मुंह में नाम भगवान का और दिल में नफ़रत का ज़हर ?                                     

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− निर्मल रानी

पूरे देश को नफ़रत की आग में झोंकने की कोशिश में लगे अराजक तत्वों का एक और नफ़रती एजेंडा पिछले दिनों उस समय सामने आया जबकि गत 24 जनवरी को उत्तराखंड में राजधानी देहरादून के निकट मसूरी के बाला हींसार क्षेत्र में वाइनबर्ग एलेन स्कूल में स्थित सूफ़ी संत फ़क़ीर व प्रसिद्ध कवि बाबा बुल्ले शाह की लगभग 100 वर्ष पुरानी मुख्य मज़ार सहित वहां मौजूद दो अन्य मज़ारों को भी कुछ अराजक तत्वों ने हथौड़े, सब्बल और लोहे की रॉड आदि का प्रयोग कर उन्हें क्षतिग्रस्त कर दिया। इन अवांछित तत्वों ने वहां मौजूद कई धार्मिक ग्रंथों व पुस्तकों को फाड़ा। वहां मौजूद दानपेटी तोड़कर उसकी नक़दी लूटी। बुल्ले शाह सहित अन्य कई संतों फ़क़ीरों के चित्र फाड़े। इतना ही नहीं बल्कि उस पवित्र परिसर में शौच कर इन आतताइयों ने अपने ‘संस्कारों’ का भी परिचय दिया। इस पूरे घटनाक्रम के संबंध में वायरल वीडीओ में सुनाई व दिखाई दे रहा है कि जिस समय यह उपद्रवी तोड़ फोड़ कर रहे थे उस समय वे अभद्र गालियाँ भी बक रहे थे साथ ही जय श्री राम व जय हनुमान के नारे भी लगा रहे थे। गोया साफ़ है कि यह उसी मानसिकता व उसी विचारधारा के मुट्ठी भर लोग थे जिन्होंने अपने ऐसे ही नफ़रती व विषाक्त एजेंडों से भारतीय समाज को बेचैन कर रखा है। 

                                    यहाँ एक बात यह भी क़ाबिल -ए -ग़ौर है कि उत्तराखंड में यह घटना उस दौरान घटी है जबकि राज्य में इन दिनों 19 वर्षीय रिसेप्शनिस्ट अंकिता भंडारी की हत्या को लेकर फिर से उबाल आया हुआ है। ग़ौरतलब है कि अंकिता भंडारी की 18 सितंबर 2022 को उत्तराखंड के ऋषिकेश स्थित एक रिज़ॉर्ट में हत्या कर दी गई थी। हत्या के बाद उसके शव को चीला नहर में फेंक दे दिया गया था जो क्षत विक्षत अवस्था में सात दिन बाद बरामद हुआ था। इस काण्ड में मुख्य आरोपी के रूप में आर एस एस व भाजपा से संबंध रखने वाले राज्य के पूर्व मंत्री विनोद आर्य के बेटे पुलकित आर्य के अतिरिक्त सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता के नाम हैं जिन पर अंकिता भंडारी से बलात्कार करने व बाद में उसकी हत्या किये जाने का आरोप है। पिछले दिनों इस मामले में एक बार फिर उस समय उबाल आ गया जब अंकिता को न्याय दिलाने की मांग करने वाले पत्रकार आशुतोष नेगी को उत्तराखंड पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किया गया। इसके बाद श्रीनगर गढ़वाल में अंकिता के परिजनों ने धरना शुरू किया, सरकार के पुतले फूंके गए और सोशल मीडिया पर आक्रोश फैल गया और अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने हेतु देहरादून से दिल्ली तक प्रदर्शन होने लगे। यह मामला इन दिनों उत्तराखंड की सियासत में गरमाया हुआ है, जहां सरकार पर बड़े नेताओं को बचाने के आरोप लग रहे हैं। इसी संबंध में गत 11 जनवरी को उत्तराखंड बंद का आह्वान भी हुआ। राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 8 जनवरी 2026 को अंकिता भंडारी बलात्कार व हत्या मामले की सीबीआई जांच की सिफ़ारिश भी कर दी। इन परिस्थितियों में यह भी माना जा रहा है कि उत्तराखंड सरकार तथा संघ व भाजपा नेताओं के हत्या व बलात्कार के आरोपों के इसी कलंक से पीछा छुड़ाने की कोशिश के परिणामस्वरूप भी यह घिनौना खेल खेला जा सकता है। यानी अंकिता भंडारी मामले की ओर से जनता का ध्यान हटाने की ग़रज़ से ही देहरादून में बाबा बुल्ले शाह की मज़ार में तोड़फोड़ की गयी हो ?

                       रहा सवाल  प्रसिद्ध पंजाबी सूफी संत और कवि बुल्ले शाह का, तो वे प्रायः कर्मकांडों की निष्फलता और प्रेम के महत्व को ही अपनी शायरी में व्यक्त किया करते थे। उनकी रचनाएँ सूफ़ी दर्शन की मिसाल पेश करने के साथ साथ मानवता, एकता और भेदभाव के खंडन पर केंद्रित हैं। इसमें बाहरी विद्या या रूढ़ियों के बजाय हृदय की भक्ति प्रधान थी। उनकी प्रमुख रचनाएँ काफ़ियाँ हैं, जो मूलतः पंजाबी भाषा में होने के बावजूद सभी धर्मों में स्वीकृत हैं। बुल्ले शाह ने हमेशा रूह (आत्मा )को एक ही मानते हुये हमेशा ही हिंदू-मुस्लिम भेदभाव का विरोध किया। यही वजह है कि उनकी कविताएँ सूफ़ीवाद की मूल भावना अर्थात एकेश्वरवाद, फ़क़ीरी व प्रेमपंथ को दर्शाती हैं,और निश्चित रूप से यही शिक्षा किसी इंसान को कट्टरपंथी सोच से बचाती हैं। यही वजह है कि कट्टरपंथियों को संतों व फ़क़ीरों की सद्भाव की भाषा और विचार पसंद नहीं आते। अन्यथा क्या वजह है कि इसी विषाक्त मानसिकता के लोग कभी मस्जिद में तोड़ फोड़ करते हैं तो कभी दरगाहों में, कभी चर्च पर हमला व तोड़फोड़ तो कभी बुद्ध, गाँधी व अंबेडकर जैसे महापुरुषों की मूर्ति खंडित करते हैं। यही उत्पाती लोग कभी मस्जिद के सामने भीड़ इकट्ठी कर शोर शराबा कर दूसरे समाज के लोगों को उकसाने का काम करते हैं तो कभी अपनी हिंसक गतिविधियों से किसी शांतिपूर्ण धार्मिक जुलूस को भी उपद्रवी भीड़ में बदल देते हैं। कभी धर्म या जाति देखकर इन्हीं नफ़रती उपद्रवियों की टोली किसी बेगुनाह व्यक्ति को पीट पीटकर मार देती है। 

                      बुल्ले शाह की ही तरह संत कबीर दास भी एक महान कवि व सुधारक थे ।इनके प्राकट्य दिवस के अवसर पर 8 वर्ष पूर्व यानी 28 जून 2018 को प्रधानमंत्री मोदी ने उत्तर प्रदेश में मगहर स्थित संत कबीर की समाधि स्थल पर पहुंचकर उनकी मज़ार पर चादर चढ़ाई थी और वहां अपना माथा टेका था। वहां मोदी ने कबीर की शिक्षाओं को याद करते हुये कहा भी था कि “संत कबीर जाति में विश्वास नहीं करते थे, वह मानते थे  कि हर कोई बराबर है। हम कबीर के बुद्धिपरक संदेश को जनता तक ले जाएंगे और ‘न्यू इंडिया’ को आकार देंगे”। जात पात पूछे नहिं कोई, हरि को भजे सो हरि को होय जैसी प्रसिद्ध लोकप्रिय व प्रचलित पंक्ति के रचयिता भी संत कबीर की हैं। परन्तु यह बात भी समझ से परे है कि एक ओर तो नरेंद्र मोदी न केवल कबीर की समाधी पर चादर चढ़ाते हैं बल्कि अजमेर सहित और भी कई दरगाहों पर चादरें भेजकर अपनी हाज़िरी लगते हैं। परन्तु दूसरी ओर इसी विचारधारा से जुड़े लोग उसी संत व फ़क़ीरी के सिलसिले से नफ़रत करते दिखाई देते हैं। आख़िर यह कैसा विरोधाभासी ‘न्यू  इंडिया ‘ है ?

                         ऐसी तमाम ख़बरें सामने आती रहती हैं जिनमें इसी नफ़रती मानसिकता के चंद चिंटू कभी साईं बाबा जैसे महान संत का विरोध व उनका अपमान करते दिखाई दे जाते हैं तो कभी गुग्गा माड़ी के भक्तों को पूजा पद्धति सिखाने पहुँच जाते हैं। नफ़रत के इन सौदागरों को किसी संत फ़क़ीर की सद्भावना पूर्ण शिक्षाओं या उसके शांति व प्रेम पूर्ण सन्देश से नहीं बल्कि उसकी धर्म जाति से वास्ता होता है। आज बुल्लेशाह मुसलमानों में कम बल्कि प्रत्येक उस समाज में ज़्यादा लोकप्रिय हैं जो उदारवादी  है,जो अंधविश्वास और अंधभक्ति के विरुद्ध है जो पाखंड व आडंबरों को पसंद नहीं करता। आज पूरे विश्व में उनकी मान्यता व लोकप्रियता उनकी शिक्षाओं के कारण है। वास्तव में मुंह में भगवान का नाम और दिल में नफ़रत का ज़हर रखने वाले विद्वेषपूर्ण मानसिकता के इन चिंटुओं की तो औक़ात ही नहीं कि वे बुल्लेशाह जैसे मानवतावादी संतों के नाम को मिटा भी सकें।                                                   − निर्मल रानी

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