भारत सिर्फ भूगोल नहीं, सेवा और कल्याण उसका स्वभाव है : भागवत

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कसरावद (निमाड़) मध्य प्रदेश, 04 फ़रवरी । भारत सिर्फ एक भौगोलिक इकाई नहीं, यहां सेवा, कर्म और सर्वजन कल्याण उसका स्वभाव है। कुछ भी यहां उपकार नहीं बल्कि सेवा ही परंपरा है। जीवन में जहां भी सेवा का अवसर मिले, उसे करना चाहिए क्योंकि सेवा से आत्मशुद्धि होती है। सभी परमेश्वर के स्वरूप हैं, अत: उपकार नहीं, सेवा करना हमारा धर्म है। हमारे यहां चैरिटी नहीं, अपितु सेवा है। जीवन में सेवा के जो भी अवसर मिलें, सेवा करना चाहिए। जिसके पास जो भी सामर्थ्य हो, वही उसे समाज को अर्पित करना चाहिए। जिसके पास जो हो, वो देना चाहिए। सेवा से हमारी शुद्धि होती है।

उक्‍त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कसरावद में व्‍यक्‍त किए। ये विचार-प्रेरक कार्यक्रम निमाड़ अभ्युदय रूरल मैनेजमेंट एंड डेवलपमेंट एसोसिएशन एवं श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया था। इस अवसर पर डॉ. मोहन भागवत ने ‘मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण’ विषय पर उद्बोधन दिया। कार्यक्रम में ‘गोष्ट-नर्मदालयाची’ ऑडियोबुक का विमोचन भी किया गया।

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि मनुष्य सुनकर या बोलकर नहीं, देखकर सीखता है। भारत की यात्रा में यह सत्य स्पष्ट हुआ है कि सुख बाहर नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर ही निहित है। भारत में मनुष्य के अंदर की खोज की परंपरा रही है और यही आंतरिक यात्रा शाश्वत सुख का मार्ग है। हमारे पूर्वजों ने अनुभव के आधार पर बताया कि माया का आधार अध्यात्म होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि ईश्वर ने मनुष्य को संवेदना प्रदान की है, जो दूसरों के सुख-दुःख को समझती है। किसी की उपेक्षा करके सुख भोगना मनुष्य की संवेदना के विपरीत है। जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए शिक्षा और शुचिता अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा का उद्देश्य केवल स्वयं का दुःख दूर करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के दुःख को भी दूर करना है, यही भारत का स्वभाव है। यही धर्म भारत ने विश्व को दिया है और हम पाते हैं कि परतंत्रता के काल में भी यह स्वभाव भारत का नहीं बदला।

शिक्षा आत्मनिर्भरता और मानवता का बोध कराए

भारतीय संदर्भ में शिक्षा पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि जन्मों का संचित ज्ञान मनुष्य के मस्तिष्क में निहित रहता है, आवश्यकता उसे बाहर लाने की है। टंट्या मामा और गाडगे महाराज जैसे महापुरुषों ने औपचारिक शिक्षा नहीं ली, फिर भी आज उनका सम्मान होता है। हमारे भीतर दैवीय गुण हैं, जिन्हें जागृत करना आवश्यक है।

सरसंघचालक डॉ. भागवत ने कहा कि वास्तविक शिक्षा वही है जो मनुष्य को विश्व मानवता का बोध कराए, आत्मनिर्भर बनाए और श्रम की प्रतिष्ठा सिखाए। भारत में व्यक्ति से अधिक कर्म की महत्ता है और परिणाम से अधिक प्रामाणिक व उत्कृष्ट कार्य को महत्व दिया जाता है। भारत का अर्थ केवल भूगोल नहीं, बल्कि एक विशिष्ट स्वभाव है। भारत की उन्नति का तात्पर्य जल, जंगल, नदी, पर्वत, पशु और मनुष्य सभी की उन्नति से है।

वनवासी बच्चों के लिए समर्पित संस्थान

उल्‍लेखनीय है कि श्री रामकृष्ण विश्व सद्भावना निकेतन विगत 15 वर्षों से शिक्षा एवं कौशल विकास के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। संस्थान में 17 से 20 जनवरी तक प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न हुआ, जिसके पश्चात सरसंघचालक का लेपा में प्रवास हुआ। यह संस्थान विशेष रूप से वनवासी क्षेत्रों के कुपोषित बच्चों के शिक्षा और कौशल विकास के लिए समर्पित है।

संस्थान द्वारा वनवासी बच्चों के लिए कक्षा दसवीं तक की शिक्षा तथा बेसिक रूरल टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा पाठ्यक्रम संचालित किया जा रहा है। निमाड़ अभ्युदय के विद्यालयों में लगभग 800 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। नर्मदा परिक्रमा के दौरान वनवासी बच्चों की शिक्षा का संकल्प लेकर सुश्री भारती ठाकुर दीदी ने इस संस्थान की स्थापना की। रक्षा मंत्रालय की सेवा छोड़कर उन्होंने यह सामाजिक प्रकल्प प्रारंभ किया। नागा साधुओं के पुनर्वास हेतु मिले आश्रम दान से यह प्रकल्प विकसित हुआ, जहां वर्तमान में गौशाला सहित विभिन्न गतिविधियां संचालित हो रही हैं।

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