“प्रदूषण की कीमत: क्या भारत को चाहिए एक व्यापक ‘प्रदूषण कर’?

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पर्यावरणीय आपातकाल और सीमित राजस्व—क्या आर्थिक दंड ही हरित भविष्य का मार्ग बना सकता है?**

भारत विश्व के उन देशों में है जहाँ वायु, जल और मिट्टी का प्रदूषण तीव्र स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी सबसे प्रदूषित नगरों की सूची में भारत के अनेक नगर शामिल हैं। जल-प्रदूषण से प्रतिवर्ष लाखों लोग रोगग्रस्त होते हैं। दूसरी ओर, स्वच्छ ऊर्जा, हरित अवसंरचना और प्रदूषण नियंत्रण हेतु सरकार के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं। ऐसे समय में “प्रदूषण कर”—अर्थात् प्रदूषण फैलाने पर आर्थिक दंड—को एक समुचित समाधान के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि इससे प्रदूषण में कमी और पर्यावरण-रक्षा के लिए स्थायी राजस्व दोनों प्राप्त हो सकते हैं।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ तेज आर्थिक विकास और बिगड़ते पर्यावरण के संकट के बीच संतुलन बनाना अत्यंत कठिन चुनौती बन गया है। शहरों की हवा दिन–प्रतिदिन जहरीली होती जा रही है, नदियाँ औद्योगिक कचरे से भर रही हैं, भूमिगत जल स्तर घट रहा है, ठोस कचरे के पहाड़ महानगरों की पहचान बनते जा रहे हैं, वहीं जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कृषि, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या अब भारत को प्रदूषण फैलाने वालों पर प्रत्यक्ष आर्थिक दंड लगाने—अर्थात् विस्तृत “प्रदूषण कर” लागू करने—की आवश्यकता है?

प्रदूषण कर का विचार नया नहीं, परन्तु इसकी आवश्यकता आज पहले से कहीं अधिक है। अर्थशास्त्र में यह माना जाता है कि जब कोई उद्योग, वाहन या गतिविधि प्रदूषण फैलाती है तो उसका दुष्परिणाम पूरे समाज को भुगतना पड़ता है, न कि केवल उसे जो प्रदूषण फैला रहा है। यह बाज़ार व्यवस्था की वह गंभीर विफलता है जिसे “बाह्य लागत” कहा जाता है—अर्थात् नुकसान तो समाज को होता है, पर उसका मूल्य न तो वस्तु की कीमत में जुड़ता है, न ही प्रदूषण फैलाने वाला उसे भरता है। ऐसे में “प्रदूषण कर” इसी असंतुलन को सुधारने का प्रयास करता है, जहाँ जो जितना अधिक प्रदूषण फैलाए, वह उतनी अधिक आर्थिक कीमत चुकाए।

भारत में कोयले पर लगाया गया “स्वच्छ ऊर्जा उपकर” इसका एक प्रारंभिक स्वरूप था, परंतु आज देश में वायु, जल, ध्वनि, ठोस कचरा और औद्योगिक उत्सर्जन का ऐसा मिश्रित संकट है कि केवल किसी एक क्षेत्र पर कर लगाना पर्याप्त नहीं। आवश्यकता एक सर्वसमावेशी और वैज्ञानिक पद्धति से तैयार प्रदूषण कर की है, जो प्रदूषण को कम करने और स्वच्छ विकल्पों को बढ़ावा देने में सहायक हो।

प्रदूषण कर का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह प्रदूषण को महँगा बनाता है और स्वच्छता को सस्ता। जब किसी उद्योग को प्रति इकाई उत्सर्जन पर कर देना पड़ेगा, तो वह स्वाभाविक रूप से ऐसी तकनीक अपनाने की ओर अग्रसर होगा जो कम प्रदूषण करे। यूरोप जैसे क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है जहाँ कार्बन-आधारित दंड के बाद ऊर्जा-संरक्षण और हरित तकनीक का उपयोग अत्यधिक बढ़ा। भारत में भी यह परिवर्तन संभव है, बशर्ते नीति दीर्घकालिक, पारदर्शी और लक्ष्य-उन्मुख हो।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत को आने वाले वर्षों में पर्यावरण-रक्षा और स्वच्छ ऊर्जा पर बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी। नदियों की सफाई, स्वच्छ परिवहन व्यवस्था, नवीकरणीय ऊर्जा, प्रदूषण नियंत्रण उपकरण, ठोस कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा हरित भवनों के विकास पर अत्यधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता होगी। ऐसे में प्रदूषण कर एक स्थायी और अनुमानित राजस्व स्रोत बन सकता है, जिसे एक स्वतंत्र “हरित निधि” के माध्यम से केवल पर्यावरण संरक्षण पर व्यय किया जा सकता है।

वैश्विक स्तर पर भी प्रदूषण कर का महत्व बढ़ रहा है। कई विकसित देश अब उन आयातित वस्तुओं पर अतिरिक्त शुल्क लगा रहे हैं जो अधिक प्रदूषणकारी स्रोतों से बनती हैं। यदि भारत घरेलू स्तर पर प्रदूषण पर उचित कर लागू करता है, तो भारतीय निर्यातकों को विदेशी बाज़ारों में अतिरिक्त शुल्क से राहत मिल सकती है। इस प्रकार प्रदूषण कर केवल पर्यावरण-हित में नहीं, बल्कि भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा की रक्षा में भी सहायक सिद्ध हो सकता है।

परंतु इन सबके बीच सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या प्रदूषण कर गरीबों पर भारी पड़ सकता है? यह चिंता बिल्कुल वास्तविक है। यदि ईंधन और बिजली की लागत बढ़ेगी, तो उसके साथ ही परिवहन, खाद्य पदार्थ और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इसका सीधा प्रभाव निम्न-आय वर्ग पर पड़ता है, जिनके पास विकल्प सीमित होते हैं। इसलिए प्रदूषण कर को न्यायपूर्ण बनाने के लिए यह अनिवार्य होगा कि निम्न-आय वाले परिवारों को प्रत्यक्ष नकद सहायता, ऊर्जा सब्सिडी और रसोई गैस जैसी आवश्यकताओं पर राहत दी जाए।

उद्योग जगत की चिंताएँ भी कम नहीं। विशेषकर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग ऊर्जा-प्रधान होते हैं और किसी भी अतिरिक्त कर का प्रभाव उनकी लागत पर पड़ता है। अतः प्रदूषण कर को चरणबद्ध ढंग से लागू करना होगा—पहले बड़े उद्योगों पर, फिर धीरे-धीरे छोटे उद्योगों को तकनीकी और वित्तीय सहायता के साथ इस दायरे में लाना होगा। हरित मशीनरी पर अनुदान, ब्याज रहित ऋण, और तकनीकी उन्नयन के लिए मार्गदर्शन इस परिवर्तन को सुगम बना सकते हैं।

भारत की प्रशासनिक क्षमता भी एक महत्वपूर्ण कारक है। प्रदूषण का सटीक मापन, डेटा की विश्वसनीयता और निगरानी तंत्र की पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक होगी। छोटे उद्योगों और गैर-प्रमाणित स्रोतों की निगरानी आज भी चुनौतीपूर्ण है। यदि उत्सर्जन मापन ही विश्वसनीय न हो, तो कर प्रणाली पर विश्वास नहीं किया जा सकता। इसलिए भारत को आधुनिक सेंसर-तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, डिजिटल उत्सर्जन-पंजीकरण तथा रियल-टाइम निगरानी प्रणाली को मजबूत करना होगा।

इसके अतिरिक्त, प्रदूषण कर की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि सरकार इसके राजस्व का उपयोग कहाँ करती है। यदि यह धन सामान्य बजट में विलीन हो गया, तो जनता में अविश्वास बढ़ेगा और नीति का उद्देश्य कमजोर पड़ेगा। इसके लिए एक स्वतंत्र “हरित कोष” का गठन आवश्यक है, जो केवल प्रदूषण नियंत्रण, स्वच्छ ऊर्जा, हरित परिवहन और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों पर व्यय हो तथा जिसकी वार्षिक लेखा-परीक्षा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।

राजनीतिक दृष्टि से यह एक साहसिक कदम होगा। किसी भी प्रकार की मूल्य-वृद्धि जनता के बीच असंतोष उत्पन्न कर सकती है। परंतु यह भी सत्य है कि पर्यावरणीय संकट अब इतना गंभीर हो चुका है कि उससे निपटने के लिए कठोर, दीर्घकालिक और दूरदर्शी आर्थिक सुधार आवश्यक हैं। भारत की युवा पीढ़ी सुरक्षित जल, स्वच्छ वायु और स्वस्थ जीवन की मांग कर रही है। इस मांग को नज़रअंदाज़ करना अब संभव नहीं।

अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रदूषण कर भारत के लिए केवल राजस्व-संग्रह का साधन नहीं, बल्कि एक व्यापक हरित परिवर्तन की दिशा में आवश्यक कदम है। इसे न्यायपूर्ण, पारदर्शी, चरणबद्ध और वैज्ञानिक आधार पर लागू करने से भारत न केवल प्रदूषण कम कर पाएगा, बल्कि अपने विकास मॉडल को भी टिकाऊ, स्वस्थ और पर्यावरण-सम्मत बना सकेगा।

यदि इसे सही नीतिगत ढंग से लागू किया गया, तो यह भारत के इतिहास में वह मोड़ साबित हो सकता है जहाँ देश ने आर्थिक विकास और पर्यावरणीय संरक्षण को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि सहयोगी सिद्ध किया।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

24 नवंबर को शाम से ही रामलला के दर्शन बंद रहेंगे

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राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम के कारण 24 नवंबर को शाम से ही श्रद्धालुओं के लिए रामलला के दर्शन बंद कर दिए जाएंगे. ये ध्वजारोहण कार्यक्रम 25 नवंबर को होगा. इस दिन राम मंदिर के मुख्य शिखर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ध्वजारोहण करेंगे.

राम मंदिर के शिखर पर ध्वजारोहण कार्यक्रम के कारण 24 नवंबर को शाम से ही श्रद्धालुओं के लिए रामलला के दर्शन बंद कर दिए जाएंगे. इसके बाद 26 नवंबर से दोबारा अपने निर्धारित समय से सुबह सात बजे से श्रद्दालु अपने रामलला के दर्शन कर सकेंगे. ये जानकारी श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की ओर से दी गई है

स्वच्छता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का एक वैश्विक प्रयास

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विश्व शौचालय दिवस

 बाल मुकुन्द ओझा

विश्व शौचालय दिवस हर साल 19 नवंबर को मनाया जाता है। यह महत्वपूर्ण दिवस केवल एक जन जाग्रति का अभियान या मिशन नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में स्वच्छता की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का एक वैश्विक प्रयास है। शौचालय मानव की पहली और बुनियादी जरुरत है। यह नागरिकों के मूलभूत अधिकारों से जुड़ी सर्वोच्च आवश्यकता है। मगर आज भी लाखों करोड़ों लोगों के पास यह सुविधा सुलभ नहीं होने से वे खुले में शौच को मज़बूर है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की 3.6 अरब से अधिक आबादी के पास अभी भी सुरक्षित स्वच्छता की सुविधा नहीं है। जबकि 673 मिलियन लोग खुले में शौच करते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने सिंगापुर द्वारा प्रस्ताव पेश करने के बाद साल 2013 में  विश्व शौचालय दिवस को संयुक्त राष्ट्र दिवस घोषित किया था। इससे पहले 2001 में सिंगापुर की एनजीओ ‘वर्ल्ड टॉयलेट ऑर्गनाइजेशन’ द्वारा अनौपचारिक रूप से विश्व शौचालय दिवस की स्थापना की गई थी। इस दिवस को मनाने के पीछे यही उद्देश्य और संदेश है कि विश्व के तमाम लोगों को 2030 तक शौचालय की सुविधा मुहैया करा दी जाए। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के 6 सतत विकास लक्ष्यों में से एक यह भी है। इस दिवस की 2024 की थीम स्वच्छता और जल प्रबंधन है, जो यह दर्शाती है कि स्वच्छ शौचालय जल सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं।

भारत की बात करें तो हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में सत्ता संभालते ही महिलाओं का दुःख दर्द समझा और बड़े पैमाने पर शौचालयों का निर्माण कर महिलाओं और लड़कियों की गरिमा की सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित किया गया। मोदी ने 2014 में स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से उन महिलाओं की दुर्दशा के बारे में बात की थी, जिन्हें घर में शौचालय नहीं होने के कारण भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। शौचालय नहीं होने के कारण महिलाओं के साथ हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाएं हुई क्योंकि वो खुले में शौच करने को मजबूर हैं। इससे एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत हुई। इसका  मुख्य उद्देश्य खुले में शौचमुक्त करना, गंदे शौचालयों को ठीक करना, हाथ से मैला ढोने प्रथा खत्म करना, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देना और स्वच्छता के संबंध में लोगों के व्यवहार परिवर्तन की दिशा में कार्रवाई करना।

भारत का स्वच्छता कवरेज 2014 में 39 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में 100 प्रतिशत हो गया- जो अपने आप में एक उल्लेखनीय और ऐतिहासिक  उपलब्धि है। इसलिए, स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण की सफलता को कई तरीकों से मापा जा सकता है। सरकार का उद्देश्य अब गांवों को ओडीएफ प्लस बनाने का है और इसके लिए ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की भी जरूरत है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक दस साल पहले तक भारत की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी शौचालयों की कमी के कारण खुले में शौच करने के लिए मजबूर थी। वर्तमान में  देश में 12 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए और शौचालय कवरेज का दायरा पहले के 40 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत हो गया। यह भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि है।

मोदी ने देशवासियों से स्वच्छ भारत अभियान में भाग लेने और मन की बात के माध्यम से स्वच्छ भारत मिशन को लागू करने में मदद करने के लिए कहा, तो देश के सभी हिस्सों के लोगों ने उनके आह्वान का जवाब दिया और बड़ी संख्या में भाग लिया। स्वच्छ भारत मिशन से हर साल 60 से 70 हजार बच्चों की जान बच रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2014 से 2019 के बीच 3 लाख लोगों की जान बचाई गई, जो डायरिया के कारण गवां दी जाती। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट में बताया कि घर में शौचालय बनने से अब 90 प्रतिशत से अधिक महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं और स्वच्छ भारत मिशन के कारण महिलाओं में संक्रमण से होने वाली बीमारियों में भी काफी कमी आई है। इसी भांति लाखों स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय बनने से, स्कूल छोड़ने की दर में कमी आई है। यूनिसेफ के एक अन्य अध्ययन में बताया कि स्वच्छता के कारण गांवों में परिवारों को हर साल औसतन 50 हजार रुपये की बचत हो रही है, जो पहले बीमारियों के इलाज पर खर्च हो जाते थे।

– बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

D 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

सीएम होकर भी अब उछल−कूद नही कर सकेंगे नीतीश कुमार

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अशोक मधुप

वरिष्ठ पत्रकार

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी का ये कथन  इस बार के बिहार के जनादेश पर सही उतरता है कि बिहार दुनिया को राजनीति सिखाता है। इस जनादेश ने जहां विपक्षी दलों को उनकी औकात बता दी,वहीं नीतीश कुमार को भी  बता दिया कि अगले पांच साल भाजपा के बिना गुजारा नही है। मुख्यमंत्री बने रहना है तो भाजपा को साथ लेकर चलना होगा। उसे नजर अंदाज कर मुख्यमंत्री नही रह सकते। इस बार आप  पाला नही बदल पाओगे।  भाजपा के दबाव में काम करना होगा।

बिहार में नई सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब काफी हद तक साफ होती दिख रही है। एनडीए गठबंधन के मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार की ही ताजपोशी होगी, जबकि बीजेपी को दो डिप्टी सीएम दिए जाने की चर्चा तेज है।

इस बार भाजपा न सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, बल्कि जेडीयू के बगैर भी वह एनडीए के अन्य सहयोगियों के साथ जादुई आंकड़े को पार कर गई । ऐसे में नीतीश कुमार के लिए भाजपा के साथ किसी तरह का बिहार में बार्गेनिंग करना अब सरल नहीं रह गया है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से यह बार-बार दोहराया गया है कि चुनाव के बाद भी परिणाम चाहे जो भी आएं, गठबंधन के चेहरे नीतीश कुमार ही बने रहेंगे। जेडीयू की ओर से भी यह बात दोहराई गई है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। वैसे ये तय है कि ज्यादा सीट मिलने   के कारण नीतीश कुमार के मंत्री मंडल में भी भाजपा के मंत्रियों की संख्या भारी होगी।

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत ने एक बार फिर बता दिया कि ये चमत्कार  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व, गृहमंत्री अमित शाह की चुनावी रणनीति की देन है। एनडीए की जीत के पीछे उनके 10 प्रमुख वादे पंचामृत गारंटी, रोजगार सृजन, ,महिलाओं के लिए योजनाएं, मुफ्त शिक्षा, कृषि सुधार तथा बुनियादी ढांचे का विकास आदि शामिल है। इस बार के चुनाव की विशेषता यह भी है कि  बिहार की 243 सीट में एनडीए गठबंधन को 202 ,महांगठबंधन को 35, एआईएमआईएम को पांच और अन्य को एक सीट मिली। भाजपा को 89 सीट मिली और वह प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। नीतीश कुमार की जदयू को 85 सीट मिली।  1951 के बाद बिहार में इस बार सबसे ज्यादा  67.13 प्रतिशत मतदान हुआ। ये मतदान  पिछले विधानसभा चुनाव से 9.6 प्रतिशत ज्यादा है। इस बार के मतदान में पुरुषों की हिस्सेदारी 62.98 प्रतिशत रही और महिलाओं की 71.78 प्रतिशत। पुरुषों की तुलना में महिलाओं का मतदान 8.15 प्रतिशत ज्यादा रहा । ऐसा लगता   है कि एनडीए ने एकतरफा बिहार की महिलाओं का विश्वास जीता  है। महागठबंधन की करारी हार बताती है कि चुनावी रैलियों में भीड़ जरूर इकट्ठी हुई, भाषणों में तीखे हमले भी हुए, लेकिन विपक्ष जनता का विश्वास नही जीत सका। इन चुनावों की  बड़ी देन  चिराग पासवान का उभार रहा। उन्होंने यह साबित कर दिया कि वे  भविष्य के निर्णायक खिलाड़ी हैं। सीटों पर उनकी मजबूत पकड़ ने यह बता दिया कि वे आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति को नए सिरे से लिखेंगे।

इस बार के चुनाव में पहली बार जन सुराज पार्टी ‘ नामक एक नया राजनैतिक दल ने भी बिहार की राजनीति में अपनी ज़ोरदार उपस्थिति दर्ज कराने के लिए सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए।बड़ी बात यह है कि इस पार्टी के लगभग सभी उम्मीदवार शिक्षित,बुद्धिजीवी,पूर्व नौकर शाह,पूर्व आई ए एस,आई पी एस,वैज्ञानिक,गणितज्ञ तथा शिक्षाविद हैं, किंतु किसी को विजय  नही मिली। जन सुराज पार्टी ‘ के संस्थापक व अकेले रणनीतिकार व स्टार प्रचारक वही प्रशांत किशोर हैं, जो नरेंद्र मोदी व भाजपा से लेकर देश के अधिकांश राजनैतिक दलों व नेताओं के लिये एक पेशेवर के रूप में चुनावी रणनीति तैयार करने के बारे में जाने जाते हैं। पार्टी की बुरी हार ने यह साबित कर दिया कि उनके दावों में कोई दम नही था।

इस बार ऐतिहासिक जीत के बाद बिहार की जनता को एनडीए से अपेक्षाएं भी बहुत हैं। देखना है कि एनडीए  सरकार उनकी अपेक्षाओं पर कैसे खरी उतरती है। एनडीए को सुशासन लाने, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए काम करने के साथ साथ राज्य में ऐसी भी व्यवस्था करनी होगी कि बिहार में तस्करी से शराब न आ सके। शराब बंदी पूरी तरह और सख्ती से लागू हो। कुल मिलाकर बिहार की जनता ने जो भारी मतदान किया वह जंगलराज, परिवारवाद तथा भ्रष्टाचार के खिलाफ है। मतदान सुशासन, स्त्री सुरक्षा और पलायन रोकने के पक्ष में है। विपक्ष ने बिहार के जेन- जी को भड़काने का प्रयास किया लेकिन उसने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भरोसा जताया। बिहार के चुनाव परिणाम साधारण  नहीं है। इनका परिणाम भारत के भविष्य के निर्माण की दिशा तय करने वाला है।इस चुनावी जनादेश को जनविश्वास की कसौटी से देखना होगा। विश्लेषकों द्वारा बिहार विधानसभा 2025 चुनाव में  राजग की जीत सुनिश्चित मानी जा रही थी तथापि महागठबंधन की इतनी करारी हार की आशंका किसी को नहीं थी,  राजग और महागठबंधन  के नेताओं को भी नहीं। इन परिणामों ने सभी को चौंकाया है। राजग की अप्रत्याशित जीत, भाजपा नीत मोदी सरकार तथा बिहार में नीतीश सरकार पर जनता के भरोसे की जीत है। बीस वर्ष बाद भी लालू के शासनकाल का जंगलराज जनता भूल नहीं पाई है । बिहार की जनता ने जातिवाद, परिवारवाद, मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। गरीब, महिला, किसान और युवा मतदाता का नया समीकरण स्पष्ट दिखाई दे रहा है।

बिहार के 2025 विधानसभा चुनाव न केवल एक राजनीतिक जीत है बल्कि लोकतांत्रिक पुनर्पुष्टि का संकेत हैं। एनडीए की जीत स्पष्ट और व्यापक है, जो महिलाओं, जातिगत गठजोड़, संगठनात्मक मजबूती और मजबूत कल्याण नीतियों के मिश्रण से संभव हुई। वहीं, विपक्ष को यह सोचना होगा कि उसका जनसंवाद आखिर कहाँ चूक गया और भविष्य में उसे कैसे समायोजित किया जाए। यह परिणाम बिहार की राजनीति के अगले अध्याय की शुरुआत हो सकती है — लेकिन यह भी सच है कि लोकतंत्र अब और अधिक सक्रिय, उत्तरदायी और बहुआयामी होता जा रहा है। भविष्य में न सिर्फ पार्टियों की राजनीतिक रणनीतियाँ, बल्कि उनके विकास मॉडल और सामाजिक संकल्प भी इस मतदाता-जनादेश द्वारा परख की जाएँगी।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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समाज को बदलने की शुरुआत: बच्चों को नई दृष्टि देने का संकल्प

“समाज बदलने की पहली शर्त यही है कि हम अपने बच्चों को दुनिया को देखने की नई दृष्टि दें—

दृष्टि जो केवल देखना न सिखाए, बल्कि समझना, परखना और सुधारना भी सिखाए।”

– डॉ प्रियंका सौरभ

समाज परिवर्तन की सबसे कठिन, सबसे लंबी और सबसे महत्त्वपूर्ण यात्रा हमेशा अपने मूल में उन छोटे-छोटे बीजों से शुरू होती है, जिन्हें हम बच्चे कहते हैं। दुनिया की कोई भी क्रांति—विचारों की हो, नैतिकता की हो, तकनीक की हो या इंसानी मूल्यों की—तब तक स्थायी नहीं हो सकती जब तक वह अगली पीढ़ियों के जीवन-दर्शन में अपनी जड़ें न जमा ले। यही कारण है कि बुद्ध, विवेकानंद, गांधी, टैगोर, नेल्सन मंडेला जैसे विचारकों ने मानव सभ्यता में किसी स्थायी परिवर्तन के लिए शिक्षा, संस्कार और बाल मानस की संवर्धन को सबसे महत्वपूर्ण आधार माना। आज जब समाज अनेक स्तरों पर मूल्य-संकट, हिंसा, असहिष्णुता, उपभोक्तावाद, कट्टरता और सामाजिक विघटन की चुनौतियों से गुजर रहा है, तब यह प्रश्न और भी तीखा हो उठता है—क्या हम अपने बच्चों को वह दृष्टि दे पा रहे हैं, जिसके आधार पर वे वर्तमान से बेहतर भविष्य बना सकें?

बच्चों के भीतर समाज को देखने का दृष्टिकोण केवल पाठ्यपुस्तकों से नहीं बनता, बल्कि परिवार, परिवेश, विचारों, संवाद, उदाहरणों और सबसे अधिक—व्यस्कों के व्यवहार से बनता है। बच्चा, दरअसल, समाज का सबसे संवेदनशील दर्पण होता है। जिस प्रकार की भाषा, सोच, सह-अस्तित्व, सामाजिक व्यवहार, संवेदनशीलता और दृष्टि वह अपने आस-पास देखता है, वही धीरे-धीरे उसके भीतर किसी अनलिखी किताब की तरह अंकित हो जाती है। यही कारण है कि यदि हम समाज को बदलना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें अपने व्यवहार, अपने पारिवारिक वातावरण और अपने सामाजिक आचरण को बदलना होगा—क्योंकि बच्चा वही बनता है, जो वह देखता है; वही नहीं बनता, जिसे वह सुनता है।

आज के समय में बच्चों के सामने समाज को समझने के दो बड़े स्रोत मौजूद हैं—एक परिवार, दूसरा डिजिटल दुनिया। दुर्भाग्य यह है कि दोनों में से किसी में भी वह स्पष्ट और संतुलित दृष्टि नहीं मिल पाती, जिसकी उसे आवश्यकता है। परिवारों में संवाद कम हो गया है, समय घट गया है और साथ बैठने की संस्कृति लगभग लुप्त होती जा रही है। वहीं डिजिटल दुनिया बच्चों को सूचना का असीमित सागर तो देती है, परंतु विवेक और दिशा का दीपक नहीं देती। ऐसे में बच्चे जानकारी तो बहुत पा लेते हैं, परंतु समझ की कमी के कारण वह जानकारी उनके भीतर भ्रम, असुरक्षा और अव्यवस्थित दृष्टिकोण पैदा कर देती है।

इसीलिए यह आवश्यक है कि हम बच्चों को समाज को देखने के लिए एक ऐसी दृष्टि दें जो संवेदनशील हो, विवेकपूर्ण हो, वैज्ञानिक हो, नैतिक हो और सबसे अधिक—मानवतावादी हो। बच्चा यदि सीख जाए कि समाज केवल भीड़ नहीं, बल्कि व्यक्तित्वों का एक जीवंत तानाबाना है; कि हर व्यक्ति की अपनी संघर्ष-कथा है; कि हर निर्णय का कोई संदर्भ होता है; और कि सहानुभूति किसी भी सभ्यता का सबसे बड़ा आधार है—तो वह न केवल एक बेहतर नागरिक बनेगा, बल्कि समाज को भी बेहतर दिशा देगा।

समाज परिवर्तन का यह बीज तभी पनप सकता है जब हम अपने बच्चों को प्रश्न पूछना सिखाएं। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में बच्चों को प्रश्न पूछने से अधिक उत्तर रटने की आदत डाली जाती है। जबकि सच्चा ज्ञान, सच्चा चिंतन और सच्ची प्रगति वहीं से जन्म लेती है जहाँ प्रश्नों की स्वतंत्रता होती है। यदि बच्चा अपने घर, स्कूल और समाज में यह महसूस करे कि वह निडर होकर प्रश्न कर सकता है, विचार व्यक्त कर सकता है, असहमति जता सकता है, और गलतियों से सीख सकता है—तो उसके भीतर रचनात्मकता और मौलिकता विकसित होती है। यही रचनात्मकता समाज को आगे ले जाती है।

समाज को देखने का नया दृष्टिकोण बच्चों को तभी मिलेगा जब हम उन्हें विविधता को स्वीकार करना सिखाएँ। आज के समय में विभाजन, ध्रुवीकरण और एकांगी सोच के कारण समाज के भीतर खाईयाँ बढ़ रही हैं। बच्चे स्कूलों में साथ पढ़ते हैं, खेलते-कूदते हैं, लेकिन बड़े होने पर अक्सर उन दीवारों को अपना लेते हैं जो समाज ने खड़ी की होती हैं। इसलिए यह बेहद महत्वपूर्ण है कि हम बच्चों को यह समझाएँ कि विविधता समाज की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है। यदि वह यह समझ जाए कि हर संस्कृति, हर भाषा, हर परंपरा, हर विचार और हर व्यक्ति समाज की सामूहिक पहचान का हिस्सा है—तो वह न केवल एक बेहतर नागरिक बनेगा, बल्कि वह उन दीवारों को भी तोड़ पाएगा जो नफरत और संकीर्णता खड़ी करती हैं।

समाज बदलने की इस प्रक्रिया में शिक्षा प्रणाली की भूमिका निर्णायक है। शिक्षा केवल परीक्षा पास कराने का साधन नहीं हो सकती; वह बच्चों को जीवन और समाज को समझने की कला भी सिखाए। उन्हें यह बताया जाए कि सफलता केवल अंकों से नहीं, बल्कि इंसानियत, सत्यनिष्ठा, सहयोग, साहस और संवेदनशीलता से भी मापी जाती है। यह भी समझाया जाए कि समाज केवल लिए जाने की चीज़ नहीं, बल्कि कुछ देने की जिम्मेदारी भी है। जब बच्चा अपने जीवन में ‘कर्तव्य’ का भाव समझता है, तभी वह समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लेता है।

बच्चों को नई दृष्टि देने के लिए पहला कदम है—उन्हें सही आदर्श देना। आदर्श का मतलब सिर्फ बड़े-बड़े व्यक्तित्व नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में ऐसे छोटे-छोटे उदाहरण भी हैं, जो उनके व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालते हैं। जैसे—किसी भूखे को भोजन देना, किसी बुज़ुर्ग की सहायता करना, प्रकृति की रक्षा करना, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता रखना, सत्य बोलना, स्त्री-पुरुष समानता मानना, जाति-भेद समाप्त करना और कानून का सम्मान करना। जब बच्चा यह सब अपने घर और समाज में जीवन्त रूप में देखता है, तब उसमें भी वैसा ही चरित्र-विकास होता है।

बच्चों में यह दृष्टि विकसित करने के लिए सबसे आवश्यक है—उन्हें स्वयं सोचने देना, स्वयं अनुभव करने देना, स्वयं सीखने देना। बच्चों पर अपनी सोच थोप देना समाज परिवर्तन का मार्ग नहीं, बल्कि समाज को जड़ता में बाध्य करने का तरीका है। यदि बच्चा स्वयं यह अनुभव करे कि समाज में समस्याएँ हैं और उन्हें बदलना संभव है, तो उसके भीतर यथार्थ की समझ और परिवर्तन का साहस जन्म लेता है।

बच्चों को नया दृष्टिकोण देना मतलब यह नहीं कि हम उन्हें आदर्शवादी कल्पनाओं में जीने दें। बल्कि उन्हें यह समझाना है कि समाज जटिल है, समस्याएँ वास्तविक हैं, लेकिन समाधान भी संभव हैं। उन्हें चुनौतियों को स्वीकार करना सिखाना है। उन्हें यह बताना है कि प्रगति के रास्ते संघर्ष से होकर गुजरते हैं, और यह कि उनके छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े परिवर्तन का कारण बन सकते हैं।

यदि हम आने वाली पीढ़ियों को यह समझा पाएं कि समाज कोई बाहरी व्यवस्था नहीं, बल्कि ‘हम सभी’ की सामूहिक चेतना है—तो समाज को बदलने की यह यात्रा सशक्त और सफल हो सकती है। बच्चे वही समाज बनाएँगे, जो हम आज उनके भीतर बोएँगे। आज यदि हम उनके भीतर सत्य, न्याय, संवेदना, समानता, विज्ञान, विवेक और मानवीय मूल्यों के बीज बोते हैं, तो कल वे उसी समाज की फसल काटेंगे।

अंततः बात फिर उसी सिद्धांत पर आकर खड़ी होती है—समाज को बदलने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने बच्चों को समाज को देखने का नया दृष्टिकोण प्रदान करना होगा। यह दृष्टिकोण न केवल उनके भविष्य को उजाला देगा, बल्कि हमारे समाज की सामूहिक चेतना को भी नए क्षितिजों तक ले जाएगा। क्योंकि बच्चा केवल परिवार की आशा या राष्ट्र का भविष्य ही नहीं होता—वह वह दीपक है, जिसकी रोशनी से आने वाले समय का मार्ग प्रकाशित होता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

हिट हो गई मोदी और शाह की जोड़ी

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                                                                                                                                    बाल मुकुन्द ओझा

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को मिली प्रचंड जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की जोड़ी को दिया जा रहा है। यह कहने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि मोदी और अमित शाह ने मिलकर जीत की पटकथा तैयार की। बिहार चुनाव जीतकर मोदी और शाह की जोड़ी ने भारतीय राजनीति को दिशा और दृष्टि दी। बिहार चुनाव में हिट हो गई मोदी नीतीश की जोड़ी। यह जोड़ी भाजपा की रणनीति से लेकर सफलता का आधार रही है। मोदी के निर्देशन में अमित शाह ने बिहार जीतने के लिए माइक्रो-प्लानिंग पर बहुत ध्यान दिया। उन्होंने बूथ और ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ सीधी बैठकें कीं। उनकी पारखी नज़रों ने बिहार को पहचानने में देर नहीं की। उन्होंने स्पष्ट किया कि किस बूथ पर किस दल का प्रभाव है और कार्यकर्ताओं को किस तरह गठबंधन साथी के उम्मीदवार के लिए काम करना है। इस जमीनी रणनीति ने गठबंधन के वोटों को एक साथ लाने में निर्णायक भूमिका निभाई और सीटें बढ़ाने में मदद की। शाह की रणनीति के आगे विपक्ष चारो खाने चित हो गया। अमित शाह भाजपा के चाणक्य है। उनके नेतृत्व में भाजपा जीत के रिकॉर्ड कायम कर रही है। बिहार के बाद अब मोदी और शाह की जोड़ी की अग्नि परीक्षा अगले साल बंगाल विधान सभा के चुनाव में होंगी। मोदी ने घोषणा कर दी है कि बिहार के जनादेश ने अब बंगाल में भाजपा की जीत का रास्ता खोला है और पार्टी वहां भी जंगल राज खत्म करेगी। यदि इस परीक्षा में यह जोड़ी सफल हो जाती है तो 2027 में यूपी चुनाव में जीतना आसान हो जायेगा।

जनसंघ और भाजपा में अटल आडवाणी की जोड़ी कई दशकों तक छाई रही। पार्टी के सभी फैसले यह जोड़ी ही लेती थी। पार्टी के पोस्टर, बैनर और लगभग सभी स्थानों पर इन दोनों के चित्र ही लगे रहते थे। अटलजी के बीमार होने और नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल आडवाणी जोड़ी का स्थान नरेंद्र मोदी अमित शाह की जोड़ी ने ले लिया। अमित शाह आज देश के गृह मंत्री है। शाह फर्श से अर्श तक पहुँचने वाले एक साधारण कार्यकर्त्ता से शक्तिशाली पद पर प्रतिष्ठित हुए है। एक राज्य स्तर के नेता का धूमकेतु की तरह इतनी जल्दी राष्ट्रीय स्तर पर छा जाना कोई कम महत्त्व नहीं है। शाह की सांगठनिक क्षमता और भाषण शैली भी गजब की है। उन्होंने अपने तार्किक और प्रभावशाली भाषण से श्रोताओं के साथ दूसरे नेताओं को भी प्रभावित किया है। उनकी इस क्षमता से प्रभावित होकर ही आर एस एस ने पहले भाजपा मुखिया फिर गृह मंत्री बनाने की मोदी की गुहार को अपनी स्वीकृति दी थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के जानकर लोगों का कहना है कि वाजपेयी और आडवाणी की ही तरह उन्होंने नरेंद्र मोदी को राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर लाने में भरपूर मदद की। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, मोदी और शाह एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। वो दशकों से एक साथ रहे हैं। वो एक जैसा सोचते हैं और एक विश्वस्त टीम की तरह काम करते हैं। अमित शाह और नरेंद्र मोदी के जीवन में कई समानता है। दोनों ने आरएसएस की शाखाओं में जाना बचपन से शुरू कर दिया था और दोनों ने अपनी जवानी में अपने जोश और कुशलता से वरिष्ठ नेताओं को प्रभावित किया था। दोनों की संवाद शैली काफी प्रभावोत्पादक है।

2001 में मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बनाये जाते हैं। तब नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को अपने मंत्री मंडल में शामिल किया और उन्हें 17 पोर्टफोलियो दिये गये। यहीं से दोनों की दोस्ती गाढ़ी होती गई। 2003 में नरेंद्र मोदी फिर गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो नरेंद्र मोदी ने अमित शाह को प्रदेश के गृहमंत्री सहित कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी।  2014 में बीजेपी ने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाया तो अमित शाह ने इस चुनाव में रणनीतिकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चुनाव बीजेपी के पक्ष में रहा नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गये। मोदी ने भी इस विश्वास को आगे बढ़ाते हुए अमित शाह को बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया। 2019  और 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने केंद्रीय मंत्री मंडल में अमित शाह को जगह देते हुए देश का गृह मंत्री बनाकर सबसे महत्वपूर्ण पद दिया। यहीं से दोनों की मित्रता के विकास की यात्रा बढ़ती गई जो आज भी कायम है। कुछ लोगों का कहना है मोदी के बाद शाह देश की कमान संभालेंगे। इसके लिए मोदी अपनी सोची समझी रणनीति पर काम कर रहे है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

 डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

सवालों के घेरे में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद

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विश्व राजनीति की अशांत मिट्टी पर खड़े संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का नैतिक व संस्थागत आधार आज पहले से कहीं अधिक प्रश्नों से घिरा है। जब युद्ध बढ़ते जा रहे हैं, तब शांति का सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं अपनी भूमिका सिद्ध करने में असफल दिख रहा है। 

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 1945-आधारित संरचना आज की बहुध्रुवीय और संघर्षग्रस्त दुनिया में शांति बनाए रखने में सक्षम नहीं रह गई है। वीटो शक्ति का राजनीतिक दुरुपयोग, अप्रतिनिधिक सदस्यता, कमजोर राजनीतिक निरंतरता, असंगठित शांति अभियानों और बड़े मानवीय संकटों पर निष्क्रियता ने UNSC को कठघरे में खड़ा कर दिया है। वैश्विक दक्षिण की बढ़ती असंतुष्टि और विश्व व्यवस्था में उभरते शक्ति-संतुलन इस संस्था की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाते हैं। संयुक्त राष्ट्र को अपनी वैधता और प्रभावशीलता बचाने के लिए गहरे, व्यावहारिक और कार्यात्मक सुधार अपनाने होंगे—अन्यथा शांति का यह सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं प्रश्नों का केंद्र बन जाएगा।

— डॉ. सत्यवान सौरभ

सवालों के घेरे में खड़ा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद केवल एक संस्था का संकट नहीं है, बल्कि यह वैश्विक नैतिक नेतृत्व के क्षरण की बड़ी कहानी भी है। जब संयुक्त राष्ट्र का जन्म हुआ था, तब दुनिया दूसरी विश्वयुद्ध की राख से निकल रही थी और मानवता ने सामूहिक रूप से यह प्रण लिया था कि भविष्य में किसी भी बड़े युद्ध को रोका जाएगा। उस सपने का केंद्र था—सुरक्षा परिषद, जिसे शांति का संरक्षक, वैश्विक न्याय का प्रहरी और सामूहिक सुरक्षा का आधार माना गया। मगर आज, लगभग 80 वर्ष बाद, जब दुनिया यूक्रेन, गाज़ा, सूडान, यमन, म्यांमार और साहेल जैसे संघर्षों से दहक रही है, तब यह संस्था अक्सर मौन खड़ी दिखाई देती है।

यह मौन केवल असहायता का प्रतीक नहीं है, बल्कि उस संरचनात्मक कमजोरी का भी संकेत है जिसने वर्षों में इसकी विश्वसनीयता को खोखला कर दिया। जब दुनिया भर के नागरिक शांति की उम्मीद में इस संस्था की ओर देखते हैं, तब यह भू-राजनीतिक हितों की जकड़ में बंधी दिखाई देती है। यही कारण है कि आज शांति का सबसे बड़ा संरक्षक स्वयं सबसे बड़े सवालों का विषय बन गया है।

सबसे बड़ी समस्या है—वीटो शक्ति से पैदा होने वाला शक्ति-असंतुलन। पाँच स्थायी सदस्य देशों के हाथों में केंद्रित यह शक्ति उन्हें किसी भी प्रस्ताव को रोकने का अधिकार देती है, भले वह प्रस्ताव मानवीय त्रासदी को रोकने जितना आवश्यक ही क्यों न हो। यही कारण है कि गाज़ा में हज़ारों बच्चों की मौतें हों, यूक्रेन में शहरों के शहर तबाह हो जाएँ, या म्यांमार में लोकतांत्रिक संस्थाओं का विनाश हो—सुरक्षा परिषद अक्सर पक्षाघात की स्थिति में दिखाई देती है। यह एक ऐसे दरवाज़े का दृश्य बन गया है जिसके बाहर सहायता की गुहार लगाने वाले लाखों लोग खड़े होते हैं, लेकिन उस दरवाज़े को खोलने की चाबी कुछ सीमित देशों के हाथों में होती है, जो अपने राष्ट्रीय हितों को वैश्विक शांति से ऊपर रख देते हैं।

सवाल यहाँ से आगे बढ़ता है—क्या शांति किसी राष्ट्र के हितों से छोटी हो सकती है? क्या हत्या और भूख से जूझते लोग किसी स्थायी सदस्य की भू-नीति के कारण मृत्यु के लिए छोड़ दिए जाएँ? क्या संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक संगठन का उद्देश्य केवल औपचारिक बयान देना रह गया है? ये प्रश्न आज तीखे होते जा रहे हैं, क्योंकि दुनिया भर में मीडिया, नागरिक समाज और शांति विशेषज्ञ लगातार यह महसूस कर रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र की नैतिक शक्ति का क्षरण हो चुका है।

दूसरी समस्या है—इस संस्था की संरचना का अप्रतिनिधिक होना। दुनिया 1945 से अब पूरी तरह बदल चुकी है, लेकिन UNSC की संरचना लगभग जड़वत है। अफ्रीका, जो संघर्षों का केंद्र भी है और शांति के लिए सर्वाधिक योगदान भी देता है, उसका कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं है। भारत जैसा विशाल लोकतंत्र, जिसके योगदान शांति रखरखाव से लेकर मानवीय सहायता तक व्यापक हैं, उसे भी अब तक स्थायी सदस्यता नहीं मिली है। यह एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था का संकेत है जो वास्तविकता से कट चुकी है।

जहाँ वैश्विक शक्ति-मानचित्र बदल गया है—चीन का उदय हुआ, भारत आर्थिक व राजनीतिक रूप से नई ऊँचाइयों पर पहुँचा, अफ्रीका उभरती संभावनाओं का महाद्वीप बन गया, लातिन अमेरिका राजनीतिक रूप से अधिक मुखर हुआ—वहाँ सुरक्षा परिषद अब भी 1945 की मानसिकता में फंसी है। परिणामस्वरूप, कई देश इसे “वैध” के बजाय केवल “पुरानी व्यवस्था” का अवशेष समझने लगे हैं।

तीसरी समस्या है—शांति अभियानों की राजनीतिक विफलता। संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापना अभियानों ने कई जगह हिंसा को रोका जरूर, परंतु राजनीतिक स्थिरता नहीं ला सके। यह ऐसा था मानो किसी टूटते हुए घर की दीवार पर रंग तो कर दिया जाए, लेकिन दरारों की मरम्मत न की जाए। शांति केवल बंदूकें शांत कर देने से नहीं आती; यह आती है संवाद, समावेशन, शासन-सुधार और समाज के भीतर विश्वास पैदा करने से। लेकिन संयुक्त राष्ट्र का तंत्र शांति स्थापना और राजनीतिक समाधान को एकीकृत नहीं कर पाता।

उदाहरण के लिए, कई अफ्रीकी देशों में शांति सेना लगाने के बाद राजनीतिक मार्गदर्शन का अभाव रहा, जिसके कारण थोड़े समय बाद हिंसा फिर भड़क उठी। यह विफलता केवल संसाधन या क्षमता की नहीं, बल्कि दृष्टि-हीन रणनीति की भी है।

चौथी समस्या है—निरंतरता का अभाव। UNSC अक्सर केवल संकट की शुरुआत में सक्रिय होता है, लेकिन जब स्थिति स्थिर होने लगती है, तब उसकी उपस्थिति कम हो जाती है। इससे संघर्षग्रस्त देश राजनीतिक संक्रमण के बीच झूलते रह जाते हैं। यह “अधूरी शांति” का निर्माण करता है, जिसका अंत प्रायः नई हिंसा में होता है।

पाँचवीं समस्या है—इन विफलताओं के कारण संयुक्त राष्ट्र के प्रति भरोसे का क्षरण। आज वैश्विक दक्षिण में यह धारणा तेजी से बढ़ रही है कि सुरक्षा परिषद कुछ देशों की राजनीतिक लड़ाई का मैदान बन गया है। यही कारण है कि अफ्रीकी संघ, आसियान, अरब लीग और यूरोपीय संघ जैसे क्षेत्रीय संगठन अपने-अपने सुरक्षा ढाँचे मजबूत कर रहे हैं, और यह प्रवृत्ति संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को सीमित करती जा रही है।

इन सबके बीच प्रश्न उठता है—क्या समाधान है? क्या UNSC को बदलने की जरूरत है? या उसे पुनर्जीवित करने की?

उत्तर है—दोनों।

सुरक्षा परिषद में संरचनात्मक बदलाव आवश्यक हैं—नए स्थायी सदस्य, वीटो शक्ति की समीक्षा, क्षेत्रीय संतुलन—परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है कार्यप्रणाली में सुधार। संयुक्त राष्ट्र महासभा अनुच्छेद 22 के तहत नए संस्थान बनाकर सुरक्षा परिषद की कमजोरियों की भरपाई कर सकती है। एक शांति एवं सतत सुरक्षा बोर्ड जैसी संस्था यह सुनिश्चित कर सकती है कि राजनीतिक निरंतरता बनी रहे, संघर्ष-बाद सुधारों की निगरानी हो, और शांति केवल युद्धविराम पर आधारित न होकर दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता में बदले।

इसके साथ क्षेत्रीय संगठनों की भूमिका भी बढ़ानी होगी, क्योंकि वे स्थानीय संस्कृति, राजनीति और जमीनी वास्तविकताओं को बेहतर समझते हैं। शांति स्थापना अभियानों को राजनीतिक रणनीति के साथ जोड़ना होगा ताकि केवल बंदूकें ही नहीं, बल्कि मन भी शांत हो सकें।

सबसे महत्वपूर्ण है—संयुक्त राष्ट्र को स्वयं अपनी नैतिक विश्वसनीयता को पुनः स्थापित करना होगा। वह तभी संभव है जब वह मानवीय संकटों में समयबद्ध, निष्पक्ष और साहसिक निर्णय लेने में सक्षम हो। केवल बयान देने की संस्कृति से आगे बढ़कर, उसे वास्तविक प्रवर्तन-आधारित शांति तंत्र बनना होगा।

आज दुनिया भय, ध्रुवीकरण, तकनीकी संघर्ष, आतंकवाद, जल-संकट, और युद्ध की आशंकाओं से जूझ रही है। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता मानवता को निराश कर रही है। शांति के इस सबसे बड़े संरक्षक पर उठते सवाल तभी शांत होंगे जब यह संस्था स्वयं को 21वीं सदी के अनुरूप पुनर्निर्मित करेगी।

समय आ गया है कि दुनिया संयुक्त राष्ट्र से वह भूमिका वापस मांगे जिसे निभाने का वादा उसने 80 वर्ष पहले किया था—

शांति, न्याय और मानवता की रक्षा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी

“लोकतंत्र की रीढ़ या बाज़ार का शोर? प्रेस की स्वतंत्रता की परीक्षा”

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राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस (16 नवंबर)

प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।

जब पत्रकार निर्भय होते हैं, तब नागरिक सुरक्षित होते हैं।

लेकिन आज सत्ता, बाज़ार और डिजिटल शोर के बीच सत्य की आवाज़ दबती जा रही है। फेक न्यूज़, प्रोपेगेंडा और ट्रेंडिंग कंटेंट ने पत्रकारिता की गंभीरता को चुनौती दी है।

राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस हमें यह याद दिलाता है कि

यदि सवाल पूछने का साहस खत्म हो गया, तो लोकतंत्र भी केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाएगा। स्वतंत्र, निष्पक्ष और साहसी पत्रकारिता ही राष्ट्र की चेतना और जनमत की असली रक्षा करती है।

✍️ डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत हर साल 16 नवंबर को राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाता है—एक ऐसा दिन जो हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की मज़बूती का असली आधार सत्ता नहीं, सत्य की निर्भय अभिव्यक्ति है। यह दिन केवल पत्रकारों का उत्सव नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के विवेक का पर्व है। क्योंकि लोकतंत्र तभी जीवित रहता है जब उसके नागरिकों को सच्चाई तक पहुँचने का अधिकार मिले और उसके पत्रकारों को सत्य कहने का साहस।

प्रेस की स्वतंत्रता दरअसल शब्दों की नहीं, विचारों की स्वतंत्रता है। यह केवल घटनाओं को रिपोर्ट करने का दायित्व नहीं, बल्कि उन सच्चाइयों को उजागर करने का संकल्प है जिन्हें सत्ता, व्यवस्था या समाज अक्सर छिपा देना चाहता है। पत्रकारिता की यही निडरता लोकतंत्र को जीवंत रखती है—क्योंकि सत्ता को नियंत्रित करने का सबसे मजबूत माध्यम न बंदूक है, न क़ानून, बल्कि क़लम की नैतिकता है।

1975 के आपातकाल के दौरान जब सेंसरशिप ने प्रेस का गला घोंट दिया था, तब भारतीय लोकतंत्र ने अपनी सबसे कड़ी परीक्षा दी। कई अख़बारों ने डरकर खाली कॉलम छापे, कई पत्रकारों ने जेलें देखीं, और कुछ आवाज़ें हमेशा के लिए खामोश हो गईं। यही कारण है कि यह दिवस उन संघर्षों का स्मरण भी है, जिन्होंने साबित किया कि प्रेस की स्वतंत्रता कोई कृपा नहीं—यह लोकतंत्र का जन्मसिद्ध अधिकार है।

आज डिजिटल युग ने पत्रकारिता को नई गति दी है, पर उसी के साथ अभूतपूर्व चुनौतियाँ भी पैदा की हैं। खबरों की यात्रा अख़बारों से मोबाइल स्क्रीन तक आ गई है। परंतु हर तेज़ समाचार विश्वसनीय हो, यह ज़रूरी नहीं। एल्गोरिद्म तय करते हैं कि जनता क्या देखेगी, और व्यूज़ यह तय करते हैं कि क्या “खबर” कहलाएगा। यही वह बिंदु है जहाँ पत्रकारिता और मनोरंजन की रेखाएँ धुंधली पड़ गई हैं।

ऐसे समय में प्रेस की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती है—क्योंकि जब सूचना का प्रवाह अनियंत्रित हो, तब सत्य की स्पष्टता ही एकमात्र मार्गदर्शक बनी रह जाती है।

पत्रकारिता का मूल यह नहीं है कि कौन सबसे पहले खबर दिखाता है; बल्कि यह है कि कौन सबसे पहले साहसपूर्वक सत्य दिखाता है। भारत के असंख्य पत्रकार आज भी गाँवों की कच्ची पगडंडियों से लेकर महानगरों की चकाचौंध तक, अपराध, भ्रष्टाचार, असमानता और अन्याय को उजागर करने में लगे हैं। वे अक्सर बिना सुरक्षा, बिना संसाधन और बिना संस्थागत संरक्षण के काम करते हैं। सच कहें तो पत्रकारिता आज भी एक पेशा नहीं—एक जोखिमभरा संघर्ष है।

प्रेस की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं कि वह सामाजिक उत्तरदायित्व से मुक्त है। फेक न्यूज़, आधा–सच और सनसनीखेज़ रिपोर्टिंग ने समाज में भ्रम फैलाया है। इसलिए पत्रकारिता की नैतिकता उसके अस्तित्व की पहली शर्त है। एक स्वतंत्र प्रेस तभी सम्मान पाती है जब वह निष्पक्ष, तथ्याधारित और जनहित में काम करे। सत्य को तोड़ने–मरोड़ने की स्वतंत्रता, स्वतंत्रता नहीं, अराजकता है।

सोशल मीडिया के दौर में पत्रकारिता को सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन्फ्लुएंसर और पत्रकार के बीच की दूरी कम होती जा रही है। जहाँ पत्रकार सत्य का पीछा करता है, वहीं इन्फ्लुएंसर ट्रेंड का। पत्रकार का लक्ष्य तथ्य होता है, इन्फ्लुएंसर का लक्ष्य व्यूज़। दुखद यह है कि कई बार जनता भी सरल मनोरंजन को कठिन सत्य पर प्राथमिकता देने लगी है।

यदि समाज सच सुनने की इच्छा खो देगा, तो पत्रकारिता की स्वतंत्रता भी धीरे-धीरे महत्वहीन हो जाएगी।

स्वतंत्र प्रेस केवल पत्रकारों की लड़ाई नहीं—यह नागरिकों का अधिकार है। नागरिक जितने जागरूक होंगे, प्रेस उतना ही निर्भीक होगा। अगर जनता आलोचनात्मक सोच खो देगी, तो प्रेस केवल बाज़ार और सत्ता का उपकरण बनकर रह जाएगी। इसलिए लोकतंत्र का स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिक अपने समाचार स्रोतों से क्या अपेक्षा रखते हैं—सच? या मनोरंजन?

यह चुनाव आने वाले समय में पत्रकारिता की दिशा तय करेगा।

आज भारत का मीडिया अनेक दबावों के बीच काम करता है—राजनीतिक, आर्थिक, कॉर्पोरेट और सामाजिक। कई बार सच्चाई कहने का परिणाम नौकरी जाना, मुकदमों में फँसना या जान जोखिम में डालना होता है। इसके बावजूद सैकड़ों पत्रकार आज भी निडर होकर लिखते हैं, बोलते हैं और मैदान में उतरते हैं।

उनका साहस हमें यह याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता कागज़ पर नहीं, जमीनी संघर्षों से जीवित रहती है।

राष्ट्रीय प्रेस स्वतंत्रता दिवस का उद्देश्य केवल इतिहास को याद करना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को यह चेतावनी देना भी है कि प्रेस कमजोर हुआ तो लोकतंत्र भी कमजोर हो जाएगा। जब सवाल पूछना अपराध बन जाए और चुप्पी सुरक्षा का साधन, तब लोकतंत्र का हृदय मंथर होने लगता है।

इसीलिए पत्रकारिता को पुनः उस मूल स्थान पर लौटना होगा जहाँ सच्चाई सर्वोच्च हो—न मालिक से डर, न बाज़ार से, न व्यवस्था से।

समाज के लेखकों, कवियों, शिक्षकों और विद्वानों पर भी यह जवाबदेही है कि वे पत्रकारिता की इस गिरावट और दबाव को समझें। एक राष्ट्र केवल विज्ञान, उद्योग या सेना से महान नहीं बनता; वह महान तब बनता है जब उसमें विचार, संवाद और सत्य की संस्कृति जीवित हो।

और यह संस्कृति प्रेस के बिना संभव नहीं है।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि प्रेस की स्वतंत्रता सिर्फ एक संवैधानिक प्रावधान नहीं—यह राष्ट्र की नैतिक आत्मा है। जहाँ प्रेस डरकर लिखे, वहाँ समाज कभी स्वतंत्र नहीं हो सकता। और जहाँ पत्रकारिता सवाल पूछने से हिचक जाए, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे रस्म में बदल जाता है।

16 नवंबर इसीलिए महत्वपूर्ण है—क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि

एक राष्ट्र उतना ही स्वतंत्र है,

जितना उसका पत्रकार स्वतंत्र है।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता का प्रश्न और एसआईआर की अनिवार्यता

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भारत में चुनाव केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे जीवंत उत्सव है। मतदान जनता को अपनी आवाज़ सुनाने और नीतिगत दिशा तय करने का अवसर प्रदान करता है। इस दौरान प्रशासन निष्पक्षता, सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए व्यापक व्यवस्थाएँ करता है—मतदान केंद्रों की तैयारी से लेकर जागरूकता अभियानों तक। चुनाव आयोग द्वारा की गई व्यवस्थाएँ नागरिकों के भरोसे को मजबूत करती हैं। वोट देना केवल अधिकार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है, जो राष्ट्र के भविष्य को दिशा देती है।

✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ शासन की असली शक्ति जनता के हाथों में निहित मानी जाती है। यहाँ सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है और संविधान की स्पष्ट व्यवस्था के अनुसार यह प्रक्रिया चुनाव आयोग की निष्पक्ष संरचना और उसकी कार्यशैली द्वारा संचालित होती है। मतदाता सूची इस पूरी प्रक्रिया की आधारशिला है—क्योंकि उसी के माध्यम से नागरिक अपने मताधिकार का प्रयोग करते हैं। इसलिए मतदाता सूची की विश्वसनीयता और शुचिता लोकतंत्र की स्थिरता के लिए अत्यंत आवश्यक है। यही संदर्भ विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया—स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (Special Intensive Revision – SIR)—को अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाता है।

मतदाता सूची में त्रुटियाँ कई रूपों में सामने आती हैं—मृत व्यक्तियों के नाम, एक व्यक्ति का दो स्थानों पर नाम, पात्र मतदाताओं के नाम का गायब होना, या पते के परिवर्तन के बावजूद संशोधन न होना। ऐसी स्थिति चुनावों की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार देता है, जिसमें चुनाव संचालन, नियंत्रण, निर्देशन और पर्यवेक्षण शामिल हैं। अतः एसआईआर केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि संवैधानिक रूप से स्थापित लोकतांत्रिक दायित्व है।

1950 में संविधान लागू होने के बाद से ही चुनाव आयोग नियमित रूप से मतदाता सूची में संशोधन करता रहा है। कुछ राज्यों में एसआईआर के दौरान बड़ी मात्रा में मृतकों के नाम हटाए गए, गलत प्रविष्टियाँ सुधारी गईं, और स्थानांतरित या नए पात्र मतदाताओं को सूची में जोड़ा गया। बिहार और बंगाल में हुए पुनरीक्षणों के उदाहरण बताते हैं कि लंबे समय से निष्क्रिय पड़े नामों को हटाने से मतदाता सूची अधिक वास्तविक और पारदर्शी बन सकी। बंगाल में 7.6 करोड़ मतदाताओं की सूची में से लगभग 47 लाख नाम हटाए गए, जिससे पता चलता है कि अगर नियमित संशोधन न हो तो सूची कितनी विकृत हो सकती है।

मतदाता सूची में त्रुटियाँ केवल तकनीकी समस्या नहीं—वे चुनावी निष्पक्षता, प्रतिनिधित्व के अधिकार और जनविश्वास पर सीधा आघात करती हैं। यदि किसी नागरिक का नाम सूची से गायब है, तो वह अपने मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार—मताधिकार—से वंचित हो जाता है। दूसरी ओर, मृतकों या स्थानांतरित लोगों के नाम बने रहने से फर्जी मतदान या राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका बढ़ती है। इन विसंगतियों से लोकतंत्र की वैधता कमजोर होती है।

कुछ लोग एसआईआर को राजनीतिक हस्तक्षेप या सरकार द्वारा मतदाता सूचियों में हस्तक्षेप के रूप में देखने लगते हैं, जबकि यह शंका तथ्यहीन है। मतदाता सूची का शुद्धिकरण किसी दल की जीत या हार के लिए नहीं, बल्कि निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया के लिए आवश्यक है। चुनाव आयोग पूर्णतः स्वायत्त संस्था है और उसके निर्णय न्यायालयों द्वारा भी संरक्षित माने जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में स्पष्ट कहा है कि निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला है और इसके लिए मतदाता सूची की शुचिता सुनिश्चित करना अनिवार्य है।

एसआईआर के दौरान नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी महत्वपूर्ण है। यदि लोग स्वयं अपनी प्रविष्टियों की जाँच न करें, त्रुटियाँ सम्बंधित बूथ लेवल अधिकारियों को न बताएं, और दस्तावेज उपलब्ध न कराएं तो प्रक्रिया धीमी हो जाती है। आज भी बड़ी संख्या में ऐसे नागरिक हैं जिनके नाम गलत होने पर वे स्वयं सुधार के लिए आगे नहीं आते। यह उदासीनता लोकतंत्र को कमजोर करती है। इसलिए चुनाव आयोग ने डिजिटल साधनों—जैसे वोटर हेल्पलाइन ऐप, ऑनलाइन फॉर्म, पोर्टल—का उपयोग बढ़ाया है ताकि लोग आसानी से संशोधन कर सकें।

एसआईआर के विरोध करने वालों को यह समझना चाहिए कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची में विसंगतियों को दूर करने, फर्जी मतदान रोकने और सही मतदाता आधार सुरक्षित करने के लिए है। जिन राज्यों में यह प्रक्रिया रोकी गई या राजनीतिक विवाद के कारण ठप हो गई, वहां मतदाता सूची में भारी त्रुटियाँ पाई गईं। ऐसे मामलों में न्यायालयों ने स्वयं दिशा-निर्देश जारी कर मतदाता सूची के शुद्धिकरण की आवश्यकता दोहराई है। अतः एसआईआर का विरोध लोकतांत्रिक मूल्यों का विरोध है।

भारत जैसे विशाल देश में जहाँ 96 करोड़ से अधिक मतदाता हैं, वहां मतदाता सूची का अद्यतन एक अत्यंत जटिल, विशाल और सतत प्रक्रिया है। इसे केवल सरकारी जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं; यह नागरिक कर्तव्य भी है। चुनाव आयोग केवल ढाँचा देता है, लेकिन उसे प्रभावी बनाने का दायित्व जनता के सहयोग पर निर्भर है। मतदाता सूची में अपनी प्रविष्टि को सही रखना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना मतदान के दिन वोट देना।

अंततः, लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं—पूरी व्यवस्था का नाम है। इस व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए मतदाता सूची की शुचिता सर्वोपरि है। एसआईआर यही सुनिश्चित करता है कि चुनाव निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय हों। यह लोकतांत्रिक प्रणाली की आत्मा को जीवित रखता है और नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित करता है। इसलिए मतदाता सूची के नियमित शुद्धिकरण को लेकर जागरूकता बढ़ाना, नागरिकों को भागीदारी के लिए प्रेरित करना और एसआईआर जैसी प्रक्रियाओं को सहयोग देना हर जिम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

राजस्थान में तीसरे मोर्चे के झंडाबरदार

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बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान विधानसभा के अंता उप चुनाव ने तीसरे मोर्चे की नींव खड़ी करदी है। राज्य की राजनीति एक बार फिर नए समीकरणों की ओर बढ़ती दिख रही है। इस बार चर्चा है एक तीसरे मोर्चे की, जो भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग अपनी राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है। राजस्थान में एक बार फिर तीसरे मोर्चे की संभावनाएं हिलोरे लेने लगी है। सांसद हनुमान बेनीवाल प्रदेश में तीसरे मोर्चे की संभावनाओं पर बड़े आशान्वित है। बेनीवाल का कहना है कि 2024 में 7 विधानसभा सीटों पर हुए उप -चुनाव में कांग्रेस पार्टी की 6 सीटों पर हार हुई जिसमें से खींवसर सहित 4 सीटों पर कांग्रेस पार्टी की जमानत जब्त हुई और अंता विधानसभा क्षेत्र के उप- चुनाव के परिणाम में तीसरे मोर्चे के उम्मीदवार नरेश मीणा ने लगभग 55 हजार मत लेकर यह स्पष्ट कर दिया कि जब हाड़ौती आंचल में भी तीसरे मोर्चे ने स्थापित दोनों राष्ट्रीय पार्टियों को कड़ी चुनौती दी है तो आने वाले समय में राजस्थान की जनता तीसरे मोर्चे को बड़ा आशीर्वाद देगी। इस बार तीन लड़ाकू नेता तीसरे मोर्चे के झंडाबरदार बनने जा रहे है। ये नेता है, नरेश मीना, राजेंद्र गुड्डा और हनुमान बेनीवाल। इनमें हनुमान बेनीवाल राजस्थान लोकतान्त्रिक पार्टी की कमान संभाले हुए है, साथ ही वे नागौर से सांसद भी है। वहीं राजेंद्र गुढ़ा दो बार के विधायक और मंत्री रहे है। तीसरे जुझारू नेता नरेश मीना है जो विधानसभा का कोई चुनाव तो अब तक नहीं जीत पाए मगर 50 हज़ार से अधिक वोट लेकर अपने दमख़म का परिचय दिया। अंता उप चुनाव के दौरान ये नेता एक साथ जुड़े थे। इन तीनों नेताओं  का कभी न कभी कांग्रेस से जुड़ाव रहा है। हनुमान बेनीवाल अपनी बात मुखरता से रखते है। जाट बाहुल्य इलाकों में उनकी पार्टी के जड़े गहराई से जुडी है। युवाओं में लोकप्रिय है, उनकी एक आवाज पर हजारों लोग इक्कठे होते देर नहीं करते। यही उनकी ताकत है। राजेंद्र गुढ़ा ने एक संघर्षशील नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई है। बेनीवाल की भांति कांग्रेस और भाजपा के विरोध में झंडा बुलंद कर रखा है। तीसरे नेता नरेश मीना ने राजस्थान विश्व विधालय के छात्र नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई। मीना ने कई बार कांग्रेस से टिकट मांगी मगर टिकट नहीं मिलने से तीनों बार निर्दलीय चुनाव लड़ा। वे चुनाव में सफल तो नहीं हुए मगर अपने स्वजातीय वोटों का बड़ा हिस्सा अपने पक्ष में जरूर कर लिया जिसका खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ा है। अतः उप चनाव में कई नेताओं ने उनका समर्थन किया था और माना जा रहा है इसी चुनाव से तीसरे मोर्चे की नींव पड़ गई है। तीनों नेता अपनी अपनी जातियों में अच्छा खासा दखल रखते है। इन तीनों के अलावा प्रदेश में दो और नेता है जो कांग्रेस और भाजपा से अलग अपना प्रभुत्व कायम किये हुए है। इनमें राजकुमार रोत बांसवाड़ा से सांसद है और रविंद्र भाटी बाड़मेर जिले से निर्दलीय विधायक है। अगर ये पांचों नेता एक हो जाते है तो राजस्थान में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं बलवती हो जाएगी। पांचों नेता लड़ाकू प्रवृति के है। इस तरह जाट, राजपूत, मीना और आदिवासी समुदाय के मतदाताओं में इनके दबदबे से इंकार नहीं किया जा सकता।  राजस्थान में चौधरी कुम्भाराम आर्य से लेकर हनुमान बेनीवाल तक तीसरे मोर्चे के अनेक झंडाबरदार हुए है। इनमें आर्य सहित नाथूराम मिर्धा, दौलत राम सारण, दिग्विजय सिंह, देवी सिंह भाटी,  लोकेन्द्र सिंह कालवी, किरोड़ी लाल मीणा, घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल के नाम मुख्य रूप से लिए जा सकते है। इन लोगों ने भारी शोर शराबे और धूम धड़ाके से तीसरे मोर्चे की हुंकार भरी थी मगर प्रदेश की मरुभूमि में ये मोर्चा सरसब्ज नहीं हुआ। अनेक की भ्रूण हत्या भी हो गई। राजस्थान में कई बार तीसरे मोर्चे की बुनियाद रखी गई मगर हर बार दीवार खड़ी होने  से पहले ही धराशाही हो गई। आजादी के बाद राज्य में तीस साल तक कांग्रेस का एकछत्र राज रहा। 1977 में पहली बार कांग्रेस का राज पलटा और विभिन्न दलों को मिलाकर बनी जनता पार्टी सत्तारूढ़ हुई। बाद के दो दशकों में राज्य की राजनीति अस्थिर रही। जनता पार्टी टुकड़े टुकड़े होकर बिखर गई। भाजपा के रूप में जनसंघ का पुनः उदय हुआ। इस पार्टी ने कद्दावर नेता भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व में विभिन्न क्षेत्रीय और अपने अपने इलाकों में जमीन से जुड़े  नेताओं को भाजपा में शामिल कर पार्टी को मजबूत बनाया। इस भांति प्रदेश में कांग्रेस और भाजपा में सीधे मुकाबले की स्थिति बनी। साम्यवादी, समाजवादी और अन्य जातीय दल मिलकर तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं कर पाए। राजपूत नेता कल्याण सिंह कालवी, देवीसिंह भाटी जाट नेता कुंभाराम आर्य, नाथूराम मिर्घा, दौलत राम सहारण, किरोड़ी मीणा, हनुमान बेनीवाल और घनश्याम तिवाड़ी लाख प्रयासों के बाद भी राज्य में तीसरा मोर्चा खड़ा नहीं कर पाए। हारकर देवी सिंह भाटी, किरोड़ी और तिवाड़ी अपनी मूल पार्टी भाजपा में लौट आये। हनुमान बेनीवाल अभी मैदान में डटे है और दोनों मुख्य दलों को ललकार रहे है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर