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ईरान का इस्लामिक दुनिया से रिश्तों का जटिल जाल

-विवेक शुक्ला

रमजान के महीने में राजधानी दिल्ली में इस्लामिक देशों के राजनयिक आमतौर पर चाणक्यपुरी में स्थित सूडान एंबेसी में नमाज अदा करते हैं। पर ईरानी राजनयिक अपनी एंबेसी में ही नमाज अदा करते हैं। ईरान और शेष इस्लामिक संसार में दूरियों को इस उदाहरण से कुछ हद कर समझा जा सकता है। दरअसल, ईरान के इस्लामिक राष्ट्रों के साथ संबंध जटिल और बहुआयामी हैं। 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से ईरान ने शिया इस्लाम को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया है, जो सुन्नी-बहुल मुस्लिम दुनिया के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करता है। ईरान की सरकार खुद को इस्लामिक एकता का समर्थक बताती है लेकिन वास्तव में वह शिया प्रभाव को बढ़ाने की कोशिश करती रहती है।

ईरान की इस्लामिक क्रांति ने उसे मुस्लिम दुनिया में एक वैकल्पिक मॉडल के रूप में स्थापित किया, जहां वह खुद को साम्राज्यवाद-विरोधी और फिलिस्तीन समर्थक के रूप में पेश करता है। हालांकि, शिया-सुन्नी विभाजन के कारण ईरान की सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य सुन्नी-बहुल देशों के साथ प्रतिद्वंद्विता गहरी है। ईरान को सुन्नी राष्ट्रों द्वारा “शिया विस्तारवादी” के रूप में देखा जाता है, जबकि ईरान इन देशों को अमेरिका के कठपुतली मानता है। 1980 के दशक से ईरान ने लेबनान में हिजबुल्लाह, इराक में शिया मिलिशिया, सीरिया में असद शासन और यमन में हूती विद्रोहियों को समर्थन देया। यह नेटवर्क ईरान को क्षेत्रीय शक्ति प्रदान करता है लेकिन इसे आतंकवाद का प्रायोजक भी बनाता है, जैसा कि अमेरिका और उसके सहयोगी दावा करते हैं।

सऊदी अरब और ईरान में पुरानी अदावत है। दरअसल सऊदी अरब में एक शिया मौलवी को 2016 में फांसी की सजा दी गई थी और इसी मुद्दे पर 2016 में सऊदी अरब और ईरान के कूटनीतिक संबंध खत्म हो गए थे। तब से ये दोनों देश एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए थे। सऊदी अरब खुद को सारी दुनिया के सुन्नी मुसलमानों का रहनुमा मानता है और ईरान अपने को शिया मुसलमानों का। आप जानते हैं कि दोनों ही देश तेल उत्पादक देश हैं। दोनों ही देश अपने व्यावसायिक दिलचस्पी के वर्चस्व की लड़ाई लड़ते हैं। क्या सऊदी अरब और ईरान कभी चीन से यह पूछने की हिमाकत करेंगे कि चीन में मुसलमानों पर भीषण अत्याचार क्यों हो रहे हैं? वे कब थमेंगे? चीन ने अपने मुस्लिम बहुल शिनजियांग प्रांत में रहने वाले मुसलमानों को पूरी तरह से कसा हुआ है। उन्हें खानपान के स्तर पर वह सब कुछ करना पड़ा रहा है, जो उनके इस्लाम धर्म में पूर्ण रूप से निषेध है।

इस बीच, ईरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान जैसे सुन्नी बहुल देशों के साथ व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाता है। वह मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे सुन्नी समूहों से भी संबंध रखता है, ताकि अमेरिकी प्रभाव का मुकाबला कर सके। लेकिन कुल मिलाकर, ईरान की अलगाववादी स्थिति बनी हुई है, विशेष रूप से सुन्नी अरब देशों के साथ। हालांकि यह बताना जरूरी है कि उसकी पाकिस्तान से तनातनी भी चलती रहती है। ईरान ने पाकिस्तान में 2021 में सर्जिकल स्ट्राइक किया था। इस हमले का नतीजा यह हुआ कि ईरान ने अपने कुछ अपहृत कर लिए गए नागरिकों को “जैश उल अदल” नाम के आतंकी संगठन के कब्जे से छुड़वा लिए। जैश अल-अदल के आतंकी पाकिस्तान की ईरान से लगती सरहद पर लगातार हमले बोल रहे हैं। उनके 2019 के हमले में 27 ईरानी नागरिक मारे गए थे।

ओआईसी में ईरान की स्थिति

ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) 1969 में स्थापित विश्व का दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है, जिसमें 57 मुस्लिम बहुल देश शामिल हैं। ईरान इस संगठन का संस्थापक सदस्य होने के साथ-साथ शुरू से ही एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली देश रहा है। हालांकि, ईरान की स्थिति हमेशा विवादास्पद और उतार-चढ़ाव वाली रही है। सऊदी अरब के साथ क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता ने ओआईसी में ईरान की भूमिका को बार-बार प्रभावित किया। उसे 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान ओआईसी में अलग-थलग करने की कोशिशें हुईं।

फिर भी, ईरान ने इस संगठन में अपनी सक्रियता कभी कम नहीं होने दी। वह फिलिस्तीन के समर्थन, कश्मीर मुद्दे और इस्लामोफोबिया के खिलाफ लगातार मुखर रहा। हाल के वर्षों में, खासकर 2024-2025 में इजराइल के साथ बढ़ते तनाव और ईरान पर हुए हमलों के बाद उसने ईरान ओआईसी से मजबूत एकजुटता की मांग की। कतर, मलेशिया, इंडोनेशिया और तुर्की जैसे देशों ने कई बार ईरान के पक्ष में आवाज उठाई, लेकिन सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के प्रभाव के कारण संगठन अक्सर निर्णायक कार्रवाई करने में असमर्थ रहा।

ईरान ओआईसी को मुस्लिम दुनिया की एकता का मंच मानता है, लेकिन ईरान की स्थिति प्रभावशाली तो है, परंतु पूर्ण नेतृत्व वाली नहीं है।

आज ईरान के प्रमुख सहयोगी हैं: लेबनान में हिजबुल्लाह, गाजा में हमास और फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद, यमन में हूती, इराक में पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज। ये समूह ईरान को इजराइल और अमेरिका के खिलाफ “प्रतिरोध” प्रदान करते हैं। ईरान रूस और चीन से भी करीब है, जो उसे प्रतिबंधों से बचाने में मदद करते हैं।

दूसरी ओर, उसका सुन्नी देशों के साथ तनाव जारी है। सऊदी अरब के साथ यमन युद्ध और इराक में प्रभाव की लड़ाई ने संबंधों को बिगाड़ा है। हालांकि, 2023 में चीन की मध्यस्थता से कुछ सामान्यीकरण हुआ, लेकिन इजराइल-हमास युद्ध ने फिर तनाव बढ़ाया। ईरान खुद को मुस्लिम दुनिया का रक्षक बताता है लेकिन कई मुस्लिम राष्ट्र उसे संदेह की नजर से देखते हैं क्योंकि वह क्षेत्रीय अस्थिरता फैलाता है।

ईरान में आजकल चल रही उथल-पुथल इस्लामिक दुनिया के साथ उसके संबंधों को और जटिल बना रही है। पिछले दिसंबर से तेहरान के ग्रैंड बाजार में दुकानदारों की हड़ताल से शुरू हुए विरोध प्रदर्शन तेजी से देशव्यापी हो गए, सभी 31 प्रांतों में फैल गए। शुरुआत में मुद्रा (रियाल) के पतन और 40% महंगाई के खिलाफ थे लेकिन जल्दी ही राजनीतिक हो गए। प्रदर्शनकारी देश के शिखर नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, रेजा पहलवी (पूर्व शाह के पुत्र) के पक्ष में चिल्ला रहे हैं और शासन के अंत की मांग कर रहे हैं।

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)

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