काग़ज़ी सम्मान की चमक में खोता वास्तविक योगदान

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– डॉ. सत्यवान सौरभ

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय पर्व नहीं हैं बल्कि ये राष्ट्र के आत्ममंथन के अवसर भी होते हैं। इन दिनों प्रशासन द्वारा दिए जाने वाले प्रशंसा पत्रों को समाज के लिए किए गए उत्कृष्ट कार्यों की सार्वजनिक स्वीकृति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उद्देश्य यह होता है कि ऐसे लोगों को सामने लाया जाए जिन्होंने निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र, समाज और व्यवस्था को बेहतर बनाने में योगदान दिया है। किंतु बीते कुछ वर्षों में इन प्रशंस पत्रों की प्रक्रिया और चयन पद्धति पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।

सबसे बुनियादी सवाल यही है कि क्या किसी प्रशंसा पत्र के लिए आवेदन करना आवश्यक होना चाहिए? यदि हाँ, तो क्यों? सम्मान तो वह होता है जो स्वतः मिले, जिसे समाज और व्यवस्था स्वयं पहचानें। यदि किसी व्यक्ति को अपने कार्य के लिए स्वयं आवेदन करना पड़े या किसी माध्यम से अपना नाम अनुशंसित करवाना पड़े तो ऐसे सम्मान की नैतिकता और प्रामाणिकता पर स्वाभाविक रूप से संदेह उत्पन्न होता है।

विडंबना यह है कि जब किसी क्षेत्र में अनियमितता, भ्रष्टाचार या अव्यवस्था की खबरें समाचार पत्रों, टीवी चैनलों या सोशल मीडिया पर आती हैं तो प्रशासन तत्काल सक्रिय हो जाता है। जांच बिठा दी जाती है, नोटिस जारी होते हैं और कार्रवाई की घोषणाएँ की जाती हैं। यानी नकारात्मक घटनाओं पर प्रशासन की दृष्टि अत्यंत सजग और तीक्ष्ण है। फिर सकारात्मक, रचनात्मक और जनहितकारी कार्यों को पहचानने में वही प्रशासन इतना असहाय क्यों दिखाई देता है? क्या अच्छे कार्यों को देखने और समझने की प्रशासनिक दृष्टि अब केवल फाइलों और औपचारिक रिपोर्टों तक सीमित होकर रह गई है?

वास्तविकता यह है कि आज प्रशंसा पत्रों की व्यवस्था योग्यता की बजाय प्रक्रिया आधारित होती जा रही है। आवेदन, अनुशंसा, विभागीय चैनल और व्यक्तिगत संपर्क- ये सभी सम्मान प्राप्त करने के अनौपचारिक मानदंड बन चुके हैं। परिणामस्वरूप वही लोग बार-बार सम्मानित होते दिखाई देते हैं जो व्यवस्था के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज कराना जानते हैं, न कि वे जिन्होंने वास्तव में समाज के लिए ज़मीन पर काम किया है। यह स्थिति सम्मान को प्रेरणा के साधन से अधिक एक औपचारिक रस्म में बदल देती है।

यह भी देखने में आता है कि कई बार प्रशंसा पत्र सरकारी कर्मचारियों को उनके नियमित दायित्वों के निर्वहन के लिए दे दिए जाते हैं, जबकि उनका कार्य मूलतः उनकी नौकरी का हिस्सा होता है। इसके विपरीत, अनेक सामाजिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, कलाकार, शिक्षक और स्वतंत्र रूप से काम करने वाले लोग- जो बिना किसी पद या संसाधन के समाज में बदलाव लाने का प्रयास कर रहे होते हैं- प्रशासन की दृष्टि से बाहर ही रह जाते हैं। क्या यह सम्मान की सही कसौटी है?

प्रशंसा पत्रों के मूल्य पर भी विचार आवश्यक है। जिन व्यक्तियों को राज्यपाल, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर पत्र लिखे जाते हैं, वे केवल औपचारिक सम्मान नहीं होते। ऐसे पत्र व्यक्ति के कृतित्व के ऐतिहासिक दस्तावेज बन जाते हैं। वे शोध-ग्रंथों में उद्धृत होते हैं, सामाजिक स्मृति का हिस्सा बनते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होते हैं। इसके विपरीत, आवेदन-आधारित प्रशंसा पत्र अक्सर समारोह समाप्त होते ही अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं।

सम्मान की सबसे बड़ी कसौटी प्रशासन नहीं बल्कि समाज होता है। पाठक, दर्शक, श्रोता और आम लोग तय करते हैं कि कौन उनके विश्वास पर खरा उतरा और कौन नहीं। साहित्य और कला के क्षेत्र में यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। किसी रचनाकार का मूल्यांकन उसके प्रमाण पत्रों से नहीं, बल्कि उसकी रचनाओं, विचारों और सामाजिक प्रभाव से होता है। यही कारण है कि कई बार बिना किसी औपचारिक सम्मान के भी कुछ लोग समाज में अमर हो जाते हैं, जबकि अनेक पदक और प्रमाण पत्र पाने वाले लोग समय के साथ भुला दिए जाते हैं।

यहाँ पद और प्रतिष्ठा के अंतर को समझना भी आवश्यक है। पद से मिलने वाला सम्मान अस्थायी होता है। जब तक व्यक्ति पद पर होता है, तब तक उसके चारों ओर अभिनंदन और औपचारिक सम्मान की भीड़ रहती है। जैसे ही पद समाप्त होता है या व्यक्ति सेवानिवृत्त होता है, वही भीड़ छँटने लगती है। इसके विपरीत, जो लोग अपने कार्य और कृतित्व के बल पर पहचान बनाते हैं, उनकी प्रतिष्ठा पद से परे होती है और समय के साथ और गहरी होती जाती है।

दुर्भाग्य से कुछ अधिकारी पद के मद में यह भूल जाते हैं कि वे राष्ट्र और समाज से बड़े नहीं हैं। पद उन्हें अधिकार देता है, श्रेष्ठता नहीं। यदि किसी अधिकारी ने अपने सेवाकाल में राष्ट्र और समाज के लिए कुछ विशिष्ट नहीं किया, तो ऊँचे पद से सेवानिवृत्ति के बाद भी उसका जीवन सामान्य ही रह जाता है। इतिहास में अधिकारी नहीं बल्कि विचार, कृतियाँ और योगदान दर्ज होते हैं।

यह भी सच है कि साहित्य और कला की समझ न रखने वाले कुछ अधिकारी सम्मान की प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में चयन का आधार गुणवत्ता नहीं बल्कि सुविधा और औपचारिकता बन जाता है। इससे न केवल वास्तविक योगदान करने वालों के साथ अन्याय होता है, बल्कि सम्मान की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।

प्रश्न यह भी उठता है कि जब किसी व्यक्ति के कार्यों को मीडिया ने व्यापक रूप से कवर किया हो, समाज ने स्वीकार किया हो और उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता हो, तो फिर उसे प्रशासनिक प्रशंसा-पत्र के लिए आवेदन करने की आवश्यकता ही क्यों होनी चाहिए? क्या यह सम्मान की मूल भावना के विपरीत नहीं है?

वास्तव में, सम्मान माँगने की वस्तु नहीं है। वह समाज और व्यवस्था द्वारा स्वतः दिया गया प्रमाण होना चाहिए। यदि किसी को स्वयं आगे बढ़कर यह कहना पड़े कि उसने अच्छा काम किया है और इसलिए उसे सम्मानित किया जाए तो यह सम्मान की आत्मा को कमजोर करता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन सम्मान की संस्कृति पर गंभीर पुनर्विचार करे। चयन-प्रक्रिया पारदर्शी हो, स्वतः संज्ञान की परंपरा विकसित हो और वास्तविक योगदान को प्राथमिकता दी जाए। सम्मान उन लोगों को मिले जो बिना किसी अपेक्षा के समाज के लिए कार्य कर रहे हैं, न कि उन्हें जो केवल प्रक्रिया को साधना जानते हैं।

राष्ट्रीय पर्वों पर दिए जाने वाले सम्मान तभी सार्थक होंगे जब वे गणतंत्र की मूल भावना-समानता, न्याय और कर्तव्य-को प्रतिबिंबित करें। अन्यथा ये केवल औपचारिक आयोजन बनकर रह जाएंगे, जिनका समाज पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं होगा।

अंततः यह प्रश्न प्रशासन से अधिक समाज से जुड़ा है। हमें यह तय करना होगा कि हम किसे सम्मानित मानते हैं- उसे जिसके पास पद और प्रमाण-पत्र हैं या उसे जिसने अपने कार्य से समाज की चेतना को समृद्ध किया है। जब तक यह निर्णय स्पष्ट नहीं होगा, तब तक प्रशंसा पत्रों की राजनीति पर सवाल उठते रहेंगे।

गणतंत्र की मजबूती केवल संस्थानों से नहीं बल्कि उन व्यक्तियों से आती है जो बिना किसी पुरस्कार की अपेक्षा के अपना कर्तव्य निभाते हैं। ऐसे लोगों को पहचानना और सम्मान देना ही किसी स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है। यदि प्रशासन इस दिशा में ईमानदार प्रयास करे, तभी प्रशंसा पत्र वास्तव में प्रशंसा के पात्र बन पाएँगे।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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