सुकमा में गोगुंडा की पहाड़ियों में टूटा नक्सल भय का प्रतीक

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सीआरपीएफ ने रमन्ना का स्मारक किया ध्वस्त

सुकमा, 04 फ़रवरी (हि.स.)। कभी जंगलों की खामोशी में छिपा डर, बारूद की गंध और अनकही आशंकाओं का प्रतीक रहा गोगुंडा क्षेत्र अब एक नई शुरुआत की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। चार दशकों से नक्सली आतंक का पर्याय बने कुख्यात नक्सली नेता रमन्ना के स्मारक को केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) ने बुधवार को ध्वस्त कर दिया।

यह कार्रवाई केवल एक ढांचे को गिराने तक सीमित नहीं रही बल्कि उस मानसिक भय को तोड़ने की दिशा में बड़ा कदम साबित हुई, जिसने वर्षों तक ग्रामीणों को जकड़ कर रखा था।

इस अहम अभियान को सीआरपीएफ की 74वीं वाहिनी ने अंजाम दिया। कमांडेंट हिमांशु पांडे के स्पष्ट निर्देशों पर असिस्टेंट कमांडेंट विदेखो एवं असिस्टेंट कमांडेंट अंकित सिंह के नेतृत्व में पूरी रणनीतिक तैयारी और सतर्कता के साथ यह कार्रवाई की गई। कड़े सुरक्षा घेरे के बीच नक्सली स्मारक को ध्वस्त कर यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि अब क्षेत्र में डर की राजनीति नहीं चलेगी।

जिस स्मारक को हटाया गया, वह कुख्यात माओवादी नेता रमन्ना का था, जो कभी तेलंगाना, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में खौफ का दूसरा नाम माना जाता था। उस पर तीन राज्यों में कुल 2.40 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। उसकी मृत्यु के बाद भी माओवादी संगठन द्वारा उसकी विचारधारा को जीवित रखने के उद्देश्य से इस तरह के स्मारकों को ‘शहादत’ के प्रतीक के रूप में स्थापित किया गया था। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, इस स्मारक के पास से गुजरते समय लोग डर के कारण नजरें झुका लेते थे। बच्चों को चुप करा दिया जाता और महिलाएं रास्ता बदल लेती थीं। ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल पत्थर का ढांचा नहीं बल्कि भय का स्थायी प्रतीक बन चुका था।

स्मारक ध्वस्त होते ही गांव का माहौल बदला नजर आया। पत्थरों के गिरने की आवाज़ के साथ वर्षों पुरानी खामोशी टूट गई और लोगों के चेहरों पर राहत दिखाई दी।

इस मौके पर सीआरपीएफ 74वीं वाहिनी के असिस्टेंट कमांडेंट विदेखो की ने कहा कि माओवाद केवल हथियारों के दम पर नहीं बल्कि डर और प्रतीकों के सहारे जीवित रहता है। ऐसे अवैध स्मारकों को हटाना जरूरी है ताकि भय की जड़ खत्म हो और विकास का रास्ता खुले।

सुकमा का गोगुंडा पहाड़ पिछले चार दशकों (40 साल) से नक्सलियों का अजेय किला माना जाता था। यहां नक्सलियों की भारी मौजूदगी के कारण सुरक्षाबल पहुंचने से बचते थे। हालांकि इलाके में सीआरपीएफ 74वीं बटालियन का नया कैंप स्थापित होने के बाद स्थितियां बदल गईं। अब यह क्षेत्र पूरी तरह से नक्सलियों के कब्जे से आजाद हो चुका है।

टॉप नक्सली कमांडर और सेंट्रल कमेटी मेंबर रमन्ना की मौत साल 2020 में हार्ट अटैक से हुई थी। उसकी मौत के बाद नक्सलियों ने उसकी याद में गोगुंडा की पहाड़ियों पर यह 20 फीट ऊंचा स्मारक तैयार किया था, जो नक्सलियों के प्रभाव का प्रतीक माना जाता था। नक्सली रमन्ना की याद में बनाए गए इस स्मारक को गिराने के लिए सीआरपीएफ 74वीं बटालियन और कोबरा 201 बटालियन ने एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया। जवानों ने स्मारक को चारों तरफ से घेरकर ध्वस्त कर दिया।

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