
सतीश गुजराल भारतीय कला जगत के एक ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाकार थे जिन्होंने चित्रकला, मूर्तिकला, वास्तुकला और लेखन के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी। उनका जन्म २६ दिसंबर १९२५ को झेलम, पंजाब में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। वे भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल के छोटे भाई थे। बचपन में एक दुर्घटना के कारण वे लगभग बहरे हो गए थे, लेकिन इस शारीरिक चुनौती ने उनकी रचनात्मकता को कभी बाधित नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपनी कला के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति को और भी सशक्त बनाया।
सतीश गुजराल की प्रारंभिक शिक्षा लाहौर में हुई। उन्होंने मायो कला विद्यालय, लाहौर से कला की शिक्षा प्राप्त की। १९४७ के विभाजन ने उनके जीवन को गहराई से प्रभावित किया। विभाजन की त्रासदी और हिंसा ने उनकी कला में एक गहन संवेदनशीलता और मानवीय पीड़ा के प्रति सजगता को जन्म दिया। इस कठिन समय के अनुभवों ने उनकी कलाकृतियों में एक विशिष्ट गहराई और भावनात्मक तीव्रता प्रदान की। विभाजन के बाद वे अपने परिवार के साथ भारत आ गए और यहीं से उनकी कलात्मक यात्रा का नया अध्याय शुरू हुआ।
उच्च शिक्षा के लिए गुजराल ने मुंबई के जे जे कला विद्यालय में प्रवेश लिया और बाद में वे मैक्सिको गए जहां उन्होंने प्रसिद्ध भित्ति चित्रकार डिएगो रिवेरा और डेविड सिकेरोस के साथ कार्य किया। मैक्सिको में बिताए गए समय ने उनकी कला शैली को व्यापक आयाम दिए। वहां के जीवंत रंगों, सामाजिक यथार्थवाद और भित्ति चित्रण की परंपरा ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। इस अनुभव ने उनकी कला में बड़े आकार के चित्रों और साहसिक रंग योजनाओं का समावेश किया।
सतीश गुजराल की कला में विभिन्न शैलियों और माध्यमों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उन्होंने तैल चित्रण, जल रंग, भित्ति चित्र, मूर्तिकला, चीनी मिट्टी के बर्तन और अन्य कई माध्यमों में काम किया। उनकी कलाकृतियों में भारतीय परंपरा और आधुनिक पश्चिमी कला का सुंदर मेल देखा जा सकता है। उनके चित्रों में रंगों का प्रयोग बेहद साहसिक और प्रभावशाली था। वे गहरे और चटकीले रंगों का उपयोग करते थे जो दर्शकों को तुरंत अपनी ओर आकर्षित करते थे।
उनकी कला में विभाजन की पीड़ा, मानवीय संघर्ष, सामाजिक विषमताएं और जीवन के विभिन्न पहलू प्रमुखता से दिखाई देते हैं। उनके चित्रों में अक्सर विकृत आकृतियां, तीव्र भावनाएं और गहरी मानवीय पीड़ा की अभिव्यक्ति मिलती है। विभाजन की त्रासदी उनकी अनेक कृतियों का केंद्रीय विषय रही। उन्होंने अपनी आत्मकथा में भी इस दौर के अनुभवों को बहुत मार्मिकता से व्यक्त किया है।
वास्तुकला के क्षेत्र में भी सतीश गुजराल ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने अनेक भवनों, होटलों और सार्वजनिक स्थानों का डिजाइन तैयार किया। बेल्जियम में भारतीय दूतावास की इमारत उनकी वास्तुकला कौशल का एक उत्कृष्ट नमूना है। उन्होंने वास्तुकला में कला को समाहित करने का अनूठा प्रयास किया और भवनों को केवल निर्माण न मानकर उन्हें कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।
मूर्तिकला में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्होंने कांस्य, लकड़ी और अन्य सामग्रियों से बेहतरीन मूर्तियां बनाईं। उनकी मूर्तियां भी उनके चित्रों की तरह ही भावनात्मक रूप से सशक्त और विचारोत्तेजक होती थीं। उन्होंने परंपरागत और आधुनिक दोनों शैलियों में मूर्तिकला का कार्य किया।
सतीश गुजराल को उनके असाधारण योगदान के लिए अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए। १९५४ में उन्हें राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में स्वर्ण पदक मिला। १९७२ में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। १९९९ में उन्हें कला जगत में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पद्म विभूषण से नवाजा गया, जो भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान है।
उनकी कलाकृतियां विश्व भर के प्रमुख संग्रहालयों और निजी संग्रहों में सुरक्षित हैं। उनकी प्रदर्शनियां भारत और विदेशों में लगीं और सराही गईं। उनकी कला ने न केवल भारतीय कला जगत को समृद्ध किया बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय कला का सम्मान बढ़ाया।
लेखन के क्षेत्र में भी सतीश गुजराल ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। उनकी आत्मकथा बहुत प्रशंसित हुई जिसमें उन्होंने अपने जीवन संघर्ष, विभाजन की त्रासदी और कला यात्रा का मार्मिक वर्णन किया। उनका लेखन उतना ही सशक्त और प्रभावशाली था जितनी उनकी कलाकृतियां।
सतीश गुजराल का निधन २३ मार्च २०२० को दिल्ली में हुआ। वे ९४ वर्ष की आयु में इस संसार से विदा हुए। उनकी मृत्यु के साथ भारतीय कला जगत ने एक महान कलाकार को खो दिया, लेकिन उनकी कलाकृतियां और उनका योगदान हमेशा भारतीय कला के इतिहास में अमर रहेगा। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने अपनी शारीरिक सीमाओं को कभी अपनी रचनात्मकता पर हावी नहीं होने दिया और जीवन भर कला साधना में लीन रहे। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।(सोनेट)
समकालीन भारतीय कलाकारों में एक महत्त्वपूर्ण शख्सियत, चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार और ग्राफिक डिज़ायनर के रूप में प्रख्यात सतीश गुजराल भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री इन्द्र कुमार गुजराल के छोटे भाई हैं। 25 दिसम्बर, 1925 को पंजाब के झेलम (अब पाकिस्तान) में जन्मे सतीश गुजराल को बचपन में पैर फिसलने के कारण टांगों और सिर में काफी चोट आई जिसके कारण इन्हें कम सुनाई पड़ने लगा था। अपनी शारीरिक व्यथा के बावजूद संघर्षशील कला सृजन से उन्होंने जीवन में सफलता पाई जो उनकी कला जिजीविषा का परिणाम है। उन्होंने लाहौर के मेयो स्कूल ऑफ आर्ट में कला अध्ययन के पश्चात बॉम्बे में प्रसिद्ध सर जे जे स्कूल आफ आर्ट में दाखिला लिया और एक छात्रवृत्ति मिलने के बाद मैक्सिको के प्लेसिया नेशनल डी बेल्लास आर्ट्स में प्रसिद्ध कलाकार दिएगो रिवेरा और डेविड एलफेरो सिक्विरो के साथ काम किया। इसके बाद उन्होंने इंग्लैण्ड के इम्पीरियल सर्विस कॉलेज विंडसर में भी कला का विधिवत अध्ययन किया। सतीश गुजराल ने अपनी रचना यात्रा में कभी भी सीमाएं नहीं खींचीं और माध्यमों के क्षेत्र में व्यापक प्रयोग किये। रंग और कूची के साथ साथ सिरामिक, काष्ठ, धातु और पाषाण — उन्होंने हर माध्यम के प्रयोग से अपनी कलात्मक रचनाशीलता का परिचय दिया। भारत विभाजन को देखने-समझने वाले सतीश गुजराल के इस विषय पर चित्रों में तत्कालीन समाज में व्याप्त त्रासदी व पीड़ा रूपक के रूप में प्रस्तुत होती रही हैं। धूसर, काला और सफेद रंगो से बने ऐसे चित्रों में एक तैलचित्र ‘विनाश का गीत’ है जिसमें एक आतंकित पुरुष के चेहरे पर भय, क्रोध और पीड़ा का मिलाजुला भाव दिखाया है। अपने वैविध्यपूर्ण रचनाक्रम में अमूर्त चित्रण और चटकीले रंगों के सुन्दर संयोजन के अलावा वे आकृति प्रधान चित्रों के लिये जाने जाते हैं। जब वे विशेष रूप से निर्मित खुरदुरी सतह पर एक्रेलिक से चित्रांकन करते हैं, तब ये आकृतियां एक दूसरे में विलीन होकर विभिन्न ज्यामितीय आकारों में स्थित होकर रंगों के परस्पर संगत प्रभाव और विभिन्न बिम्बों के आकर्षण से चित्रों की मोहकता बढ़ाती है। उन्होंने अपनी कलाकृतियों में जीव-जन्तुओं और पक्षियों को सहज स्थान देने के साथ इतिहास, लोक कथाओं, पुराणों, प्राचीन भारतीय संस्कृति और विविध धर्मों के प्रसंगों से भी प्रेरणा लिया। पचास के दशक में उन्होंने कृष्ण मेनन, अपने पिता, जवाहरलाल नेहरू और लाला लाजपतराय जैसे कई व्यक्ति चित्र भी बनाए हैं। साठ के दशक में उनके चित्रों की रचना शैली और संरचना बदलने के बाद साल 1968 का कागज के ऊपर काली स्याही और पेन्सिल से बनाया गया श्वेत-श्याम चित्र उनकी आकृतिपरक चित्रकारी का उम्दा नमूना है। एक वास्तुकार के रूप में उन्होंने दुनियाभर के अनेक इमारतों की शानदार वास्तु परियोजनाएं तैयार की हैं। दिल्ली हाईकोर्ट, शास्त्री भवन, गोवा विश्वविद्यालय, लखनऊ का आम्बेदकर मेमोरियल इत्यादि की वास्तुकला उनके बहुप्रशंसित कार्यों में शामिल हैं। उन्होंने नई दिल्ली स्थित बेल्जियम के दूतावास का भी डिजाईन बनाया जिसे ‘इंटरनेशनल फोरम ऑव आर्किटेक्ट्स’ द्वारा बीसवीं सदी की सर्वश्रेष्ठ इमारतों की सूची में स्थान दिया गया है। कला के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 1999 में पद्म विभूषण, तीन बार कला का राष्ट्रीय पुरस्कार (दो बार चित्रकला और एक बार मूर्तिकला के लिये), मेक्सिको का ‘लियो नार्डो द विन्ची’ और बेल्जियम के राजा का ‘आर्डर ऑफ़ क्राउन’ जैसे अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। सतीश गुजराल की आत्मकथा के अतिरिक्त उनके व्यक्तित्व व कृतित्व पर तीन और पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और कई वृत्तचित्र भी बनी हैं। उनकी बड़ी बेटी अल्पना ज्वेलरी डिज़ाइनर तथा दूसरी बेटी रसील एक इंटीरियर डिज़ाइनर हैं।