ईरान, ट्रंप और प्रतिरोध की राजनीति

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– डॉ. सत्यवान सौरभ

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ संघर्ष केवल सीमाओं या संसाधनों तक सीमित नहीं होते, वे विचारधाराओं, सत्ता-संतुलन और नैतिकता की भी परीक्षा लेते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चला आ रहा टकराव ऐसा ही एक संघर्ष है, जो समय-समय पर नए रूपों में सामने आता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान यह टकराव जिस तीव्रता और आक्रामकता के साथ उभरा, उसने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर शीतयुद्धोत्तर दौर की अस्थिरता की याद दिला दी।

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरान अमेरिका की रणनीतिक और वैचारिक राजनीति का लक्ष्य रहा है। अमेरिका ने ईरान को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल के रूप में देखा- ऐसा मॉडल जो पश्चिमी प्रभुत्व, इज़राइल-केन्द्रित पश्चिम एशिया नीति और अमेरिकी साम्राज्यवादी सोच को चुनौती देता है। यही कारण है कि ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रहे हैं।

डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में यह नीति और अधिक कठोर, असंवेदनशील और टकरावपूर्ण हो गई। 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका का एकतरफा हटना न केवल कूटनीतिक असंतुलन का उदाहरण था, बल्कि यह भी दर्शाता था कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय सहमति और बहुपक्षीयता को किस हद तक नज़रअंदाज़ करने को तैयार था। इसके बाद ईरान पर “अधिकतम दबाव नीति” लागू की गई, जिसका उद्देश्य ईरानी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाना और शासन को आंतरिक विद्रोह की ओर धकेलना था।

इतिहास साक्षी है कि दबाव हमेशा झुकाव पैदा नहीं करता। कई बार वह प्रतिरोध को जन्म देता है। ईरान के मामले में भी यही हुआ। आर्थिक कठिनाइयों, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद ईरान ने अपने राजनीतिक अस्तित्व, संप्रभुता और वैचारिक पहचान को बनाए रखा। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि ईरान का विरोध केवल अमेरिका की नीतियों से नहीं है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था से है जिसमें कुछ गिने-चुने देश स्वयं को न्यायाधीश और शेष दुनिया को अभियुक्त मान लेते हैं।

“जैसी करनी वैसी भरनी” का सिद्धांत केवल नैतिक कहावत नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी गहराई से लागू होता है। पश्चिम एशिया में दशकों तक किए गए अमेरिकी हस्तक्षेप—इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया- ने क्षेत्र को स्थिरता नहीं, बल्कि अराजकता दी। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन, मानवाधिकारों के नाम पर सैन्य आक्रमण और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर निर्दोष नागरिकों की हत्या- इन सबने अमेरिका की नैतिक साख को गहरा नुकसान पहुँचाया। ऐसे में जब ईरान अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देता है तो वह केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है, जो ताकत को ही न्याय मानती है।

ट्रंप की विदेश नीति का एक और खतरनाक पहलू उसका व्यक्तिवादी और आवेगपूर्ण स्वभाव था। कूटनीति संवाद और धैर्य से चलती है, जबकि ट्रंप की राजनीति ट्वीट, धमकी और शक्ति-प्रदर्शन पर आधारित थी। ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या इसी मानसिकता का परिणाम थी। यह घटना न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थी, बल्कि इसने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया। इसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब वह केवल सहने की नीति पर नहीं चल रहा।

ईरान की राजनीति को अक्सर पश्चिमी मीडिया में कट्टर, दमनकारी और पिछड़ा बताकर प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह चित्रण अधूरा और एकांगी है। ईरान की जनता ने बार-बार यह साबित किया है कि वे बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वह कितनी भी आकर्षक शब्दावली में क्यों न लपेटा गया हो। ईरान में सरकार की आलोचना होती है, विरोध होते हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीय संप्रभुता की आती है, तो जनता और सत्ता एकजुट दिखाई देते हैं। यही वह तत्व है जिसे पश्चिमी रणनीतिकार अक्सर समझने में चूक जाते हैं।

भारत जैसे देशों के लिए यह पूरा परिदृश्य एक गंभीर चेतावनी भी है और अवसर भी। ईरान भारत का पारंपरिक मित्र रहा है-ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क (चाबहार बंदरगाह) और मध्य एशिया तक पहुँच के लिहाज़ से ईरान का महत्व असंदिग्ध है। लेकिन अमेरिका के दबाव में भारत का ईरान से दूरी बनाना उसकी स्वतंत्र विदेश नीति पर प्रश्न खड़े करता है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को किसी तीसरे देश की नाराज़गी के डर से गिरवी न रखे।

आज वैश्विक राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पकड़ ढीली पड़ रही है और बहुध्रुवीयता का उदय हो रहा है। ऐसे में ईरान जैसे देश, जो लंबे समय से दबाव और प्रतिबंधों के बीच खड़े रहे हैं, नए शक्ति-संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। रूस-चीन-ईरान के बढ़ते समीकरण इस बदलाव के संकेत हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब दुनिया केवल वाशिंगटन के इशारों पर नहीं चलेगी।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि ईरान सही है या अमेरिका गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक राजनीति में शक्ति ही न्याय का एकमात्र पैमाना होगी या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और समानता के सिद्धांतों को वास्तविक सम्मान मिलेगा। यदि बड़े राष्ट्र अपनी करनी से दुनिया को डराते रहेंगे तो भरनी के रूप में उन्हें अस्थिरता, अविश्वास और प्रतिरोध ही मिलेगा। ईरान और ट्रंप के दौर की अमेरिकी राजनीति हमें यही सिखाती है कि दमन से स्थायित्व नहीं आता और धमकी से सम्मान नहीं मिलता। इतिहास अंततः उसी का पक्ष लेता है जो अपनी संप्रभुता, आत्मसम्मान और जनता की चेतना के साथ खड़ा रहता है। #iran @trump

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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