केंद्रीय खेल मंत्री ने पुडुचेरी में फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल की पहली वर्षगांठ के समारोह का नेतृत्व किया

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केन्द्रीय खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने आज रविवार को पुडुचेरी में फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल कार्यक्रम की पहली वर्षगांठ के समारोह का नेतृत्व किया।इसमें रॉक बीच पर 1,500 से अधिक प्रतिभागियों ने साइकिल चलाई।केन्द्रीय खेल मंत्री ने फिट इंडिया मोबाइल ऐप कार्बन क्रेडिट प्रोत्साहन का शुभारंभ किया। इससे साइकिल चलाने को बढ़ावा मिलेगा।पुडुचेरी के उपराज्यपाल के. कैलाशनाथन एवं मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने खेल रत्न पुरस्कार विजेता शरथ कमल और पीआर श्रीजेश के साथ इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में भाग लिया।

स्कूल के विद्यार्थियों, नमो साइकिलिंग क्लब, पुडुचेरी विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों तथा कई अन्य लोगों सहित जीवन के विभिन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 1500 से अधिक साइकिल चलाने वालों ने पुडुचेरी के खूबसूरत रॉक बीच को फिटनेस के एक जीवंत उत्सव में बदल दिया; जोकि इस आंदोलन के बढ़ते राष्ट्रीय महत्व और देश में साइकिल चालन के प्रति बढ़ते प्रेम को दर्शाता है।पद्म भूषण से सम्मानित व खेल रत्न पुरस्कार विजेता पी. आर. श्रीजेश और शरथ कमल युवाओं के साथ साइकिल चलाकर प्रतिभागियों को खेल तथा फिटनेस को अपनाने के लिए प्रेरित किया।

हर मामले में, पुडुचेरी में आयोजित फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल की पहली वर्षगांठ का यह विशिष्ट संस्करण पूरी तरह से फिटनेस कार्निवल जोन बन गया क्योंकि जुम्बा, कैरम, शतरंज, मल्लखंब, सिलांबम, योग, रस्सी कूद जैसे कई मजेदार खेल एवं गतिविधियां भी आकर्षण का केन्द्र रहीं। संयोग से, 21 दिसंबर को विश्व ध्यान दिवस होने के कारण, सामूहिक रूप से यह संदेश भी दिया गया कि फिटनेस वास्तव में गति में ध्यान है!

आज पुडुचेरी में रविवार सुबह की सभा में उपराज्यपाल के. कैलाशनाथन, मुख्यमंत्री एन. रंगासामी, विधानसभा अध्यक्ष आर. सेल्वम और पुडुचेरी के गृह मंत्री ए. नमस्सिवयम और अन्य प्रतिष्ठित सरकारी अधिकारी शामिल थे। साथ ही, माननीय केन्द्रीय खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया भी मौजूद थे – जिन्होंने एक वर्ष पहले नई दिल्ली में पहले आयोजन को हरी झंडी दिखाई थी।

सभा को संबोधित करते हुए, डॉ. मांडविया ने बताया कि कैसे फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल एक छोटी सी शुरुआत से आगे बढ़कर एक देशव्यापी जन आंदोलन बन गया है।

उन्होंने कहा, “जब हमने एक वर्ष पहले यह पहल शुरू की थी, तो इसे मात्र पांच स्थानों पर लगभग 500 लोगों के साथ आयोजित किया गया था। आज, देश भर में 10,000 से अधिक स्थानों पर हर रविवार को इसमें हिस्सा लिया जाता है। इसमें 10 लाख से अधिक नागरिक नियमित रूप से जुड़ते हैं। यह एक जुनून, एक संस्कृति और प्रदूषण से निपटने का एक सशक्त  समाधान बन गया है। माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस आंदोलन को मोटापे के खिलाफ देशव्यापी लड़ाई बनाने में मदद की है।”

पुडुचेरी के उपराज्यपाल के. कैलाशनाथन ने इस पहल को समाज के लिए एक सही समय पर दिया गया संदेश बताया।

उन्होंने कहा, “गुजरात के भावनगर में स्थित डॉ. मांडविया के अपने गांव में मात्र 4000 लोग रहते हैं। और वहां हर कोई साइकिल से यात्रा करता है, कोई दूसरा दो-पहिया या चार-पहिया  वाहन नहीं है। एक नागरिक के तौर पर, हम अक्सर यह महसूस नहीं कर पाते कि जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव मिलकर पर्यावरण, खासकर कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के मामले में कितना बड़ा अंतर ला सकते हैं।”

पुडुचेरी के मुख्यमंत्री एन. रंगासामी ने आसान फिटनेस को बढ़ावा देने के लिए फिट इंडिया आंदोलन की प्रशंसा की। उन्होंने कहा, “स्वस्थ रहने के लिए साइकिल चलाना सबसे आसान और कारगर तरीकों में से एक है। जब हमारा शरीर फिट होगा, तभी हम ज़िंदगी में अपने लक्ष्य हासिल कर पाएंगे। मैं पूरे फिट इंडिया आंदोलन के पीछे प्रधानमंत्री के विजन की सही मायने में सराहना करता हूं।”

आज देश में 10000 से अधिक स्थानों पर एक साथ आयोजित हुए इन गतिविधियों को भारतीय खेल प्राधिकरण और हजारीबाग, कारगिल, पटियाला, लखनऊ, गोलाघाट, छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव, हिसार, तिनसुकिया, विशाखापत्तनम, उत्तराखंड के काशीपुर, कटक तथा कई अन्य स्थानों पर स्थित खेलो इंडिया केन्द्रों ने देश भर के विभिन्न बैंकों, जो विशेष सहयोगी थे, के साथ मिलकर आयोजित किया।

इन आयोजनों में भाग लेने वाले प्रसिद्ध हस्तियों में साई सोनीपत के अर्जुन पुरस्कार विजेता  तीरंदाज ज्योति सुरेखा और अभिषेक वर्मा भी शामिल थे। ‘संडे ऑन साइकिल’ अभियान का एक अहम हिस्सा रहने वाले नमो फिट इंडिया साइकिलिंग क्लब और माय भारत वॉलंटियर्स ने इस अभियान को काफी बढ़ावा दिया है।

पुडुचेरी में सुबह के कार्यक्रम में बहुप्रतीक्षित फिट इंडिया मोबाइल ऐप कार्बन क्रेडिट प्रोत्साहन का शुभारंभ भी किया गया, जिससे साइकिल चालन के प्रेमियों को बढ़ावा मिलेगा। इस कार्यक्रम के दौरान सबसे अधिक कार्बन क्रेडिट हासिल करने वाले तीन साइकिल चालकों  – भरतभाई परमार, शशिकांत वीरकर और गोविंद सिंह – को सम्मानित किया गया।

नागरिक साइकिल चलाकर कार्बन क्रेडिट कमा सकते हैं, जिन्हें बाद में भुनाया जा सकता है। डॉ. मांडविया ने आगे कहा, “अब से, हर महीने, हर राज्य एवं केन्द्र-शासित प्रदेश के साइकिल चलाने वालों को फिट इंडिया मोबाइल ऐप के जरिए पहचाना जाएगा और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले तीन लोगों को प्रोत्साहन दिया जाएगा। यह कदम नागरिकों को साइकिल चालन को रोजाना की आदत बनाने के लिए प्रोत्साहित करने और इनाम देने हेतु है।”

‘संडे ऑन साइकिल’ अभियान में अहम रहने और इसके उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाले फिट इंडिया एंबेसडरों और इन्फ्लुएंसरो को भी सम्मानित किया गया। इनमें निधि निगम, ऐश्वर्या राज (चैंपियन) और एंबेसडर डॉ. शिखा गुप्ता, युक्ति आर्य, पर्वतारोही दिव्या अरुल, तमिलनाडु में साइकिल चालन की राज्य चैंपियन शिवा सेंथिल के नाम शामिल हैं।

साइकिल चालन आंदोलन की पूरी यात्रा को भारतीय हॉकी के ‘वॉल’ पी.आर. श्रीजेश ने बहुत अच्छे से बताया।

पद्म भूषण से सम्मानित इस खिलाड़ी ने कहा, “फिट रहने का मतलब सिर्फ पदक के लिए ट्रेनिंग करना नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन में अनुशासन और संतुलन बनाना है। साइकिल चलाना एक आसान आदत है, लेकिन जब इसे सब मिलकर अपनाते हैं, तो इससे एक स्वस्थ समाज और एक मजबूत देश बनता है। मुझे खुशी है कि केन्द्रीय खेल मंत्री की फिट इंडिया संडे ऑन साइकिल पहल ने फिटनेस को एक ऐसे जन आंदोलन में बदल दिया है, जिसमें परिवार, युवा और पेशेवर लोग समान उत्साह के साथ हिस्सा लेते हैं।”

जैसे ही पुडुचेरी में खूबसूरत समुद्र तट के किनारे साइकिल चालकों को हरी झंडी दिखाई गई, वर्षगांठ वाले इस संस्करण ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि ‘संडे ऑन साइकिल’ महज एक आयोजन से बदलकर एक ऐसी देशव्यापी संस्कृति बन गया है, जो देश भर में फिटनेस, स्थिरता  और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा दे रहा है।

योगी आदित्यनाथ की लघु व सीमांत किसानों को बड़ी सौगात, अब सिर्फ छह फीसदी ब्याज पर मिलेगा लोन

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष 2025 के अंतर्गत रविवार को इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के जूपिटर हॉल में युवा सहकार सम्मेलन एवं यूपी को-ऑपरेटिव एक्सपो-2025 का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री ने इस क्षेत्र में विशिष्ट कार्य करने वालों को सम्मानित भी किया। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लघु व सीमांत किसानों को बड़ी सौगात दी। अब सिर्फ छह फीसदी ब्याज पर मिलेगा लोन!

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रविवार को युवा सहकार सम्मेलन और यूपी को-ऑपरेटिव एक्सपो-2025 का दीप प्रज्जवलित कर शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्होंने युवाओं को चेक व प्रशस्ति पत्र भी वितरित किए। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि सहकारिता आंदोलन को युवाओं के साथ जोड़कर प्रदेश में आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे सहकारी समितियों के माध्यम से स्वरोजगार और ग्रामीण विकास में अपना योगदान दें।
सहकारिता से बदलेगी प्रदेश की तस्वीर
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा कि सहकारिता केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह समाज को सशक्त बनाने का माध्यम है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में सहकारिता को नई दिशा मिली है और उत्तर प्रदेश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में सहकारी समितियों की संख्या लगातार बढ़ रही है और इससे लाखों लोगों को रोजगार मिल रहा है। उन्होंने कहा कि सहकारी समितियों के माध्यम से किसानों, दुग्ध उत्पादकों, बुनकरों और कारीगरों को उचित मूल्य मिल सकता है।
युवाओं की भागीदारी जरूरी
युवा सहकार सम्मेलन को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सहकारिता आंदोलन में युवाओं की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आज का युवा शिक्षित और तकनीक से जुड़ा है, यदि वह सहकारी समितियों में शामिल होगा तो इस क्षेत्र में नया बदलाव आएगा। मुख्यमंत्री ने युवाओं से अपील की कि वे नौकरी की तलाश में भटकने के बजाय सहकारी समितियों के माध्यम से स्वरोजगार के अवसर तलाशें। उन्होंने कहा कि सरकार युवाओं को सहकारी समितियां बनाने के लिए हर संभव मदद करेगी।
प्रदर्शनी में दिखी सहकारिता की ताकत
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश सहकारी प्रदर्शनी का विधिवत शुभारंभ किया। इस प्रदर्शनी में प्रदेश की विभिन्न सहकारी समितियों ने अपने उत्पादों का प्रदर्शन किया। दुग्ध उत्पाद, हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद, बुनाई के सामान और अन्य वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाई गई। मुख्यमंत्री ने प्रदर्शनी का अवलोकन किया और विभिन्न स्टालों पर रुककर उत्पादों की गुणवत्ता की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह प्रदर्शनी सहकारी समितियों की उपलब्धियों को दर्शाती है।
सरकार की योजनाएं और पहल
मुख्यमंत्री ने बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार सहकारिता क्षेत्र को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं चला रही है। सहकारी समितियों को ऋण देने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को सहकारिता के बारे में जागरूक किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सहकारी चीनी मिलें, दुग्ध संघ और कृषि सहकारी समितियां प्रदेश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
गरीबों का सशक्तिकरण
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सहकारिता का मूल उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि सहकारी समितियों के माध्यम से गरीब किसान, मजदूर और छोटे व्यापारी मिलकर काम कर सकते हैं और बड़े व्यवसायियों की तरह लाभ कमा सकते हैं। इससे समाज में समानता आएगी।
महिलाओं की भूमिका
कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने महिलाओं की सहकारिता में बढ़ती भागीदारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि महिला सहकारी समितियां बहुत अच्छा काम कर रही हैं। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं। सरकार महिला सहकारी समितियों को विशेष प्राथमिकता दे रही है।
कार्यक्रम में मौजूद गणमान्य
इस कार्यक्रम में सहकारिता मंत्री, विधायक, सहकारी समितियों के अध्यक्ष, युवा प्रतिनिधि और विभिन्न क्षेत्रों के लोग उपस्थित थे। सभी ने मुख्यमंत्री के विचारों की सराहना की और सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाने का संकल्प लिया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। इस अवसर पर सहकारिता विभाग की उपलब्धियों एवं नवाचार पर आधारित पुस्तक का विमोचन करने के साथ ही सहकारिता के सर्वांगीण विकास हेतु कार्य करने वाले जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों व ​विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों को सम्मानित भी किया।

प्रधानमंत्री ने असम के नामरूप में असम वैली उर्वरक और रसायन कंपनी लिमिटेड की अमोनिया-यूरिया उर्वरक परियोजना की आधारशिला रखी

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प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी ने आज असम के डिब्रूगढ़ जिले के नामरूप में असम वैली उर्वरक और रसायन कंपनी लिमिटेड की अमोनिया-यूरिया उर्वरक परियोजना की आधारशिला रखी। इस अवसर पर एक जनसभा को संबोधित करते हुए श्री मोदी ने कहा कि यह चाओलुंग सुखापा और महावीर लछित बोडफुकन जैसे महान नायकों की भूमि है। उन्होंने भीमबर देउरी, शहीद कुशल कुंवर, मोरन राजा बोदूसा, मालती मेम, इंदिरा मीरी, स्वर्गदेव सरबानंदा सिंह और वीर सती साधनी के योगदान को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे उजानी असम की पवित्र भूमि, इस वीरता और बलिदान की महान भूमि को नमन करते हैं।

श्री मोदी ने कहा कि वे आगे बड़ी संख्या में लोगों को अपना स्नेह व्यक्त करते हुए देख सकते हैं। उन्होंने विशेष रूप से माताओं और बहनों की उपस्थिति का उल्लेख करते हुए कहा कि वे जो प्रेम और आशीर्वाद लेकर आई हैं, वह असाधारण है। उन्होंने कहा कि कई बहनें असम के चाय बागानों की सुगंध लेकर आई हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सुगंध असम के साथ उनके रिश्ते में एक अनूठा भाव पैदा करती है। उन्होंने वहां उपस्थित सभी लोगों को प्रणाम किया और उनके स्नेह और प्रेम के लिए आभार व्यक्त किया।

श्री मोदी ने कहा कि आज का दिन असम और पूरे पूर्वोत्तर भारत के लिए ऐतिहासिक है!उन्होंने कहा कि नामरूप और डिब्रूगढ़ का लंबे समय से प्रतीक्षित सपना साकार हो गया है और इस क्षेत्र में औद्योगिक प्रगति का एक नया अध्याय शुरू हो गया है। उन्होंने बताया कि कुछ ही समय पहले उन्होंने अमोनिया-यूरिया उर्वरक संयंत्र का भूमि पूजन किया और डिब्रूगढ़ पहुंचने से पहले गुवाहाटी हवाई अड्डे के नए टर्मिनल का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सभी कह रहे हैं कि असम ने अब विकास की एक नई रफ्तार पकड़ ली है। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज जो कुछ हो रहा है वह तो बस शुरुआत है और असम को अभी और आगे ले जाना है। उन्होंने अहोम साम्राज्य के दौरान असम की ताकत और भूमिका को याद करते हुए कहा कि विकसित भारत में असम उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने नए उद्योगों की शुरुआत, आधुनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण, सेमीकंडक्टर विनिर्माण, कृषि में नए अवसरों, चाय बागानों और उनके श्रमिकों की उन्नति और पर्यटन में बढ़ती संभावनाओं को रेखांकित करते हुए कहा कि असम हर क्षेत्र में प्रगति कर रहा है। श्री मोदी ने आधुनिक उर्वरक संयंत्र के लिए शुभकामनाएं दीं और गुवाहाटी हवाई अड्डे के नए टर्मिनल के लिए लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य स्तर पर उनकी सरकारों के तहत, उद्योग और कनेक्टिविटी के तालमेल से असम के सपने साकार हो रहे हैं और युवाओं को बड़े सपने देखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

। उन्होंने बताया कि उर्वरक परियोजना में लगभग 11,000 करोड़ रुपये का निवेश किया जाएगा, जिससे प्रतिवर्ष 12 लाख मीट्रिक टन से अधिक उर्वरक का उत्पादन होगा। उन्होंने रेखांकित किया कि स्थानीय स्तर पर उत्पादन होने से आपूर्ति तेज होगी और लॉजिस्टिक लागत कम होगी।

श्री मोदी ने इस बात पर प्रकाश डालते हुए कहा कि नामरूप इकाई से हजारों नए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा होंगे और संयंत्र के चालू होने से कई लोगों को स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार मिलेगा। उन्होंने कहा कि मरम्मत, आपूर्ति और अन्य संबंधित कार्यों से भी युवाओं को रोजगार मिलेगा।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पिछली सरकार के कार्यकाल में उर्वरक कारखाने बंद हो रहे थे, जबकि वर्तमान सरकार ने गोरखपुर, सिंदरी, बरौनी और रामागुंडम में कई संयंत्र शुरू किए हैं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि इन प्रयासों के परिणामस्वरूप भारत यूरिया के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “वर्ष 2014 में देश में केवल 225 लाख मीट्रिक टन यूरिया का उत्पादन हुआ था, जबकि आज उत्पादन लगभग 306 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया है।” उन्होंने बताया कि भारत को प्रतिवर्ष लगभग 380 लाख मीट्रिक टन यूरिया की आवश्यकता है और सरकार इस कमी को पूरा करने के लिए तेजी से काम कर रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार किसानों के हितों के प्रति अत्यंत संवेदनशील है। श्री मोदी ने कहा कि विदेशों से अधिक कीमतों पर आयातित यूरिया का भी किसानों पर बोझ नहीं बनने दिया जाता, क्योंकि सरकार सब्सिडी के माध्यम से यह लागत वहन करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय किसानों को यूरिया का एक बोरा मात्र 300 रुपये में मिलता है, जबकि सरकार उसी बोरे के लिए अन्य देशों को लगभग 3,000 रुपये का भुगतान करती है। उन्होंने रेखांकित किया कि शेष राशि सरकार द्वारा वहन की जाती है ताकि किसान भाइयों और बहनों पर कोई वित्तीय बोझ न पड़े। उन्होंने किसानों से यूरिया और अन्य उर्वरकों का अधिकतम उपयोग करके मिट्टी को बचाने का भी आग्रह किया।

विकसित भारत के निर्माण में पूर्वी भारत और पूर्वोत्तर भारत की भूमिका निरंतर बढ़ती जा रही है, इस बात पर जोर देते हुए श्री मोदी ने कहा कि पूर्वी भारत राष्ट्र के विकास का इंजन बनेगा। उन्होंने बताया कि नामरूप की नई उर्वरक इकाई इस परिवर्तन का प्रतीक है, क्योंकि यहां उत्पादित उर्वरक न केवल असम के खेतों की जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश तक भी पहुंचेगी। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यह देश की उर्वरक आवश्यकताओं में पूर्वोत्तर भारत का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन का समापन करते हुए कहा कि नामरूप जैसी परियोजनाएं यह दर्शाती हैं कि आने वाले समय में पूर्वोत्तर भारत आत्मनिर्भर भारत का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा और सही मायने में अष्टलक्ष्मी बना रहेगा। उन्होंने नए उर्वरक संयंत्र के लिए सभी को एक बार फिर बधाई दी।

असम के राज्यपाल  लक्ष्मण प्रसाद आचार्य, असम के मुख्यमंत्री  हिमंत बिस्व सरमा, केंद्रीय मंत्री श सरबानंद सोनोवाल सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति इस अवसर पर उपस्थित थे।

लारा कोर्ट ने दिया बिजनौर के डीएम आवास को कुर्क करने का आदेश

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नौ जनवरी को डीएम को कोर्ट ने किया तलब, चार वर्षों से मुकदमा था विचाराधीन

मुरादाबाद के लारा कोर्ट (न्यायालय भूमि अर्जन पुनर्वासन एवं पुनर्व्यवस्थापन प्राधिकरण) ने भूमि अधिग्रहण मामले में मुआवजा नहीं देने पर बिजनौर के जिलाधिकारी का आवास कुर्क करने का आदेश दिया है। साथ ही निबंधन की शर्तों को तय करने के लिए नौ जनवरी 2026 को जिलाधिकारी को कोर्ट ने तलब किया है। आरोप है कि डिक्री के बावजूद जिलाधिकारी ने जमीन स्वामी का भुगतान नहीं किया।

अदालत में वादी उमेश के अधिवक्ता ने बताया कि जमीन के मुआवजा के मामले में जिलाधिकारी बिजनौर की ओर से कोई आख्या प्रस्तुत नहीं की गई। इस मामले में एक प्रार्थनापत्र प्रस्तुत करते हुए बताया गया कि 13 मार्च 2020 को मुआवजा देने के बारे में निर्णय पारित हुआ था। कई बार तगादा करने के बावजूद जिला प्रशासन ने कोई धनराशि अदा नहीं की। जबकि जिला प्रशासन धनराशि अदा करने में समक्ष है। भूलवश उसने ट्रेजरी कार्यालय में कुछ शब्द अंकित कर दिया था। इस मामले में जिलाधिकारी आवास कुर्क कराकर वादी को धनराशि दिलाई जानी आवश्यक है। वादी की ओर से यह अनुरोध किया गया कि डीएम बिजनौर के आवास को कुर्क कर धनराशि का भुगतान कराया जाए। यह मुकदमा चार वर्षों से विचाराधीन है। उच्चतम न्यायालय के राजामणि के निर्णय का हवाला देते हुए तर्क दिया गया। बताया गया कि प्रत्येक निष्पादन वाद छह माह के अंदर निस्तारित होना चाहिए। पहले भी 41 (2) सीपीसी के तहत नोटिस भी जारी किया जा चुका है। आदेश 21 नियम 37 सीपीसी की कार्यवाही भी की जा चुकी है। दोनों पक्षों के तकों को सुनने के बाद कोर्ट ने आदेश 21 नियम 54 सीपीसी के तहत कलेक्टर बिजनौर के शासकीय आवास को कुर्क करने का आदेश दिया। इस दौरान कलेक्टर बिजनौर अपने शासकीय आवास को किसी प्रकार से अंतरित नहीं करेंगे। किसी भी आर्थिक लाभ के लिए शासकीय आवास का उपयोग नहीं करेंगे।

उधर जिलाधिकारी जसजीत कौर ने बताया कि लैंड एक्विजिशन ट्रिब्यूनल मुरादाबाद के न्यायाधीश जैग़म उद्दीन द्वारा उनके न्यायालय में लंबे समय से विचाराधीन इज़राहे वाद उमेश बनाम सरकार केस में सिंचाई विभाग द्वारा पिटीशनर को 25 लाख 23 हज़ार रूपये न देने के कारण डीएम आवास बिजनौर को कुर्क करने के आदेश पारित किए गए हैं। प्रयास किया जाएगा कि अग्रिम तारीख से पूर्व शासन वह धनराशि सिंचाई विभाग को रिलीज़ कर दे ताकि नियमानुसार पिटीशनर को भुगतान किया जा सके ।ये भी जाँच करी जाएगी की किस अधिकारी / कर्मचारी के कारण ये डिमांड शासन पर भेजने में देरी करी गई। उन सभी कि विरुद्ध नियमानुसार कार्यवाही भी की जाएगी ।

यूपी में मुठभेड़ में दो बदमाश ढ़ेर

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सहारनपुर में एसटीएफ ने एक लाख के इनामी वांटेड बदमाश सिराज को एनकाउंटर में ढेर कर दिया। सिराज सुल्तानपुर हत्याकांड में फरार था। गंगोह क्षेत्र में घेराबंदी के दौरान मुठभेड़ हुई। सिराज पर 30 से ज्यादा आपराधिक मुकदमे दर्ज थे। मौके से पिस्टल, बाइक, वाई-फाई डोंगल, भारी मात्रा में कारतूस और 4 मोबाइल फोन बरामद हुए।सिराज का 30 मुकदमों का आपराधिक इतिहास है जिनमें हत्या,हत्या के प्रयास ,रासुका जैसे गंभीर धाराओं में मुकदमे उत्तर प्रदेश के विभिन्न थानों एवं जनपदों में पंजीकृत है।

बुलंदशहर में पुलिस मुठभेड़ में 50 हजार का इनामी बदमाश आज़ाद उर्फ पीटर (ज़ुबैर) मारा गया। बदमाशों की फायरिंग में एक सिपाही घायल हो गया। अंधेरे का फायदा उठाकर एक साथी मौके से फरार, जिसकी तलाश में कॉम्बिंग ऑपरेशन जारी है। घटनास्थल से पिस्टल, खोखा कारतूस और बिना नंबर प्लेट की बाइक बरामद हुई। आज़ाद देहात थाने की लूट में वांछित था और मेरठ का रहने वाला बताया गया।


राष्ट्रपति ने वीबी–जी राम जी (विकसित भारत- जी राम जी) विधेयक, 2025 को स्वीकृति दी

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राष्ट्रपति ने विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) : वीबी–जी राम जी (विकसित भारत-जी राम जी) विधेयक, 2025 को आज अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी है, जो ग्रामीण रोज़गार नीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। यह अधिनियम ग्रामीण परिवारों के लिए प्रति वित्तीय वर्ष मज़दूरी रोज़गार की वैधानिक गारंटी को 125 दिनों तक बढ़ाता है और सशक्तिकरण, समावेशी विकास, योजनाओं के अभिसरण (कन्वर्जेस) तथा परिपूर्ण (सेचूरेशन) तरीके से सेवा–प्रदाय को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है, जिससे समृद्ध, सक्षम और आत्मनिर्भर ग्रामीण भारत की नींव मजबूत होती है।

इससे पूर्व, संसद ने विकसित भारत-रोज़गार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक, 2025 पारित किया था, जिसने भारत के ग्रामीण रोज़गार और विकास ढांचे में एक निर्णायक सुधार का मार्ग प्रशस्त किया है। यह अधिनियम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 (महात्मा गांधी नरेगा) को प्रतिस्थापित करते हुए आजीविका सुरक्षा को सुदृढ़ करने वाला एक आधुनिक वैधानिक ढांचा प्रदान करता है, जो विकसित भारत@2047 के राष्ट्रीय विज़न के अनुरूप है।

सशक्तिकरण, विकास, कन्वर्जेंस और परिपूर्णता (सेचूरेशन) के सिद्धांतों पर आधारित यह अधिनियम ग्रामीण रोज़गार को केवल एक कल्याणकारी योजना से आगे बढ़ाकर विकास का एक एकीकृत माध्यम बनाता है। यह ग्रामीण परिवारों की आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, शासन और जवाबदेही को आधुनिक बनाता है तथा मज़दूरी रोज़गार को टिकाऊ और उत्पादक ग्रामीण परिसंपत्तियों के सृजन से जोड़ता है, जिससे समृद्ध एवं सक्षम ग्रामीण भारत की नींव और अधिक मजबूत होती है।

बाघ संरक्षण योजनाओं को मंजूरी दी गई और चीता परियोजना के विस्तार का मूल्यांकन किया गया; मानव-वन्यजीव संघर्ष समाप्ति और अखिल भारतीय बाघ गणना के छठे चक्र की समीक्षा

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राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की 28वीं बैठक और परियोजना हाथी की 22वीं संचालन समिति की बैठक में बाघ संरक्षण योजनाओं को मंजूरी दी गई और चीता परियोजना के विस्तार का मूल्यांकन किया गया; मानव-वन्यजीव संघर्ष समाप्ति और अखिल भारतीय बाघ गणना के छठे चक्र की समीक्षा की गई।

21 दिसंबर 2025 को पश्चिम बंगाल के सुंदरबन बाघ अभ्यारण्य में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में बैठक आयोजित की गई। इन बैठकों में बाघ और हाथी बहुल राज्यों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, वैज्ञानिकों और क्षेत्र विशेषज्ञों के साथ-साथ प्रमुख संरक्षण संस्थानों के प्रतिनिधियों ने परियोजना बाघ और परियोजना हाथी की प्रगति की समीक्षा करने और भारत में बाघों और हाथियों के संरक्षण के लिए भावी रणनीतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए भाग लिया।

एनटीसीए की बैठक की अध्यक्षता करते हुए, श्री यादव ने भारत के विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त बाघ संरक्षण मॉडल पर जोर दिया और विज्ञान-आधारित प्रबंधन, भू-भाग स्तर की योजना, सामुदायिक भागीदारी, अंतर-राज्यीय समन्वय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के महत्व का उल्‍लेख किया।

18 अप्रैल 2025 को आयोजित 27वीं बैठक के कार्यवृत्त की पुष्टि की गई और उसमें लिए गए निर्णयों पर कार्रवाई रिपोर्ट की समीक्षा की गई। चार क्षेत्रीय बैठकों के परिणामों पर चर्चा की गई जिसमें बाघ अभ्यारण्यों के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर विशेष ध्यान दिया गया। मानव-बाघ संघर्ष से निपटने के उपायों पर चर्चा की गई जिसमें एक त्रिपक्षीय रणनीति और ‘बाघ अभ्यारण्यों के बाहर बाघों का प्रबंधन’ परियोजना का शुभारंभ शामिल है। कर्मचारियों की कमी, वित्तीय बाधाओं, पर्यावास क्षरण और आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन से संबंधित मुद्दों की भी समीक्षा की गई और राज्यों तथा संबंधित अधिकारियों को उचित अनुवर्ती कार्रवाई के लिए निर्देश जारी किए गए।

इस बैठक में एनटीसीए की तकनीकी समिति की बैठकों के निर्णयों की पुष्टि की गई जिनमें बाघ संरक्षण योजनाओं की स्वीकृति; चीता परियोजना का विस्तार और विकास; बाघों का स्थानांतरण; शिकार संवर्धन; भूदृश्य प्रबंधन योजना; मांसाहारी जानवरों के स्वास्थ्य प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम; और राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (एनबीडब्ल्यूएल) की स्थायी समिति को परियोजना प्रस्तावों पर एनटीसीए द्वारा दिए गए सुझाव शामिल हैं।

प्रोजेक्ट एलिफेंट की संचालन समिति की बैठक 21 वीं संचालन समिति की बैठक की कार्रवाई रिपोर्ट की पुष्टि के साथ शुरू हुई जिसके बाद संचालन समिति के सदस्यों और स्थायी आमंत्रितों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।

दक्षिण भारत और उत्तर-पूर्वी भारत में हाथी संरक्षण के लिए क्षेत्रीय कार्य योजनाओं की स्थिति पर प्रस्तुतियाँ दी गई जिसमें हाथी के आवास वाले राज्यों द्वारा हासिल की गई प्रगति पर प्रकाश डाला गया और अंतर-राज्यीय समन्वय के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान की गई।

संचालन समिति ने अखिल भारतीय समन्वित हाथी गणना पर अद्यतन जानकारी की समीक्षा की  जो प्रमाण-आधारित योजना और निर्णय लेने के लिए एक महत्वपूर्ण कार्य है। नीलगिरी हाथी अभ्यारण्य के लिए आदर्श हाथी संरक्षण योजना के तहत हुई प्रगति और बंदी हाथियों के डीएनए प्रोफाइलिंग पर चल रहे कार्यों पर भी चर्चा की गई जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन और कल्याण मानकों को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

देश भर में मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति की व्यापक समीक्षा की गई। समिति ने संघर्ष के कारणों और निवारण उपायों पर चल रहे अध्ययनों के निष्कर्षों के साथ-साथ हाथियों के क्षेत्र वाले राज्यों द्वारा अपनाए गए मुआवज़ा व्‍यवस्‍था की स्थिति और पर्याप्तता पर चर्चा की।

बैठक में हाथियों की गणना का आकलन करने की विधियों के मूल्यांकन, रिपु-चिरंग हाथी अभ्यारण्य के लिए एकीकृत संरक्षण और प्रबंधन रणनीतियों की प्रगति और भावी कार्य योजनाओं पर भी विचार-विमर्श किया गया। इनमें कैम्‍पा द्वारा वित्त पोषित सभी हाथी अभ्यारण्यों के लिए प्रबंधन प्रभावशीलता मूल्यांकन का संचालन और बांधवगढ़ क्षेत्र में हाथी गलियारों, पर्यावास उपयोग और संघर्ष के प्रमुख क्षेत्रों पर प्रस्तावित अध्ययन शामिल हैं।

संचालन समिति ने हाथियों और हाथियों के क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए एक स्थायी भविष्य सुनिश्चित करने हेतु विज्ञान-आधारित संरक्षण, अंतर-राज्यीय समन्वय, तकनीकी नवाचार और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोणों के प्रति भारत सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस अवसर पर श्री यादव ने छह प्रकाशनों का विमोचन किया। इनमें शामिल हैं: भारत में परियोजना चीता, जिसमें वैज्ञानिक प्रबंधन और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से परियोजना चीता के तहत हासिल की गई प्रगति पर प्रकाश डाला गया है; एनटीसीए की प्रचार पत्रिका स्ट्राइप्स का नवीनतम अंक, जो आधुनिक प्रौद्योगिकी, बाघों के फैलाव और अखिल भारतीय बाघ गणना (एआईटीई) के छठे चक्र के प्रारंभ पर केंद्रित है; भारत के बाघ संरक्षण ढांचे और संस्थागत उपलब्धियों का दस्तावेजीकरण करने वाली एनटीसीए की एक पुस्तिका; टाइगरवर्स – भारत के बाघ अभ्यारण्यों के कुछ अनसुने तथ्य, जो देश भर के बाघ अभ्यारण्यों से जैव विविधता, संस्कृति और संरक्षण की कहानियों को प्रदर्शित करता है; हाथी संचालकों के लिए बंदी हाथी प्रबंधन में सर्वोत्तम प्रथाएं और ट्रम्पेट त्रैमासिक पत्रिका का दिसंबर 2025 अंक।

7वें राष्ट्रीय वन्यजीव संरक्षण बोर्ड के निर्देशों के अनुपालन पर अद्यतन जानकारी प्रस्तुत की गई जिसमें गुजरात के गांधीसागर वन्यजीव अभ्यारण्य और बन्नी घास के मैदान में चीता परियोजना का विस्तार और कैम्पा के तहत समर्थित पहलों की प्रगति शामिल है। प्रस्तावित ग्‍लोबल बिग कैट समिट के लिए की जा रही तैयारियों की भी समीक्षा की गई।

मंत्री ने अखिल भारतीय बाघ गणना के छठे चक्र में हुई प्रगति, विभिन्न क्षेत्रों में भू-स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों, नवंबर 2025 से जमीनी सर्वेक्षणों की शुरुआत और प्रोजेक्ट चीता के तहत अंतरराष्ट्रीय सहयोग सहित एनटीसीए की प्रमुख चल रही गतिविधियों की समीक्षा की। इन गतिविधियों में दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया और बोत्सवाना के प्रतिनिधिमंडलों की यात्राएं भी शामिल थीं। बैठक में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर भी ध्यान दिया गया और बाघ संरक्षण एवं प्रबंधन पर इसके प्रभावों पर विचार-विमर्श किया गया।

बार काउंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश का पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्रीशीटर या गैंगस्टर के तौर पर लिस्टेड वकीलों के लाइसेंस सस्पेंड करने एकमत से फैसला

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प्रयागराज: बार काउंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को बताया है कि उसने पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्रीशीटर या गैंगस्टर के तौर पर लिस्टेड वकीलों के लाइसेंस सस्पेंड करने का एकमत से फैसला लिया है।

कोर्ट को यह भी बताया गया कि बार काउंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश ने 98 वकीलों के खिलाफ खुद से संज्ञान लिया है, और 23 वकीलों के खिलाफ कार्रवाई अभी डिसिप्लिनरी कमिटी के सामने पेंडिंग है।

यह बात जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच के सामने वकील मोहम्मद कफील की एक पिटीशन की सुनवाई के दौरान कही गई, जिन पर UP गैंगस्टर्स एक्ट, जालसाजी, जबरन वसूली और क्रिमिनल कॉन्सपिरेसी के तहत कई क्रिमिनल केस चल रहे हैं।

कफील ने आर्टिकल 227 के तहत एक पिटीशन फाइल करके इटावा के एडिशनल सेशन जज के एक ऑर्डर को चैलेंज किया था, जिसमें एक पुलिस कांस्टेबल के खिलाफ उनकी कंप्लेंट खारिज कर दी गई थी।

हालांकि उन्होंने आरोप लगाया कि 26 नवंबर, 2025 को एक रेलवे स्टेशन के पास कांस्टेबल ने उन पर हमला किया और उन्हें घूंसा मारा, लेकिन राज्य के वकील ने कोर्ट को उनके (वकील के) अपने पिछले रिकॉर्ड के बारे में बताया।

इससे पहले, कोर्ट ने 18 दिसंबर के ऑर्डर में बार काउंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश में एनरोल वकीलों के खिलाफ पेंडिंग क्रिमिनल केस का राज्य भर का डेटा मांगा था।

कार्रवाई के दौरान, बार काउंसिल ऑफ़ उत्तर प्रदेश के वकील अशोक कुमार तिवारी ने काउंसिल का एक प्रस्ताव रिकॉर्ड पर रखा, जिसमें पुलिस रिकॉर्ड में हिस्ट्री-शीटर ​​या गैंगस्टर के तौर पर लिस्टेड वकीलों के प्रैक्टिस का लाइसेंस सस्पेंड करने का एकमत से फैसला लिया गया था।

कोर्ट ने बार काउंसिल को क्रॉस-रेफरेंस के लिए उन सभी वकीलों की डिटेल्स वाली एक पेन ड्राइव पेश करने का समय भी दिया, जिन्हें प्रैक्टिस का सर्टिफिकेट जारी किया गया है।

इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य सरकार के कंप्लायंस एफिडेविट के साथ-साथ वकीलों के खिलाफ जिलेवार केस की लिस्ट भी रिकॉर्ड पर ली।

बचपन पर बोझ नहीं, संरक्षण चाहिए: हमारी सामाजिक होड़ और बच्चों का स्वास्थ्य

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– डॉ. प्रियंका सौरभ

हाल ही में 10 वर्षीय एक बच्चे की अचानक मृत्यु से जुड़ा समाचार केवल एक दुखद घटना नहीं है, बल्कि हमारे समय की सबसे गंभीर सामाजिक विडंबना का संकेत है। चिकित्सकों द्वारा बताए गए संभावित कारण—अधूरी नींद, बिना नाश्ता स्कूल जाना, भारी स्कूल बैग, होमवर्क और प्रदर्शन का मानसिक दबाव, समय पर व पौष्टिक भोजन का अभाव—एक ऐसे तंत्र की ओर इशारा करते हैं, जिसमें बचपन लगातार कुचला जा रहा है। यह घटना हमें यह सोचने के लिए मजबूर करती है कि क्या हम बच्चों को बेहतर भविष्य देने की कोशिश में उनका वर्तमान छीन रहे हैं।

आज का समाज उपलब्धियों की अंधी दौड़ में फँसा हुआ है। अभिभावक, शिक्षक और संस्थाएँ—सभी किसी न किसी रूप में प्रतिस्पर्धा को जीवन का मूल मंत्र मान बैठे हैं। इस प्रतिस्पर्धा का सबसे कमजोर शिकार वे बच्चे हैं, जिनकी उम्र अभी खेलने, सीखने और सहज विकास की है। चार-पाँच साल की उम्र में जब बच्चा दुनिया को समझना शुरू करता है, तब उससे अपेक्षा की जाती है कि वह तय समय पर उठे, तय पाठ्यक्रम पूरा करे, परीक्षा में अव्वल आए और भविष्य की दिशा अभी से तय कर ले। यह सोच न केवल अवैज्ञानिक है, बल्कि अमानवीय भी है।

बाल मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि शुरुआती वर्षों में बच्चे का मस्तिष्क सबसे अधिक लचीला और संवेदनशील होता है। इस दौर में उस पर डाला गया दबाव उसके व्यक्तित्व, आत्मविश्वास और स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ता है। नींद की कमी, तनाव और भय की स्थिति में सीखने की प्रक्रिया बाधित होती है। फिर भी, हम सुबह कच्ची नींद में बच्चों को जगाते हैं, उन्हें बिना नाश्ता कराए स्कूल भेज देते हैं और उनसे उम्मीद करते हैं कि वे पूरे दिन सक्रिय और एकाग्र रहेंगे। यह उम्मीद वास्तविकता से कोसों दूर है।

भारी स्कूल बैग वर्षों से चर्चा का विषय रहे हैं। सरकारी दिशा-निर्देश और न्यायालयों के आदेशों के बावजूद, आज भी छोटे बच्चे अपने वजन से अधिक बोझ कंधों पर ढोते दिखाई देते हैं। यह केवल शारीरिक समस्या नहीं है; यह मानसिक संदेश भी देता है कि शिक्षा एक बोझ है, आनंद नहीं। जब शिक्षा बोझ बन जाती है, तो बच्चे के मन में सीखने के प्रति स्वाभाविक जिज्ञासा धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।

होमवर्क और परीक्षा का दबाव इस समस्या को और गहरा करता है। होमवर्क का उद्देश्य कक्षा में सीखी गई बातों को दोहराना और समझ को मजबूत करना होना चाहिए, न कि बच्चे को भयभीत करना। लेकिन व्यवहार में होमवर्क अक्सर दंड का रूप ले लेता है। अधूरा रहने पर डाँट, सज़ा और तुलना—ये सब बच्चे के आत्मसम्मान को चोट पहुँचाते हैं। वह सीखने के बजाय गलती से डरने लगता है, और यही डर आगे चलकर तनाव, चिंता और अवसाद का कारण बनता है।

भोजन और दिनचर्या भी बच्चों के स्वास्थ्य में अहम भूमिका निभाते हैं। स्कूल में समय पर और पौष्टिक भोजन न मिलना, ठंडा लंच खाने की मजबूरी, और घर लौटते ही बिना आराम नहाने व पढ़ने का दबाव—यह सब बच्चे के शरीर की प्राकृतिक जरूरतों की अनदेखी है। शरीर और मन को विश्राम की आवश्यकता होती है। बिना विश्राम के लगातार गतिविधि बच्चे की सहनशीलता को तोड़ देती है।

यह सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम बच्चों से आखिर चाहते क्या हैं। क्या हम उन्हें खुश, स्वस्थ और संवेदनशील इंसान बनाना चाहते हैं, या केवल अंक और पदवी हासिल करने वाली मशीन? जब अभिभावक अपने बच्चे को दूसरों से तुलना करते हैं—“फलाँ का बच्चा यह कर रहा है, तुम क्यों नहीं”—तो वे अनजाने में उसके मन में हीन भावना भर देते हैं। यह तुलना सामाजिक होड़ को जन्म देती है, जिसमें हर कोई आगे निकलने की कोशिश करता है, चाहे उसकी कीमत बच्चे का बचपन ही क्यों न हो।

शिक्षा व्यवस्था को भी इस संदर्भ में आत्ममंथन करना होगा। स्कूल केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की फैक्ट्री नहीं हैं; वे समाज निर्माण की प्रयोगशालाएँ हैं। यदि स्कूलों में खेल, कला, संवाद और रचनात्मक गतिविधियों के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, तो शिक्षा अधूरी है। शिक्षक बच्चों के लिए केवल ज्ञानदाता नहीं, मार्गदर्शक और संरक्षक भी होते हैं। अनुशासन के नाम पर भय का वातावरण बनाना शिक्षा के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

नीतिगत स्तर पर सरकार और प्रशासन की भूमिका भी अहम है। स्कूल बैग का वजन, स्कूल समय, होमवर्क की मात्रा और प्रारंभिक कक्षाओं में परीक्षा प्रणाली—इन सब पर स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देशों की आवश्यकता है। साथ ही, इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र भी होना चाहिए। बच्चों के नियमित स्वास्थ्य परीक्षण, काउंसलिंग सेवाएँ और पोषण कार्यक्रम शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनने चाहिए।

अभिभावकों के लिए सबसे बड़ा प्रश्न आत्मचिंतन का है। अपनी शिक्षा-यात्रा को याद करना जरूरी है—हमने कब स्कूल जाना शुरू किया, कैसे सीखा, कितनी जगह खेल और मित्रता को मिली। क्या हम सचमुच आज के बच्चों से अधिक सक्षम थे, या हमें सीखने के लिए अधिक समय और स्वतंत्रता मिली थी? यदि हमने संघर्ष किया और आगे बढ़े, तो यह मान लेना कि हमारे बच्चे भी वही रास्ता अपनाएँ, जरूरी नहीं। हर पीढ़ी की चुनौतियाँ और जरूरतें अलग होती हैं।

यह भी समझना होगा कि सफलता का अर्थ केवल ऊँचा पद या अधिक वेतन नहीं है। एक संतुलित, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनना भी सफलता है। यदि बच्चा मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है, तो उसकी उपलब्धियाँ खोखली हैं। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि हर बच्चा एक जैसा नहीं होता—उसकी रुचियाँ, क्षमताएँ और गति अलग-अलग होती हैं। शिक्षा का उद्देश्य इन भिन्नताओं को सम्मान देना होना चाहिए, न कि उन्हें कुचल देना।

मीडिया और सामाजिक विमर्श की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जब केवल टॉपर्स, रैंक और रिकॉर्ड की बातें होती हैं, तो अप्रत्यक्ष रूप से दबाव का माहौल बनता है। हमें उन कहानियों को भी जगह देनी चाहिए, जहाँ बच्चों ने खेल, कला, सेवा और मानवीय मूल्यों के माध्यम से जीवन को अर्थ दिया। इससे समाज का दृष्टिकोण संतुलित होगा।

अंततः, यह प्रश्न हमारे सामने खड़ा है—क्या हम सचमुच बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, या अपने अहंकार और असुरक्षा को उनके कंधों पर लाद रहे हैं? यदि किसी उपलब्धि की कीमत बच्चे की सेहत, मुस्कान और जीवन है, तो वह उपलब्धि नहीं, विफलता है। बच्चों को दया नहीं, अधिकार चाहिए—आराम का, खेलने का, गलती करने का और अपनी गति से बढ़ने का।

अब समय आ गया है कि हम होड़ से हटकर संवेदना को चुनें। शिक्षा को भय से मुक्त करें, बचपन को बोझ नहीं, संरक्षण दें। क्योंकि स्वस्थ बचपन ही स्वस्थ समाज की नींव होता है, और यदि नींव ही कमजोर होगी, तो भविष्य की इमारत कितनी भी ऊँची क्यों न हो, टिक नहीं पाएगी।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

अमीन सयानी: भारतीय रेडियो का स्वर्णिम स्वर

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भारतीय रेडियो प्रसारण के इतिहास में अमीन सयानी का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उनकी मधुर आवाज और अनोखे अंदाज ने लाखों श्रोताओं के दिलों में विशेष स्थान बना लिया। “भाइयो और बहनो” कहकर अपने कार्यक्रम की शुरुआत करने वाले इस महान उद्घोषक ने भारतीय रेडियो को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी आवाज में एक जादू था जो श्रोताओं को बांध लेता था और उन्हें कार्यक्रम से जोड़े रखता था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
अमीन सयानी का जन्म ११ दिसंबर १९३२ को मुंबई में एक गुजराती परिवार में हुआ था। उनके पिता जान मोहम्मद सयानी और माता कुलसूम सयानी दोनों ही शिक्षित और प्रगतिशील विचारों के थे। उनकी माता स्वयं भी एक लेखिका और समाज सेविका थीं। अमीन सयानी की शिक्षा मुंबई के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स महाविद्यालय में हुई, जहां उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बचपन से ही उनमें भाषा और संप्रेषण के प्रति विशेष रुचि थी।
अमीन सयानी का विवाह रूमा सयानी से हुआ और उनके दो पुत्र हैं। उनका पारिवारिक जीवन अत्यंत सुखद रहा। उनके परिवार ने हमेशा उनके व्यावसायिक जीवन में उनका साथ दिया और उन्हें प्रोत्साहित किया। उनकी पत्नी रूमा भी एक शिक्षित महिला थीं और उन्होंने अमीन के करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रेडियो जगत में प्रवेश
अमीन सयानी का रेडियो जगत में प्रवेश बहुत ही रोचक तरीके से हुआ। मात्र तेरह वर्ष की आयु में वर्ष १९४५ में उन्होंने अपना पहला कार्यक्रम प्रस्तुत किया। यह एक अंग्रेजी कार्यक्रम था जो बच्चों के लिए था। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा का विकास होता गया और वे विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे। उनकी आवाज की स्पष्टता, उच्चारण की शुद्धता और भावनाओं को व्यक्त करने की क्षमता ने उन्हें जल्द ही लोकप्रिय बना दिया।
पचास के दशक में वे नियमित रूप से रेडियो सीलोन पर कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगे। उन दिनों रेडियो सीलोन भारतीय श्रोताओं के बीच बहुत लोकप्रिय था क्योंकि यह फिल्मी संगीत प्रसारित करता था, जबकि आकाशवाणी पर अधिकतर शास्त्रीय संगीत और गंभीर कार्यक्रम होते थे। इसी दौरान उन्होंने अपनी पहचान बनाई और श्रोताओं के प्रिय बन गए।
बिनाका गीतमाला: एक युगांतरकारी कार्यक्रम
अमीन सयानी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और यादगार कार्यक्रम था “बिनाका गीतमाला”। इस कार्यक्रम की शुरुआत तीन दिसंबर १९५२ को हुई थी और यह लगभग चार दशकों तक चला। यह कार्यक्रम हर बुधवार रात को प्रसारित होता था और करोड़ों श्रोता इसे सुनने के लिए अपने रेडियो के पास बैठ जाते थे। इस कार्यक्रम में सप्ताह के लोकप्रिय फिल्मी गीत बजाए जाते थे और अमीन सयानी अपने अद्भुत अंदाज में उन्हें प्रस्तुत करते थे।
बिनाका गीतमाला केवल एक संगीत कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह एक सामाजिक घटना बन गया था। लोग अपने पसंदीदा गीतों के लिए पत्र लिखते थे और गीतों की लोकप्रियता की सूची का बेसब्री से इंतजार करते थे। अमीन सयानी के “भाइयो और बहनो” कहने का अंदाज इतना प्रसिद्ध हो गया कि यह उनकी पहचान बन गई। वे श्रोताओं के पत्रों को पढ़ते थे, उनकी समस्याओं को सुनते थे और उन्हें अपने परिवार का हिस्सा समझते थे।
आवाज में जादू और प्रस्तुति की कला
अमीन सयानी की सफलता का राज उनकी अद्वितीय प्रस्तुति शैली थी। उनकी आवाज में एक अनोखा जादू था जो श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता था। वे हर गीत को इस तरह प्रस्तुत करते थे जैसे वह कोई कहानी सुना रहे हों। फिल्म की पृष्ठभूमि, गीतकार, संगीतकार और गायक के बारे में रोचक जानकारी देना उनकी विशेषता थी। वे केवल गीत बजाने तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि श्रोताओं को उस गीत से भावनात्मक रूप से जोड़ देते थे।
उनकी हिंदी भाषा पर पकड़ अद्भुत थी। यद्यपि उनकी मातृभाषा गुजराती थी, लेकिन उन्होंने हिंदी को इतने सुंदर तरीके से बोला कि हर प्रांत के श्रोता उन्हें अपना समझते थे। उनका उच्चारण स्पष्ट था और शब्दों का चयन बहुत सोच-समझकर किया जाता था। वे कठिन शब्दों को भी इस तरह बोलते थे कि आम श्रोता भी समझ सकें।
अन्य कार्यक्रम और योगदान
बिनाका गीतमाला के अलावा अमीन सयानी ने हजारों अन्य कार्यक्रम भी प्रस्तुत किए। उन्होंने विभिन्न विषयों पर कार्यक्रम बनाए, जिनमें सामाजिक मुद्दे, स्वास्थ्य, शिक्षा और मनोरंजन शामिल थे। वे विज्ञापनों के लिए आवाज देने में भी सिद्धहस्त थे और उन्होंने अनगिनत विज्ञापनों के लिए अपनी आवाज दी। उनकी आवाज ने कई उत्पादों को घर-घर तक पहुंचाने में मदद की।
अमीन सयानी ने दूरदर्शन पर भी कई कार्यक्रम प्रस्तुत किए। जब दूरदर्शन का प्रसारण शुरू हुआ, तो उन्होंने इस नए माध्यम को भी अपनाया और सफलतापूर्वक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। हालांकि, रेडियो ही उनकी पहली पसंद रहा और वहीं उन्होंने अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाई।
पुरस्कार और सम्मान
अमीन सयानी को उनके अतुलनीय योगदान के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान मिले। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष २००९ में पद्मश्री से सम्मानित किया। यह भारत का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। इसके अलावा उन्हें कई राज्य सरकारों और संगठनों द्वारा भी सम्मानित किया गया। उन्हें जीवनभर उपलब्धि के लिए विभिन्न पुरस्कार मिले।
लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी उनका नाम दर्ज है। उन्होंने अपने जीवनकाल में लगभग ५४,००० से अधिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए और ६५,००० से अधिक विज्ञापनों के लिए आवाज दी। यह एक विश्व रिकॉर्ड है जो उनकी मेहनत और समर्पण का प्रमाण है।
विरासत और प्रभाव
अमीन सयानी ने भारतीय रेडियो प्रसारण को एक नई दिशा दी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि रेडियो केवल समाचार और जानकारी का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मनोरंजन और भावनात्मक जुड़ाव का भी सशक्त माध्यम हो सकता है। उनके बाद आने वाले अनेक उद्घोषकों ने उनसे प्रेरणा ली और उनकी शैली को अपनाने का प्रयास किया, लेकिन अमीन सयानी की अनोखी आवाज और शैली की नकल करना असंभव था।
उनका निधन २० फरवरी २०२४ को मुंबई में हुआ। उस समय वे ९१ वर्ष के थे। उनके निधन से भारतीय मनोरंजन जगत को एक अपूरणीय क्षति हुई। लेकिन उनकी आवाज और उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए कार्यक्रम आज भी लोगों की यादों में जीवित हैं। अनेक लोग आज भी उनके कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग सुनते हैं और उस स्वर्णिम युग को याद करते हैं।
अमीन सयानी ने साबित किया कि प्रतिभा, मेहनत और समर्पण से कोई भी व्यक्ति अपने क्षेत्र में शिखर पर पहुंच सकता है। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। भारतीय रेडियो के इतिहास में उनका स्थान अमर रहेगा और वे हमेशा “आवाज का जादूगर” के रूप में याद किए जाएंगे।(साेनेट)