आरएनआई राष्ट्रों के लिए ‘आत्ममंथन का दर्पण’ है: राम नाथ कोविंद

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नई दिल्ली, 19 जनवरी (हि.स.)। पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने कहा कि रिस्पॉन्सिबल नेशन्स इंडेक्स (आरएनआई) केवल प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला स्कोरबोर्ड नहीं है, बल्कि राष्ट्रों के लिए ‘आत्ममंथन का दर्पण’ है।राम नाथ कोविंद ने यह बात आज नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन की ओर से आयोजित कार्यक्रम में देश की पहली ‘रिस्पॉन्सिबल नेशंस इंडेक्स’ रिपोर्ट जारी करने के दौरान कही। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रों को उनके नागरिकों, पर्यावरण और वैश्विक समुदाय के प्रति अधिक जवाबदेह बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है। इस इंडेक्स में भारत का स्थान 16वां है जबकि पहले स्थान पर सिंगापुर और दूसरे पर स्विटजरलैंड है।

कोविंद ने कहा कि राष्ट्रों की महानता का निर्धारण ‘बल’ से नहीं बल्कि ‘चरित्र’ से होना चाहिए। विकसित देशों का लक्ष्य अब वैश्विक प्रभुत्व नहीं, बल्कि वैश्विक सुधारों का मार्गदर्शक बनना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोई भी देश आर्थिक रूप से संपन्न होते हुए भी गैर जिम्मेदार हो सकता है। इसलिए केवल उच्च प्रति व्यक्ति आय, अच्छे शासन का एक मानक नहीं हो सकती। किसी भी देश की प्रगति के सच्चे मानक के रूप में पहले मानवीय विकास इंडेक्स के विकसित होने के पीछे यही मूल कारण था। इस मानक में प्रति व्यक्ति आय के अतिरिक्त स्वास्थ्य और शिक्षा को भी एक समावेशी मानदंड के रूप में शामिल किया गया।

कोविंद ने कहा कि यह इंडेक्स एक व्यापक अध्ययन है जिसमें शासन से जुड़े कई अहम पहलुओं और नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के मानदंडों को शामिल किया गया है। यह एक ऐसा कदम है जो अभी प्रगति पर है और भविष्य में इसकी और परख तथा बौद्धिक व्याख्याएं हो सकती हैं लेकिन यह आने वाली पीढ़ियों के लिए शांतिपूर्ण और समृद्ध भविष्य के निर्माण की दिशा में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा, “मुझे खुशी है कि आरएनआई नवीकरणीय ऊर्जा, जैव विविधता और स्वच्छ पर्यावरण जैसे इस धरती को बचाने के लिए किए गए प्रयासों पर बल देता है।”

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा ने कहा कि आज के दौर में विकास की परिभाषा केवल आर्थिक नहीं होनी चाहिए, बल्कि तकनीकी सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता पर आधारित होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यह संदेश स्पष्ट करता है कि वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए केवल विकास ही काफी नहीं है, बल्कि राष्ट्रों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार और आपस में एकजुट होना पड़ेगा।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शांतिश्री डी. पंडित ने कहा कि आने वाला समय केवल शक्ति या प्रभुत्व का नहीं होगा बल्कि भविष्य का वैश्विक क्रम संवाद, मानवता के प्रति जवाबदेही और उत्तरदायित्व से तय होगा, जिसमें भारत एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा।

दस्तावेजों के अनुसार, वर्तमान में दुनिया जलवायु परिवर्तन, युद्ध, मानवीय आपातकाल और लोकतंत्र पर बढ़ते दबाव जैसे संकटों से जूझ रही है जहां देशों की क्षमताएं तो बढ़ी हैं, लेकिन उनकी ‘नैतिक जिम्मेदारी’ में कमी देखी गई है।

इस मौके पर आर्थिक विकास संस्थान और 15वें वित्त आयोग के अध्यक्ष एन.के. सिंह, पेरिस विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. एडुआर्ड हस्सन, भारतीय प्रबंधन संस्थान, मुंबई के निदेशक प्रो. मनोज कुमार तिवारी, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण कुमार मिश्रा और वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. जगदीश मुखी सहित अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे।

उल्लेखनीय है कि यह पहल ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और नैतिक संयम जैसे सभ्यतागत मूल्यों को वैश्विक स्तर पर आधुनिक नीतिगत उपकरणों में बदलने के विश्वास पर आधारित है। इससे राष्ट्रों की प्रगति को केवल उनकी संपत्ति या जीडीपी के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जिम्मेदारियों के आधार पर मापेगा। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, भारतीय प्रबंधन संस्थान, मुंबई और डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर का भी सहयोग है।

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