बदले बदले से मेरे सरकार नज़र आते है

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शशि थरूर के मायने

बाल मुकुन्द ओझा

लगता है कांग्रेस में सब कुछ ठीक नज़र नहीं आ रहा है। मुस्लिम नेताओं के कांग्रेस पर लगातार हमले हो रहे है।  पूर्व केंद्रीय मंत्री शकील अहमद के बाद अब रसीद अल्वी ने राहुल गाँधी की आलोचना की है। पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव होने जा रहे है। इनमें बंगाल,  केरल, तमिलनाडु और असम सबसे प्रमुख है। बंगाल में टीएमसी, केरल में सीपीएम, तमिलनाडु में डीएमके और असम में भाजपा का राज है। आज हम बात कर रहे है देश के सबसे शिक्षित प्रदेश केरल की। इस राज्य में जहाँ सत्तारूढ़ सीपीएम अपना शासन बचाने के लिए  जी तोड़ प्रयास में जुटी है वहीं विपक्षी कांग्रेस यहाँ अपना झंडा गाड़ने के लिए तत्पर हो रही है। भाजपा का इस प्रदेश में कोई खास जनाधार नहीं है मगर पहली बार तिरूवंतपुरम नगर निगम सीपीएम से छीनने के बाद भाजपा कुछ अधिक उत्साहित हो रही है। केरल में सीपीएम हारती है तो देश में उनका कहीं भी नमो निशान नहीं होगा। वैसे यह पार्टी कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में शामिल है मगर केरल और बंगाल में उसकी राहे कुछ अलग है। केरल में दो मोर्चे सदा राज करते आये है जिन्हें लोग वाम मोर्चा और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नाम से ज्यादा जानते है। दोनों मोर्चों के अलावा कोई तीसरा मोर्चा यहाँ अस्तित्व में नहीं है। ये ही मोर्चे बदल बदल कर शासन करते आये है। केरल के स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के शानदार प्रदर्शन से राज्य सरकार के खिलाफ आम लोगों में बढ़ती नाराजगी का संकेत मिल रहा है और यह 2026 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।

वाम मोर्चे ने तिरुवनंतपुरम, कोल्लम, त्रिशूर, पलक्कड़, कोझिकोड, वायनाड और कन्नूर जिलों में अपने कई मजबूत गढ़ खो दिए. वहीं, यूनाइटेड मोर्चे ने कुल 941 में से 505 ग्राम पंचायतों, 152 में से 79 ब्लॉक पंचायतों में जीत हासिल की। इसके अलावा कुल 14 में सात जिला पंचायतों, छह में से चार नगर निगमों और 86 में से 54 नगर पालिकाओं में भी UDF को सफलता मिली। राजनीतिक समीक्षकों का कहना है, अगर कांग्रेस अपनी हालिया सफलता की गति बनाए रखती है और इसी तरह एकजुट नजर आती है तो केरल में वाम मोर्चे के लिए सत्ता में आने की हैट्रिक मनाना आसान नहीं होगा।

 केरल विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच शशि थरूर की कांग्रेस से नाराजगी सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी की हालिया कोच्चि यात्रा के दौरान ‘उचित सम्मान’ न मिलने से थरूर नाराज हैं। वे पार्टी मीटिंगों से भी दूरी बनाये हुए है और चलते चलते मोदी की प्रशंसा में कसीदें पढ़ने लग जाते है जबकि थरूर का कहना है वे ऑपरेशन सिन्दूर के अलावा कभी मोदी सरकार के पक्ष में नहीं बोले। शशि थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्होंने संसद में कभी पार्टी की घोषित लाइन का उल्लंघन नहीं किया। उनका एकमात्र सार्वजनिक मतभेद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर रहा, जिस पर वे आज भी बिना खेद के कायम हैं। पहलगाम घटना के बाद उन्होंने अखबार में लेख लिखकर सख्त लेकिन सीमित कार्रवाई की वकालत की थी। फिर भी कांग्रेस आलाकमान उनपर भरोसा नहीं कर रही है। उन्हें संदेह की दृष्टि से देखा जा। पार्टी नेतृत्व से मतभेद की अटकलों पर उन्होंने दो टूक कहा कि जब भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और वैश्विक प्रतिष्ठा दांव पर हो, तो भारत पहले आता है। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के कथन ‘अगर भारत नहीं रहा तो कौन बचेगा’ का हवाला देते हुए कहा कि राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं, भले ही राजनीतिक दलों के बीच मतभेद क्यों न हों। हाल ही उन्होंने वाम मोर्चे के नेताओं से मुलाकात की थी, जिसे कांग्रेस पसंद नहीं कर रही है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, CPM ने थरूर को LDF से जुड़ने पर 15 विधानसभा सीटों का प्रस्ताव भी दिया है। वहीं कांग्रेस सांसद शशि थरूर को बीजेपी ने भी पार्टी में शामिल होने का ऑफर दिया है। बीजेपी के केरल अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने थरूर का स्वागत करते हुए कहा कि बीजेपी सभी देशभक्तों का स्वागत कर सकती है। हालाँकि केरल में शशि थरूर को कोई अधिक जनाधार वाला नेता नहीं माना जा रहा है मगर वे एक बड़े नेता की भूमिका में जरूर है और इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।  यह भी कहा जा रहा है कि पिछले कुछ अरसे से कांग्रेस से उनकी नाराजगी सामने आती रहती। है उनके बयान पार्टी को कई बार असहज कर देते है। कई बार  कांग्रेस उससे किनारा कर लेती है तथा उनका व्यक्तिगत बयान बता कर अपना पल्ला झाड़ लेती है। यह भी कहा जा रहा है शशि थरूर एक सुलझे हुए नेता है जो वैश्विक कूटनीति पर अपना प्रभाव रखते है। उनकी वैश्विक समझ भी अनूठी है।

दूसरी तरफ शशि थरूर द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ करने और भाजपा में शामिल होने की अटकलें तेज हो गईं। राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व इस बयानों से सकते में हैं। जबकि पार्टी में हड़कंप मचा हुआ है। थरूर के अगले राजनीतिक कदम पर सभी की नजरें टिकी हैं। रह रह कर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि क्या थरूर पलटी मारेंगे।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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