बनारस धर्म, विद्या, कला और सह-अस्तित्व की भूमि है: उप सभापति हरिवंश

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नई दिल्ली, 08 फरवरी (हि.स.)। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि बनारस केवल एक शहर नहीं, बल्कि धर्म, विद्या, कला और सह-अस्तित्व की भूमि है।

हरिवंश ने यह बात नई दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) में नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘काशीस्थ’ के लोकार्पण पर कही। पुस्तक में काशी पर एकाग्र 13 प्रसिद्ध साहित्यकारों के 17 लेख शामिल हैं। पुस्तक का सम्पादन व्योमेश शुक्ल ने किया है।

मुख्य वक्ता के रूप में हरिवंश ने काशी नागरी प्रचारिणी सभा पर अपने विचार साझा करते हुए कहा कि बनारस, काशी या वाराणसी केवल एक शहर नहीं, बल्कि धर्म, विद्या, कला, संगीत और मानवीय सहअस्तित्व की भूमि है। काशी पर अब तक जितनी भी पुस्तकें लिखी गई हैं, यह पुस्तक उन सबसे भिन्न है, क्योंकि यह काशी को केवल विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करती है। इसकी गलियां, घाट, स्मृतियां और बौद्धिक परंपराएं हमारी अमूल्य धरोहर हैं।

उन्होंने कहा, “मैं मानता हूं कि तकनीक कितनी भी सशक्त हो जाए, वह पुस्तक का स्थान नहीं ले सकती। परम्परा को नए संदर्भों में आगे बढ़ाना ही बौद्धिक कर्म है। यह पुस्तक औचित्य, भाव, भाषा और दर्शन, हर स्तर पर पाठक को समृद्ध करती है। मुझे विश्वास है कि ऐसे प्रयास हिन्दी के बौद्धिक संसार को और अधिक सशक्त एवं समृद्ध करेंगे।”

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि ‘काशीस्थ’ काशी की परम्परा को समग्रता में समझने का एक सशक्त प्रयास है, जो अकादमिक जगत के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा। उन्होंने कहा, काशी आपको पकड़ कर रखती है, उसमें गजब का सम्मोहन है। काशी को बहुत सारी उपमाएं दी गई हैं लेकिन यह एक शहर नहीं, बल्कि संज्ञा है। यह एक जगह नहीं, कई जगह विद्यमान है। काशीमय हो जाना अपने आप में एक बड़ी संज्ञा है, एक बड़ा विशेषण है। काशी में एक तेज है और हमेशा रहेगा।

भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीसीआर) के सदस्य सचिव प्रो. धनंजय सिंह ने काशी को भारतीय ज्ञान-परंपरा का जीवंत केंद्र बताते हुए कहा कि ‘काशीस्थ’ जैसी कृतियां हमारी सांस्कृतिक स्मृति को सुदृढ़ करती हैं और परंपरा व आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा, यह पुस्तक सिर्फ एक शहर का नहीं, सभ्यता का इतिहास है। काशी की जो प्रवृत्ति है, वह हमें सकारात्मक वृत्ति प्रदान करती है।

श्री व्योमेश शुक्ल ने बताया कि ‘काशीस्थ’ में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अप्रकाशित लेख सहित 13 विद्वानों के 17 लेखों को संकलित किया गया है। यह पुस्तक काशी के अध्यात्म, चिंतन, भूगोल और परम्परा की पड़ताल करती है।

कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के नदी उत्सव के संयोजक अभय मिश्र ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में विद्वान, शोधार्थी, लेखक, विद्यार्थी एवं संस्कृति-प्रेमी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता राज्यसभा के उपसभापति श्री हरिवंश थे, जबकि विशिष्ट वक्ता आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी थे। आधार वक्तव्य भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आईसीसीआर) के सदस्य सचिव प्रो. धनंजय सिंह ने दिया। स्वागत-भाषण नागरी प्रचारिणी सभा, काशी के प्रधानमंत्री श्री व्योमेश शुक्ल ने दिया, जबकि कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन आईजीएनसीए के नदी उत्सव के संयोजक अभय मिश्र ने किया।

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