हिजाब विवाद : क्रिया से ख़तरनाक प्रतिक्रिया                                                                       

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निर्मल रानी

देश में पिछले दिनों उस समय हिजाब को लेकर फिर एक बहस छिड़ गयी जबकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गत 15 दिसंबर को पटना में एक सरकारी कार्यक्रम में नव नियुक्त आयुष डॉक्टरों को नियुक्ति पत्र वितरित करते समय एक मुस्लिम महिला डॉक्टर नुसरत परवीन जोकि चेहरा ढंकने वाला हिजाब पहने हुई थीं, का हिजाब सार्वजनिक मंच से उसके चेहरे से खींच कर उतारने की कोशिश की। उस समय डॉक्टर नुसरत परवीन स्टेज पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के हाथों नियुक्ति पत्र ग्रहण करने हेतु आमंत्रित की गयी थी। इस घटना ने वहां मौजूद सभी लोगों को स्तब्ध कर दिया। इस घटना से संबंधित वायरल वीडीओ में देखा जा सकता है कि घटना के समय जहाँ डॉक्टर नुसरत असहज दिखीं वहीं उसी मंच पर मौजूद बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी भी न केवल घटना से हतप्रभ नज़र आये बल्कि उन्होंने नीतीश की ओर हाथ बढ़ाते हुये उन्हें हिजाब खींचने से रोकने की कोशिश भी की। जबकि उसी मंच पर मौजूद कुछ लोग हंसते हुये भी दिखायी दिये। इस घटना से एक बात तो साबित हो ही गयी कि नितीश कुमार जैसे अनुभवी राजनेता लगभग 75 वर्ष की आयु तक पहुँचने के बाद अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं। इसी वजह से वे पहले भी महिलाओं को लेकर की गयी एक अत्यंत अभद्र टिप्पणी के लिये आलोचना का पात्र बन चुके हैं। कभी कभी सार्वजनिक मंचों पर उनकी बेतुकी बातें व उनकी असामान्य हरकतें भी यही संकेत देती कि अब वे उम्र के उस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं जहां उन्हें सार्वजनिक सक्रिय राजनैतिक जीवन से सन्यास ले लेना चाहिये। 

                       परन्तु इस घटना के बाद जिस तरह से इसे परिभाषित करने की कोशिश की गयी वह और भी हैरान करने वाली बात थी। हिजाब खींचने की बहस को नितीश कुमार की मनोदशा से जोड़कर देखने के बजाये हिजाब धारण करने न करने को लेकर ही बहस छिड़ गयी। इस्लाम व मुस्लिम विरोध की राजनीति पर अपनी दुकानें चलाने वाले कुछ नेता तो बेशर्मी की सभी हदें पार करते हुये नितीश कुमार के बचाव में उतर आये। कांग्रेस,आर जे डी व अन्य कई विपक्षी दलों ने इसे महिलाओं और मुस्लिम समुदाय का अपमान बताया। किसी ने नितीश से मुआफ़ी की मांग की तो किसी ने इस्तीफ़ा माँगा। जबकि कुछ ने नीतीश की मानसिक स्थिति पर भी सवाल उठाए। परन्तु इस विषय पर सबसे घटिया,ओछी  अपमानजनक प्रतिक्रिया देने वाले दो नेता ऐसे भी हैं जो केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर बैठकर इस मुद्दे पर ज़हर उगल रहे हैं तथा अपनी अशिष्ट शब्दावली से देश की संवैधानिक मर्यादाओं का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं। इनमें  नितीश कुमार के हिजाब विवाद पर अपनी पहली प्रतिक्रिया संसद भवन में देने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नीतीश कुमार का खुलकर बचाव करते हुये कहा कि ‘नितीश ने कुछ भी ग़लत नहीं किया है। नियुक्ति पत्र लेने आए व्यक्ति को चेहरा दिखाना चाहिए। क्या भारत कोई इस्लामिक देश है? एयरपोर्ट, पासपोर्ट या वोटिंग के समय चेहरा दिखाना पड़ता है, तो यहां क्यों नहीं’? जब उनसे सवाल किया गया कि ख़बर है कि महिला डॉक्टर नुसरत परवीन के नौकरी छोड़ने की ख़बर है इस पर गिरिराज सिंह ग़ुस्से में यह कहते सुनाई दिये कि “नौकरी करे या जहन्नुम में जाए”। उनका यह बयान सबसे ज़्यादा विवादित रहा और इसे सांप्रदायिक व अपमानजनक बयान के रूप में देखा गया।                      ऐसा ही निम्नस्तरीय बयान उत्तर प्रदेश सरकार में मत्स्य पालन मंत्री संजय निषाद द्वारा दिया गया। उन्होंने भी नीतीश कुमार का समर्थन करते हुये कहा कि  “अरे वो भी तो आदमी हैं न… नक़ाब छू दिया तो इतना बवाल? कहीं और छू देते तो क्या हो जाता?” संजय निषाद के इस बयान को भी महिला गरिमा को आहत करने की नज़रों से देखा गया। जे डी यू के नेता व बिहार के अल्पसंख्यक मंत्री ज़मा ख़ान ने नितीश के प्रति अपनी वफ़ादारी का सुबूत देते हुये यह कहा कि यह “पिता जैसा स्नेह” था। तो कुछ मुस्लिम व महिला संगठनों द्वारा इस मामले में एफ़ आई आर दर्ज कराने व कई जगह नितीश के विरुद्ध प्रदर्शन करने व उनका पुतला जलाने की भी ख़बरें हैं। परन्तु सबसे बड़ी चिंता का विषय तो यही है कि इस घटना को लेकर नितीश के मानसिक स्वास्थ पर चर्चा होने के बजाये जिसतरह हिजाब पर ही बहस छेड़ दी गयी और वह भी अपने कुतर्कों के द्वारा, इससे यह साबित होता है कि साम्प्रदायिकता की राजनीति करने वाले मुस्लिम विरोध या इस्लामी प्रतीकों के विरोध का कोई भी अवसर गंवाना नहीं चाहते। अन्यथा किसी केंद्रीय मंत्री के इस बेहूदे कुतर्क का क्या अर्थ कि एयरपोर्ट, पासपोर्ट या वोटिंग के समय चेहरा दिखाना पड़ता है, तो यहां क्यों नहीं? संविधान की शपथ लेने वाले इस केंद्रीय मंत्री गिरिराज को पता नहीं कि एयरपोर्ट, पासपोर्ट या वोटिंग के समय महिला सुरक्षा कर्मियों द्वारा किसी महिला की स्वेच्छा से उसके अपने हाथों से हिजाब या पर्दा हटाने को कहा जाता है न कि नितीश कुमार की तरह बदतमीज़ी से किसी के चेहरे से हिजाब खींचा जाता है ? ऊपर से पीड़िता को ही यह कहना कि वह  “नौकरी करे या जहन्नुम में जाए”, इस तरह की शब्दावली देश का एक केंद्रीय मंत्री इस्तेमाल कर रहा है ?  

                  बुर्क़ा पर्दा या हिजाब को लेकर ख़ुद विश्व मुस्लिम जगत में ही बड़ा घमासान है। दुनिया के कई अलग अलग इस्लामी देश अलग अलग तरह के परदे या हिजाब की पैरवी करते रहे हैं। जबकि विश्व का एक बड़ा उदारवादी व प्रगतिशील वर्ग ऐसा भी है जो इस तरह की बंदिशों को ग़ैर ज़रूरी समझता है। कोई इसे इस्लामिक व शरिया से जुड़ी व्यवस्था बताता है तो कोई इसे सामाजिक या भौगोलिक ज़रूरतों का हिस्सा बताता है। कई महिलायें स्वयं इसका विरोध करती हैं तो कई इसे अपनी इस्मत से जोड़कर देखती हैं। परन्तु यहाँ बहस इन विषयों पर नहीं होनी चाहिये बल्कि बहस का विषय नितीश कुमार द्वारा हिजाब को लेकर की गयी उनकी अभद्र क्रिया होनी चाहिये। और इस क्रिया से भी ख़तरनाक उन प्रतिक्रियाओं पर चर्चा होनी चाहिये जोकि उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे मंत्री स्तर के लोगों द्वारा व्यक्त की गयी हैं। 

                                   

                            निर्मल रानी  

जब अस्वस्थता में भी अटल जी ने किया ‘राष्ट्रधर्म’ का लोकार्पण

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– कर्मचारी थक जाते तो अटल जी चलाते थे मशीन

लखनऊ,24 दिसंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रान्त प्रचारक भाऊराव देवरस ने अटल जी को हरदोई जिले की सण्डीला तहसील में प्रचारक के रूप में भेजा था। अगस्त 1947 में भाऊराव देवरस और सह प्रान्त प्रचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मन में आया कि भविष्य के दिशा-दर्शन के लिए ​एक सांस्कृतिक पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। अन्तत: राष्ट्रधर्म के प्रकाशन की योजना बनी।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवन पुत्र बादल ने बताया कि 31 अगस्त, 1947 की श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के पुनीत अवसर पर राष्ट्रधर्म का प्र​थम अंक प्रकाशित हुआ। पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर ही अटल जी की प्रसि​द्ध कविता ‘हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन, रग—रग हिन्दू मेरा परिचय’ छपी। साथ ही इसी अंक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिन्तनपरक लेख ​’चिति’ भी छपा। इस पत्रिका की तीन हजार प्रतियां हाथों हाथ बिक गईं। इसका दूसरा संस्करण निकालने के लिए पुन: 500 प्रतियों का आदेश दिया गया। देखते ही देखते पत्रिका का प्रसार दूसरे अंक का 4000 और तीसरे अंक का 12000 तक पहुंच गया। पूरे देश में युवा संपादक अटल जी की धूम मच गई।

डॉ. बादल ने बताया कि उस समय अंक निकालना इतना सरल नहीं था। हाथ से मशीन चलानी पड़ती थी। जब कर्मचारी थक जाते थे तो अटल जी और दीनदयाल उपाध्याय जी स्वयं ही मशीन हाथ से चलाते थे। इतना ही नहीं स्वयं अटल जी साइकिल पर राष्ट्रधर्म के बण्डल लेकर चारबाग रेलवे स्टेशन और लखनऊ के स्थानीय अभिकर्ताओं के यहां पहुंचाते थे।

बाद में तो अटल जी इस देश के जन-मन में बस गए। तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे। राष्ट्रधर्म के प्रबंध संपादक रहे डॉ.बादल ने बताया कि कालान्तर में जब 2007 का अंक जनसंघ और भाजपा विशेषांक के रूप में निकाला गया तो लोकार्पण के लिए आग्रह करने हम अटल जी से मिलने दिल्ली गए। उन्होंने कहा कि अब हम तो लखनऊ चल नहीं सकते। हमने तुरन्त कहा कि अटल जी। हम तो दिल्ली आ सकते हैं। अटल जी मुस्कुराये और कहा आ जाइए, हम भी आ जायेंगे। और फिर दिनांक 07 अगस्त, 2007 अटल जी और आडवाणी जी के द्वारा दोनों अंको का विमोचन नई दिल्ली में संपन्न हुआ। अटल जी जैसे श्रेष्ठ वक्ता के सामने हमें कार्यक्रम संचालन का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। विधि का विधान अगस्त 1947 में राष्ट्रधर्म से प्रारम्भ हुई उनकी यह सामाजिक यात्रा 07 अगस्त 2007 को राष्ट्रधर्म के जनसंघ और भाजपा विशेषांक के लोकार्पण के साथ समाप्त हुई। अटल जी का यह अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था।

राहुल के आरोप : विदेशी धरती पुराने बोल

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बालमुकुंद ओझा

हमारे देश की सियासत गजब की है। देश में जहां प्रियंका गांधी की स्वीकार्यता बढ़ने की चर्चा हो रही है वहीं भाई राहुल गांधी विदेशी धरती पर अपने विवादग्रस्त बयानों से घिरते नज़र आ रहे है। खैर आज चर्चा हो रही है राहुल गाँधी की गतिविधियों की। कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी एक बार फिर अपने विदेश दौरों पर दिए गए बयानों के कारण विवादों में हैं। राहुल गांधी अपनी नई विदेश यात्रा में भी अपने पुराने बोल को बरकरार रखे हुए हैं। राहुल विदेश दौरे पर जर्मनी में हैं जहां से उन्होंने अपनी पुरानी परिपाटी को कायम रखते हुए एक बार फिर देश की संवैधानिक संस्थाओं पर बीजेपी के कब्जे का आरोप लगाया है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि देश के संस्थागत ढांचों पर भाजपा का कब्जा हो चुका है और जांच एजेंसियों का राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।  ED-CBI जैसी एजेंसियों का दुरुपयोग कर रही है। राहुल ने चुनाव प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए और INDIA गठबंधन की एकजुटता पर बात की।

इस पर पलटवार करते हुए भाजपा ने कहा कि भारत की संस्थाओं को बदनाम करना और भारतीय संस्कृति व सनातन के खिलाफ बोलना राहुल गांधी की आदत बन चुकी है। ऐसा लगता है कि राहुल गांधी ने विदेशी आकाओं से भारत, भारतीय संस्कृति और सम्मान के खिलाफ बोलने की सुपारी ले रखी है।

कांग्रेसी नेता राहुल गाँधी एक बार फिर अपने देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के बहाने देश के लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला बोलते तनिक भी नहीं हिचकिचाएं। उन्होंने पूर्व की भांति अपनी जर्मनी यात्रा में मोदी पर ताबड़तोड़ हमला करते हुए विदेशी धरती पर विवादस्पद बयानबाज़ी कर देश को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। मगर वे यह भूल गए देश की जनता ने नेहरू, इंदिरा और राजीव की भांति मोदी को भी बहुमत के साथ देश का ताज पहनाया है। गौरतलब है राहुल ने देश की सवैंधानिक संस्थाओं यथा चुनाव आयोग, न्यायालय और प्रेस पर भी समय समय पर हमला बोला है।

राहुल हमेशा मोहब्बत की बात करते है मगर मोदी और आरएसएस के बारे में अपनी नफरत छुपा नहीं पाते। हालाँकि वे कहते है मैं मोदी से नफरत नहीं करता। मगर विदेशी धरती पर जाकर मोदी और संवैधानिक संस्थाओं पर बेसिरपैर के आरोप लगाना देशवासियों के गले नहीं उतरता । राहुल के बयानों पर भाजपा आग बबूला हो रही है वहां इंडि गठबंधन की सहयोगी पार्टियां राहुल के बयानों का समर्थन कर अपनी एकजुटता प्रदर्शित कर रही है।

राहुल देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार पर अपनी बात कहे और इन मुद्दों पर मोदी और सरकार की जमकर आलोचना करें यह समझ में आने वाली है मगर देश के बाहर जाकर संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर क्या हासिल करना चाहते है, यह समझ से परे है। 

कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में 52 से 99 पर पहुँचने के बाद जो गंभीरता पार्टी में आनी चाहिए थी वह कमोवेश देखने को नहीं मिली है। नेता विपक्ष बनने के बाद राहुल गांधी के गुस्से में बढ़ोतरी देखी जा रही है। राहुल गांधी को बहुत गुस्सा आता है जब लोग उन्हें तरह तरह की उपमाओं से नवाजते है।  राहुल कई बार यात्राएं निकालकर लोगों के बीच गए। हर तबके के लोगों से मिले। उनका प्यार भी उन्हें मिला । राहुल गांधी की एक दशक की सियासी यात्रा पर दृष्टिपात करें तो पाएंगे कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने मोदी पर तरह तरह के आरोप लगाए। इससे पूर्व जब दुनिया भर के दिग्गज नेता दिल्ली में आयोजित जी -20 में शामिल होकर जहाँ भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ग्लोबल लीडर के रूप में खुलकर सराहना कर रहे थे तो  वहीं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी विदेशी धरती पर जाकर देश और मोदी के खिलाफ जहर उगल रहे थे । यह वह वक्त था जब पूरी दुनिया की नजर भारत पर थी । ऐसे समय में भी  राहुल गांधी भारत को कोसने से बाज नहीं आये । गौरतलब है राहुल ने देश की सवैंधानिक संस्थाओं यथा चुनाव आयोग, न्यायालय और प्रेस पर भी समय समय पर हमला बोला है ।

बालमुकुंद ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर


मौसम की पहली बर्फबारी ने कश्मीर के शीतकालीन पर्यटन क्षेत्र में फूंकी नई जान

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श्रीनगर, 24 दिसंबर (हि.स.)। मौसम की पहली बर्फबारी ने कश्मीर के शीतकालीन पर्यटन क्षेत्र में नई जान फूंक दी है। ट्रैवल ऑपरेटरों ने पर्यटकों की पूछताछ और बुकिंग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की है। पिछले सप्ताह गुलमर्ग में भारी बर्फबारी हुई। इससे पर्यटक फूलों के मैदान में नव वर्ष मनाने के लिए उत्साहित हुए।

ताज़ा बर्फबारी ने गुलमर्ग, पहलगाम और सोनमर्ग जैसे लोकप्रिय स्थलों को शीतकालीन स्वर्ग में बदल दिया है जिससे पर्यटकों और स्थानीय व्यवसायों दोनों में उत्साह का माहौल है। ट्रैवल एजेंट्स एसोसिएशन ऑफ कश्मीर (टीएएएके) के अध्यक्ष रऊफ ट्राम्बू ने कहा कि बर्फबारी ने पर्यटन क्षेत्र से जुड़े लोगों का आत्मविश्वास बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि बर्फबारी की इस पहली बौछार ने टूर ऑपरेटरों में उम्मीद जगा दी है। कल से पर्यटकों के फोन और पूछताछ में तेजी से वृद्धि हुई है।

रऊफ ट्राम्बू ने कहा कि आने वाले हफ्तों में और बर्फबारी होने से पर्यटकों की रुचि और बढ़ सकती है। उन्होंने कहा कि अगर एक-दो बार और बर्फबारी होती है तो हमें पूछताछ, बुकिंग और पर्यटकों की आवाजाही में और भी अधिक वृद्धि की उम्मीद है। अन्य संचालकों ने बताया कि उन्हें होटल बुकिंग, स्की किराये, गोंडोला की सवारी और निर्देशित पर्यटन के लिए ऑनलाइन पूछताछ प्राप्त हो रही है।

श्रीनगर स्थित ट्रैवल ऑपरेटर और कनेक्ट कश्मीर मोबाइल के मालिक तौकीर ने कहा कि पर्यटक बर्फ का अनुभव करने के लिए उत्सुक हैं और प्रतिक्रिया अच्छी रही है। हमारे काउंटरों पर फिर से लंबी कतारें लगनी शुरू हो गई हैं और कई लोग मौके पर ही पैकेज बुक कर रहे हैं। पर्यटन केंद्रों के होटलों, एडवेंचर एक्टिविटी ऑपरेटरों और रेस्तरां में भी पर्यटकों की संख्या में वृद्धि देखी गई है, वहीं पर्यटक भी ताजा बर्फबारी को लेकर उत्साहित हैं। पूछताछ बढ़ने और बुकिंग में वृद्धि के साथ कश्मीर के पर्यटन क्षेत्र के हितधारकों को उम्मीद है कि बर्फबारी का यह पहला दौर एक सफल शीतकालीन सीजन की नींव रखेगा।

सिर्फ सजा काटने का स्थान नहीं कारागार,बल्कि एक सुधार गृह है – डीएम

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महोबा, 24 दिसंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले की जिलाधिकारी गजल भारद्वाज ने पुलिस अधीक्षक प्रबल प्रताप सिंह के साथ मंगलवार की रात उपकारागार के निरीक्षण कर निरुद्ध बंदियों के बैरकों, भोजनालय, रसोई घर, अस्पताल के साथ ही अन्य व्यवस्थाओं का धरातल पर जायजा लिया। इसके साथ ही महिला बंदियों के बैरकों का गहनता से अवलोकन किया है।

निरीक्षण के दौरान डीएम गजल भारद्वाज ने कहा कि जेल परिसर में किसी भी प्रकार की प्रतिबंधित सामग्री प्रवेश न कर पाए इसके लिए कड़ी सतर्कता बरतें। बंदियों को उपलब्ध कराई जाने वाली चिकित्सा एवं भोजन सुविधाओं की नियमित निगरानी करने के निर्देश दिए हैं।

इस दौरान अधिकारियों ने कहा कि कारागार एक सुधार गृह है , यहां निरुद्ध सुधार की दिशा में प्रेरित करने के लिए सकारात्मक गतिविधियों एवं परामर्श कार्यक्रमों का संचालन किया जाना चाहिए। इस दौरान जेलर पी के मिश्रा समेत अन्य मौजूद रहे हैं।

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नववर्ष पर खाटू में बदली दर्शन व्यवस्था, 29 दिसंबर से दाे जनवरी तक वीआईपी एंट्री बंद

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सीकर, 24 दिसंबर (हि.स.)। नववर्ष पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए खाटूश्यामजी मंदिर की दर्शन व्यवस्था में बदलाव किया गया है। मंदिर कमेटी ने निर्णय किया है कि 29 दिसंबर से दाे जनवरी तक विशेष (वीआईपी) प्रवेश व्यवस्था लागू नहीं रहेगी। इस दौरान केवल प्रोटोकॉल श्रेणी के श्रद्धालुओं को ही अलग प्रवेश की अनुमति दी जाएगी, जबकि अन्य सभी श्रद्धालुओं को सामान्य कतार के माध्यम से दर्शन करने होंगे।

रींगस में नववर्ष, एकादशी एवं पांच दिवसीय खाटू श्यामजी मेले को लेकर प्रशासनिक तैयारियों की समीक्षा के लिए एडिशनल एसपी दीपक गर्ग की अध्यक्षता में भैंरूजी मोड़ स्थित एएसपी कार्यालय में बैठक हाे चुकी है। बैठक में निर्णय किया गया कि मेले के दौरान दो दिन तक खाटूश्यामजी रोड को नो-व्हीकल जोन घोषित किया जाएगा। साथ ही चिकित्सा विभाग एवं फायर ब्रिगेड को अलर्ट मोड पर रहने के निर्देश दिए गए।

बैठक में रेलवे स्टेशन पर श्रद्धालुओं के प्रवेश-निकास को सुव्यवस्थित करने तथा भीड़ नियंत्रण के पुख्ता इंतजाम करने पर जोर दिया गया। रेलवे स्टेशन रोड एवं आसपास की दुकानों से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए। चाय की थड़ियों पर घरेलू गैस सिलेंडर के अवैध उपयोग पर सख्त कार्रवाई के आदेश भी जारी किए गए।

अधिकारियों को निर्देशित किया गया कि यदि वाहन चालक श्रद्धालुओं से निर्धारित किराए से अधिक वसूली करते पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

सरकारी स्कूल और शिक्षा व्यवस्था की सड़ांध 

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हरियाणा में शिक्षा सुधार के दावे जितने ऊँचे हैं, जमीनी हकीकत उतनी ही कड़वी है। पंचकूला के सरकारी स्कूल में राज्यपाल के निरीक्षण के दौरान उजागर हुई बदहाली बताती है कि समस्या किसी एक विद्यालय की नहीं, पूरे तंत्र की है। गंदे शौचालय, पानी का अभाव और जर्जर ढाँचा बच्चों के स्वास्थ्य व सम्मान पर सीधा आघात हैं। करोड़ों के बजट और योजनाओं के बावजूद बुनियादी सुविधाएँ न मिलना प्रशासनिक विफलता का प्रमाण है। यदि अब भी जवाबदेही तय नहीं हुई, तो हरियाणा का भविष्य भी इन्हीं बदहाल स्कूलों जैसा बनता जाएगा।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा, जो अपने को खेल, सैनिक परंपरा और विकास के दावों के लिए जाना जाता है, वहाँ के सरकारी स्कूलों की जमीनी सच्चाई अक्सर इन दावों से उलट दिखाई देती है। पंचकूला स्थित राजकीय मॉडल संस्कृति प्राथमिक विद्यालय में राज्यपाल प्रो. असीम घोष के निरीक्षण के दौरान सामने आई तस्वीर केवल एक स्कूल की कहानी नहीं है, बल्कि यह हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था की उस सच्चाई को उजागर करती है, जिसे वर्षों से फाइलों और आंकड़ों के पीछे छिपाया जाता रहा है। जब किसी राज्य के राज्यपाल को स्कूल के शौचालयों की दुर्गंध से नाक ढकनी पड़े, तो यह घटना केवल असहजता नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर लगे प्रश्नचिह्न की तरह देखी जानी चाहिए।

हरियाणा सरकार पिछले कुछ वर्षों से “मॉडल संस्कृति स्कूल”, “स्मार्ट स्कूल” और “डिजिटल क्लासरूम” जैसे शब्दों के साथ शिक्षा के आधुनिकीकरण के दावे करती रही है। बजट भाषणों में स्कूलों के लिए करोड़ों रुपये की घोषणाएँ होती हैं, नई योजनाओं के पोस्टर लगते हैं और उद्घाटन समारोहों में विकास की तस्वीर पेश की जाती है। लेकिन पंचकूला का यह विद्यालय बताता है कि काग़ज़ों पर चल रहा विकास ज़मीन पर दम तोड़ रहा है। शौचालयों में पानी नहीं, दरवाज़े टूटे हुए हैं और बुनियादी ढाँचा इस कदर जर्जर है कि कर्मचारियों को सीढ़ियों के अभाव में जुगाड़ से छत पर चढ़ना पड़ता है।

यह स्थिति एक दिन में पैदा नहीं हुई। यह वर्षों की प्रशासनिक लापरवाही, निरीक्षण तंत्र की विफलता और जवाबदेही के अभाव का परिणाम है। हरियाणा में शिक्षा विभाग की एक पूरी संरचना है—ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, इंजीनियरिंग विंग, निरीक्षण समितियाँ और स्कूल प्रबंधन समितियाँ। सवाल यह है कि जब तक राज्यपाल नहीं आए, तब तक किसी को यह दुर्गंध क्यों नहीं आई। क्या ये सभी अधिकारी अंधे थे, या फिर उन्होंने सब कुछ देखकर भी अनदेखा करने को ही अपनी प्रशासनिक संस्कृति बना लिया है।

हरियाणा जैसे राज्य में, जहाँ ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच पहले से ही गहरी खाई है, सरकारी स्कूलों की यह हालत सामाजिक असमानता को और गहरा करती है। जिन परिवारों के पास संसाधन हैं, वे अपने बच्चों को निजी स्कूलों में भेज देते हैं। लेकिन जिनके पास विकल्प नहीं, उनके बच्चे इन्हीं स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं। ऐसे में गंदे शौचालय, टूटी इमारतें और असुरक्षित वातावरण केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का रूप ले लेते हैं।

शौचालयों की बदहाली को अक्सर एक मामूली समस्या समझ लिया जाता है, लेकिन वास्तव में यह शिक्षा की गुणवत्ता से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है। विशेषकर हरियाणा में, जहाँ बालिकाओं की शिक्षा और ड्रॉपआउट दर पहले से ही चिंता का विषय रही है, स्वच्छ और सुरक्षित शौचालयों का अभाव लड़कियों को स्कूल से दूर करने का बड़ा कारण बनता है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे अभियानों की सार्थकता तब सवालों के घेरे में आ जाती है, जब स्कूलों में बेटियों के लिए बुनियादी सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं होतीं।

राज्यपाल का आक्रोश स्वाभाविक था और उन्होंने तत्काल सुधार के निर्देश भी दिए। लेकिन हरियाणा का अनुभव बताता है कि ऐसे निर्देश अक्सर तात्कालिक सफ़ाई और लीपापोती तक सीमित रह जाते हैं। कुछ दिनों तक शौचालय चमकते हैं, टूटे दरवाज़े अस्थायी रूप से ठीक कर दिए जाते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। यदि इस मामले में भी दोषी अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो यह घटना भी बाकी निरीक्षणों की तरह फाइलों में दफन हो जाएगी।

हरियाणा सरकार शिक्षा पर होने वाले खर्च को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है। लेकिन खर्च और परिणाम के बीच का अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है। सवाल उठता है कि पैसा आखिर जा कहाँ रहा है। क्या निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का इस्तेमाल हो रहा है, क्या ठेकेदारी व्यवस्था में भ्रष्टाचार है, या फिर निगरानी का तंत्र पूरी तरह से ढीला पड़ चुका है। जब तक इन सवालों का ईमानदारी से जवाब नहीं खोजा जाएगा, तब तक किसी भी नई योजना से वास्तविक सुधार की उम्मीद करना व्यर्थ है।

इस पूरे प्रकरण में समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। हरियाणा में अभिभावक, पंचायतें और स्थानीय जनप्रतिनिधि अक्सर तब तक चुप रहते हैं, जब तक मामला मीडिया में नहीं आ जाता। स्कूल प्रबंधन समितियाँ काग़ज़ों में तो हैं, लेकिन उन्हें न तो पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं और न ही उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता है। यदि स्थानीय समुदाय स्कूलों की निगरानी में सक्रिय भूमिका निभाए, तो ऐसी बदहाली को वर्षों तक छिपाए रखना संभव नहीं होगा।

यह भी ध्यान देने की ज़रूरत है कि हरियाणा के सरकारी स्कूल केवल शिक्षा के केंद्र नहीं, बल्कि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में बच्चों के लिए सुरक्षा, पोषण और सामाजिक समावेशन का माध्यम भी हैं। मध्याह्न भोजन योजना, स्वास्थ्य जांच और छात्रवृत्तियाँ इन्हीं स्कूलों के ज़रिये पहुँचती हैं। जब स्कूल का माहौल ही असुरक्षित और अपमानजनक हो, तो इन योजनाओं का उद्देश्य भी कमजोर पड़ जाता है।

इस घटना को हरियाणा के संदर्भ में एक चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए। सुधार केवल आदेश जारी करने से नहीं होगा। ज़रूरत है कि स्कूलों के बुनियादी ढाँचे का नियमित स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, निर्माण और रखरखाव से जुड़े ठेकों की पारदर्शी जांच हो, और जिन अधिकारियों ने लापरवाही बरती है, उनके खिलाफ उदाहरणात्मक कार्रवाई की जाए। साथ ही, स्कूल प्रबंधन समितियों और पंचायतों को वास्तविक अधिकार देकर उन्हें जवाबदेही का हिस्सा बनाया जाए।

हरियाणा की पहचान मेहनती किसानों, सैनिकों और खिलाड़ियों की भूमि के रूप में रही है। यह राज्य तभी अपनी उस पहचान को कायम रख सकता है, जब उसकी अगली पीढ़ी को सम्मानजनक और सुरक्षित शैक्षणिक वातावरण मिले। बदबूदार शौचालय, टूटे दरवाज़े और जर्जर भवन किसी भी विकसित राज्य की पहचान नहीं हो सकते।

राज्यपाल का रूमाल इस बात का प्रतीक बन गया है कि अब स्थिति छिपाने लायक नहीं रही। यह हरियाणा सरकार, प्रशासन और समाज—तीनों के लिए आत्ममंथन का क्षण है। यदि इस घटना से सबक लेकर ठोस और स्थायी सुधार किए गए, तो यह निरीक्षण एक सकारात्मक मोड़ साबित हो सकता है। लेकिन यदि इसे भी कुछ दिनों की चर्चा के बाद भुला दिया गया, तो यह बदहाली हरियाणा के भविष्य को भी उसी तरह प्रभावित करेगी, जैसे वह आज उसके स्कूलों को कर रही है।

अंततः सवाल यही है कि क्या हरियाणा अपने बच्चों को केवल नारों और योजनाओं में “मॉडल” बनाना चाहता है, या वास्तव में उन्हें एक ऐसा स्कूल देना चाहता है, जहाँ स्वच्छता, सुरक्षा और सम्मान बुनियादी अधिकार हों। शिक्षा की असली कसौटी यही है, और इसी पर राज्य का भविष्य टिका हुआ है।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

ट्रक के नीचे आकर मर जाओ तो मिलेंगे पांच लाख, अधिक मुआवजा को लेखपाल ने आगजनी पीड़ित को दी मरने की सलाह

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महोबा, 24 दिसंबर (हि.स.)।बुंदेलखंड के महोबा जिले में एक लेखपाल द्वारा संवेदनहीनता दिखाते हुए एक ऐसी हास्यादपद बात कही गई , जोकि जिले भर में चर्चा का विषय बनी है। जहां लेखपाल साहब ने घर जलने से परेशान व्यक्ति को अधिक मुआवजा पाने के लिए मोटर साइकिल सहित ट्रक के नीचे आकर मरने की सलाह दे डाली, जिससे पीड़ित को पांच लाख तक का मुआवजा मिल जाएगा। जिसको सुनने के बाद पीड़ित हैरत में पड़ गया और एक दम शांत हो गया । जिसका ऑडियो वायरल हो रहा है। लेखपाल के द्वारा दी गई अमानवीय सलाह से सभी हैरान हैं।

दरअसल पूरा मामला जनपद के चरखारी तहसील क्षेत्र के चंदौली गांव का है। जहां ग्रामीण शिव प्रसाद अपनी पत्नी फुलिया के साथ गांव में रहकर जीवन यापन करते हैं। और उनके चार बेटे हैं। जिनमें जयपाल , बृजेंद्र, भूपेंद्र और राघवेंद्र चारों ईंट भट्टों में काम करते हैं।

राघवेंद्र ने बताया कि वह सब भाइयों के साथ महानगर में ईंट भट्टे में थे । घर में माता पिता अकेले थे। एक दिसंबर को उनके घर में आगजनी की घटना हो गई । इसमें भाई भूपेंद्र और चाचा चंद्रपाल का लाखों रूपये का सामान जलकर खाक हो गया था। सूचना पर पहुंचे लेखपाल ने नुकसान की तीन लाख रूपये की रिपोर्ट तैयार की थी।

राघवेंद्र ने ने बताया कि लेखपाल साहब से फोन पर आगजनी से हुए नुकसान का अधिक मुआवजा की गुहार लगाई तो साहब ने कहा कि केवल चार हजार ही मिलेगा जो करना हो सो कर लो। और फिर उनसे मिन्नत करने पर उन्होंने ऐसी बात कही जिसके सुनने के बाद उसकी बोलती बंद हो गई। लेखपाल ने अधिक मुआवजा पाने के उसको मोटर साइकिल के साथ ट्रक के नीचे आकर मरने की सलाह दे दी । कहा कि इसके बाद उसकी मौत पर पांच लाख का मुआवजा मिल जाएगा।

बुधवार को चरखारी तहसीलदार आर एन मिश्रा ने बताया कि पीड़ित का आंशिक नुकसान होने पर चार हजार रूपये की रिपोर्ट भेजी है। अधिक मुआवजा पाने के लिए लेखपाल के द्वारा जो बात कही गई है उसके वायरल ऑडियो की जांच की जा रही है। जांच के बाद नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

इसरो ने रचा इतिहास, श्रीहरिकोटा से संचार उपग्रह किया लॉन्च

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पीएम मोदी ने इसरो को दी बधाई

श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश), 24 दिसंबर, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने इतिहास रच दिया है। इसरो ने इस साल के अपने आखिरी मिशन में सबसे बड़ी कम्युनिकेशन सैटेलाइट ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 को सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया है। यह पूरी तरह से कॉमर्शियल लॉन्चिंग है। मिशन के तहत अमेरिकी कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 संचार उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित किया गया। इसरो ने इसकी लॉन्चिंग के लिए अपने एलवीएम3 रॉकेट का इस्तेमाल किया। इस लॉन्च व्हीकल की छठवीं उड़ान रही और वाणिज्यिक मिशन के लिए तीसरी। भारत के इस लॉन्च व्हीकल को पहले ही इसकी क्षमताओं के लिए ‘बाहुबली’ नाम दिया जा चुका है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो को भारतीय जमीन से अब तक का सबसे भारी सैटेलाइट लांच करने पर बधाई दी है। पीएम मोदी ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि… एलवीएम3-एम6 का सफल प्रक्षेपण, जिसने भारतीय धरती से अब तक का सबसे भारी उपग्रह, अमेरिका का अंतरिक्ष यान ब्लू बर्ड ब्लॉक-2, अपनी निर्धारित कक्षा में स्थापित किया, भारत की अंतरिक्ष यात्रा में एक गौरवपूर्ण मील का पत्थर है। यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास को और मजबूत करता है।

यह प्रक्षेपण न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) और अमेरिका की कंपनी एएसटी स्पेसमोबाइल के बीच हुए समझौते के तहत होगा। एनएसआईएल इसरो की व्यावसायिक इकाई है। इसरो ने बताया कि यह संचार उपग्रह करीब 6,100 किलोग्राम वजनी है। यह अब तक एलवीएम3 रॉकेट से पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजा जाने वाला सबसे भारी उपग्रह हो

एएसटी स्पेसमोबाइल ने इसे अगली पीढ़ी के कम्युनिकेशन सैटेलाइट, ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 से दुनिया भर के स्मार्टफोन को सीधे 24/7 हाई-स्पीड सेलुलर ब्रॉडबैंड देने के लिए डिजाइन किया गया है। ब्लू बर्ड ब्लॉक-2 सैटेलाइट में 223 एम2 का फेज्ड एरे है, जो लो अर्थ ऑर्बिट में तैनात किया गया अब तक का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट बनाता है।

यह इसरो का 101वां मिशन है। यह ऐतिहासिक मिशन अगली पीढ़ी का ऐसा संचार उपग्रह स्थापित करेगा, जिसे दुनियाभर में सीधे स्मार्टफोन को उच्च गति वाली सेल्युलर ब्रॉडबैंड सेवा देने के लिए डिजाइन किया गया है। ब्लूबर्ड ब्लॉक-2 मिशन का उद्देश्य उपग्रह के जरिये सीधे मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना है। यह नेटवर्क दुनिया में कहीं भी, कभी भी, सभी के लिए 4-जी और 5-जी वॉयस-वीडियो कॉल, संदेश, स्ट्रीमिंग और डेटा सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इस प्रक्षेपण की पूर्व संध्या पर इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन ने तिरुमाला के श्री वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में पूजा की।

भाजपा कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने की पटना के काली मंदिर में पूजा-अर्चना

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पटना, 24 दिसंबर (हि.स.)। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन पटना दौरे पर हैं। बुधवार सुबह उन्होंने पटना के बांस घाट स्थित काली मंदिर और अखंडवासनी देवी मंदिर में पूजा-अर्चना की। नबीन कई प्रमुख मंदिरों में जाएंगे। साथ ही पटना स्थित गुरुद्वारा में भी माथा टेकेंगे।

कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन के साथ प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी भी रहे। इस दौरान दोनों नेताओं ने बिहारवासियों सहित देशवासियों की सुख, शांति और समृद्धि की कामना की। मंदिर परिसर में पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भी मौजूदगी रही।

उल्लेखनीय है कि नबीम मंगलवार को पटना पहुंचे। उनके स्वागत को बिहार भाजपा ने बड़े शक्ति प्रदर्शन में तब्दील कर दिया। पटना की सड़कों पर करीब 6 किलोमीटर लंबा रोड शो निकाला गया। इसके बाद मिलर स्कूल ग्राउंड में भव्य अभिनंदन समारोह आयोजित किया गया। नितिन नबीन ने भाजपा प्रदेश मुख्यालय में भाजपा विधानमंडल दल के नेताओं के साथ अहम बैठक भी की। राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष का पद संभालने के बाद यह नितिन नबीन का पहला बिहार है।