भारतीय तटरक्षक बल का जहाज रणनीतिक यात्रा में ईरान के चाबहार बंदरगाह पर पहुंचा

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भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) का अपतटीय गश्ती पोत सार्थक ईरान के चाबहार बंदरगाह पर पहुंच गया है। रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह गहरे पानी का बंदरगाह भारत को ईरान, अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जोड़ने वाला एक सीधा व सुरक्षित समुद्री मार्ग उपलब्ध कराता है। यह पोत 16 से 19 दिसंबर, 2025 तक चार दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर ईरान में रहेगा।

चाबहार बंदरगाह पर भारतीय तटरक्षक बल (आईसीजी) के इस जहाज की यह पहली यात्रा है, जो क्षेत्र में भारत की बढ़ती समुद्री उपस्थिति और सक्रिय भागीदारी को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। यह दौरा अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सुरक्षित एवं भरोसेमंद आपूर्ति लाइनों को सुदृढ़ करने की भारत की क्षमता को भी रेखांकित करती है।

भारतीय तटरक्षक बल का जहाज सार्थक बंदरगाह पर प्रवास के दौरान ईरानी नौसेना तथा ईरान की अन्य समुद्री एजेंसियों के साथ विभिन्न पेशेवर एवं सामुदायिक गतिविधियों में भाग लेगा। इनमें शिष्टाचार भेंट, कार्य संबंधी संवाद व विचार-विमर्श शामिल हैं, जिनका उद्देश्य दोनों देशों के बीच संस्थागत संबंधों को सुदृढ़ करना तथा समुद्री सुरक्षा, सहयोग एवं आपसी समझ को और अधिक गहरा करना है।

बंदरगाह के प्रमुख आकर्षणों में समुद्री खोज एवं बचाव (एसएआर), समुद्री कानून प्रवर्तन (एमएलई) और समुद्री प्रदूषण रोधी कार्रवाई (एमपीआर) पर केंद्रित संयुक्त प्रशिक्षण गतिविधियां शामिल होंगी। चाबहार बंदरगाह में तेल रिसाव और खतरनाक तथा हानिकारक पदार्थों (एचएनएस) के रिसाव से निपटने पर आधारित समुद्री प्रदूषण रोधी प्रतिक्रिया का व्यावहारिक प्रदर्शन किया जाएगा, जिससे दोनों पक्षों के समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र की क्षमता प्रदर्शित हो सके। इसके अतिरिक्त, एमआरसीसी-से-एमआरसीसी समन्वय अभ्यास, एक टेबल-टॉप अभ्यास तथा संयुक्त दौरा, बोर्डिंग, तलाशी व जब्ती (वीबीएसएस) अभ्यास आयोजित किए जाएंगे, जो दोनों देशों के बीच सहभागिता, आपसी समन्वय एवं परिचालन तत्परता को और अधिक सुदृढ़ करेंगे।

पेशेवर गतिविधियों के अतिरिक्त, इस यात्रा के दौरान खेल प्रतियोगिताओं के अलावा एक बीच वॉकथॉन भी आयोजित किया जाएगा, जिनमें राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) के कैडेट सक्रिय रूप से भाग लेंगे। ये गतिविधियां समुद्री पर्यावरण संरक्षण, तटीय स्वच्छता एवं जन-जागरूकता को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से आयोजित की जा रही हैं और राष्ट्रीय पुनीत सागर अभियान के अनुरूप हैं।

इस जहाज का चाबहार बंदरगाह दौरा कुवैत की हालिया यात्रा के बाद हुआ है, जहां भारतीय तटरक्षक बल के जहाज सार्थक ने कुवैत तटरक्षक बल के साथ सफल और सार्थक संवाद किया था। ये यात्राएं भारतीय तटरक्षक बल की बढ़ती क्षेत्रीय उपस्थिति व क्षेत्रीय समुद्री भागीदारों के साथ रचनात्मक जुड़ाव को और अधिक स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं।

आईसीजी जहाज सार्थक की चाबहार की चार दिवसीय यात्रा समुद्री सहयोग को सुदृढ़ करने, नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को बढ़ावा देने और विशाल हिंद महासागर क्षेत्र व खाड़ी में शांति, स्थिरता एवं सतत विकास को प्रोत्साहित करने के प्रति भारत की दृढ़ वचनबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

खेल मंत्री ने पहला विश्व कप जीतने के बाद भारतीय स्क्वैश टीम को सम्मानित किया

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केन्द्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने बुधवार को ऐतिहासिक विश्व  कप जीतने वाली भारतीय स्क्वैश टीम को सम्मानित किया।

जोशना चिनप्पा, अभय सिंह, वेलवन सेंथिलकुमार और अनाहत सिंह की मिश्रित टीम ने पिछले शनिवार को चेन्नई में इतिहास रच दिया।इस जीत के साथ भारत ने अपना पहला स्क्वैश विश्व कप खिताब जीता और 2023 संस्करण  में मिले कांस्य पदक से बेहतर प्रदर्शन किया।भारत ने टूर्नामेंट के फाइनल में शीर्ष वरीयता प्राप्त हांगकांग को 3-0 से हराया और स्क्वैश विश्व कप जीतने वाला चौथा देश बन गया तथा ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड एवं मिस्र जैसे विजेता  देशों की सूची में शामिल हो गया।खिलाड़ियों को बधाई देते हुए, डॉ. मांडविया ने कहा कि यह “भारतीय खेल जगत के लिए गर्व का क्षण” है।

उन्होंने कहा, “भारत खेल के क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रहा है। एक के बाद एक, हम नई उपलब्धियां हासिल कर रहे हैं। हमारी महिला क्रिकेट टीम ने भी हाल ही में विश्व कप जीता है।” मंत्री ने आगे कहा, “हमारी स्क्वैश टीम का अपनी धरती पर विश्व कप जीतना बहुत गर्व का क्षण है। टीम ने पूरे टूर्नामेंट में एक भी मैच नहीं हारा। मुझे खुशी है कि खेल के क्षेत्र में हुआ यह विकास देश के गौरव में और भी वृद्धि करेगा।”भारत के शीर्ष स्क्वैश खिलाड़ियों को टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (टॉप्स) के तहत प्राप्त समर्थन से भी लाभ हुआ है। इस स्कीम ने लगातार बेहतर प्रदर्शन से संबंधित सुझावों, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और विशेषज्ञों द्वारा मार्गदर्शन के जरिए उनकी तैयारी को ठोस करने में अहम भूमिका निभाई है।

युवा खिलाड़ी अनाहत सिंह ने चेन्नई मीट के दौरान मिले दर्शकों के समर्थन को श्रेय दिया। 17-वर्षीया अनाहत ने कहा, “मैंने पहली बार अपने वरिष्ठ साथियों के साथ विश्व कप में खेला। यह एक शानदार सीखने वाला अनुभव था और मैं निरंतर समर्थन देने के लिए चेन्नई के खेलप्रेमियों को धन्यवाद देती हूं।”

टीम अब एशियाई खेल 2026 और 2028 में लॉस एंजिल्स ओलंपिक जैसे बड़ी प्रतियोगिताओं  की प्रतीक्षा कर रही है, जहां स्क्वैश पहली बार शामिल होगा।अगले वर्ष जापान में होने वाले एशियाई खेल से पहले, पद्म श्री  एवं अर्जुन अवॉर्ड विजेता जोशना चिनप्पा उम्मीद बनाए हुए हैं।

39-वर्षीया खिलाड़ी ने कहा, “हम कई महीनों से तैयारी कर रहे थे और इस विश्व कप में बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। इससे हमें जापान में होने वाले एशियाड से पहले काफी आत्मविश्वास मिला है। मैं व्यक्तिगत रूप से उम्मीद करती हूं कि मैं बेहतरीन स्थिति में रहूंगी और एशियाई खेलों के लिए क्वालिफाई करूंगी।”

योगी ने पीएसी के 78वें स्थापना दिवस परेड का निरीक्षण किया

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मुख्यमंत्री याेगी आदित्यनाथ जी ने प्रदेशवासियों काे उत्तर प्रदेश पी0ए0सी0 के 78वें
संस्थापना दिवस की बधाई एवं शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पी0ए0सी0 बल के अनुशासन, शौर्य,
त्याग और समर्पण का एक गौरवशाली इतिहास है। साहस, अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा, व्यावसायिक
दक्षता और कठिन प्रशिक्षण ही पी0ए0सी0 बल की पहचान है। प्रदेश सरकार पी0ए0सी0 के जवानों
के सम्मान के साथ उनकी सुविधा और संसाधनों में निरन्तर वृद्धि के लिए कृतसंकल्पित है।
मुख्यमंत्री जी आज यहां उत्तर प्रदेश प्रादेशिक आम्र्ड काॅन्स्टेबुलरी (यू0पी0पी0ए0सी0) के
संस्थापना दिवस समाराेह-2025 का शुभारम्भ करने के पश्चात आयाेजित कार्यक्रम में अपने विचार
व्यक्त कर रहे थे। इस अवसर पर मुख्यमंत्री जी ने सर्वाेत्तम वाहिनी, सर्वश्रेष्ठ बाढ़ राहत दल,
उत्कृष्ट खिलाड़ी, बेस्ट पुलिस माॅडर्न स्कूल और मेधावी छात्र-छात्राओं को सम्मानित किया। उन्होंने
पी0ए0सी0 बल द्वारा आयोजित प्रदर्शनी का भी उद्घाटन किया। मुख्यमंत्री काे उ0प्र0 पी0ए0सी0
के जवानाें ने गार्ड आँफ आँनर दिया गया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश में सुरक्षा, शान्ति, समृद्धि तथा आत्मविश्वास का वातावरण
निर्मित होने के प्रमुख कारणों में एक राज्य में कानून का राज स्थापित हाेना है। कानून का राज
ही हमें सुशासन की गारण्टी दे सकता है। सुशासन में निवेश सुरक्षित हाे सकता है और सुरक्षित
निवेश हमारे युवाओं की आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बन सकता है। प्रदेश के विकास और नए
उत्तर प्रदेश का राज यहीं से प्रारम्भ होता है।

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि 13 दिसम्बर, 2001 काे देश की संसद पर हुए कायराना आतंकी
हमले के समय संसद सुरक्षा में तैनात 30वीं वाहिनी पी0ए0सी0, गोण्डा के जवानाें ने मुस्तैदी से
अपनी ड्यूटी का निर्वहन करते हुए मुठभेड़ के दाैरान सभी पांचों आतंकवादियों काे मार गिराया
था। जुलाई, 2005 को श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या परिसर में आतंकी हमले के दाैरान
सी0आर0पी0एफ0, पी0ए0सी0 और उत्तर प्रदेश पुलिस की संयुक्त टीम ने मोर्चा लेकर सभी
आतंकवादियों को मुठभेड़ में मार गिराया था। प्रदेश सरकार ने पी0ए0सी0 की 46 कम्पनियों को
पुनर्जीवित किया है। इन कम्पनियों के माध्यम से प्रदेश में बेहतर कानून-व्यवस्था तथा आन्तरिक
सुरक्षा के माध्यम से देश के सामने प्रदेश की बेहतर छवि प्रस्तुत करने में सफलता प्राप्त हुई है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा पी0ए0सी0 जवानों की संख्या, उनकी क्षमता,
प्रशिक्षण और तकनीक में वृद्धि का कार्य निरन्तर जारी है। इस बल को एस0एल0आर0, इन्सास
रायफल, मल्टीसेल लाँचर, एण्टी राॅयट व टियर गैस गन जैसे अत्याधुनिक हथियारों और दंगा
नियन्त्रण उपकरणों से सुसज्जित किया गया है। पी0ए0सी0 कार्मिकाें की व्यवसायिक दक्षता में
गुणात्मक सुधार किए जाने हेतु पूर्व में प्रचलित प्रशिक्षण पाठ्यक्रम काे अपडेट करते हुए उन्हें
सेवाकाल के दाैरान ए, बी, सी काेर्स नियमित रूप से कराए जा रहे हैं। आज पी0ए0सी0 बल में
सर्वाधिक संख्या युवाओं की है। प्रदेश सरकार द्वारा पी0ए0सी0 में 41,893 आरक्षियाें एवं 698
प्लाटून कमाण्डरों की भर्ती की गई है। सीधी भर्ती के अन्तर्गत प्लाटून कमाण्डराें के 1,648 पदों एवं

आरक्षी के 15,131 पदों हेतु भर्ती प्रक्रिया वर्तमान में प्रचलित है। इसमें 135 प्लाटून कमाण्डर की

भर्ती हेतु विज्ञापन जारी किया जा चुका है। बहुत शीघ्र यह भर्ती सम्पन्न हाेकर उत्तर प्रदेश पुलिस
बल की क्षमता को अधिक बढ़ाएगी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सेवा के दौरान दिवंगत हुए पी0ए0सी0 जवानों के 396 आश्रिता ें
काे आरक्षी और 58 आश्रितों काे प्लाटून कमाण्डर के पद पर सेवायोजित किया गया है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि पुलिस कल्याण योजना के अन्तर्गत प्रदेश में 31 पुलिस मॉडर्न
स्कूल संचालित हैं। पी0ए0सी0 स्थापना दिवस पर पहली बार पुलिस मॉडर्न स्कूलाें में ‘बेस्ट
परफॉर्मेंस पी0एम0एस0’ का चयन किया गया है। पी0ए0सी0 वाहिनी में कार्यरत जवानों को मार्केट
रेट से कम दाम पर दैनिक उपभोग की वस्तुएं उपलब्ध कराने के लिए 13 मास्टर कैन्टीन और
103 सब्सिडियरी कैन्टीन संचालित हैं। सभी पी0ए0सी0 जवानों हेतु आवासीय सुविधा सुनिश्चित
करने के लिए पी0ए0सी0 की 33 में से 31 वाहिनियों में प्रत्येक में 200 जवानों की आवासीय
व्यवस्था हेतु जी़11 टाइप की बहुमंजिला बैरकों का निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ाया गया है।
प्रदेश में पहली बार पी0ए0सी0 की तीन महिला बटालियनों के गठन का कार्य प्रारम्भ किया गया है। इनमें लखनऊ
में वीरांगना ऊदादेवी, गोरखपुर में वीरांगना झलकारीबाई तथा बदायूं में वीरांगना अवन्तीबाई लाेधी
के नाम पर बटालियन का निर्माण कार्य प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त 03 अन्य महिला वाहिनी की
स्थापना के क्रम में मीरजापुर एवं जालौन में भूमि प्राप्त हो चुकी है। जनपद बलरामपुर में भूमि क्रय
की कार्यवाही प्रचलित है।

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि खेलकूद के प्राेत्साहन एवं खिलाड़ियों के उत्साहवर्धन हेतु वर्ष2024 में

पुलिस स्मृति दिवस के अवसर पर खेल बजट का 70 लाख रुपये से बढ़ाकर 10 कराेड़
रुपये किया गया है। इसे खिलाड़ियाें के विशेष आहार, उनके उपयोगार्थ खेलकूद किट, उपकरण

एवं ख ेल से सम्बन्धित अन्य वस्तुआ ें के क्रय किए जाने पर व्यय किया जा सकता है। इसके

फलस्वरूप वर्ष 2025 में प्रदेश पुलिस टीम की ओर से विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में
प्रतिभाग करते हुए खिलाड़ियों द्वारा 14 स्वर्ण पदक, 02 रजत पदक और 03 कांस्य पदक अर्जित
किए गए हैं।

इस अवसर पर समाज कल्याण राज्यमंत्री (स्वतन्त्र प्रभार) असीम अरुण, पुलिस
महानिदेशक राजीव कृष्ण, प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री, गृह एवं सूचना संजय प्रसाद, ए0डी0जी0,पी0ए0सी0 डाॅ0 रामकृष्ण स्वर्णकार सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

प्रदेश में खाद की उपलब्धता और सुचारु वितरण के सख्त निर्देश

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मंगलवार को अपने सरकारी आवास
पर आहूत एक उच्चस्तरीय बैठक में प्रदेश में खाद की समुचित उपलब्धता और सुचारु
वितरण के सम्बन्ध में सख्त निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि मिलावटी अथवा नकली
खाद बेचने वालाें और खाद की कालाबाजारी में संलिप्त किसी भी व्यक्ति को बख्शा
नहीं जाएगा। ऐसे तत्वों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एन0एस0ए0) के तहत
कठोर कार्य वाही की जाएगी। यदि खाद के सम्बन्ध में किसान को कोई भी
समस्या हुई, तो जवाबदेही तय हाेगी और दोषी चाहे किसी भी स्तर का हो, उस पर
कार्यवाही की जाएगी।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सहकारिता और कृषि मंत्री प्रतिदिन खाद की
उपलब्धता और वितरण की स्थिति की समीक्षा करे। मुख्यमंत्री कार्यालय से हर जनपद
में सीधी निगरानी रखी जाएगी और खाद वितरण में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी
स्वीकार नहीं होगी। उन्होंने निर्देश दिए कि जिलाधिकारी, अपर जिलाधिकारी और
उप जिलाधिकारी स्वयं खाद की दुकानों और समितियों का आकस्मिक निरीक्षण करें।
ओवर रेटिंग किसी भी दशा में न हो और खाद समितियां निर्धारित अवधि के अनुसार
अनिवार्य रूप से खुली रहें। किसानों को डी0ए0पी0, यूरिया और पोटाश केवल तय
सरकारी दरों पर ही उपलब्ध कराया जाए। जहां भी गड़बड़ी पाई जाए, वहां तत्काल
जवाबदेही तय की जाए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि फील्ड में तैनात अधिकारियों की गतिविधियों की
निरन्तर निगरानी की जाएगी। यदि किसी स्तर पर मिलीभगत या लापरवाही सामने
आती है, ताे खुली विजिलेंस जांच करायी जाएगी। उन्होंने निर्देश दिये कि उपलब्धता
के बावजूद किसी किसान को खाद के लिए भटकना न पड़े, यही सरकार की सर्वोच्च
प्राथमिकता है। मुख्यमंत्री जी का स्पष्ट संदेश है कि खाद संकट पैदा करने या कृत्रिम
अभाव दिखाने की कोशिश करने वालाें के लिए प्रदेश मे काेई जगह नहीं है।

मुख्यमंत्री जी को यह भी अवगत कराया गया कि रबी फसलों की बाेआई लगभग
पूर्ण हो चुकी है और गेहूं की फसल में टॉप ड्रेसिंग के लिए यूरिया का वितरण किया
जा रहा है। गत वर्ष की तुलना में इस अवधि में यूरिया की बिक्री अधिक रही है और
वर्तमान में प्रतिदिन औसतन 54,249 मीट्रिक टन यूरिया का वितरण हो रहा है।

स्वदेशी रेल इंजिन मोज़ाम्बिक को भेजा गया

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बनारस लोकोमोटिव वर्क्स (बीएलडब्ल्यू) ने सोमवार को मोज़ाम्बिक के लिए स्वदेशी रूप से निर्मित छठे 3300 हॉर्स पावर एसी-एसी डीजल-इलेक्ट्रिक रेल इंजन को भेज दिया गया। रेल इंजन विनिर्माण के क्षेत्र में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का परचम लहराया है। यह एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि बीएलडब्ल्यू ने मोज़ाम्बिक के लिए दस 3300 हॉर्स पावर एसी-एसी डीजल-इलेक्ट्रिक रेल इंजन को निर्यात का ऑर्डर हासिल किया है। इन रेल इंजनों की आपूर्ति मेसर्स आरआईटीईईएस के माध्यम से 10 रेल इंजन निर्माण एवं निर्यात संबंधी अनुबंध के तहत की जा रही है। पहले दो रेल इंजन जून 2025 में भेजे गए, इसके बाद तीसरा सितंबर में और चौथा अक्टूबर में भेजा गया। पांचवां रेल इंजन 12 दिसंबर को और छठा 15 दिसंबर को भेजा गया। यह निर्यात वैश्विक मंच पर रेल इंजन निर्माण में भारत की बढ़ती क्षमताओं को दर्शाता है।

बीएलडब्ल्यू द्वारा निर्मित ये अत्याधुनिक 3300 एचपी केप गेज (1067 मिमी) रेल इंजन 100 किमी प्रति घंटे तक की गति से चलने में सक्षम हैं। इनमें अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप चालक-अनुकूल सुविधाएं जैसे रेफ्रिजरेटर, हॉट प्लेट, मोबाइल होल्डर और आधुनिक कैब डिजाइन मौजूद हैं, जो बेहतर आराम और परिचालन दक्षता सुनिश्चित करते हैं!

वाराणसी स्थित बीएलडब्ल्यू भारतीय रेलवे के अंतर्गत एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है, जो रेल इंजन विनिर्माण के क्षेत्र में एक प्रमुख निर्यात केंद्र के रूप में उभर रहा है। स्वदेशी डिजाइन और उन्नत रेल प्रौद्योगिकी के निर्माण में अपनी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए बीएलडब्ल्यू वैश्विक रेलवे बाजारों में भारत की उपस्थिति को सशक्त बना रहा है। बीएलडब्ल्यू ने 2014 से श्रीलंका, म्यांमार और मोज़ाम्बिक जैसे देशों को रेल इंजन निर्यात किए हैं, जिससे उनकी रेलवे प्रणालियों के विकास में सहायता मिली है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की परिकल्पना के अनुरूप ये निर्यात भारतीय रेलवे की उस क्षमता को प्रदर्शित करते हैं, जिसके अंतर्गत वो विश्व में प्रचलित विभिन्न गेज प्रणालियों के लिए रोलिंग स्टॉक का डिजाइन, निर्माण और आपूर्ति कर सकता है। इन पहलों के माध्यम से भारतीय रेलवे भागीदार देशों को उनके रेल अवसंरचना उन्नयन में सहयोग दे रहा है, साथ ही रेलवे रोलिंग स्टॉक और संबंधित सेवाओं के एक विश्वसनीय निर्यातक के रूप में भारत की स्थिति को और सुदृढ़ कर रहा है।

भारत ने अब तक मेट्रो कोच, बोगियां, यात्री कोच, रेल इंजन तथा अन्य महत्वपूर्ण रेलवे उपकरणों का निर्यात यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, स्पेन, जर्मनी, इटली आदि यूरोपीय देशों को किया है। अफ्रीका में मोज़ाम्बिक, गिनी गणराज्य, दक्षिण अफ्रीका आदि देश शामिल हैं। इसके अलावा अन्य प्रमुख देशों में म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और मैक्सिको जैसे देशों को भी रेलवे उपकरणों का निर्यात किया गया है।

रेल इंजन निर्यात के क्षेत्र में बीएलडब्ल्यू की ये उपलब्धियां भारत की बढ़ती प्रौद्योगिकीय आत्मनिर्भरता और वैश्विक रेलवे उपकरण बाजार में उसके विस्तारित पदचिन्ह को दर्शाती हैं।

शराब और अपराध : चोली दामन का साथ

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बाल मुकुन्द ओझा

मध निषेध दिवस 18 दिसंबर को मनाया जाता है। आजकल के बदलते लाइफस्टाइल में हमारे देश में नशा एक ऐसा अभिशाप बन कर उभर रहा है जो हमारे युवाओं को तेजी से अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। साल-दर-साल इन युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। युवाओं में शराब जैसे खतरनाक नशे के बढ़ते चलन के पीछे बदलती जीवनशैली, अकेलापन, बेरोज़गारी और आपसी कलह जैसे अनेक कारण हो सकते हैं। नशाखोरी इस सदी की सबसे बड़ी समस्या है जिसमें मध यानि शराब का नशा प्रमुख है। आज युवा वर्ग शराब के नशे में खोता जा रहा है। युवाओं में तेजी से बढ़ रही शराब की लत को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञ समय-समय सचेत करते रहते हैं। शराब का सेवन शरीर को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है। युवाओं के बीच शराब का सेवन एक चलन सा चल पड़ा है। शराब एक नशीला पदार्थ है, जिसको एक प्रकार का अवसाद भी माना जाता है। शराब जैसे तन मन और परिवार को खोखला करने वाली की लत उन्हें बर्बाद कर रही है। शुरू में युवा शौक के तौर पर शराब का सेवन करता है और बाद में नशे की मांग पूरी करने के लिए तस्करी और गैर सामाजिक कार्य के कारोबार में फंस जाता है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक देश में 15 वर्ष या उससे अधिक आयु के 31.2 फीसदी लोग शराब का सेवन करते हैं। इनमें से 3.8 फीसदी वो लोग भी हैं जो इसकी लत का बुरी तरह शिकार हैं और आए दिन बड़ी मात्रा में शराब पीते हैं, जबकि 12.3 फीसदी वो हैं जो कभी-कभार काफी ज्यादा शराब पीते हैं। युवा लोगों में शराब पीने की लत तो बढ़ ही रही थी, अब पीकर बेहोश होने का नया चलन शुरू हो गया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने शराब को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। इस संबंध में संगठन ने अपनी एक रिपोर्ट पेश करते हुए कहा कि शराब की वजह से हर साल करीब 30 लाख लोगों की मौत होती है। उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में मृत्यु दर में थोड़ी कमी आई है। इस नए रिपोर्ट को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि आंकड़ें भले ही कम हो रहे हों लेकिन यह अभी भी ‘अस्वीकार्य रूप से उच्च’ बनी हुई है। शराब और स्वास्थ्य पर पेश इस नवीनतम रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब से सेवन से हर साल दुनिया भर में 20 में से लगभग एक मौत शराब पीने के कारण होती है। शराब पी के गाड़ी चलाने, शराब के कारण होने वाली हिंसा और दुर्व्यवहार और कई तरह की बीमारियों और विकारों के कारण यह मौत होती है। शराब का नशा कम समय में बहुत अधिक शराब पीने से जुड़ी एक स्थिति है। इसे शराब पॉयसन भी कहा जाता है। शराब का नशा गंभीर है यह आपके शरीर के तापमान, श्वास, हृदय गति और गैग रिफ्लेक्स को प्रभावित करता है। यह कभी-कभी कोमा या मृत्यु का कारण भी बन सकता है। शराब का नशा कम समय में जल्दी हो सकता है। जब कोई व्यक्ति शराब का सेवन कर रहा होता है, तो अलग-अलग लक्षण दिखाई दे सकता हैं। ये लक्षण नशे के विभिन्न स्तरों, या चरणों से जुड़े होते हैं।

एक सरकारी  सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पांच में से एक शख्स शराब पीता है। सर्वे के अनुसार 19 प्रतिशत लोगों को शराब की लत है। जबकि 2.9 करोड़ लोगों की तुलना में 10-75 उम्र के 2.7 प्रतिशत  लोगों को हर रोज ज्यादा नहीं तो कम से कम एक पेग जरूर चाहिए होता है और ये शराब के लती होते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार देशभर में 10 से 75 साल की आयु वर्ग के 14.6 प्रतिशत यानी करीब 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश और गोवा में शराब का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इस सर्वे की चौंकाने वाली बात यह है कि देश में 10 साल के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों में शामिल हैं।

एक अन्य सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी-कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है तथा सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं वे शराब पर फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिन्ता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़फ रहे हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

राष्ट्रपति ने आदि जगद्गुरु शिवयोगी महास्वामी के जयंती समारोह का उद्घाटन किया

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भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने मंगलवार को कर्नाटक के मांड्या जिले के मालवल्ली में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रिश्वर शिवयोगी महास्वामीजी के 1066वें जयंती समारोह का उद्घाटन किया।

 इस अवसर पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि युगों-युगों से संतों ने अपने ज्ञान और करुणा से मानवता को सचेत किया है। उनका जीवन हमें याद दिलाता है कि सच्ची महानता अधिकार या धन में नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और आध्यात्मिक शक्ति में निहित है। ऐसे महानतम संतों में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रीश्वर शिवयोगी महास्वामीजी प्रकाश और प्रेरणा के प्रतीक के रूप में चमकते हैं।

राष्ट्रपति ने यह जानकर प्रसन्नता व्यक्त की कि मठ के मार्गदर्शन और संरक्षण में, जेएसएस महाविद्यालय भारत के उन प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक बनकर उभरा है, जो शिक्षा और सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिए समर्पित हैं। उन्होंने कहा कि विश्व भर में कई संस्थानों के साथ, यह युवा प्रतिभाओं को निखारने, स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने, महिलाओं को सशक्त बनाने, ग्रामीण समुदायों का उत्थान करने, संस्कृति का संरक्षण करने और समावेशी समाज की नींव को मजबूत करने में लगा हुआ है।

ए, हमें प्रौद्योगिकी की शक्ति और मूल्यों की दृढ़ता, दोनों की आवश्यकता है। एक विकसित भारत के लिए आधुनिक शिक्षा को नैतिक ज्ञान, नवाचार को पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, आर्थिक विकास को सामाजिक समावेश और प्रगति को करुणा के साथ एकीकृत करना आवश्यक है। भारत सरकार इसी समग्र दृष्टिकोण के साथ कार्य कर रही है। सुत्तूर मठ जैसे संस्थान इस राष्ट्रीय प्रयास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारे युवाओं में निहित उनकी ऊर्जा, रचनात्मकता, मूल्य और चरित्र है। भारत का भविष्य न केवल उनके कौशल और ज्ञान से, बल्कि उनकी ईमानदारी और दृढ़ संकल्प से भी तय होगा। उन्होंने सत्तूर मठ जैसे संस्थानों से आग्रह किया कि वे युवा प्रतिभाओं को प्रेरित करते रहें, जिम्मेदार नागरिकों को तैयार करें और भविष्य के भारत के निर्माताओं का मार्गदर्शन करें

      स्वतंत्र भारत के इतिहास में चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा पर सबसे बड़ा संकट                    − निर्मल रानी

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 विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष में दुनिया की सबसे जटिल समझी जाने वाली चुनावी प्रक्रिया को अपनाने व इसे पूरा कराने को लेकर जिस केंद्रीय चुनाव आयोग की पीठ पूरी दुनिया थपथपाया करती थी व दुनिया के विभिन्न देशों के संसदीय प्रतिनिधिमंडल व चुनाव विशेषज्ञ जिस भारतीय चुनाव संचालन को देखने व समझने के लिये अब भी भारत आते रहते हैं वही चुनाव व चुनाव आयोग इन दिनों विपक्षी दलों के अति गंभीर आरोपों से जूझ रहा है। चुनाव आयोग व इस तरह के कई अन्य केंद्रीय संस्थानों पर सत्ता का पक्षपात करने के आरोप तो पहले भी लगते रहे हैं। परन्तु वर्तमान चुनाव आयोग जिसतरह सत्ता को फ़ायदा पहुँचाने वाले नए नए चुनावी नियम बना रहा है,विपक्ष की प्रमाण सहित दी जाने वाली शिकयतों की अनसुनी कर रहा है,सत्ता द्वारा चुनाव आचार संहिता की धज्जियाँ उड़ाने के बावजूद आँखें मूंदे बैठा रहता है,और अब एस आई आर के बहाने कथित तौर पर जहाँ करोड़ों फ़र्ज़ी मतों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है वहीँ संभावित रूप से विपक्ष की ओर जाने वाले मतों को चिन्हित कर उन्हें किसी न किसी बहाने से मतदाता सूची से काटने का काम किया जा रहा है। यानी स्पष्ट रूप से लोकततंत्र में लोक के मताधिकार पर ‘डाका ‘ डाला जा रहा है।        

                   वैसे तो पूरा विपक्ष ही चुनाव आयोग को केवल संदेह नहीं बल्कि सत्ता से मिलकर संविधान के साथ विश्वासघात किये जाने की दृष्टि से देख रहा है। लोक सभा व राज्य सभा के सर्वोच्च सदनों में चुनाव आयोग को निशाना बनाया जा रहा है। परन्तु नेता विपक्ष राहुल गाँधी ने तो चुनाव आयोग द्वारा की और करायी जाने वाली धांधली पर तो बाक़ायदा ‘शोध’ कर डाला है। और वे अपने इस चुनाव धांधली सम्बन्धी ‘शोध परिणाम’ को प्रेस कॉन्फ़्रेंस में प्रदर्शित करने से लेकर जनता जनार्दन के बीच सड़कों व गलियों तक पहुँच रहे हैं। इस संबंध वे अब तक 4 प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर ‘वोट चोरी ‘ के पूरे सबूत पेश कर चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे अगस्त-सितंबर 2025 के बीच बिहार में 16 दिनों की 1,300 किमी लंबी वोटर अधिकार यात्रा भी SIR के विरुद्ध निकाल चुके हैं। इसके अलावा 200 से अधिक सांसदों व विधायकों के साथ वे 11 अगस्त 2025 को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त मुख्यालय तक एक दिवसीय विरोध प्रदर्शन रुपी पैदल मार्च भी कर चुके हैं। एक ओर तो राहुल चुनाव आयोग द्वारा उपलब्ध कराये गये डेटा के अनुसार ही आयोग द्वारा बरती गयी अनियमितताओं संबंधी साक्ष्य पेश करते हैं तो दूसरी ओर  चुनाव आयोग कभी इन आरोपों को “बेबुनियाद” बता कर अपना पल्ला झाड़ लेता है तो कभी उल्टे राहुल से ही शपथ-पत्र मांगने लगता है। 

                परन्तु लगता है कि राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी ने तो गोया चुनाव आयोग को पूरी तरह बेनक़ाब करने का संकल्प ही कर लिया है। गत 14 दिसंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में कांग्रेस ने एक विशाल रैली आयोजित की। “वोट चोर, गद्दी छोड़” के शीर्षक से किये गये इस आयोजन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने देशभर से लाखों कार्यकर्ता जुटाये। इस रैली का भी मुख्य उद्देश्य हरियाणा, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों में कथित “वोट चोरी” और मतदाता सूची में हेराफेरी के आरोप लगाना था। इस विशाल रैली में भी कांग्रेस ने भाजपा और चुनाव आयोग पर मिलीभगत का गंभीर आरोप लगाते हुए लोकतंत्र तथा संविधान की रक्षा का संकल्प लिया। इस तरह की किसी रैली में यह पहला मौक़ा था जब कि सीधे तौर पर सबसे तीखा हमला मुख्य चुनाव आयुक्त और उसके दो आयुक्तों पर बोला गया। सांसद प्रियंका गाँधी ने एक बार और राहुल गांधी ने तो दो बार अपने भाषण में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी का नाम लेकर उनपर सीधे निशाना साधा। इन नेताओं ने उनका नाम लेते हुये आरोप लगाया कि ‘चुनाव आयोग भाजपा सरकार के साथ मिलकर काम कर रहा है, वोट चोरी को संरक्षण दे रहा है तथा आयोग निष्पक्ष नहीं है। ये लोग नहीं भूलें कि वे देश के चुनाव आयुक्त हैं, नरेंद्र मोदी के नहीं।”राहुल ने यह भी कहा कि ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयुक्तों को क़ानूनी सुरक्षा (इम्यूनिटी) देने वाला क़ानून बदला है, ताकि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो सके। कांग्रेस सत्ता में आने पर इस क़ानून को बदलेगी और आयुक्तों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी। यहाँ भी राहुल ने दोहराया कि “चुनाव आयोग असत्य के साथ खड़ा नज़र आ रहा है। उन्होंने बताया कि कैसे हरियाणा में चुनाव चोरी हुआ, किस  तरह  कर्नाटक में लाखों वोट डिलीट हुए और महाराष्ट्र में फ़र्ज़ी वोट जोड़े गए परन्तु चुनाव आयोग ने कोई जवाब नहीं दिया।” यहाँ भी राहुल ने चुनावी धांधलियों के कई और उदाहरण पेश किये। यही नहीं बल्कि राहुल गांधी द्वारा देश भर से चुनाव आयोग के विरुद्ध लगभग 6 करोड़ हस्ताक्षर कराए गए हैं। यह अभियान कथित वोट चोरी के आरोपों के खिलाफ चलाया गया था, और इन हस्ताक्षरों को राष्ट्रपति को सौंपने की योजना है। इन 6 करोड़ हस्ताक्षर को भी 14 दिसंबर 2025 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ रैली के दौरान प्रदर्शित किया गया।

                   इसी रैली में कांग्रेस के कई प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया को हर क़दम पर संदिग्ध बताते हुये संस्थाओं पर दबाव डालने का आरोप लगाया जबकि कुछ वक्ताओं ने चुनाव आयोग को भाजपा की कठपुतली बताते हुये आयोग पर सबूतों की जांच नहीं करने का भी आरोप लगाया। कुछ नेताओं का मत था कि देश में निष्पक्ष अंपायर की कमी है। जबकि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने तो मुख्य रूप से भाजपा पर “वोट चोरी” करके सत्ता में आने का आरोप लगाया और चुनाव आयोग पर अप्रत्यक्ष रूप से सवाल उठाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह रैली कांग्रेस की ओर से चुनावी अनियमितताओं के ख़िलाफ़ अब तक का एक सबसे बड़ा शक्ति प्रदर्शन थी, जिसमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सार्वजनिक रूप से खुलकर गंभीर सवाल उठाए गए। साथ ही यह भी सच है कि चुनाव आयोग पर प्रमाण सहित लगने वाले  इसतरह के आरोपों और आयोग द्वारा इन आरोप को नज़र अंदाज़ करने से भी स्वतंत्र भारत के इतिहास में चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा यहाँ पर भी सबसे बड़ा संकट सामने आ खड़ा हुआ है।   

 − निर्मल रानी

वरिष्ठ लेखिका

हांसी : इतिहास के केंद्र से हाशिये तक और फिर जिले की दहलीज़ पर

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(हांसी : इतिहास ने छीना, वक्त ने लौटाया जिला) 

हांसी कभी हरियाणा क्षेत्र की राजधानी रही है। जॉर्ज थॉमस के शासनकाल में यह प्रशासनिक और व्यापारिक केंद्र था। मुगल काल में यहां टकसाल और सैनिक छावनी स्थापित की गई। 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ तीव्र प्रतिरोध के कारण हांसी से जिला दर्जा छीना गया और लगभग 1870–80 के बीच हिसार को जिला बनाया गया। 1966 में हरियाणा गठन के बाद हिसार का कई बार पुनर्गठन हुआ। 2025 में हांसी को पुनः जिला बनाने की घोषणा हुई, जिसे ऐतिहासिक न्याय के रूप में देखा जा रहा है।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

इतिहास कभी अचानक नहीं बदलता, वह धीरे-धीरे करवट लेता है। हरियाणा की प्राचीन नगरी हांसी इसका जीवंत उदाहरण है। एक समय यह नगर सत्ता, प्रशासन, व्यापार और सामरिक दृष्टि से उत्तरी भारत के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में गिना जाता था। आज वही हांसी, जिसने सदियों तक शासन का भार उठाया, लंबे समय तक प्रशासनिक उपेक्षा झेलने के बाद एक बार फिर जिले के रूप में अपनी पहचान पाने की ओर अग्रसर हुई है। वर्ष 2025 में हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि इतिहास के एक अधूरे अध्याय को पूरा करने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है।

अंग्रेजों के भारत आगमन से बहुत पहले हांसी का गौरव अपने चरम पर था। जॉर्ज थॉमस के दौर में हांसी हरियाणा क्षेत्र की राजधानी के रूप में स्थापित थी। उस समय यह नगर दिल्ली परगना के अधीन उत्तरी भारत के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों में शामिल था। हांसी से ही प्रशासनिक आदेश जारी होते थे और आसपास के बड़े भूभाग पर शासन संचालित किया जाता था। यह नगर केवल सत्ता का केंद्र नहीं था, बल्कि व्यापारिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और सैनिक रणनीतियों का भी प्रमुख केंद्र था।

मुगल काल में भी हांसी का महत्व कम नहीं हुआ। अकबर के शासनकाल के ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और नक्शों में हांसी को एक महत्वपूर्ण मुगल केंद्र के रूप में दर्शाया गया है। यहां एक टकसाल स्थापित थी, जहां सिक्कों का निर्माण होता था। किसी भी नगर में टकसाल का होना उसकी आर्थिक और प्रशासनिक ताकत का प्रतीक माना जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि हांसी केवल एक कस्बा नहीं, बल्कि उस दौर की अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ था।

हांसी की भौगोलिक स्थिति ने भी इसे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया था। दिल्ली, पंजाब और राजस्थान की ओर जाने वाले मार्गों पर स्थित होने के कारण यहां मुगलों ने सैनिक छावनी स्थापित की। बाद में अंग्रेजों ने भी इसी सामरिक महत्ता को समझते हुए यहां अपनी सैन्य मौजूदगी बनाए रखी। हांसी की किलेबंदी, प्रशासनिक ढांचा और सैन्य व्यवस्था इसे उत्तरी भारत के सुरक्षित और संगठित नगरों में शामिल करती थी।

लेकिन इतिहास की दिशा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के साथ बदल गई। हांसी और आसपास के क्षेत्रों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खुलकर विद्रोह किया। यह क्षेत्र उन इलाकों में शामिल था जहां अंग्रेजों को सबसे तीव्र प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। स्थानीय जनता, सैनिकों और जमींदारों ने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। यह विद्रोह अंग्रेजों के लिए केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं था, बल्कि उनकी सत्ता के लिए सीधी चुनौती था।

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने प्रतिशोध की नीति अपनाई। जिन क्षेत्रों ने सबसे अधिक प्रतिरोध किया, उन्हें प्रशासनिक रूप से कमजोर किया गया। हांसी भी इसी नीति का शिकार बना। भले ही हांसी से जिले का दर्जा छीने जाने की कोई सटीक और प्रमाणिक तारीख उपलब्ध नहीं है, लेकिन इतिहासकारों का मानना है कि 1870 से 1880 के बीच अंग्रेजों ने हांसी से जिला मुख्यालय हटाकर हिसार को नया जिला बना दिया। इसके साथ ही हांसी का प्रशासनिक महत्व लगभग समाप्त कर दिया गया।

हिसार को जिला बनाकर अंग्रेजों ने न केवल प्रशासनिक ढांचा बदला, बल्कि हांसी की ऐतिहासिक भूमिका को भी हाशिये पर डाल दिया। फतेहाबाद, सिरसा जैसे इलाकों पर हिसार से शासन चलाया जाने लगा। यह बदलाव केवल सुविधा के नाम पर नहीं था, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र को नियंत्रित करने की रणनीति थी, जिसने अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ विद्रोह का साहस दिखाया था।

इतिहासकार यह भी बताते हैं कि 1700 ईस्वी के आसपास हरियाणा, पंजाब से अलग एक विशिष्ट भू-राजनीतिक पहचान के साथ नक्शों में मौजूद था। उस दौर के कई नक्शे आज भी उपलब्ध हैं, जिनमें हांसी को हरियाणा की राजधानी के रूप में दर्शाया गया है। जॉर्ज थॉमस ने हांसी को अपना प्रमुख केंद्र बनाकर पूरे इलाके पर शासन किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि हांसी का महत्व किसी एक शासक या काल तक सीमित नहीं था, बल्कि यह लंबे समय तक सत्ता का केंद्र रहा।

स्वतंत्रता के बाद 1966 में जब हरियाणा राज्य का गठन हुआ, तब हिसार प्रदेश का सबसे बड़ा जिला था। उस समय हांसी एक बार फिर उम्मीद कर रहा था कि उसे उसका ऐतिहासिक दर्जा वापस मिलेगा। लेकिन प्रशासनिक प्राथमिकताओं और राजनीतिक संतुलनों के चलते ऐसा नहीं हो सका। इसके बजाय हिसार जिले का समय-समय पर पुनर्गठन किया गया।

1972 में भिवानी को अलग जिला बनाया गया। इसके बाद 1975 में सिरसा और 1997 में फतेहाबाद को जिला का दर्जा मिला। 2016 में भिवानी से अलग होकर चरखी दादरी नया जिला बना। इन सभी विभाजनों ने हिसार के प्रशासनिक नक्शे को लगातार बदला और छोटा किया, लेकिन हांसी हर बार जिले की सूची से बाहर रह गया।

इस उपेक्षा ने धीरे-धीरे हांसी में असंतोष को जन्म दिया। लोगों को लगने लगा कि यह केवल प्रशासनिक अनदेखी नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय का विस्तार है। पिछले लगभग दस वर्षों से हांसी को जिला बनाने की मांग ने जोर पकड़ना शुरू किया। स्थानीय सामाजिक संगठनों, व्यापार मंडलों और राजनीतिक प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को लगातार उठाया। यह मांग धीरे-धीरे एक जन आंदोलन का रूप लेने लगी।

हांसी के लोग यह तर्क देते रहे कि यह नगर ऐतिहासिक, भौगोलिक और प्रशासनिक—तीनों दृष्टियों से जिला बनने की सभी शर्तें पूरी करता है। यहां पहले से ही कई प्रशासनिक कार्यालय मौजूद हैं। आसपास के क्षेत्रों की दूरी और जनसंख्या दबाव को देखते हुए भी जिला बनना तर्कसंगत माना गया। लेकिन इन सभी दलीलों से ऊपर एक भावनात्मक पहलू भी था—हांसी को उसका खोया हुआ सम्मान लौटाने की आकांक्षा।

2025 में जब हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा हुई, तो इसे केवल एक प्रशासनिक खबर के रूप में नहीं देखा गया। यह घोषणा हांसी के इतिहास, संघर्ष और प्रतीक्षा की परिणति मानी गई। लोगों ने इसे उस अन्याय के आंशिक सुधार के रूप में देखा, जो 1857 के बाद अंग्रेजों ने किया था और जिसे स्वतंत्र भारत में लंबे समय तक अनदेखा किया गया।

हांसी का जिला बनना प्रशासनिक विकेंद्रीकरण की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल स्थानीय लोगों को बेहतर प्रशासनिक सुविधाएं मिलेंगी, बल्कि क्षेत्रीय विकास को भी गति मिलेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और रोजगार जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा होने की संभावना है। इसके साथ ही यह निर्णय क्षेत्रीय संतुलन को भी मजबूत करेगा।

इतिहास गवाह है कि जिन नगरों को सत्ता के केंद्र से हटाया गया, वे केवल भौगोलिक रूप से नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी हाशिये पर चले जाते हैं। हांसी भी लंबे समय तक इसी स्थिति से गुजरा। लेकिन अब जिला बनने के साथ ही यह नगर एक बार फिर केंद्र में लौटने की तैयारी कर रहा है।

हांसी की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि इतिहास केवल किताबों में दर्ज घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि वह वर्तमान की नीतियों और फैसलों को भी प्रभावित करता है। हांसी को जिला बनाना इस बात का प्रमाण है कि इतिहास चाहे देर से ही सही, लेकिन अपनी न्यायपूर्ण दिशा जरूर खोज लेता है।

आज जब हांसी जिले की दहलीज़ पर खड़ा है, तो यह केवल एक प्रशासनिक इकाई का विस्तार नहीं, बल्कि उस नगर की आत्मा की पुनर्स्थापना है, जिसने कभी हरियाणा को राजधानी दी थी, जिसने सत्ता को चुनौती दी थी और जिसने लंबे समय तक उपेक्षा सहकर भी अपनी पहचान नहीं खोई। हांसी का यह नया अध्याय इतिहास के उसी पुराने गौरव से जुड़ता है, जहां से उसकी यात्रा शुरू हुई थी।

हांसी एक नज़र में

प्राचीन पहचान : जॉर्ज थॉमस के शासनकाल में हरियाणा क्षेत्र की राजधानी

मुगल काल : अकबर के समय प्रमुख प्रशासनिक केंद्र, यहां टकसाल स्थापित

सामरिक महत्व : मुगल और अंग्रेजी दौर में सैनिक छावनी

1857 का विद्रोह : अंग्रेजों के खिलाफ सशक्त प्रतिरोध, प्रशासनिक दंड मिला

जिला दर्जा छीना गया : लगभग 1870–80 के बीच हांसी से जिला मुख्यालय हटाया गया

हिसार जिला बना : हांसी, फतेहाबाद व सिरसा हिसार के अधीन आए

हरियाणा गठन (1966) : हिसार सबसे बड़ा जिला

हिसार का पुनर्गठन :

1972 – भिवानी अलग

1975 – सिरसा अलग

1997 – फतेहाबाद अलग

2016 – चरखी दादरी अलग

2025 : हांसी को नया जिला बनाए जाने की घोषणा

मांग की अवधि : पिछले लगभग 10 वर्षों से निरंतर आंदोलन

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

संसद का अवरुद्ध स्वर और लोकतंत्र की कसौटी

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लगातार व्यवधानों के दौर में संसदीय लोकतंत्र को सशक्त करने की संस्थागत राह

— डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय संसद लोकतंत्र की आत्मा मानी जाती है। यही वह मंच है जहाँ जनता की विविध आकांक्षाएँ, असहमतियाँ और अपेक्षाएँ बहस के माध्यम से नीति और कानून का रूप लेती हैं। किंतु हाल के वर्षों में संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित होने, प्रश्नकाल के स्थगित रहने, विधेयकों के बिना पर्याप्त चर्चा पारित होने और सदन के समय से पहले स्थगन ने इसकी गरिमा और प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। संसद, जो संवाद और सहमति का प्रतीक होनी चाहिए थी, वह अनेक अवसरों पर टकराव और अवरोध का अखाड़ा बनती दिखी है। यह स्थिति केवल संसदीय परंपराओं का क्षरण नहीं, बल्कि प्रतिनिधि लोकतंत्र की जड़ों के कमजोर होने का संकेत भी है।

संसद में व्यवधान कोई नया विषय नहीं है। विरोध, असहमति और सरकार को जवाबदेह ठहराने के लिए प्रतिपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में अनिवार्य है। किंतु जब विरोध का प्रमुख औजार निरंतर हंगामा, नारेबाजी और कार्यवाही ठप करना बन जाए, तब यह प्रश्न उठता है कि क्या संसद अपने मूल उद्देश्य को पूरा कर पा रही है। बार-बार स्थगित होने वाली कार्यवाही का सबसे बड़ा नुकसान जनता को होता है, क्योंकि संसद का हर खोया हुआ घंटा नीतिगत विमर्श, जनहित के मुद्दों और विधायी समीक्षा से चूक का प्रतीक बन जाता है। यह स्थिति कार्यपालिका को अधिक शक्तिशाली बनाती है और विधायिका की निगरानी भूमिका को कमजोर करती है।

लोकतांत्रिक शासन में संसद केवल कानून पारित करने की मशीन नहीं होती, बल्कि वह कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करने, नीतियों की आलोचनात्मक समीक्षा करने और समाज के विभिन्न वर्गों की आवाज़ को सामने लाने का मंच भी होती है। जब संसद बाधित होती है, तब कार्यपालिका पर सवाल पूछने के अवसर कम होते हैं, अध्यादेशों और ‘गिलोटिन’ जैसी प्रक्रियाओं के माध्यम से विधायी निगरानी कमजोर पड़ती है और निर्णय कुछ सीमित हाथों में केंद्रित होने लगते हैं। इस संदर्भ में संस्थागत सुधारों की आवश्यकता केवल तकनीकी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता से जुड़ा प्रश्न है।

संसदीय समितियों की भूमिका इस बहस में अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत में संसदीय समितियाँ सदन के बाहर अपेक्षाकृत शांत वातावरण में विधेयकों की बारीकी से जांच करने, विशेषज्ञों और हितधारकों की राय लेने तथा राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर व्यावहारिक सुझाव देने का मंच प्रदान करती हैं। जब अधिकाधिक विधेयकों को बिना समिति जांच के पारित किया जाता है, तो कानून निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होती है। संस्थागत सुधार के रूप में सभी प्रमुख विधेयकों को अनिवार्य रूप से समितियों को भेजना न केवल विधायी प्रक्रिया को मजबूत करेगा, बल्कि संसद के भीतर होने वाले टकराव को भी कम कर सकता है, क्योंकि असहमति का समाधान बहस और प्रमाण के माध्यम से बाहर संभव होगा।

प्रश्नकाल को संसदीय लोकतंत्र की रीढ़ कहा जाता है। यही वह समय होता है जब निर्वाचित प्रतिनिधि सीधे-सीधे मंत्रियों से जनता से जुड़े सवाल पूछते हैं और सरकार को अपने निर्णयों का स्पष्टीकरण देना पड़ता है। प्रश्नकाल का बार-बार बाधित होना या औपचारिकता में सिमट जाना कार्यपालिका की जवाबदेही को कमजोर करता है। संस्थागत सुधार के तहत प्रश्नकाल की सुरक्षा और उसकी अनिवार्यता तय करना आवश्यक है, ताकि किसी भी परिस्थिति में इसे स्थगित न किया जाए। इससे सरकार और विपक्ष दोनों को संवाद के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

संसद में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने के लिए आचार-संहिता और दंडात्मक प्रावधान भी आवश्यक हैं। वर्तमान में नियम तो मौजूद हैं, किंतु उनका निष्पक्ष और सुसंगत क्रियान्वयन अक्सर विवादों में घिर जाता है। यदि सांसदों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और सर्वसम्मति से तय आचार-संहिता हो तथा उसके उल्लंघन पर समान रूप से कार्रवाई हो, तो अव्यवस्थित आचरण पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकता है। यह सुधार केवल दंड देने का नहीं, बल्कि संसदीय संस्कृति को पुनर्जीवित करने का माध्यम बन सकता है।

संसद के कार्यदिवसों की संख्या भी एक महत्वपूर्ण संस्थागत मुद्दा है। भारत की संसद कई विकसित लोकतंत्रों की तुलना में अपेक्षाकृत कम दिन बैठती है। सीमित सत्रों में भारी विधायी एजेंडा न केवल सांसदों पर दबाव बढ़ाता है, बल्कि सार्थक बहस की संभावना को भी कम करता है। न्यूनतम निश्चित बैठक दिनों वाला कैलेंडर तय करना और उसका सख्ती से पालन करना विधायी गुणवत्ता को बेहतर बना सकता है। अधिक बैठकों का अर्थ केवल अधिक कानून नहीं, बल्कि अधिक संवाद, अधिक प्रश्न और अधिक जवाबदेही है।

हालाँकि, इन संस्थागत सुधारों की राह आसान नहीं है। राजनीतिक दल अक्सर संसद के भीतर व्यवधान को एक वैध राजनीतिक हथियार मानते हैं। विपक्ष को यह आशंका रहती है कि सुधारों के नाम पर उसके विरोध के अधिकार को सीमित किया जाएगा, जबकि सत्ता पक्ष पर यह आरोप लगता है कि वह संस्थागत नियमों का उपयोग असहमति को दबाने के लिए कर सकता है। इसके अतिरिक्त, स्पीकर या सभापति की निष्पक्षता पर उठने वाले सवाल भी सुधारों के प्रभावी क्रियान्वयन में बाधा बनते हैं। यदि पीठासीन अधिकारी पर पक्षपात का आरोप लगे, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई भी विवाद का कारण बन जाती है।

कार्यपालिका का बढ़ता प्रभुत्व भी एक गंभीर चिंता है। अध्यादेशों का बढ़ता प्रयोग, धन विधेयकों के दुरुपयोग और समयाभाव के नाम पर बहस सीमित करने की प्रवृत्ति संसद की भूमिका को कमजोर करती है। ऐसे में केवल नियम बदलना पर्याप्त नहीं होगा; सत्ता और विपक्ष दोनों को संसदीय मर्यादाओं के प्रति प्रतिबद्धता दिखानी होगी। संस्थागत सुधार तभी सार्थक होंगे जब उन्हें राजनीतिक इच्छाशक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन प्राप्त हो।

अंततः संसद की मजबूती किसी एक सुधार या नियम से सुनिश्चित नहीं हो सकती। यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें संस्थाएँ, परंपराएँ और राजनीतिक आचरण तीनों समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। संसद को फिर से बहस, सहमति और उत्तरदायित्व का मंच बनाने के लिए आवश्यक है कि विरोध संवाद में बदले, असहमति अवरोध में नहीं, और शक्ति संतुलन संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप बना रहे। तभी भारतीय संसदीय लोकतंत्र न केवल व्यवधानों से उबर पाएगा, बल्कि एक जीवंत, प्रतिनिधिक और जवाबदेह संस्था के रूप में अपनी भूमिका को पुनः स्थापित कर सकेगा।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,