बज उठी है बंगाल में चुनावी महासंग्राम की रणभेरी

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बाल मुकुन्द ओझा

प.बंगाल में अभी चुनाव आयोग ने विधानसभा चुनावों की तिथियां घोषित नहीं की है मगर  पूरा प्रदेश चुनावी शोर शराबे में डूब गया है। चुनाव की रणभेरी बज उठी है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी कमान संभाल ली है। उनके दौरे शुरू हो चुके है।  मोदी ने लोगों से बंगाल में ममता के  जंगलराज को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया है।प्रधानमंत्री ने अपनी इन रैलियों में घुसपैठ तथा कानून व्यवस्था को भाजपा के मुख्य चुनावी मुद्दों के रूप में सामने रखा। यह चुनाव ममता और मोदी के मध्य  सीधी जंग है। दोनों और से चुनाव की दुंदुभी बज़ चुकी है। तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के लिए यह करो और मरो का चुनाव है। दोनों ही पार्टियां साम दाम दंड भेद के साथ चुनावी संघर्ष में कूद चुकी है।

विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं वैसे वैसे भाजपा और टीएमसी के बीच सियासी टकराव बढ़ता ही जा रहा हैं। भाजपा ने विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए अपना एजेंडा सेट करना शुरू दिया है तो टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी अपनी सत्ता को बचाए रखनी की कवायद में है। देश की सत्ता पर भाजपा तीसरी बार काबिज है, लेकिन बंगाल में अभी तक कमल नहीं खिल सका है। नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा को बंगाल में उम्मीद की किरण दिखाई दी है, जिसके चलते 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी के सियासी दुर्ग में भाजपा अपनी सियासी बेस को बनाने की एक्सरसाइज शुरू कर दी है। बंगाल में एनडीए का मतलब भाजपा और इंडिया गठबंधन का अर्थ टीएमसी है। लोकसभा और विधान सभा में कांग्रेस और कम्युनिष्टों का सूपड़ा साफ़ हो चुका है। बंगाल में एनडीए का मतलब भाजपा और इंडिया गठबंधन का अर्थ टीएमसी है। लोकसभा और विधान सभा में कांग्रेस और कम्युनिष्टों का सूपड़ा साफ़ हो चुका है। ममता इंडिया में जरूर है मगर बंगाल के चुनाव में किसी भी सहयोगी पार्टी को पास फटकने नहीं दे रही है। एनडीए में भाजपा को छोड़कर किसी सहयोगी दल का अस्तित्व नहीं है। ऐसे में भाजपा और टीएमसी में सीधा मुकाबला होगा। ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है तो भाजपा ममता की चालों को धराशाही करने के लिए कमर कस ली है। बंगाल का चुनाव बेहद दिलचस्प और धूम धड़ाके वाला होगा और पूरे देश की निगाह इस पर टिकी होंगी। 

बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष  कराना चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती है। यहाँ रक्तरंजित चुनाव से इंकार नहीं किया जा सकता। प्रमुख दलों ने अभी से बड़ी बड़ी रैलियों का आगाज कर  प्रचार शरू कर दिया है। पार्टियों में रोज ही मारकाट होती है। एक दूसरे पर हमले हो रहे है। बीजेपी जिस तरह से ममता बनर्जी को हिंदुत्व के मुद्दे पर घेरने में जुटी है, उसके जवाब में ममता बनर्जी बंगाल की अस्मिता का मुद्दा बना सकती है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भी ममता बनर्जी ने बीजेपी के हिंदुत्व पॉलिटिक्स के सामने मां, माटी और मानुष के भरोसे सियासी जंग फतह करने में कामयाब रहीं। बीजेपी 2026 के चुनाव में जिस तरह हिंदुत्व के मुद्दे को धार देने में जुटी है, उसके चलते माना जा रहा है कि ममता बनर्जी फिर से बंगाल अस्मिता वाले हथियार का इस्तेमाल कर सकती हैं।

प. बंगाल में 34 साल तक एक छत्र शासन करने वाले कम्युनिष्टों को सत्ताच्युत कर ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी तृणमूल का झंडा फहराया। ममता की टीएमसी 2011 से पश्चिम बंगाल में सत्ता में है। इससे पूर्व 1977 से 2011 तक पहले दिग्गज नेता ज्योति बासु और फिर बुद्धदेब भट्टाचार्य ने राज सत्ता की कमान संभाली थी। 2011 के चुनाव में ममता ने कम्युनिष्टों का शासन ऐसा उखाड़ा की आज उनका नाम लेवा भी वहां नहीं बचा है। देश की सियासत में दीदी के नाम से मशहूर हुई ममता बनर्जी। ममता को बंगाल की शेरनी भी कहा जाता है। सूती धोती और मामूली चप्पल ममता की पहचान है। वे विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं। पार्टी हाई कमान भी वे स्वयं हैं और अपने सभी प्रकार के निर्णय खुद ही लेती हैं। इसमें किसी का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करतीं।  ममता धरातलीय नेता हैं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी, 1998 को की थी। उस दौरान  ममता को लगा था की कांग्रेस में रहकर कम्युनिष्टों को नहीं हटाया जा सकता। तभी वो कांग्रेस से अलग हो गयी और अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना ली।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी  32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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