रेवंद चीनी एक पहाड़ी बूंटी

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, रेवंद चीनी -क्या हैं रेवंद चीनी के औषधिय गुण? रेवंदचीनी को रेवतिका भी कहते हैं

। यह एक जड़ी-बूटी है। आप रेवंद चीनी से लाभ लेकर अनेक रोगों से रोग मुक्त होसकते है यह आर्टिकल आयुर्वेद एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शोध पर आधारित है।

आयुर्वेद ग्रंथ भाव प्रकाश के अनुसार. रेवतिका (रेवंदचीनी) तेज सिर दर्द (Blister), रक्त विकार, दस्त (Diarrhoea), डायबिटीज (Diabetes) कैंसर आदि में लाभ पहुंचाता है। भूख न लगना, पाचन धीमा होना, पेशाब में जलन, गांठ, घाव, इत्यादि रोग में भी रेवतिका (रेवंदचीनी) से लाभ ले सकते हैं।

रेवातिका (rhubarb) स्वाद में कडवी और तीखी होती है। इसकी तासीर ठंडी होती है। रेवंद चीनी एक पहाड़ी वनस्पति है, जिसकी जड़ चिकित्सा के लिए प्रयोग में लाई जाती है। रेवंदचीनी की जड़ सख्त लकड़ी जैसी और मोटी होती है। इसकी जड़ भूरे पीले रंग की होती है। जड़ का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। रेवंदचीनी (indian rhubarb) हिमालयी वनों में पायी जाने वाली औषधि है यह जम्मू-कश्मीर हिमाचल प्रदेश उत्तराखंड सिक्किम आसाम में उच्च हिमालय क्षेत्र 3350मीटर से3650मीटर की उंचाई तक पैदा होती है। हम आपके लिए बहुत ही आसान भाषा मैं रेवंदचीनी के फायदे और नुक्सान बता रहे हैं।

अन्य भाषाओं में रेवंदचीनी के नाम (Rhubarb Called in Different Languages)
रेवंदचीनी पॉलिगोनेसी (Polygonaceae) कुल का पौधा है। इसका वानस्पतिक (वैज्ञानिक) नाम रिअम् ऍस्ट्रेल (Rheum australe D.Don) है। वैज्ञानिक इसे Syn-Rheum emodi Wall. ex Meissn भी कहते हैं। रेवंदचीनी को अंग्रेजी में Rhubarb कहते है यह एक अति उपयोगी आयुर्वेदिक औषधि है इस लिए इसके सभी भाषाओं में नाम क्या हैं यह जानना ज़रुरी है क्या कहते हैं अलग-अलग भाषा में इस औषधि को।

English –हिमालयन रुहबर्व (Himalayan rhubarb) तथा इण्डियन रुहबर्व (Indian rhubarb)
Arabic – रेचीनी (Revandchini), रेवन्दहिन्दी (Revandhindi)
Persian – तुर्सक (Tursak), रावन्दे हिन्दी (Ravande hindi), बिखरेवस (Bikhrewas)
Sanskrit – पीतमूला, अम्लपर्णी, गंधिनी, रेवंदचीनी, रेवंदचीनी
Hindi (rhubarb meaning in hindi) – रेवंदचीनी, डोलू, अर्चा
Urdu – रेवन्दचीनी (Revandchini);
Kannada (rhubarb in kannada) – नट-रेवाचिनी (Nat revachini), रेवल चीनी (Reval chini);
Gujarati – गामिनी रेवनचीनी (Gamini revanchini), लड़कीरेवन्दचीनी (Ladki Revand-chini);
Telugu (rhubarb meaning in telugu) – नट्टू (Nattu), अरिवेल चीनी (Areval chini)
Bengali – रेवन्दचीनी (Revandchini), बंगला रेवनचीनी (Bangla revanchini)
Nepali – अकसे चूक (Akse chuk), पदमचल (Padamchal)
Marathi (rhubarb in marathi) – मूलक (Mulak), चरवल चीनी (Charval chini), रेवन्द चीनी (Revand chini)
Punjabi – चूटियाल (Chutiyal)

रेवंदचीनी के फायदे और उपयोग
अनेक लोगों को दांतों से जुड़ी कई तरह की परेशानियां होती है। दांतों में दर्द, मुंह से बदबू आना दांतों के रोगों में आम है। ऐसे में रेवंदचीनी का प्रयोग करना लाभ दिलाता है। दांतों के दर्द से जल्द राहत पाने के लिए रेवंदचीनी की जड़ को कूटकर चूर्ण (revand chini powder) बना लें। इस चूर्ण को दांतों पर मंजन की तरह मलने से दर्द दूर होता है। इससे दांत-मुंह के अन्य रोग, दुर्गन्ध आदि से भी मुक्ति मिलती है।

कब्ज से परेशान है तो रेवंदचीनी का इस्तेमाल कर सकते हैं। घृतकुमारी (एलोवेरा) का गूदा, सनाय के पत्ते तथा शुण्ठी के चूर्ण 12-12 ग्राम की मात्रा में लें। इसमें 6-6 ग्राम काला नमक और सेंधा नमक मिलाएं। इसमें 3-3 ग्राम की मात्रा में विडङ्ग तथा रेवंदचीनी का चूर्ण (revand chini powder) मिलाकर मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण चूर्ण को 1-2 ग्राम लेकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करने से पुराने से पुराने कब्ज की परेशानी खत्म होती है छोटे बच्चों को यदि स्टूल साफ नहोता हो दो-दो दिन बाद स्टूल जाते हो तो यह योग आयु अनुसार मात्र में सुबह साम गुन गुने पानी में या शहद में मिलाकर दें।

बवासीर के रोगी को यदि खून आता हो तो इसमें रेवंदचीनी तुरंत राहत दिलाती है। रेवंदचीनी की जड़ को पीसकर इसका लेप बवासीर के मस्सों पर लगाएं। इससे बवासीर का दर्द जलन कम होता है और खून आना बंद होता है।

रेवतिका का उपयोग योनि संबंधी कई बीमारियों में कर सकते हैं। योनि में खुजली होने पर रेवंदचीनी के चूर्ण (revand chini powder) को गेहूँ के आटा मिला लें। इस मिश्रण को जल में घोल कर हल्का गुनगुना कर लें। योनि में इसका लेप करने से खुजली की परेशानी ठीक होती है और योनि की शिथिलता तथा अन्य योनि के विकारों का भी नाश होता है।

जल्दी घाव सुख नहीं रहा है तो आप रेवतिका का इस्तेममाल कर सकते हैं। इसके लिए रेवातिका (revand chini benefits) की जड़ को पीसकर घाव पर लगाएं। ऐसा करने से घाव जल्दी भरता है।

रेवंदचीनी का केवल जड़ औषधि के रूप में प्रयोग के लायक होता है। इसके जड़ के प्रयोग के विभिन्न तरीके ऊपर बताये जा चुके हैं.

रेवंदचीनी (revandchini) एक अच्छी औषधि है , लेकिन इसका प्रयोग चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही करना चाहिए ।

रेवंदचीनी के प्रयोग से » 48 घंटे में ही कैंसर और Leukemia के सेल्स ख़त्म होने शुरू हो जाते हैं यह कहना है आयुर्वेद के आचार्यों का आज इसकी पुष्टि अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में होने वाले शोध से भी साबित हो गयी है।
कैंसर के मरीजों पर 25 वर्षों के शोध के बाद केलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के मेडिकल फिजिक्स एवं साइकोलॉजी के सीनियर प्रोफेसर डॉ. हर्डिन बी जॉन्स का कहना है कि कैंसर के इलाज के तौर पर प्रयोग की जाने वाली कीमोथैरेपी cancer पीड़ित मरीज को दर्दनाक मौत की तरह ले जा सकती है। ऐसे में वर्तमान में देश और विदेश में कैंसर की प्राकृतिक चिकित्सा बहुत ही ज्यादा प्रचलन में है और ये बहुत ही ज्यादा सस्ती भी है और इसके नतीजे कई गुना अधिक हैं तो आइये जाने Cancer ka natural ilaj.

रूबर्ब पौधा जिसे रेवतचीनी और रेवन्दचीनी के नाम से भी जाना जाता है. यह पौधा आयुर्वेदिक दवाइयों में प्रयोग किया जाता है. इस पौधे की पत्तियां ज़हरीली होती हैं लेकिन इसके डंठल दवा के रूप में प्रयोग किये जाते है

हालिया हुए यूएस में एक शोध के अनुसार, रूबर्ब पौधे की डंठलों को कैंसर के इलाज के लिए प्रयोग में लाया जायेगा. इस शोध में हैरानी भरे परिणाम सामने आए हैं.

Anthraquinone Glycosides नामक केमिकल जो रेवन्दचीनी में पाए जाते हैं ये कैंसर रोधी गुणों से भरपूर हैं, ये व्यक्ति को कैंसर से बचाने और cancer को रोकने में काफी सहायक हैं. इसके अलावा इसमें Parietin नामक विशेष Pigment पाया जाता है. इस पौधे की डंठलों में पाए जाने वाले Parietin नामक एक ख़ास ऑरेंज पिगमेंट जो 6PGD नामक एंजाइम को रोक देता है ये एंजाइम कैंसर सेल की ग्रोथ के लिए जरुरी होता है जब इस एंजाइम की कमी कैंसर सेल में होना शुरू हो जाएगी तो कैंसर सेल्स अपने आप ख़तम होना शुरू हो जाएगी. ।

लेबोरेटरी में किये गये एक शोध में पता लगा है की Parietin पिगमेंट कैंसर के सेल्स को 48 घंटे के अन्दर ही खत्म करने की ताकत रखता है. शोध में इस डंठल का प्रयोग के जरिए दो ही दिनों में लयूकैमिया के आधे से ज्यादा सेल्स को यह पौधा नष्ट कर चुका था।

जॉर्जिया की विनशिप कैंसर इंस्टीट्यूट और एमोरी यूनिवर्सिटी द्वारा 2000 कॉम्पोनेन्ट के साथ इसका परिक्षण किया गया. जिसमें विज्ञानिकों ने पारीटिन पाया. जो एंटी-कैंसर ड्रग के रूप में जाना जाता है.

आयुर्वेद के अनुसार यह सभी कैंसर में रोगों में अति लाभकारी है परन्तु आधुनिक शोध मे11 दिनों पारीटिन का प्रयोग कर पाया की यह फेफड़ों के कैंसर में कारगर है. इसके साथ ही यह ब्रेन और गर्दन के ट्यूमर को भी ख़त्म कर सकता है

रेवंद चीनी आयुर्वेद की बहुत प्रसिद्ध औषिधि है, यह पहाड़ी इलाकों में उत्पन्न होती है, जैसे शिमला, कश्मीर, हरिद्वार इत्यादि. ये आपको बहुत आसानी से पंसारी से मिल जाएगी.

रेवंद चीनी की असली नकली पहचान.
कई बार कुछ लोग रेवंद चीनी के नाम पर कुछ और चीजें दे देते हैं, ऐसे में आप इसको बड़ी आसानी से पहचान से सकते हैं. इसका स्वाद तीखा और कड़वा होता है, इसमें विशेष गंध रहती है, इसमें Calcium Oxalate होता है जिसको चबाने से करकरापन महसूस होगा. इसको चबाने से मुंह की लार पीले रंग की हो जाती है.

आदरणीय श्री मान पं रामकुमार वैध का कैंसर नाशक योग रेवंद चीनी दो भाग शेष सभी एक एक भाग कच्ची हल्दी श्याम तुलसी, पपीते के पत्ते, गेंहू के जवारे, सबुने के फूल, पुनर्नवा,ताजे काकजी निम्बू का छिलका, अश्वगंधा, मुलैठी, काली जीरी, गुडुची, हरड़ , लेमन ग्रास इत्यादि चीजों को मिलाने से, जो की इसकी गुणवत्ता को कई गुणा बढाता है.

सबसे पहले तो ये व्यक्ति को कैंसर से बचाने और कैंसर को रोकने में बहुत ही सहायक हैं, जिस कारण से इसको कोई भी व्यक्ति सेवन कर सकता है।

इन सभी आयुर्वेदिक औषधियों में इस प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं जो कैंसर कोशिकाओं के ऊपर पाए जाने वाली उनके बचाव के लिए बनायीं गयी कोटिंग को नष्ट करती है, जिस से उस कैंसर सेल को ख़त्म करने में आसानी होती है, जिस से जो भी आपका ट्रीटमेंट चल रहा हो, वो चाहे किसी भी पद्धति से हो वो अधिक असर करेगा.
यह कैंसर की कोशिकाओं को ख़त्म करता है और स्वस्थ कोशिकाओं को बचाता है।
यह एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट का काम करता हैं
यह कैंसर सेल की ग्रोथ को रोकता है
यह कैंसर से बचाव के साथ साथ इससे होने वाली जटिलताओं जैसे उलटी, उबाक, कमजोरी इत्यादि को भी नष्ट करता है.
उपरोक्त सब गुणों के कारण इसका सेवन कैंसर के रोगी को तो तुरंत ही कर देना चाहिए. और कैंसर के रोगी को कुछ परहेज ज़रूर करने चाहिए, जैसे के मीठे का, अनाज का, चाय का. और रोगी को खाने में सिर्फ मौसमी फल और उबली हुई सब्जियां देनी चाहिए।

अगर कैंसर अधिक बढ़ गया हो या शरीर में दर्द होता हो रोगी को , रोगी को तुरंत शक्ति देगा, फ्री रेडिकल्स से बचाएगा, शरीर में खून को बढ़ाएगा और एनर्जी से भरपूर करेगा. रोगी को कैंसर से लड़ने की अद्भुत शक्ति देगा. इसका रिजल्ट रोगी को पहले दिन से ही दिखना शुरू होगा. तीन से चार दिन में रोगी को अभूतपूर्व परिवर्तन महसूस होग।

शोध में पारीटिन का प्रयोग कर पाया की यह फेफड़ों के कैंसर में कारगर है. इसके साथ ही यह ब्रेन और गर्दन के ट्यूमर को भी ख़त्म कर सकता है.

साधारण बिमारियों में रेवन्दचीनी को अल्प मात्रा में 60 से 250 मिलीग्राम दिया जाता है. और अधिक भयंकर बीमारी में इसकी मात्रा 1 से 2 ग्राम तक हो सकती है. रोगी की बीमारी देख कर खुद से इसकी मात्रा निर्धारण करें. इसके सेवन से 6 से 8 घंटे में दस्त हो सकता है. अगर दस्त ज्यादा हो तो फिर इसकी मात्रा कम कर दें. मगर इसमें ग्राही तत्व होने के कारण दस्त भी अपने आप बाद में रुक जाता है. अगर मरोड़ हो तो 2 ग्राम सौंठ या 1 चम्मच अदरक के रस के साथ में एक चम्मच सौंफ देने से मरोड़ रुक जाते हैं. इसके सेवन से पेशाब भी गहरे रंग का हो जाता है।

यह उन मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद होगा जो के कैंसर का इलाज ले रहें हैं और इसको वो अपने चल रहे इलाज के साथ भी बड़ी आसानी के साथ ले सकते हैं. चाहे कैंसर प्रथम स्टेज का हो या लास्ट स्टेज का हो, मरीज को यह तुरंत देना शुरू करना चाहिए.

इसमें इस प्रकार के एंजाइम पाए जाते हैं जो कैंसर कोशिकाओं के ऊपर पाए जाने वाली उनके बचाव के लिए बनायीं गयी कोटिंग को नष्ट करती है, जिस से उस कैंसर सेल को ख़त्म करने में आसानी होती है,
यह कैंसर की कोशिकाओं को ख़त्म करता है और स्वस्थ कोशिकाओं को बचाएगा.
यह एक शक्तिशाली एंटी ऑक्सीडेंट का काम करता
हैं वो कैंसर सेल की ग्रोथ को रोकेगा.
यह कैंसर से बचाव के साथ साथ इससे होने वाली जटिलताओं जैसे उलटी, उबाक, कमजोरी इत्यादि को भी नष्ट करता है.।

(( रेवंद चीनी ब्लड कैंसर(Leukemmia)ki चिकित्सा के लिए होम्योपैथी दवाई lMITINEK MERCILET बनाई गरी है जो ब्लड कैंसर की प्रभावी औषधि समझी जाती है))

उपरोक्त सब गुणों के कारण इसका सेवन कैंसर के रोगी को तो तुरंत ही कर देना चाहिए. और कैंसर के रोगी को कुछ परहेज ज़रूर करने चाहिए, जैसे के मीठे का चीनी शक्कर गुड़ पूर्ण तया बंद कर दें गेहूं का आटा नहीं खायें चाय काफी या कैफ़ीन युक्त पदार्थ (दूध और दूध से बने आहार मांसाहार या ये कहना उचित होगा पसूओं से आने वाले आहार केवल ताजा दही लें सकते हैं वह भी देशी गाय या बकरी के दूध की मछली न खायेंऔर रोगी को खाने में सिर्फ मौसमी फल और उबली हुई सब्जियां देनी चाहिए।
यह पोस्ट आयुर्वेद पर आधारित सामान्य जानकारी उपलब्ध कराती है किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अथवा चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न 9837342534

बिहार चुनाव को लेकर नेता सड़कों पर

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बिहार में तो चुनाव का बिगुल बज गया है । भारत सरकार विश्व प्रसिद्ध हो चुकी छठ पूजा को यूनेस्को की प्राच्य पर्व सूची में लाने में जुट गई है । कल सवेरे नीतीश कुमार सड़कों पर उतरे तो दोपहर में बूढ़े बीमार लालू भी सड़क पर चले आए । कल ही शायद राहुल भैया विदेश यात्रा से लौट आए । जाहिर है बिहार जाएंगे । सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बीजेपी पहले ही सड़क पर है । चिराग पासवान हों , प्रशांत कुमार या जीतनराम माझी या पवन सिंह : सभी सड़क पर हैं । बाप और भाई से खुली बगावत कर तेजप्रताप यादव सड़कों पर घनचक्कर की तरह घूम रहे हैं ।

मतलब साफ है । सभी बन गए हैं आदमी सड़क का ? मुख्य चुनाव आयुक्त का बिहार दौरा क्या हुआ नेताओं के पांव कथक और भरतनाट्यम करने लगे । अभी देखिए हफ्तेभर में चुनाव कार्यक्रम आने वाला है आपको ओडिसी भी नजर आएगा । हां तांडव अब नहीं होगा । कारण यह कि वोट चोरी का ड्रामा सुपरफ्लॉप साबित हो चुका है । ईवीएम पर स्यापा चुनाव परिणाम आने के बाद होगा अतः रूदाली गैंग छुट्टी पर भेज दिए गए हैं । रही बात भैया की तो हाइड्रोजन बम तो पहले ही फुस्स हो गया था । अब कोलंबिया और चार देशों से कैसे बॉम्बर लाए जल्द पता चल जाएगा ।

बहरहाल माहौल बड़ा हॉट है । लालू दरबार में बेटा बेटी की बगावत के बाद खलबली है । यादव मुस्लिम गठजोड़ में सेंध लगाने के वास्ते ओवैसी फिर बिहार पहुंचने वाले हैं । दरअसल उन्होंने इस बार इंडी गठबंधन से तालमेल करने को हाथ बढ़ाया था । तेजस्वी ने उन्हें भाव नहीं दिया , कांग्रेस से वे बात नहीं करना चाहते । ओवैसी पहले भी बिहार में पांंच सीट जीतकर बता चुके हैं कि मुस्लिमों का समर्थन उनके पास भी है । हमेशा की तरह बिहार में जातियां भरपूर खेलती आई हैं । जाहिर है इस बार बहुकोणीय संघर्ष चुनाव को रोचक बनाएगा । पिछले तीन लोकसभा चुनावों को मोदी ब्रांड ने खासी सफलता प्राप्त की थी । कोई कितनी भी तैयारी करले , एन वक्त पर चुनावी रुख बदलने में मोदी ब्रांड काफी भारी पड़ता रहा है ।

कुछ चीजें प्रमाणित हैं और फायर ब्रांड योगी का प्रभाव भी अद्भुत है । याद कीजिए हरियाणा और महाराष्ट्र ? बटोगे तो कटोगे का नारा ही चुनाव को ले उड़ा ? बीजेपी के पास तुरुप का इक्का हेमंता भी मौजूद है । तो मतलब यह कि बिहार का चुनाव बड़ा दिलचस्प होने वाला है । बंगाल ही नहीं इस बार तमिलनाडु का रास्ता भी बिहार होते हुए जाएगा । तो देखते जाइए । बिहार में सतुअन की बहार यूँ तो सावन भादों में आती है । अबकी बार लिट्टी चोखा और सत्तू का स्वाद कार्तिक में भी खूब रंग जमाएगा ।

….कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

मेघनाथ शाह ः गरीबी में जन्मा एक उजाला

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6 अक्टूबर 1893 – यह तारीख भारतीय विज्ञान के इतिहास में एक स्वर्ण अक्षर बन गई। बांग्लादेश की राजधानी ढाका के पास छोटे-से गाँव शाओराटोली में जन्मे मेघनाद साहा के पिता जगन्नाथ साहा एक मामूली दुकानदार थे। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर थी, लेकिन बेटे की प्रतिभा को देखकर लगता था जैसे किस्मत ने कुछ बड़ा लिखा है। पिता चाहते थे कि मेघनाद पढ़ाई छोड़कर दुकान में मदद करें, मगर बेटे की आँखों में सिर्फ एक सपना था – ज्ञान की खोज।

बचपन से ही मेघनाद सवाल पूछने में निपुण थे। उनके प्रश्न इतने जटिल होते कि शिक्षक तक चकित रह जाते। एक बार उन्होंने सूर्य के चारों ओर मंडल जैसी आकृति पर सवाल किया, जिसका उत्तर अध्यापक तक न दे सके। उस दिन उन्होंने कहा था – “मैं एक दिन खुद इसका उत्तर खोजूँगा।” उनके अध्यापक ने महसूस किया कि यह लड़का साधारण नहीं है, और तभी से उसकी प्रतिभा को दिशा देने का बीड़ा उठाया गया।

घर की हालत ऐसी थी कि दूसरे गाँव जाकर पढ़ाई कर पाना नामुमकिन था। तभी परिवार के एक शुभचिंतक डॉक्टर अनंत दास ने मदद का हाथ बढ़ाया। उन्होंने न केवल शिक्षा की जिम्मेदारी ली बल्कि अपने घर में रहने की जगह भी दी। उनकी बदौलत मेघनाद ने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में दाखिला लिया और पढ़ाई में ऐसा परचम लहराया कि आठवीं में पूरे ढाका ज़िले में पहला स्थान हासिल किया। इसके बाद मिली छात्रवृत्ति ने उनके पंखों को और मज़बूती दी।

देश में आज़ादी की लहर उठ चुकी थी। गवर्नर के स्कूल दौरे पर जब विरोध प्रदर्शन हुआ तो मेघनाद भी पीछे नहीं रहे। इस साहस की कीमत उन्हें चुकानी पड़ी — छात्रवृत्ति रद्द और स्कूल से निष्कासन। लेकिन यह हार नहीं थी, यह शुरुआत थी। नए स्कूल किशोरी लाल जुबली स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने इंटरमीडिएट में प्रथम श्रेणी हासिल की और कलकत्ता विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान पाया। गाँव का यह साधारण बालक अब असाधारण यात्रा पर था।

प्रेसिडेंसी कॉलेज में उनका सामना हुआ विज्ञान के दिग्गजों — प्रफुल्ल चंद्र राय और जगदीश चंद्र बसु — से। यहीं से उनकी सोच की दिशा तय हुई। बसु ने कहा, “तुम्हें भौतिक विज्ञान पर ध्यान देना चाहिए।” और मेघनाद ने ऐसा ही किया। वे प्रयोगशालाओं में घंटों बिताते, नोट्स बनाते और प्रयोगों में डूब जाते। धीरे-धीरे विज्ञान ही उनका जीवन बन गया।

नौकरी नहीं मिली, लेकिन मिला मिशन

एमएससी के बाद जब सरकारी नौकरी राजनीतिक कारणों से नहीं मिली, तो उन्होंने इसे निराशा नहीं, अवसर माना। दिन में ट्यूशन और रात में अनुसंधान। मेहनत इतनी कि साइकिल से दूर-दराज तक छात्रों को पढ़ाने जाते। जल्द ही उन्हें कलकत्ता यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ साइंस में अध्यापन का मौका मिला, जहाँ उन्होंने अपने ज्ञान से नई पीढ़ी को प्रेरित किया।

एक दिन उन्होंने एग्निस क्लर्क की किताब “तारा भौतिकी” पढ़ी, जिसने उनका जीवन बदल दिया। उन्होंने खोज की — Ionization Formula — जिसके ज़रिए सूर्य और तारों के आंतरिक तापमान का पता लगाया जा सकता था। यह खोज इतनी बड़ी थी कि वैज्ञानिक जगत ने उन्हें खगोल विज्ञान का अग्रदूत कहा। इस फ़ॉर्म्युला को आज भी Saha Equation के नाम से जाना जाता है।

1920 में इंग्लैंड यात्रा के दौरान उन्होंने यूरोप के वैज्ञानिकों के साथ काम किया। लौटने पर उन्हें रॉयल सोसाइटी का फेलो बनाया गया — यह सम्मान किसी भारतीय के लिए असाधारण था। 1923 में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिक विभाग के अध्यक्ष बने और आगे चलकर Astrophysics के जनक कहे गए।

अल्बर्ट आइंस्टाइन स्वयं मेघनाद साहा के सिद्धांतों से प्रभावित हुए। उन्होंने कहा था, “यह खोज मानवता के लिए एक अमूल्य योगदान है।” साहा ने आइंस्टाइन के शोध ग्रंथों का अनुवाद किया और भारत में Nuclear Physics की शिक्षा की नींव रखी। 1950 में उन्होंने Institute of Nuclear Physics की स्थापना की, जो आगे चलकर भारत की वैज्ञानिक आत्मनिर्भरता का आधार बना।

विज्ञान के साथ समाज की सेवा

सिर्फ प्रयोगशाला तक सीमित नहीं, साहा समाज के लिए भी समर्पित रहे। बंगाल विभाजन के बाद उन्होंने विस्थापितों की मदद की। बाढ़ रोकने की योजनाओं में शामिल हुए और देश की नदियों के अध्ययन में योगदान दिया। उनके लिए विज्ञान केवल प्रयोग नहीं था, बल्कि मानव कल्याण का माध्यम था।

विज्ञान को सुलभ बनाने की मुहिम

उन्होंने महसूस किया कि विज्ञान की पुस्तकें भारत में दुर्लभ हैं। इसलिए खुद “Theory of Heat” और “Modern Physics” जैसी किताबें लिखीं, जो विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाने लगीं। उन्होंने Science and Culture नामक पत्रिका शुरू की ताकि विज्ञान सरल भाषा में हर व्यक्ति तक पहुँच सके।

संस्थाओं के निर्माता

सिर्फ विचारक नहीं, साहा एक आयोजक भी थे। उन्होंने National Academy of Sciences, Indian Physical Society और National Institute of Sciences of India जैसी संस्थाओं की नींव रखी। उनके प्रयासों से 1951 में Saha Institute of Nuclear Physics अस्तित्व में आया — आज भी यह भारत की वैज्ञानिक पहचान है।

जनता के प्रिय वैज्ञानिक

1952 में जब उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा, तो जनता ने भारी बहुमत से उन्हें संसद भेजा। वे नेहरू के साथ योजना आयोग में कार्यरत रहे। 16 फरवरी 1956 को राष्ट्रपति भवन जाते हुए उन्हें हार्ट अटैक आया, और वहीं उनका जीवन थम गया। लेकिन उनका नाम, उनकी खोजें, और उनकी सोच — आज भी भारत के हर वैज्ञानिक मन में जीवित हैं।

(सोशल मीडिया से साभार)

चंद्रमा से आज रात होगी अमृत रूपी सोम की वृष्टि

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शरद पूर्णिमा आज …..

छत पर बिताइए चांदनी रात खीर खाइए

ब्रह्मलोक में अनादि राधा और अनादि कृष्ण के महारास से निकला अमृत सोम लताओं में जा बसता है । यही अमृत शरद पूर्णिमा की रात्रि में पूर्णचंद्र की किरणों के साथ धरती पर बरसता है । सोम रूपी यह अमृत वर्ष में केवल एक ही रात बरसता है । जिस साल कुंभ मेले हो उस साल मुख्य स्नान के दिन भी इसी अमृतमय सोम की वर्षा पवित्र नदियों पर होती है । अश्विन शुक्ल पूर्णिमा सोमवार की रात्रि में यह अमृत फिर बरसेगा । कालांतर में देवताओं और असुरों के बीच हुए समुद्र मंथन में शरद पूर्णिमा के दिन यही अमृत समुद्र के गर्भ से अक्षय कलश में निकला था ।

मान्यता है कि ऐसा ही अमृत वृन्दावन के निधिवन में प्रति रात्रि बरसता है । लेकिन यह रास एकांत में होता है और मनुष्य का रात्रि प्रवेश निधिवन में वर्जित है । अतः धरती वासियों को अमृत पान का अनोखा अवसर शरद पूर्णिमा की रात्रि में मिलता है । द्वापर में भगवान कृष्ण गोपियों संग पूर्णिमा को रात भर महारास किया करते थे ।

शरद पूर्णिमा की रात्रि में कुछ घंटे छत पर खुले आकाश के नीचे बिताए । दूध में चौले ( चिवड़ा )और चीनी मिलाकर अथवा खीर बनाकर चंद्रमा की चांदनी में पूरी रात अथवा कुछ घंटे रखें । बाद में प्रसाद रूप में आरोग्य पाने की भावना से इसे ग्रहण करें । रात्रि में कुछ समय यदि चांदनी के प्रकाश में सुईं में धागा पिरोया जाए , या फिर सीधे चंद्रमा से नजरें मिलाकर त्राटक किया जाए , तो नेत्र ज्योति बढ़ती है ।

शरद पूर्णिमा की रात्रि में जब समुद्र मंथन से लक्ष्मी प्रकट हुई तब देवताओं ने उनकी वंदना की । प्रत्येक शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा के प्रकाश में बैठकर लक्ष्मी की पूजा की जाती है । सर्व सिद्धि योग और अमृत योग में नक्षत्रों की जुगलबंदी व्यापक प्रभाव डालती है । शरद रात्रि से चंद्रमा के 27 नक्षत्रों का मिलन न केवल शुभ माना जाता है अपितु कईं प्रकार के उत्तम फल भी प्रदान करता है ।

अश्विन पूर्णिमा की चांदनी का मिलन जब कार्तिक मास की प्रतिपदा से होता है तो शास्त्रों में उसे अमृत योग कहा गया है । दोनों के मिलन से जल रूप गंगा भी उत्पन्न हुई । गंगा को भगीरथ धरती पर लाए । गंगा तट पर रात भर बैठकर शरद पूर्णिमा मनाई जाए तो सोम मय अमृत तत्व सहज प्राप्त हो जाता है । यही अमृत समुद्र मंथन के समय उस कलश में विद्यमान था , जिसे लेकर भगवान धन्वंतरि प्रगट हुए थे ।

शरद पूर्णिमा पर भगवान विष्णु तथा महालक्ष्मी की पूजा का विधान है । यह पूजा पवित्र नदियों में स्नान के बाद वहीं तटों पर भी की जाती है और मंदिरों में जाकर भी । बहुत से श्रद्धालु शरद पूर्णिमा पर व्रत रखते हैं । महालक्ष्मी का प्राकट्य चूंकि समुद्र के जल से हुआ , अतः गंगा आदि पवित्र नदियों के किनारे जल पूजा भी शास्त्रों में बताई गई है ।

……कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

विनोद खन्ना ,आज जिनका जन्मदिन है

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विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर, 1946 में पेशावर, पाकिस्तान में हुआ था, लेकिन विभाजन के बाद इनका परिवार मुंबई आकर बस गया था। इनके पिता किशनचन्द्र खन्ना एक बिजनेसमैन थे और माता कमला खन्ना एक कुशल गृहणी रहीं। विनोद खन्ना ने दो विवाह किये थे। पहली पत्नी गीतांजलि थीं, जिनसे 1985 में तलाक हो गया। बाद में उन्होंने उन्होंने कविता से शादी की। उनके तीन बेटे अक्षय खन्ना, राहुल खन्ना और साक्षी खन्ना हैं। उनकी एक बेटी है, जिसका नाम श्रद्धा खन्ना है।

1968 में सुनील दत्त की फिल्म ‘मन का मीत’ से विनोद खन्ना ने अपना फिल्मी कॅरियर शुरू किया था। विनोद खन्ना का नाम ऐसे अभिनेताओं में शुमार था जिन्होंने शुरुआत तो विलेन के किरदार से की थी लेकिन बाद में हीरो बन गए। ये फिल्में थीं, पूरब और पश्चिम, सच्चा झूठा, आन मिलो सजना, मस्ताना, मेरा गांव मेरा देश, ऐलान आदि। ‘मेरे अपने’, ‘दयावान’, ‘कुर्बानी’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ जैसी फिल्मों को उनकी यादगार भूमिकाओं के लिए याद किया जाता है।

विनोद खन्ना ने 1971 में सोलो लीड रोल में फिल्म ‘हम तुम और वो’ में काम किया था। गुलजार के ‘मेरे अपने’ में शत्रुघ्न सिन्हा के अपोजिट निभाए गए उनके किरदार को आज भी लोग याद करते हैं। गुलजार की ही फिल्म ‘अचानक’ में मौत की सजा पाए आर्मी अफसर का किरदार निभाने के लिए भी उन्हें काफ़ी तारीफ मिली। बाद में अमिताभ के अपोजिट हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर में भी उन्होंने यादगार रोल निभाया। कहा जाता है कि अगर विनोद खन्ना ओशो के आश्रम न जाते तो आने वाले वक्त में वह अमिताभ बच्चन के स्टारडम को फीका कर देते। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि विनोद खन्ना की सबसे हिट फिल्मों में से एक ‘कुर्बानी’ का रोल पहले अमिताभ बच्चन को ही ऑफर किया गया था। उन्होंने यह रोल ठुकरा दिया, जिसके बाद विनोद खन्ना ने यह किरदार निभाया। बाद में विनोद को ‘रॉकी’ फिल्म ऑफर की गई, लेकिन उन्होंने यह फिल्म नहीं की। इस फिल्म से संजय दत्त ने बॉलीवुड में एंट्री ली।

उनकी यादगार फ़िल्मों में ‘मेरे अपने’, ‘कुर्बानी’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रेशमा और शेरा’, ‘हाथ की सफाई’, ‘हेरा फेरी’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’, ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘दयावान’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ रही हैं।

अपने करियर के शिखर दौर में विनोद खन्ना अचानक अभिनय को विदा कहकर आध्यात्मिक गुरु रजनीश के शिष्य हो गए थे।

विनोद खन्ना ने 1998 में राजनीति में कदम रखा और उसी साल 12वीं लोकसभा चुनावों में पंजाब के गुरदासपुर से पहली बार भारतीय जनता पार्टी टिकट पर संसद पहुंचे। यह सिलसिला लगातार तीन बार चला। 1999 और 2004 के आम चुनावों में भी वह लगातार इसी सीट से जीते।

2002-03 में वह अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्‍व में केंद्र की बीजेपी सरकार में पर्यटन एवं संस्‍कृति राज्‍यमंत्री और 2003-04 में विदेश राज्‍यमंत्री रहे। 2009 में उन्‍होंने चुनाव नहीं लड़ा। उसके बाद 2014 में एक बार फिर उन्‍होंने बीजेपी के टिकट पर गुरदासपुर से चुनाव जीता और इस तरह चौथी बार 16वीं लोकसभा के सदस्‍य बने। संसद में वह कई कमेटियों के भी सदस्‍य रहे। 1 सितंबर, 2014 से वह रक्षा मामलों पर गठित स्‍टैंडिग कमेटी के सदस्‍य थे। इसके अलावा कृषि मंत्रालय की परामर्श कमेटी के भी सदस्‍य थे।

1999 में उनको फिल्मों में उनके 30 वर्ष से भी ज्यादा समय के योगदान के लिए फिल्मफेयर के लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित भी किया गया। 140 से भी अधिक फिल्‍मों में विविध किरदार निभाने वाले विनोद खन्‍ना को सबसे पहले 1974 में ‘हाथ की सफाई’ फिल्‍म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। उसी साल उनको नेशनल यूथ फिल्‍म अवार्ड भी मिला।

विनोद खन्ना के पिता का टेक्सटाइल, डाई और केमिकल का बिजनेस था। विनोद खन्ना के एक भाई और तीन बहनें हैं।
विनोद खन्ना बचपन में बेहद शर्मीले थे और जब वह स्कूल में पढ़ते थे, तो उन्हें एक टीचर ने जबरदस्ती नाटक में उतार दिया और तभी से उन्हें अभिनय करना अच्छा लगने लगा।
स्कूल में पढ़ाई के दौरान विनोद खन्ना ने ‘सोलहवां साल’ और ‘मुग़ल-ए-आजम’ जैसी फिल्में देखीं और इन फिल्मों ने उन पर गहरा असर छोड़ा।

विनोद खन्ना के पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा फिल्मों में जाए, लेकिन अंत में विनोद की ज़िद के आगे उनके पिता झुक गए और उन्होंने विनोद को दो साल का समय दिया। विनोद ने इन दो सालों में मेहनत कर फिल्म इंडस्ट्री में जगह बना ली। सुपरस्टार राजेश खन्ना, विनोद खन्ना के बेहद पसंदीदा अभिनेताओं में एक थे।

विनोद खन्ना को सुनील दत्त ने साल 1968 में फिल्म ‘मन का मीत’ में विलेन के रूप में लॉन्च किया। दरअसल यह फिल्म सुनील दत्त ने अपने भाई को बतौर हीरो लॉन्च करने के लिए बनाई थी। वह तो पीछे रह गए, लेकिन विनोद ने फिल्म से अपनी अच्छी पहचान बना ली।

हीरो के रूप में स्थापित होने के पहले विनोद ने ‘आन मिलो सजना’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘सच्चा झूठा’ जैसी फिल्मों में सहायक या खलनायक के रूप में काम किया।

गुलजार द्वारा निर्देशित ‘मेरे अपने’ (1971) से विनोद खन्ना को चर्चा मिली और बतौर नायक वे नजर आने लगे।
मल्टीस्टारर फिल्मों से विनोद को कभी परहेज नहीं रहा और उन्होंने उस दौर के सितारे अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, सुनील दत्त आदि के साथ कई फिल्में साथ में कीं।

बागवानी के बेहद शौकीन विनोद खन्‍ना को ध्‍यान, क्रिकेट, खेल, संगीत, फोटोग्राफी और ड्राइविंग का भी बेहद शौक था। उनको बैडमिंटन खेलने का शौक था। स्‍कूल और कॉलेज के दिनों में वह खेलों में हिस्‍सा लेते थे। वह कॉलेज के दिनों में जिमनास्‍ट और बॉक्‍सर भी थे।

विनोद खन्ना का 27 अप्रैल, 2017 को कैंसर की बीमारी से जूझते निधन हो गया। वे 70 साल के थे!

−रविकांत शुक्ला

महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों को संगठित करने का बड़ा काम किया

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महेंद्र सिंह टिकैत के जन्म दिन छह अक्तूबर पर विशेष

किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत का किसानों में जन चेतना जगाने और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ने में असाधारण योगदान रहा है। उन्हें सही मायनों में किसानों का मसीहा कहा जाता था। महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म छह अक्टूबर 1935 को सिसौली, मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआा।भारतीय किसान यूनियन (भाकियू) की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके माध्यम से उन्होंने देश भर के किसानों को एक मजबूत गैर-राजनीतिक मंच पर संगठित किया।

​उन्होंने किसानों को जाति, धर्म और क्षेत्र के भेदों से ऊपर उठकर एक झंडे के नीचे आने के लिए प्रेरित किया, जिससे किसान आंदोलन को एक नई पहचान और शक्ति मिली।टिकैत ने किसानों की समस्याओं को सरकार और देश के सामने रखने के लिए कई विशाल और सफल आंदोलनों का नेतृत्व किया। 1987 का मुजफ्फरनगर आंदोलन: उन्होंने किसानों के बिजली बिल माफ कराने और उचित मांगों को लेकर एक बड़ा आंदोलन किया।   इस आंदोलन ने  उन्हें एक प्रमुख किसान नेता के रूप में स्थापित किया।

1988 की दिल्ली बोट क्लब रैली  उनके करियर की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक रैलियों में से एक थी। लगभग पांच लाख किसानों ने दिल्ली के केंद्र में डेरा डाल दिया था। किसानों की 35-सूत्रीय मांगें थीं। इनमें फसलों के उच्च मूल्य, बिजली और पानी के बिलों में छूट शामिल थी। इस आंदोलन ने राजीव गांधी सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया और उनकी कई मांगें मान ली गईं।

​इन आंदोलनों के माध्यम से, उन्होंने यह चेतना जगाई कि किसान संगठित होकर अपनी आवाज़ उठा सकते हैं और सरकारों को अपनी माँगें मानने के लिए बाध्य कर सकते हैं।उन्होंने किसानों के लिए गन्ने का उचित मूल्य, बिजली और सिंचाई की दरों में कमी, फसलों का लाभकारी मूल्य, और किसान ऋण माफ़ी जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाया।उनकी आवाज़ में एक देहाती और सीधापन था, जिसने किसानों के दर्द और उनकी मांगों को सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुँचाया।

टिकैत अपनी सादगी और देहाती अंदाज़ के लिए जाने जाते थे। वह हमेशा किसानों के बीच बैठकर खाना खाते थे और आंदोलन के दौरान भी मंच के बजाय किसानों के बीच बैठना पसंद करते थे।उनका यह आचरण किसानों के साथ उनके गहरे व्यक्तिगत जुड़ाव को दर्शाता था, जिससे किसान उनसे और अधिक प्रेरित होते थे।

​संक्षेप में, महेंद्र सिंह टिकैत ने किसानों को संगठित होने का महत्व सिखाया। उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाया, और यह साबित किया कि किसानों की एकता किसी भी सरकार को चुनौती दे सकती है। उन्होंने ही किसान आंदोलन को एक ऐसी शक्ति के रूप में स्थापित किया, जो आज भी भारत की राजनीति को प्रभावित करती है। 15 मई 2011 को उनका निधन हुआ।

बुखार का इलाज

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यदि आप काफी दिनों से बुखार से पीड़ित हैं या मियादी बुखार (टायफाइड) से पीड़ित हैं तो गिलोय, चिरायता , अजवायन का क्वाथ बनाकर उसकी भाप सूंघे और गुनगुना रहने पर पीलें ३-४दिन के प्रयोग से ज्वर उतर जाता है बुखार के बाद की कमज़ोरी दूर करने के लिए सुबह साम 5-5, मुनक्का तवे पर सेक कर बीज निकालकर नमक तथा खूबकलां भरकर खायें *हमारा लक्ष्य स्वस्थ तन और मन ! स्वास्थ चेतना सरल जीवन शैली।

यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न

बुलडोेजर एक्शन अमेरिका और फ्रांस तक पहुंचा

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यूपी का बुलडोजर एक्शन और बदमाशों का लंगड़ा ऑपरेशन अपराधियों के साथ एक नए न्याय के रूप में उभरकर आए हैं । बुलडोजर न्याय तो न केवल पूरे देश में फैला अपितु अमेरिका और फ्रांस तक भी जा पहुंचा । देश के कईं राज्यों में योगी मॉडल काफी लोकप्रिय हो चुका है ।

योगी ब्रांड का शिकार चूंकि एक समुदाय के लोग ज्यादा हैं, अतः यह समुदाय जिनका वोटबैंक हैं वे राजनैतिक दल खासे तमतमाए हुए हैं । यह स्वाभाविक है चूंकि सीएम योगी आदित्यनाथ सरेआम बयान दे चुके हैं कि यूपी में न तो दादागिरी चलेगी , न किसी वर्ग की बलवागिरी चलेगी , न धर्मांतरण चलेगा और जो लोग गजवा ए हिन्द का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें बक्शा नहीं जाएगा ।

योगी सरकार की इस नीति पर सुप्रीमकोर्ट खासा नाराज है । चीफ जस्टिस गवई ने तो कल ही कहा कि बुलडोजर एक्शन बिना कोर्ट की अनुमति नहीं किया जा सकेगा , लेकिन बुलडोजर एक्शन केवल भाजपा शासित राज्यों में नहीं छत्तीसगढ़ , तेलंगाना , पंजाब , कर्नाटक आदि राज्यों में भी चल रहा है । दरअसल इसके लिए घोर रिश्वतखोर सिस्टम और नेताओं की दबंगई भी जिम्मेदार है ।

खुद न्यायपालिकाएं सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं जहां न्याय पाने के लिए वादकारी दशकों तक लटकते रहते हैं ? इसका लाभ भूमाफिया और सरकारी संपत्ति कब्जाओ माफिया खूब उठा रहे हैं । इसमें कोई शक नहीं कि वक्फबोर्ड जैसी संस्थाओं और धार्मिक इदारों की आड में जमीनें कब्जाने की गुंडई खूब हो रही है । अफसोस कि बात है कि बुलडोजर एक्शन उन अधिकारियों के घरों पर नहीं होता जो इस सब के लिए जिम्मेदार हैं ।

देखिए जरायमपेशा नामी गुंडों की क्या हालत है । घर भी तोड़े जा रहे हैं , एनकाउंटर भी हो रहे हैं , लंगड़े भी बनाए जा रहे हैं । अतीक और मुख्तार जैसे बेहद खतरनाक राजनैतिक डॉन अभियुक्तों का सफाया हो चुका है । लारेंस गैंग को निपटाने का काम भारत सरकार शुरू कर चुकी है । जिन दुर्दांत अपराधियों को अदालतें बरसों से पालती आ रही हैं उनका इलाज इसी तरह संभव है । यह सब हमारे तंत्र को टोटल फेल्योर है । इसके लिए राजनीति , ब्यूरोक्रेसी , न्यायव्यवस्था और पुलिस कॉकस पूरी तरह जिम्मेदार है ।

…..कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

औषधीय गुणों की खान है शरद पूर्णिमा की खीर

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बाल मुकुन्द ओझा

भारत त्योहारों का देश है। यहां हर त्योहार का कोई न कोई निहितार्थ है। त्योहार देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय एकता के जीवन्त प्रतीक होते हैं। इसमें देश के इतिहास का समावेश होता है। त्योहार बिना जाति, धर्म ओर भेदभाव के सभी लोग मिलजुल कर मनाते हैं और एक दूसरे के सुख दुख में भागीदारी देते हैं। ऐसा ही एक त्योहार शरद पूर्णिमा है। शरद पूर्णिमा पर देश के अनेक भागों में औषधीय खीर का वितरण सभी धर्मों के लोगों को समान रूप से किया जाता है। मान्यता है शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी 16 कलाओं में रहकर पृथ्वी के काफी करीब रहता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन चंद्रमा से निकलने वाली किरणों में सभी प्रकार के रोगों को हरने की क्षमता होती है। इसीलिए कहा गया है कि शरद पूर्णिमा की रात आकाश से अमृत वर्षा होती है। इसी अमृत वर्षा को चखने के लिए घर घर में खुले आसमान के नीचे खीर बनायीं जाती है। इस खीर को प्रसाद के रूप में अगली सुबह वितरित किया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार शरद पूर्णिमा का पावन पर्व इस वर्ष 6 अक्टूबर, को देशभर में मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार, आश्विन माह की पूर्णिमा तिथि 6 अक्टूबर 2025, दोपहर 12 बजकर 23 मिनट पर शुरू होगी जिसका समापन 7 अक्टूबर, सुबह 9 बजकर 16 मिनट पर होगा। पंचांग के अनुसार इस बार शरद पूर्णिमा का पर्व 6 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा। इस दिन चन्द्रोदय का समय शाम 5 बजकर 27 मिनट पर होगा। शरद ऋतु की पूर्णिमा काफी महत्वपूर्ण तिथि है। साल की 12 पूर्णिमा में से शरद पूर्णिमा सबसे खास होती है। शरद पूर्णिमा तन, मन और धन तीनों के लिए सर्वश्रेष्ठ होती है। शरद पूर्णिमा पर लक्ष्मी जी की उपासना कर कोजागर पूजा की जाती है, ये पूजा सर्वसमृद्धिदायक मानी गई है। देशभर में शरद पूर्णिमा का त्योहार काफी धूम-धाम और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इसे कौमुदी उत्सव, कुमार उत्सव, शरदोत्सव, कमला पूर्णिमा और रास पूर्णिमा के नाम से भी इसे जाना जाता है। हिंदू धर्म में सभी पूर्णिमा में आश्विन पूर्णिमा का विशेष महत्त्व है। शास्त्रों के अनुसार यह दिन आमजन के लिए लाभकारी है।

शरद पूर्णिमा पर खीर बनाकर चांदनी रात में रखने की परंपरा अब तक चली आ रही है।  माना जाता है कि इस रात चंद्रमा की रोशनी में खीर रखने से खीर में औषधीय गुण आ जाते हैं। मान्यता है इस खीर को खाने से पित्त से जुड़ी समस्याएं कम होती हैं, साथ ही एसिडिटी, स्किन रेशेज, पेट में जलन, आर्टिकेरिया जैसी बीमारियों से इस खीर से राहत मिलती है। आयुर्वेद के अनुसार, चंद्रमा की किरणों में औषधीय गुण होते हैं, जो खीर में मौजूद दूध और चावल के साथ मिलकर स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव डालते हैं। दूध में लैक्टिक एसिड और अन्य पोषक तत्व होते हैं, जो चंद्रमा की किरणों के संपर्क में आने पर और अधिक प्रभावी हो सकते हैं। चांदनी रात में खीर को खुले आसमान के नीचे रखने से यह ठंडी रहती है, और बैक्टीरिया के विकास की संभावना कम होती है। इसके अलावा, शरद ऋतु में तापमान संतुलित होता है, जो खीर को रात भर ताजा रखने में मदद करता है। पूर्णिमा की चांदनी में खीर बनाकर खुले आसमान के नीचे रखने के पीछे वैज्ञानिक तर्क यह है कि चंद्रमा के औषधीय गुणों से युक्त किरणें पड़ने से खीर भी अमृत के समान हो जाएगी। उसका सेवन करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होगा। इस दिवस से वर्षा काल की समाप्ति तथा शीत काल की शुरुआत होती है।

शरद पूर्णिमा को भगवान कृष्ण से भी जोड़ कर देखा गया है। इसे रास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता यह है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि को भगवान् श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महा रास नामक दिव्य नृत्य किया था। इस दिन धन, वैभव और ऐश्वर्य की देवी माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। धार्मिक  मान्यता के मुताबिक  शरद पूर्णिमा को माता लक्ष्मी रातभर विचरण करती हैं। जो लोग माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं और अपने घर में उनको आमंत्रित करते हैं, उनके यहां वर्ष भर धन वैभव की कोई कमी नहीं रहती है। शरद पूर्णिमा के अवसर पर देश के अनेक स्थानों पर अस्थमा पीड़ितों के लिए खास औषधि का वितरण किया जाता है। यह औषधि चंद्रकिरणों से तैयार की जाती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

“आपातकाल के अंधकार से शताब्दी के प्रकाश तक : संघ की यात्रा”

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“लोकतंत्र की रक्षा के प्रहरी : संघ के शताब्दी वर्ष का संदेश”

“संघ का शताब्दी वर्ष : आपातकाल की ज्वाला से सेवा की ज्योति तक”

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1975 के आपातकाल के दौरान लाखों स्वयंसेवकों ने जेल यातनाएँ सही और भूमिगत रहकर लोकतंत्र की रक्षा की। यह संघर्ष केवल संगठन की शक्ति का प्रमाण नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को गहराई से सींचने वाला अध्याय भी था। संघ ने आपातकाल की ज्वाला से निकलकर समाज सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास और राष्ट्रीय एकता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित किए। शताब्दी वर्ष का उत्सव अतीत की गौरवगाथा और भविष्य के भारत निर्माण का संकल्प है।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

भारत का आधुनिक इतिहास अनेक उतार-चढ़ावों और संघर्षों से भरा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आज़ादी के बाद लोकतंत्र की रक्षा तक, कई संगठन और व्यक्तित्व देश की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) एक ऐसा संगठन है जिसने न केवल राष्ट्र निर्माण के सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्र में योगदान दिया, बल्कि कठिनतम परिस्थितियों में लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए भी अग्रणी भूमिका निभाई। विशेष रूप से 1975-77 का आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा थी। इस कालखंड ने संघ की संगठनात्मक क्षमता, साहस और राष्ट्रनिष्ठा को परखने का अवसर दिया। आज जबकि संघ अपने शताब्दी वर्ष (2025-26) की ओर बढ़ रहा है, यह स्मरण करना स्वाभाविक है कि आपातकाल के समय किए गए संघर्ष ने भारतीय राजनीति और समाज को किस प्रकार नई दिशा दी।

आपातकाल की पृष्ठभूमि

25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू करने की घोषणा की। आधिकारिक रूप से इसका कारण आंतरिक अशांति बताया गया, परंतु वास्तविक कारण राजनीतिक था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया था, जिससे उनके प्रधानमंत्री पद पर संकट आ गया था। सत्ता बचाने के लिए उन्होंने संविधान की मूल भावना को ही दरकिनार करते हुए आपातकाल लागू कर दिया।

इस दौरान नागरिक स्वतंत्रताएँ समाप्त कर दी गईं। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, विरोध करने वाले लाखों लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया। विपक्षी दलों के नेताओं के साथ-साथ सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं को भी निशाना बनाया गया। भारतीय लोकतंत्र के लिए यह एक अंधकारमय काल था।

संघ की परीक्षा और संघर्ष

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उस समय एक विशाल संगठन था। लाखों स्वयंसेवक गाँव-गाँव, शहर-शहर सामाजिक सेवा और राष्ट्रभक्ति की भावना जगाने में लगे हुए थे। आपातकाल लागू होते ही सरकार ने संघ को भी प्रतिबंधित कर दिया। हजारों स्वयंसेवक जेलों में डाल दिए गए। अनुमान है कि 1,00,000 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और लगभग 30,000 से अधिक स्वयंसेवक भूमिगत होकर गुप्त रूप से आंदोलन चलाते रहे।

संघ की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उसने भयभीत हुए बिना लोकतंत्र की रक्षा का बीड़ा उठाया। जहां विपक्षी दलों के कई नेता जेलों में बंद थे, वहीं संघ के स्वयंसेवक भूमिगत होकर जनता को जागरूक कर रहे थे। वे गुप्त पत्रक निकालते, संदेश पहुँचाते और सत्याग्रह के माध्यम से जनता में प्रतिरोध की भावना जगाते। यह संगठनात्मक अनुशासन और साहस ही था कि पूरे देश में लोकतंत्र बचाने का अभियान जीवित रहा।

भूमिगत आंदोलन और संगठनात्मक क्षमता

आपातकाल के दौरान संघ ने अपनी मजबूत शाखा व्यवस्था और अनुशासित संगठन का उपयोग किया। हजारों कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहते हुए आंदोलन की मशाल जलाए रखी। दिल्ली, मुंबई, जयपुर, नागपुर, कोलकाता, चेन्नई और लखनऊ जैसे बड़े शहरों से लेकर गाँव-गाँव तक संदेश पहुँचाए जाते रहे।

केंद्र सरकार ने बार-बार यह दावा किया कि विरोध समाप्त हो चुका है, लेकिन संघ की गुप्त गतिविधियों ने सरकार की नींद हराम कर दी। यही कारण था कि इंदिरा गांधी सरकार ने संघ को विशेष रूप से निशाना बनाया और इसे कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा दी। परंतु सत्य यह है कि जितना दमन बढ़ता गया, उतनी ही ताक़त से संघ का प्रतिरोध भी बढ़ता गया।

लोकतंत्र की बहाली और जनता पार्टी की सरकार

आपातकाल की 21 महीनों की अवधि ने जनता को यह सिखा दिया कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र का महत्व क्या होता है। जब 1977 में चुनाव की घोषणा हुई, तो पूरे देश में इंदिरा गांधी और कांग्रेस के खिलाफ आक्रोश फूट पड़ा। संघ के स्वयंसेवकों ने विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मिलकर चुनाव प्रचार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

जनता पार्टी का गठन हुआ और उसे अप्रत्याशित विजय मिली। इंदिरा गांधी की करारी हार हुई। यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ था, जहां संघ ने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक धारा को भी मजबूत आधार प्रदान किया।

समाज पर आपातकाल का प्रभाव

आपातकाल का एक बड़ा सकारात्मक पहलू यह रहा कि इसने जनता को जागरूक कर दिया। नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व का बोध हुआ और लोकतंत्र की रक्षा का संकल्प और मजबूत हुआ। संघ ने इस जागरूकता को स्थायी बनाने के लिए समाज में व्यापक अभियान चलाए।

आज भी जब लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा होती है, तो आपातकाल का उदाहरण दिया जाता है। यह कालखंड इस बात का प्रतीक है कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र में सत्ता के दमन के विरुद्ध संगठित प्रतिरोध आवश्यक है।

संघ की वर्तमान भूमिका और शताब्दी वर्ष का महत्व

संघ आज अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है। 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में डॉ. हेडगेवार द्वारा स्थापित इस संगठन ने बीते सौ वर्षों में सेवा, संगठन और राष्ट्र निर्माण का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया है।

आपातकाल के संघर्ष ने संघ की छवि को और भी प्रखर बनाया। आज संघ केवल शाखाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, आपदा प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समरसता जैसे अनेक क्षेत्रों में कार्यरत है।

शताब्दी वर्ष के अवसर पर संघ ने व्यापक जनजागरण अभियान की योजना बनाई है। देशभर में लाखों स्वयंसेवक घर-घर जाकर संपर्क करेंगे। समाज के हर वर्ग तक पहुँचने का प्रयास होगा ताकि राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक जागरण को और मजबूत किया जा सके।

संघ का संघर्ष और समर्पण

आपातकाल भारतीय लोकतंत्र की सबसे कठिन परीक्षा थी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर यह सिद्ध कर दिया कि संगठन की शक्ति ही परिवर्तन की सच्ची साथी होती है। हजारों स्वयंसेवकों ने जेल की यातनाएँ सहीं, भूमिगत रहकर संघर्ष किया और लोकतंत्र की लौ बुझने नहीं दी।

आज जब संघ अपने शताब्दी वर्ष में प्रवेश कर रहा है, तो यह केवल एक संगठन का उत्सव नहीं है बल्कि राष्ट्र की उस जीवटता का प्रतीक है जिसने हर संकट में लोकतंत्र और स्वतंत्रता को सर्वोपरि रखा। आपातकाल का संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा स्रोत है और यह संदेश देता है कि परिवर्तन की धारा को कोई भी सत्ता, कोई भी दमन लंबे समय तक रोक नहीं सकता।

इस शताब्दी वर्ष में संघ केवल अतीत की गौरवगाथा का स्मरण ही नहीं कर रहा, बल्कि भविष्य के भारत के निर्माण की दिशा भी तय कर रहा है। एक ऐसा भारत जो सांस्कृतिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से समरस, और राजनीतिक रूप से सशक्त हो।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,