सातवें आसमान पर पहुँचा ममता का गुस्सा

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बाल मुकुन्द ओझा

प.बंगाल में विधान सभा चुनावों की तिथियां ज्यों ज्यों नज़दीक आती जा रही है त्यों त्यों मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच रहा है। हाल फिलहाल ममता एसएआर को लेकर चुनाव आयोग और उसके मुखिया ज्ञानेश कुमार पर बुरी तरह भड़की हुई है। उनकी भाषा और बोली भी संयमित और सवैंधानिक नहीं है। चुनाव आयोग से अपनी बैठक के दौरान भी ममता ने अपना गुस्सा छिपाया नहीं। इस दौरान उन्होंने आयोग पर एसआईआर को लेकर गंभीर आरोप लगाए। लेकिन जब आयोग ने आरोपों पर जवाब देना शुरू किया, वह भड़क गई। ममता ने बैठक के दौरान मेज को कई बार तेज-तेज पीटा और बैठक का बहिष्कार कर चली गई। वहीं बैठक से बाहर निकलकर ममता बनर्जी ने आयोग पर गंभीर आरोप लगाए और अपने साथ दु‌र्व्यवहार करने का आरोप लगाया।

प.बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सियासत तीन लोकों से न्यारी है। बंगाल में कम्युनिष्टों के साथ अपनी मातृ संस्था कांग्रेस को जड़ से उखाड़ने का श्रेय ममता को दिया जा सकता है। ममता बनर्जी अपने लड़ाकू अंदाज़ के लिए देशभर में जानी जाती है। वे आजकल मोदी विरोध के लिए जी जान से जुटी है। उनकी कांग्रेस और भाजपा दोनों से ही सियासी पटरी नहीं बैठती। हालाँकि वे कांग्रेस की ही उपज है। ममता लगातार मोदी पर हमला करने वाली नेत्री के रूप में प्रसिद्ध है। भाजपा और कांग्रेस के बंगाल के नेता ममता की गतिविधियों को महज नौटंकी करार देते है। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन तो यह कहने से नहीं चूकते है की ममता ने अपने पर हमला करा कर टूटी टांग को प्रदर्शित कर मतदाताओं की सहानुभूति बटोरकर पिछला विधानसभा चुनाव जीता। बंगाल के नेता लगातार ममता पर हमलावर रहते है, इसी कारण ममता की कांग्रेस से पटरी नहीं बैठती और वे गाहे बगाहे गैर कांग्रेस और गैर भाजपा मोर्चा बनाने की वकालत करती है। वर्तमान में ममता ने प्रधान मंत्री मोदी की सबसे बड़ी आलोचक के रूप में अपनी छवि बनाई है।

प. बंगाल में 34 साल तक एक छत्र शासन करने वाले कम्युनिष्टों को सत्ताच्युत कर ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल का झंडा फहराया। ममता की टीएमसी 2011 से पश्चिम बंगाल में सत्ता में है। इससे पूर्व 1977  से 2011 तक पहले दिग्गज नेता ज्योति बसु और फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य ने राज सत्ता की कमान संभाली थी। 2011 के चुनाव में ममता ने कम्युनिष्टों का शासन ऐसा उखाड़ा की आज उनका नाम लेवा भी वहां नहीं बचा है। देश की सियासत में दीदी के नाम से मशहूर हुई ममता बनर्जी। 1984 में ममता को पहली बार लोकसभा चुनाव का टिकट मिला। ममता दक्षिण कोलकाता से सांसद चुनी गईं। 1991 में ममता बनर्जी दोबारा लोकसभा सांसद बनीं। ममता को बंगाल की शेरनी भी कहा जाता है। सूती धोती और मामूली चप्पल ममता की पहचान है। 25 साल बाद भी बंगाल पर ममता का जलवा बरकरार है और वे विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। पार्टी हाई कमान भी वे स्वयं हैं और अपने सभी प्रकार के निर्णय खुद ही लेती हैं।  इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं।  ममता अपने राज्य में जन-जन में लोकप्रिय हैं और धरातलीय नेता हैं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को की थी। उस दौरान  ममता को लगा था की कांग्रेस में रहकर कम्युनिष्टों को नहीं हटाया जा सकता। तभी वो कांग्रेस से अलग हो गयी और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाली। ममता ने दिग्गज कम्युनिष्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराकर देश में धमाका कर दिया था। ममता येन केन प्रकारेण कम्युनिष्टों को सत्ता से हटाना चाहती थी। उन्होंने अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए शुरू में भाजपा से हाथ मिलाया था।  1997 में कांग्रेस से अलग होने और टीएमसी के गठन के बाद, बनर्जी ने भाजपा के साथ गठबंधन किया और रेल मंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी के मंत्रिमंडल का भी हिस्सा थीं। मगर जल्द ही भाजपा से उनका मोह भांग हो गया और उन्होंने एक बार फिर कांग्रेस से हाथ मिलकर अपनी सियासत शुरू की। आखिर ममता की मेहनत रंग लाई।  2011 में, टीएमसी ने पश्चिम बंगाल में 34 साल के सीपीआई (एम) के शासन को खत्म कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की और 20 मई को बनर्जी ने पश्चिम बंगाल की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लीं।  2016 और 2021 के चुनावों में जीत हासिल करने के बाद से टीएमसी राज्य में सत्ता में है।  पिछले विधान सभा चुनाव में उनका सीधा मुकाबला भाजपा से हुआ। इस चुनाव में ममता की जीत हुए। भाजपा दूसरे नंबर पर आयी। कांग्रेस और वामपंथियों का इस चुनाव में पूरी तरह सफाया हो गया।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी  32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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