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‘हे,राम! चित्रकूट में मंदाकनी हो गई मैली’

मुकुंद

त्रेता युग से लेकर अब तक दशरथ नंदन राम सबके हैं। अयोध्या के राजा राम ने अपने वनवास के 14 वर्ष का लंबा हिस्सा चित्रकूट में गुजारा है। जनश्रुति है कि वह वैदेही सीता और अपने भाई लक्ष्मण के साथ यहां लगभग साढ़े 11 बरस रहे। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बड़े भू-भाग में स्थित चित्रकूट अब वैसा नहीं रहा। बहुत कुछ नहीं, सबकुछ बदल चुका है। अब मंदाकनी नदी हांफने लगी है। मध्य प्रदेश के चित्रकूट क्षेत्र के सती अनुसूया आश्रम की पहाड़ी से निकली मंदाकनी का अस्तित्व खतरे में है। विकास के नाम पर मंदाकनी को आक्सीजन देने वाले औषधीय और गैर औषधीय एक दो नहीं अनगिनत वृक्षों की बलि चढ़ाई जा चुकी है।

भगवान राम त्रेता युग में चित्रकूट आए थे। यह युग लगभग 12,96,000 वर्ष का माना जाता है। सर्वोदय कार्यकर्ता और चित्रकूट के जल-जंगल और जमीन के सशक्त पहरेदार अभिमन्यु भाई (अभिमन्यु सिंह) कहते हैं, ”विनाशकारी विकास ने चित्रकूट की पयस्विनी (पैसुनी) और सरयू नदी को पहले ही लील लिया । यह दोनों पवित्र जलधारा कामदगिरी पर्वत से निकलकर चित्रकूट के राम प्रयाग घाट (राम घाट) में मंदाकनी में मिलती थीं। भगवान राम ने इसी घाट पर अपने पिता दशरथ का तर्पण किया। मंदाकनी को बचाने की जद्दोजहद में मैं अब खुद को हारा महसूस करने लगा हूं।”

अभिमन्यु सिंह कहते हैं, ” कोई साथ नहीं दे रहा। अकेली आवाज का लोग और अफसर मजाक उड़ाने लगे हैं। इस बुढ़ापे में भी लगा रहता हूं। सोचता हूं पैसुनी और सरयू को तो विकास के आंक्राताओं किस्तों में मार डाला। मंदाकनी की हालत देखकर पूरा बदन कांपने लगता है। यह नदी कभी कल-कल कर बहते हुए रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के राजापुर में यमुना नदी में मिलकर जयश्री राम का उद्घोष करते हुए मिल जाती थी। लोग आज भी राजापुर के संगम में तीज त्योहार पुण्य की कामना करते हुए डुबकी लगाकर खुद को धन्य समझते हैं। चित्रकूट के सारे घरों, होटलों और मंदिरों का गंदा पानी इसी मंदाकनी में जाता है। नालों से गुजरता यह पानी मंदाकनी के जल को विषाक्त कर रहा है। ”

ऐसा मानने वाले चित्रकूट में दर्जनों लोग हैं। मगर हर कोई खुलकर बोलने से डरता है। मगर कुछ लोग दबी जुबान बोलते हैं कि साहब कुछ नहीं किया जा सकता। कंधों पर बंदूकें टांगे दादू (ठेकेदार और उनके कारिंदे) और सिपाहियों को लेकर अफसर आते हैं। घंटों में नहीं सिर्फ मिनटों में जेसीबी चलवाकर आदिकालीन वृक्षों को गिराकर वहां से निकलने वाली मिट्टी से मंदाकनी के दोनों ओर पक्की दीवार बनवा रहे हैं। इन लोगों का दावा सच भी है। ऐसा स्फटिक शिला से कुछ पहले अब भी देखा जा सकता है। मंदाकनी का प्राकृतिक प्रवाह भी बदल गया है। कुछ आगे आने पर मंदाकनी की धारा का बड़ा हिस्सा घेरकर स्विमिंग पूल बनवा दिया गया है। अभिमन्यु कहते हैं कि अगर कलयुग में मंदाकनी को बचाने कोई भगीरथ सामने नहीं आया तो ना रहेगी मंदाकिनी ना चित्रकूट।

हैरानी यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चित्रकूट की मंदाकनी नदी को स्वच्छ करने का आह्वान कर चुके हैं। वह मंदाकनी नदी के जल का आचमन भी कर चुके हैं। उन्होंने जल शक्ति मंत्रालय के नमामि गंगे जैसी परियोजनाओं के माध्यम से मंदाकनी और अन्य नदियों को स्वच्छ और बाधा-मुक्त रखने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं। चित्रकूट आगमन पर मंदाकिनी के कटाव का निरीक्षण भी किया है। बावजूद इसके कुछ भी ऐसा नहीं हुआ कि मंदाकनी को बचाया जा सके। यह नदी धर्मपारायण जनता के लिए गंगा है।

यहां प्रमोद वन, आमोद वन, सिरसा वन, शृंगार वन समेत कुल सात वन होते थे। अभिमन्यु कहते हैं कि इनमें कई लगभग-लगभग उजड़ चुके हैं। मगर कामदगिरी वन काफी हद तक बचा हुआ। यह चित्रकूट का सबसे पवित्र वन क्षेत्र है। इसी वन्य क्षेत्र में कामदगिरी पर्वत स्थित है। लोग बारह महीनों इस पर्वत की परिक्रमा (पांच किलोमीटर) करते हैं। अनुसूया वन कभी घना वन क्षेत्र रहा है। विकास की कुल्हाड़ी यहां के वन क्षेत्र में चलती रहती है। जनश्रुति यह भी है इस दण्डकारण्य में तुलसीदास को भगवान राम ने दर्शन दिए थे। लोग यहां आकर नतमस्तक होते हैं। मकर संक्रांति पर कोलकाता से यहां कामदगिरी का परिक्रमा लगाने पहुंचे विजय प्रताप रामघाट में मंदाकनी में मिल रहे नालों को देखकर विचलित हो गए। उन्होंने पवित्र डुबकी नहीं लगाई और एक प्याऊ का जल छिड़ककर आगे बढ़ गए।

चित्रकूट भूदान आंदोलन और सर्वोदय के प्रणेता संत विनोबा भावे, रामायण मेला के प्रथम प्रवर्तक डॉ. राममनोहर लोहिया और चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की नींव डालने वाले नानाजी देशमुख का केंद्र रहा है। संत विनोबा भावे के चित्रकूट से विशेष लगाव के कई पहलू हैं। वह चित्रकूट को परमधाम मानते थे। चित्रकूट की शांत और आध्यात्मिक भूमि को उन्होंने जीवन के उच्च मूल्यों (सेवा, निष्काम कर्म, समन्वय) को जीने और भूदान-ग्रामदान जैसे आंदोलनों की प्रेरणा में बदला। उन्होंने चित्रकूट ने उन्हें सत्ता की राजनीति से ऊपर उठकर जनशक्ति और नैतिक शक्ति पर विश्वास करने की प्रेरणा दी। यह उनके ‘जय जगत’ के नारे और विश्व बंधुत्व के संदेश का भी आधार बना। विनोबा भावे ने चित्रकूट और मंदाकिनी नदी के किनारे गहन आध्यात्मिक चिंतन किया। उनके लिए यह स्थान एकांत और बाहरी दुनिया के शोर से दूर रहकर आत्मा और ईश्वर से जुड़ने का माध्यम बना। 1952 में वो यहां आए और यहीं के होकर रह गए। उन्होंने मंदाकनी के किनारे रहकर प्रकृति और मनुष्य के बीच के संबंध को समझने का प्रयास किया।

चित्रकूट नानाजी देशमुख के लिए कर्म भूमि रहा। उन्होंने दीनदयाल शोध संस्थान के माध्यम से गांवों को आत्मनिर्भर बनाने, शिक्षा, स्वास्थ्य, और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देने पर जोर दिया, ताकि ‘हर हाथ को काम और हर खेत में पानी’ के लक्ष्य के साथ ग्रामीण भारत में वास्तविक बदलाव लाया जा सके। चित्रकूट के अस्तित्व संकट पर सामाजिक कार्यकर्ता आलोक द्विवेदी कहते हैं कि सीवेज का पानी मंदाकनी में नहीं जाना चाहिए। ना ही बेवजह वृक्षों पर कुल्हाड़ी चलनी चाहिए। अभिमन्यु भाई का विचार है कि अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा। संयुक्त (उत्तर प्रदेश-मध्य प्रदेश) चित्रकूट विकास प्राधिकरण बनाकर बदलाव लाया जा सकता है। दोनों सरकारें समान जिम्मेदारी उठाएं और निगरानी तंत्र बनाकर चित्रकूट और मंदाकनी की रक्षा करें।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

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