निशान बचा है, नाम गायब है
आलोक पुराणिक
वक्त क्या क्या दिखाता है साहब, एक वक्त के वीआईपी किसी दौर में इस कदर गुमनाम हो जाते हैं कि कोई नाम तक ना जानता।
हुमायूं टोंब के ठीक सामने एक मकबरानुमा भवन है, कोई दफन होंगे इसमें। कौन, नहीं पता।
निजामुद्दीन औलिया के आसपास जो भी दफन है, वह एक लेवल का वीआईपी ही रहा होगा, निजामुद्दीन की दरगाह के पास की जगह अपने अपने वक्तों के वीआईपी लोगों के लिए ही सुरक्षित थी। यूं यह वक्त का हिसाब रहा कि वीआईपी हज्जाम भी जगह पा गये इस इलाके में।
इस इलाके में कई छोटे बड़े मकबरे हैं, जिनमें दफन बंदों का कोई पता नहीं मिलता।
हुजूर आइये कभी घूम लीजिये इस इलाके में, बड़े बड़ों के नाम गायब हैं, काम में अगर दम है, तो वह जरुर आगे चला जाता है। शायरी बहुत लंबे वक्त तक आगे जाती है, शायर के नाम के साथ।
वाक ए दिल्ली की हेरिटेज-लिटरेचर वाक में सिर्फ इतिहास-लिटरेचर नहीं है, कुछ अध्यात्म है, कुछ उदासी है, कुछ बहुत कुछ है।
खैर नाम-निशां पर उस्ताद दाग का एक शेर सुनिये-
कोई नाम-ओ-निशाँ पूछे तो ऐ क़ासिद बता देना
तख़ल्लुस ‘दाग़’ है वो आशिक़ों के दिल में रहते हैं
दाग़ देहलवी
-कासिद यानी पत्रवाहक
बात और भी हैं, वाक और भी हैं