भारत–अमेरिका व्यापार समझौता; किसानों के लिए मृत्यु-पत्र: सिद्धारमैया

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बेंगलुरु, 08 फरवरी (हि.स.)। भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते को स्वीकार कर उसका स्वागत करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिका के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके हैं। आने वाले दिनों में यह समझौता 140 करोड़ भारतीयों के लिए, विशेष रूप से देश के 72 करोड़ किसानों के लिए मृत्यु-पत्र साबित होगा। यह आरोप कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने लगाया है।

सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर जारी एक बयानों में मुख्यमंत्री ने कहा कि दो देशों के बीच संबंध समानता और पारस्परिक सम्मान के आधार पर होने चाहिए, न कि दबाव, धमकी और एकतरफा नीति निर्धारण के आधार पर। लेकिन भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के प्रावधानों को देखने से यह साफ है कि यह मालिक के आदेश पर सेवक द्वारा सिर हिलाने जैसा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि रूस से तेल खरीदने वाले भारत पर दबाव बनाने के उद्देश्य से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय वस्तुओं पर भारी शुल्क लगाया था। अब उसे 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर भारत पर उपकार करने का नाटक किया जा रहा है। इसके बदले भारत ने अमेरिकी वस्तुओं पर शुल्क शून्य कर दिया है। यह स्पष्ट रूप से एक असमान और अन्यायपूर्ण समझौता है, फिर भी केंद्र सरकार द्वारा इसे स्वीकार करना देशवासियों के साथ विश्वासघात है।

वर्तमान में भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 40 प्रतिशत रूस से खरीदता है। लेकिन इस समझौते के तहत अमेरिकी दबाव में आकर रूस से तेल खरीद कम कर अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदने पर सहमति जताई गई है। यह भारत की पूर्ण शरणागति है। इससे देश में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में वृद्धि होगी और आवश्यक वस्तुएं भी महंगी होंगी, ऐसा उन्होंने चेतावनी दी।

सिद्धारमैया ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इस समझौते से होने वाले मामूली लाभों को बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है और भारतीय जनता, खासकर किसानों को होने वाले भारी नुकसान को जानबूझकर छिपा रही है। अमेरिकी किसान समुदाय द्वारा इस समझौते का खुले तौर पर स्वागत किया जाना ही इस बात का प्रमाण है कि यह भारतीय किसानों के लिए विनाशकारी सिद्ध होगा।

उन्होंने कहा कि अमेरिका के किसान भारत की तुलना में कहीं अधिक सब्सिडी प्राप्त करते हैं, जिससे वे कम कीमत पर अपने कृषि उत्पाद बेच सकते हैं। इसी खतरे को देखते हुए अब तक की सभी सरकारों ने अमेरिकी कृषि उत्पादों पर ऊंचा आयात शुल्क लगाया था। यदि अब यह शुल्क हटा दिया गया तो अमेरिकी सस्ते अनाज, फल, सब्ज़ी और डेयरी उत्पाद भारतीय बाजारों में भर जाएंगे, जिससे भारतीय किसान दिवालिया होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस समझौते में भारतीय हितों की रक्षा का कोई उद्देश्य नहीं है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि क्या अंतरराष्ट्रीय दबावों और प्रधानमंत्री मोदी के करीबी उद्योगपतियों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र सरकार ने इस देश-विरोधी समझौते को स्वीकार किया है।

सिद्धारमैया ने कहा कि भारत वैश्विक स्तर पर पहले कभी इतना कमजोर नहीं रहा। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति, इंदिरा गांधी के मजबूत नेतृत्व और डॉ मनमोहन सिंह की आर्थिक दूरदर्शिता का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की विदेश नीति भाषणों, घोषणाओं, हाथ मिलाने और आत्मप्रचार तक सीमित हो गई है।

चीन और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के बीच फंसा भारत अपनी अस्मिता खोने की स्थिति में पहुंच गया है। कभी डोनाल्ड ट्रंप की प्रशंसा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी आज उनके आदेशों का पालन करने की स्थिति में आ गए हैं, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

विदेश नीति, आर्थिक और सामाजिक सभी मोर्चों पर विफल रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देशहित में इस्तीफा दे देना चाहिए, ऐसा आग्रह मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने किया है।

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