भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्वर्णाक्षर रामानन्द सागर

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रामानंद सागर भारतीय टेलीविजन और सिनेमा जगत के एक ऐसे नाम हैं जिन्होंने भारतीय मनोरंजन उद्योग में अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म 29 दिसंबर 1917 को लाहौर, ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान) में चंद्रमौली चोपड़ा के रूप में हुआ था। उनके पिता एक व्यवसायी थे और परिवार का माहौल धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था, जिसके बाद उनका पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया। इस कठिन समय ने उनके व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की और जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को आकार दिया।
रामानंद सागर की शिक्षा लाहौर में हुई। उनकी कला और साहित्य में गहरी रुचि विकसित की। युवावस्था में ही उन्हें लेखन का शौक था और वे कविताएं तथा कहानियां लिखा करते थे। विभाजन के दौरान वे अपने परिवार के साथ भारत आ गए और मुंबई में बस गए। इस दौर की त्रासदी और संघर्ष ने उनके जीवन दर्शन को प्रभावित किया और बाद में उनकी रचनाओं में इसकी झलक देखने को मिली। मुंबई आने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखना शुरू किया।
फिल्म निर्माण और निर्देशन में रामानंद सागर का प्रवेश 1950 के दशक में हुआ। उनकी पहली फिल्म “बरसात की रात” (1960) एक बड़ी व्यावसायिक सफलता साबित हुई। इस फिल्म के गीत-संगीत ने दर्शकों का दिल जीत लिया और रामानंद सागर एक सफल निर्देशक के रूप में स्थापित हो गए। उन्होंने “आरज़ू” (1965), “आंखें” (1968), “ललकार” (1972), “चरस” (1976) और “बाग़ी” (1990) जैसी कई सफल फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों में सामाजिक संदेश, पारिवारिक मूल्य और मनोरंजन का अद्भुत मिश्रण होता था।
हालांकि रामानंद सागर को सबसे अधिक प्रसिद्धि उनकी टेलीविजन श्रृंखला “रामायण” से मिली। 1987 में दूरदर्शन पर प्रसारित यह धारावाहिक भारतीय टेलीविजन इतिहास का एक मील का पत्थर साबित हुआ। हर रविवार सुबह जब यह कार्यक्रम प्रसारित होता था, तो पूरा देश थम जाता था। सड़कें सूनी हो जाती थीं और लोग अपने टेलीविजन सेटों के सामने एकत्रित हो जाते थे। इस धारावाहिक ने धार्मिक और सांस्कृतिक चेतना को एक नया आयाम दिया और करोड़ों लोगों को रामायण की कथा से जोड़ा।
“रामायण” की सफलता अभूतपूर्व थी। यह कार्यक्रम विश्व का सबसे अधिक देखा जाने वाला धारावाहिक बन गया और गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। रामानंद सागर ने इस महाकाव्य को सरल और सहज भाषा में प्रस्तुत किया जिससे हर वर्ग के दर्शक इससे जुड़ सके। उन्होंने पात्रों के चयन, संवाद, संगीत और दृश्यों के निर्माण में विशेष ध्यान दिया। अरुण गोविल (राम), दीपिका चिखलिया (सीता) और सुनील लहरी (लक्ष्मण) जैसे कलाकार घर-घर में पूजनीय हो गए।
“रामायण” की सफलता के बाद रामानंद सागर ने “श्री कृष्णा” (1993) नामक एक और धार्मिक धारावाहिक का निर्माण किया जो श्रीमद् भागवत पुराण पर आधारित था। यह धारावाहिक भी बेहद लोकप्रिय रहा और इसने भारतीय टेलीविजन पर धार्मिक और पौराणिक कथाओं के प्रसारण की परंपरा को मजबूत किया। उनकी निर्माण शैली में प्रामाणिकता, सांस्कृतिक संवेदनशीलता और दृश्य सौंदर्य की अद्भुत त्रिवेणी होती थी।
रामानंद सागर केवल एक निर्देशक ही नहीं बल्कि एक दूरदर्शी कलाकार थे। उन्होंने भारतीय मूल्यों और संस्कृति को टेलीविजन के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंचाया। उनका मानना था कि मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा और संस्कार भी जरूरी हैं। उनके कार्यों में नैतिक मूल्यों की प्रधानता होती थी और वे अपनी कृतियों के माध्यम से समाज को एक सकारात्मक संदेश देना चाहते थे।
उनका व्यक्तिगत जीवन भी अनुशासन और सादगी से भरा था। वे एक समर्पित पारिवारिक व्यक्ति थे और अपने परिवार को बहुत महत्व देते थे। उनके बेटों ने भी फिल्म और टेलीविजन उद्योग में काम किया और पिता की विरासत को आगे बढ़ाया। रामानंद सागर ने अपने जीवनकाल में कई पुरस्कार और सम्मान प्राप्त किए जो उनकी प्रतिभा और योगदान की पहचान थे।
12 दिसंबर 2005 को मुंबई में 87 वर्ष की आयु में रामानंद सागर का निधन हो गया। उनकी मृत्यु भारतीय मनोरंजन जगत के लिए एक बड़ी क्षति थी। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कृतियां आज भी करोड़ों लोगों के दिलों में जीवित हैं। “रामायण” और “श्री कृष्णा” आज भी विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होते हैं और नई पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति और मूल्यों से परिचित कराते हैं।
रामानंद सागर का योगदान भारतीय टेलीविजन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया है। उन्होंने साबित किया कि सार्थक और मूल्यपरक मनोरंजन भी व्यावसायिक रूप से सफल हो सकता है। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी और भारतीय कला और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा

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