बिहार में रेवड़ी सरकार का बोलबाला

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बाल मुकुन्द ओझा

                                                                                                                    बिहार में चहुंओर मुफ्त की बारिश हो रही है, जिसे देखकर लगता है चाहे किसी पार्टी की सरकार बने मगर बनेगी तो रेवड़ी सरकार ही। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने की लगातार घोषणाओं से चुनावी माहौल गरमाने लगा है। चुनाव का सियासी बिगुल बज चुका है। मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन में है। सभी पार्टियों के नेता लोक लुभावन वादों की बौछार कर रहे। आरजेडी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव ने प्रदेश के हर घर में सरकारी नौकरी का वादा कर फ्री बीज का छक्का जड़ दिया है। इसी के साथ आरोप प्रत्यारोप की सियासत शुरू हो गई है। सच तो यह है रेवड़ी संस्कृति के कारण हमारे देश की अनेक राज्य सरकारें लगभग दीवालिया होने की कगार पर हैं। उनका बजट घाटा बढ़ता जा रहा है, लेकिन वे मुफ्तखोरी की सियासत को छोड़ने को तैयार नहीं है। क्योंकि चुनाव जो जीतना है। कहा जाता हैं चुनाव जीतने के लिए सब कुछ जायज है। इस कार्य में कोई भी सियासी पार्टी पीछे नहीं रहती। बिहार में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की होड़ शुरू हो गई है। बिहार पर पहले से ही 4 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है, ऊपर से चुनावी सीजन में मुफ्त योजनाओं के लिए बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं।

बिहार में महिलाओं को साधने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत प्रधानमंत्री ने 75 लाख ग्रामीण महिलाओं को पहली किस्त के तौर पर 10,000- 10,000 रुपये की राशि ट्रांसफर की। योजना के तहत आगे चलकर प्रत्येक महिला को कुल 2 लाख तक की आर्थिक सहायता मिलेगी। इसे महिलाओं के लिए चुनावी सौगात भी कहा जा रहा है। यानि अभी तो फ्री बीज की यह शुरुआत है, पिक्चर अभी बाकी है। आरजेडी और इंडिया ब्लॉक का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने दरअसल उन्हीं वादों की नकल की है, जिन्हें विपक्ष ने जनता से करने का दावा किया था।  

मुख्यमंत्री नीतिश कुमार फ्री बीज की योजनाओं के विरुद्ध रहे है है। उन्होंने दिल्ली चुनाव के दौरान अरविन्द केजरी वाल की मुफ्त बिजली की अवधारणा को ‘गलत काम’ करार देते हुए कहा था कि यह दीर्घकालिक विकास के लिए हानिकारक है और आज वे खुद ही फ्री बीज के रास्ते पर चल निकले है। नीतीश कुमार ने 2022 में केजरीवाल की मुफ्त बिजली योजना को अव्यवहारिक और गलत बताकर तंज कसा था, आज तीन साल बाद खुद ऐसी ही फ्री बिजली योजना लागू कर अपनी सियासी रणनीति बदल ली है। उनका यह कदम न केवल उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि नीतिगत निर्णयों और सिद्धांतों की राजनीति से किनारा करने की स्थिति को भी बताता है। इसीलिए कहा जाता है हाथी के दांत दिखाने के कुछ और होते है। इससे पूर्व आरजेडी नेता तेजस्वी मुफ्तखोरी की अनेक घोषणाएं की घोषणा कर दी थी। चुनावों के दौरान सियासी पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए तरह तरह के वादे और प्रतिवादे करती है। सरकार बनने के बाद चुनावी वादे पूरा करने में पार्टियों के पसीने छुट जाते है। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तो चौपट तक हो जाती है जिसके कारण सम्बध सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन आदि  चुकाने के लाले पड़ जाते है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने का प्रकरण सियासी हलकों में गर्माने लगा है। देश की प्रबुद्ध जमात का मानना है इससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रकार की योजनाओं की आलोचना की थी। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान इस तरह के वादे करने का चलन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिक से अधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वादे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीजें बांटने को लेकर होती हैं। यह देखा गया है कुछ सालों से देश की चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली—पानी, मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद राशि, सस्ते गैस सिलेंडर आदि आदि अनेक तरह की घोषणाओं का चलन बढ़ गया है। विशेषकर चुनाव आते ही वोटर्स को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू कशमीर के चुनाव इसके ज्वलंत उदाहरण है। मुफ्त का मिल जाये तो उसका जी भर उपयोग करना। ये मुफ्त की नहीं है अपितु जनता के खून पसीनें की कमाई है जो राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा दी जा रही है ताकि चुनाव की बेतरणी आसानी से पार की जा सके। देश के प्रधानमंत्री रेवड़ी कल्चर का विरोध कर चुके है मगर चुनावों में उनकी पार्टी भाजपा सहित कांग्रेस और आप सहित सभी पार्टियां रेवड़ी कल्चर में डुबकियां लगा रही है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

तेजस्वी ने एक बहुत ऊंची फेंकी

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तेजस्वी ने एक बहुत ऊंची फेंकी । बोले वे सीएम बने तो बिहार में तीन करोड़ रोजगार देंगे ! वह भी सरकारी ? हर महीने 20 लाख नौकरियों का दावा किया है । अच्छी बात है , बेरोजगारों का कल्याण होना चाहिए । आपको मुख्यमंत्री जरूर बनना चाहिए । मोदी तो 2 करोड़ नहीं दे पाए , यह आरोप विपक्ष का ही है ।

आप जरूर दे देंगे क्योंकि देश ने आपके पिता को जमीन के बदले नौकरी देते हुए और पशुओं का चारा खाते हुए देखा है । और हां , आपके खटाखट खटाखट वाले साथी दो हफ्तों से विदेश में हैं । कोई नई बात नहीं , जब भी चुनाव आता है या सीट बंटवारे का दौर चलता है , वे देश में होते कहां हैं ? आएंगे , प्रचार अभियान के वीआईपी प्रचारक बनेंगे और विदेश यात्रा से जितनी टिप्स लाए हैं , उड़ेल देंगे , लम्बी लम्बी हॉक देंगे ? 3 करोड़ नौकरियां कैसे दें , यह भी उन्हीं से सीख लेना । अरे भाई खटाखट की तरह ? तेजस्वी बाबू ! बड़ा मजा आए जब मिल बैठेंगे दीवाने दो ?

हवाई किले बांधने के दिन हैं । नाश हो इन टीवी वालों का । एक सबसे बड़े और उससे छोटे न्यूज चैनल्स ने अभी से एनडीए की सरकार बनती दिखा दी ? बताइए ! अभी तो नामांकन करने के दिन हैं , उन्होंने सर्वे दिखा दिया ? हाय हाय ! यह क्या कर डाला नामर्दूदों ने ? खैर ! चुनाव है भैया यह सब तो चलेगा ही । टिकट बंटवारे में महागठबंधन के भी पसीने छूटते रहे और एनडीए भी हांफता रहा । बिहार में कभी कांग्रेस का एकछत्र राज था ।

जब से क्षेत्रीय दल आए तब से बिहार इस देश का सबसे अधिक खिचड़ी दलों वाला राज्य बन गया । छोटे छोटे दलों ने बड़े दलों की नींद उड़ा दी है । सच कहा किसी ने । बिहार में इतने दल हैं कि उनको दिलखुश करना मेढ़कों को तौलने के समान है । झटका लगते ही जालिम दूसरे पलड़े में जा बैठते हैं । क्या करें ? चुनाव बिहार में हो तो सबसे बड़ा काम जातियों को साधना होता है । ये छोटे छोटे दल यही काम तो करते हैं । तो खेलेंगे भी और खूब खिलाएंगे भी ?

नगाड़ा बज चुका है । बिहार कांग्रेस गा रही है — आजा रे परदेसी आजा , तुझको पुकारे देश तेरा । सामने बुजुर्ग नीतीश हैं , युवा सम्राट हैं । चिराग और मांझी ने बड़े खेल दिखाए । केन्द्र से भेजे गए प्रभारियों के जब पसीने छूटे तो आखिर में शाह मोदी को फोन उठाना पड़ा । अब मोदी तो राम नहीं लेकिन चिराग खुद को मोदी के हनुमान कहते हैं , सो मान गए , नतीजा आज आएगा । चिराग पिछली बार तो नहीं माने थे पर अब तो मान गए । तो मजा खूब आएगा । लिट्टी चोखा की बहार है । छठ पूजा भी आ रही है । तो जाइए , कुछ दिन तो बिताइए बिहार में ?
……कौशल सिखौला

त्योहार अब दिल से नहीं, डिस्प्ले से मनाए जाते हैं

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त्योहारों का सेल्फ़ी ड्रामा

( हम अब त्योहारों से ज़्यादा अपनी तस्वीरें मना रहे हैं।) 

अब त्योहार पूजा, मिलन और आत्मिक उल्लास का नहीं, बल्कि ‘कंटेंट’ का मौसम बन गए हैं। दीपक की लौ से ज़्यादा रोशनी अब मोबाइल की फ्लैश में दिखती है। भक्ति, व्रत और परंपराएँ अब फ़िल्टर और फ्रेम में सिमट गई हैं। लोग ‘सेल्फ़ी विद गणेश’, ‘करवा चौथ वाइब्स’ और ‘भाई दूज मोमेंट्स’ जैसे टैग से उत्सव मनाते हैं। सच्ची आस्था और दिखावे के बीच की यह डिजिटल खाई हमारी आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। यह सवाल अब ज़रूरी है — क्या हम त्योहार मना रहे हैं या दिखा रहे हैं?

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

त्योहार हमारे समाज की आत्मा होते हैं — वह समय जब इंसान ईश्वर, प्रकृति और अपने संबंधों के प्रति आभार व्यक्त करता है। लेकिन अब हर त्योहार के साथ एक नया किरदार जुड़ गया है — मोबाइल कैमरा। जैसे ही दीपक जलता है, आरती की थाली घूमती है या राखी बंधती है, पहला सवाल यही होता है — “फोटो ली क्या?”। पहले पूजा पूरी होती थी, फिर प्रसाद बाँटा जाता था; अब पहले स्टोरी लगती है, फिर पूजा होती है। यह वही भारत है जहाँ कभी ‘मन का उत्सव’ मनाया जाता था, आज वही ‘मीडिया का उत्सव’ बन गया है।

दीपावली अब दीपों की नहीं, सजावट की पोस्टों की रात है। घरों की सफ़ाई से ज़्यादा लोग कैमरे का कोण सुधारने में व्यस्त रहते हैं। माता लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा से पहले “बूमरैंग” बनता है, और पटाखों से पहले “कैप्शन” तय होता है — #दीवाली_की_वाइब्स #परिवार_का_प्यार। ऐसा लगता है मानो हर व्यक्ति का त्योहार सोशल मीडिया पर दिखना चाहिए, वरना वह अधूरा है। यह डिजिटल प्रतिस्पर्धा अब भक्ति से ज़्यादा ‘लाइक’ का खेल बन चुकी है।

करवा चौथ जैसे व्रतों का जो भाव था — प्रेम, समर्पण और आशीर्वाद — वह अब फोटो खिंचवाने और छूट वाले ऑफ़र में बँट गया है। “सेल्फ़ी विद सासू माँ”, “उपवास वाला चेहरा” और “चाँद के साथ तस्वीर” जैसी प्रवृत्तियाँ अब त्योहार की नई पहचान हैं। पहले चाँद देखने का रोमांच था, अब ‘क्लिक करने’ का जुनून है। एक जमाना था जब महिलाएँ साड़ी पहनती थीं पूजा के भाव से; आज वही साड़ी ब्रांड को टैग करने का साधन बन गई है। त्योहार अब प्रेम का नहीं, प्रदर्शन का पर्व बन गया है।

होली भी अब रंगों का नहीं, रंगीन दिखावे का खेल है। पहले जो चेहरे रंगों में डूबे होते थे, अब वे फ़िल्टर में धुल चुके हैं। लोग अब एक-दूसरे को रंग लगाने से ज़्यादा डरते हैं कि “कपड़े खराब हो जाएँगे, फोटो में अच्छा नहीं लगूँगा।”

“सेल्फ़ी विद गुलाल” में रंग तो हैं, पर अपनापन नहीं। यह होली अब मन की नहीं, मेकअप की होली बन गई है।

ईद, क्रिसमस, नवरात्र — हर धर्म का उत्सव अब एक ही रंग में रंग गया है — डिजिटल दिखावे का रंग। मस्जिद या गिरजाघर के सामने मुस्कुराती तस्वीरें, थाली में सजे पकवानों के फोटो, और शीर्षक — “प्यार और शांति बाँट रहे हैं।” पर क्या सचमुच प्यार और शांति फैल रही है, या बस दिखावा? त्योहार अब इंसान को जोड़ने की बजाय, तुलना और प्रतिस्पर्धा का कारण बनते जा रहे हैं। “उसकी लाइटिंग ज़्यादा सुंदर”, “उसका मंडप बड़ा”, “उसके पास महँगी सजावट”— यह सब उस आत्मीयता को निगल गया है जो कभी परिवारों की पहचान थी।

यह सेल्फ़ी नाटक इतना गहरा हो चुका है कि अब भक्ति का भी अभिनय होता है। मंदिर में जाते ही लोग पहले फोन निकालते हैं, फिर हाथ जोड़ते हैं। आरती लाइव होती है, पर मन ऑफ़लाइन। दान सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है, ताकि दूसरों को पता चले कि ‘हम भी नेक हैं’। भक्ति निजी नहीं रही, सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। आस्था अब आत्मा से नहीं, प्रसारण से चलती है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह “डिजिटल आस्था” एक गहरी बेचैनी का परिणाम है। इंसान अब अपने हर अनुभव का प्रमाण सोशल मीडिया से चाहता है। उसे लगता है कि अगर कोई चीज़ कैमरे में नहीं आई तो वह हुई ही नहीं। यही कारण है कि अब त्योहारों में मुस्कान असली नहीं, अभ्यास की हुई होती है। बच्चे तक कैमरे के सामने “हैप्पी दिवाली” बोलना सीख चुके हैं। रिश्तों की गर्माहट अब कैमरे की ठंड में जम गई है।

त्योहारों का असली अर्थ था — रुकना, साँस लेना, जुड़ना।

अब अर्थ बदल गया है — सजना, पोस्ट करना, भूल जाना।

लोगों को यह भी याद नहीं रहता कि त्योहार का मूल कारण क्या था — बस इतना याद रहता है कि किस दिन क्या पोस्ट करना है। यह ‘सेल्फ़ी संस्कृति’ धीरे-धीरे उस आध्यात्मिक गहराई को खा रही है जो भारतीय समाज की पहचान थी।

अब त्यौहार आत्मा का नहीं, ‘छवि’ का दर्पण बन गए हैं।

बाज़ार ने भी इस प्रवृत्ति को भुनाने में देर नहीं लगाई।

हर त्यौहार से पहले ‘सेल्फ़ी पृष्ठभूमि’, ‘फोटो मंच’, ‘डिजिटल सजावट’ और ‘त्योहार संग्रह’ की बाढ़ आ जाती है।

पूजा की थाली से ज़्यादा महत्त्व अब पैकेजिंग का हो गया है। त्योहार अब आध्यात्मिक नहीं, ब्रांडेड अवसर बन चुके हैं। दीपावली अब “ऑनलाइन खरीदारी पर्व” है, नवरात्र “गरबा नाइट्स प्रायोजित कार्यक्रम” है, और होली “कलर ब्लास्ट आयोजन” बन चुकी है। जहाँ पहले त्योहार आत्मा को शुद्ध करते थे, अब वह जेब को खाली कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर दिखावे की इस होड़ ने समाज में एक अजीब-सी भावनात्मक दूरी पैदा कर दी है। लोगों को लगता है कि उन्होंने दूसरों की फोटो देखकर उनसे जुड़ाव बना लिया — जबकि असल में वह जुड़ाव एक भ्रम है। त्योहार जो कभी सबको साथ लाते थे, अब लोगों को अकेला कर रहे हैं। हर कोई अपने फोन में बंद है, दूसरे की मौजूदगी सिर्फ स्क्रीन पर है। “परिवार की फोटो” तो पूरी है, लेकिन परिवार बिखरा हुआ है।

यह सब लिखते हुए एक प्रश्न चुभता है — क्या हम ईश्वर से जुड़ रहे हैं या नेटवर्क सिग्नल से? क्या हमें खुशी मिल रही है या बस ‘प्रतिक्रिया’? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे त्योहार अब आत्मा से नहीं, कैमरे की चमक से रोशन हो रहे हैं?

त्योहारों का असली अर्थ तब लौटेगा जब हम कैमरा नीचे रखकर, किसी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान देखेंगे।

जब दीया सिर्फ़ फोटो के लिए नहीं, अंधेरे के लिए जलाया जाएगा। जब करवा चौथ पर फोटो नहीं, साथ बैठकर एक-दूसरे की आँखों में सुकून ढूँढा जाएगा। जब होली पर रंग लगाते वक्त डर नहीं, अपनापन होगा। त्योहार तब लौटेंगे, जब हम दिखाना बंद करेंगे — और महसूस करना शुरू करेंगे।

त्योहारों का यह सेल्फ़ी ड्रामा तभी खत्म होगा जब इंसान अपने अंदर झाँककर यह कह सके — “मुझे किसी की लाइक नहीं चाहिए, मुझे बस अपने अपनों की सच्ची मुस्कान चाहिए।”

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

*“घर का चाँद”*

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करवा चौथ की रात थी।

बाहर काले बादल छाए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। आसमान का चाँद जैसे रूठकर बादलों में छिपा बैठा था।

दरवाज़े पर दस्तक हुई।

माँ, कमला देवी, गुस्से से दरवाज़ा खोलते ही बोलीं—

“इतनी देर से आया है अमन! शर्म नहीं आती? तेरी पत्नी सुबह से भूखी-प्यासी बैठी है। दिल में ज़रा भी दया नहीं है क्या?”

अमन ने थके स्वर में कहा—

“क्या करूँ माँ? बॉस ने देर से छुट्टी दी, ऊपर से ट्रैफ़िक ने जान निकाल दी। अब आ गया हूँ न, अब तो व्रत खुलवा दीजिए।”

तभी प्रिया झल्लाई हुई बाहर आई—

“अब कैसे खोलूँ व्रत? चाँद तो बादलों में छुपा है। घंटों से इंतज़ार कर रही हूँ। भूख-प्यास से हालत खराब हो गई है।”

इसी बीच, छोटा बेटा मोहन भी बाहर से घर लौटा। बारिश में भीगा हुआ और कपड़े कीचड़ से सने हुए।

उसकी पत्नी रीना भी भूख से निढाल थी।

रीना धीरे से बोली—

“लगता है माँ, आज तो चाँद निकलेगा ही नहीं।”

कमला देवी परेशान होकर बोलीं—

“अरे! अब तुम दोनों बहुएँ कब तक भूखी रहोगी?”

अमन और मोहन ने एक-दूसरे की ओर देखा। दोनों के दिमाग में एक ही विचार आया।

अमन बोला—

“माँ, ज़रा हमारे साथ छत पर चलिए।”

कमला देवी चौंकीं—

“क्यों? वहाँ से चाँद दिख रहा है क्या?”

मोहन मुस्कुराया—

“नहीं माँ। आज चाँद धरती पर ही उतर आएगा।”

छत पर दोनों बहुएँ—प्रिया और रीना—पूजा की थाली लेकर तैयार खड़ी थीं। दीपक जल रहा था, पर आसमान अब भी अँधेरा था।

दोनों ने माँ को सामने खड़ा किया।

कमला देवी घबरा गईं—

“अरे, ये क्या कर रही हो बहुओं? मैं तो विधवा हूँ… मेरी पूजा करोगी तो पाप लगेगा!”

प्रिया ने माँ के चरण छूते हुए कहा—

“नहीं माँ, आज आप ही हमारा चाँद हैं। आसमान वाला चाँद तो जिद्दी हो गया है। पिताजी आपको हमेशा ‘मेरा चाँद’ कहते थे।”

रीना ने भी नम्र स्वर में कहा—

“अगर माँ की पूजा करने से पाप लगता है, तो सारे शास्त्र झूठे हैं। आप ही करवा माता हो।”

माँ यह सुनकर भाव-विभोर हो गईं। उनकी आँखों से आँसू निकल आए।

वे तनकर खड़ी हो गईं, मानो करवा माता का रूप।

दोनों बहुओं ने उनकी पूजा की, जल का अर्ध्य दिया, साड़ी भेंट की और माथे पर टीका लगाया।

फिर छलनी उठाकर पहले माँ का चेहरा देखा और फिर पति का।

उस क्षण, घर-आँगन में रोशनी फैल गई।

बादलों का चाँद चाहे न निकला हो, लेकिन रिश्तों का चाँद पूरे घर को रोशन कर गया।

उस रात करवा चौथ सिर्फ़ पति की लंबी उम्र का पर्व नहीं रहा,

बल्कि सास-बहू के रिश्ते का उत्सव बन गया।

👉 क्योंकि सच्चाई यही है—

घर का असली चाँद/असली पर्व वही है,

जो अपने आशीर्वाद और प्रेम से रिश्तों को जगमग कर दे।

:- डॉ भूपेंद्र सिंह, अमरोहा

न्यायाधीश अदालत में कम बोलेंः काटजू की सलाह

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पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने सलाह दी है कि “न्यायाधीश अदालत में कम बोलें”। जस्टिस काटजू ने कहा है कि “बहुत बोलने वाला न्यायाधीश बेसुरा बाजा होता है।” यह बात केवल तंज नहीं, बल्कि न्यायशास्त्र का वह मूलभूत सिद्धांत है, जिसे हम भूलते जा रहे हैं। जब अदालतों में वाक्पटुता न्याय से बड़ी हो जाती है, जब न्यायाधीश व्यंग्यात्मक टिप्पणी या ‘पब्लिक शो’ की मुद्रा में आने लगते हैं, तब अदालतों की गरिमा दरकने लगती है। काटजू का तर्क सीधा है— न्यायाधीश का काम बोलना नहीं, सुनना है।

देखा जाये तो अदालत वह जगह है जहाँ शब्द नहीं, तर्कों की मर्यादा तय होती है। लेकिन हाल के वर्षों में अदालतों का माहौल कुछ अलग दिशा में जाता दिख रहा है। जहां न्यायाधीश लगातार टिप्पणियाँ करते हैं, कभी समाज पर, कभी राजनीति पर, कभी याचिकाकर्ता पर। यह प्रवृत्ति न्याय की गंभीरता को न केवल हल्का करती है बल्कि उस न्यायिक तटस्थता को भी क्षीण करती है जिस पर इस संस्था की पूरी विश्वसनीयता टिकी है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा है कि उन्हें कभी-कभी न्यायालय में भेदभावपूर्ण व्यवहार का अनुभव हुआ है। यदि एक वरिष्ठ वकील तक यह कहने को विवश हैं तो सोचिए सामान्य नागरिक की क्या अपेक्षा रह जायेगी? न्याय केवल किया नहीं जाना चाहिए, उसे दिखाई भी देना चाहिए— यह सिद्धांत जितना पुराना है, उतना ही आज भी प्रासंगिक है।

यह सच है कि उच्चतम न्यायालय में घटे घटनाक्रम पर प्रधान न्यायाधीश गवई ने उत्तेजना नहीं दिखाई, बल्कि दोषी अधिवक्ता को चेतावनी देकर छोड़ देने का निर्देश दिया, यह उनके न्यायिक संतुलन का प्रमाण है। लेकिन सवाल फिर वही है कि क्या हमें ऐसी परिस्थितियाँ बनने से रोकना नहीं चाहिए? क्या अदालत को इतनी संवेदनशीलता नहीं रखनी चाहिए कि उसकी एक टिप्पणी भी समाज में विवाद का विषय न बने?

देखा जाये तो जस्टिस काटजू की यह नसीहत दरअसल अदालतों के चरित्र की पुनर्स्थापना की पुकार है। अदालतों का आदर्श वह होना चाहिए जहाँ गम्भीरता, शालीनता और संयम तीनों एक साथ झलकें। न्याय की ताकत उसकी भाषा की कोमलता में है, न कि तीखे व्यंग्य में। आज जब न्यायपालिका पर जनता की निगाह पहले से अधिक है, तब यह और भी ज़रूरी है कि न्यायाधीश अपने शब्दों की सीमा समझें। क्योंकि अदालत में बोला गया हर वाक्य आदेश से कम प्रभावशाली नहीं होता। काटजू की तल्ख बात का मर्म यही है कि न्याय की कुर्सी पर वाणी का नहीं, विवेक का शासन होना चाहिए।

व्यंग्य , लागूं…जी !!

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पुरुष को पैर छुआने की आदत कम होती है। वह छूने में विश्वास करता है। छुआने में नहीं। जब कोई उसके यदा कदा पैर छूता है तो आशीर्वाद का हाथ सकपका जाता है। अरे, यह क्या? मानो, शरीर में कोई दर्द हो। और किसी ने मरहम लगा दिया।

नज़र घुमाइए। आपने किस किस को आशीर्वाद दिया। अब तो वीडियो का जमाना है। वीडियो बनाइए। और बार बार देखिए। सोचिए। कहां चूक हो गई। पैर छूना और छुआना एक कला है। यह हर किसी को आती नहीं। पुरुष तो इस मामले में अनभिज्ञ हैं। उन्होंने अपने को कभी इसका पात्र ही नहीं समझा। बेटे ने पैर छुए तो

रौब से बोले..’ठीक है। ठीक है। मन लगाकर पढ़ो।”

संकट बहू के साथ आता है। जैसे तैसे एक हाथ धीरे-धीरे उठता है। नज़र पृथ्वी पर। पोजीशन स्टेट। स्टेच्यू की मुद्रा में हाथ। जैसे महादेव ने सिर पर हाथ रख दिया हो।

महिलाएं निपुण हैं। वह पैर छुआती ही नहीं, दबवाती भी है। शगुन लेती भी हैं। दिलवाती भी हैं। बहू जब आहिस्ता-आहिस्ता उनके पैर की “मालिश” करती है तो चंद्रमा उनकी आंखों में उतर जाता है। बहू को भी आनंद मिलता है। वह भी सास के पांव नहीं छोड़ती। ऐसे पांव कोई बार-बार थोड़े मिलते हैं। ठंडी सांसेंsss मन में उमंगsss। तरंगsss। एक बार। दो बार। पूरे पांच बार। या दस बार। “बहू 11 तो कर ले। 10 शुभ नहीं होता।”

पैर छूने की अपनी अलग अलग परम्परा है। हर समाज अपनी रीतियों से छूता है। टांग भले ही खींचो। मगर पैर छूते रहो। आपके यहां कोई आया। बच्चे ने उनके पैर छू लिए। “वाह। कितना प्यारा बच्चा है। संस्कारवान। ऐसे संस्कार देने चाहिए़। “( इसी चक्कर में आज बच्चे दूर से ही चरण स्पर्श का अहसास करते हैं)।

बच्चा बड़ा हुआ। चमचागीरी में बॉस के पैर छूने लगा। बॉस समझ गया, क्यों छू रहा है। बच्चा पॉलिटिक्स में आया। वहां सबके पांव छूने लगा। पता नहीं, कब कौन काम आ जाए। नेता तो नेता हैं। हजारों लोग उनके पांव छूते हैं। किस किस को टिकट दें। लोकतंत्र में इसको चरण वंदना कहते हैं। गणेश परिक्रमा कहते हैं।

पांव पर्व, गर्व, शर्म और धर्म में छुए जाते हैं। जब कोई आशीर्वाद देता है या देती है ..”सौभाग्यवती रहो। खुश रहो। फूलों फ्लो।” तो कश्मीर की वादियों से ठंडी ठंडी हवा चल पड़ती है। पश्चिमी विक्षोभ होने लगता है। जाहिर है। यह हेलो। हाय से अलग है।

सुनो पुरुषों! कुछ महिलाओं से सीखो। कैसे आशीर्वाद दिया जाता है। यह क्या स्टेच्यू बन जाते हो।

और आप बहन जी! “आशीर्वाद ट्रेनिंग सेंटर” खोल लीजिए। खूब चलेगा। चरण-वंदना और पांव छूने की सबको जरूरत है। यहां हर तरह से पांव छूने और आशीर्वाद देने की कला सिखाई जाती है… दरवाजे से ही हाथ उठाते आने की। घुटना छूने की। पैर पड़ाई की रस्म की। धीरेssss धीरे । मीठे-मीठे। पैर दबाने की।

सूर्यकांत

“फाइलों से फायर तक: अफसरशाही के भीतर सड़ता भेदभाव”

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(जातिगत अपमान, साइड पोस्टिंग और मानसिक उत्पीड़न — एक अफसर की चुप्पी जो अब चीख बन गई।) 

हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार की आत्महत्या ने प्रशासनिक जगत को झकझोर दिया है। उनके सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं, जिन पर जातिगत अपमान और मानसिक उत्पीड़न के आरोप हैं। चंडीगढ़ पुलिस ने डीजीपी शत्रुजीत कपूर और रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया समेत 14 अधिकारियों पर एफआईआर नंबर 156 दर्ज की है। यह हरियाणा के इतिहास में पहला मौका है जब इतने सीनियर अफसरों पर एक साथ एससी/एसटी एक्ट और भारत न्याय संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा चला है। यह मामला नौकरशाही के भीतर छिपे जातिगत भेदभाव पर गहरी चोट है।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा की प्रशासनिक मशीनरी में सात अक्टूबर की सुबह एक ऐसी गूंज उठी, जिसने नौकरशाही के चेहरे से शालीनता का मुखौटा उतार फेंका। सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सेक्टर-11 स्थित अपने सरकारी आवास पर खुद को गोली मार ली। पर यह आत्महत्या नहीं, व्यवस्था के भीतर पल रहे जातिगत भेदभाव, सत्ता संघर्ष और संस्थागत उत्पीड़न का परिणाम थी। अब चंडीगढ़ पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है, उसने इस सन्नाटे को कानून के दस्तक में बदल दिया है।

एफआईआर नंबर 156, जिसमें डीजीपी शत्रुजीत कपूर, रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया सहित 14 अफसर आरोपी बनाए गए हैं, भारतीय प्रशासनिक इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना है। भारत न्याय संहिता की धारा 108, 3(5) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत दर्ज यह मामला इस सच्चाई की गवाही देता है कि नौकरशाही की ऊँची दीवारों के भीतर भी जाति आज भी उतनी ही जीवित है जितनी गांवों की गलियों में।

पूरन कुमार के सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं। हर नाम एक आरोप है, और हर आरोप यह सवाल है कि क्या एक सविधानिक पद पर बैठा अधिकारी भी इस देश में अपनी जाति की जंजीरों से मुक्त नहीं हो सकता? उन्होंने लिखा कि उन्हें लगातार “साइड पोस्टिंग” दी जाती रही, उनकी योग्यता को दबाया गया, और उन्हें जातिगत तंज और धमकियों से मानसिक रूप से तोड़ा गया।

पूरन कुमार का कैरियर रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करता है। मेहनत और ईमानदारी से उन्होंने पुलिस सेवा में पहचान बनाई, पर उन्हें बार-बार “कम प्रभावी” पदों पर भेजा गया — कभी आईजी होमगार्ड, कभी आईजी टेलीकम्युनिकेशन। जब अप्रैल 2025 में उन्हें रोहतक रेंज का आईजी बनाया गया, तब उन्होंने यह सोचा होगा कि अब मेहनत का फल मिला है। लेकिन मात्र पांच महीने बाद ही उन्हें सुनारिया पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज भेज दिया गया — और वहीं से उनकी मानसिक गिरावट की शुरुआत हुई।

यह कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की वह बीमार रग है जो ‘योग्यता’ के सामने ‘पहचान’ को रखती है। हमारे समाज में आरक्षण भले अवसर देता हो, लेकिन व्यवस्था अक्सर उसे स्वीकार नहीं करती। वह दलित अफसर को ‘काबिल अधिकारी’ की जगह ‘आरक्षण वाला अफसर’ कहकर छोटा करती है। पूरन कुमार की मौत ने यह दिखा दिया कि जाति का भूत सिर्फ समाज में नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी घूमता है।

पूरन कुमार की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने दो अलग-अलग प्रतिवेदन दिए — एक में केवल डीजीपी और एसपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, और दूसरे में सभी 15 अफसरों की गिरफ्तारी की। यह एक अधिकारी की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पत्नी और सहकर्मी की लड़ाई है जो व्यवस्था से इंसाफ मांग रही है। उन्होंने कहा कि “यह सिर्फ एक सुसाइड नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक मर्डर है।”

एफआईआर दर्ज होने के बाद राज्य के एससी समुदाय से जुड़े कई आईएएस, आईपीएस और एचसीएस अफसर पूरन परिवार के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। यह अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि आमतौर पर नौकरशाही के भीतर एक ‘मौन संस्कृति’ चलती है — जहां अधिकारी अपने साथी पर टिप्पणी करने से भी कतराते हैं। लेकिन इस बार सन्नाटा टूटा है। अफसर कह रहे हैं कि पूरन कुमार का मामला एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की हत्या है जो समानता और सम्मान की उम्मीद करती थी।

मुख्यमंत्री नायब सैनी ने परिवार से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है। पर सवाल यह है कि क्या यह भरोसा न्याय में बदलेगा? क्या राज्य सरकार इतनी हिम्मत दिखा पाएगी कि डीजीपी जैसे शीर्ष अधिकारी को छुट्टी पर भेजे और एसपी को हटाए? या यह भी किसी और “आंतरिक जांच” की तरह फाइलों में गुम हो जाएगा?

हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी में वर्षों से यह चर्चा होती रही है कि जातिगत गुटबाजी अफसरों की नियुक्तियों, ट्रांसफरों और प्रमोशनों को प्रभावित करती है। “कौन किसका है” — यह बात यहां पद से बड़ी हो जाती है। और जब इस गुटबाजी में जाति का तड़का लग जाता है, तो योग्यता, सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता सब हाशिये पर चली जाती हैं।

पूरन कुमार की मौत इस झूठी प्रतिष्ठा वाली मशीनरी पर एक नैतिक प्रश्नचिह्न है। यह घटना सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक सिस्टम की आत्मा की हत्या है — जो अपने अफसरों को मानसिक और जातिगत रूप से इतना तोड़ देती है कि वे जीवन से हार मान लेते हैं।

इस घटना के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि अब नौकरशाही के भीतर जातिगत भेदभाव पर खुली चर्चा शुरू होगी। लेकिन डर यह भी है कि यह मामला किसी प्रशासनिक औपचारिकता में तब्दील कर दिया जाएगा — जैसे हर बार होता है। जांच कमेटी बनेगी, बयान होंगे, और अंत में रिपोर्ट यह कहेगी कि “व्यक्तिगत कारणों से आत्महत्या थी।”

पूरन कुमार का लिखा हर शब्द आज भी सवाल बनकर हवा में तैर रहा है —

> “जब न्याय देने वाले ही अन्याय करने लगें, तो शिकायत किससे करें?”

एक संवेदनशील अफसर ने अपनी जान देकर यह दिखा दिया कि जाति का दर्द कुर्सी की ऊंचाई से नहीं मिटता। आज यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है कि वह यह स्वीकार करे — जातिवाद अब सिर्फ राजनीति नहीं, प्रशासन की आत्मा में भी जहर की तरह घुल चुका है।

पूरन कुमार चले गए, पर उनके सुसाइड नोट ने यह साफ कर दिया है कि अब नौकरशाही की चुप्पी भी एक अपराध है। उनकी मौत व्यवस्था से यह मांग करती है कि वह सिर्फ दोषियों को नहीं, बल्कि अपनी सोच को भी कटघरे में खड़ा करे। क्योंकि जब तक सिस्टम खुद को नहीं बदलेगा, तब तक हर पूरन कुमार के भीतर कोई न कोई गोली तनी रहेगी।

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 डॉ. सत्यवान सौरभ

(स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

जगजीत सिंह — जीवन, संगीत और योगदान

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जगजीत सिंह (जन्म: 8 फरवरी 1941, श्री गंगानगर, राजस्थान – निधन: 10 अक्टूबर 2011, मुंबई) हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल संगीत के प्रतीक और आधुनिक भारत के महान गायकों में से एक थे।

प्रारंभिक जीवन और संगीत शिक्षा

जगजीत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम अमर सिंह धिमन था, जो सरकारी विभाग में कार्य करते थे, और माता बच्चन कौर थीं।शिक्षा के दौरान ही संगीत में रुचि जागी। उन्होंने शुरुआती संगीत प्रशिक्षण पंडित चगनलाल शर्मा से प्राप्त किया और बाद में उस्ताद जमाल खान (Senia Gharana) के तहत खयाल, ठुमरी, द्रुपद आदि शास्त्रीय विधाओं का अध्ययन किया।श्री गंगानगर के स्कूलों और कॉलेजों में वे पहले ही संगीत प्रस्तुतियों में भाग लेने लगे और धीरे-धीरे उन्हें पहचान मिलने लगी।

मुंबई में संघर्ष और करियर की शुरुआत

1965 में जगजीत सिंह मुंबई चले आए, जहाँ उन्होंने संगीत की बेहतर संभावनाएँ देखीं। शुरुआत में उन्होंने विज्ञापन जिंगल्स, रेडियो और स्टेज पर गाना शुरू किया।धीरे-धीरे उन्हें बॉलीवुड फिल्मों में पार्श्व गायकी के अवसर मिले और उन्होंने ग़ज़ल शैली को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ग़ज़ल की लोकप्रियता और नए अंदाज़

जगजीत सिंह को “ग़ज़ल किंग” कहा जाने लगा क्योंकि उन्होंने पारंपरिक ग़ज़ल को सरल, सुगम और जनता के करीब पहुँचाया।उनकी एक बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने शायरी और संगीत दोनों को इस तरह संयोजित किया कि संगीत प्रेमी केवल शेर-ओ-शायरी के शौकीन ही नहीं, बल्कि आम जनता भी ग़ज़लों से जुड़ सकें।इसके अलावा, उन्होंने पारंपरिक संगीत वाद्यों के साथ-साथ कीबोर्ड, गिटार, वायलिन आदि पश्चिमी उपकरणों को भी शामिल किया, जिससे ग़ज़ल संगीत आधुनिक ध्वनि के साथ नए युग में प्रवेश कर सकी।

फिल्मों में योगदान

जगजीत सिंह ने कई फिल्मों के लिए गाना और संगीत कम्पोज किया। फिल्मों जैसे “प्रेम गीत”, “साथ− साथ”, “अर्थ”, “ सरफरोश”, “जागरस पार्क”, “लीला”, “तुम बिन”, आदि में उनके गाने बहुत लोकप्रिय हुए। उनका गाना “होठों से छू लो तुम” (प्रम गीत), “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो” (अर्थ), “होश वालों को खबर क्या” ( सरफरोश) आदि आज भी बहुत याद किये जाते हैं।

अन्य संगीत रूप और सामाजिक सेवा

ग़ज़ल के अलावा, जगजीत सिंह भजन, कीर्तन, और धार्मिक गीतों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने श्री कृष्ण भजन, गुरुबाणी शबद आदि को भी प्रस्तुत किया।

साथ ही, उन्होंने अनेक संगीत शिक्षण एवं सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लिया और नए कलाकारों को प्रेरित किया।

सम्मान और विरासत

सरकार ने उन्हें 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है।

उनकी ग़ज़लों और गायन की शैली ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी गहरा प्रभाव डाला। उनका संगीत आज भी सुनने वालों के दिलों को छूता है।

निष्कर्ष

जगजीत सिंह ने शास्त्रीय, आधुनिक और लोकप्रिय संगीत को जोड़कर ग़ज़ल और संगीत की दुनिया में नया मुकाम बनाया। उनकी मधुर आवाज, भावनात्मक परिव्यक्ति और शेर-ओ-शायरी का सहज संवाद आज भी संगीत प्रेमियों के लिए अमूल्य निधि है।जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी भारतीय संगीत इतिहास की सबसे लोकप्रिय और भावनात्मक जोड़ियों में से एक मानी जाती है।


🌹 जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की पहली मुलाकात

साल 1967 के आसपास की बात है। उस समय जगजीत सिंह मुंबई में एक संघर्षरत गायक थे — वे विज्ञापन जिंगल्स और रेडियो कार्यक्रमों में गाया करते थे।
उसी दौर में एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में उनकी मुलाकात हुई चित्रा दत्ता से, जो उस समय एक प्रसिद्ध मॉडल और कभी-कभी गायिका भी थीं।

चित्रा का विवाह पहले एक एयर फोर्स अधिकारी देबसिंह दत्ता से हुआ था, और उनकी एक बेटी मोनिका थी। लेकिन व्यक्तिगत कारणों से वह विवाह टूट गया।

जगजीत और चित्रा की यह मुलाकात एक पेशेवर काम के दौरान हुई — दोनों को साथ में एक जिंगल रिकॉर्ड करना था।चित्रा उनकी आवाज़, विनम्रता और संगीत के गहरे ज्ञान से बहुत प्रभावित हुईं। वहीं, जगजीत सिंह भी चित्रा के सौम्य स्वभाव और गायकी से आकर्षित हुए। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह दोस्ती जीवनसाथी के रिश्ते में बदल गई।


💍 विवाह और साथ का संगीत सफर

साल 1969 में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने विवाह किया।यह विवाह न केवल दो व्यक्तियों का, बल्कि दो आवाज़ों और दो आत्माओं का संगम था। विवाह के बाद उन्होंने मिलकर ग़ज़लों की नई दिशा तय की। दोनों ने साथ मिलकर “The Unforgettables” (1976) नामक एल्बम जारी किया, जिसने भारत में ग़ज़ल गायन का चेहरा बदल दिया।
यह एल्बम एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ — क्योंकि यह भारत की पहली स्टूडियो रिकॉर्डेड स्टीरियो ग़ज़ल एल्बम थी।

इस एल्बम के बाद दोनों पति-पत्नी संगीत जगत के सबसे लोकप्रिय ग़ज़ल युगल बन गए।
उनकी जोड़ी को लोग प्यार से “The King and Queen of Ghazals” कहा करने लगे।


🎶 संगीत में योगदान (JAGJIT–CHITRA DUO)

दोनों ने मिलकर दर्जनों एल्बम दिए, जिनमें प्रमुख हैं –

The Unforgettables (1976)

Come Alive in a Concert (1979)

Echoes

A Sound Affair

Passions

Someone Somewhere

उनकी गाई कुछ लोकप्रिय ग़ज़लें आज भी अमर हैं, जैसे —

“वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…”

“ये तेरा घर, ये मेरा घर…”

“तुमको देखा तो ये ख़याल आया…”

“होठों से छू लो तुम…”

“झुकी झुकी सी नज़र…”

चित्रा सिंह की आवाज़ में एक कोमलता और गहराई थी, जो जगजीत सिंह की मधुर, भावनात्मक गायकी के साथ अद्भुत संगम बनाती थी।
दोनों ने ग़ज़ल को आम जनता तक पहुँचाया — सरल भाषा, मधुर संगीत और दिल को छू लेने वाले बोलों के साथ।


💔 व्यक्तिगत त्रासदी और चित्रा सिंह का संगीत से संन्यास

उनके जीवन में सबसे बड़ा झटका 27 जुलाई 1990 को लगा, जब उनके इकलौते बेटे विवेक सिंह की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
विवेक मात्र 21 वर्ष के थे और पढ़ाई कर रहे थे।

यह घटना जगजीत और चित्रा, दोनों के जीवन को तोड़ देने वाली साबित हुई।जहाँ जगजीत ने अपने दुःख को संगीत में ढाल दिया, वहीं चित्रा सिंह ने पूरी तरह संगीत से संन्यास ले लिया।
उन्होंने 1990 के बाद कभी मंच पर नहीं गाया और न कोई एल्बम रिकॉर्ड किया।

बाद में, 2009 में उनकी बेटी मोनिका चौधरी (चित्रा की पहली शादी से) ने भी आत्महत्या कर ली — यह उनके लिए दूसरा बड़ा मानसिक आघात था।


🕊️ चित्रा सिंह – एक शांत किंतु दृढ़ व्यक्तित्व

चित्रा सिंह ने अपने जीवन में असाधारण संघर्ष झेला, लेकिन उन्होंने हमेशा गरिमा और संयम बनाए रखा।
आज भी वे मुंबई में रहती हैं और समय-समय पर जगजीत सिंह की स्मृति में आयोजित आयोजनों में भाग लेती हैं।

वर्ष 2022 में उन्होंने अपने पति की याद में “Jagjit Singh Foundation” की स्थापना की, जो युवा कलाकारों को संगीत शिक्षा और मंच प्रदान करने का कार्य करती है।


🌼 निष्कर्ष

जगजीत और चित्रा सिंह की प्रेम कहानी केवल एक वैवाहिक संबंध नहीं, बल्कि संगीत की आत्मीय यात्रा है।
दोनों ने मिलकर भारतीय ग़ज़ल को नया जीवन दिया, उसे घर-घर तक पहुँचाया और संवेदना के उस स्तर तक पहुँचाया जहाँ श्रोता खुद को गीतों में महसूस करते हैं।

उनकी जोड़ी संगीत इतिहास में हमेशा एक मिसाल रहेगी —
जहाँ प्रेम, पीड़ा और संगीत — तीनों एक हो जाते हैं।

सॉफ्ट स्किल्स, वित्तीय साक्षरता और स्टार्टअप

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देवेंद्र जोशी
आजकल भारत की किशोर आबादी के विचारों में आने वाला परिवर्तन इनके बीच जाकर संवाद करने से महसूस किया जा सकता है। आज का किशोर यानी भविष्य का युवा इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना चाहता है, वह परंपरागत विषयों से हटकर ऐसे नवाचार करना चाहता है जिससे उसके ज्ञान और पहल की सार्थकता सिद्ध हो सके। हाल ही में इन पंक्तियों के लेखक को एक प्रतिष्ठित स्कूल के बच्चों को संबोधित करने का अवसर मिला। संबोधन के बाद एक दसवीं क्लास का छात्र मेरे पास आया वह अपनी क्लास का टॉपर है और स्टार्टअप में अपना भविष्य देख रहा है। उस किशोर का मानना है कि पर्यटन स्थलों पर जाने वाले लोगों के पास एक्स्ट्रा सामान मसलन हैंडबैग, पर्स और खाने पीने का अतिरिक्त सामान एक बोझ की तरह से होता है अगर हमारी कंपनी वह सामान उसके घर तक सुविधाजनक कीमत में पहुंचा दे तो उसके पर्यटन का मजा खराब नहीं होगा। एक किशोर के मस्तिष्क में उपजे इस प्रकार के नवाचार को देखकर बड़ा अच्छा लगा मैंने उससे पूछा कि वह इतने अच्छे अंक लाकर डॉक्टर या इंजीनियर क्यों नहीं बनना चाहता, उसका जवाब था कि मैं चाहता हूं कि मैं बहुत से लोगों को रोजगार प्रदान करूं ।
ज्ञान और स्किल पर आधारित भविष्य का समाज मुख्यतः चार कॉन्सेप्ट के इर्द-गिर्द ही बनता हुआ प्रतीत होता है , सबसे पहले हम सॉफ्ट स्किल से बने व्यक्तित्व की बात करें तो आत्मविश्वास , इमोशनल मैनेजमेंट, नेतृत्व क्षमता ,टीमवर्क और समस्या समाधान के साथ-साथ अपने तनाव का करने वाला युवा भविष्य में किसी प्रकार के मानवीय संसाधन को नेतृत्व देगा | आज भी जब हम किसी बड़ी कंपनी की चयन प्रक्रिया को देखते हैं तो इन गुणों को वरीयता नियोक्ता देते हैं |
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भविष्य में एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जाता है ऐसे में आज का विद्यार्थी अपने समय प्रबंधन , प्रोजेक्ट निर्माण, प्रश्न पत्र तैयार करने और अपने उत्तर को औरों से बेहतर बनाने के साथ-साथ कठिन विषयों को सरलतम तरीके से समझने में इस तकनीक का प्रयोग कर रहा है | कंटेंट बनाना आज विद्यार्थी के लिए बहुत बड़ी चुनौती नहीं रह गया है |
इस आर्थिक युग में वित्तीय साक्षरता को दरकिनार नहीं किया जा सकता ऐसे में छोटी उम्र से ही बचत करना, निवेश के नए-नए तरीके सीखना, अपना और परिवार का बजट बनाना, वित्तीय धोखाधड़ी से बचना और आय के नए-नए साधनों को अर्जित करना आज किशोर सीखने लगे हैं |
और अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि भारत जैसे विकासशील देश में आज का युवा स्टार्टअप की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है| हमारे इस विविधता पूर्ण समाज में किसी भी प्रोडक्ट के हिट होने या किसी भी विचार को नवाचार बनाने की अनंत संभावना है ऐसे में सरकारी सहायता और बड़ी आसानी से मिलने वाला लोन इन युवाओं के सपनों को पंख दे रहा है | कुल मिलाकर हम अपने आसपास होने वाले इस सामाजिक परिवर्तन को महसूस कर पा रहे हैं और भविष्य की बड़ी ही खूबसूरत तस्वीर हमारे सामने हमारी युवा पीढ़ी बना रही है यह बहुत सुखद और आनंद दायक है।

देवेंद्र जोशी
शिक्षाविद् एंव लेखक

बेटियों को चाहिए शिक्षा, समानता और सुरक्षा

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                                        बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस हर साल 11 अक्टूबर को मनाया जाता है ताकि बालिकाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके अधिकारों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। दुनियाभर में महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचारों और असमानताओं जैसे भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बाल विवाह एवं अशिक्षा को देखते हुए और उन्हें इन सभी समस्याओं से उबारने के लिए तथा उनके संरक्षण के उद्देश्य से ही हर साल अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। आजकल बालिका के सशक्तीकरण की चर्चा हमारी जुबान पर हर वक्त रहती है। सरकारी चर्चा शिक्षा, टीकाकरण, समान अधिकार देने, स्वास्थ्य, पोषण और बालिकाओं की घटती संख्या से आगे नहीं बढ़ती है। जबकि माता पिता को बालिका की सुरक्षा हर समय चिंतित रखती है। देश में बालिकाओं के साथ हो रही अनहोनी वारदातें निरंतर बढ़ती जा रही है। बेटियों के सशक्तीकरण की अनेक योजनाओं के संचालन के बावजूद आज समाज में बेटियों को सुरक्षा और संरक्षा का समुचित वातावरण नहीं मिल रहा है। आए दिन बालिकाओं पर होने वाले अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा मामले छेड़छाड़ और दुष्कर्म के हैं। जमीनी सच्चाई बता रही है कि समाज और सरकार बालिकाओं की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित कर पाने में नकारा साबित हो रहा है। एक वर्ष की बच्ची से लेकर अधेड़ उम्र की महिला सुरक्षित नहीं है। माता पिता ढाई तीन साल की आयु में अपनी बेटी को स्कूल भेज देते है। जब तक बेटी सुरक्षित घर नहीं आजाती तब तक माँ की आँखे हर समय घर के दरवाजे को घूरती रहती है। राम राज्य की बातें करने वाले हमारे समाज को आखिर हो क्या गया है। हम किस रास्ते पर चल निकले है।

बेटी को जन्म से लेकर मृत्यु तक सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। हमारी संकुचित मानसिकता ही उनके विकास में अवरोधक बनी हुई है। आज बालिका हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के बाद भी अनेक सामाजिक कुरीतियों की शिकार हैं। ये कुरीतियों उनके आगे बढ़ने में बाधाएँ उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इन कुरीतियों के शिकार है। आज भी हजारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। समाज में कई घर ऐसे हैं, जहाँ बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जा रही है। यह दिवस बालिका शक्ति को लोगों के सामने लाने तथा उनके प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस देश की एक सच्चाई यह है कि भारत में हर घंटे चार बच्चों को यौन शोषण का सामना करना पड़ता है। हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटर फॉर रिसर्च के अनुसार पिछले 20 वर्षों में भारत में कन्या भ्रूण हत्या के कारण एक करोड़ बच्चियां जन्म से पहले काल की बलि चढा दी गईं। सभी को मिलकर इस कुरीति को मिटाना है। बाल विवाह, भ्रूण हत्या, शिशु मृत्यु दर रोके जाने, स्तनपान कराने, नियमित टीकाकरण, दहेज प्रथा एवं अन्य सामाजिक ज्वलंत विषयों में सुधार लाना चाहिए।

आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया पर कही ना कहीं से लड़कियों पर हो रहे अत्याचार की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये । आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है। संविधान और कानून बनाकर नारी के स्वाभिमान की रक्षा नहीं होगी। समाज पूरी तरह जागरूक और सचेत होगा तभी हम बालिका को सुरक्षा और संरक्षा की खुली हवां में साँस दिला पाएंगे। 

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर