जन्म तिथि सुधार के लिए केवल स्कूल का लिविंग सर्टिफिकेट पर्याप्त नहीं : अदालत

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वडोदरा, 01 जनवरी (हि.स.)। गुजरात की वडोदरा की एक अदालत ने जन्म रजिस्टर में दर्ज जन्म तिथि में सुधार के लिए केवल स्कूल से जारी लिविंग सर्टिफिकेट को पर्याप्त प्रमाण नहीं माना जा सकता। यह अहम फैसला वडोदरा की सीनियर सिविल जज अदालत ने सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जन्म प्रमाणपत्र ही जन्म का प्राथमिक और सर्वोत्तम कानूनी प्रमाण होता है।

वडोदरा के मंझलपुर क्षेत्र की एक महिला ने अपनी भतीजी की जन्म तिथि में सुधार के लिए सीनियर सिविल जज की अदालत में याचिका दायर की थी। याचिका में मांग की गई थी कि जन्म रजिस्टर में दर्ज 2 मार्च 1979 की तारीख को स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार 12 मार्च 1979 किया जाए। हालांकि, सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अदालत ने कानूनी आधार के अभाव में याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जन्म प्रमाणपत्र में दर्ज तारीख गलत है और स्कूल के लिविंग सर्टिफिकेट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और पासपोर्ट सहित अन्य दस्तावेजों में 12.03.1979 की तारीख दर्ज है।

प्रतिवादी पक्ष की ओर से वडोदरा नगर निगम ने दलील दी गई कि जन्म प्रमाणपत्र रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ्स एंड डेथ्स एक्ट, 1969 के तहत जारी एक वैधानिक दस्तावेज है और उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव केवल सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जा सकता है।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि जन्म प्रमाणपत्र एक प्राथमिक सार्वजनिक दस्तावेज है, जिसकी सत्यता की कानूनी धारणा होती है। याचिकाकर्ता जन्म के समय से संबंधित कोई अस्पताल रिकॉर्ड या अन्य ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि स्कूल रिकॉर्ड अभिभावकों द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित होते हैं और उन्हें जन्म के समय का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने कहा कि सिविल कोर्ट, रजिस्ट्रार की वैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती और पर्याप्त एवं ठोस सबूतों के बिना सार्वजनिक रिकॉर्ड में बदलाव का आदेश नहीं दिया जा सकता।

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