मातृत्व की मूर्त प्रतिमा−फिल्म अभिनेत्री निरूपा रॉय

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भारतीय सिनेमा के विशाल इतिहास में कुछ कलाकार ऐसे हुए हैं जिन्होंने पर्दे पर निभाए गए अपने किरदारों से पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। ऐसी ही एक महान अभिनेत्री थीं निरूपा रॉय, जिन्हें लोग आज भी “भारतीय माँ” के प्रतीक के रूप में याद करते हैं। उनका चेहरा, उनकी करुणा से भरी आँखें और संवादों की सहज गहराई, सिनेमा के हर युग में मातृत्व की परिभाषा बन गईं।


प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

निरूपा रॉय का जन्म 4 जनवरी 1931 को Valsad (वलसाड), गुजरात में हुआ था। उनका असली नाम कोकिला किशोरचंद्र बुलसारा था। वे एक साधारण गुजराती परिवार से थीं। प्रारंभिक शिक्षा वलसाड में ही हुई।

1940 के दशक में विवाह के बाद वे अपने पति कमल रॉय के साथ मुंबई आ गईं।
मुंबई उस समय हिंदी सिनेमा की राजधानी बन चुकी थी। पति-पत्नी दोनों को फिल्मों का शौक था, और संयोग से उन्होंने एक फिल्म प्रतियोगिता में भाग लिया।
वहीं से बॉम्बे टॉकीज के निर्माताओं की नजर उन पर पड़ी और उन्हें फिल्मों में काम करने का पहला मौका मिला।
यही से शुरू हुई कोकिला बुलसारा की निरूपा रॉय बनने की यात्रा।


फिल्मी करियर की शुरुआत

निरूपा रॉय की पहली फिल्म “अमर राज” (1946) थी, जो एक धार्मिक फिल्म थी।
फिर आई “हर हर महादेव” (1950) जिसमें उन्होंने पार्वती माता की भूमिका निभाई।
उनकी इस भूमिका ने उन्हें दर्शकों के बीच देवी स्वरूपा बना दिया।
लोग उन्हें सच्चे अर्थों में “देवी माँ” मानने लगे।
सिनेमा हॉल के बाहर लोग उनकी तस्वीरों पर अगरबत्तियाँ जलाते और आशीर्वाद मांगते थे — यह लोकप्रियता अपने आप में अनोखी थी।


1950 का दशक – धार्मिक फिल्मों की रानी

1950 का दशक निरूपा रॉय के लिए धार्मिक फिल्मों का स्वर्णिम युग रहा।
उन्होंने “शिवलिंग”, “गंगा मईया”, “श्री गणेश महिमा”, “जय संतोषी माँ”, “तुलसी विवाह”, “श्री सती आनंदी”, और “हर हर महादेव” जैसी अनेक फिल्मों में देवी या भक्त की भूमिकाएँ निभाईं।
उनकी आँखों में जो आस्था और त्याग झलकता था, वह अभिनय नहीं, मानो भावनाओं का साक्षात रूप था।

इस दौर में वे त्रिलोक कपूर के साथ जोड़ी के रूप में सबसे अधिक प्रसिद्ध रहीं।
लोग इन्हें “देव–देवी की जोड़ी” कहने लगे थे।


‘माँ’ के किरदारों की ओर बदलाव

1960 के दशक के मध्य में, जब धार्मिक फिल्मों का दौर थोड़ा कम हुआ, तो निरूपा रॉय ने सामाजिक और पारिवारिक फिल्मों की ओर रुख किया।
यहाँ उन्होंने एक नए रूप में खुद को स्थापित किया — ‘माँ’ के रूप में।
उनका चेहरा मातृत्व, त्याग, संवेदना और संघर्ष की प्रतिमूर्ति बन गया।

फिल्म “छलिया” (1960) में राज कपूर के साथ, “देवदास” (1955) में पारो की माँ के रूप में, और फिर “दीवार” (1975) में अमिताभ बच्चन की माँ के रूप में उन्होंने मातृत्व को एक नई ऊँचाई दी।


‘दीवार’ – माँ के चरित्र का अमर रूप

1975 में आई फिल्म “दीवार” ने निरूपा रॉय को माँ के किरदारों की रानी बना दिया।
फिल्म में उनका संवाद —
“मेरे पास माँ है” —
भारतीय सिनेमा के इतिहास का सबसे प्रसिद्ध संवाद बन गया।

उन्होंने वीरू और विजय जैसे बेटों के बीच भावनात्मक पुल का काम किया।
उनकी करुणा और त्याग की शक्ति ने इस किरदार को अविस्मरणीय बना दिया।
उसके बाद तो मानो हर निर्माता के लिए निरूपा रॉय “आदर्श माँ” बन गईं।


अमिताभ बच्चन की ऑन-स्क्रीन माँ

1970 और 1980 के दशक में निरूपा रॉय और अमिताभ बच्चन की जोड़ी को सिनेमा का सबसे भावनात्मक रिश्ता माना गया।
उन्होंने “दीवार”, “अमर अकबर एंथनी”, “सुहाग”, “मर्द”, “नमक हलाल”, “कूली”, और “लावारिस” जैसी कई सुपरहिट फिल्मों में माँ-बेटे की जोड़ी निभाई।

इन फिल्मों में उनकी भूमिका केवल भावुक माँ की नहीं थी, बल्कि वह सामाजिक न्याय, नैतिकता और आत्मबल की प्रतीक थीं।
संवेदनशील अभिनय शैली

निरूपा रॉय के अभिनय की सबसे बड़ी विशेषता थी संवेदनशीलता और संयम।
वे कभी ओवरएक्ट नहीं करती थीं।
उनकी आँखों की नमी और चेहरे की शांति संवादों से अधिक असर डालती थी।
उनके अभिनय में सच्चे जीवन का दर्द झलकता था — मानो वे खुद उन घटनाओं को जी रही हों।

उनकी आवाज़ में करुणा, और चेहरे पर स्नेह की छवि, दर्शकों को भावनात्मक रूप से बाँध लेती थी।
यही कारण था कि दर्शक उन्हें अपनी माँ जैसा मानने लगे।


निरूपा रॉय – महिला सशक्तिकरण की प्रतीक

हालाँकि उन्हें “माँ” के किरदारों के लिए जाना गया, लेकिन वे हमेशा महिला सशक्तिकरण की पक्षधर थीं।
उनके संवाद अक्सर यह संदेश देते थे कि औरत केवल त्याग की मूर्ति नहीं, बल्कि साहस और आत्मबल की प्रतिमूर्ति है।

फिल्म “सुहाग” में जब वे बेटों से कहती हैं —

“इंसान की पहचान उसके कर्म से होती है, वंश से नहीं” —
तो यह संवाद समाज के उस दौर में भी समानता और नैतिकता का संदेश देता है।


सम्मान और पुरस्कार

निरूपा रॉय को उनके योगदान के लिए अनेक पुरस्कार मिले —

फिल्मफेयर अवॉर्ड – सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री

“गूंज उठी शहनाई” (1959)

“छाया” (1961)

“शराफत” (1970)

फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड (1998)

उन्हें भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित माँ के रूप में भी सम्मानित किया गया।

उनके नाम पर गुजरात फिल्म संघ ने विशेष सम्मान “माँ रॉय स्मृति पुरस्कार” की शुरुआत की थी।


निजी जीवन और परिवार

निरूपा रॉय के पति कमल रॉय व्यवसायी थे और उन्होंने हमेशा अपनी पत्नी के करियर में सहयोग दिया।
उनके दो पुत्र हुए — योगेश और किरण रॉय।
निरूपा रॉय अपने परिवार से बेहद जुड़ी हुई थीं।
वे पर्दे पर जितनी भावनात्मक दिखती थीं, निजी जीवन में उतनी ही दृढ़ और व्यावहारिक थीं।


निधन और विरासत

13 अक्टूबर 2004 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से निरूपा रॉय का निधन हो गया।
उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा की माँ चिरनिद्रा में सो गई, पर उनका प्रभाव अमर रहा।

आज भी जब कोई फिल्म में माँ के किरदार की बात करता है, तो सबसे पहले निरूपा रॉय का चेहरा सामने आता है।
उनकी अदाकारी ने “माँ” को सिर्फ एक पात्र नहीं, बल्कि एक भावना बना दिया।


निष्कर्ष

निरूपा रॉय का जीवन भारतीय सिनेमा में स्त्री की उस छवि का प्रतीक है जिसने अपनी शक्ति, संवेदना और त्याग से लाखों दिलों को छुआ।
उन्होंने सिनेमा को आस्था, मातृत्व और भावनाओं का ऐसा रंग दिया जो आज तक फीका नहीं पड़ा।

वे केवल पर्दे की माँ नहीं थीं — वे भारतीय समाज की सामूहिक चेतना में बस चुकीं हैं।
उनका नाम लेते ही आँखों के सामने वह करुणा, ममता और आशीर्वाद भरा चेहरा उभर आता है जो हर माँ में बसता है।
निरूपा रॉय सचमुच भारतीय सिनेमा की माँ थीं — और रहेंगी।

भारतीय सिनेमा के युगपुरुष −अभिनेता अशोक कुमार (मुनी दा) –

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भारतीय फिल्म उद्योग के स्वर्णिम इतिहास में जिन नामों को सदैव आदरपूर्वक याद किया जाएगा, उनमें अशोक कुमार का नाम सबसे ऊपर आता है। वह केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के परिवर्तन के प्रतीक थे — वह युग जब अभिनय नाटकीयता से निकलकर यथार्थ की धरती पर उतर आया। प्रेम, वेदना, विनम्रता और परिपक्वता का अद्भुत संगम उनके व्यक्तित्व में झलकता था। उन्हें प्यार से ‘दादा मनी’ कहा जाता था, और उन्होंने हिंदी फिल्मों में अभिनय की शैली को एक नई दिशा दी।


प्रारंभिक जीवन

अशोक कुमार का जन्म 13 अक्टूबर 1911 को भागलपुर (अब बिहार) में हुआ था। उनका वास्तविक नाम कुमुदलाल गांगुली था। उनके पिता काला प्रसाद गांगुली वकील थे और परिवार बंगाली ब्राह्मण परंपरा से जुड़ा था। अशोक कुमार का बचपन भागलपुर में बीता, जहाँ उन्होंने बुनियादी शिक्षा प्राप्त की। बाद में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई करने पहुंचे, लेकिन उनका झुकाव शुरू से ही कला और अभिनय की ओर था।

उन्होंने प्रारंभ में किसी अभिनेता के रूप में नहीं, बल्कि बॉम्बे टॉकीज स्टूडियो में लैब असिस्टेंट के रूप में काम शुरू किया। फिल्मों में उनकी एंट्री एक संयोग की तरह हुई। उस समय के प्रसिद्ध अभिनेता नवीन यशवंत अचानक शूटिंग के दौरान अनुपस्थित हो गए, और स्टूडियो ने अशोक कुमार को मुख्य भूमिका निभाने का मौका दे दिया। यही संयोग भारतीय सिनेमा को उसका पहला “सुपरस्टार” देने वाला क्षण बन गया।


फिल्मी करियर की शुरुआत

अशोक कुमार की पहली बड़ी फिल्म “जीवन नैया” (1936) थी, लेकिन उन्हें सच्ची पहचान मिली “अछूत कन्या” (1936) से। इस फिल्म में उन्होंने देविका रानी के साथ अभिनय किया। यह फिल्म सामाजिक मुद्दों पर आधारित थी और जातिवाद के खिलाफ एक सशक्त संदेश देती थी। इसके बाद वे बॉम्बे टॉकीज के स्थायी स्तंभ बन गए।

1930 और 1940 के दशक में अशोक कुमार ने एक के बाद एक सफल फिल्में दीं — “बंधन” (1940), “किस्मत” (1943), “झूला” (1941), “चलचल रे नौजवान” (1944) और “महल” (1949) जैसी फिल्मों ने उन्हें घर-घर में प्रसिद्ध बना दिया।
उनकी फिल्म “किस्मत” को भारतीय सिनेमा की पहली सुपरहिट ब्लॉकबस्टर कहा जाता है। इस फिल्म ने उस दौर में रिकॉर्डतोड़ कमाई की थी और इसमें उनका गाना “धन ते नन…” आज भी चर्चित है।


अभिनय शैली और योगदान

अशोक कुमार की सबसे बड़ी विशेषता थी – स्वाभाविक अभिनय। उस दौर में जब अभिनेता नाटकीय संवाद शैली में बोलते थे, अशोक कुमार ने चेहरे के भाव और सरल संवाद अदायगी से चरित्रों को जीवंत बना दिया।
उनकी आवाज़ में एक शालीनता और विश्वास झलकता था। चाहे वे प्रेमी की भूमिका निभा रहे हों या एक पिता की, उनके अभिनय में एक सहज अपनापन दिखाई देता था।

वे पहले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने फिल्मों में “एंटी-हीरो” की अवधारणा को प्रस्तुत किया। “किस्मत” में उन्होंने एक अपराधी का रोल निभाया जो दर्शकों को खलनायक नहीं बल्कि एक त्रासद नायक के रूप में प्रिय लगा। बाद में यह ट्रेंड भारतीय सिनेमा का स्थायी हिस्सा बन गया।


‘महल’ और रहस्य फिल्मों का दौर

1949 में रिलीज़ हुई फिल्म “महल” को अशोक कुमार के करियर का टर्निंग पॉइंट कहा जा सकता है। इसमें उनके साथ मधुबाला थीं। यह भारत की पहली सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी, जिसका गीत “आएगा आने वाला…” अमर हो गया।
इस फिल्म के रहस्यमय किरदार ने भारतीय सिनेमा में रहस्य और मनोवैज्ञानिक फिल्मों की नींव रखी।


निर्माता और मार्गदर्शक के रूप में योगदान

अशोक कुमार सिर्फ अभिनेता नहीं रहे, बल्कि निर्माता, निर्देशक और मार्गदर्शक की भूमिका में भी आगे आए। उन्होंने कई नई प्रतिभाओं को मौका दिया।
उन्होंने अपने छोटे भाई किशोर कुमार को फिल्म जगत में लाने में बड़ी भूमिका निभाई।
किशोर कुमार बाद में भारत के सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक और अभिनेता बने।
इसी तरह, उन्होंने अनूप कुमार और कई अन्य कलाकारों को भी प्रोत्साहित किया।

1950 और 1960 के दशक में जब नए नायक उभरने लगे, अशोक कुमार ने चरित्र भूमिकाओं में अपनी नई पहचान बनाई। फिल्मों जैसे “भाई-भाई” (1956), “चितलें चौकडी”, “आशिरवाद” (1968), “मिली” (1975) और “खूबसूरत” (1980) में उनके अभिनय ने उन्हें नए युग का “सीनियर हीरो” बना दिया।


‘आशीर्वाद’ – अभिनय का शिखर

1968 में आई फिल्म “आशीर्वाद” अशोक कुमार के जीवन की सबसे यादगार फिल्म रही।
इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई जो अपने बच्चे के लिए समाज से लड़ता है।
उनका संवाद “रेल की पटरी पर खड़ा एक आदमी…” और प्रसिद्ध बालगीत “रेल गाड़ी रेल गाड़ी…” आज भी लोगों की स्मृतियों में है।
इस फिल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


टेलीविजन युग में भी सक्रियता

1980 के दशक में जब दूरदर्शन का दौर शुरू हुआ, तो अशोक कुमार ने टीवी पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
उनका धारावाहिक “हमलोग” भारतीय टीवी इतिहास का पहला बड़ा पारिवारिक ड्रामा था।
इसमें उनकी भूमिका एक वाचक (Narrator) की थी, जो हर एपिसोड में जीवन के मूल्यों और संघर्षों पर विचार प्रस्तुत करते थे।
उनकी वाणी में वह गहराई थी जो दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती थी।

मैडम और मार्केट

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व्यंग्य

बाजार तो बाजार है। बेजार नहीं। वह दिल से ज्यादा नब्ज पर हाथ रखता है। ग्राहक के कदम रखते ही वह सब भांप जाता है। कभी अकेले शॉप में जाएं। मुरझाए चेहरे। कुछ भी ले लो। कोई उत्साह नहीं। मरे मन से सेल्स बॉय चीज दिखाएगा। आदमी अलट पलट करके देखेगा। समझ में कुछ आयेगा नहीं। फिर सेल्स बॉय से कहेगा..भाई जो अच्छा हो। आप ही दे दो। मुश्किल बीबी के आइटम में आती है। पास में बैठी “बहन जी” की मदद लेनी पड़ती है। “जी, मिसेज के लिए साड़ी लेनी है। क्या आप मदद करेंगी?”
वह भी चतुर हैं। वह बारीकी नज़रों से पहले ही भांप चुकी थी..हमको कुछ समझ नहीं आ रही है। खैर, हमारे प्रश्न पर उनका जवाब मिला.. “श्योर “।” मैं लेती तो ये लेती”( जैसे हम उनको दिलवा रहे हों)। अब उनकी पसंद का तो पता नहीं। वैसे ये ले जाइए। शायद पसंद आ जाए। वरना आप चेंज कर लीजिए। हर लेडीज की पसंद अलग होती है। “
सेल्स बॉय ने मौका ताड़ा। भाईसाहब दो ले जाइए। कोई न कोई पसंद आ ही जाएगी। एक बहन जी की पसंद की ले लें। एक मेरी पसंद की ( वो जान गया था, हम तो उल्लू हैं)। “भैया। तुम्हारी पसंद की क्यों? अपनी क्यों नहीं। “

बहरहाल, घर पर आए। बीबी ने डिब्बा खोला। “अरे, वाह। तुम तो मेरे लिए साड़ी लाए हो।” पहला डिब्बा सेल्स बॉय की पसंद वाला था। वो देखा। फिर किनारे रख दिया। दूसरा डिब्बे का दिल धुक धुक हो रहा था..खुल जा सिम सिम। डिब्बा खुला..”ये तुम लाए हो? ये तुम्हारी पसंद तो लगती नहीं? किस से पसंद करवाई?”
पोल खुल गई। सच बताना पड़ा। “वही तो”। मैं तो देखते ही समझ गई थी। जान पहचान की थी?” अरे नहीं। बगल में बैठी थी। उसी से पूछ लिया। “साड़ी तो ठीक है। सुंदर है। लेकिन अब मैं साड़ी कहां पहनती हूं? इस कलर की तो कई हैं। वैसे भी मैं तो अब सूट पहनती हूं।”
दुकानदार कह रहा था..”पसंद न आए तो बदल लेना..मैने कहा।”
ठीक है। अभी चलते हैं ( महिलाएं बाजार जाने को कभी मना नहीं करतीं। बाजार उनसे है। वो बाजार से)। हम दोनों दुकान पर पहुंचे। वो महिला अभी तक वहीं जमी हुई थी। या तो साड़ी पसंद नहीं आई। या हमारा इंतजार कर रही थी।
हमने परिचय कराया..” आपके लिए इन्होंने ही पसंद की थी ..”। दोनों ने बुझे मन से एक दूसरे को नजरों से हेलो कहा। दोनों अपने काम में लग गई। वाइफ ने पचास साड़ी में से 8 चॉयस में निकाली। फिर सबको रिजेक्ट किया। जो हम लेकर गए थे। वही घर में आ गई। साथ में दो सूट और।
कनखियों से उस महिला ने हमको देखा। नजरों से थंब किया। देखी, हमारी पसंद !

महिला प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर ही बाजारों में एक्सचेंज ऑफर निकलता है। जीएसटी अपने आप उछलता रहता है। स्लैब की यहां जरूरत नहीं। महिलाओं के लिए कोई दुकान नई नहीं। प्रायः हर दुकान पर लक्ष्मी जी के चरण कमल पड़ चुके होते हैं। 800 या 1000 करोड़ का बिजनेस यूं ही नहीं हो जाता। वो भी अकेले करवा चौथ पर।

पूरे बाजार पर महिलाओं या बच्चों का कब्जा है। उदाहरण देखिए…गारमेंट्स, ज्वेलरी,कॉस्मेटिक,ब्यूटी पार्लर और राशन की दुकानें। इनकी अनगिनत रेंज है। एक ही लेन में पांच ज्वेलर्स। 20 साड़ी या गारमेंट्स के शो रूम। चार पार्लर। पांच परचून की दुकान। तीन जगह पानी के बताशे। बाकी में लेडीज शूज।

शेष 10 प्रतिशत में बच्चे। 2 % में पुरुषों की थकी हुई जींस। टी शर्ट। सूट। या हाथ की घड़ी। कोई रेंज नहीं। नो एक्सचेंज ऑफर। उसमें भी लेडीज चॉइस..” ये ले लो। यही ठीक लगेगी।” जैसे जैसे महिलाएं आगे बढ़ रही हैं। बाजार भी बढ़ रहा है। विश्व की तीसरी अर्थव्यवस्था से हमको कौन रोकेगा? जीडीपी में इससे बड़ा योगदान क्या होगा ? वह गृह लक्ष्मी हैं। राज लक्ष्मी हैं। धन लक्ष्मी हैं।

सूर्यकांत

“गुरुहीन स्कूल, अधूरा भविष्य-  शिक्षा व्यवस्था पर संकट की दस्तक”

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हरियाणा के सरकारी स्कूलों में 12,000 से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। नूंह जैसे जिलों में एक शिक्षक पर 100 से अधिक बच्चों का बोझ है। सरकार की धीमी भर्ती प्रक्रिया और असमान पदस्थापन इस संकट को गहरा कर रहे हैं। शिक्षा नीति 2020 के अनुसार हर बच्चे को समान व गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अधिकार है। इसके लिए सरकार को त्वरित, पारदर्शी और स्थायी भर्ती नीति लागू करनी चाहिए ताकि हर कक्षा में शिक्षक और हर बच्चे के जीवन में ज्ञान का उजाला हो।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा की शिक्षा व्यवस्था इस समय एक गहरे संकट से गुजर रही है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी ने न केवल पढ़ाई की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, बल्कि बच्चों के भविष्य पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। हाल ही में आई रिपोर्टों के अनुसार प्रदेश में 12,000 से अधिक शिक्षक पद रिक्त हैं। यह संख्या केवल एक प्रशासनिक आँकड़ा नहीं, बल्कि उन हजारों बच्चों की उम्मीदों का प्रतीक है जो अपने जीवन की दिशा तय करने के लिए इन स्कूलों पर निर्भर हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि कुछ जिलों में एक-एक शिक्षक पर 100 से अधिक बच्चों की जिम्मेदारी आ चुकी है।

हरियाणा जैसे शिक्षित और विकसित राज्य में यह स्थिति बेहद चिंताजनक है। एक ओर सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के लक्ष्य पूरे करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर स्कूलों में ब्लैकबोर्ड तक खाली हैं। शिक्षक समाज की नींव होते हैं, वे केवल पढ़ाई नहीं कराते बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। जब इन स्कूलों में गुरुजी ही न हों, तो बच्चों का मनोबल, सीखने की क्षमता और भविष्य सभी खतरे में पड़ जाते हैं।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राज्य के विभिन्न विभागों में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया वर्षों से अधर में लटकी हुई है। बार-बार घोषणाएँ होती हैं, पदों का विज्ञापन निकलता है, लेकिन या तो चयन प्रक्रिया धीमी रहती है या फिर नियुक्तियाँ समय पर नहीं हो पातीं। नतीजा यह है कि हजारों स्कूल ऐसे हैं जहाँ या तो एक ही शिक्षक पूरी जिम्मेदारी उठा रहा है, या फिर अस्थायी आधार पर ‘गेस्ट टीचर’ व्यवस्था से काम चलाया जा रहा है। यह स्थिति बच्चों के हित में नहीं है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि एक शिक्षक पर अधिकतम 30-35 विद्यार्थियों से अधिक का बोझ नहीं होना चाहिए। ऐसा इसलिए ताकि शिक्षक व्यक्तिगत ध्यान दे सकें और सीखने की प्रक्रिया को सार्थक बनाया जा सके। मगर नूंह, पलवल, महेंद्रगढ़ जैसे जिलों में यह अनुपात 1:100 तक पहुँच गया है। यह केवल एक शैक्षणिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक असमानता की कहानी भी कहता है। क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे वही हैं जिनके माता-पिता निजी शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते। इस वर्ग के लिए सरकारी स्कूल ही एकमात्र आशा हैं, और जब इन स्कूलों की दशा ऐसी हो जाए, तो समाज का भविष्य ही संकट में पड़ जाता है।

सरकार ने वर्ष 2024 में 14,295 नए पदों पर भर्ती की घोषणा की थी। लेकिन जिस गति से प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, उसे देखकर लगता है कि यह लक्ष्य 2025 के अंत तक भी पूरा नहीं हो पाएगा। शिक्षकों की भर्ती के लिए लंबी प्रक्रिया, कोर्ट के केस, दस्तावेज़ी जाँच, रिजर्वेशन विवाद, और विभागीय सुस्ती — सब मिलकर स्थिति को और जटिल बना रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, जो शिक्षक सेवानिवृत्त हो रहे हैं, उनकी जगह तुरंत नई नियुक्ति नहीं की जा रही। इसका अर्थ यह हुआ कि रिक्तियों की संख्या समय के साथ बढ़ती ही जा रही है।

हरियाणा के कुछ जिलों में हालात इतने खराब हैं कि स्कूलों में एक ही शिक्षक हिंदी, गणित, विज्ञान, सामाजिक अध्ययन सब कुछ पढ़ा रहा है। नतीजतन, बच्चों की समझ कमजोर होती जा रही है। शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में पास करवाना नहीं बल्कि सोचने, समझने और समाज में योगदान देने की क्षमता विकसित करना होता है। लेकिन ऐसी परिस्थितियों में बच्चों को केवल औपचारिक शिक्षा मिल रही है, वास्तविक ज्ञान नहीं।

शिक्षक केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि समाज के विकास की रीढ़ हैं। उनके बिना कोई भी नीति, कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। शिक्षक का होना ही विद्यालय की आत्मा का होना है। जब शिक्षकों की कमी होती है, तो स्कूल भवन तो रह जाते हैं, लेकिन शिक्षा का सार कहीं खो जाता है।

सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या लगातार घट रही है क्योंकि अभिभावक अब निजी स्कूलों की ओर झुक रहे हैं। लेकिन निजी स्कूल हर वर्ग के लिए सुलभ नहीं। ग्रामीण इलाकों में तो कई बार सरकारी स्कूल ही शिक्षा का एकमात्र माध्यम हैं। जब यहाँ संसाधन नहीं, शिक्षक नहीं और सुविधाएँ नहीं, तो शिक्षा केवल एक दिखावा बनकर रह जाती है।

राज्य सरकार ने कई बार दावा किया है कि शिक्षकों की भर्ती जल्द पूरी की जाएगी, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव न के बराबर है। शिक्षा विभाग की फाइलें कार्यालयों में घूमती रहती हैं जबकि स्कूलों में बच्चे बिना पढ़ाई के दिन बिताते हैं। शिक्षा के इस संकट को दूर करने के लिए केवल घोषणाएँ काफी नहीं होंगी, बल्कि ठोस कार्ययोजना बनानी होगी।

सबसे पहले तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर विद्यालय में विषयवार पर्याप्त संख्या में शिक्षक हों। साथ ही, जो पद लंबे समय से रिक्त हैं, उन्हें अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी भर्ती के माध्यम से भरा जाए। गेस्ट टीचर व्यवस्था एक अस्थायी उपाय थी, लेकिन अब यह स्थायी समाधान बन गई है, जो कि शिक्षा की गुणवत्ता के लिए नुकसानदायक है।

दूसरा, शिक्षकों के स्थानांतरण और पदस्थापन में पारदर्शिता लाई जाए। कई बार होता यह है कि कुछ स्कूलों में शिक्षक अधिक होते हैं जबकि कुछ स्कूलों में एक भी नहीं। यह असमान वितरण भी एक बड़ी समस्या है। डिजिटल तकनीक की मदद से इस स्थिति को संतुलित किया जा सकता है।

तीसरा, शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। जो शिक्षक सेवा में हैं, उन्हें समय-समय पर नई शिक्षण तकनीकों और पद्धतियों का प्रशिक्षण मिले ताकि वे बच्चों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ सकें।

सरकार को यह समझना होगा कि शिक्षा खर्च नहीं बल्कि निवेश है। जब राज्य शिक्षा पर ध्यान देता है, तभी उसका सामाजिक और आर्थिक विकास संभव होता है। यदि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिलेगी, तो आने वाले वर्षों में यह कमी देश की उत्पादकता, नवाचार और सामाजिक सद्भाव पर सीधा असर डालेगी।

हरियाणा ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है — उद्योग, खेल, कृषि और प्रशासन में राज्य की पहचान बनी है। लेकिन शिक्षा में यह कमी उस छवि को धूमिल कर रही है। हर बच्चा तभी सक्षम नागरिक बनेगा जब उसे बचपन से उचित मार्गदर्शन और शिक्षा मिलेगी। स्कूलों में शिक्षकों की कमी केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी का उल्लंघन भी है।

शिक्षक ही वह कड़ी हैं जो समाज और ज्ञान को जोड़ती है। जिस दिन हम इस कड़ी को कमजोर कर देंगे, उसी दिन समाज में अंधकार फैलने लगेगा। बच्चे जब बिना शिक्षक के स्कूल जाते हैं, तो यह केवल एक शैक्षणिक विफलता नहीं बल्कि राष्ट्र की असफलता भी है।

अब समय आ गया है कि सरकार शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। केवल भवन बनाना, स्मार्ट क्लास लगाना या किताबें बांटना पर्याप्त नहीं है। इन सबका अर्थ तभी है जब हर कक्षा में शिक्षक खड़ा हो, बच्चों की आँखों में सवाल हों और उन सवालों के जवाब देने वाला कोई गुरु मौजूद हो।

शिक्षा के प्रति लापरवाही का सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ी भुगतेगी। एक शिक्षक की अनुपस्थिति का अर्थ है सैकड़ों बच्चों की क्षमता का अधूरा रह जाना। इसीलिए यह केवल एक विभागीय मसला नहीं, बल्कि समाज का प्रश्न है।

यदि हरियाणा को वास्तव में ‘शिक्षा राज्य’ बनाना है तो सबसे पहले शिक्षकों की कमी को दूर करना होगा। सरकार को चाहिए कि वह भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी, त्वरित और निष्पक्ष बनाए। साथ ही, शिक्षकों को उनके योगदान के अनुरूप सम्मान और प्रोत्साहन मिले।

हरियाणा के शिक्षा मंत्री से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक सभी को इस मुद्दे की गंभीरता को समझना चाहिए। यदि शिक्षा पर निवेश नहीं किया गया, तो भविष्य में यह सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती बन जाएगी। स्कूलों में ब्लैकबोर्ड खाली हैं, लेकिन इससे भी ज्यादा खाली हैं बच्चों के सपने, जो शिक्षक के बिना अधूरे हैं। 

शिक्षक केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के विचारों, संस्कारों और भविष्य का निर्माणकर्ता है। हरियाणा में शिक्षकों की कमी ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ कमजोर हो चुकी है। अब जरूरत है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाएं। हर बच्चे का अधिकार है कि उसे शिक्षित किया जाए, और यह अधिकार तभी पूरा होगा जब हर स्कूल में शिक्षक मौजूद हो।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

अहोई अष्टमी व्रत : मातृत्व की ममता और संतान की दीर्घायु का पर्व

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तिथि: 13 अक्टूबर 2025, सोमवार

अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर सुबह 9:15 बजे

अष्टमी तिथि समाप्त: 14 अक्टूबर सुबह 7:10 बजे

तारा दर्शन मुहूर्त (व्रत खोलने का समय): शाम 6:45 बजे से 7:15 बजे तक (स्थानीय समय अनुसार)

योग: रवि योग, शिव योग, परिधि योग

नक्षत्र: पुनर्वसु नक्षत्र

व्रत उद्देश्य: संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की कामना हेतु। 

 अहोई माता का व्रत मातृत्व और संतान के पवित्र बंधन का प्रतीक है। यह व्रत माताओं की श्रद्धा, विश्वास और निस्वार्थ प्रेम का प्रतीक बनकर पीढ़ियों से परिवार की सुख-शांति और समृद्धि का आधार माना जाता है।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहार केवल पूजा-पाठ के माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह जीवन के आदर्शों, भावनाओं और संबंधों की गहराई को दर्शाते हैं। इन्हीं में से एक है अहोई अष्टमी व्रत, जो मातृत्व की भावना से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र पर्व है। यह व्रत माताएँ अपने बच्चों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। यह पर्व माँ के त्याग, स्नेह और श्रद्धा का अद्भुत प्रतीक है।

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का व्रत किया जाता है। यह पर्व करवा चौथ के ठीक चार दिन बाद और दीपावली से सात दिन पहले आता है। वर्ष 2025 में अहोई अष्टमी 13 अक्टूबर, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन आद्रा और पुनर्वसु नक्षत्र, बव करण, परिधि योग तथा शिव योग जैसे शुभ संयोग बन रहे हैं। इस शुभ मुहूर्त में अहोई माता की पूजा और व्रत विशेष फलदायी मानी जाती है।

अहोई अष्टमी व्रत का उद्देश्य संतान की दीर्घायु, सुख और सुरक्षा के लिए माँ द्वारा किया गया एक निस्वार्थ संकल्प है। इस दिन माताएँ निर्जला उपवास रखती हैं और रात्रि में तारा दर्शन के बाद ही व्रत खोलती हैं। यह व्रत नारी के समर्पण और आस्था की मिसाल है। प्राचीन समय में इसे केवल पुत्र की लंबी आयु के लिए रखा जाता था, परंतु अब यह सभी बच्चों—पुत्र-पुत्री दोनों—के कल्याण हेतु किया जाता है।

किंवदंती के अनुसार, बहुत समय पहले एक साहूकार दंपति रहता था। उनकी सात संतानें थीं। दीपावली के दिनों में घर की सजावट हेतु साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी लेने गई। जब वह मिट्टी खोद रही थी, तब उसके फावड़े से अनजाने में एक साही (साही के बच्चे) को चोट लग गई और उसकी मृत्यु हो गई। यह देखकर वह बहुत दुखी हुई। कुछ समय बाद उसके सातों पुत्रों की मृत्यु हो गई। वह शोक में डूबी रहने लगी और सोचने लगी कि यह सब उसके पाप का परिणाम है। एक दिन उसने अपनी व्यथा एक साधु को सुनाई। साधु ने कहा कि तुमने अनजाने में पाप किया है, इसलिए अहोई माता की पूजा और व्रत करो, वे तुम्हें क्षमा करेंगी और तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करेंगी। उसने सच्चे मन से अहोई माता का व्रत किया। उसकी श्रद्धा और पश्चाताप से प्रसन्न होकर अहोई माता ने उसके सभी पुत्रों को जीवनदान दिया। तभी से यह व्रत मातृत्व, क्षमा और करुणा का प्रतीक बन गया।

अहोई अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान के बाद माताएँ संकल्प लेती हैं कि वे दिनभर व्रत रखकर अपने बच्चों की मंगलकामना करेंगी। इस दिन निर्जला उपवास रखना श्रेष्ठ माना गया है, परंतु कुछ महिलाएँ फलाहार कर सकती हैं। शाम के समय पूजा की तैयारी की जाती है। दीवार पर या कागज पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है। चित्र में अहोई माता, साही माता और सात पुत्रों के प्रतीकात्मक चित्र होते हैं। साथ में सात तारे या बिंदु बनाए जाते हैं, जो सात संतान या सात पीढ़ियों का प्रतीक माने जाते हैं। पूजा की थाली में कलश, जल का लोटा, दूध, रोली, चावल, हलवा, पूड़ी, मिठाई और चांदी की अहोई रखी जाती है।

संध्या के समय जब तारा उदय होने लगता है, तब दीप जलाकर माता अहोई की पूजा की जाती है। कथा सुनी जाती है और अहोई माता से प्रार्थना की जाती है कि जैसे आपने साहूकारनी के पुत्रों को जीवनदान दिया था, वैसे ही मेरे बच्चों की रक्षा करें। पूजा के बाद माताएँ आकाश में तारे को देखती हैं, उसे जल अर्पित करती हैं और उसी क्षण व्रत खोलती हैं। कई जगह माताएँ यह व्रत चाँद निकलने पर भी खोलती हैं, किंतु पारंपरिक रूप से तारा दर्शन का महत्व सबसे अधिक माना गया है।

“अहोई” शब्द का अर्थ ही है—“अहो” यानी गलती और “ई” यानी क्षमा। अहोई माता वह देवी हैं जो अनजाने में हुए पापों को क्षमा करती हैं और अपने भक्तों के जीवन से संकट दूर करती हैं। उन्हें माता पार्वती का ही एक स्वरूप माना गया है। इस दिन पार्वती जी के साथ भगवान शिव की पूजा भी विशेष रूप से शुभ मानी जाती है। शिववास योग होने पर पूजा का प्रभाव और भी बढ़ जाता है।

अहोई अष्टमी का व्रत केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि यह समाज में स्त्री की भूमिका, उसकी संवेदनशीलता और त्याग को उजागर करता है। यह पर्व मातृत्व के उस रूप को सामने लाता है, जो न केवल सृजन करती है बल्कि संरक्षण भी करती है। इस व्रत में माँ यह संकल्प लेती है कि वह अपने बच्चों की रक्षा और उन्नति के लिए हर तप, हर त्याग करने को तैयार है। यही भावना भारतीय संस्कृति में नारी को पूजनीय बनाती है।

आज के आधुनिक युग में भी अहोई अष्टमी का महत्व कम नहीं हुआ है। शहरों और व्यस्त जीवनशैली के बावजूद महिलाएँ इस दिन उपवास रखती हैं, ऑनलाइन कथा सुनती हैं और डिजिटल रूप में भी पूजा करती हैं। भले ही माध्यम बदल गए हों, परंतु भावना वही है—माँ की निस्वार्थ ममता और अपने बच्चों के सुख की कामना। यह परंपरा यह भी सिखाती है कि संस्कृति समय के साथ बदलती है, पर उसकी जड़ें आस्था और संबंधों में ही रहती हैं।

अहोई अष्टमी का एक पर्यावरणीय संदेश भी है। कथा में वर्णित साही एक वन्य जीव है, जो भूमि और जंगल की उर्वरता में सहायक होता है। इस कथा के माध्यम से यह संदेश मिलता है कि प्रकृति और जीवों के प्रति दया और करुणा रखना मानव का धर्म है। अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट देना पाप माना गया है। इस दृष्टि से अहोई अष्टमी केवल संतान की पूजा नहीं, बल्कि जीवों के प्रति करुणा और प्रकृति के प्रति सम्मान का भी पर्व है।

यह व्रत परिवार के भीतर एकता, स्नेह और सामाजिक जुड़ाव का भी माध्यम है। माताएँ एक साथ बैठकर कथा सुनती हैं, पूजा करती हैं, और अपनी अनुभूतियाँ साझा करती हैं। इससे न केवल पारिवारिक बंधन मजबूत होते हैं बल्कि पीढ़ियों तक संस्कारों का प्रवाह बना रहता है। छोटे बच्चे भी इस दिन अपनी माँ को पूजा करते देखते हैं और उनके मन में आस्था के बीज पड़ते हैं।

अहोई अष्टमी जीवन के उस भाव को भी अभिव्यक्त करती है जिसमें गलती करने के बाद पश्चाताप और सुधार का मार्ग खुला रहता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि यदि किसी ने अनजाने में कोई भूल कर दी हो, तो सच्चे मन से पश्चाताप और ईश्वर की प्रार्थना करने से क्षमा प्राप्त की जा सकती है। यह क्षमा की भावना समाज को मानवीय और संवेदनशील बनाती है।

भारतीय परंपराओं में हर त्योहार के पीछे एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश छिपा होता है। अहोई अष्टमी भी यही सिखाती है कि सच्चा धर्म केवल पूजा-पाठ में नहीं, बल्कि प्रेम, क्षमा और करुणा में निहित है। जब माँ अपनी संतानों के लिए तारा देखकर व्रत खोलती है, तब वह केवल अपने बच्चों की नहीं, बल्कि पूरे परिवार की मंगलकामना करती है। यह व्रत जीवन में संयम, श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है।

अंततः अहोई अष्टमी भारतीय नारी की उस शक्ति को नमन है जो सृजन करती है, पोषण करती है और रक्षा भी करती है। यह पर्व मातृत्व की पवित्रता का उत्सव है। जिस समाज में माँ का आदर किया जाता है, वहाँ सदैव शुभता और समृद्धि बनी रहती है। अहोई अष्टमी की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि माँ केवल जननी नहीं, बल्कि एक देवी स्वरूप है जिसकी ममता से ही संसार चलता है।

अहोई माता का आशीर्वाद सभी संतानों पर बना रहे। सभी माताओं को अहोई अष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🙏🌸

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री का भारत दौरा: विश्व की राजनीति पर प्रभाव

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​अफगानिस्तान की तालिबान-शासित सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी का हालिया भारत दौरा क्षेत्रीय कूटनीति और वैश्विक भू-राजनीति के लिए एक महत्वपूर्ण घटना है। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद किसी वरिष्ठ तालिबान नेता की यह पहली उच्च-स्तरीय यात्रा थी। भले ही भारत ने अभी तक तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन यह दौरा दोनों देशों के बीच व्यावहारिक जुड़ाव और दशकों पुरानी दुश्मनी को समाप्त करने की दिशा में एक अहम कूटनीतिक क्षण माना जा रहा है।
​इस दौरे के निहितार्थ केवल भारत-अफगानिस्तान संबंधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसका असर विश्व की राजनीति, विशेषकर क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और आतंकवाद-विरोधी प्रयासों पर भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

मुत्ताकी का भारत दौरा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कदम है। ​भारत ने तालिबान के सत्ता में आने के बावजूद अफगानिस्तान में मानवीय सहायता जारी रखी है और काबुल में अपने ‘तकनीकी मिशन’ को अब ‘पूर्ण दूतावास’ के स्तर पर अपग्रेड करने की घोषणा की है, साथ ही तालिबान को नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में अपने राजनयिक नियुक्त करने की भी अनुमति दी है। यह कदम भारत की अफगानिस्तान नीति में बड़े बदलाव का संकेत है। भारत अफगानिस्तान में अपने सुरक्षा हितों (खासतौर पर भारत विरोधी आतंकवादी समूहों की सक्रियता) और विकास परियोजनाओं (लगभग $3 बिलियन से अधिक का निवेश) को सुरक्षित करने के लिए पर्दे के पीछे से तालिबान के साथ संपर्क बनाए हुए है। यह दौरा संबंधों को और मजबूत करने का संकेत है।

यह दौरा क्षेत्रीय शक्ति संतुलन, खासकर पाकिस्तान के लिए, कई सवाल खड़े करता है। पाकिस्तान की हमेशा से यह इच्छा रही है कि अफगानिस्तान की विदेश नीति पर उसका प्रभाव रहे, विशेषकर भारत के मामलों में। तालिबान और भारत के बीच बढ़ती नजदीकी से पाकिस्तान में चिंताएं बढ़ी हैं। तालिबान के विदेश मंत्री ने भारत को आतंकवाद के खिलाफ अफगानिस्तान की ज़मीन का उपयोग न होने देने की प्रतिबद्धता दोहराई है, जिसका सीधा निहितार्थ पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों के लिए चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। इसके अलावा, भारत चाबहार बंदरगाह के माध्यम से अफगानिस्तान के साथ व्यापार बढ़ाना चाहता है, जो पाकिस्तान को दरकिनार करता है। इससे पाकिस्तान पर भू-राजनीतिक दबाव बढ़ सकता है।

दौरे के दौरान व्यापार, अर्थव्यवस्था, हवाई संपर्क बढ़ाने और निवेश के अवसरों पर चर्चा हुई। अफगानिस्तान ने भारतीय कंपनियों को अपने खनन क्षेत्र में अवसरों की खोज करने के लिए आमंत्रित किया। भारत की ओर से चाबहार बंदरगाह के माध्यम से व्यापारिक संपर्क बढ़ाने की पहल क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार के लिए महत्वपूर्ण है। यह अफगानिस्तान की आर्थिक स्थिरता में भारत की सकारात्मक भूमिका को भी रेखांकित करता है।

इस दौरे का असर सिर्फ क्षेत्रीय ताकतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बड़ी शक्तियों के बीच कूटनीतिक समीकरणों को भी प्रभावित करता है।भारत का यह उच्च-स्तरीय जुड़ाव तालिबान सरकार के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वैधता हासिल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। दुनिया के कई देश अभी भी तालिबान को औपचारिक रूप से मान्यता देने से हिचक रहे हैं, लेकिन भारत जैसे महत्वपूर्ण देश का व्यावहारिक जुड़ाव अन्य देशों को भी तालिबान के साथ संबंध सामान्य बनाने के लिए प्रेरित कर सकता है। यह तालिबान के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है।

भारत और अफगानिस्तान दोनों ने सभी प्रकार के आतंकवाद से निपटने के लिए समन्वित प्रयास करने पर सहमति व्यक्त की है। अफगानिस्तान ने दोहराया है कि उसकी ज़मीन का उपयोग किसी भी देश के खिलाफ कोई आतंकवादी गतिविधि चलाने के लिए नहीं किया जाएगा। यह आश्वासन वैश्विक समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है, जो अफगानिस्तान को फिर से आतंकवाद का केंद्र बनने से रोकने के लिए चिंतित है। यह कदम भविष्य में वैश्विक आतंकवाद-विरोधी प्रयासों की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है।

यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब ईरान कमजोर हुआ है, रूस यूक्रेन युद्ध में व्यस्त है, और अमेरिका का रुख अस्थिर बना हुआ है। चीन पहले से ही तालिबान के साथ राजनयिक संबंध मजबूत कर रहा है। भारत का यह कदम क्षेत्रीय शक्ति चीन के बढ़ते प्रभाव को प्रतिसंतुलित करने की दिशा में भी देखा जा सकता है, जिससे एशियाई भू-राजनीति में एक नई रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की शुरुआत हो सकती है। भारत की यह सक्रियता क्षेत्र में किसी भी एक बड़ी शक्ति के पूर्ण दबदबे को रोकने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

​अफगानिस्तान के विदेश मंत्री का भारत दौरा दोनों देशों के बीच संबंधों के सामान्यीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह न केवल भारत के सुरक्षा और आर्थिक हितों को साधने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और वैश्विक आतंकवाद-विरोधी प्रयासों की दिशा को भी प्रभावित करता है। यह दौरा क्षेत्रीय कूटनीति में भारत की व्यावहारिक नीति और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाता है, जिसमें भारत अब अफगानिस्तान के साथ मिलकर एक स्थिर और सुरक्षित भविष्य की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, भले ही औपचारिक मान्यता का प्रश्न अभी भी लंबित हो।

हुजूर! दीपक जल गया..?

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व्यंग्य

“हुजूर दीपक जल गया..! ‘

कैसे जल गया? कितना जला?

“हुजूर। पूरा जल गया। मर गया।”

थानेदार: तूने क्यों आग लगाई?

“सर, पूरी दुनिया लगा रही थी। मैने भी लगा दी।”

थानेदार: उसकी फोटो दे?

“किसकी हुजूर?”

थानेदार: दीपक की। फोन नंबर बता।

“सर। वो तो मर गया। उसके तो बहुत साथी मरे हैं। “

थानेदार: होश फाख्ता। थाना क्षेत्र में इतना बड़ा कांड हो गया। पता भी नहीं लगा।

तभी मोबाइल की घंटी बजी।

“तुम्हारे इलाके में कोई दीपक मरा है?”

जी बॉस। अभी रपट लिख रहा हूं। सर, वो बता रहा है, उसके और भी साथी मरे हैं।

फोन कट।

देखते ही देखते, थाने में सायरन बजने लगे। एक दो तीन चार। अफसरों की फौज आ गई। कैसे हो गया? क्यों हो गया? दीपक ने क्यों आग लगाई? खुद आग लगाई तो औरों ने क्यों लगाई? कोई प्रेम प्रसंग का तो मामला नहीं? कहीं अवैध संबंध तो नहीं? आग लगा ली। मगर दिवाली पर क्यों लगाई। त्यौहार खराब कर दिया।

तफ्तीश शुरू हुई। जांच टीमें आ गई। सूंघ कर बताने वाले भी आ गए। सबको जले हुए की बू आ रही थी। यानी कन्फर्म था। कोई जला है। पीड़ित हिरासत में था। उकड़ू बैठा था। घुटनों पर सिर लगाए। उसको पता था..थोड़ी देर में उसके नाम की पट्टी आगे लगनी है।

“तभी एक आवाज आई। उसको लाओ।”

“तुमने क्या देखा..?”

जी। वो जल रहा था।

“तुमने बचाया क्यों नहीं?”

बचाता कैसे? वो बुझ गया।

“उसके ऊपर कम्बल डाल देते?”

वो कहां से लाता। गर्मी है अभी।

“उसके साथ कितने जले होंगे? कोई आइडिया?”

कह नहीं सकता हुजूर। बहुत जले होंगे।

“वाई द वे। यह आग लगी या लगाई गई?”

“सर। लगाई गई। लोग सज धज कर आए। और जला गए। दीपक मर गया। ( ऑ उं उं)”

यह तय हो गया। बड़ी घटना हुई है। मामला खुदकुशी का ही ठीक है। जलाने से हत्या की धारा लग लाएगी। बदनामी होगी। लोग नपेंगे। तभी एक्स चीखने लगा। ब्रेकिंग। दीपक जल कर मर गया। पुलिस सोती रही। दिवाली पर दिल दहला देने वाली घटना। टीवी चैनल पर कल्चर से एग्रीकल्चर पर बोलने वाले एक्सपर्ट आ गए…” निःसंदेह। इसमें कोई बड़ी साजिश है। सरकार को बदनाम करने की कोशिश हो सकती है। “

द्वितीय एक्सपर्ट -” हमको पहले ही लगता था। इस चैनल के माध्यम से मैने कहा भी था। यही नीतियां रहीं तो कभी भी कुछ भी हो सकता है। यह असंतोष है। “

थोड़ी देर में खबर फ्लैश हुई। मास्टरमाइंड पकड़ा गया। उकड़ू बैठे “दीपक” के आगे तख्ती लगी थी। खबरें चीख रही थीं..घटना के 24 घंटे के अंदर कातिल गिरफ्तार। लापरवाही पर इंस्पेक्टर सहित चार सस्पेंड।

सीन दो

पोस्टमार्टम होना था। चार्जशीट लगनी थी। कातिल पकड़ा गया। मगर आला कत्ल? वो अभी नहीं था। हम रख भी देते। लेकिन बॉडी रिकवर तो होनी चाहिए? पुलिस मौके पर पहुंची। कुछ नहीं था वहां। दीपक जल चुका था। उसका जला शव ठिकाने लग चुका था। लोग दिवाली मना रहे थे। किसी ने नहीं कहा- रोशनी देकर चला गया। सवाल कायम था। दीपक जला। मगर कौन सा? शायद यह जांच आयोग पता लगाए! मिट्टी तो दोनों दीपक को होना है। क्या फर्क पड़ता है, कौन सा जला?

सूर्यकांत

वैभव, प्रगति और विवादों का संगमः पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह

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​महाराजा सर भूपेंद्र सिंह (Sir Bhupinder Singh) (जन्म: 12 अक्टूबर 1891 – मृत्यु: 23 मार्च 1938) पटियाला रियासत के सातवें और संभवतः सबसे प्रसिद्ध महाराजा थे। उनका 38 वर्ष का शासनकाल (1900-1938) भारत के रियासती इतिहास में असाधारण वैभव, प्रगतिशील प्रशासन और कई विवादों के लिए जाना जाता है। वे ब्रिटिश राज के एक शक्तिशाली सहयोगी थे, जिन्होंने एक ओर आधुनिक प्रशासन और खेलों को बढ़ावा दिया, तो दूसरी ओर अपने विलासी और असाधारण जीवनशैली के लिए यूरोप तक चर्चा बटोरी।

​प्रारंभिक जीवन और राज्यारोहण

​भूपेंद्र सिंह का जन्म 12 अक्टूबर 1891 को पटियाला के मोती बाग पैलेस में हुआ था। वे जाट सिख फूलकियाँ राजवंश से संबंधित थे। उन्होंने लाहौर के ऐचिसन कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की। जब उनके पिता, महाराजा राजिंदर सिंह, का निधन हुआ, तब वे केवल नौ वर्ष के थे। इसलिए नवंबर 1900 में उनका राज्यारोहण हुआ, लेकिन राज्य का प्रशासन एक रीजेंसी काउंसिल (Regency Council) द्वारा संभाला गया। 1909 में, भारत के वायसराय, अर्ल ऑफ मिंटो ने 18 वर्ष की आयु में उन्हें राज्य के पूर्ण प्रशासनिक अधिकार सौंप दिए।

​प्रशासनिक और राजनीतिक योगदान

​महाराजा भूपेंद्र सिंह ने अपने शासनकाल में पटियाला रियासत को एक आधुनिक और प्रगतिशील राज्य बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए।
: उनके शासनकाल में, पटियाला में नहरों, रेलवे (जैसे पटियाला स्टेट मोनोरल ट्रेनवेज़), और डाकघरों का एक मजबूत नेटवर्क स्थापित हुआ।

​शिक्षा और स्वास्थ्य: उन्होंने रियासत में 262 सार्वजनिक स्कूल, 40 राज्य अस्पताल और एक कॉलेज स्थापित किए। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के संस्थापकों को भी उदारतापूर्वक दान देने के लिए जाने जाते हैं।

​बैंकिंग: उन्होंने 1917 में स्टेट बैंक ऑफ पटियाला की स्थापना की।

​ब्रिटिश राज से संबंध
​भूपेंद्र सिंह ब्रिटिश राज के प्रति अत्यधिक वफादार थे और उन्हें एक प्रमुख सहयोगी माना जाता था।

​प्रथम विश्व युद्ध: उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) में ब्रिटिश सरकार को ₹1.5 करोड़ की बड़ी राशि दान की और अपनी सेना भी भेजी। इस सेवा के लिए उन्हें 43 पदक और कई मानद सैन्य रैंक (जैसे लेफ्टिनेंट-जनरल) से सम्मानित किया गया।

​अंतर्राष्ट्रीय मंच: उन्होंने 1918 में इम्पीरियल वॉर कैबिनेट और 1925 में लीग ऑफ नेशंस में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

​नरेंद्र मंडल (Chamber of Princes): वे 1926 से 1938 तक चैंबर ऑफ प्रिंसेस के कुलाधिपति (Chancellor) रहे, जहाँ उन्होंने भारतीय रियासतों के हितों का प्रतिनिधित्व किया।

​खेलों के महान संरक्षक

​महाराजा भूपेंद्र सिंह एक उत्साही खिलाड़ी और खेलों के महान संरक्षक थे, खासकर क्रिकेट और पोलो के।
​क्रिकेट में योगदान

​भारतीय टीम के कप्तान: उन्होंने 1911 में इंग्लैंड का दौरा करने वाली पहली भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तानी की।

​बीसीसीआई (BCCI) के सह-संस्थापक: वे भारत में क्रिकेट के राष्ट्रीय शासी निकाय, बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (BCCI) की स्थापना में सहायक थे।

​रणजी ट्रॉफी: उन्होंने अपने मित्र महाराजा रणजीतसिंहजी (जाम साहिब ऑफ नवानगर) के सम्मान में रणजी ट्रॉफी के लिए दान दिया।

​क्रिकेट ग्राउंड: उन्होंने हिमाचल प्रदेश के चायल में दुनिया के सबसे ऊंचे क्रिकेट ग्राउंड की स्थापना की, जिसे उन्होंने बाद में भारत सरकार को दान कर दिया।

​पोलो और अन्य खेल

​वे एक उत्कृष्ट पोलो खिलाड़ी थे और उनकी टीम ‘पटियाला टाइगर्स’ भारत की सर्वश्रेष्ठ टीमों में गिनी जाती थी।

​उन्होंने पटियाला पोलो क्लब की स्थापना की।

​वे 1928 से 1938 तक इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन (IOA) के अध्यक्ष रहे, जिससे भारत में ओलंपिक खेलों को बढ़ावा मिला।

​उन्होंने पटियाला अखाड़ा भी स्थापित किया, जिसने गामा, इमाम बख्श जैसे महान पहलवानों को जन्म दिया।

​असाधारण वैभव और विवादित जीवनशैली

​भूपेंद्र सिंह को भारत के सबसे खर्चीले और विलासी राजाओं में से एक माना जाता है, जिनके ठाट-बाट की चर्चा विदेशों में भी होती थी।

​पटियाला नेकलेस: उन्होंने 1928 में मशहूर ज्वेलरी कंपनी कार्टियर से दुनिया का सबसे प्रसिद्ध हार, पटियाला हार बनवाया था। इस हार में 2,900 से अधिक हीरे और कीमती रत्न जड़े थे, जिसमें विश्व का सातवाँ सबसे बड़ा हीरा ‘डी बीयर्स’ (234 कैरेट) भी शामिल था।

​कारों का संग्रह: वे कारों के शौकीन थे और उनके पास 20 रॉल्स रॉयस कारों का एक काफिला था। वह निजी हवाई जहाज रखने वाले पहले भारतीय भी थे।

​विलासिता: कहा जाता है कि वे करोड़ों के डाइनिंग सेट में भोजन करते थे, उनके महल में 11 रसोइयां थीं, और उनके पास चाँदी का बाथ टब था।

​हरम और पत्नियाँ: उनकी निजी जिंदगी काफी विवादित रही। उन्होंने 10 से अधिक शादियाँ कीं और उनके हरम में कथित तौर पर 350 से अधिक महिलाएँ थीं। विभिन्न पत्नियों और उपपत्नियों से उनके 88 बच्चे थे, जिनमें से 52 वयस्क हुए।

​’लीला-भवन’: उनके दीवान जरमनी दास ने अपनी किताब ‘महाराजा’ में लिखा है कि भूपेंद्र सिंह ने पटियाला में ‘लीला-भवन’ (रंगरलियों का महल) बनवाया था, जहाँ बिना कपड़ों के लोगों को प्रवेश की अनुमति थी।

​पटियाला पैग (Patiala Peg)

​शराब के शौकीनों के बीच प्रसिद्ध ‘पटियाला पैग’ भी महाराजा भूपेंद्र सिंह की ही देन है। यह एक विशेष प्रकार का माप है, जिसमें सामान्य से दोगुनी मात्रा में शराब डाली जाती है। यह पेय उनकी असाधारण जीवनशैली का प्रतीक बन गया।

​निधन और विरासत

​महाराजा भूपेंद्र सिंह का निधन 23 मार्च 1938 को 46 वर्ष की आयु में हुआ।
​अपनी असाधारण विलासिता और विवादों के बावजूद, महाराजा भूपेंद्र सिंह को एक दूरदर्शी प्रशासक और खेलों के महान संरक्षक के रूप में याद किया जाता है। उनके बेटे महाराजा यादविंदर सिंह उनके उत्तराधिकारी बने, जिन्होंने 1947 में पटियाला रियासत का विलय स्वतंत्र भारत में करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
​महाराजा भूपेंद्र सिंह की विरासत आज भी पटियाला में महाराजा भूपेंद्र सिंह पंजाब स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी और उनके द्वारा स्थापित अन्य संस्थानों के रूप में जीवित है।

विशुद्ध भारतीय जमीन और संस्कृति से जुड़े शायर निदा फाजली

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निदा फाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता, मुर्तुज़ा हसन, स्वयं एक शायर थे, जिससे उन्हें बचपन से ही साहित्य और शायरी का माहौल मिला। उन्होंने अपना बचपन और शुरुआती शिक्षा ग्वालियर, मध्य प्रदेश में पूरी की और 1958 में ग्वालियर कॉलेज से स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की।
​भारत विभाजन के समय उनके परिवार के अधिकांश सदस्य पाकिस्तान चले गए थे, लेकिन भारतीयता के पोषक निदा फाजली ने भारत में ही रहने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनकी रचनाओं में भी परिलक्षित होता है, जहाँ वे विशुद्ध भारतीय जमीन और संस्कृति से जुड़े रहे। रोज़ी-रोटी की तलाश में वे 1964 के आसपास बंबई (अब मुंबई) आ गए, जहाँ उन्हें ‘धर्मयुग’ और ‘ब्लिट्ज़’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और अख़बारों में काम करने का अवसर मिला।
​उनका लेखन नाम ‘निदा फाजली’ दो भागों से मिलकर बना है: ‘निदा’ का अर्थ है स्वर या आवाज़ और ‘फाज़ली’ उनके पूर्वजों के कश्मीर के फ़ाज़िला नामक इलाके से आकर दिल्ली में बसने के कारण उनके उपनाम से जुड़ा।

​साहित्यिक सेवाएं और कृतित्व

​निदा फाजली की साहित्यिक यात्रा एक शायर, गद्यकार और फिल्म गीतकार के रूप में बहुआयामी रही है। उनकी शायरी में सूफीवाद का गहरा प्रभाव दिखता है और वे कबीर, रहीम, मीरा के साथ-साथ मीर और गालिब से भी प्रभावित थे। उन्होंने अपनी शायरी में आम आदमी की समस्याओं, दैनिक जीवन के अनुभव, मानवीय रिश्तों की जटिलता और साम्प्रदायिक सद्भाव जैसे विषयों को अत्यंत सादगी और गहराई से अभिव्यक्त किया। उनकी भाषा सरल, लोक-संस्कृति से जुड़ी हुई और हृदय को छूने वाली रही है, जिसने उन्हें हिंदी पाठकों के बीच भी अपार लोकप्रियता दिलाई।
​काव्य संग्रह (शायरी)
​फाजली साहब का पहला काव्य संकलन ‘लफ़्ज़ों के पुल’ (1971) प्रकाशित होते ही उन्हें व्यापक पहचान मिली। उनकी नई और आकर्षक आवाज़ ने लोगों को उनकी ओर आकर्षित किया। उनके अन्य महत्वपूर्ण काव्य संग्रहों में शामिल हैं:

​खोया हुआ सा कुछ: इस कृति के लिए उन्हें 1998 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो उनके साहित्यिक कद को दर्शाता है।

​मोर नाच

​आँख और ख़्वाब के दरमियाँ

​सफ़र में धूप तो होगी

​आँखों भर आकाश

​गद्य रचनाएँ और आत्मकथा
​शायरी के अलावा, निदा फाजली ने गद्य में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी गद्य रचनाओं में भी शेरो-शायरी का पुट मिलता है। उनकी गद्य की किताब ‘मुलाकातें’ काफी चर्चित रही।
​उनकी आत्मकथा, जो दो खंडों में प्रकाशित हुई, अत्यंत लोकप्रिय हुई और उनके व्यक्तिगत एवं साहित्यिक जीवन पर प्रकाश डालती है:

​दीवारों के बीच (पहला खंड)

​दीवारों के बाहर (दूसरा खंड)

​फिल्म गीत लेखन
​निदा फाजली का योगदान फिल्म जगत में भी अविस्मरणीय रहा। उन्होंने कई फिल्मों के लिए यादगार गीत लिखे, जिनमें “कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता” (फिल्म: आहिस्ता आहिस्ता) और “होश वालों को खबर क्या” (फिल्म: सरफ़रोश) जैसे गीत आज भी लोकप्रिय हैं। उन्होंने छोटे पर्दे के लिए भी गीत लिखे, जैसे टीवी सीरियल ‘सैलाब’ का शीर्षक गीत।
​विरासत और सम्मान
​निदा फाजली ने अपनी शायरी और लेखन के माध्यम से साम्प्रदायिक सद्भाव और मनुष्यता का संदेश दिया। उनकी रचनाएँ आशा, यथार्थ और प्रेम की भावना से ओत-प्रोत हैं।
​उन्हें उनकी उत्कृष्ट साहित्यिक सेवाओं के लिए कई सम्मानों से नवाजा गया:

​साहित्य अकादमी पुरस्कार (1998, खोया हुआ सा कुछ के लिए)

​पद्म श्री (भारत सरकार द्वारा)

​नेशनल हारमनी अवार्ड (साम्प्रदायिक सद्भाव पर लेखन के लिए)

​निदा फाजली 8 फरवरी 2016 को इस दुनिया को अलविदा कह गए, लेकिन उनके शब्द आज भी उनकी रचनात्मक प्रतिभा और मानवीय संवेदनाओं की गवाही देते हुए लोगों के दिलों में गूंजते हैं। उनकी शायरी जीवन के दर्शन को सरल और सहज तरीके से प्रस्तुत करने के लिए हमेशा याद की जाएगी।
​यह वीडियो निदा फाजली की जीवनी और उनकी रचनाओं के बारे में जानकारी प्रदान करता है, जो उनके जीवन परिचय और साहित्यिक सेवाओं को समझने में सहायक है

डॉ. आत्माराम -आज जिनकाजन्म दिन है

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प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक डॉ. आत्माराम (1908-1983) का नाम भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने वाले अग्रणी वैज्ञानिकों में सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें विशेष रूप से काँच (Glass) और सिरेमिक प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए जाना जाता है। सादगी भरा जीवन जीने के कारण उन्हें अक्सर ‘गांधीवादी वैज्ञानिक’ भी कहा जाता था।

​डॉ. आत्माराम: जीवन परिचय

​डॉ. आत्माराम का जन्म 12 अक्टूबर 1908 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के पिलाना गाँव में एक साधारण पटवारी लाला भगवानदास के यहाँ हुआ था।

​शिक्षा

​उन्होंने अपनी शिक्षा में अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का परिचय दिया:

​बी.एससी. (कानपुर)

​एम.एससी. (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

​पी.एचडी./डी.एससी. (इलाहाबाद विश्वविद्यालय), उन्होंने भौतिक रसायन के जनक डॉ. नीलरत्न धर के मार्गदर्शन में उच्च स्तरीय शोध किया।

​वे सादा जीवन, उच्च विचार के आदर्श पर चलने वाले व्यक्ति थे और विज्ञान की शिक्षा को भारतीय भाषाओं में दिए जाने पर ज़ोर देते थे, जिससे विज्ञान आम जनता तक पहुँच सके।

​प्रमुख वैज्ञानिक और प्रशासनिक सेवाएं

​डॉ. आत्माराम की सेवाएं केवल प्रयोगशाला तक ही सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने देश की सर्वोच्च वैज्ञानिक संस्थाओं का नेतृत्व कर वैज्ञानिक अनुसंधान को एक नई दिशा दी।

​1. काँच और सिरेमिक अनुसंधान (Optical Glass)

​डॉ. आत्माराम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ऑप्टिकल काँच (Optical Glass) के स्वदेशी निर्माण में रहा।

​आत्मनिर्भरता: ऑप्टिकल काँच, जो सूक्ष्मदर्शी, दूरबीन और विविध प्रकार के सैन्य उपकरण बनाने में उपयोग होता है, भारत में पहले जर्मनी से आयात किया जाता था। इस पर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च होती थी।

​वैज्ञानिक उपलब्धि: डॉ. आत्माराम ने अथक शोध और लगन से भारत में ही इस उच्च शुद्धता वाले काँच को बनाने की विधि का सफलतापूर्वक आविष्कार किया।

​संस्थापक निदेशक: वे कलकत्ता (अब कोलकाता) स्थित केन्द्रीय काँच एवं सिरामिक अनुसंधान संस्थान (CGCRI) के निदेशक रहे और इस संस्थान को भारत में काँच प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक मजबूत आधार प्रदान किया।

​2. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) में नेतृत्व

​उनकी प्रशासनिक और वैज्ञानिक नेतृत्व क्षमता को देखते हुए, उन्हें देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक अनुसंधान संस्था का सर्वोच्च पद सौंपा गया:

​महानिदेशक: उन्होंने 21 अगस्त 1966 को वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) के महानिदेशक का पद संभाला। इस पद पर रहते हुए, उन्होंने देश में वैज्ञानिक अनुसंधान और उद्योगों के बीच समन्वय स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

​3. हिन्दी में विज्ञान और ‘भारत की संपदा’

​डॉ. आत्माराम हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे और मानते थे कि विज्ञान को मातृभाषा में ही पढ़ाया और समझाया जाना चाहिए।

​प्रकाशन: उनकी दूरदर्शिता के कारण ही CSIR के बहुखंडीय अंग्रेजी ग्रंथ ‘वेल्थ ऑफ इंडिया’ का हिंदी अनुवाद ‘भारत की संपदा’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। यह उनके जीवन की एक बड़ी साहित्यिक और वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जाती है, जिसने भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक साहित्य को समृद्ध किया।

​राष्ट्रीय चेतना: उन्होंने विज्ञान को जन-समुदाय से जोड़ने और वैज्ञानिक जनमत की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे आम लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास हो सके।

​सम्मान और विरासत

​डॉ. आत्माराम को उनकी उत्कृष्ट वैज्ञानिक सेवाओं के लिए कई राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया:

​शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1959)

​पद्म श्री (1959)

​उनकी स्मृति और हिन्दी के प्रति उनके प्रेम को श्रद्धांजलि देने के लिए, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष उत्कृष्ट वैज्ञानिक लेखन के लिए ‘डॉ. आत्माराम पुरस्कार’ प्रदान किया जाता है।
​डॉ. आत्माराम का निधन 6 फरवरी 1983 को हुआ। उनका जीवन और कार्य भारतीय वैज्ञानिकों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहा, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद भारत को प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का स्वप्न देखा और उसे साकार किया। वे एक ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा का उपयोग केवल शोध तक ही सीमित न रखकर उसे देश की औद्योगिक प्रगति और आम आदमी की भाषा से भी जोड़ा।