
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील (व्यापार समझौता) को लेकर देश की राजनीति में बहस तेज है। कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जैसे विपक्षी दल इस समझौते को भारत विरोधी करार दे रहे हैं, किंतु आर्थिक तथ्यों और हालिया परिस्थितियों का विश्लेषण यह संकेत देता है कि यह समझौता भारत के हितों को ध्यान में रखकर किया गया एक रणनीतिक और व्यावहारिक कदम है। विशेष रूप से उस समय जब अमेरिका द्वारा बढ़ाए गए टैरिफ ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया। वस्तुत: यह समझौता नुकसान की भरपाई और भविष्य की स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जाना चाहिए।
टैरिफ का आर्थिक झटका और भारत की चुनौती
अमेरिका द्वारा पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर भारत के कई उत्पादों पर 25 फीसद से 50 फीसद तक टैरिफ बढ़ाए जाने का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ा। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार रहा है, जहां से भारत को लगभग 86.5 अरब डॉलर का वार्षिक निर्यात मिलता है। मई से अक्टूबर 2025 के बीच निर्यात में 28.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जोकि 8.83 अरब डॉलर से घटकर 6.31 अरब डॉलर तक पहुंच गया।
टेक्सटाइल, ज्वेलरी, इंजीनियरिंग सामान और स्टील जैसे प्रमुख क्षेत्रों पर इसका सीधा असर पड़ा। विशेष रूप से टेक्सटाइल, जूते, मणि-मोती और सीफूड जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों में गिरावट अधिक रही, क्योंकि इन उत्पादों का बड़ा हिस्सा 50 फीसद टैरिफ के दायरे में आ गया। अनुमान है कि 60.2 अरब डॉलर के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लागू होने से लगभग 30 अरब डॉलर यानी करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान हुआ।
यदि व्यापक आर्थिक प्रभावों का आकलन किया जाए तो यह नुकसान शेयर बाजार में गिरावट, विदेशी निवेश का पलायन, रुपये की कमजोरी और जीडीपी वृद्धि में कमी जैसे कई अप्रत्यक्ष नुकसान के रूप में भी सामने आया। जुलाई 2025 में 25 फीसद टैरिफ की घोषणा के बाद निफ्टी और सेंसेक्स में 3–5 प्रतिशत की गिरावट आई। विदेशी निवेशकों ने नौ दिनों में 27,000 करोड़ रुपये और पूरे महीने में 42,000 करोड़ रुपये तक निकाले। वर्ष 2025 में कुल एफआईआई आउटफ्लो 1.7 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था।
रुपये की गिरावट और बढ़ता आयात बोझ
टैरिफ का एक और बड़ा असर भारतीय रुपये पर पड़ा। अगस्त 2025 में रुपया 88.31 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। यदि पहले के स्तर 83–84 रुपये प्रति डॉलर से तुलना की जाए, तो लगभग 5 रुपये की गिरावट ने भारत के आयात बिल पर सालाना 4–5 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल दिया। फरवरी 2026 तक रुपये की गिरावट से जुड़े कुल नुकसान का अनुमान लगभग 8.3 लाख करोड़ रुपये तक लगाया गया। यह स्थिति सिर्फ विदेशी व्यापार तक सीमित नहीं रही, इसका असर घरेलू महंगाई, उत्पादन लागत और उपभोक्ता मांग पर भी पड़ा। गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे औद्योगिक राज्यों के एमएसएमई सेक्टर पर विशेष दबाव देखा गया, जहां लाखों नौकरियां जोखिम में आ गईं।
जीडीपी पर असर और कुल आर्थिक नुकसान
भारत की जीडीपी 2024-25 में 330.68 लाख करोड़ रुपये थी और 2025-26 में इसके 7.4 प्रतिशत की दर से बढ़कर 357.14 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। लेकिन बढ़े हुए टैरिफ के कारण जीडीपी वृद्धि में 0.4 फीसद से एक प्रतिशत तक की कमी का अनुमान लगाया गया। 0.5 फीसद की कमी का मतलब लगभग 1.8 लाख करोड़ रुपये का सीधा नुकसान है। यदि निर्यात हानि (2.5 लाख करोड़ रुपये), एफआईआई आउटफ्लो (1.7 लाख करोड़ रुपये), रुपये की गिरावट (4 लाख करोड़ रुपये) और जीडीपी नुकसान (करीब 2 लाख करोड़ रुपये) को जोड़कर देखा जाए, तब उस स्थिति में फरवरी 2026 तक कुल आर्थिक नुकसान लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के आसपास आंका गया है। यह एक बड़ा संकेत है कि वैश्विक व्यापार नीतियों में बदलाव का असर भारत जैसे विकासशील देश पर कितना गहरा हो सकता है।
ऐसे समय में समझौते का महत्व
यही वह संदर्भ है जिसमें भारत-अमेरिका ट्रेड डील का महत्व समझा जाना चाहिए। आज ये समझौता व्यापार बढ़ाने का माध्यम तो है ही, साथ में आर्थिक नुकसान को रोकने और स्थिरता लाने की रणनीति भी है। खास बात यह है कि भारत ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया है, विशेष रूप से कृषि क्षेत्र में। अमेरिका लंबे समय से चाहता था कि भारत अपने कृषि बाजार को अधिक खोल दे, किंतु भारत ने अपने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए उन शर्तों को स्वीकार नहीं किया। वस्तुत: यह दृष्टिकोण इस बात का संकेत है कि भारत व्यापारिक समझौतों में अपनी प्राथमिकताओं को प्राथमिकता दे रहा है। यह नई आत्मनिर्भरता की परिभाषा है।
निवेश, तकनीक और नए अवसर
केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को दोनों देशों के लिए संभावनाओं से भरा बताया है। उनका मानना है कि अगले 5–6 वर्षों में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार 500 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। यह तकनीक और निवेश के नए रास्ते खोलने वाला कदम है। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डेटा सेंटर जैसे उभरते क्षेत्रों में इस डील से बड़े निवेश की संभावना है। इससे भारत वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई गति मिलेगी।
एमएसएमई और रोजगार पर सकारात्मक असर
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) का मानना है कि इस समझौते से एमएसएमई सेक्टर को अमेरिकी बाजार में नए अवसर मिलेंगे। कपड़ा, चमड़ा, ज्वेलरी, सस्ती दवाइयां, ऑटोमोबाइल और इंजीनियरिंग सामान जैसे क्षेत्रों में भारतीय उत्पाद अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकेंगे। इससे उत्पादन बढ़ेगा और युवाओं व महिलाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। एमएसएमई भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। यदि इस सेक्टर को स्थिर और बड़ा बाजार मिलता है, तो इसका असर सीधे तौर पर रोजगार और आय पर पड़ेगा।
रणनीतिक संतुलन और आत्मनिर्भरता
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य संजीव सान्याल ने स्पष्ट किया है कि भारत अब हर चीज खुद बनाने के पुराने मॉडल से आगे बढ़ चुका है। अब आत्मनिर्भरता का मतलब है कि जो चीजें रणनीतिक रूप से जरूरी हैं, उन्हें देश में मजबूत किया जाए और बाकी क्षेत्रों में वैश्विक सहयोग लिया जाए। यह दृष्टिकोण बताता है कि भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका को समझते हुए व्यवहारिक और संतुलित निर्णय ले रहा है। सस्ती ऊर्जा, सस्ते संसाधन और मजबूत व्यापारिक संबंध भारत की प्राथमिकता हैं। इसलिए जब हम आर्थिक आंकड़ों और वास्तविक परिस्थितियों को देखते हैं, तो स्पष्ट होता है कि यह ट्रेड डील भारत के लिए एक रक्षात्मक और आक्रामक दोनों तरह की रणनीति का हिस्सा है।
ऐसे में कहना यही होगा कि एक ओर यह टैरिफ से हुए भारी नुकसान को कम करने का प्रयास है, तो दूसरी ओर यह भविष्य में निवेश, तकनीक और निर्यात के नए अवसर खोलने वाला कदम है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अपने कृषि हितों से समझौता किए बिना यह समझौता किया है, इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि यह डील व्यापारिक समझौता से अधिक भारत की आर्थिक कूटनीति का परिपक्व उदाहरण है, जहां देश ने अपने हितों की रक्षा करते हुए वैश्विक अवसरों को अपनाने का संतुलित मार्ग अपनाया है।

डॉ. मयंक चतुर्वेदी
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
