सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस सुकड़ रही है

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देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस कईं राज्यों में छोटे भाई की भूमिका निभाने को मजबूर है । जिस पार्टी ने दशकों तक देश पर राज किया हो उसके लिए बाप या बड़े भाई की गद्दी छोड़कर छोटा भाई बनना कोई मजबूरी नहीं । यह उसकी मक्कारियों और गुनाहों का परिणाम है ।

हमारा स्पष्ट मानना है कि स्वाधीनता आंदोलन के दौरान कांग्रेस कोई पार्टी थी ही नहीं । 1947 तक कांग्रेस एक राष्ट्रवादी आंदोलन था । आज बीजेपी सहित जितनी भी पार्टियां देश में हैं उन सभी के पुरखे महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता संग्राम में शामिल थे । तब देश में हिन्दू , मुस्लिम मिलकर अंग्रेजों को भगाने के लिए एक साथ लड़ रहे थे ।

तभी महात्मा गांधी चाहते थे कि स्वराज्य मिलने के बाद आजादी दिलाने के लिए बनी कांग्रेस को अब भंग कर दिया जाए । वे जानते थे कि स्वतंत्र लोकतांत्रिक भारत में अन्य राजनयिक दल भी बनेंगे और कांग्रेस भी अब राजनीतिक दल बनकर रह जाएगी । किसी ने बापू की नहीं मानी और कांग्रेस आज अनेक राज्यों में इतनी छोटी बन गई है कि अब कभी बड़ी बनेगी इसकी संभावना फिलहाल नजर नहीं आती ।

चुनाव लड़ने तक के लिए उसे गठबंधन बनाकर लड़ना पड़ रहा है । देख लीजिए । सबसे बड़े राज्य यूपी , बिहार , महाराष्ट्र और बंगाल में वह बहुत छोटे भाई की भूमिका में है । तमिलनाडु , झारखंड , जम्मू कश्मीर और दिल्ली राज्यों में कांग्रेस की भूमिका नाम मात्र की है । गोआ , पुदुचेरी और कईं पूर्वोत्तर राज्यों में भी यही हाल है । कांग्रेस में विघटन से जन्में क्षेत्रीय दल इतने पल्लवित हो गए हैं कि इन राज्यों स्वतंत्ररूप से कांग्रेस की वापसी अब असंभव दिखाई दे रही है ।

कांग्रेस से एक और महापाप हुआ है । वह है आजादी मिलते ही मुसलमानों को अपना वोटबैंक बनाना । कांग्रेस ने मुस्लिमों को राष्ट्र की मुख्यधारा से मिलने ही नहीं दिया ? जिन्ना के इस्लामिक राष्ट्र बनाने के बाद कांग्रेस का पहला पाप था हिंदुओं के मूल देश भारत को हिन्दू राष्ट्र न बनाना । दूसरी गलती थी मुसलमानों को डराकर वोटबैंक बनाना ।

बाद में कांग्रेस बिखरती रही , नए नए दल बनते रहे और गौर से देखिए वे सभी मुसलमानों को वोटबैंक बनाते रहे । आश्चर्य की बात है कि मुस्लिम समाज वोटबैंक बनता भी गया । इन दलों ने मुस्लिम समाज को आरएसएस से जबरन डरा डराकर वोटबैंक बनने के लिए बाध्य किया । नतीजा सामने है । सम्पूर्ण संवैधानिक अधिकार होते हुए भी मुस्लिम समाज अपना कोई स्वतन्त्र राजनैतिक वजूद कायम न कर सका ।

मुस्लिम समाज का एक भी बड़ा राष्ट्रव्यापी नेता 78 वर्षों में नहीं बन सका । वे पीढ़ियों से कांग्रेस , सपा , बसपा , राजद , टीएमसी , डीएमके आदि के पीछे खड़े होकर ताली बजा रहे हैं । अखिलेश , ममता , राहुल , लालू , स्टालिन और यहां तक कि बाल ठाकरे के बेटे उद्धव के पीछे कतारबद्ध होकर वोट डाल रहे हैं । न अपना स्वतन्त्र अस्तित्व स्थापित कर पाए , न नेता बना पाए , पिछलग्गू बनकर रह गए । क्या करें , शायद नियति को यही मंजूर है ?

……कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

चोपचीनी, *

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चोपचीनी पचने में हल्की, वात, पित्त तथा कफ को शान्त करने वाली। यह भूख बढ़ाता है, मल–मूत्र को साफ करता है, और शरीर को ताकत देता है। यह यौवन तथा यौनशक्ति को बनाए रखता है। चोबचीनी कब्ज, गैस, शरीर दर्द, गठिया आदि जोड़ों की समस्याएं को ठीक करती है ।
यह चीन मूल की औषधि है इसका पेड़ जमीन पर बिछा सा होता है इसकी जड़ सुर्ख तथा गुलाबी रंग की होती है कोई सफेद या काली भी होती है यह चीन के पहाड़ों के अतिरिक्त बंगाल में सिलहट के पहाड़ों पर और नेपाल के पहाड़ों पर भी होती है चोपचीनी चरपरी मधुर कड़वी गरम मल मूत्र का शोधन करने वाली अफारा शूल वात व्याधि अपस्मार उन्माद और अंगों की वेदना को दूर करने वाली यह गरम और अग्नि वर्धक है अफारा और उदर शूल को शांत करती है दस्त और पेशाब को साफ करती है। पक्षाघात (लकवा)संधि वात अर्थराइटिस तथा वायु के अन्य रोगों में उपयोगी है गर्भाशय के रोग गुदा रोग कुष्ठरोग, खुजली, त्वचा की एलर्जी ,ज़हरीले फोड़े ,दाद रक्त संबंधी रोग ,फील पांव रोग में लाभदायक है ।अपस्मार ,पागलपन उन्माद में भी फायदा पहुचाती है ।उपदंश रोग के लिए यह लाभदायक औषधि है ।यह पुरुषों के वीर्य दोष और स्त्रियों के रजो दोष को दूर करती है। कंठमाला और नेत्र रोगों में भी लाभकारी है ।इससे अफ़ीम खाने की आदत छूट जाती है इसके सेवन से चेहरे पर तेज और कांति आती है। बच्चों को बिस्तर में पेशाब करने का रोग ठीक होता है।
चोबचीनी ताकत को बढ़ाती है। खून को साफ करती है शरीर की गर्मी को सुरक्षित रखती चोबचीनी प्रसन्नता बढ़ाती है‌।
कुछ लोग चोपचीनी को चोबचीनी भी कहते हैं। क्या आपको पता है कि चोपचीनी क्या है, और चोबचीनी के फायदे क्या-क्या हैं? अधिकांश लोगों को चोपचीनी के फायदे के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती, इसलिए वे चोबचीनी (चोपचीनी) से लाभ नहीं ले सकते। भारत में चोपचीनी का प्रयोग एक चीनी खाने में तथा नेपाल और बंगाल के पहाड़ों पर मसाले के रूप में होता है, लेकिन इसके अलावा भी चोबचीनी के फायदे और भी हैं। चोपचीनी का पौधा कांटेदार, मोटे प्रकंद वाला और फैला होता है। यह जमीन पर फैलते हुए बढ़ता है। इसके पत्ते नुकीले, अण्डाकार होते हैं। इसके फूल सफेद रंग के तथा आकार में छोटे होते हैं। इसके फल चमकीले लाल रंग के, गोलाकार मांसल और रसयुक्त होते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार, चोपचीनी एक बहुत ही उत्तम जड़ी-बूटी है, और इसके उपयोग द्वारा अनेक तरह के रोगों की रोकथाम की जा सकती है। आप चोपचीनी के फायदे सिर दर्द, यौन रोग, जोड़ों के दर्द, चर्म रोग के अलावा अन्य कई बीमारियों में ले सकते हैं।

यूरिक एसिड को चमत्कारी रुप से कम करती है
चोपचीनी का चूर्ण (यह आपको आयुर्वेदिक स्टोर या पंसारी की दुकान पर मिल जायेगा) आधा चम्मच सुबह खाली पेट और रात को सोने के समय पानी से लेने पर कुछ ही दिनों में यूरिक एसिड (Uric Acid) ख़त्म हो जाता है। यह उपाय बहुत चमत्कारी है क्योंकि की यह आजमाया हुआ है।

चोपचीनी, सोंठ, मोचरस, अश्वगंधा दोनों सफेद और काली मूसली , कालीमिर्च, वायविडंग शुद्ध किये हुए कौंच की मिंगी तथा सौंफ को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनायें। बाद में 10 ग्राम की मात्रा में रोज खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी लें इससे पौरुष शक्ति बढ़ेगी और शुद्धि‍करण करेगा। इसमें मौजूद रसायन के कारण यह वीर्यदोष को दूर करने में भी मदद करता है।

चोपचीनी के वाजीकर होने के कारण ये शरीर की कमजोरी को दूर कर यह स्वप्नदोष जैसी परेशानियों को भी दूर करता है। इसके नियमित उपयोग से स्वप्नदोष से निजात पाने में मदद मिलती है।
सफ़ेद दाग़
चोपचीनी 50, ग्राम बावचि के बीज 50, ग्राम का चूर्ण बनाकर एक चम्मच (3, ग्राम,) सुबह और एक चम्मच रात में सोते समय शहद के साथ खाने से सफ़ेद दाग़ ठीक हो जाता है दूध और पसूओं से आने वाले आहार समुद्री आहार तेज मिर्च मसाले दार भोजन खट्टे फल सब्जी सिरका का परहेज़ करें।

सिफलिस
चोपचीनी का चूर्ण 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम लेने से उपदंश में लाभ होता है। उपदंश का जहर अगर ज्यादा फैल गया हो तो चोबचीनी का काढ़ा या फांट शहद मिलाकर पीना चाहिए।

गठिया रोग
चोपचीनी को दूध में उबालकर 3 से 6 ग्राम मस्तंगी, इलायची और दालचीनी को मिलाकर सुबह-शाम रोगी को देने से गठिया के दर्द में आराम मिलता है। चोपचीनी और गावजबान को मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े से घुटनों पर मिलाकर मालिश करने से दर्द व हड्डियों की कमजोरी खत्म हो जाती है।

कूल्हे से पैर तक का दर्द शयाटिका का दर्द
60 ग्राम चोपचीनी को मोटा-मोटा पीसकर रख लें। 200 मिलीलीटर पानी में 6 ग्राम चोबचीनी को रात में भिगोकर रख लें। सुबह उस चोपचीनी को आधा पानी खत्म होने तक उबालें और थोड़ा ठण्डा हो जाने पर पी लें। इससे कुल्हे से पैर तक का दर्द दूर होता है।

दमा के ल‍िए
100 ग्राम चोपचीनी लेकर 800 मिलीलीटर पानी में डालकर आग पर चढ़ा देते हैं। जब 300 मिलीलीटर पानी शेष रह जाए तो उसे उतार लेते हैं। इसे ठंडा करके छान लेते हैं। 25 ग्राम से 75 ग्राम तक यह काढ़ा रोजाना 3-4 बार पीने से श्वास रोग (दमा) ठीक हो जाता है।

ऐसे पहचानें
अच्छे चोपचीनी की पहचान-सबसे अच्छे चोपचीनी का रंग लाल या गुलाबी होता है। स्वाद मीठा होता है। यह चमकदार और चिकना होता है। इसमें गांठें और रेशे कम होते हैं। यह भीतर तथा बाहर से एक ही रंग का होता है। यह पानी में डालने पर डूब जााता है। इसके जो टुकड़े वजन में हल्के और सफेद रंग के हों, उनको कच्चा समझना चाहिए। चोपचीनी रक्त विकार और चर्म रोगों के इलाज के लिए बहुत अधिक उपयोगी माना जाता है चोब चीनी शरीर की संधियों और शिराओं में प्रवेश करके विकृत पित्त (यूरिक एसिड)को खतम करता है और अविकृत पित्त (साइट्रिक एसिड)को सहायता पहुंचाती है खून को साफ करती है संधियों (जोड़ों) को मजबूत करती है पेशाब को गति देती है मासिक धर्म को साफ करती है लकवा हाथ पैरों की सुजन उपदंस से होने वाला सिरदर्द ,आधा शीशी,पूराना नजला विसमृति चक्कर उन्माद ,और दमे के रोगों में भी लाभकारी है

चोपचीनी के नुकसान
गर्म प्रकृति वाले लोग (जिनका पेट गर्म रहता हो) चोपचीनी का अधिक मात्रा में उपयोग नहीं करें। चोपचीनी का अधिक मात्रा में उपयोग गर्म स्वभाव वालों के लिए हानिकारक होता है। चोबचीनी से होने वाले दोषों को दूर करने के लिए —–अनार के जूस का सेवन करें अनार का रस चोपचीनी के दोषों को दूर करता है।
यह पोस्ट आयुर्वेद पर आधारित सामान्य जानकारी उपलब्ध कराती है किसी भी चिकित्सा अथवा आयुर्वेद चिकित्सक की सलाह अथवा चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
यशपाल सिंह,आयुर्वेद रत्न

बिहार चुनाव की घाेषणा

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बिहार के विधानसा चुनाव के लिए तारीखों की घाेषणा कर दी गई। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से बताया कि बिहार विधानसभा चुनाव दो चरण में होंगे। छह नवंबर को पहले चरण का मतदान होगा । 11 नवंबर को दूसरे चरण का मतदान होगा। मतगणना 14 नवंबर को होगी।

14 लाख मतदाता पहली बार डालेंगे वोट
बिहार में कुल 7.43 करोड़ मतदाता हैं। 14 लाख मतदाता पहली बार वोट डालेंगे। अनुसूचित जाति के लिए 38 और अनुसूचित जनजाति के लिए दो सीट आरक्षित होंगी। चुनाव आयोग के मुताबिक 90,712 मतदान केंद्र होंगे। इनमें 76,801 ग्रामीण क्षेत्रों में होंगे और 13,911 शहरों में होंगे। मतदान केंद्रों को सौ फीसदी वेब कास्टिंग होगी। प्रत्येक मतदान केंद्र पर औसत 818 मतदाता होंगे। 

शरद_पूर्णिमा*

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भारतीय (सनातन) वांग्मय ऋग्वेद कहता है और आज आधुनिक विज्ञान भी इस की पुष्टि करता है शरद पूर्णिमा पर चांद पृथ्वी के सबसे पास होता है भूमंडल में सूर्य और उसके ग्रह सौर परिवार कहलाता है जिन्हें उर्जा (उष्मा) सूर्य से मिलती है ।सभी ग्रह और उप ग्रह एक दूसरे से गुरुत्वाकर्षण से जुड़े हैं और अपनी धुरी पर धूमते हैं जिसे दिन और रात होता और सौर परिवार के केंद्र सूर्य का चक्कर लगाते हैं। इससे अलग अलग ऋतु होती हैं ।पृथ्वी पर जीवन और वनस्पति सभी में जीवन सूर्य और चंद्रमा से आता है ।प्रकृति ने सभी जीवों वनस्पतियों मे उर्जा ग्रहण करने की छमता अनुसार गुण विकसित होते हैं। इसी तरह पृथ्वी का उप ग्रह चंद्रमा है और पृथ्वी के सबसे करीब भी है, इसीलिए पृथ्वी को सबसे ज्यादा प्रभावित चंद्रमा करता है ।इसीाकारण समुद्र में ज्वार भाटा आता है अनाजों में पौष्टिकता फलों में मिठास औषधियों में रोग हर गुण फूलों में सुगंध सभी सूरज और चंद्रमा से आते हैं।

*आयुर्वेद में चंद्रमा की चांदनी से चिकित्सा और शरद पूर्णिमा का महत्व *

शरद पूर्णिमा ( 6अक्टूबर 2025 – शरद पूनम की रात दिलाये- आत्मशांति और, स्वास्थ्य लाभ।)

आश्विन पूर्णिमा को ‘शरद पूर्णिमा’ या कोजागिरी भी बोलते हैं । इस दिन रास-उत्सव और कोजागर व्रत किया जाता है । गोपियों को शरद पूर्णिमा की रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी बजाकर अपने पास बुलाया और ईश्वरीय अमृत का पान कराया था । अतः शरद पूर्णिमा की रात्रि का विशेष महत्त्व है । इस रात को चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ पृथ्वी पर शीतलता, पोषक शक्ति एवं शांतिरूपी अमृतवर्षा करता है ।

शरद पूनम की रात को क्या करें, क्या न करें ?

दशहरे से शरद पूनम तक चन्द्रमा की चाँदनी में विशेष हितकारी रस, हितकारी किरणें होती हैं । इन दिनों चन्द्रमा की चाँदनी का लाभ उठाना, जिससे वर्षभर आप स्वस्थ और प्रसन्न रहें । नेत्रज्योति बढ़ाने के लिए दशहरे से शरद पूर्णिमा तक प्रतिदिन रात्रि में 15 से 20 मिनट तक चन्द्रमा के ऊपर त्राटक करें ।

अश्विनी कुमार देवताओं के वैद्य हैं । जो भी इन्द्रियाँ शिथिल हो गयी हों, उनको पुष्ट करने के लिए चन्द्रमा की चाँदनी में खीर रखना और भगवान को भोग लगाकर अश्विनी कुमारों से प्रार्थना करना कि ‘हमारी इन्द्रियों का बल-ओज बढ़ायें ।’ फिर वह खीर खा लेना ।

इस रात सूई में धागा पिरोने का अभ्यास करने से भी नेत्रज्योति बढ़ती है ।

शरद पूनम दमे की बीमारी वालों के लिए वरदान का दिन है।छोटी इलाईची को, चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर में मिलाकर खा लेना और रात को सोना नहीं । दमे का दम निकल जायेगा ।चन्द्रमा की चाँदनी गर्भवती महिला की नाभि पर पड़े तो गर्भ पुष्ट होता है । शरद पूनम की चाँदनी का अपना महत्त्व है लेकिन बारहों महीने चन्द्रमा की चाँदनी गर्भ को और औषधियों को पुष्ट करती है।

अमावस्या और पूर्णिमा को चन्द्रमा के विशेष प्रभाव से समुद्र में ज्वार-भाटा आता है । जब चन्द्रमा इतने बड़े दिगम्बर समुद्र में उथल-पुथल कर विशेष कम्पायमान कर देता है तो हमारे शरीर में जो जलीय अंश है, सप्तधातुएँ हैं, सप्त रंग हैं, उन पर भी चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है । इन दिनों में अगर काम-विकार भोगा तो विकलांग संतान अथवा जानलेवा बीमारी हो जाती है और यदि उपवास, व्रत तथा सत्संग किया तो तन तंदुरुस्त, मन प्रसन्न और बुद्धि में नयापन आता है।

खीर को बनायें अमृतमय प्रसाद

खीर को रसराज कहते हैं । सीताजी को अशोक वाटिका में रखा गया था । रावण के घर का क्या खायेंगी सीताजी ! तो इन्द्रदेव उन्हें खीर भेजते थे।

खीर बनाते समय घर में चाँदी का गिलास आदि जो बर्तन हो, या शुद्ध चांदी का सिक्का अथवा गहना आवश्य रात भर डाल कर रखें चांदी गरम खीर में डालेंआजकल जो मेटल (धातु) का बनाकर चाँदी के नाम से देते हैं वह नहीं, असली चाँदी के बर्तन अथवा असली सोना धो-धा के खीर में डाल दो तो उसमें रजतक्षार या सुवर्णक्षार आयेंगे । लोहे की कड़ाही अथवा पतीली में खीर बनाओ तो लौह तत्त्व भी उसमें आ जायेगा।

इलायची, खजूर या छुहारा डाल सकते हो लेकिन बादाम, काजू, पिस्ता, चारोली ये रात को पचने में भारी पड़ेंगे ।

रात्रि आठ बजे महीन कपड़े से ढँककर चन्द्रमा की चाँदनी में रखी हुई खीर 12 बजे के आसपास भगवान को भोग लगा कर प्रसादरूप में खा लेनी चाहिए । लेकिन देर रात को खाते हैं इसलिए थोड़ी कम खाना और खाने से पहले एकाध चम्मच ईश्वर के हवाले भी कर देना । मुँह अपना खोलना और भाव करना : ‘लो प्रभु ! आप भी लगाओ भोग ।’ और थोड़ी बच जाय तो फ्रिज में रख देना । सुबह गर्म करके खा सकते हो ।
(खीर दूध, चावल, मिश्री, चाँदी, चन्द्रमा की चाँदनी – इन पंचश्वेतों से युक्त होती है, अतः सुबह बासी नहीं मानी जाती ।)

शरद पूनम का आत्मकल्याणकारी संदेश

रासलीला इन्द्रियों और मन में विचरण करनेवालों के लिए अत्यंत उपयोगी है लेकिन राग, ताल, भजन का फल है भगवान में विश्रांति । रासलीला के बाद गोपियों को भी भगवान ने विश्रांति में पहुँचाया था । श्रीकृष्ण भी इसी विश्रांति में तृप्त रहने की कला जानते थे । संतुष्टि और तृप्ति सभीकी माँग है । चन्द्रमा की चाँदनी में खीर पड़ी-पड़ी पुष्ट हो और आप परमात्म-चाँदनी में विश्रांति पाओ ।
चन्द्रमा के दर्शन करते जाना और भावना करना कि ‘चन्द्रमा के रूप में साक्षात् परब्रह्म-परमात्मा की रसमय, पुष्टिदायक रश्मियाँ आ रही हैं । हम उसमें विश्रांति पा रहे हैं । पावन हो रहा है मन, पुष्ट हो रहा है तन, ॐ शांति… ॐ आनंद…’ पहले होंठों से, फिर हृदय से जप और शांति… निःसंकल्प ईश्वर में विश्रांति पाते जाना । परमात्म-विश्रांति, परमात्म-ज्ञान के बिना भौतिक सुख-सुविधाएँ कितनी भी मिल जायें लेकिन जीवात्मा की प्यास नहीं बुझेगी, तपन नहीं मिटेगी ।
देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ । (रामायण)

श्रीकृष्ण गोपियों से कहते हैं कि ‘‘तुम प्रेम करते-करते बाहर-ही-बाहर रुक न जाओ बल्कि भीतरी विश्रांति द्वारा मुझ अपने अंतरात्मा प्रेमास्पद को भी मिलो, जहाँ तुम्हारी और हमारी दूरी खत्म हो जाती है । मैं ईश्वर नहीं, तुम जीव नहीं, हम सब ब्रह्म हैं – वह अवस्था आ जाय ।’’ श्रीकृष्ण जो कहते हैं, उसको कुछ अंश में समझकर हम स्वीकार कर लें, बस हो गया ।

शरद पूर्णिमा
सबके लिए सुखद शीतल ठंडी दे छाँव
7अक्टूबर 2025
आज आश्विन मास का अंतिम दिवस शरद पूर्णिमा है
कार्तिक मास के अभिनंदन हेतु स्वयं चांद अपनी प्यारी प्रिया चांदनी द्वारा खूबसूरत चौड़ी मुस्कान देते हुए तैयार खड़ा हो जाता है।
सचमुच अति मनोहर चांदनी दूधिया श्वेत धवल उज्ज्वल चांदनी रात का दृश्य हृदय को आल्हादित किये बगैर नहीं रहता है।
आज की ही रात चन्द्रमा की चांदनी में खीर को ठंडी कर रख सुबह यज्ञ में प्रसाद लगा कर खाने का, आंखों की ज्योति वर्धन करने निरीक्षण परीक्षण करने का अति उत्साही, मंगलकारी यह प्राकृतिक पावन पर्व है..
कहा जाता है यदि आज के दिन की बनाई हुई खीर में अर्जुन की छाल का चूर्ण मिला दिया जाए, फिर उस खीर को रात भर बाहर किसी बर्तन में भर, सूती झीने कपड़े से मुंह बांधकर किसी दीवाल से अधर लटका दिया जाए (जहां बिल्ली आदि न चढ़ सके) तत्पश्चात खाने से जीवन भर के लिए दमा या अस्थमा रोग से छुटकारा मिल जाता है और ह्रदय को शक्ति मिलती है।
चांदी के कटोरे में लगभग पांच से 10 ग्राम चूर्ण डाल कर खीर चांदनी में रात भर रखने से चंद्रमा की किरणें खीर पर पड़ औषधीय लाभ को चौगुना कर देती हैं।
प्रकृति के द्वारा इस अनमोल अनुपम औषधीय लाभ को हम सभी को ग्रहण कर उस परमात्मा का अवश्य धन्यवाद करना चाहिये जिसने सूरज चांद ऋतुएं बना औषधियों का ग्रहण पान कर स्वस्थ दीर्घायु हो आनंद से जीने हमें सुअवसर प्रदान किया है।
चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में, स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में। पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से, मानों झूम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥ आप सभी को शरद पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनायें ।।
यशपाल सिंह आयुर्वेद रत्न

पंजाब के स्वतंत्रता सेनानी: बाबा खड़क सिंह की आज पुण्य तिथि है

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​’पंजाब के गांधी’ के नाम से विख्यात बाबा खड़क सिंह (6 जून 1867 – 6 अक्टूबर 1963) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के एक महान और निडर सेनानी, सिख राजनीतिक नेता, और एक प्रमुख राष्ट्रवादी थे। उन्होंने न केवल ब्रिटिश राज के विरुद्ध लड़ाई लड़ी बल्कि सिख धार्मिक संस्थानों, विशेष रूप से गुरुद्वारों, के सुधार और प्रबंधन के लिए अकाली आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जीवन त्याग, समर्पण और अडिग राष्ट्रवाद का प्रतीक था।

बाबा खड़क सिंह का जन्म 6 जून 1867 को सियालकोट, पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) में हुआ था। उनके पिता, राय बहादुर सरदार हरि सिंह, एक समृद्ध ठेकेदार और उद्योगपति थे, जिससे खड़क सिंह को एक आरामदायक पृष्ठभूमि मिली। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय स्कूलों से पूरी की और फिर लाहौर विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। बाद में, उन्होंने लॉ कॉलेज, इलाहाबाद में प्रवेश लिया, लेकिन अपने पिता के निधन के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर पारिवारिक व्यवसाय और संपत्ति की देखभाल के लिए वापस लौटना पड़ा।प्रारंभिक सार्वजनिक जीवन: शिक्षा पूरी न कर पाने के बावजूद, वह जल्द ही सिख मुद्दों और व्यापक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय हो गए। 1915 में, उन्होंने लाहौर में आयोजित सिख शैक्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता की, जिससे उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत हुई।

​बाबा खड़क सिंह का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान बहुआयामी और अद्वितीय था। उन्हें उनके साहसी रुख और ब्रिटिश सरकार के सामने न झुकने के लिए जाना जाता था। वह अपने विचारों में नरमपंथियों से अधिक चरमपंथी थे और उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सीधी कार्रवाई पर जोर दिया।

​सेंट्रल सिख लीग के अध्यक्ष: वह सेंट्रल सिख लीग के अध्यक्ष बने, एक ऐसा मंच जिसके माध्यम से उन्होंने पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में सिखों को संगठित किया और राष्ट्रीय आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की।

​असहयोग आंदोलन में भूमिका: उन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन का सक्रिय रूप से समर्थन किया। इस दौरान, उन्होंने ब्रिटिश उपाधियाँ, सम्मान, और सरकारी अदालतों का बहिष्कार करने का आह्वान किया।

​जेल और यातना: अपने राष्ट्रवादी कार्यों के कारण उन्हें कई बार कैद किया गया और लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। ब्रिटिश दमन के बावजूद, उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।

​राष्ट्रीय एकता पर जोर: बाबा खड़क सिंह ने हमेशा राष्ट्रीय एकता पर बल दिया। उन्होंने मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित पाकिस्तान की मांग और सिखों के लिए एक अलग पंजाब की मांग का भी कड़ा विरोध किया, जिससे यह सिद्ध होता है कि वह अखंड भारत के प्रबल समर्थक थे।

​अकाली आंदोलन और धार्मिक सुधार

​बाबा खड़क सिंह का एक और महत्वपूर्ण योगदान अकाली आंदोलन में था, जिसका उद्देश्य गुरुद्वारों को भ्रष्ट और ब्रिटिश-समर्थक मंहतों (पुजारियों) के चंगुल से मुक्त कराना और उनका प्रबंधन सिख समुदाय के हाथों में सौंपना था।

​शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC): अकाली आंदोलन के परिणामस्वरूप शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (SGPC) का गठन हुआ, जो सिख गुरुद्वारों के प्रबंधन और नियंत्रण के लिए जिम्मेदार है।

​SGPC के पहले अध्यक्ष: बाबा खड़क सिंह SGPC के वस्तुतः पहले अध्यक्ष थे। उन्होंने गुरुद्वारा सुधार के लिए अथक प्रयास किया, जिसमें स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) की चाबियों को अंग्रेजों से वापस लेने का प्रसिद्ध संघर्ष शामिल है।

​स्वर्ण मंदिर की चाबी का मोर्चा (Key Affair): 1921 में, ब्रिटिश अधिकारियों ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर की चाबियाँ जब्त कर ली थीं। बाबा खड़क सिंह के नेतृत्व में एक शक्तिशाली और सफल आंदोलन चलाया गया। आखिरकार, ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा और चाबियाँ वापस करनी पड़ीं। इस जीत को महात्मा गांधी ने “भारत की स्वतंत्रता की पहली निर्णायक लड़ाई” कहा था।

​सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925: अकाली आंदोलन की परिणति 1925 में सिख गुरुद्वारा अधिनियम के अधिनियमन में हुई, जिसने कानूनी तौर पर निर्वाचित सिख प्रतिनिधियों द्वारा गुरुद्वारों के प्रबंधन को सुनिश्चित किया।

​सांप्रदायिक पुरस्कार (Communal Award) का विरोध

​1932 में, ब्रिटिश प्रधान मंत्री रैम्से मैकडोनाल्ड ने सांप्रदायिक पुरस्कार की घोषणा की, जिसमें भारतीय अल्पसंख्यकों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (separate electorates) प्रदान किए गए थे। बाबा खड़क सिंह ने इसका भी मुखर विरोध किया, क्योंकि उनका मानना था कि यह भारत की राष्ट्रीय और सांप्रदायिक एकता को भंग कर देगा। उन्होंने महात्मा गांधी के साथ मिलकर इस पुरस्कार का विरोध किया, जब गांधीजी पुणे की यरवदा जेल में उपवास पर थे।

​अंतिम वर्ष और विरासत

​भारत की स्वतंत्रता के बाद भी बाबा खड़क सिंह ने सक्रिय राजनीति में भागीदारी जारी रखी। उन्होंने 6 अक्टूबर 1963 को 96 वर्ष की आयु में दिल्ली में अंतिम सांस ली।

​विरासत: बाबा खड़क सिंह को उनकी असाधारण बहादुरी, निस्वार्थता, और राष्ट्रवाद के लिए याद किया जाता है। उन्हें अक्सर ‘पंजाब के गांधी’ कहा जाता था क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान गांधीजी के समान ही महत्वपूर्ण और प्रेरणादायक था, खासकर पंजाब में।

​स्मारक: नई दिल्ली के कनॉट प्लेस क्षेत्र की एक प्रमुख सड़क का नाम उनके सम्मान में बाबा खड़क सिंह मार्ग रखा गया है। 1988 में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था।

​बाबा खड़क सिंह का जीवन इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय आंदोलन में धार्मिक सुधार और राजनीतिक मुक्ति की लड़ाई साथ-साथ लड़ी जा सकती है। उन्होंने सिख समुदाय को न केवल राजनीतिक रूप से जागरूक किया, बल्कि उन्हें राष्ट्रीय मुख्यधारा में भी सफलतापूर्वक एकीकृत किया।

वकील द्वारा मुुुख्य न्यायधीश पर जूता फेंकने की कोशिश

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सुप्रीम कोर्ट में एक वकील ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई पर हमला करने की कोशिश की। सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ के वकीलों द्वारा मामलों की सुनवाई करने के दौरान ये घटना हुई । सूत्रों के अनुसार, वकील मंच के पास गया और अपना जूता निकालकर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बीआर गवई पर फेंकने की कोशिश की। हालाँकि, अदालत में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने समय रहते हस्तक्षेप किया और वकील को बाहर निकाल दिया। बाहर निकलते समय वकील को यह कहते सुना गया कि सनातन का अपमान नहीं सहेंगे। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और अदालत में मौजूद वकीलों से अपनी दलीलें जारी रखने को कहा।

उन्होंने कहा इस सब से विचलित न हों। हम विचलित नहीं हैं। ये बातें मुझे प्रभावित नहीं करतीं। यह घटना संभवतः खजुराहो में भगवान विष्णु की सात फुट ऊँची सिर कटी मूर्ति की पुनर्स्थापना से संबंधित एक पूर्व मामले में मुख्य न्यायाधीश गवई की टिप्पणियों से प्रेरित थी। उस मामले को खारिज करते हुए उन्होंने कहा था जाओ और देवता से ही कुछ करने को कहो। तुम कहते हो कि तुम भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो। तो अभी जाकर प्रार्थना करो। यह एक पुरातात्विक स्थल है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को अनुमति वगैरह देनी होगी। 

इस टिप्पणी से सोशल मीडिया पर हंगामा मच गया था और कई लोगों ने मुख्य न्यायाधीश पर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का आरोप लगाया था। दो दिन बाद खुली अदालत में इस विवाद पर बोलते हुए, मुख्य न्यायाधीश गवई ने कहा कि उनका कोई अनादर करने का इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूँ… यह सब सोशल मीडिया पर हुआ।” केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश का समर्थन करते हुए कहा था कि सोशल मीडिया पर अक्सर घटनाओं पर प्रतिक्रियाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। 

दिल दिल है

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दिल

दिल दिल है। दिल टूटता है। बिखरता है। फटता है। हंसता है। रोता है। खेलता है। फेंकता है। पागल है। काजल है। बादल है। दिल सजना है। सजनी है। दिल सावन है। भादो है। मौसम है। हर पल बदलता है। दिल मजबूरी है। कमजोरी है। लाचारी है। दिल पास है। फेल है। साफ है। छोटा सा दिल। और सौ झमेले।

दिल न होता। हम न होते। न मोहब्बत होती। न जंजाल होते। न शादी होती। न बच्चे होते। न रोते। न हँसते। सारी गलती बड़े बुजुर्गों की है। न सेब खाते। न यह सब होता। अब क्या करें? कुछ नहीं हो सकता। दिल दीवाना है। मस्ताना है। दिल चोर है। दिल मोर है। दिल आसना है। क्या कोसना है? बीत गई। सो बीत गई।

दिल ऐसे ही नहीं बिगड़ा। सेब ने बिगाड़ा। सब ने मना किया..मत खा मत खा। लेकिन बड़े बुजुर्ग माने नहीं। अब भुगतो। दिल बैठ गया। राह चलते अटक गया। अटक गया तो अटक गया। कबूतर संदेश ले जाने लगे। फिर चिट्ठियां जाने लगीं। अब एसएमएस जाने लगे। दिल तो पागल हो। नहीं माना। दिल उड़ने लगा। घूंघट उड़ गया। चुनरी आसमान में फैल गई। बेटे बेटियों का दिल परवाज हो गया।

दिल दूध की तरह है। उबालोगे तो उबलेगा। यह तूफान है। तटबंध टूटेंगे ही। दिल करता है। दिल मरता है। वहीं खपता है। दिल से दुनिया है। दिल से दल। दिल दाल है। पहले साफ की जाती है। फिर पकाई जाती है। फिर खाई जाती है। इसमें प्रोटीन है। दिल में कोकीन है। दिल लगे तो मुश्किल। न लगे तो मुश्किल। सब सेब की देन।

दिल कभी बूढ़ा नहीं होता। दिल कभी सीधा नहीं होता। दिल के राज ताशकंद समझौते की तरह है। आदमी चला जाता है। दिल यहीं छोड़ जाता है। अपनों में भटकता है। उनके लिए रोता है। फिल्मों ने तो दिल का अंबार लगा दिया। भइया मुकेश ऐसा गा गये। दिल अभी भी रोता है।

कवि शायरों ने दिल को नीलाम कर दिया। बीते वक्त सबका दिल फटता था। क्या करे? मुकेश को सुनता था। दिल और जोर से चीख पड़ता था। आज बेफिक्री है। दिल रोता नहीं। हंसता है। तू नहीं तो और सही। डेट और लिव इन इसी के पर्यायवाची हैं।

दिल कब दस्तक दे दे। पता नहीं। पहले आसानी से कुंडी नहीं खुलती थी। अब खट खट की आवाज गांव में भी सुनी जाती है। ऑन लाइन दिल बिकता है। फटता है। सच मानिए। दिल ने बहुत तरक्की की है। दिल की अपनी दुनिया है। दुनिया उसी में कैद है। दिल की रेंज देखकर बाजार बना। आइटम बने। दो दिलों से काम नहीं चला। तो असंख्य दल बने। वोटर के दिल का क्या पता? हो सकता है, वोट मिल जाए?

दिल दलदल है। हर आदमी धंसता जरूर है। तभी हार्ट फेल होने लगे। खेलते, नाचते, गाते लोग जाने लगे। पीस मेकर भले न हो। पेसमेकर अवश्य है। क्या करें? दिल का मामला है। दिल नाजुक है। कभी भी टूट सकता है। न वो सेब खाते न यह दुर्गति होती। एक गलती कितनी भारी पड़ गई। अब कुछ नहीं हो सकता। कांग्रेस नहीं आएगी। दल हो या दिल, इसी से काम चलाओ। दिल दीवाना बिन सजना के माने न!

सूर्यकांत द्विवेदी

पटना मेट्रो के प्रथम चरण का शुभारंभ

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना मेट्रो के पहले चरण का उद्घाटन किया। इसमें 3.6 किमी एलिवेटेड खंड शामिल है । । यह परियोजना पटना में यातायात भीड़ को कम कर कनेक्टिविटी में सुधार लाएगी। इसका किराया ₹15 से ₹30 है । यह मेट्रो प्रतिदिन सुबह आठ बजे से रात 10 बजे तक चलेगी। इसमें यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा पर विशेष ध्यान दिया गया है। पटना मेट्रो के पहले चरण के उद्घाटन के साथ ही, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पटना जंक्शन समेत छह भूमिगत मेट्रो स्टेशनों की नीव रखी गई। तीन डिब्बों वाली पटना मेट्रो ट्रेन में लगभग 138 यात्री बैठ सकते हैं, जबकि प्रति ट्रिप 945 अतिरिक्त यात्री खड़े होकर यात्रा कर सकते हैं। पटना मेट्रो के उद्घाटन से शहर के परिवहन नेटवर्क में आमूल-चूल परिवर्तन आएगा, यातायात की भीड़ कम होगी और पटना में कनेक्टिविटी में सुधार होगा।

आईएसबीटी से जीरो माइल तक का किराया 15 रुपये होगा, जबकि न्यू आईएसबीटी से भूतनाथ मेट्रो स्टेशन तक का किराया 30 रुपये होगा। मेट्रो प्रतिदिन चलेगी, फिलहाल सुबह 8 बजे से रात 10 बजे तक, हर 20 मिनट में ट्रेनें चलेंगी। प्रत्येक ट्रेन में महिलाओं और दिव्यांग यात्रियों के लिए 12 आरक्षित सीटें भी होंगी। पटना मेट्रो ने यात्रियों की सुरक्षा और सुविधा पर विशेष ध्यान दिया है। प्रत्येक कोच में 360-डिग्री सीसीटीवी कैमरे, आपातकालीन बटन और माइक्रोफ़ोन लगे हैं, जिनसे यात्री सीधे मेट्रो चालक से संवाद कर सकते हैं

इसके अतिरिक्त, कोचों में मोबाइल फ़ोन और लैपटॉप चार्जिंग पॉइंट, आगे की ओर आपातकालीन द्वार और बेहतर सुरक्षा के लिए दो हिस्सों में बंटे स्लाइडिंग दरवाज़े भी हैं। बिहार की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हुए, कोचों को मधुबनी पेंटिंग और गोलघर, महावीर मंदिर और बुद्ध जैसे प्रतिष्ठित स्थलों के भगवा रंग में चित्रित रूपांकनों से सजाया गया है।

ग़ज़ा शांति योजना और विश्व के लिये अछूत देश बनता इस्राईल

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     −  तनवीर जाफ़री

  अमेरिकीराष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रयासों से ग़ज़ा को लेकर नई शांति योजना घोषित की गयी है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति ट्रंप व इस्राईली प्रधानमंत्री नेतन्याहू द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तावित यह योजना ग़ज़ा में सैन्य संघर्ष को समाप्त करने और इस क्षेत्र में दीर्घकालिक शांति स्थापित करने के लिए बनाई गई है। इस नई शांति योजना के अंतर्गत मुख्य रूप से ग़ज़ा को “आतंक मुक्त” और उग्रवाद-मुक्त क्षेत्र बनाने का लक्ष्य है, जिससे पड़ोसी देशों के लिए कोई ख़तरा न रहे और वहां पुनर्निर्माण व विकास कार्य शुरू हो सके। इस प्रस्तावित योजना के तहत इस्राईल अपनी सेना को चरणबद्ध तरीक़े से ग़ज़ा से हटाएगा, बशर्ते दोनों पक्ष यानी इस्राईल और हमास इस योजना को स्वीकार करें। सार्वजनिक रूप से दोनों पक्षों द्वारा इस योजना को स्वीकार करने के 72 घंटे के भीतर सभी बंधकों की रिहाई की बात कही गई है। प्रस्तावित समझौते के अनुसार हमास के क़ब्ज़े में रखे गये बंधकों की रिहाई के बाद इस्राईल भी क़रीब 250 फ़िलस्तीनी कैदियों सहित अन्य सैकड़ों गिरफ़्तार ग़ज़ा वासियों को रिहा करेगा। इसके अतिरिक्त ग़ज़ा में अस्थायी रूप से एक अंतरराष्ट्रीय शासी बोर्ड बनेगा, जिसकी अध्यक्षता स्वयं  डोनाल्ड ट्रंप करेंगे। इसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर भी शामिल होंगे। शांति योजना के अनुसार हमास के जो सदस्य शांतिपूर्वक साथ रहने की शपथ लेंगे उन्हें तो मुआफ़ी दी जाएगी जबकि अन्य को सुरक्षित निकास या किसी इच्छुक देश में बसने का विकल्प मिलेगा।

                    अमेरिका व इस्राईल द्वारा ग़ज़ावासियों पर ‘थोपी’ जा रही इस शांति योजना पर मुस्लिम देशों के रवैये में एक राय नहीं है। सऊदी अरब, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, क़तर, मिस्र, इंडोनेशिया और पाकिस्तान जैसे कई अन्य ‘अमेरिका परस्त ‘ मुस्लिम राष्ट्रों ने इन शांति प्रयासों का समर्थन किया है तो ईरान और तुर्की जैसे देश इस योजना को ‘अधूरी’ और फ़िलिस्तीन के हक़ में अपर्याप्त मान रहे हैं। इन देशों का मानना है कि इस योजना से फ़िलिस्तीनी स्वायत्तता और हमास की भूमिका सीमित हो जाती है। ईरान का मत है कि वह ‘न्यायपूर्ण, संतुलित और स्थायी समाधान’ के पक्ष में है और ग़ज़ा व फ़िलिस्तीन संबंधी किसी भी योजना में फ़िलिस्तीनी जनता की इच्छाओं व आकांक्षाओं की अनदेखी उचित नहीं है। ईरान ने इस योजना को ‘चौंकाने वाला’ और “फ़िलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का प्रयास” बताया है। जबकि कई अरब देश ऐसे भी हैं जिन्होंने अमेरिका के नेतृत्व वाली इस प्रक्रिया के स्थायित्व को लेकर संदेह ज़ाहिर किया है।  इस योजना को लेकर नेतन्याहू का मानना है कि इस योजना से उनके युद्ध के उद्देश्य पूरे होंगे। इस योजना के लागू होने से बंधकों की वापसी, हमास की सैन्य क्षमताओं का विघटन, और भविष्य में ग़ज़ा से कोई ख़तरा न रहना सुनिश्चित हो सकेगा। ख़बरों के अनुसार हमास ने भी दूर दृष्टि का परिचय देते हुये इस नई शांति योजनसा को स्वीकार कर लिया है। 

                 ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि ग़ज़ा जनसंहार के दोषी व ग़ज़ा शांति को लेकर पूरी दुनिया की अनदेखी करने वाले नेतेनयाहू को आख़िर इस नई शांति योजना के लिये अचानक क्यों राज़ी होना पड़ा। यह समझने के लिये हमें पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र महासभा के सत्र पर नज़र डालनी होगी। दरअसल न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र महासभा में पिछले दिनों उस समय अजीब दृश्य देखने को मिला जब विश्व के इस सबसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मंच से इस्राईल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपना भाषण देने के लिये जैसे ही खड़े हुये उसी समय उनके भाषण का विश्व के अधिकांश देशों द्वारा बहिष्कार किया गया। 193 देशों की इस महासभा में सैकड़ों देशों के प्रतिनिधि व राजनयिक अपनी कुर्सियां छोड़कर सदन से बाहर चले गए जिससे महासभा का काफ़ी बड़ा हिस्सा ख़ाली रह गया। उस समय नेतन्याहू के चेहरे पर परेशानी व असहजता के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे। निःसंदेह यह दृश्य इस्राईल की वर्तमान आक्रामक नीतियों, विशेषकर उसके द्वारा ग़ज़ा में जारी सैन्य अभियान और इससे होने वाले जनसंहार, के प्रति वैश्विक असहमति व आक्रोश का प्रतीक बन था। इस घटना के उस व्यापक निहितार्थ को भी समझने की ज़रुरत है जिसमें इस्राईल व नेतन्याहू के सन्दर्भ में अंतर्राष्ट्रीयक़ानून, नैतिकता, राजनीति और भविष्य की वैश्विक व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं। नेतन्याहू के भाषण के दौरान केवल अरब, मुस्लिम और अफ़्रीक़ी देशों के प्रतिनिधि ही बाहर नहीं गए, बल्कि अनेक यूरोपीय व पश्चिमी देशों के राजनयिकों ने भी नेतन्याहू के भाषण के विरोध में मंच छोड़ दिया। दरअसल यह बहिष्कार इस्राईल की अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बढ़ती अलगाव और दुनिया की नज़रों में इस्राईल के ‘अछूत ‘ बनने की स्थिति की ओर संकेत करता है।

                    नेतन्याहू इस समय अमेरिका संरक्षित विश्व के सबसे बड़े ‘अपराधी ‘ राष्ट्राध्यक्ष व एक बदनाम नेता के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनपर ग़ज़ा युद्ध में जनसंहार व युद्ध अपराध करने के आरोप हैं। इस व्यक्ति ने खाने के लिये लाइन में लगे भूखे लोगों पर, अस्पतालों पर शरणार्थी कैम्प्स पर अनेक बार बमबारी करवाई है। अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने उसके विरुद्ध गिरफ़्तारी वारंट जारी कर रखा है। नेतन्याहू के विरुद्ध अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक अदालत ने नवंबर 2024 में वारंट जारी किया है जिसमें उसे ‘युद्ध अपराध’ और ‘मानवता के ख़िलाफ़ अपराध’ का आरोपी ठहराया गया है । इन आरोपों में भुखमरी को हथियार बनाना, नागरिकों की हत्या करवाना , उत्पीड़न, और अन्य अमानवीय कृत्य शामिल हैं। नेतन्याहू अंतर्राष्ट्रीय अदालत के सभी 125 सदस्य देशों की यात्रा के समय क़ानूनी तौर पर हिरासत में लिये जा सकते हैं। उधर ग़ज़ा व फ़िलिस्तीन की धरती को क़ब्ज़ा करने की फ़िराक़ में अपनी गिद्ध दृष्टि लगाये बैठे नेतन्याहू को दुनिया के कई प्रमुख देश एक के बाद एक झटके देते जा रहे हैं। मिसाल के तौर पर जिस फ़िलिस्तीन को इस्राईल स्वतंत्र राष्ट्र मानने को तैयार नहीं उसी फ़िलिस्तीन को फ़्रांस , यूके, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे कई पश्चिमी देशों ने गत दिनों स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी। 

                  दरअसल संयुक्त राष्ट्र महासभा में पिछले दिनों नेतन्याहू के भाषण का विश्व के अधिकांश देशों द्वारा किये गये बहिष्कार की घटना ने जहां नेतन्याहू को ट्रंप द्वारा प्रस्तावित नई शांति योजना को स्वीकार करने के लिये मजबूर किया वहीँ कई प्रमुख पश्चिमी देशों द्वारा फ़िलिस्तीन को राष्ट्र के रूप में मान्यता दिया जाना भी नेतन्याहू के लिये एक बड़ा झटका साबित हुआ है। वास्तव में अपनी जनसंहारक नीतियों से नेतन्याहू इस्राईल को दुनिया की नज़रों में एक अछूत देश बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे। 

तनवीर जाफ़री 

वरिष्ठ पत्रकार

संपर्क : 9896219228 

हजार बुराइयों की जड़ है दारू

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में हर वर्ष  दो से आठ अक्टूबर तक मद्य निषेध सप्ताह के आयोजन की औपचारिकता का निर्वहन किया जाता है। इस अवसर पर पोस्टर, प्रदर्शनी, भाषण, मौखिक वार्ता ,विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित कर छात्रों और आम जनों को शराब की बुराइयों से अवगत कराया जाता है। साथ ही  मद्यपान, अन्य मादक द्रव्यों, पदार्थ तथा नशीली दवाओं के दुरुपयोग की रोकथाम हेतु समुदाय में व्यापक जनमत जाग्रत करने का प्रयास किया जाता है। मगर हमारे लाख प्रयासों के बावजूद इस पर पूरी तरह नकेल नहीं कसी जा सकी है।

नशाखोरी इस सदी की सबसे बड़ी समस्या है जिसमें शराब का नशा प्रमुख है। आज युवा वर्ग शराब के नशे में खोता जा रहा है। शराब जैसे तन मन और परिवार को खोखला करने वाली की लत उन्हें बर्बाद कर रही है। शुरू में युवा शौक के तौर पर शराब का सेवन करता है और बाद में नशे की मांग पूरी करने के लिए तस्करी और गैर सामाजिक कार्य के कारोबार में फंस जाता है। आजकल के बदलते लाइफस्टाइल में हमारे देश में नशा एक ऐसा अभिशाप बन कर उभर रहा है जो हमारे युवाओं को तेजी से अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है। साल-दर-साल इन युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। युवाओं में शराब जैसे खतरनाक नशे के बढ़ते चलन के पीछे बदलती जीवनशैली, अकेलापन, बेरोज़गारी और आपसी कलह जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब की वजह से हर साल करीब 30 लाख लोगों की मौत होती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब से सेवन से हर साल दुनिया भर में 20 में से लगभग एक मौत शराब पीने के कारण होती है। शराब पी के गाड़ी चलाने, शराब के कारण होने वाली हिंसा और दुर्व्यवहार और कई तरह की बीमारियों और विकारों के कारण यह मौत होती है। एक सरकारी  सर्वेक्षण के अनुसार भारत में पांच में से एक शख्स शराब पीता है। सर्वे के अनुसार 19 प्रतिशत लोगों को शराब की लत है। जबकि 2.9 करोड़ लोगों की तुलना में 10-75 उम्र के 2.7 प्रतिशत  लोगों को हर रोज ज्यादा नहीं तो कम से कम एक पेग जरूर चाहिए होता है और ये शराब के लती होते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार देशभर में 10 से 75 साल की आयु वर्ग के 14.6 प्रतिशत यानी करीब 16 करोड़ लोग शराब पीते हैं। छत्तीसगढ़, त्रिपुरा, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश और गोवा में शराब का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। इस सर्वे की चौंकाने वाली बात यह है कि देश में 10 साल के बच्चे भी नशीले पदार्थों का सेवन करने वालों में शामिल हैं।

एक अन्य सर्वे के मुताबिक भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी-कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है तथा सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं वे शराब पर फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिन्ता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़फ रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। ये लोग कहते हैं वे गम को भुलाने के लिए नशे का सेवन करते हैं। उनका यह तर्क कितना बेमानी है जब यह देखा जाता है कि उनका परिवार भूखे ही सो रहा है। युवाओं में नशा करने की बढ़ती प्रवृत्ति के चलते शहरी और ग्रामीण अंचल में आपराधिक वारदातों में काफी इजाफा हो रहा है। शराब के साथ नशे की दवाओं का उपयोग कर युवा वर्ग आपराधिक वारदातों को सहजता के साथ अंजाम देने लगे हैं। हिंसा ,बलात्कार, चोरी, आत्महत्या आदि अनेक अपराधों के पीछे नशा एक बहुत बड़ी वजह है। शराब पीकर गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करना, शादीशुदा व्यक्तियों द्वारा नशे में अपनी पत्नी से मारपीट करना आम बात है । शराब पीने से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होती हैं, जिनमें लीवर का सिरोसिस और कुछ कैंसर शामिल हैं। रिपोर्ट में पाया गया कि शराब का सेवन करने से लोग तपेदिक, एचआईवी और निमोनिया जैसी संक्रामक बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर