
– हृदयनारायण दीक्षित
गाँधीजी जीवित होते तो आज 156 साल के होते। परसों उनकी पुण्यतिथि थी। वे बहुत गहराई से याद किए गए। उन्होंने विश्व इतिहास में हस्तक्षेप किया और काल की अखण्ड सत्ता को प्रभावित किया। काल है भी अखण्ड सत्ता। सारी घटनाएं समय के भीतर होती हैं। अथर्ववेद (19.53-54) में भृगु कहते हैं “काल-अश्व विश्व-रथ का संवाहक है। काल ही पिता है, वही आगे पुुत्र होता है। काल में प्राण हैं, मन हैं, सारे नाम हैं, काल की अनुकूलता ही आनंद है। काल स्वयंभू है। काल के द्वारा ही भूत और भविष्य पैदा हुए हैं आदि आदि।”
समय पकड़ में नहीं आता। घटनाएं घटती हैं, घटना अतीत है। अतीत की घटनाओं का यथातथ्य संकलन इतिहास है। प्राचीन राष्ट्र की घटनाएं करोड़ों की संख्या में होती हैं। भारत ऐसा ही राष्ट्र है। मूलभूत प्रश्न है कि घटनाओं के संकलन में संकलनकर्ता की रूचि क्या है? रूचि क्यों है? कुछेक विद्वान् युद्ध प्रिय होते हैं, वे युद्धों का इतिवृत्त संकलित करते हैं। कुछ विद्वान् प्रकृति प्रेमी होते हैं, वे प्राकृतिक परिवर्तनों के संकलन को इतिवृत्त का विषय बनाते हैं। मार्क्सवादी सोच के विद्वान् उत्पादन पद्धति की विवरणी का संकलन करते हैं। इतिहास अतीत का दर्पण होता है लेकिन इतिहास लेखन या संकलन की कोई भी शैली प्राचीन समाज या राष्ट्र का सम्पूर्ण विवरण नहीं हो सकती। जैसे समुद्री लहरों की गणना असंभव होती है वैसे ही इतिहास संकलन का काम भी बड़ा जटिल है। इसलिए इतिहास का रूप स्वरूप और इतिहास खोजना बहुत कठिन काम है।
भारत में ‘इतिहास के इतिहास’ पर बहसें चलती हैं। यूरोपीय विद्वान भारत पर इतिहास की उपेक्षा का आरोप लगाते हैं। मैक्समूलर ने लिखा, “हिन्दू दार्शनिकों की एक जाति थी। उनका संघर्ष विचारों का संघर्ष था। उनका अतीत सृष्टि की समस्या थी, उनका भविष्य अस्तित्व का प्रश्न था। यह कहना सही है कि विश्व के राजनैतिक इतिहास में भारत का कोई स्थान नहीं है।” मैक्समूलर को वैदिक और पौराणिक सहित प्राचीन इतिहास में राज्यव्यवस्था नहीं दिखाई पड़ती। एलफिन्सटन को सिकंदर के हमले के पूर्व किसी भी घटना का निश्चित समय नहीं दिखाई पड़ता। उन्होंने 1839 में लिखा, “भारतीय इतिहास में सिकंदर के आक्रमण के पूर्व किसी सार्वजनिक घटना की तिथि निश्चित नहीं की जा सकती है।” विटरनिट्ज यहां काव्य, नायकत्व और इतिहास का घालमेल देखते हैं। अलबेरूनी के आरोप ज्यादा सख्त है कि “हिन्दू चीजों (घटनाओं) के ऐतिहासिक क्रम पर अधिक ध्यान नहीं देते। वे अपने सम्राटों के काल क्रमानुसार उत्तराधिकार के वर्णन में लापरवाह है।”
गांधीजी को यह सब खासा बुरा लगा था।
राष्ट्रबोध की वास्तविक शर्त सच्चा इतिहास बोध है। गणित, ज्योतिष, चिकित्सा आदि के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियां विश्वख्यात थीं। भारत ने इतिहास संकलन की अपनी विशेष परम्परा विकसित की थी लेकिन यूरोपीय तर्ज के इतिहासविद् भारत को इतिहासविहीन बता रहे हैं। गांधीजी राजाओं के विवरण को सच्चा इतिहास नहीं मानते थे। उन्होंने हिन्द स्वराज में लिखा “इतिहास जिस अंग्रेजी शब्द (हिस्ट्री) का तरजुमा है और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की तवारीख होता है। हिस्ट्री में दुनिया के कोलाहल की ही कहानी मिलेगी। राजा लोग कैसे खेलते थे? कैसे खून करते थे? कैसे वैर करते थे, यह सब हिस्ट्री में मिलता है।” गांधीजी ने यूरोपीय इतिहास की अंतर्वस्तु को ठीक ही सिर्फ खूनखराबे का संग्रह बताया है।
अतीत और वर्तमान दो नहीं हैं, वर्तमान अतीत का ही विस्तार है। अतीत निजÊव सत्ता नहीं है, वर्तमान बीते प्राणवान समय का ही चेहरा है। इसलिए पुराने समय के पर्वत, वन उपवन, पशु, पक्षी और ग्रहदशा तथा गीत, नृत्य भी वर्तमान काल में किसी न किसी रूप में मौजूद रहते ही हैं। इतिहास और वर्तमान का सम्बंध अविच्छिन्न है। इतिहास में मनुष्य के कर्म अनुभव होते हैं। भूलें-चूकें और जय-पराजय होती हैं। मनुष्य उनसे सीखता है। वर्तमान की वस्तुनिष्ठ व्याख्या का उपकरण भी इतिहास ही है। इतिहास मनुष्य जीवन की प्रयोगशाला है। समाज इसी प्रयोगशाला के निष्कर्षो के अनुुसार सही, गलत, करणीय या अकरणीय और अनुकरणीय कार्यो विचारों की सूची बनाता हैं। इसलिए इतिहास संकलन का काम वैज्ञानिक जैसा है। लेकिन दोनों के लक्ष्य में आधारभूत अन्तर हैं। विज्ञान प्रकृति का विश्लेषण करता है, उसके निष्कर्ष अंतिम नहीं होते। प्रकृति विराट है, यहां अनंत रहस्य हैं। विज्ञान द्वारा जाना गया कोई भी तथ्य सम्पूर्ण या अंतिम सत्य नहीं होता। इतिहास ‘हो चुके’ का विवरण है। अतीत में अब कुछ भी नया होने की संभावना नहीं है। जो हो गया, उसी का तथ्यगत संकलन इतिहास है।
गांधीजी इतिहास निर्माता थे लेकिन स्वयं एक अच्छे इतिहास लेखक भी थे। अनेक विद्वानों ने गांधीजी की लिखी “दक्षिण अफ्रीका के सत्याग्रह का इतिहास” पुस्तक की प्रशंसा की है। गांधीजी की इस किताब का पहला अध्याय है ‘भूगोल’। इतिहास की घटनांए एक खास भू क्षेत्र पर घटित होती हैं। भू क्षेत्र का रूप स्वरूप स्थायी नहीं रहता। उत्पादन के साधनों में भी परिवर्तन होते हैं। इसलिए इतिहास के सम्यक् अध्ययन में भूगोल की महत्ता है। वैदिक कवि भी अपने परिवेश, नदियों, पर्वतों का दिल खोल कर वर्णन करते थे। साथ में तत्कालीन अर्थव्यवस्था का काव्य बिम्ब भी खींचते थे। गांधीजी ने भी दक्षिण अफ्रीका के तत्कालीन अर्थतंत्र का वर्णन किया-दक्षिण अफ्रीका के गाय और बैल हिन्दुस्तान के गाय बैलों से से अधिक बड़े और मजबूत होते हैं।” दक्षिण अफ्रीका में अंगूर हैं, अन्य मीठे फल हैं आम भी हैं। लेकिन गांधीजी के अनुसार आमों की गुठलियां हिन्दुस्तानी ही ले गये थे। गांधीजी ने इतिहास लेखन में भाषा को भी प्रमुख स्थान दिया है। मार्क्सवादी चिन्तक डाॅ0 रामविलास शर्मा ने याद दिलाया है “जो लोग नस्लवादी दृष्टि से इतिहास लिखते हैं उनके लिए अफ्रीका का इतिहास काले आदमियों का इतिहास है। गांधीजी का दृष्टिकोण इससे भिन्न है। वह काले आदमियों में उनकी भाषाओं और जातियों की पहचान करते हैं।”
अध्ययन के सभी विषयानुशासन मनुष्य के गढ़े हैं, मनुष्य के लिए हैं। वृहत्तर मानवता का लोकमंगल ही सभी विषयों के ज्ञान का लक्ष्य है। इतिहास में लोकमंगल साधने का कर्मयोग और व्यवहार शास्त्र पसरा हुआ है। स्वाभाविक ही इतिहास लेखन, संकलन और अध्ययन का कार्य लोकमंगल के लक्ष्य से जुड़ा होना चाहिए। मूलभूत प्रश्न यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप की इतिहास देखने की प्राचीन दृष्टि क्या थी? क्या मिथकीय ही थी? क्या तथ्यों को झुठलाने की लत थी? क्या महाकाव्यों पुराणों और उसके भी पहले रचे गए वैदिक साहित्य के नायक काल्पनिक ही हैं? पूर्वजों की ऐसी ही इतिहास दृष्टि क्यों थी?
आधुनिक इतिहासकारों का एक वर्ग इतिहास में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को सही और जरूरी मानता है। इस दृष्टिकोण से वैदिक साहित्य-इतिहास में क्या खामियां हैं? क्या मार्क्सवादी इतिहास लेखन ही वैज्ञानिक है? इस तरह तो कार्ल मार्क्स के पहले का समूचा इतिहास लेखन अवैज्ञानिक होगा? ऐसी प्रश्नावली बड़ी हो सकती है। मसलन क्या पुरातात्विक साक्ष्य ही प्रमाण है? शब्द अनुभूति श्रुति स्मृति क्यों बकवास है? उसी कालखण्ड का प्रेमपूर्ण समाज क्यों महत्वपूर्ण नहीं है?
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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