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लाल के बाद अब ‘हरी मकड़ी’ की खोज, जैव-विविधता के क्षेत्र में नया आयाम

मेदिनीपुर, 06 जनवरी (हि.स.)।

पश्चिम मेदिनीपुर जिले की समृद्ध जैव-विविधता में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि जुड़ गई है। पहले जहां जिले में दुर्लभ लाल रंग की मकड़ी की खोज हुई थी, वहीं अब पहली बार हरे रंग की मकड़ी — ओलिओस मिलेटि की उपस्थिति दर्ज की गई है। यह दुर्लभ प्रजाति केशपुर प्रखंड के कलाग्राम इलाके में पाई गई है। इससे शोधकर्ताओं और प्रकृति प्रेमियों में उत्साह का माहौल है।

केशपुर सुकुमार सेनगुप्ता महाविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग के प्राध्यापक डॉ. सुमन प्रतिहार ने बताया कि ओलिओस मिलेटि पूरी तरह हरे रंग की होती है। इस कारण यह पेड़ों की पत्तियों के साथ सहज रूप से घुल-मिल जाती है। इसी ‘कैमफ्लाज’ या छलावरण की तकनीक से यह अपने शिकार को चकमा देती है। यह मकड़ी फूलों पर शहद पीने आने वाली मधुमक्खियों, तितलियों और मच्छरों को घात लगाकर शिकार बनाती है। कई बार यह अपने आकार से बड़े कीटों को भी विषैले दंश से काबू में कर लेती है। भोजन की कमी होने पर यह फूलों का पराग और शहद से भी अपना पेट भर लेती है।

सोमवार सुबह डॉ. सुमन प्रतिहार के छात्र अभिजीत सेनापति ने केशपुर के कलाग्राम क्षेत्र में इस विशिष्ट हरी मकड़ी को देखा और इसकी पहचान की। विशेषज्ञों के अनुसार, ओलिओस प्रजाति की मकड़ियां भारत के अन्य हिस्सों और श्रीलंका में पाई जाती हैं, लेकिन पश्चिम मेदिनीपुर जिले में अब तक इसकी कोई आधिकारिक जानकारी नहीं थी।

पश्चिम मेदिनीपुर जिला लगातार नई जैविक खोजों के कारण शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वर्ष 2020 में डॉ. सुमन प्रतिहार और उनके छात्र चंदन दंडपाट ने मेदिनीपुर सदर ब्लॉक के नयाग्राम क्षेत्र से ‘मेगालोमॉर्फ’ श्रेणी की लाल मकड़ी की खोज की थी। इडायप्स वंश की इस मकड़ी को पहली बार यहीं पाए जाने के कारण ‘इडायप्स मेदिनी’ नाम दिया गया। यह मकड़ी जमीन में गड्ढा बनाकर रहने वाली ‘ट्रैपडोर स्पाइडर’ के रूप में जानी जाती है और इसकी खोज ‘वर्ल्ड स्पाइडर कैटलॉग’ में भी दर्ज है।

इसी तरह हाल ही में विद्यासागर विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने भादुतला जंगल से सटे हरिनामारी क्षेत्र में लिवरवॉर्ट प्रजाति के एक नए पौधे की खोज की, जिसका नाम पश्चिम बंगाल के नाम पर ‘फोसम्ब्रोनिया बेंगलिनेसिस’ रखा गया।

डॉ. सुमन प्रतिहार ने बताया कि ओलिओस मिलेटि की इस खोज को पश्चिम मेदिनीपुर जिले की जैव-विविधता कैटलॉग में दर्ज कराने की प्रक्रिया जल्द शुरू की जाएगी।

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