परीक्षा में बैठने का अधिकार जीवन के अधिकार के समान : हाईकोर्ट

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–पोर्टल की गड़बड़ी के कारण वंचित छात्रा के लिए विशेष परीक्षा दिलाने का आदेश

प्रयागराज, 19 जनवरी (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि परीक्षा में बैठने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए मानवीय गरिमा के साथ जीने के अधिकार के समान है। कोर्ट ने कहा कि किसी स्टूडेंट का भविष्य “तकनीकी खामियों“ या प्रशासनिक सुस्ती के कारण खतरे में नहीं डाला जा सकता।

जस्टिस विवेक सरन ने यह आदेश प्रयागराज स्थित यूनिवर्सिटी को बीएससी की स्टूडेंट श्रेया पांडेय के लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने का निर्देश दिया है। याची छात्रा को एडमिट कार्ड नहीं दिया गया, क्योंकि यूनिवर्सिटी पोर्टल उसके एडमिशन रिकॉर्ड को अपडेट नहीं कर पाया था।

रज्जू भैया यूनिवर्सिटी से जुड़े उर्मिला देवी पीजी कॉलेज, हंडिया में बीएससी (बायोलॉजी) प्रथम वर्ष की स्टूडेंट श्रेया पांडेय ने याचिका दायर की है। उसका कहना है कि उसने 16 जुलाई, 2025 को अपनी फीस जमा कर दी थी और शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कक्षाओं में भाग लिया। हालांकि, जब परीक्षा कार्यक्रम प्रकाशित हुआ तो उसे एडमिट कार्ड जारी नहीं किया गया। समस्या यह थी कि उसके रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी के “समर्थ पोर्टल“ पर तय तारीख तक अपडेट नहीं हो पाए। हालांकि उसका कैंडिडेट/आवेदन पोर्टल पर ड्राफ्ट के रूप में उपलब्ध था।

गलती को देखते हुए कॉलेज ने यूनिवर्सिटी को रिप्रेजेंटेशन दिया। इसमें कहा गया कि याचिकाकर्ता सहित लगभग 30 स्टूडेंट के रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुए हैं। हालांकि बाद में 25 स्टूडेंट के रिकॉर्ड अपडेट कर दिए गए, लेकिन याची का रिकॉर्ड फिर से अपडेट नहीं हुआ। इसलिए केवल ’समर्थ पोर्टल’ पर रिकॉर्ड अपडेट न होने के कारण याची को परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया गया, क्योंकि यूनिवर्सिटी उसे एडमिट कार्ड जारी नहीं कर पाई।

कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के रुख पर कड़ी आपत्ति जताई, क्योंकि पाया कि अधिकारियों को रिकॉर्ड अपडेट न होने की पूरी जानकारी थी और डेटा ड्राफ्ट के रूप में मौजूद था। इसके बावजूद उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की। बेंच ने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी के वकील कोर्ट को यह बताने में विफल रहे कि जब ऐसी तकनीकी त्रुटियां उनके संज्ञान में आती हैं तो वे किस मानक प्रक्रिया का पालन करते हैं। ऐसी स्थिति में कोर्ट ने राहुल पांडे बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में अपने हाईकोर्ट के हालिया आदेश पर भरोसा किया, जिसमें यह माना गया कि “सम्बंधित परीक्षा में शामिल होना भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है“।

यह देखते हुए कि याची की कोई गलती नहीं थी और “केवल तकनीकी कमियों“ के कारण उसके भविष्य को खतरे में नहीं डाला जाना चाहिए, हाईकोर्ट ने अंतरिम निर्देश जारी किया।

कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया है कि वह आज से दो सप्ताह के भीतर शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए याची की बीएससी (बायोलॉजी) पहले सेमेस्टर की परीक्षा आयोजित करे और आगे निर्देश दिया कि परिणाम उचित समय के भीतर प्रकाशित किया जाए ताकि याचिकाकर्ता अपनी आगे की पढ़ाई जारी रख सके। कोर्ट ने यूनिवर्सिटी को यह भी निर्देश दिया कि याची के रिकॉर्ड को उचित समय के भीतर अपडेट करने के लिए सभी उचित कदम उठाए जाएं ताकि उसका ’भविष्य’ सुरक्षित हो सके।

इस बीच कोर्ट ने विश्वविद्यालय के वकील को याचिका पर जवाब दाखिल करने के लिए समय दिया है तथा सुनवाई के लिए 10 फरवरी तारीख नियत की है।

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