
बाल मुकुन्द ओझा
महाराष्ट्र में अजित पवार की विरासत उनकी पत्नी सुनेत्रा ने संभाल ली है। उन्होंने एनसीपी विधायक दल की नेता चुनने के तीन घंटे बाद ही उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही देश में एक बार फिर परिवारवाद की चर्चा सुनाई देने लगी है। विशेषकर क्षेत्रीय पार्टियों की नीव वंशवाद पर टिक्की है। महाराष्ट्र के अलावा बहुत से ऐसे राज्य है जहाँ क्षेत्रीय पार्टियां सत्ता में है और वे वंशवाद का अनुसरण कर रहे है। या यूँ कहे उनके पास अपने परिवार को सत्ता सौंपने के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं। अनेक राज्यों में जाने माने नेताओं के बेटों ने उनकी विरासत संभाल रखी है। तमिलनाडु में स्टालिन, कश्मीर में उमर अब्दुला, पंजाब में बादल, बिहार में तेजस्वी, यूपी में अखिलेश यादव, बंगाल में अभिषेक बनर्जी हरियाणा में देवी लाल के पोते इसके जीवंत उदहारण है।
आज़ादी के बाद से ही देश की सियासत में परिवारवाद का डंका बजता रहा है। इनमें सबसे बड़ा सियासी परिवार नेहरू – गांधी का है जिसकी पांचवीं छठी पीढ़ी राजनीति में सक्रीय है। कहने का मतलब है मोतीलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक सियासी समर में सक्रीय है। इस समय देश में डेढ़ दर्ज़न परिवार राजनीति में सक्रीय है। इनमें अनेक बड़े परिवार समय के साथ फलते फूलते और बिखरते रहे। देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित नेहरू गांधी परिवार में भी स्व. संजय गांधी की पत्नी मेनका और बेटे वरुण गांधी ने परिवार से अलग राह पकड़कर भाजपा का दामन थाम रखा है। दूसरा बड़ा परिवार पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल का है जिसकी चौथी पीढ़ी इस समय सियासी समर में संघर्षरत है। देवीलाल के बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चौटाला के दोनों बेटों ने सियासत की अलग अलग पगडंडियां पकड़ रखी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान के निधन के बाद उनका परिवार भी बिखर गया है। बेटे और भाई ने अलग अलग राह पकड़ रखी है। इसी भांति यूपी में सोने लाल पटेल के परिवार के सदस्यों की राह भी जुदा जुदा है। इनमें एक सदस्य मोदी मंत्री मंडल में शामिल है तो दूसरा मोदी विरोधी धड़े के साथ है। कल तक मुलायम सिंह यादव का परिवार भी अलग थलग था। भाई शिवपाल और बेटे अखिलेश की राह अलग अलग थी मगर शिवपाल फिर अपने भतीजे के साथ हो गए है मगर परिवार के एक बहू अपर्णा आज भी भाजपा खेमे से जुडी है। आंध्र में पूर्व मुख्यमंत्री रामाराव का परिवार भी बिखरा हुआ है। महाराष्ट्र में बाल ठाकरे का परिवार भी एकजुट नहीं रहा। भतीजे राज ने अपने चाचा से बगावत कर अलग पार्टी बना ली थी और आज भी उद्धव और राज की राहें अलग अलग है।
भारतीय राजनीति में पंचायत से संसद तक परिवारवाद हावी है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक राजनीति में परिवारवाद ने अपनी जड़ इतनी ज्यादा मजबूत कर ली है कि उसे हटाना अब नामुमकिन हो गया है। हमारे लोकतान्त्रिक देश में एक दर्जन राज्यों में परिवारवाद की चिंगारी अभी सुलग रही है। यूँ देखा जाये तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा में वंशवादी राजनीति न के बराबर है जबकि कांग्रेस, सपा, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, लोकदल के नाम से विभिन्न दल, नेशनल कॉन्फ्रेंस, लोक जनशक्ति पार्टी, देवेगौड़ा की पार्टी, अकाली दल जैसे दलों का संगठन और सत्ता एक परिवार विशेष के लिए समर्पित है। कई राजनीतिक विश्लेषक परिवारवाद और वंशवाद की परिभाषा अलग अलग बताते है। इन लोगों की मान्यता के अनुसार यदि संघर्ष के रास्ते कोई भाई अपनी जगह सियासत में बनाकर आता है तो उसे परिवारवाद का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। वहीँ दूसरे पक्ष के विश्लेषक मानते है कि परिवार के सहारे आगे बढ़ना अनुचित है। भारत के लोकतंत्र को समझने वाले लोगो का एक दृष्टिकोण ये भी है की इस देश में वंशवाद और राजशाही को लोकतंत्र का जामा ओढ़ाया गया है। राजशाही के जमाने में और लोकतंत्र में फर्क सिर्फ इतना है कि तब राजा ही अपने बेटे को उत्तराधिकारी घोषित करता था अब वो जनता से घोषित करवाता है। बहरहाल आम जनता की नजर में परिवारवाद और वंशवाद में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोकतंत्र के लिए यह हितकारी नहीं है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी . 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर
