—श्री काशी विश्वनाथ धाम के गंगा द्वार पर तस्वीरों पर श्रद्धांजलि अर्पित
वाराणसी,25 दिसंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू)के संस्थापक भारत रत्न महामना पं मदन मोहन मालवीय और राजनीति के अटल सूर्य पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती गुरूवार को मनाई गई। दोनों महापुरूषों की जयंती पर नमामि गंगे ने श्रीकाशी विश्वनाथ धाम के गंगा द्वार पर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया। मां गंगा की आरती उतारकर भारत रत्न महामना और अटल जी की जयंती मनाई। राष्ट्रीय ध्वज के साथ महामना – अटल जी की तस्वीर लेकर गंगा निर्मलीकरण के संकल्प को साकार करने के लिए सभी को शपथ दिलाई गई । महामना द्वारा दी गयी प्रेरणा ” गंगा बहे और बहती रहे ” को आत्मसात कर उन्हें स्मरण किया गया । नमामि गंगे काशी क्षेत्र के संयोजक राजेश शुक्ला ने इस मौके पर कहा कि महामना की यह कामना थी कि भारत की समृद्धि , प्रगति और जीवन की गतिशीलता का प्रमाण माँ गंगा प्रदूषण मुक्त हों , शुद्ध रहें, बाधाओं से मुक्त होकर अविरल बहें और बहती रहें इसी में भारत का हित है । उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में देश भर की नदियों को जोड़कर सिंचाई से लेकर बाढ़ तक की समस्या से निपटने का सपना देखा गया । नदी जोड़ो योजना में गंगा सहित 60 नदियों को जोड़ने की योजना थी । अटल जी का मकसद यह था कि इससे कृषि योग्य लाखों हेक्टेयर भूमि की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी । हम सभी को इन दोनों महापुरुषों का जन्मदिन गंगा निर्मलीकरण एवं अविरलता के लक्ष्य को निर्धारित करके मनाना चाहिए । आयोजन में अर्जुन सिंह , शुभम उपाध्याय, नवनीत कुमार, शिवाली कुमारी, हर्ष आर्या आदि ने भी भागीदारी की।
नई दिल्ली, 25 दिसंबर (हि.स.)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार को कहा कि ओडिशा के कंधमाल जिले में हुए बड़े नक्सल विरोधी ऑपरेशन में शीर्ष माओवादी नेता और केंद्रीय समिति सदस्य गणेश उइके सहित छह नक्सलियों का मारा जाना नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में मील का पत्थर है। उन्होंने भरोसा जताया कि इस बड़ी सफलता के बाद ओडिशा नक्सलवाद से पूरी तरह मुक्त होने की दहलीज पर खड़ा है।
गृह मंत्री कार्यालय के आधिकारिक एक्स हैंडल पर पोस्ट किया गया है कि, “नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम। ओडिशा के कंधमाल में एक बड़े ऑपरेशन में सेंट्रल कमेटी मेंबर गणेश उइके सहित 6 नक्सलियों को अब तक खत्म कर दिया गया है। इस बड़ी सफलता के साथ ओडिशा पूरी तरह से नक्सलवाद से मुक्त होने की कगार पर है। हम 31 मार्च 2026 से पहले नक्सलवाद को खत्म करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।”
पुलिस सूत्रों के अनुसार, मारे गए नक्सलियों में माओवादी संगठन का शीर्ष कमांडर गणेश उइके भी शामिल है, जिस पर 1 करोड़ 10 लाख रुपये का इनाम घोषित है। वह ओडिशा और आसपास के राज्यों में माओवादी गतिविधियों का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था।
ओडिशा के पुलिस महानिदेशक योगेश बहादुर खुरानिया ने बताया कि खुफिया सूचनाओं के आधार पर कंधमाल-गंजाम सीमा क्षेत्र में संयुक्त सुरक्षा बलों द्वारा यह ऑपरेशन चलाया गया। मुठभेड़ के दौरान छह नक्सली मारे गए।
सुरक्षा बलों द्वारा इलाके में तलाशी अभियान जारी है और अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई ओडिशा में नक्सल समस्या के खात्मे की दिशा में निर्णायक साबित होगी।
ग्वालियर, 25 दिसंबर (हि.स.)। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ‘अभ्युदय एमपी ग्रोथ समिट‘ के तहत गुरुवार को ग्वालियर में 2 लाख करोड़ की परियोजनाओं का भूमिपूजन-लोकार्पण किया।
पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जयंती के अवसर पर मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मेला ग्राउंड में आयोजित ‘अभ्युदय मध्य प्रदेश ग्रोथ समिट का गुरुवार को केंद्रीय गृह अमित शाह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अटलजी की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने करीब दो लाख करोड़ रुपये की औद्योगिक परियोजनाओं का लोकार्पण और भूमिपूजन से राज्य में लगभग 1.93 लाख रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है।
केन्द्रीय गृह मंत्री शाह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने एमपी ग्रोथ समिट में लगी प्रदर्शनी का अवलोकन किया। समिट के दौरान केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ग्वालियर मेले का उद्घाटन किया और अटल संग्रहालय के नवीनीकरण कार्य को भी जनता को समर्पित किया। इस समिट में करीब 25 हजार लाभार्थी तथा हजारों उद्यमी और निवेशक भाग ले रहे हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य राज्य में निवेश को बढ़ावा देना और औद्योगिक विकास को नई दिशा देना है। कार्यक्रम में केंद्रीय संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित कई वरिष्ठ मंत्री और जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।
इस अवसर पर अमित शाह ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजा साहब कहकर संबोधित किया। मंच से यह सुनकर जनता ने खूब तालियां बजाई। उन्होंने आगे कहा कि ग्वालियर की धरती साधारण नहीं है। यही वह भूमि है जहां तानसेन का जन्म हुआ और ग्वालियर घराने के अनेक महान संगीतकारों ने अपनी साधना की। उन्होंने कहा कि इसी भूमि ने अटल बिहारी वाजपेयी जैसे महान नेता को देश को दिया। यहीं से निकलकर अटल जी ने संघर्ष किया और आज पूरा देश उन्हें लाड़ करता है।
उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश में देश की सबसे बड़ी आदिवासी आबादी है। अटल जी से पहले आदिवासियों के लिए न तो कोई ठोस योजना थी और न ही कोई अलग विभाग, जिससे उनके विकास और उत्थान का कार्य हो सके। अटल बिहारी वाजपेयी ने आदिवासियों के कल्याण के लिए अलग आदिवासी विभाग का गठन किया और उनके अधिकारों को मजबूती दी।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मार्गदर्शन में मध्यप्रदेश सरकार विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने और देश को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। राज्य सरकार के अनुसार यह ग्रोथ समिट केवल निवेश प्रस्तावों और औद्योगिक घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उद्योग, शहरी विकास, पर्यटन, एमएसएमई, स्टार्टअप और रोजगार को एक साथ आगे बढ़ाने का समग्र विजन प्रस्तुत किया गया है। समिट के माध्यम से मध्यप्रदेश के विकास मॉडल को एक नए और व्यापक दृष्टिकोण के साथ देश और दुनिया के सामने रखा जा रहा है।
राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (25 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में संथाली भाषा में भारत का संविधान जारी किया।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि यह सभी संथाली लोगों के लिए गर्व और खुशी की बात है कि भारत का संविधान अब संथाली भाषा में, ओल चिकी लिपि में उपलब्ध है। इससे वे संविधान को अपनी भाषा में पढ़ और समझ सकेंगे।
राष्ट्रपति ने कहा कि इस वर्ष हम ओल चिकी लिपि की शताब्दी मना रहे हैं। उन्होंने विधि एवं न्याय मंत्री और उनकी टीम की प्रशंसा की, जिन्होंने शताब्दी वर्ष में भारत के संविधान को ओल चिकी लिपि में प्रकाशित करवाया।
इस अवसर पर उपस्थित गणमान्य व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति श्री सीपी राधाकृष्णन और केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल शामिल थे।
संथाली भाषा, जिसे 2003 के 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, भारत की सबसे प्राचीन जीवित भाषाओं में से एक है। यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में बड़ी संख्या में आदिवासी लोगों द्वारा बोली जाती है।
लखनऊ – सीएम योगी ने पूर्व पीएम अटल जी की 101वीं जयंती पर लोक भवन स्थित प्रतिमा पर अटल बिहारी को नमन कर श्रद्धांजलि दीं। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी श्रद्धांजलि दी।
इस अवसर पर योगी ने कहा – अटल जी की पैतृक भूमि यूपी में होना सौभाग्य की बात है। अटल जी का विराट व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत है। लखनऊ में राष्ट्र प्रेरणा स्थल का निर्माण किया गया है। अटल जी का जीवन राष्ट्र को समर्पित रहा है। राष्ट्र के विकास में जीवन समर्पित किया।अटल जी की स्मृतियां जीवंत रखनी हैं। लखनऊ से अटल जी का रिश्ता खास है। प्रदेशवासियों को सुशासन दिवस की बधाई।अटल जी हम सभी के लिए प्रेरणा है।अटल जी ने लोकसभा में यूपी का प्रतिनिधित्व किया।
—वर्ष के अन्त में हो रही अत्यधिक भीड़ के चलते लिया गया निर्णय
वाराणसी, 25 दिसंबर (हि.स.)। समापन की ओर बढ़ रहे वर्ष 2025 में श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन के लिए उमड़ रही भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर में तीन जनवरी 2026 तक स्पर्श दर्शन पर रोक लगाई गई है। मंदिर में प्रोटोकॉल और सुगम दर्शन चलता रहेगा। मंदिर न्यास की ओर से यह जानकारी बुधवार देर शाम दी गई। बताया गया कि मंदिर में वर्ष 2025 के अंत और नए साल में उमड़ने वाली संभावित भीड़ की सुरक्षा और सुगम दर्शन के लिए स्पर्श दर्शन रोका गया है।
मंदिर न्यास के अनुसार तीन जनवरी को भीड़ का आकलन और समीक्षा की जाएगी। यदि भीड़ कम हुई तो स्पर्श दर्शन की व्यवस्था शुरू होगी । समय के अनुरूप आवश्यक निर्णय लिया जाएगा। इस अवधि में कतारबद्ध श्रद्धालुओं को झांकी दर्शन मिलेगा। मंदिर न्यास ने श्रद्धालुओं से नियम में सहयोग करने की अपील की है और कहा है कि मंदिर में दर्शन पूजन आस्था का विषय है, सुविधा एवं प्रतिष्ठा का नहीं। उधर भीड़ को देखते हुए मंदिर के नंदू फारिया मार्ग पर भी स्थायी चेकिंग पॉइंट बनाया जा रहा है।
मंदिर प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यहां प्रवेश द्वार पर लगेज चेकिंग मशीन भी लगायी जाएगी। वाराणसी में बढ़ती ठंड के बीच पर्यटन सीजन भी चल रहा है। लोग वाराणसी में घूमने के साथ बाबा विश्वनाथ मंदिर में दर्शन पूजन के लिए बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।
छूटी हुई पाठशाला, छिनते सपने : भारत की बेटियों की अधूरी शिक्षा; अधिकार से वास्तविकता तक : लड़कियों की स्कूली ड्रॉपआउट की क्रूर सच्चाई; स्कूल के बाहर खड़ी आधी आबादी : जब बेटियाँ बीच रास्ते लौट आती हैं; किताब, काँच और क़ैद : पितृसत्ता के साये में लड़कियों की शिक्षा; ड्रॉपआउट की दीवार के पार : भारत की बेटियाँ और शिक्षा का संघर्ष; अनुच्छेद 21A से आगे की लड़ाई : क्यों छूट जाती हैं बेटियाँ स्कूल से?; संविधान ने हक़ दिया, समाज ने रोका : लड़कियों की अधूरी स्कूली यात्रा; सायकिल, शौचालय और सुरक्षा : तीन कुंजियाँ, जो बेटियों को स्कूल में रोक सकती हैं; बाल विवाह, घरेलू बोझ और डर : लड़कियों की शिक्षा के अदृश्य दुश्मन; जब स्कूल नहीं, घर बनता है किस्मत : बेटियों की शिक्षा और भारतीय समाज।
– – डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत में लड़कियों की स्कूली शिक्षा की कहानी आज़ादी के बाद के विकास‑वृत्तांत की सबसे जटिल और मार्मिक कड़ी है। संविधान का अनुच्छेद 21A हर बच्चे को 6 से 14 वर्ष तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, पर ज़मीनी तस्वीर बताती है कि जैसे‑जैसे कक्षा बढ़ती है, लड़कियों की संख्या कम होती जाती है और माध्यमिक‑उच्च माध्यमिक स्तर पर पहुँचते‑पहुँचते बड़ी संख्या में बेटियाँ स्कूल से बाहर हो चुकी होती हैं। यह केवल शैक्षणिक ढाँचे की विफलता नहीं, बल्कि गहरे बैठे सामाजिक पूर्वाग्रह, पितृसत्ता, आर्थिक अभाव और राज्य की अधूरी प्रतिबद्धताओं की संयुक्त देन है।
सबसे पहले बात स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं की, जो लड़कियों के लिए शिक्षा के अधिकार और शिक्षा की वास्तविक उपलब्धता के बीच की सबसे कठोर दीवार बनकर खड़ी हैं। आज भी अनेक सरकारी स्कूलों में अलग, सुरक्षित और कार्यशील शौचालयों की कमी है; जहाँ शौचालय बने भी हैं, वहाँ साफ‑सफाई, पानी और रखरखाव की स्थिति अक्सर बेहद खराब रहती है। किशोरावस्था में प्रवेश करने वाली बालिकाओं के लिए मासिक धर्म के दौरान स्वच्छ और सम्मानजनक व्यवस्था जीवन की बुनियादी ज़रूरत है; लेकिन जब स्कूल इस ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करते हैं, तो परिवार के लिए सबसे आसान विकल्प लड़की को घर बैठा देना होता है। स्वच्छ पेयजल, सेनेटरी नैपकिन की उपलब्धता, कचरा निस्तारण जैसी बातें कागज़ी योजना‑दस्तावेज़ों में चाहे जितनी आकर्षक दिखें, ज़मीन पर उनकी कमी लड़कियों के हौसले को बार‑बार तोड़ती है। यह वही उम्र है जहाँ शिक्षा आत्मनिर्भरता और सशक्तिकरण का रास्ता खोल सकती है, लेकिन अवसंरचना की कमी उसे ‘ड्रॉपआउट’ के आँकड़ों में बदल देती है।
दूसरा बड़ा कारक स्कूल तक पहुँच का है, जिसमें दूरी और सुरक्षा दोनों शामिल हैं। ग्रामीण इलाकों में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय अक्सर गाँव से कई किलोमीटर दूर स्थित होते हैं। लड़के किसी तरह साइकिल या पैदल यह दूरी तय कर लेते हैं, लेकिन लड़कियों के मामले में हर किमी के साथ असुरक्षा, झिझक और जोखिम भी बढ़ जाता है। रास्ते में छेड़खानी, उत्पीड़न, सुनसान सड़कें, अपर्याप्त सार्वजनिक परिवहन और देर से घर लौटने का डर, माता‑पिता के मन में यह धारणा गहरी कर देते हैं कि “इतनी दूर भेजना सुरक्षित नहीं।” जहाँ‑जहाँ साइकिल वितरण, छात्राओं के लिए सुरक्षित बस‑सेवा, या क्लस्टर‑स्कूल जैसा मॉडल ईमानदारी से लागू हुआ, वहाँ यह साफ़ दिखा कि परिवहन‑सुरक्षा की समस्या हल होते ही लड़कियों की उपस्थिति, ट्रांज़िशन रेट और बोर्ड तक बने रहने के आँकड़े बेहतर हो जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि सही नीतिगत हस्तक्षेप से “दूरी” नाम की बाधा को शिक्षा का रास्ता रोके बिना भी संभाला जा सकता है।
तीसरी वजह घर की चारदीवारी के भीतर छिपी है—घरेलू काम और देखभाल की ज़िम्मेदारियाँ। भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक संरचना में बेटा अक्सर “भविष्य का कमाने वाला” और बेटी “परिवार की ज़िम्मेदारी” मानी जाती है। गरीब और निम्न‑मध्यवर्गीय परिवारों में माँ के साथ खाना बनाना, बर्तन‑कपड़े धोना, छोटे भाई‑बहनों की देखभाल करना, पानी लाना, खेत या दुकान में मदद करना—इन सभी कामों का सबसे आसान विकल्प लड़की ही बनती है। उसके स्कूल‑समय को “लचीला” समझा जाता है; जैसे ही घर का बोझ बढ़ता है, सबसे पहले उसकी पढ़ाई कटती है। सर्वेक्षण बार‑बार दिखाते हैं कि बहुत‑सी लड़कियाँ “पढ़ाई में रुचि नहीं” की वजह से नहीं, बल्कि “घर के काम” और “परिवारिक ज़िम्मेदारी” के कारण स्कूल छोड़ती हैं, लेकिन डेटा में इसे अक्सर गलत ढंग से दर्ज कर दिया जाता है। यह अदृश्य श्रम, जो घर और समाज के पहियों को चलाता है, लड़की के अधिकारों और भविष्य के रास्ते में सबसे बड़े रोड‑ब्लॉक में बदल जाता है।
चौथा निर्णायक तत्व है बाल विवाह और विवाह‑केंद्रित सामाजिक मानसिकता। आज भी अनेक समुदायों में यह मान्यता जीवित है कि लड़की की “इज़्ज़त” और “भविष्य” का असली उपाय उसे जल्दी ब्याह देना है, न कि लंबी शिक्षा देना। ज़्यादा पढ़ाई को कई बार “बिगड़ने”, “पति न मानने” या “शादी देर से होने” के ख़तरे के रूप में देखा जाता है। राष्ट्रीय स्तर के सर्वे साफ़ दिखाते हैं कि अशिक्षित या कम पढ़ी‑लिखी लड़कियों में 18 वर्ष से पहले विवाह की संभावना कहीं अधिक होती है, जबकि उच्च शिक्षा पाने वाली लड़कियों में यह अनुपात बहुत कम है। यह दुष्चक्र बेहद क्रूर है—कम शिक्षा बाल विवाह को जन्म देती है और बाल विवाह आगे की शिक्षा की संभावना लगभग समाप्त कर देता है। शादी के बाद ससुराल की ज़िम्मेदारियाँ, जल्दी गर्भधारण का सामाजिक दबाव और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम, लड़की को स्कूल से स्थायी रूप से बाहर कर देते हैं।
इन सबके ऊपर आर्थिक बाधाएँ एक तरह से “सील” का काम करती हैं। भले ही सरकारी स्कूलों में फीस नाममात्र की हो या न हो, लेकिन यूनिफॉर्म, जूते‑चप्पल, किताबें, कॉपियाँ, परीक्षा शुल्क, ट्यूशन, परिवहन—इन अप्रत्यक्ष खर्चों का बोझ गरीब परिवारों के लिए बहुत भारी होता है। ऐसे परिवारों की आर्थिक गणित अक्सर बेटे के पक्ष में झुक जाती है; उन्हें लगता है कि लड़के की शिक्षा पर निवेश का प्रतिफल नौकरी या कमाई के रूप में मिलेगा, जबकि लड़की की पढ़ाई “निवेश से अधिक दान” जैसी समझी जाती है। यह सोच कई बार लड़कियों को बिल्कुल शुरुआती कक्षाओं से बाहर धकेल देती है, तो कई बार आठवीं, दसवीं या बारहवीं के मोड़ पर उनकी शिक्षा का धागा टूट जाता है।
इन कारणों का असर भारत के सार्वभौमिक विद्यालयीकरण के लक्ष्य पर गहरा और दूरगामी है। सबसे पहले तो यह संकट सतत विकास लक्ष्य 4 (सभी के लिए समावेशी और समान गुणवत्तापूर्ण शिक्षा) और लक्ष्य 5 (लैंगिक समानता) की दिशा में भारत की प्रगति को बाधित करता है। जब माध्यमिक स्तर पर ही लड़कियों की बड़ी संख्या स्कूल से बाहर हो जाती है, तो साक्षरता, नामांकन और परीक्षा‑उत्तीर्णता के आँकड़ों में स्थायी लैंगिक खाई बन जाती है। “सार्वभौमिक” शब्द केवल प्रवेश‑सूची में दिखता है, लेकिन क्लासरूम और परीक्षा‑परिणाम में नहीं।
दूसरा असर अंतरपीढ़ी गरीबी पर पड़ता है। शोध लगातार दिखाते हैं कि शिक्षित माँ अपने बच्चों की सेहत, पोषण, टीकाकरण और शिक्षा में अधिक सजग और निवेशकारी होती है। जब लड़की स्वयं शिक्षा से वंचित रह जाती है, तो उसके लिए अगली पीढ़ी को शिक्षा‑केंद्रित जीवन देना बहुत कठिन हो जाता है। इस तरह एक पीढ़ी का ड्रॉपआउट, अगली पीढ़ी के अवसरों को भी सीमित कर देता है और गरीबी की जंजीरें टूटने के बजाय और मजबूत हो जाती हैं।
तीसरा बड़ा असर आर्थिक विकास और उत्पादकता पर दिखता है। यदि महिलाओं की श्रम‑बल भागीदारी, शिक्षा और कौशल के सहारे, पुरुषों के बराबर या उसके करीब पहुँच सके तो भारत की GDP में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है; लेकिन जब लाखों लड़कियाँ माध्यमिक स्तर से बाहर हो जाती हैं, तो यह संभावित मानव‑पूँजी कभी विकसित ही नहीं हो पाती। देश की आधी आबादी “हाफ‑टाइम” से पहले ही खेल से बाहर कर दी जाती है, और आर्थिक विकास अपनी प्राकृतिक ऊँचाई तक नहीं पहुँच पाता।
चौथा असर सामाजिक‑राजनीतिक सशक्तिकरण पर पड़ता है। शिक्षा सिर्फ रोज़गार का माध्यम नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नागरिकता का सबसे बुनियादी औज़ार है। पढ़ी‑लिखी लड़की स्वास्थ्य, प्रजनन, रोज़गार, बैंकिंग, डिजिटल तकनीक और मतदान जैसे निर्णयों में अधिक आत्मविश्वास से भाग लेती है। जब वह स्कूल छोड़ने पर मजबूर होती है, तो उसकी आवाज़ कमज़ोर हो जाती है, वह फैसलों की निर्माता की बजाय केवल प्रभावित होने वाली बनकर रह जाती है। स्थानीय निकायों में महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए जरूरी है कि गांव‑मोहल्ले की सामान्य लड़कियाँ भी कम से कम माध्यमिक स्तर तक की ठोस शिक्षा प्राप्त कर सकें।
इन नकारात्मक प्रभावों को संतुलित करने के लिए नीतियों को केवल कानूनों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़मीन पर संवेदनशील बनाना होगा। सशर्त नकद अंतरण, छात्रवृत्ति, साइकिल और परिवहन योजनाएँ, सुरक्षित और लैंगिक‑समान स्कूल अवसंरचना, बाल विवाह के खिलाफ सख्त और ईमानदार अमल, समुदाय‑आधारित जागरूकता अभियान, और ओपन‑स्कूलिंग व डिजिटल शिक्षा के जरिए “दूसरा मौका”—ये सभी कदम तभी असरदार होंगे जब उनकी योजना और क्रियान्वयन के केंद्र में “लड़की” हो, न कि केवल “छात्र” का कोई लिंग‑निरपेक्ष, अमूर्त चित्र। लड़कियों का स्कूल से बाहर होना भारत की कहानी में एक अधूरा अध्याय नहीं, बल्कि एक ऐसी चेतावनी है जो बताती है कि जब तक हर बेटी बिना डर और बाधा के कम से कम माध्यमिक शिक्षा पूरी न कर सके, तब तक “शिक्षित भारत” का सपना आधा ही रहेगा।
बागपत, 25 दिसंबर (हि.स.)। उत्तरप्रदेश के जनपद बागपत में थाना बड़ौत क्षेत्र के ग्राम महावतपुर बावली में गुरुवार सुबह गाेलियाें की आवाज से लाेग सहम गए। एकतरफा प्रेम में सतनाम कटारिया नामक एक युवक ने गांव की ही एक युवती गुड्डन की गोली मारकर हत्या कर दी और फिर खुद फांसी लगा की जान दे दी । पुलिस ने मौके पर पहुंचकर दोनों के शव को कब्जे में ले लिया है और फील्ड यूनिट द्वारा साक्ष्य संकलन की कार्यवाही की जा रही है। सामने आया है कि दोनों के बीच प्रेम प्रसंग का मामला है। पुलिस अधीक्षक बागपत ने बताया कि आवश्यक वैधानिक कार्यवाही की जा रही है।
बागपत जिले के बावली गांव में गुरुवार को दो मौताें से सनसनी फैल गयी। बावली गांव की हरिजन चौपाल पर एक सिरफिरे आशिक सतनाम कटारिया ने एकतरफा प्यार में युवती गुड्डन को गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या के बाद आरोपी ने अपने घर पहुंच कर खुद भी फांसी लगा ली। उसका शव भी लटका हुआ मिला । घटना के बाद गांव वालों ने इसकी सूचना पुलिस को दी। माैके पर पहुंची बड़ाैत कोतवाली पुलिस ने युवती को सीएचसी पहुंचाया, जहां चिकित्सकों ने उसे मृत घोषित कर दिया। बताया गया है कि आरोपी मृतक सतनाम पंजाब में ईंट भट्ठे पर काम करता था और युवती गुड्डन पर प्रेम करने का दबाव बनाता था। जिसको लेकर दोनों में तकरार चल रही थी। गांव में दोनों के घर आसपास ही हैं। पुलिस के आलाधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर घटना की जानकारी ली है। एसपी बागपत सूरज कुमार राय का कहना है कि बड़ाैत पुलिस और फोरेंसिक टीम ने जांच कर रही है। शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए। माैके पर शांति व्यवस्था कायम है। कोतवाली प्रभारी बड़ाैत मनोज कुमार चाहल का कहना है अभी किसी पक्ष की ओर से तहरीर नहीं दी गयी है, जांच जारी है।
क्रिसमस के खास मौके पर अक्षय कुमार ने अपने फैंस को बड़ा सरप्राइज दिया है। अभिनेता ने अपनी अपकमिंग फिल्म ‘वेलकम टू द जंगल’ से जुड़ा एक खास वीडियो शेयर किया है, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आते ही फिल्म को लेकर दर्शकों की उत्सुकता और भी बढ़ गई है। खास बात यह है कि अक्षय ने इसी वीडियो के जरिए फिल्म की रिलीज टाइमलाइन का भी खुलासा कर दिया है।
“कभी इतनी बड़ी फिल्म का हिस्सा नहीं रहा” : अक्षय कुमार
अक्षय कुमार ने यह वीडियो एक्स पर शेयर करते हुए लिखा, “वेलकम टू द जंगल की पूरी टीम की ओर से आप सभी को क्रिसमस की ढेरों शुभकामनाएं। यह फिल्म क्रिसमस 2026 में सिनेमाघरों में रिलीज होगी। हम में से कोई भी कभी इतनी बड़ी फिल्म का हिस्सा नहीं रहा। अब हम इस तोहफे को आपके सामने पेश करने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। शूटिंग पूरी हो गई है दोस्तों। शाबाश टीम। इसे बनाने में शामिल हर शख्स की मेहनत काबिल-ए-तारीफ है।”
सितारों से सजी है ‘वेलकम टू द जंगल’
फिल्म की स्टारकास्ट भी इसकी सबसे बड़ी ताकत मानी जा रही है। अक्षय कुमार के साथ इस मल्टीस्टारर कॉमेडी में परेश रावल, सुनील शेट्टी, अरशद वारसी, तुषार कपूर, राजपाल यादव, जैकी श्रॉफ और जॉनी लीवर अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। इसके अलावा दिशा पाटनी, रवीना टंडन, जैकलीन फर्नांडिस और लारा दत्ता भी फिल्म में कॉमेडी का तड़का लगाती दिखाई देंगी।
गौरतलब है कि अभिनेता संजय दत्त भी शुरुआत में इस प्रोजेक्ट का हिस्सा थे और उन्होंने करीब 15 दिन की शूटिंग भी की थी, लेकिन बाद में किसी कारणवश उन्होंने फिल्म छोड़ दी।
‘वेलकम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी किस्त
‘वेलकम टू द जंगल’, सुपरहिट ‘वेलकम’ फ्रेंचाइजी की तीसरी फिल्म है। इसका निर्माण फिरोज नाडियाडवाला ने किया है और निर्देशन की कमान एक बार फिर अनीस बज्मी के हाथों में है। फ्रैंचाइजी की पहली फिल्म ‘वेलकम’ साल 2007 में रिलीज हुई थी, जबकि दूसरी फिल्म ‘वेलकम बैक’ 2015 में दर्शकों के बीच आई थी। अब करीब एक दशक बाद अक्षय कुमार की वापसी के साथ यह सीरीज फिर से बड़े पर्दे पर हंसी का तूफान लाने को तैयार है।
साल 1947 में भारत के बंटवारे के बाद बने पाकिस्तान में आगे और बंटवारे की संभावना दिख रही थी।कई जानकारों ने इसे एक भौगोलिक गड़बड़ी, मीलों दूर दो अलग-अलग इलाकों का एक ढीला-ढाला मेल बताया था। मुस्लिम बहुमत के अलावा पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान; जिसे अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है, उसमें बहुत कम समानता थी।
साल 1971 के युद्ध के पीछे पाकिस्तान की नेशनल आर्मी के सैनिक स्थानीय बंगाली आबादी के साथ बलात्कार, मारपीट और दूसरे अपराध थे, जिससे तंग लोग भारत भाग गए। इतने बड़े पैमाने पर पलायन और अमानवीय गतिविधियों को देखते हुए भारत सरकार ने पूर्वी पाकिस्तान को पाकिस्तानी शासन से आज़ाद कराकर नया देश बनाने का फैसला किया।
मुख्य संघर्ष के दौरान भारत द्वारा प्रशिक्षित बांग्ला मुक्ति वाहिनी ने खुफिया जानकारी इकट्ठा की और कुछ इलाकों में पाकिस्तान से सप्लाई बंद करने में मदद की। भारतीय सेना ने ज़्यादातर सैनिक ट्रेनिंग, उपकरण और मैनपावर सप्लाई की। युद्ध की आधिकारिक शुरुआत से बहुत पहले भारतीय सेना, मुक्ति फौज से मिलकर लड़ रही थी। पहली झड़प 01 जुलाई 1971 में हुई जब 57 आर्टिलरी ब्रिगेड ने कर्नल पीके गौतम के ऑपरेशन बांग्लादेश के तहत आतग्राम और चग्राम में पाकिस्तानी ठिकानों को नष्ट कर दिया। ऐसी मुठभेड़ें दिसंबर तक जारी रहीं, जिसके दौरान मुक्ति वाहिनी ने गुरिल्ला युद्ध, तोड़फोड़ और खुफिया जानकारी इकट्ठा करने का काम किया। हालांकि वे सीधे मुकाबले में भारतीय सेना पर निर्भर थे क्योंकि वे सीधे मुकाबले में कमज़ोर लड़ाके थे।
दिसंबर 1971 में भारत ने 3900 सैनिक खो दिए।
पाकिस्तान से आजादी मिलने के बाद भारत ने उन्हें घर लौटने में मदद की, ट्रांसपोर्टेशन दिया और सड़कों एवं पुलों की मरम्मत में सहायता की। भारत ने बांग्लादेश को जो लगभग 232 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता का वादा किया था, वह दे दिया गया। साल 1972 में बांग्लादेश को खाद्यान्न मदद का सबसे बड़ा हिस्सा भारत का था। भारत- बांग्लादेश व्यापार समझौते से बांग्लादेश को बहुत फायदा हुआ। 28 मार्च 1972 को 5 करोड़ रुपये की ब्याज़ मुक्त स्विंग लिमिट के साथ समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। इससे बांग्लादेश को कोयला और अन्य ज़रूरी सामान और संसाधन खरीदने की अनुमति मिली।
भारत में लाखों बांग्लादेशी प्रवासियों का स्वागत किया गया और देश के आम नागरिकों ने स्वेच्छा से वित्तीय बोझ साझा किए। देश के नागरिकों ने पूर्वी पाकिस्तानी प्रतिरोध बलों का ज़ोरदार समर्थन किया और एक युद्ध कर लगाया गया। हालांकि पाकिस्तानी सेना के लगातार अत्याचारों के कारण स्थिति और खराब होने की आशंका थी इसलिए भारत को आखिरकार सैन्य हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ा। असल में भारत ने अमेरिका को नाराज़ करने का भी खतरा मोल लिया जो एक सुपरपावर था और याह्या खान की तानाशाही का खुलेआम समर्थन कर रहा था।
भारतीय लोगों ने शरणार्थियों की बाढ़ और उसके बाद हुए संघर्ष का भारी वित्तीय बोझ उठाया, यह दूसरे देशों के लोगों की दुर्दशा के प्रति भारत की दृढ़ता और करुणा का सबूत है। भारत ने 1971 का युद्ध किसी साम्राज्यवादी सपने या किसी खास राष्ट्रीय लक्ष्य को पूरा करने के लिए नहीं लड़ा था। भगवान राम ने हजारों साल पहले रावण को लंका पर कब्ज़ा करने के लिए नहीं बल्कि नैतिकता और धर्म का शासन फिर से स्थापित करने के लिए हराया था। अपनी जीत के बाद राम ने लंका उसके निवासियों और राजा विभीषण को वापस सौंप दी थी। इसी तरह भारत ने कट्टर राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता और नरसंहार के खिलाफ युद्ध लड़े। हम सिर्फ हथियारों से ही नहीं बल्कि करुणा और दूसरों के साथ एकता जैसे ऊँचे विचारों से भी जीते।
सवाल यह है कि
अच्छे और बुरे दोनों समय में बांग्लादेश में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद हिंदुओं को क्यों सताया जा रहा है।
हाल के वर्षों में कई बांग्लादेशियों के बीच धार्मिक पहचान ज़्यादा आम हो गई है और कई लोग नैतिक और भाषाई हैंगओवर से थक चुके हैं। अगर मजहब कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाता है तो आप बस उस देश का समर्थन नहीं कर सकते जिसने कुछ दशक पहले ही आपके देश में सबसे भयानक नरसंहारों में से एक किया था। आपको भारत जैसे देश से खुलेआम नफ़रत करने के लिए क्या प्रेरित करता है, जिसने आपको आज़ादी दिलाने में मदद की और आपकी संप्रभुता को मान्यता देने वाले पहले कुछ देशों में से एक था।
साल 2024 के विद्रोह के बाद बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ, जिसने न केवल देश के आंतरिक राजनीतिक माहौल को बिगाड़ा बल्कि इसके आसपास के क्षेत्र में भी रणनीतिक बदलाव किए। इसके अलावा चरमपंथी यूनुस के अंतरिम प्रशासन के तहत पूरे देश में कट्टरपंथ और धार्मिक उग्रवाद में चिंताजनक वृद्धि हुई है।बांग्लादेश में पिछले साल से कट्टरपंथी संगठन और विचारधाराएँ ज़्यादा प्रचलित हो गई हैं। उदाहरण के लिए जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश जैसे कट्टरपंथी संगठनों को यूनुस प्रशासन के तहत पिछले प्रशासन की तुलना में ज़्यादा जगह मिली है।ये समूह अब सार्वजनिक तौर पर हिंदू विरोधी बातचीत और सड़कों पर ज़्यादा दिखाई देते हैं। मस्जिदों और धार्मिक स्कूलों के ज़रिए इस्लामी समूहों ने आबादी के एक बड़े हिस्से, खासकर युवाओं को कट्टरपंथी बनाया है। देश में बढ़ते कट्टरपंथ के कारण बांग्लादेश में अल्पसंख्यक, खासकर हिंदू ज़्यादा खतरनाक स्थिति में हैं। दुख की बात है कि बांग्लादेश में हिंदुओं की संपत्ति, निजता और जीवन असुरक्षित हैं।ऐसे जघन्य कृत्यों को या तो राज्य द्वारा नज़रअंदाज़ किया जाता है या उसे बढ़ावा दिया जाता है।अमानवीय इस्लामी क्रूरता के अधिकांश शिकार महिलाएँ और बच्चे हैं।
बांग्लादेश और पाकिस्तान, दोनों में हिंदू आबादी में तेज़ी से गिरावट आई है। उन देशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए मानवाधिकार अभी भी दिवास्वप्न है।मूर्तियों और मंदिरों को अक्सर अपवित्र किया जाता है या नष्ट कर दिया जाता है और उनके धार्मिक विश्वास को निशाना बनाया जाता है। इन देशों के नेताओं द्वारा इस्लाम में धर्मांतरण ही एकमात्र रास्ता बताया जाता है। यह 1922 और 1946 में भी लागू था। लक्षित हमलों, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या और सांप्रदायिक हिंसा के कारण डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है। आवासीय घरों पर हमला किया गया है, पूजास्थलों को तोड़ा गया है और संपत्ति नष्ट की गई है। अल्पसंख्यकों को किसी आपराधिक गतिविधि के बजाय उनकी पहचान के कारण निशाना बनाया जा रहा है।ऐसी हिंसा सरकार पर लोगों का भरोसा कम करती है और यह संदेश देती है कि इंसानियत से ज़्यादा इस्लामिक धार्मिक कट्टरता ज़रूरी है।
पिछले कुछ महीनों में भीड़ द्वारा उत्पीड़न और लिंचिंग की कई घटनाएँ सामने आई हैं जो हिंसा में चिंताजनक बढ़ोतरी का संकेत देती हैं। ऐसी ही एक घटना में चंद्रदास नाम के 25 साल के एक हिंदू दलित व्यक्ति को कथित तौर पर ईशनिंदा के झूठे आरोप में बर्बर तरीके से जलाकर मार डाला गया।हालाँकि सांप्रदायिक हमलों में मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनाया गया है लेकिन हिंदू ही हिंसा के एकमात्र शिकार नहीं हैं।चटगाँव में दो ईसाई लड़कियों पर कथित तौर पर हिजाब नहीं पहनने के कारण सार्वजनिक रूप से हमला किया गया। इन हमलों के अलावा अल्पसंख्यकों को धर्म बदलने या देश छोड़ने की धमकियाँ भी मिल रही हैं जो असहिष्णुता, ज़बरदस्ती और धार्मिक कट्टरता में चिंताजनक बढ़ोतरी का संकेत है।
चंद्र दास की हत्या कोई अकेली घटना नहीं है बल्कि यह एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जिसमें ईशनिंदा के दावों का इस्तेमाल भीड़ की हिंसा को सही ठहराने और विरोध की आवाज़ को दबाने के लिए किया जा रहा है। ऐसी क्रूरताएँ अराजकता को बढ़ावा देती हैं और अल्पसंख्यकों में डर पैदा करती हैं। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो सामाजिक एकता और कमज़ोर होगी और बांग्लादेश बहुत ज़्यादा अस्थिर हो जाएगा। जमात-ए-इस्लामी की वापसी इस तरह के सांप्रदायिक संघर्ष का एक बड़ा कारण है। हसीना प्रशासन के तहत जेल में बंद किए गए इस समूह के नेताओं को यूनुस प्रशासन ने आज़ाद कर दिया है। वे आज़ादी से घूम रहे हैं और सार्वजनिक रूप से भारत और अल्पसंख्यक हिंदुओं को धमकियां दे रहे हैं।
अलकायदा से प्रेरित समूह अंसारुल्लाह बांग्ला टीम जिसे अब अंसार-अल-इस्लाम के नाम से जाना जाता है, उसके नेता मुफ्ती जशीमुद्दीन रहमानी ने हाल ही में भारत विरोधी ज़बरदस्त भाषण दिया जो इस खतरनाक ट्रेंड को दिखाता है। यूनुस सरकार ने पिछले साल रहमानी को भी रिहा कर दिया था जिससे चरमपंथी ताकतों के मज़बूत होने, धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए जगह कम होने और क्षेत्र की स्थिरता के बारे में गंभीर चिंताएँ पैदा हुई हैं। हसीना ने एक न्यूज़ आउटलेट के साथ ईमेल बातचीत में दावा किया कि हालिया तनाव जानबूझकर पैदा किया गया है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि यूनुस ने ऐसे लोगों को सत्ता के पदों पर बिठाया है और उन आतंकवादियों को रिहा किया है जो दोषी साबित हो चुके थे। उन्होंने यह भी कहा कि अपने राजनयिक कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर नई दिल्ली की चिंताएँ जायज़ हैं।
बांग्लादेश उस पाकिस्तान के करीब हो रहा है जो अपनी आंतरिक अशांति और उग्रवाद के लिए बदनाम है। बांग्लादेश में भारत और हिंदुओं के प्रति विरोध बढ़ रहा है, कट्टरवाद सिर उठा रहा है और अल्पसंख्यकों पर हमले जारी हैं। पाकिस्तान का बांग्लादेश को बहुत दुख देने का इतिहास होने के बावजूद सैन्य कमांडरों, जनरलों सहित उच्च पदस्थ अधिकारियों की हालिया यात्राएँ देश की राजनीतिक दिशा में बदलाव का संकेत देती हैं। राजनीतिक अस्थिरता, लोकतांत्रिक संस्थानों के कमज़ोर होने और आतंकी संगठनों के लिए जगह बनाने का पाकिस्तान का जाना-माना मॉडल इस बढ़ते प्रभाव में झलकता है। यह शासन में सुधार के बजाय उथल-पुथल, हत्याओं, बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों और अल्पसंख्यकों पर हमलों को बढ़ाता है।
यह तथ्य कि एक मजहबी चरमपंथी को नोबेल शांति पुरस्कार मिला, मानवता के लिए शर्म की बात है और यह और भी शर्मनाक है कि मानवाधिकार समूह बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों और हिंदुओं के खिलाफ किए गए अपराधों पर चुप रहे हैं। उनके खिलाफ अमानवीय कृत्यों की घातक शक्तियों का मुकाबला करने के लिए बौद्ध, सिख और जैन सहित हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए। इन अमानवीय ताकतों के सामने हिंदू एकता और प्रतिरोध निश्चित रूप से स्थिति को बदल देगा।