एक बार नही , सात बार उजड़ी और बसी दिल वालों की दिल्ली

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 दिल्ली  दिल वालों की बताई जाती है किंतु दिल्ली के बारे में यह भी  सत्य है कि ये “सात बार उजड़ी और सात बार बसी”। बुजुर्गों की यह बात केवल एक कहावत नहीं, बल्कि इतिहास में दर्ज एक गहरी सच्चाई है। अक्सर लोग यह तो बताते हैं कि दिल्ली कई बार उजड़ी, पर यह नहीं बताते कि क्यों उजड़ी—कौन-सी राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं, कौन-से विदेशी आक्रमण, कौन-सी सत्ता संघर्ष की घटनाएँ थीं जिन्होंने इस शहर को बार-बार बर्बादी की ओर धकेला।

सबसे पुरानी दिल्ली महाभारत काल की इंद्रप्रस्थ मानी जाती है। पांडवों द्वारा बसाए गए इस नगर का पतन युद्ध और उसके बाद शासन संरचना के टूटने की वजह से हुआ। महाभारत युद्ध के बाद राजनीतिक केंद्रीकरण खत्म हुआ। आर्थिक ढांचा टूट गया और धीरे-धीरे नगर उजड़ने लगा।यह उजाड़ पूरी तरह विदेशी आक्रमण का नहीं, बल्कि भीतरू राजनीतिक विनाश का परिणाम था।

दूसरी बार दिल्ली पृथ्वीराज चौहान  की हार के बाद उजड़ा।11वीं–12वीं शताब्दी में तोमर वंश और बाद में चौहानों ने दिल्ली को मुख्य सत्ता केंद्र बनाया। पृथ्वीराज चौहान की राजधानी किला राय पिथौरा समृद्ध और शक्तिशाली शहर था। 1192 में तराइन की लड़ाई में मोहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज की हार के बाद दिल्‍ली उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथ चली गई।

राजनीतिक अस्थिरता, चौहान वंश की शक्ति के टूटने और नए सुल्तान के शासन ने पुरानी दिल्ली को उजड़ने पर मजबूर किया।यह उजाड़ विदेशी आक्रमण और सत्ता हस्तांतरण का परिणाम था।

तीसरी बार शहर का उजाड़

अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के लगातार हमलों से बचने के लिए सिरी नगर बसाया। यह दिल्ली का दूसरा बड़ा शाही शहर था,लेकिन खिलजी वंश के पतन के बाद यह शहर धीरे-धीरे राजनीतिक महत्व खो बैठा।दतुगलक काल में राजधानी का केंद्र बदल गया, इसलिए सिरी प्रशासन, सेना और व्यापार से खाली होने लगी। यह उजाड़ राजनीतिक केंद्र बदलने और वंश परिवर्तन का परिणाम था।

 तुगलकाबाद का उजाड़

गियासुद्दीन तुगलक ने विशाल तुगलकाबाद शहर बसाया, लेकिन उनके पुत्र मोहम्मद बिन तुगलक के काल में राजधानी को कभी दौलताबाद (महाराष्ट्र) तो कभी दिल्ली में रखने के फैसले से शहर अस्थिर हो गया।कुतुब मीनार के पास सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया से संघर्ष भी प्रसिद्ध है—“दिल्लीन अभी दूर है” का श्राप इसी काल से जोड़ा जाता है।  लोगों को बलपूर्वक राजधानी बदलने के आदेशों ने शहर को खाली करवा दिया।यह उजाड़ शासन की गलत नीतियों और अव्यवस्थित शहरीकरण का परिणाम था।

फीरोजाबाद (फिरोज शाह तुगलक की दिल्ली) का पांचवा उजाड़ फिरोज शाह तुगलक ने दिल्ली के नए हिस्से फीरोजाबाद को जगमगती राजधानी बनाया, लेकिन तुगलक वंश कमजोर होने लगा ।बंगाल, गुजरात आदि राज्य स्वतंत्र होने लगे, दिल्ली आर्थिक रूप से कमजोर पड़ गई। 1340–1400 के बीच मंगोलों और उत्तर-पश्चिम से आने वाले हमलावरों के छापों ने शहर को नुकसान पहुँचाया।सबसे बड़ा झटका 1398 में तैमूर लंग के आक्रमण ने दिया।दिल्ली में भयंकर नरसंहार हुआ और शहर लगभग वीरान हो गया। यह उजाड़ विदेशी आक्रमण + कमजोर राजनैतिक ढांचे का परिणाम था।

 छटा शेरगढ़ / दिनपनाह का उजाड़ — मुगल-अफगान संघर्ष

15वीं–16वीं सदी में मुगल और अफगान सत्ता के बीच संघर्ष बढ़ा।हुमायूँ ने “दिनपनाह” शहर बसाया, लेकिन शेरशाह सूरी ने हमला कर उसे उखाड़ फेंका।शेरशाह ने शहर के बड़े हिस्से तोड़े और अपना नया शहर “शेरगढ़” बसाया।लेकिन शेरशाह की मृत्यु के बाद अफगान शासन कमजोर हुआ और मुगलों ने फिर सत्ता हासिल की। इन लगातार संघर्षों के कारण यह क्षेत्र स्थिर शहरी केंद्र नहीं बन पाया। यह उजाड़ लगातार युद्ध और सत्ता संघर्ष का परिणाम था।

 सातवां शाहजहानाबाद का उजाड़ — मराठों, नादिरशाह, तैमूरी हमलों और ब्रिटिश शक्ति का उभार

शाहजहां ने 1648 में शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) बसाई जिसने दिल्ली को फिर से वैभव दिया।परंतु 18वीं शताब्दी में यह शहर सबसे ज्यादा उजाड़ झेलता रहा । 1739 में नादिरशाह का आक्रमण: दिल्ली में भयंकर कत्लेआम और लूट हुई। 1750–1770 के बीच अफगान अहमद शाह अब्दाली के हमले हुए।1760 के आसपास मराठों और अफगानों की लड़ाई (पानीपत) हुई।

1803 में अंग्रेजों का दिल्ली पर कब्ज़ा

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सेना ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर विध्वंस किया। शाहजहानाबाद का बहुत-सा हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया और हजारों नागरिकों को शहर से बाहर निकाल दिया गया। यह उजाड़ आक्रमणों, मुगल पतन और ब्रिटिश दमन का परिणाम था।

दिल्ली का “सात बार उजड़ना” केवल पुरानी कहावत नहीं है, बल्कि यह भारत के राजनीतिक इतिहास की वास्तविक कहानी है—जहाँ सत्ता की लालसा, अंतरराष्ट्रीय आक्रमण, साम्राज्यों का उत्थान-पतन और योजनाहीन शहरीकरण ने इस शहर को बार-बार चोट पहुंचाई।हर बार दिल्ली टूटी… लेकिन हर बार नई रूप में उठ खड़ी भी हुई।इसीलिए दिल्ली को न केवल एक शहर, बल्कि जीवित इतिहास कहा जाता है।

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