
हकीम अजमल खान भारतीय यूनानी चिकित्सा पद्धति के सबसे महान चिकित्सकों में से एक थे। इन्होंने न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में बल्कि राष्ट्रीय आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में भी अमूल्य योगदान दिया। उनका जन्म 11 फरवरी 1868 को दिल्ली में एक प्रतिष्ठित हकीमों के परिवार में हुआ था। उनके परिवार में पीढ़ियों से यूनानी चिकित्सा की परंपरा चली आ रही थी और उनके पूर्वज मुगल दरबार में शाही हकीम के रूप में सेवारत रहे थे। उनके पिता हकीम अजीज उल्ला खान भी एक प्रसिद्ध यूनानी चिकित्सक थे ।इनसे हकीम अजमल खान को चिकित्सा विज्ञान की प्रारंभिक शिक्षा मिली।
हकीम अजमल खान की शिक्षा पारंपरिक और आधुनिक दोनों पद्धतियों में हुई। उन्होंने अपने पिता और अन्य विद्वान हकीमों से यूनानी चिकित्सा का गहन अध्ययन किया। साथ ही उन्होंने आधुनिक चिकित्सा विज्ञान का भी अध्ययन किया और अंग्रेजी भाषा में भी प्रवीणता प्राप्त की। उनकी विशेषता यह थी कि उन्होंने पारंपरिक यूनानी चिकित्सा पद्धति को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जोड़ा। उन्होंने यूनानी औषधियों के गुणों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया और उन्हें और अधिक प्रभावी बनाने के लिए शोध किया।
चिकित्सक के रूप में हकीम अजमल खान की ख्याति देश भर में फैली हुई थी। वे विशेष रूप से हृदय रोग, मधुमेह और श्वसन तंत्र की बीमारियों के उपचार में माहिर थे। उनकी चिकित्सा पद्धति में रोगी के संपूर्ण स्वास्थ्य और जीवनशैली पर ध्यान दिया जाता था। वे केवल लक्षणों का उपचार नहीं करते थे बल्कि रोग के मूल कारण को समझकर उसका उपचार करते थे। उनके पास देश के विभिन्न हिस्सों से मरीज आते थे और उन्होंने हजारों लोगों को स्वास्थ्य लाभ पहुंचाया। उनकी चिकित्सा सेवाओं की प्रसिद्धि इतनी थी कि अंग्रेज अधिकारी और यहां तक कि वायसराय भी उनसे परामर्श लेते थे।
हकीम अजमल खान केवल एक चिकित्सक ही नहीं थे बल्कि एक महान शिक्षाविद् और संस्थापक भी थे। उन्होंने यूनानी चिकित्सा पद्धति को संरक्षित करने और आगे बढ़ाने के लिए 1902 में दिल्ली में शरीफिया स्कूल की स्थापना की। बाद में 1916 में उन्होंने हिंदुस्तानी दवाखाना की स्थापना की जो यूनानी औषधियों के निर्माण और वितरण का एक प्रमुख केंद्र बन गया। 1921 में उन्होंने आयुर्वेद और यूनानी तिब्बिया कॉलेज की स्थापना की जो आज भी दिल्ली में कार्यरत है और हजारों छात्रों को यूनानी चिकित्सा की शिक्षा प्रदान कर रहा है।
हकीम अजमल खान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल थे। वे महात्मा गांधी के करीबी सहयोगी थे और असहयोग आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कई अधिवेशनों में भाग लिया और 1921 में अहमदाबाद अधिवेशन की अध्यक्षता भी की। वे मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रीय भावना जगाने के लिए प्रयासरत रहे और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया जो आज भी भारत का एक प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थान है।
हकीम अजमल खान का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे एक महान चिकित्सक होने के साथ-साथ एक दूरदर्शी शिक्षाविद्, एक समर्पित स्वतंत्रता सेनानी और एक सच्चे मानवतावादी थे। उनका मानना था कि चिकित्सा केवल एक पेशा नहीं बल्कि मानव सेवा का माध्यम है। वे गरीब और जरूरतमंद लोगों का निशुल्क इलाज करते थे और कभी भी धन संग्रह को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। उनकी सादगी, विनम्रता और परोपकार की भावना ने उन्हें समाज में अत्यधिक सम्मानित बना दिया।
हकीम अजमल खान ने यूनानी चिकित्सा पद्धति को वैज्ञानिक आधार पर स्थापित करने के लिए अनेक शोध कार्य किए। उन्होंने कई दुर्लभ औषधीय पौधों की पहचान की और उनके गुणों का विश्लेषण किया। उनके द्वारा तैयार की गई कई औषधियां आज भी प्रचलित हैं और प्रभावी मानी जाती हैं। उन्होंने यूनानी चिकित्सा पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें और लेख भी लिखे जो आज भी यूनानी चिकित्सा के छात्रों के लिए मार्गदर्शक हैं।
29 दिसंबर 1927 को दिल्ली में हकीम अजमल खान का निधन हो गया। उनकी मृत्यु पर पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई और हजारों लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनकी विरासत आज भी जीवित है और उनके द्वारा स्थापित संस्थान आज भी यूनानी चिकित्सा के प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं। भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया और उनकी स्मृति में कई पुरस्कार और छात्रवृत्तियां स्थापित की गई हैं। हकीम अजमल खान का नाम भारतीय चिकित्सा इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा गया है और वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा के स्रोत बने रहेंगे।(सोनेट)


