जब अटल जी ने संयुक्त राष्ट्र सभा में हिंदी में भाषण दिया

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चार अक्टूबर 1977 को तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 32वें अधिवेशन को हिंदी में संबोधित कर एक ऐतिहासिक क्षण बनाया था। यह संयुक्त राष्ट्र के मंच से किसी भारतीय द्वारा हिंदी में दिया गया पहला भाषण था। इस भाषण में उन्होंने भारत की दृढ़ आस्था, लोकतंत्र की पुनर्स्थापना, विश्व बंधुत्व और कई महत्वपूर्ण वैश्विक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में ऐतिहासिक हिंदी भाषण (1977)

​वाजपेयी जी ने अपने भाषण की शुरुआत में भारत की जनता की ओर से संयुक्त राष्ट्र के लिए शुभकामनाओं का संदेश देते हुए, संस्था में भारत की दृढ़ आस्था को व्यक्त किया।

​1. लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों की पुनर्स्थापना

​यह भाषण मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी की सरकार बनने के केवल छह माह बाद दिया गया था, जिसने भारत में आपातकाल के बाद सत्ता संभाली थी। वाजपेयी जी ने अपनी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में भारत में लोकतंत्र और मूलभूत मानव अधिकारों की पुनर्प्रतिष्ठा पर ज़ोर दिया।
​उन्होंने कहा:

​”जनता सरकार को शासन की बागडोर संभाले केवल छह मास हुए हैं। फिर भी इतने अल्प समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानव अधिकार पुनः प्रतिष्ठित हो गए हैं। जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था, वह अब दूर हो गया है। ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं जिनसे यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा।”

​यह वक्तव्य दुनिया को यह बताने के लिए महत्वपूर्ण था कि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में अपनी जड़ों की ओर लौट आया है और व्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च महत्व देता है।

​2. वसुधैव कुटुंबकम् और आम आदमी की महत्ता

​वाजपेयी जी ने अपने भाषण में भारतीय संस्कृति के मूल विचार ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ (सारा संसार एक परिवार है) की परिकल्पना को प्रस्तुत किया। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को इस स्वप्न को साकार करने की संभावना के रूप में देखा।
​उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके लिए राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता से अधिक महत्व आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति रखती है।

​”अध्यक्ष महोदय, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की परिकल्पना बहुत पुरानी है। भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के अब साकार होने की संभावना है। यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं। आम आदमी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए कहीं अधिक महत्व रखती है।”

​उन्होंने सफलता और असफलता का मापदंड बताते हुए कहा कि हमें इस बात से नापा जाना चाहिए कि हम “पूरे मानव समाज, वस्तुतः हर नर-नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में प्रयत्नशील हैं या नहीं।” यह कथन उनके मानवतावादी दृष्टिकोण को दर्शाता है।

​3. रंगभेद और साम्राज्यवाद का विरोध

​अटल बिहारी वाजपेयी ने रंगभेद (Apartheid) की नीति की कड़े शब्दों में निंदा की, विशेष रूप से अफ्रीका के संदर्भ में। उन्होंने ज़ोर दिया कि रंगभेद के सभी रूपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए।

​”अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है, प्रश्न यह है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा। निःसंदेह रंगभेद के सभी रूपों का जड़ से उन्मूलन होना चाहिए।”

​इसके अलावा, उन्होंने मध्य-पूर्व के मुद्दे को उठाते हुए इजरायल द्वारा वेस्ट बैंक और गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने के प्रयास की भी निंदा की और संयुक्त राष्ट्र से इसे अस्वीकार करने का आग्रह किया।

​4. निरस्त्रीकरण और शांति की नीति

​वाजपेयी ने स्पष्ट किया कि भारत शांति और निरस्त्रीकरण के प्रति दृढ़ संकल्पित है। शीत युद्ध के चरम के दौरान, उन्होंने गुटनिरपेक्षता की भारतीय नीति को दोहराया और परमाणु हथियारों के प्रसार पर चिंता व्यक्त की।

​”भारत न तो कोई शस्त्र शक्ति है और न बनना ही चाहता है। नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनर्घोषणा की है।”

​भारत की विदेश नीति के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने कहा कि भारत गुटनिरपेक्ष आंदोलन के माध्यम से शांति और सभी राष्ट्रों के साथ दोस्ती के लिए खड़ा है।

​5. मानव का भविष्य

​भाषण का एक सर्वस्पर्शी विषय ‘मानव का भविष्य’ था। उन्होंने कहा कि यह वह विषय है जो आगामी वर्षों और दशकों में बना रहेगा। उन्होंने राष्ट्रों के बीच सहयोग, गरीबी उन्मूलन, विकास और एक नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों को उनके संसाधनों का उचित मूल्य मिलना चाहिए।
​भाषण का समापन करते हुए उन्होंने पूरी दुनिया को एक विश्व (One World) के आदर्शों की प्राप्ति के लिए भारत के त्याग और बलिदान की भावना का आश्वासन दिया और “जय जगत” (विश्व की जय) के नारे के साथ धन्यवाद कहा।
​यह भाषण केवल हिंदी भाषा का गौरव नहीं था, बल्कि यह भारत के नैतिक, लोकतांत्रिक और मानवतावादी सिद्धांतों का अंतर्राष्ट्रीय मंच पर एक सशक्त प्रदर्शन था।
​यह वीडियो वाजपेयी जी के 1977 के संयुक्त राष्ट्र महासभा में दिए गए ऐतिहासिक हिंदी भाषण के मुख्य अंशों को दर्शाता है।

लेडीज बैग और कोलंबिया

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व्यंग

लेडीज बैग और कोलंबिया

“बहुत सुंदर है। कहां से लाई?”

ये चेन्नई गए थे। वहीं से लाए थे।

“बहुत सुंदर है। हमारे तो कहीं जाते ही नहीं। “

ये तो जाते रहते हैं। लाते रहते हैं।

‘बैग..?”

अरे नहीं। बैग नहीं। कभी कुछ। कभी कुछ।

‘महंगा होगा?”

दूर से लाए हैं तो महंगा ही होगा।

पड़ोसन ने बैग का अपने सजल नेत्रों में स्क्रीन शॉट लिया। कुछ दिन बाद वही बैग उसके कंधों पर था । घर में जंग छिड़ गई। एक बैग दो के कंधों पर कैसे? निश्चित, तुम दो लाए होंगे।

( एक वस्तु, एक रंग महिला शास्त्र में निषेध है)

भारतीय नारी बहुत बोझ उठाती है। गहने। सड़क पर झाड़ू लगाता परिधान। दोनों हाथों की उंगलियों से उनको पकड़े रखना। फिर कंधे का भारी भरकम बैग। ऊंची हिल। कद ऊंचा। घर का बोझ। पति का बोझ। बच्चों का बोझ। समाज का बोझ। दुनिया का बोझ। माथे पर बिंदी। मांग में सिंदूर। बिछुए। पायल। अधरों पर लाली। कानों में बाली। नाक में नथ। आंखों में न जाने क्या क्या? उफ़! इतना बोझ।

आदमी तो मर जाए। वह तो पर्स भी पीछे की जेब में रखता है। आमदनी सदा छिपा कर रखनी चाहिए। बीबी ऐसा नहीं करती। वह सदा मोटा बैग अपने कंधों पर रखती है। पता नहीं, कब आलू खरीदने पड़ जाएं। बैग होगा तो पांच किलो आलू कभी भी ले लो।

मल्टी पर्पज यह बैग। एक बार पति ने जिद पकड़ ली-” दिखाओ, इसमें क्या क्या है?” पत्नी मना करती रही। पति ने पर्स यानि बैग झटक लिया। निकला क्या..? एक लिपस्टिक, एक कंघा, एक शीशा, दूध की बोतल ( ऐच्छिक), मोबाइल और एस्प्रिन या डोलो।

पति बोला..”इतने से सामान के लिए इतना बड़ा बैग?”

“तुम कुछ नहीं समझते। लाओ मेरा बैग। देख लिया। तसल्ली हो गई। आजकल यही चल रहा है। अबकि बाहर जाओ। तो थोड़ा बड़ा लाना। ये छोटा पड़ रहा है। काम नहीं चलता।”

कोलंबिया यूनिवर्सिटी में एक सवाल पूछा गया। कार बाइक से भारी क्यों होती है? इसका उत्तर भारत को ही देना था। सो, हमारे नेता जी ने दिया। “एक पैसेंजर को ले जाने के लिए कार में 3,000 किलो धातु चाहिए, जबकि 100 किलो की बाइक दो पैसेंजर ले जाती है। तो आखिर क्यों बाइक 150 किलो के धातु से दो लोगों को ले जा सकती है, लेकिन कार के लिए 3,000 किलो की जरूरत होती है । कार से इंजन चिपका होता है। अलग नहीं होता। बाइक में अलग हो जाता है।

यह है बेसिक डिफरेंस। पर्स और लेडीज पर्स का। लेडीज पर्स यानि डबल इंजन सरकार। यानी कार का इंजन। यानी खुद्दारी। दाल कैसी भी हो। तड़का मिर्च का होना चाहिए। यह ज्ञान हमको भारत के लोगों से परदेश में मिलता है।

अपनी पत्नी कितने सिसी यानी क्यूबिक कैपेसिटी (Cubic Capacity) की है। यह कौन पता करेगा? यकीन मानिए। ऐसा कोई मानक नहीं जो यह बता सके लेडीज बैग इतना भारी क्यों होता है। कोई महिला डॉक्टर के यहां वजन नहीं कराती। डॉक्टर भी जिद नहीं करता। इंजन-इंजन का फर्क है।

सूर्यकांत द्विवेदी

वरिष्ठ लेखक और चिंतक

ट्रंप ने इस्राइल से कहा− तुरंत बमबारी रोके

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गाजा में युद्ध खत्म कराने संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की योजना के कुछ बिंदुओं को हमास द्वारा स्वीकार कर लिए जाने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइल को बमबारी तुरंत रोकने का आदेश दिया है। हमास ने कहा है कि वह बंधकों को रिहा करेगा और वह सत्ता अन्य फलस्तीनियों को सौंपेगा, हालांकि योजना के कुछ अन्य बिंदुओं पर फलस्तीनियों के बीच विस्तृत चर्चा होगी।

हमास के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि कुछ प्रमुख असहमतियां हैं, जिनपर विस्तृत चर्चा की जरूरत है। ट्रंप ने हमास के फैसले का स्वागत करते हुए लिखा, ‘‘मुझे लगता है कि वे दीर्घकालिक शांति के लिए तैयार हैं।’’ उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘‘इजराइल को गाजा में बमबारी तुरंत रोकनी होगी ताकि बंधकों को सुरक्षित तथा शीघ्र रिहा कराया जा सके। फिलहाल हमले जारी रखना बहुत खतरनाक होगा।’’ इस बीच,इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा कि इजराइल गाजा में युद्ध खत्म कराने की अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की योजना के ‘पहले चरण’ को लागू करने की तैयारी कर रहा है।

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने शनिवार को जारी एक बयान में कहा कि इजराइल अपने सिद्धांतों के अनुसार युद्ध खत्म करने के लिए ट्रंप को पूरा सहयोग देगा। हमास की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि गाजा के भविष्य और फलस्तीनी अधिकारों से संबंधित प्रस्ताव के पहलुओं पर निर्णय अन्य गुटों की सर्वसम्मति और अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर लिया जाएगा। बयान में हमास के हथियार डालने के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया है, जो ट्रंप के प्रस्ताव में शामिल इजरायल की एक प्रमुख मांग थी। मुख्य मध्यस्थों मिस्र और कतर ने ताजा घटनाक्रमों का स्वागत किया है।

कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने कहा कि वे योजना पर चर्चा जारी रखेंगे। संयुक्त राष्ट्र महासिचव एंतोनियो गुतारेस के प्रवक्ता ने सभी पक्षों से गाजा में जारी युद्ध को खत्म कराने के इस अवसर का इस्तेमाल करने का आह्वान किया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सोशल मीडिया पर लिखा कि सभी बंधकों की रिहाई और गाजा में संघर्ष विराम करीब है। इजराइली बंधकों के परिवारों का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्य संगठन ने कहा कि लड़ाई रोकने की ट्रंप की मांग बंधकों को गंभीर व अपरिवर्तनीय क्षति से बचाने के लिए आवश्यक है। संगठन ने नेतन्याहू से “सभी बंधकों को वापस लाने के लिए तुरंत सार्थक वार्ता शुरू करने” का आह्वान किया। इससे पहले ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि हमास को रविवार शाम तक योजना को मंजूरी देनी होगी, वरना और बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी।

ट्रंप ने शुक्रवार को सोशल मीडिया पर लिखा था, “अगर समझौते के इस आखिरी मौके में सफलता नहीं मिलती है तो हमास पर ऐसा कहर टूटेगा जैसा पहले कभी नहीं देखा गया। पश्चिम एशिया में किसी भी तरह शांति कायम की जाएगी।” ट्रंप ने इस हफ्ते की शुरुआत में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत के बाद गाजा पट्टी में युद्ध समाप्त कराने के लिए एक योजना पेश की थी। इस योजना के तहत हमास तीन दिन के अंदर शेष 48 बंधकों को इजराइल को सौंपेगा, जिनमें से करीब 20 की मौत होने की आशंका है। इसके अलावा हमास को सत्ता छोड़नी होगी और हथियार डालने होंगे। इसके बदले इजराइल हमले रोकेगा और गाजा के अधिकतर क्षेत्र से पीछे हट जाएगा। साथ ही इजराइल को सैंकड़ों फलस्तीनी कैदियों को छोड़ना होगा और गाजा के पुननिर्माण के लिए मानवीय मदद की आपूर्ति को मंजूरी देनी होगी। गाजा की अधिकांश आबादी को अन्य देशों में स्थानांतरित करने की योजना स्थगित कर दी जाएगी। समझौते के तहत, गाजा का प्रशासन एक अस्थायी, तकनीकी और गैर-राजनीतिक फलस्तीनी निकाय को सौंपा जाएगा, जिसकी निगरानी “बोर्ड ऑफ पीस” करेगा। इस निकाय के अध्यक्ष राष्ट्रपति डोनाल्ड जे ट्रंप होंगे और इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर सहित अन्य वैश्विक नेता सदस्य बनाए जाएंगे। समझौते के तहत, क्षेत्रीय साझेदार गारंटी देंगे कि हमास और अन्य गुट इस समझौते का उल्लंघन नहीं करेंगे और गाजा किसी के लिए खतरा नहीं बनेगा।

इसके तहत, अमेरिका, अरब देशों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ मिलकर गाजा में एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण बल (आईएसएफ) तैनात करेगा, जो स्थानीय फलस्तीनी पुलिस बलों को प्रशिक्षित करेगा और सुरक्षा बनाए रखेगा। योजना में कहा गया है कि इजराइल गाजा पर कब्जा नहीं करेगा और न ही उसे अपना हिस्सा बनाएगा। आईएसएफ द्वारा स्थिरता सुनिश्चित किए जाने के बाद, इजराइली रक्षा बल (आईडीएफ) चरणबद्ध रूप से क्षेत्र से हटेंगे, सिवाय उन सीमावर्ती इलाकों के जो अंतिम सुरक्षा सुनिश्चित होने तक नियंत्रण में रहेंगे।

आज का इतिहास

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4 अक्टूबर की महत्त्वपूर्ण घटनाएँ :——
बैजेंटाइन साम्राज्य तथा वेनिस गणराज्य के बीच एक शांति समझौता 1302 में हुआ।
मेक्सिको 1824 में एक गज णराज्य बना।
नीदरलैंड से अलग होकर 1830 में बेल्जियम साम्राज्य बना।
यूएस ने 1943 में जापानियों से सॉलोमन पर कब्जा कर लिया।
क्यूबा और हैती में 1963 को चक्रवाती तूफान ‘फ्लोरा’ से छह हजार लोग मरे।
भारत ने 1974 में दक्षिण अफ्रिका की सरकार की रंभेदी नीति का प्रतिरोध करने के लिए वहाँ जाकर डेविस कप में भाग लेने से इनकार कर दिया।
भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक को हिंदी में संबोधित किया। हिंदी में दिया गया यह पहला संबोधन था।
जूलियन असांजे ने विकीलीक्स की स्थापना 2006 को की।
नोबेल पुरस्कार समिति ने 2011 को भौतिकी के क्षेत्र में अमूल्य योगदान के लिए अमेरिका के सॉल पर्लमटर और एडम रीस तथा अमेरिकी मूल के आस्ट्रेलियाई नागरिक ब्रायन श्मिट को वर्ष 2011 का नोबेल पुरस्कार प्रदान करने की घोषणा की।
मैक्सिको के राष्ट्रीय मानव विज्ञान एवं इतिहास संस्थान ने 2011 को उत्तर में स्थित दुरांगो प्रांत से प्राप्त मानवीय अस्थियों के आधार पर दावा किया है कि प्राचीन समय में यहां के आदिवासी नरभक्षी थे।
दुनिया के नंबर एक डबल ट्रैप निशानेबाज भारत के रोंजन सोढ़ी ने 2011 को संयुक्त अरब अमीरात के अल आईन में विश्वकप मुकाबले में ओलिम्पिक पदक विजेता चीन के बिनयुआन को पराजित कर अपने खिताब की रक्षा करने वाले दुनिया के पहले खिलाड़ी बने।
फॉर्मूला वन के बादशाह माइकल शूमाकर ने 2012 को संन्यास लिया।
4 अक्टूबर को जन्मे व्यक्ति :—–
‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ में भारत की दूसरी महिला अधिकारी तथा मध्य प्रदेश की भूतपूर्व राज्यपाल सरला ग्रेवाल का जन्म 1927 में हुआ।
बीसवीं शताब्दी के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार रामचन्द्र शुक्ल का जन्म 1884 में हुआ।
प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी एवं लेखक श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 1857 में हुआ।
हिंदी और बांग्ला पार्श्व गायिका संध्या मुखोपाध्याय का जन्म 1931 में हुआ।
हैती के 41वें राष्ट्रपति और नेता जीन क्लाउड दुवेलियर का जन्म 2014 में हुआ।
4 अक्टूबर को हुए निधन:—-
खलीफा अल आदिल का 1227 मे निधन
भारतीय फिल्म निर्देशक एवं निर्माता इदिदा नागेश्वर राव का निधन 2015 में हुआ।
भारतीय सेना का एक सैनिक बाबा हरभजन सिंह का निधन 1968 में हुआ।
4 अक्टूबर के महत्त्वपूर्ण अवसर एवं उत्सव:—–
विश्व पशु कल्याण दिवस

विलुप्त होते जा रहे दुर्लभ प्रजाति के जीव जंतु

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में हर वर्ष दो से आठ अक्टूबर तक वन्यजीव सप्ताह मनाया जाता है। इस वर्ष यह सेवा पर्व विषय के अंतर्गत आयोजित किया जा रहा है, जो प्रकृति के प्रति सेवा और दायित्व की व्यापक भावना प्रदर्शित करता है। वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन के महत्व के बारे में व्यापक जागरूकता के प्रसार के लिए यह आयोजन किया जा रहा है।

वन्यजीव संरक्षण केवल एक प्रजाति या समुदाय के लिए नहीं है। यह समूची मानव जाति के व्यापक हित और कल्याण से जुड़ा है। पृथ्वी पर जन जीवन का आधार वन्यजीव है। वन्यजीव संरक्षण में उनके समुचित प्राकृतिक आवास और आर्थिक संसाधन महत्वपूर्ण केंद्र बिन्दु के रूप में उभरे है। ये दो केंद्र बिंदु हमारे ग्रह की विविध प्रजातियों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जागरूकता बढ़ाने, व्यवहार बदलने और नीति में बदलाव लाने के लिए महत्वपूर्ण हैं। थीम के मुताबिक हमें वन्यजीवों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण हेतु न केवल आर्थिक संसाधनों का प्रबंध करना है अपितु जैव विविधता की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने है, ताकि इसका लाभ समाज और धरती को भी मिले। वन्यजीवों के लुप्त होने की चिंताजनक दर को अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ की रिपोर्ट से रेखांकित किया गया है, जिससे पता चलता है कि लगभग 44,016 प्रजातियाँ विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं। यह अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ रेड लिस्ट में सूचीबद्ध 157,190 प्रजातियों में से लगभग 28  फीसदी है। इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की प्रौद्योगिकियों का पता लगाने और उन्हें एकजुट करने, खतरों को कम करने और वन्यजीवों को विलुप्त होने से बचाने के लिए उन्हें फिर से लागू करने के सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। भारत में विभिन्न वन्य जीवों की आबादी में लगातार वृद्धि हो रही है। हमें अपने वनों की सुरक्षा और जानवरों के लिए सुरक्षित आवास सुनिश्चित करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए।

मानव सभ्यता ने प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन शुरू कर दिया। जंगलों को खत्म कर दिया गया। ऐसे ही कितने ही जीव-जंतुओं का शिकार इस हद तक किया गया कि वह विलुप्त होने की कगार में हैं और कुछ तो विलुप्त भी हो गए। पूरा संसार जंतु तथा पेड़- पौधों की विभिन्न प्रजातियों से भरा हुआ है। सभी प्रजातियों के जीव, जंतु, पेड़, पौधे तथा पक्षी पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व के लिए अपने-अपने तरीकों से महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। वन्यजीव मानव अस्तित्व के समय से ही धरती पर उपस्थित हैं, तथा एक- दूसरे के जीवन का अभिन्न अंग भी बन चुके हैं। नई बस्तियां बसाने, औद्योगीकरण, बढ़ती हुई आबादी, गैरकानूनी व्यापार तथा शिकार इत्यादि कार्यों का वन्यजीवों पर विपरीत असर पड़ रहा है। धरती जीव- जंतुओं तथा पौधों की विभिन्न प्रजातियों की संख्या इतनी अधिक तेजी से घट रही है, जितनी तेज गति से यह पूर्व में शायद ही कभी घटी हो। प्रत्येक  24 घंटे के अंदर जीव-जंतुओं तथा पेड़-पौधों की लगभग 200 प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। इस भांति प्रति वर्ष करीब 73,000 प्रजातियां पृथ्वी से विलुप्त हो रही हैं।

भारत में विश्व के पांच प्रतिशत अर्थात 75,000 प्रजातियों के जीव-जन्तु निवास करते हैं तथा वनस्पतियों की 45,000 प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं।  जनसंख्या विस्फोट और शहरीकरण के ही परिणाम हैं कि वनों को काटकर इसे इमारतों, होटलों, या मानव बस्तियों में बदलने की गतिविधियों में वृद्धि हुई है। इसके परिणामस्वरूप जंगल में रहने वाले विभिन्न प्रजातियों के निवास स्थान में कमी आई है। उन्हें उन स्थानों को छोड़ना पड़ता था और नए आवास की तलाश करनी होती थी जो कि आसान नहीं होता है। नए निवास स्थान की खोज, भोजन के लिए बहुत सारी प्रतियोगिता, कई प्रजातियों को लुप्त होने की कगार पर ले जाती है। लेकिन आज इनमें से कई विलुप्त हो गई हैं और कई विलुप्त होने की कगार पर हैं। प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे का पहला कारण इनके रहने की जगह लगातार कम होना है। और इसके लिए जिम्मेदार इंसान हैं क्योंकि इनको भोजन और आश्रय प्रदान करने वाले पेड़ों को वह अपने स्वार्थ के लिए लगातार काट रहे हैं। साथ ही खनन और कृषि जैसी मानवीय गतिविधियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।

वन्यजीव जानवर और पौधे प्रकृति के महत्वपूर्ण पहलू हैं। किसी भी स्तर पर नुकसान होने पर इसके अप्राकृतिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। वे पारिस्थितिक संतुलन के लिए जिम्मेदार हैं और मानव जाति के निर्वाह के लिए, यह संतुलन बनाए रखना चाहिए। इसलिए सरकार द्वारा संरक्षण प्रयासों के साथ, यह हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी है, कि हम व्यक्तिगत रूप से वन्यजीवों के संरक्षण में अपना योगदान करें।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

D 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

आज शेखर जोशी की पुण्य तिथि है

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साहित्यकार शेखर जोशी का 90 वर्ष की आयु में आज के दिन ही वर्ष 2022 में निधन हो गया था। उन्होंने गाजियाबाद के वैशाली सेक्टर-4 स्थित पारस अस्पताल में अंतिम सांस ली थी। शेखर जोशी कथा लेखन को दायित्वपूर्ण कर्म मानने वाले सुपरिचित कथाकार थे।

शेखर जोशी की कहानियों का अंगरेजी, चेक, पोलिश, रुसी और जापानी भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी कहानी दाज्यू पर बाल-फिल्म सोसायटी द्वारा फिल्म का निर्माण किया गया है।

नौकरी छोड़ बन गए “कोशी के घटवार”

शेखर जोशी का जन्म 10 सितम्बर 1932 को अल्मोड़ा जनपद के सोमेश्वर ओलिया गांव में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अजमेर और देहरादून से प्राप्त की थी। 12वीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान ही उनका चयन ईएमई सुरक्षा विभाग में हो गया। वह 1986 तक विभाग में कार्यरत रहे।

उन्होंने नौकरी से स्वैच्छिक रूप से त्याग पत्र दे दिया। फिर वह लेखन से जुड़ गए और काफी लेखन किया लेकिन उनको प्रसिद्धि ‘कोशी के घटवार’ से मिली थी।

रजनीकांत शुक्ला की वाँल से साभार

देवमंजनी( नारीदमदमी)

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नारी धमनी को आयुर्वेद का पैरासिटामोल कहा जाता है यह बुखार की आयुर्वेदिक औषधि है जो पैरासिटामोल से तेज असर करती है…. नारी_दमदमी

चिकन गुनिया बुखार की नारी दमदमी अचूक औषधि है। जब-जब भी इसका उपयोग किया बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुई।

यह बात बिल्कुल सत्य और अनुभूत है नारी दमदमी से बुखार जड़ से चला जाता है इसका बहुतों ने उपयोग किया है इसके पौधे को पानी से साफ करने के बाद में सिलवट पर बांटा जाता है बांटने के बाद इसमें नीम की कोपल और गुटवेल और थोड़ी सी अजवाइन और दो-चार काली मिर्च इनको डाल करके सिलवट पर पीसकर इसका रस एक बर्तन पर कपड़े से छानकर एक गिलास में रख लो ।इसके बाद मिट्टी के दिया को आग में गर्म कर दो ।गर्म करने के बाद में उस दिए को एक बर्तन में रखकर उस दवाई को दिए में डाल दो ।भाप लो ।इसके बाद में उसको पी जाओ और कपड़ा उड़कर सो जाओ।
अनुभव
(राम शरण )जी का अनुभव नारी दमदमी का नाम प्रतापगढ़ जिले में देव मंजनी नाम से जानते हैं बुखार के लिए रामबाण दवा है इसको मैं बुखार में स्वयं पिया है बहुत कड़वी होती है लेकिन बुखार एक ही बार में उतर जाता है बुखार का पता ही नहीं लगता कब बुखार आई कब खत्म हो गई पता ही नहीं लगता।

राधेश्याम पाल जी का कमेंट इसका नाम नामी है। इसे तीन दिन तक काडा बनाकर पीलें एक कप। साल भर तक बुखार नही आएगा।

नारी दमदमी को ताजी पांच ग्राम जड़ सहित पूरे पौधे को लेकर कूट लें । तीन कालीमिर्च पीसकर चार कप पानी में उबाल लें ।जब एक कप बचे तब उसे छान कर सुबह खाली पेट पीने से बुखार दूर हो जाता है। सात खुराक( सात दिन)से अधिक नहीं पीना चाहिए ।यह औषधी गर्म और शुष्क है । इस औषधि के सेवन करने के समय घी का सेवन अधिक करें।
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यशपाल सिंह, आयुर्वेद रतन

अब पीओके खुद ही पाकिस्तान से अलग हो जाएगा

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समय आ गया है कि पीओके अब स्वतः ही पाकिस्तान से अलग हो जाएगा । पीओके मांगे हिन्दुस्तान । इंडियन एयर चीफ और सेनाध्यक्ष ने पाकिस्तान को बता दिया है कि उसका भूगोल जल्द ही बदलने वाला है । पहली बार खुलासा किया कि सिंदूर ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान के एफ 16 तथा जेएफ 17 सहित कम से कम 12 विमान नष्ट कर दिए , जबकि भारत के सभी विमान सुरक्षित हैं ।

निश्चित रूप से भारतीय सेना ने बड़ा बयान दिया है । बलूचिस्तान और खैबर पख़्तून के बाद पीओके पाकिस्तान से अलग होने को तैयार है । सिंध सूबे में भी अलगाव की आग सुलग रही है । पाकिस्तान की ताजा हरकतों को देखते हुए जाहिर होता है कि ऑपरेशन सिंदूर पार्ट 2 अब काफी करीब है । दिवाली के बाद भारत यदि एक और जंग में उतरकर पाकिस्तान का नक्शा बदल डाले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए । सेनाध्यक्ष ने भी कहा है कि पाकिस्तान का वजूद खत्म होने के करीब है ।

अब समझ आ गया है कि ऑपरेशन सिंदूर को ओपन क्यूँ रक्खा गया था । पाकिस्तान का काम तमाम बाकी है , देखते जाइए । इसी बीच दुनिया में बदलते घटनाक्रम को देखिए । पीओके में पांच दिनों से आजादी के लिए घमासान , 25 पाक सैनिकों को बंधक बनाया । बलूचिस्तान और ख़ैबर पख़्तून के बाद पाकिस्तान की नई मुसीबत बना पीओके ।

ऑपरेशन सिंदूर की अपार सफलता के बाद पाकिस्तान में बुरी तरह खलबली मची है । शाहबाज शरीफ़ को अपदस्थ कर कभी भी सत्ता संभाल सकते हैं आसिम मुनीर । पाक जनता में मुनीर के खिलाफ गहरी नाराजगी । मुनीर के अमेरिका के साथ गहराते रिश्तों को लेकर चीन सख्त नाराज । ऑपरेशन सिंदूर अभी भी ओपन , पीओके के हालात को लेकर भारत सजग ।

अब इसी के साथ कुछ दूसरी सुर्खियां देखिए । अमेरिका में ट्रंप सरकार घर में ही घिरी । ट्रंप ने पार्कों सहित दर्जनों सरकारी सार्वजनिक स्थल बंद किए । बेहद गंभीर वित्तीय हालात के चलते अनेक क्षेत्रों में शटडाउन । सात लाख कर्मचारियों को फरलो यानि जबरन अवकाश पर भेजा । ट्रंप और अमेरिकी सीनेट में ठनी । बजट पास न करा पाई ट्रंप सरकार ।डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप की विदेश नीतियों पर जबरदस्त प्रहार किया । कोई भी युद्ध रोकने में ट्रंप नाकाम । नोबल प्राइज कमेटी ने कहा ट्रंप को नोबल देने का कोई प्रस्ताव विचारार्थ नहीं । जाहिर हे जो डोनाल्ड ट्रंप भारत से बेवजह दुश्मनी पाल रहे थे , बार बार पाकिस्तान के कायर सेनापति आसिम मुनीर और बिना रीढ़ के शाहबाज को बुलाकर डींगें हांक रहे थे अब अपने ही घर में घिर गए हैं ।

भारत के कुछ तत्कालीन नेताओं की भीषण गलतियों के कारण पीओके का जन्म पाकिस्तान में हुआ । वरना पीओके तो हमारा कश्मीर ही था । तभी भारतीय जनसंघ ने कश्मीर वापस लेने का स्वप्न देखा था । उस स्वप्न के साकार होने का समय अब आ गया है । यद्यपि भारत में जैसा माहौल आज है उसे देखते पीओके की 1.5 करोड़ आबादी को भारत में मिलाकर आबादी बढ़ाना अपने आप में एक समस्या है । लेकिन सपने साकार किए जाते हैं और पीओके हासिल करने का समय अब करीब है । सच यह है कि पीओके टूटा तो फिर पाकिस्तान का खंड खंड होना एकदम सुनिश्चित है ।

…..कौशल सिखाेला

वरिष्ठ पत्रकार

पहले भी जारी होते रहे हैं सिक्के और डाक टिकट

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कृतिका राजपूत

कुछ लोगों को कल से दौरा पड़ा हुआ है कि आरएसएस के सौ साल होने पर भारत सरकार डाक टिकट और सिक्का कैसे जारी कर सकती है?

तो उनको ये बताना जरूरी है कि भारत सरकार मुहम्मद इकबाल पर डाक टिकट जारी कर चुकी है. वे पाकिस्तान के मूल संस्थापक हैं. जिन्ना को पाकिस्तान का ख्याल बाद में आया. पाकिस्तान ने उन पर दस से ज्यादा डाक टिकट जारी किए हैं. भारत सरकार ने भी उनकी शान में 1988 में राजीव गांधी के समय एक डाक टिकट जारी कर दिया.कांग्रेस सरकार जिन्ना वाली मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद इस्माइल पर भी डाक टिकट जारी कर चुकी है. पाकिस्तान के लिए लंबी लड़ाई लड़ने के बाद वे कभी पाकिस्तान नहीं गए क्योंकि उनका बिजनेस यहीं भारत में था.इसके अलावा मनमोहन सरकार ने हसरत मोहानी पर भी डाक टिकट जारी किया. मजेदार ये है कि पाकिस्तान ने हसरत मोहानी को “पाकिस्तान का संस्थापक” बताते हुए डाक टिकट जारी किया है.सोनिया-मनमोहन सरकार ने दारूल उलूम देवबंद के मौलाना और जमाते इस्लामी के संस्थापक हुसैन अहमद मदनी की याद में 2012 को डाक टिकट जारी किया था.वे भारत को तुर्की के खलीफा के मार्गदर्शन में इस्लामिक देश बनाने के रेशमी रुमाल आंदोलन के कारण गिरफ्तार किए गए थे. वे खिलाफत आंदोलन में ये कहकर आए कि ब्रिटेन ने भारत की हुकूमत मुसलमानों से छीनी है. वे भी भारत में रह गए.वैसे तो नेहरू जी के समय में ही उनको पद्म भूषण दे दिया गया था.

तो हर सरकार की अपनी प्राथमिकता होती है कि किसका सम्मान करें. कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के नेताओं और पाकिस्तान के संस्थापको पर डाक टिकट जारी किया, वर्तमान सरकार ने आरएसएस के सौ साल होने पर.हर पार्टी की सरकार अपने मूल समर्थकों का ख्याल रखती है.

वैसे इंदिरा गांधी ने विनायक दामोदर सावरकर की स्मृति में डाक टिकट जारी किया था. लेकिन वह दूसरी कांग्रेस थी।

कृतिका राजपूत की वाँल से

न्यूज चैनल के रवैये ने बढ़ाया प्रिंट मीडिया में विश्वास

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वंदना शर्मा

आज इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बोरिंग और उबाऊ हो गया है। जब भी टीवी खोलो न्यूज़ सुनने के लिए या तो वहां फालतू की बहस चलती रहेगी, जिसमें सब भेड़ बकरी की तरह चिल्लाते रहते हैं। मुद्दा क्या है? समाधान क्या है ?किसी को कोई मतलब नहीं। एक ही खबर को बार-बार दिखाते रहते हैं। पूरे भारत में क्या हो रहा है, क्या समस्या है इन न्यूज़ चैनल को कोई मतलब नहीं। उत्तरी भारत में उत्तर पूर्वी भारत में जैसे असम −मेघालय सिक्किम वहां की तो कोई खबर ही नहीं दिखाते हैं । उत्तर भारतीय क्षेत्र के लोगों की क्या समस्याएं  हैं, उससे  इन्हें कोई मतलब नहीं। बस फिल्म स्टार क्या कर रहे हैं। नेता क्या कर रहे हैं? इन्हीं पर इनका  फोकस रहता है ।

 मजबूरन आज आम आदमी सोचता है कि इनमें इन सबसे अच्छा है तो कोई अखबार पढ़ लो ।सही और प्रामाणिक खबर मिलेंगी ,वह भी तथ्यों के साथ ।नो बकवास कोई मजबूरी भी नहीं ।जबरदस्ती ऊंट −पतंग खबरें सुनने की टीवी पर तो एक ही खबर को इतना बढ़ा− चढ़ाकर दिखाते हैं कि अगर  मुख्य तथ्य सुनने बैठो तो आधा घंटा उनकी बकवास सुनाई पड़ती है अपनी रुचि के अनुसार जब चाहे अखबार को पढ़ो, कहीं भी ले जाओ । बाहर खुले में या कहीं भी बैठकर आप अपनी सुविधा अनुसार पढ़ सकते हैं। हर क्षेत्र की खबरें आती है । विज्ञापन, कला ,साहित्य ,देश −विदेश राजनीति सब जिसको जो अच्छा लगे, वह खबर अपने इच्छा अनुसार पढ़ लो कोई मजबूरी नहीं है कि सारी खबर ही तुम्हें पढ़नी है ।

आज  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में झूठ भी ज्यादा दिखाते हैं वहां कोई प्रमाणिकता भी नहीं होती है ।आरपरेशन सिंदूर के दौरान एक ने दिखाया कि भारत ने करांची फतह कर लिया तो एक के एंकर चिल्ला रहे  कि भारतीय सेनाएं लाहौर में घ़ुंस गईं।अब दो दिन से चल रहा है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ में विटो पावर मिल गई।इस प्रस्ताव पर आयाअमेरिका का विटो निरस्त  हो गया।

 ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशंस (ABC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से जून 2025 की अवधि में दैनिक अखबारों की औसत योग्य बिक्री 2.77 प्रतिशत बढ़कर 29,74,148 प्रतियां पहुंच गई, जो पिछले छह माह (जुलाई-दिसंबर 2024) की 28,94,1876 प्रतियों से 8,02,272 प्रतियों की शुद्ध वृद्धि दर्शाती है। यह वृद्धि तीन प्रतिशत के आसपास है।यह आंकड़ा न केवल प्रिंट की लचीलापन को रेखांकित करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि सत्यापित और गहन पत्रकारिता की भूख आज भी बरकरार है।

ABC के महासचिव अदिल कसाद ने एक बयान में कहा, “ये आंकड़े पाठकों के अटूट विश्वास को उजागर करते हैं। समाचार पत्र विश्वसनीय, सत्यापित और विस्तृत जानकारी का मजबूत स्रोत बने हुए हैं।” यह वृद्धि वैश्विक स्तर पर प्रिंट उद्योग के पतन के दौर में भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत है, जहां कई देशों में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने पारंपरिक मीडिया को पीछे धकेल दिया है। लेकिन भारत में, जहां साक्षरता दर बढ़ रही है और आर्थिक विकास तेज हो रहा है, प्रिंट अभी भी सूचना का मुख्य माध्यम बना हुआ है।ABC के आंकड़ों से स्पष्ट है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रिंट की मांग बढ़ी है, खासकर युवा और शिक्षित वर्ग में।

यह वृद्धि महामारी के बाद की रिकवरी का हिस्सा है। 2020 में कोविड-19 ने प्रिंट उद्योग को बुरी तरह प्रभावित किया था, लेकिन 2024 से शुरू हुई सुधार की प्रक्रिया अब गति पकड़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह 8 लाख से अधिक की वृद्धि प्रिंट मीडिया की बाजार हिस्सेदारी को 2025 के अंत तक और मजबूत करेगी

सोशल मीडिया पर फेक न्यूज और अफवाहों की बाढ़ के बीच, प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता एक बड़ा कारक बन गई है। ABC रिपोर्ट में उल्लेख है कि पाठक गहन विश्लेषण और सत्यापित तथ्यों की तलाश में समाचार पत्रों की ओर लौट रहे हैं। एक हालिया सर्वे में 70 प्रतिशत से अधिक पाठकों ने प्रिंट को डिजिटल से अधिक भरोसेमंद बताया।

वंदना शर्मा