‘हमेशा ऑनलाइन’ रहने के मायाजाल  की दौड़ में थकते युवा

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 डिजिटल पहचान की अंधी प्रतिस्पर्धा ने मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और वास्तविक अनुभवों को संकट में डाल दिया है। 

सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव युवाओं के मानसिक संतुलन और जीवनशैली पर गहरा असर डाल रहा है। लाइक, व्यूज़ और फॉलोअर्स की प्रतिस्पर्धा ने उन्हें एक अदृश्य दबाव में धकेल दिया है, जहाँ डिजिटल मान्यता ही आत्मविश्वास का आधार बनती जा रही है। घंटों स्क्रोल करना, हर पल ऑनलाइन बने रहना और दूसरों से तुलना करना तनाव, अनिद्रा, चिंता और अकेलेपन को जन्म दे रहा है। वास्तविक रिश्ते, संवाद और अनुभव स्क्रीन के पीछे छूटते जा रहे हैं। समाधान डिजिटल अनुशासन, सीमित उपयोग, नोटिफिकेशन नियंत्रण और वास्तविक दुनिया को प्राथमिकता देने में है। संतुलन ही मानसिक शांति का आधार है।

-डॉ सत्यवान सौरभ

आज का भारतीय समाज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है जहाँ तकनीक अवसर भी दे रही है और संकट भी खड़ा कर रही है। सोशल मीडिया का तेजी से बढ़ता दायरा इस संक्रमणकाल का सबसे बड़ा प्रतीक है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म ने आम लोगों को वह मंच दिया है, जिसकी कल्पना कुछ दशक पहले संभव नहीं थी। लेकिन यह सशक्तिकरण जितनी उम्मीदें लेकर आया था, उतने ही उलझाव उसने मनोवैज्ञानिक और सामाजिक स्तर पर पैदा कर दिए हैं। युवा पीढ़ी लाइक, व्यूज़, फॉलोअर्स और डिजिटल सेलिब्रिटी बनने की सतही चाह में उलझकर मानसिक थकान और सामाजिक दूरी के ऐसे भंवर में फंसती जा रही है जो दिखाई तो नहीं देता, पर भीतर तक कमजोर कर रहा है। भारत में सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ पार कर चुकी है—यह दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल समुदायों में से एक है। यह संख्या जितनी विशाल है, उससे कहीं अधिक विशाल है वह दबाव, जो इसने युवाओं के मन पर डाला है। सुबह उठते ही फोन उठाकर रात को आंख बंद होने तक स्क्रीन पर स्क्रोल करते रहने की आदत आज सामान्य लगती है, लेकिन यह सामान्यता ही सबसे बड़ा खतरा बन चुकी है। लाइक-व्यूज़ के माध्यम से मान्यता पाने की चाह युवाओं को धीरे-धीरे वास्तविक जीवन से काट रही है।

सोशल मीडिया का सबसे आकर्षक और सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह एक समानांतर दुनिया रचता है—एक ऐसी दुनिया जहाँ आप अपनी इच्छानुसार छवि गढ़ सकते हैं, अपनी वास्तविकता से अलग व्यक्तित्व प्रदर्शित कर सकते हैं और अपनी जिंदगी को चमकदार फ्रेम्स में पिरो सकते हैं। लेकिन इस दुनिया में स्वीकृति की कीमत बहुत भारी है। कुछ सेकंड का ध्यान पाने के लिए लगातार नए पोस्ट, नई तस्वीरें, नए रील्स और नई अभिव्यक्तियाँ देनी पड़ती हैं। युवाओं में यह दबाव बढ़ रहा है कि यदि उनकी पोस्ट को पर्याप्त लाइक या व्यूज़ नहीं मिले, तो वे किसी अदृश्य प्रतियोगिता में पिछड़ गए हैं। यह डिजिटल पहचान की एक ऐसी प्रतिस्पर्धा है जिसमें न कोई स्पष्ट लक्ष्य है, न कोई अंत, और न ही कोई वास्तविक विजेता। हर युवा अपनी ही छवि की तुलना दूसरों से करता है। किसी और की मुस्कुराहट, जीवनशैली, शरीर, छुट्टियाँ, करियर, रिश्ते—सब कुछ तुलना का आधार बन जाता है। यह तुलना आत्म-सम्मान को चोट पहुंचाती है और धीरे-धीरे युवा महसूस करने लगते हैं कि वास्तविक जीवन में जितना वे पाते हैं, वह पर्याप्त नहीं है।

कई सर्वे बताते हैं कि 18–34 आयु वर्ग के 59% युवा स्वीकार करते हैं कि सोशल मीडिया उनके मानसिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है। इनमें चिंता, तनाव, अनिद्रा, ओवरथिंकिंग, अत्यधिक उत्तेजना और आत्म-संदेह जैसी समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। युवाओं के दिमाग में हर समय दो सवाल घूमते रहते हैं—इस पोस्ट पर कितने लाइक आए? लोग मेरे बारे में क्या सोच रहे होंगे? इन सवालों का बोझ इतना बढ़ चुका है कि वास्तविक उपलब्धियाँ भी कई बार डिजिटल प्रतिक्रिया के बिना युवा को अधूरी लगती हैं। आत्मविश्वास की नींव खुद के मूल्य पर नहीं, बल्कि दूसरों की डिजिटल स्वीकृति पर टिकने लगती है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि सोशल मीडिया पर अधिक समय बिताने वाले युवाओं में अवसाद और अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ी है। बाहर से वे “कनेक्टेड” दिखते हैं, लेकिन भीतर वे अत्यधिक अलगाव महसूस करते हैं। वास्तविक बातचीत में कमी आने से भावनात्मक अभिव्यक्ति भी कमजोर हो गई है। आज कई परिवारों में यह आम दृश्य है कि भोजन की मेज पर बैठे सभी लोग मोबाइल स्क्रीन में झुके हैं। माता-पिता कभी समझ नहीं पाते कि बच्चे किस पोस्ट को बनाने में इतना वक्त लगा रहे हैं, या क्यों एक तस्वीर को कई बार परफेक्ट एंगल से लेना आवश्यक है। युवा पीढ़ी की भावनाएँ, संवाद शैली और प्राथमिकताएँ तेजी से डिजिटल स्वरूप में बदल रही हैं, जबकि बुजुर्ग अभी भी वास्तविक संवाद और संबंधों को महत्व देते हैं। इस पीढ़ीगत अंतर ने परिवारों को भावनात्मक रूप से दूर कर दिया है।

दोस्तों के साथ घूमने जाना अब एक अनुभव नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने का अवसर बन गया है। हर जगह “पोस्ट करने लायक” तस्वीर ढूंढना मानो एक अनिवार्य कार्य बन गया है। रिश्ते धीरे-धीरे वास्तविकता से हटकर प्रदर्शन के माध्यम बन रहे हैं। कई युवा स्वीकार करते हैं कि वे सोशल मीडिया पर दिखने वाले “परफेक्ट रिश्तों” से प्रभावित होकर अपने संबंधों को लेकर अनावश्यक उम्मीदें पाल लेते हैं, जो बाद में निराशा का कारण बनती हैं।

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या है—हमेशा उपलब्ध रहने का दबाव। नोटिफिकेशन की लगातार झंकार, मैसेज का तुरंत जवाब देने की आदत, किसी नए ट्रेंड में पीछे न छूटने का डर, और हर समय अपडेटेड दिखने की चाह युवाओं की मानसिक ऊर्जा को धीरे-धीरे खत्म कर रही है। डिजिटल थकान आज एक वास्तविक समस्या बन चुकी है। कई युवा रात को देर तक नींद नहीं ले पाते क्योंकि उन्हें लगता है कि वे कुछ मिस कर देंगे। दिन में उनकी एकाग्रता भंग रहती है क्योंकि दिमाग हर समय स्क्रीन की ओर खिंचता रहता है। यह चक्र अंतहीन है और जितना समय बढ़ता है, उतनी थकान गहराती जाती है।

प्लेटफॉर्म्स का उद्देश्य सरल है—उपयोगकर्ता को जितना अधिक समय स्क्रीन पर रोके रखा जाए, उतना अधिक लाभ। एल्गोरिद्म इस तरह डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता स्क्रोल करना बंद ही न करे। वीडियो एक के बाद एक चलते रहते हैं, नोटिफिकेशन लगातार आकर्षित करते रहते हैं और कंटेंट का चयन इस प्रकार किया जाता है कि उपयोगकर्ता को लगे—“बस थोड़ा और।” इस रणनीति का सबसे अधिक प्रभाव युवा दिमागों पर पड़ता है, जो अभी भावनात्मक और बौद्धिक रूप से परिपक्व हो रहे होते हैं। उन्हें यह समझ नहीं आता कि सोशल मीडिया की यह दुनिया उनके समय, ऊर्जा और आत्मसम्मान को लगातार प्रभावित कर रही है।

समस्या जितनी बड़ी है, उसका समाधान भी उतना ही व्यवहारिक है—डिजिटल अनुशासन। युवाओं को प्रतिदिन एक निश्चित समय तय करना चाहिए—इससे आदतें नियंत्रित होंगी और थकान कम होगी। अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करने से मन पर होने वाला दबाव कम होता है। खुद को दूसरों के बनाए ‘हाइलाइट रील’ से तुलना करना बंद करना जरूरी है। परिवार, दोस्तों, किताबों, प्रकृति, खेल और रचनात्मक गतिविधियों पर ध्यान देना सकारात्मक ऊर्जा देता है। स्कूलों-कॉलेजों में डिजिटल व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य पर पाठ्यक्रम जोड़ना समय की मांग है। अभिभावकों को भी बच्चों में मोबाइल उपयोग की आदतों पर संयमित और संवेदनशील निगरानी रखनी चाहिए।

युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि उनकी वास्तविक प्रतिभा, भावनाएँ, रचनात्मकता और मेहनत किसी स्क्रीन पर आए आंकड़ों से अधिक मूल्यवान हैं। जीवन का अर्थ डिजिटल तालियों से नहीं, बल्कि वास्तविक अनुभवों, रिश्तों और आत्मविकास से बनता है। सोशल मीडिया ने दुनिया को छोटा जरूर बनाया है, लेकिन इसका उपयोग यदि संयमित न हो तो यह हमारे ही जीवन का दायरा छोटा कर देता है। समय आ गया है कि युवा इस मायाजाल से जागें, स्क्रीन से थोड़ी दूरी बनाएं और अपनी वास्तविक पहचान की ओर लौटें। क्योंकि लाइक-व्यूज़ की यह दौड़ अंतहीन है—और इसमें थकना निश्चित है। लेकिन जीवन की दौड़ के रास्ते अनंत हैं, अर्थपूर्ण हैं और सच्चे हैं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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