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वाराणसी: आनुवंशिक अध्ययन ने आर्य आक्रमण के मिथक को किया खारिज

— गुजरात की मातृ वंशावली 40 हजार वर्ष से अधिक पुरानी

वाराणसी, 1 जनवरी (हि.स.)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और गांधीनगर स्थित नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (एनएफएसयू) के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक नवीन आनुवंशिक अध्ययन ने लंबे समय से चर्चित आर्य आक्रमण सिद्धांत को खारिज कर दिया है। अध्ययन में दावा किया गया है कि गुजरात की आबादी की मातृ आनुवंशिकी पूरी तरह स्वदेशी है और इसकी जड़ें प्लेइस्टोसीन काल में 40,000 वर्ष से भी अधिक पुरानी हैं।

अमेरिकन जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल एंथ्रोपोलॉजी में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, लगभग 3,500–4,000 वर्ष पहले किसी बड़े पैमाने के आक्रमण या मातृ जनसंख्या प्रतिस्थापन के प्रमाण नहीं मिलते। इससे भारत के प्राचीन इतिहास से जुड़े उन औपनिवेशिक कालीन सिद्धांतों पर प्रश्नचिह्न लगता है, जिनमें भारतीय सभ्यता को बाहरी आक्रमणकारियों की देन बताया गया था।

बीएचयू के जीन विज्ञानी और अध्ययन के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि विश्व की नौ संस्थाओं से जुड़े 16 वैज्ञानिकों की टीम ने गुजराती व्यक्तियों के 168 पूर्ण माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम का विश्लेषण किया। इसके साथ ही यूरेशिया और दक्षिण एशिया से प्राप्त 529 अतिरिक्त सीक्वेंस का तुलनात्मक अध्ययन किया गया। परिणामों में गुजरात की मातृ वंशावलियों में असाधारण निरंतरता और स्थिरता सामने आई।

शोध के अनुसार, गुजरात की 76 प्रतिशत मातृ वंशावलियां विशुद्ध रूप से दक्षिण एशिया-विशेष हैं। पूर्वी यूरेशिया का योगदान मात्र 0.6 प्रतिशत और पश्चिमी यूरेशिया का 21 प्रतिशत पाया गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि पश्चिमी यूरेशियाई वंशावलियों में से केवल 19 प्रतिशत ही पिछले 5,000 वर्षों में क्षेत्र में आईं, जबकि शेष 81 प्रतिशत उससे भी पहले की हैं। प्रो. चौबे ने कहा कि यह अध्ययन आर्य आक्रमण सिद्धांत को मूल रूप से कमजोर करता है, क्योंकि इंडो-आर्यन काल के दौरान किसी बड़े मातृ जीन प्रवाह या जनसांख्यिकीय उथल-पुथल के संकेत नहीं मिलते।

अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. शैलेश देसाई के अनुसार, “यूरोप की तरह जनसंख्या को पूरी तरह बदल देने वाले आक्रमणों के बजाय, हमारे आंकड़े हजारों वर्षों में हुए छोटे और क्रमिक जीन प्रवाह को दर्शाते हैं। गुजरात की मातृ आनुवंशिकी एक मजबूत स्वदेशी आधार को दिखाती है।” शोध में यह भी सामने आया कि लगभग 40–45 हजार वर्ष पहले गुजरात में एक बड़े जनसंख्या विस्तार की घटना हुई, जिसके बाद अंतिम हिमयुग, नवपाषाण काल या प्रस्तावित इंडो-आर्यन प्रवास जैसे ऐतिहासिक चरणों में कोई बड़ा मातृ आनुवंशिक व्यवधान नहीं हुआ। एनएफएसयू के वरिष्ठ लेखक प्रोफेसर भार्गव पटेल ने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता के लगभग 4,000 वर्ष पूर्व पतन का भी मातृ आनुवंशिकी पर न्यूनतम प्रभाव दिखता है, जो आक्रमण या व्यापक विस्थापन के बजाय निरंतरता का संकेत देता है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जीन प्रवाह केवल भारत में बाहर से नहीं आया, बल्कि भारत से पश्चिमी यूरेशिया की ओर भी गया। दक्षिण एशिया-विशेष हैप्लोग्रुप्स—एम (48.21 प्रतिशत), आर (28.56 प्रतिशत) और यू (13.69 प्रतिशत)—की प्रधानता गुजरात की भूमिका को भारत में प्रारंभिक मानव प्रवासों के एक प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में रेखांकित करती है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अध्ययन केवल आनुवंशिकी तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के इतिहास को औपनिवेशिक पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर देखने का प्रयास भी है। वैज्ञानिकों के अनुसार, आर्य आक्रमण सिद्धांत का अक्सर सामाजिक विभाजन के लिए उपयोग किया गया, जबकि यह नया आनुवंशिक साक्ष्य भारत की प्राचीन स्वदेशी विरासत और दीर्घकालिक सांस्कृतिक निरंतरता की ओर संकेत करता है।

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