अब्दुल ! धीरे धीरे कर वह मर जाएगी ….. ?

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प्रख्यात बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन की जान पर खतरा बन आया तो दुनियां में किसी ने उन्हें शरण नहीं दी । इस्लामिक देश तो क्या देते यूरोप ने भी हाथ खड़े कर दिए ? शेख हसीना जब अपदस्थ हुई तब सभी इस्लामिक देशों ने दरवाजे बंद कर लिए । शरण दी तो दोनों को ही भारत ने शरण दी । तस्लीमा और हसीना दोनों अकेले पड़ गए , चौराहे पर आ खड़े हुए थे । भारत ने दोस्त बनाया था । जिसे भी बनाया उससे कभी दगा न किया । भारत साथ न देता तो आज न तस्लीमा होतीं और न हसीना । अफसोस कि जिस पूर्वी पाकिस्तान को पाल पोसकर बांग्लादेश खड़ा किया था वही आज हिन्दुओं की पीठ में छुरा घोंप रहा है ?

यह कोई नई बात नहीं । बांग्लादेश के कट्टरपंथियों ने पहले भी हिंदुओं का कत्लेआम कम नहीं किया था । तस्लीमा नसरीन का विश्वप्रसिद्ध उपन्यास ” लज्जा” याद है आपको ? मिलता नहीं , पर हमने यह पीड़ान्तक उपन्यास पढ़ा है । सच्ची घटना का बेहद मार्मिक चित्रण किया था तसलीमा ने । उपन्यास की सबसे दर्दनाक पंक्ति थी – अब्दुल एक एक कर ‘करो’ वह मर जाएगी । ये पंक्तियां वह बेबस हिन्दू मां कहती है जिसे उसकी 18 वर्षीय बेटी के साथ अब्दुल और उसके बीस दरिंदे उठा लाए थे । दर्द से भरी मां कहती हे – आधे मेरे साथ कर लो उसे छोड़ दो । वहशी दरिंदे नहीं माने , मासूम बेटी मर गई , मां ने एक गुंडे का खंजर निकालकर अपने कलेजे में घोंप लिया । यही थी लज्जा की सत्यकथा । कट्टरपंथी मौलानाओं ने सर तन से जुदा के फरमान सुनाए , तस्लीमा किसी तरह भारत आई और हसीना की तरह जिंदा है , निर्वासित जीवन जी रही है ।

अच्छा हुआ तस्लीमा और हसीना भारत आ गईं । वरना दीपूचंद्र दास की तरह उन्हें भी पेड़ पर बांधकर जला दिया गया होता । फिर भी इस सत्य किन्तु नृशंस हत्याकांड पर “लज्जा 2” लिखा जा सकता है , कोई न कोई लिख भी देगा । लिखेगा भी वही लिखते हुए जिसके हाथ न कांपते हों , जिसके होंठ न थरथराते हों , जिसकी रूह न कांप उठती हो । यूँ तो इतिहास ने खुद को रच ही दिया है । जिगर पर पत्थर रखकर काल के कपाल पर लिख भी दिया है । क्षमा करें अटलजी , आज के जमाने का यही नया गीत है । इसीलिए आपकी लिखी पंक्तियों का उपयोग किया है । क्षमा करें । बांग्लादेश में आज जो हो रहा है , इस देश के निर्माता शेख मुजीबुर्रहमान की कब्र भी भीग गई होगी । पाकिस्तानी सेना से सरेंडर करने वाले जनरल अरोड़ा और फील्ड मार्शल जनरल मानेकशॉ की भुजाएं भी स्वर्ग में फड़फड़ा रही होंगी ।

बांग्लादेश में हिंदुओं के हत्यारे मोहम्मद युनुस की शक्ल देखकर उसे मिले नोबल पुरस्कार ने तो दम तोड़ दिया है । अब देखना है 17 साल बाद वापस आया भगोड़ा तारिक रहमान क्या करेगा , देखना बाकी है । अभी तक दिमाग पाकिस्तान के ल्यारी वाले रहमान डकैत के किरदार में खोया हुआ था , यह एक और रहमान लंदन से आ गया । तो तारिक रहमान एक बात गांठ बांध लो , पाकिस्तान के नक्शेकदम पर मत चलना । दोस्त भारत है , मोदी है ; आसिम मुनीर और से शाहबाज से दोस्ती मत करो , फिर खंजर उतार देंगे । याद करो 1971 । भारत का अहसान मानों , कौन अपना है , दोस्त कौन है पहचानो । वरना हर कोई तस्लीमा या हसीना नहीं होता जो भारत गले लगाता फिरेगा ?

,,,,,कौशल सिखौला

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