महायोद्धा दुर्गादास राठौड़

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दुर्गादास मारवाड़ के शासक महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री आसकरण सिंह राठौड़ के पुत्र थे। उनकी माँ अपने पति और उनकी अन्य पत्नियों के साथ नहीं रहीं और जोधपुर से दूर रहीं। अतः दुर्गादास का पालन पोषण लुनावा नामक गाँव में हुआ। आप का जन्म 13 अगस्त 1638 को ग्राम सालवा में हुआ था। आप सूर्यवंशी राठौड़ कुल के राजपूत थे। आप के पिता का नाम आसकरण सिंह राठौड था जो मारवाड़ ( जोधपुर) के महाराजा जसवन्त सिंह (प्रथम) के राज्य की दुनेवा जागीर के जागीदार थे।

राजस्थान की रणभूमि ने अपने साहस, कर्तव्य और त्याग से इतिहास के पन्नों को अमर करने वाले अनेक वीरों को जन्म दिया। इन्हीं अमर योद्धाओं में एक तेजस्वी नाम है—महायोद्धा दुर्गादास राठौड़। वीर दुर्गादास न केवल राजस्थान के, बल्कि समूचे भारत के इतिहास में एक ऐसे योद्धा, राजनयिक और राष्ट्रनिष्ठ सेनापति के रूप में जाने जाते हैं, जिनकी निष्ठा और दूरदर्शिता ने मारवाड़ की अस्मिता को बचाए रखा।

दुर्गादास मारवाड़ के शासक महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री आसकरण सिंह राठौड़ के पुत्र थे। उनकी माँ अपने पति और उनकी अन्य पत्नियों के साथ नहीं रहीं और जोधपुर से दूर रहीं। अतः दुर्गादास का पालन पोषण लुनावा नामक गाँव में हुआ। आप का जन्म 13 अगस्त 1638 को ग्राम सालवा में हुआ था। आप सूर्यवंशी राठौड़ कुल के राजपूत थे। आप के पिता का नाम आसकरण सिंह राठौड था जो मारवाड़ ( जोधपुर) के महाराजा जसवन्त सिंह (प्रथम) के राज्य की दुनेवा जागीर के जागीदार थे।

दुर्गादास राठौड़ का जन्म 13 अगस्त 1638 को मारवाड़ के सालवा गाँव में हुआ। उनके पिता आसकरन राठौड़ और माता नेना पंवार थीं। बचपन से ही दुर्गादास में विलक्षण प्रतिभा, तेजस्विता, उत्कृष्ट तालीम और राजपूती संस्कार देखे जाते थे। घुड़सवारी, शस्त्र-प्रयोग, तीरंदाजी और युद्ध-कला में उनकी दक्षता देखकर मारवाड़ की सेनापद्धति में उन्हें विशेष स्थान मिलने लगा। दुर्गादास बचपन से ही दूरदर्शी, साहसी और दृढ़-संकल्पी थे—इन गुणों ने बाद में उन्हें एक महान रणनीतिकार और महायोद्धा के रूप में स्थापित किया।

दुर्गादास के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है जब महाराजा जसवंत सिंह के निधन (1678) के बाद मुगल सम्राट औरंगज़ेब मारवाड़ को अपने शासन में मिलाना चाहता है। जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उनके कोई पुत्र उपस्थित नहीं थे। कुछ समय बाद उनकी रानी से पुत्र अजीत सिंह का जन्म हुआ।औरंगज़ेब इस शिशु अजीत सिंह को बंधक बनाकर मारवाड़ के राज को समाप्त करने का षड्यंत्र करने लगा। यही वह समय था जब मारवाड़ की अस्मिता पर संकट मंडरा रहा था और दुर्गादास राठौड़ आगे आए।

औरंगज़ेब ने जोधपुर पर कब्ज़ा करने और शिशु अजीत सिंह को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयत्न किया, किंतु दुर्गादास राठौड़ ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर इस नवजात उत्तराधिकारी को मुगलों के चंगुल से सुरक्षित निकाल लिया।यह घटना भारतीय इतिहास की सबसे साहसिक और रोमांचक घटनाओं में गिनी जाती है। दुर्गादास ने न केवल अजीत सिंह को बचाया बल्कि वर्षोँ तक मारवाड़ की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए अद्भुत युद्धकौशल का परिचय दिया। अजीत सिंह को सुरक्षित बचाने के बाद दुर्गादास ने लगभग 30 वर्षों तक मुगल शक्ति का डटकर मुकाबला किया। इन्होंने कभी मरुस्थल में छापामार युद्ध चलाया तो कभी पहाड़ों पर रणनीतिक युद्ध किया तो कभी गुजरात–राजस्थान की सीमाओं पर तेज़ गति से हमले किए।

दुर्गादास मुगल–राजपूत संघर्ष में एक ऐसी रणनीति लेकर आए जिसने औरंगज़ेब को वर्षों तक असफल बनाए रखा। उनकी वीरता ने राजपूतों में नई ऊर्जा और स्वतंत्रता का जोश भर दिया। दुर्गादास राठौड़ केवल तलवारबाज़ योद्धा ही नहीं थे, वे अद्भुत कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने मुगल दरबार में अपने समर्थकों का नेटवर्क बनाया। पड़ोसी राजपूत रियासतों से मित्रता की।

मारवाड़ के दूरस्थ इलाकों में सुरक्षित ठिकाने बनाए।औरंगज़ेब की सेनाओं को थकाने, भ्रमित करने और उनकी आपूर्ति-शृंखला तोड़ने की रणनीतियाँ तैयार कीं।इन सबका परिणाम यह हुआ कि औरंगज़ेब अपने जीवन के अंतिम समय तक मारवाड़ को पूरी तरह अधीन नहीं कर पाया।

1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य की शक्ति कमजोर पड़ने लगी। राजनीतिक परिस्थितियों का लाभ उठाकर दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह को जोधपुर की गद्दी पर स्थापित करने का लक्ष्य पूरा कर दिया।इस महान कार्य के पूरा होने के बाद वे स्वयं सत्ता का लोभ छोड़कर शांत जीवन जीने लगे। यह उनकी निष्ठा और त्याग की सर्वोच्च मिसाल है।


अपने जीवन के अंतिम वर्षों में दुर्गादास राठौड़ दक्षिण भारत (उदयपुर, बुरहानपुर, उज्जैन और अंत में नर्मदा तट) में रहे।8 जनवरी 1718 को नर्मदा के किनारे उनका देहांत हुआ। उनका अंतिम संस्कार नर्मदा किनारे ही हुआ, और आज भी ‘दुर्गादास की छतरी’ उनके अदम्य साहस की स्मृति दिलाती है।

विपक्ष मुक्त लोकतंत्र के दुष्प्रयास प्रयास अभी भी जारी                                                                   

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−तनवीर जाफ़री 

9 जून 2013 को गोवा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की चुनाव अभियान समिति की बैठक के दौरान जिस समय नरेंद्र मोदी को 2014 लोकसभा चुनावों के लिए अभियान समिति का अध्यक्ष मनोनीत किया गया । उस समय उन्होंने अपने भाषण में कहा था कि “कांग्रेस मुक्त भारत हमारा सपना होना चाहिए।” इस आह्वान के फ़ौरन बाद उन्होंने ट्विटर पर भी इसकी पुष्टि करते हुये लिखा था कि “वरिष्ठ नेताओं ने मुझ में विश्वास जताया है। हम कांग्रेस मुक्त भारत का निर्माण करने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ेंगे।” उसके बाद से अब तक वे इसी बात को दूसरे शब्दों में अपनी चुनावी सभाओं या सार्वजनिक रैलियों आदि में कहते रहते हैं। जैसे कभी देश को “कांग्रेस संस्कृति से मुक्ति” दिलाने की बात कभी “पंजे से मुक्ति”,कभी  तुष्टिकरण से मुक्ति तो कभी परिवारवाद व भ्रष्टाचार से मुक्ति के रूप में देश के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस को कोसकर विपक्ष मुक्त लोकतंत्र की अपनी हसरत की अभिव्यक्ति करते रहे हैं। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की 99 सीटें आने के बाद मोदी की इस हसरत पर विराम लग गया था। फिर भी कांग्रेस के दर्जनों नेताओं को भय लालच आदि के द्वारा अपने पाले में कर कांग्रेस को पूरी तरह कमज़ोर करने की कोशिश ज़रूर की गयी ।

                    अब बिहार चुनाव परिणामों से उत्साहित भाजपा दिल्ली से लेकर कर्नाटक तक एक बार फिर कांग्रेस व विपक्ष को कमज़ोर करने की कोशिश करने लगी है। इसी उद्देश्य से पिछले दिनों  प्रधानमंत्री मोदी ने सूरत में एक कार्यक्रम के दौरान फिर एक बयान दिया है। इस बार मोदी ने कांग्रेस व अन्य विपक्षी सांसदों की ‘पैरवी’ करते हुये उनके राजनीतिक कैरियर के प्रति चिंता ज़ाहिर की है। मोदी ने कहा कि कांग्रेस के युवा सांसदों को पार्टी नेतृत्व बोलने नहीं देता, जिससे उनका राजनीतिक कैरियर बर्बाद हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि “जब कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के सांसद मुझसे मिलते हैं, तो वे कहते हैं, ‘हम क्या कर सकते हैं? हमारा कैरियर ख़त्म हो रहा है। हमें संसद में बोलने का मौक़ा ही नहीं मिलता। हर बार यही कहा जाता है कि संसद को ताला लगा दो।” उन्होंने कांग्रेस पर और भी हमले किये।

               मोदी द्वारा विपक्षी सांसदों की ‘फ़िक्र’ किये जाने के सन्दर्भ में यह सोचना ज़रूरी है कि अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं का बना बनाया कैरियर समाप्त करने या उन्हें अज्ञातवास अथवा राजनैतिक संन्यास पर भेजने के लिये मजबूर करने वाले प्रधानमंत्री मोदी को आख़िर विपक्षी सांसदों के कैरियर की चिंता कैसे सताने लगी ? गुजरात से लेकर दिल्ली तक कितने नेताओं को दरकिनार कर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने वाले मोदी को विपक्षी सांसदों के कैरियर की चिंता सताने लगी ? लाल कृष्ण आडवाणी ने तो ख़ुद मोदी जी का कैरियर बचाने में उनकी मदद की थी। याद कीजिये 2002 के गुजरात दंगों के बाद तो तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाने की ठान ली थी। उस समय आडवाणी ने ही मोदी का साथ देकर इन की कुर्सी बचाई थी। बाद में मोदी ने आडवाणी जी को कहाँ पहुंचा दिया ? जिनके पैर छुआ करते थे उन्हें ऐसे मार्ग दर्शन मंडल में भेज दिया जहाँ से मार्ग दर्शन लेने की किसी को ज़रुरत ही नहीं होती ? मुरली मनोहर जोशी का वाराणसी से टिकट काट कर पहले ख़ुद चुनाव लड़ा बाद में उन्हें भी मार्ग दर्शन मंडल का रास्ता दिखा दिया ? मार्गदर्शन मंडल के बारे में बताया गया कि 75 की आयु पार करने वालों को इसमें स्थान मिलेगा। परन्तु स्वयं 1950 में जन्मे मोदी भी आज 75 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं। तो क्या 75 के नाम पर अपने अनेक वरिष्ठ नेताओं का ‘कैरियर चौपट’ करने वाले मोदी जी को स्वयं अपनी आयु 75 होने पर ‘मार्गदर्शक मंडल’ का रास्ता नज़र नहीं आता ? केंद्र में 79 वर्षीय जीतन राम मांझी मंत्री बनाये जा सकते हैं। 83 वर्षीय आनंदीबेन पटेल व 81 वर्षीय आचार्य देवव्रत राज्यपाल बनाये जा सकते हैं परन्तु सुब्रमण्यम स्वामी, यशवंत सिन्हा, शत्रुघ्न सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं के कैरियर की कोई फ़िक्र नहीं ? ऐसे और भी अनेक उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि मोदी को अपने राजनैतिक कैरियर के सिवा किसी और के राजनैतिक कैरियर की कोई फ़िक्र नहीं होती।

                         लंबे समय तक भाजपा में रहने वाले शत्रुघ्न सिन्हा ने ख़ुद कहा था कि भाजपा में अब “लोकतंत्र” नहीं, “तानाशाही” है। पूर्व केंद्रीय मंत्री आर के सिंह को बिहार चुनाव परिणाम आते ही इसलिये पार्टी से निकाल दिया गया क्योंकि उन्होंने न केवल पार्टी के अपराधी नेताओं को पार्टी प्रत्याशी बनाने पर सवाल खड़ा किया था बल्कि अडानी पावर व नीतीश सरकार के बीच हुये कथित 62,000 करोड़ रुपये के बिजली घोटाले का भी ख़ुलासा किया था और इस घोटाले की जांच की मांग की थी। इसलिये कांग्रेस या विपक्षी सांसदों के कैरियर को लेकर चिंतित होना दरअसल उनके कैरियर की चिंता करना नहीं बल्कि अपनी इन कथित चिंताओं का प्रदर्शन कर कांग्रेस व विपक्ष को कमज़ोर करने की कोशिश मात्र है। कुछ ऐसी ही कोशिशें इन दिनों लालू यादव के परिवार में पड़ी पारिवारिक फूट को लेकर देखी जा रही हैं। यहाँ भी लालू -तेजस्वी का विरोध करने वाले परिवार के सदस्यों को हवा देने की ख़बरें आ रही हैं।

                            दरअसल मोदी इस दावे से यह भी जताना चाहते हैं कि विपक्ष के कोटे का पूरा समय राहुल गाँधी ही ले लेते हैं। तो देश यह भी देखता है कि विपक्षी सांसदों को संसद में कितना बोलने दिया जाता है और उनके बोलने पर सत्ता पक्ष कितना व्यवधान पैदा करता है। हाँ राहुल का बोलना इसलिये ज़रूर खटकता होगा क्योंकि इस समय देश के वही अकेले ऐसे नेता हैं जो साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार,अडानी- अंबानी ,नोटबंदी,जी एस टी,चुनाव धांधली, सरकारी संस्थानों पर सत्ता के शिकंजे,किसानों व जातीय जनगणना,एस आई आर जैसे ज्वलंत मुद्दों पर खुलकर बोलते हैं जो सत्ता से हज़म नहीं होता। और राहुल,कांग्रेस व सम्पूर्ण विपक्ष को कमज़ोर करने की ही ग़रज़ से अब एक और दांव चलते हुये देश के 272 पूर्व अधिकारियों जिनमें 16 पूर्व न्यायाधीश,133 पूर्व सैन्य अधिकारी व 14 पूर्व राजदूत सहित 123 पूर्व नौकरशाहों से विपक्ष के नेता राहुल गांधी के विरुद्ध एक खुला पत्र जारी कराया गया है जिसमें राहुल द्वारा चुनाव आयोग पर लगाए गए “वोट चोरी” के आरोपों और संवैधानिक संस्थाओं पर कथित तौर पर बिना सबूत के हमलों की आलोचना की गयी है। परन्तु कांग्रेस ने तो इन 272 “प्रतिष्ठित ” राहुल विरोधियों में से अनेक की सेवा कुंडली ही उधेड़ कर बता दिया कि इस सूची में कितने भ्रष्ट व अनैतिक आचरण के “प्रतिष्ठित ” अधिकारी शामिल हैं। लिहाज़ा विपक्षी सांसदों के कैरियर की चिंता व राहुल गाँधी पर हमले जैसे प्रयास दरअसल ‘विपक्ष मुक्त लोकतंत्र’ के दुष्प्रयास हैं जो भाजपा के 2013 से शुरू हुये ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ मिशन से लेकर अभी तक जारी हैं। सही मायने में लोकतंत्र के लिये सबसे बड़ा ख़तरा राहुल गाँधी नहीं बल्कि सत्ता के ‘विपक्ष मुक्त लोकतंत्र’ के दुष्प्रयास ही हैं। 

    तनवीर जाफ़री 

वरिष्ठ पत्रकार 

अब नेता बदले बिना इंडी गठबंधन नही चलेगा

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एक बात पक्की है कि इंडी गठबंधन को बनाए रखना है तो गठबंधन का नेता बदलना पड़ेगा । खड़गे या राहुल गांधी से तो अब सहयोगी दलों ने ही मुंह मोड़ लिया है । शिवसेना उद्धव के प्रवक्ता आनंद दुबे और प्रियंका चतुर्वेदी ने कल साफ साफ कह दिया कि दो – चार सीटें लेनी वाली कांग्रेस के साथ कोई तालमेल हो पाना मुश्किल है । शिवसेना उद्धव के प्रवक्ता आनंद दुबे आजकल टीवी पर ही राहुल गांधी की मिमिक्री करने लगे हैं । उधर बंगाल में टीएमसी लगातार मांग कर रही है कि इंडी अलायंस का नेता बदला जाए । यूँ भी ममता बंगाल में किसी घटक के साथ गठबंधन नहीं करतीं ।

यूपी से भी ऐसी मांगें उठ रही हैं और अखिलेश को नेता बनाने का सवाल उठाया जा रहा है । महाराष्ट्र में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अबु आजमी ने कल ही साफ किया कि भविष्य में महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे । उत्तराखंड की हालत सबके सामने है जहां कांग्रेस के भीतर भारी राजनीति है । वहीं पार्टी मजबूत नेतृत्व के संकट से जूझ रही है । अब रही तमिलनाडु की बात जहां अगले साल चुनाव हैं वहां डीएमके की ही हालत बढ़िया नहीं , कांग्रेस की क्या कहें ।

एक बात बहुत खास है । वह है SIR का असर । यदि वैध अवैध रास्तों से बांग्लादेशी रोहिंग्या लगातार भाग रहे हैं तो SIR की इससे बड़ी उपलब्धि और क्या होगी ? ममता इसीलिए तो मचल रही हैं। उधर चारों ओर से निराश कांग्रेस अब अपनी आखिरी ऑक्सीजन दिल्ली में SIR के खिलाफ बड़े प्रदर्शन के माध्यम से लेना चाहती है । आपको शायद पता न हो कि असम में ऐसा पहले ही हो चुका है , अभी भी चल रहा है । रही बात दक्षिण की तो दक्षिण भारत में रोहिंग्या नहीं हैं , बांग्लादेशी जरूर हैं ।

वहां SIR का इतना असर नहीं होगा । वैसे जहां भी होता है , हो जाए । 1971 के युद्ध से पहले 1 करोड़ से अधिक शरणार्थी पूर्वी पाकिस्तान से आए थे । धीरे धीरे लाखों आते रहे जिन्हें कांग्रेस उत्तर भारतीय राज्यों में बसाती रही , वोटबैंक बनाती रही । बंगाल और असम को छोड़िए सुदूर कश्मीर में फारूख अब्दुल्ला और कांग्रेस ने इन्हें बसाया , वोटबैंक बनाया । तभी तो बदली देश की डेमोग्राफी ? SIR के डर से अब कांग्रेस , ममता , लालू , अखिलेश , केजरीवाल का वोटबैंक भाग रहा है तो तकलीफ़ हो रही है , होगी ही ?

देश में SIR इससे पहले भी 9 बार हो चुकी है । कभी ऐसा हल्ला नहीं मचाया कांग्रेस ने जो आज कपड़े फाड़ रही है । बांग्लादेशी तो इंदिरा गांधी के राज में ही आए । वोटबैंक बढ़ाने का काम भी कांग्रेस ने उन्हें वोटर बनाकर शुरू किया । तो क्या तब कांग्रेस के निर्देश पर चुनाव आयोग ने वोट चोरी की थी जो बांग्लादेशियों को बाहर नहीं भेजा ? ऐसा ही हुआ होगा शायद ? तभी तो कांग्रेस SIR से बुरी तरह कांप रही है । खैर , अब तो इंडी वाले चोर चोर चिल्लाने का असर बिहार में देख चुके हैं । आगे कहां कहां देखेंगे आने वाले दिनों में पता चल जाएगा ।

,,,,,,कौशल सिखौला

मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी ने एक अहम अपील

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शिया चाँद कमेटी लखनऊ के अध्यक्ष मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी ने एक अहम अपील जारी करते हुए कहा है कि “सभी लोग SIR (समग्र निर्वाचन पंजीकरण) की आवेदन-पत्रिकाएँ बिल्कुल सही तरीक़े से भरकर जल्द से जल्द अपने-अपने BLO को जमा करें।”

मौलाना ने कहा कि SIR फ़ॉर्म भरना हर नागरिक की ज़िम्मेदारी है, क्योंकि सही और अद्यतन मतदाता सूची न केवल चुनावी प्रक्रिया को मज़बूत बनाती है, बल्कि हर व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा भी करती है। उन्होंने बताया कि अक्सर छोटी-छोटी त्रुटियों या देरी की वजह से लोगों के नाम वोटर लिस्ट से छूट जाते हैं, इसलिए सभी लोग समय रहते फ़ॉर्म भरकर जमा करने में ढिलाई न करें।

उन्होंने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया चुनौतियों को कम करती है, डेटा की शुद्धता सुनिश्चित करती है और पारदर्शिता बढ़ाती है। हर पात्र व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी जानकारी सही-सही दर्ज करे ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार की दिक़्क़त का सामना न करना पड़े।

अंत में मौलाना सैफ़ अब्बास नक़वी ने पुनः अपील की कि “इस कार्य को हल्के में न लें। यह बहुत ज़रूरी है कि हर इंसान SIR फ़ॉर्म भरकर जल्द से जल्द BLO तक पहुँचा दे। यही हमारी नागरिक कामूल कर्तव्य है।

यूपी में अवैध घुसपैठियों के लिए बनेंगे अस्थायी डिटेंशन सेंटर

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को अवैध घुसपैठ पर त्वरित और सख्त कार्रवाई के स्पष्ट और सख्न्त निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने कहा कि प्रदेश की कानून व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता सर्वोच्च प्राथमिकता है और किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक जिला प्रशासन अपने क्षेत्र में रहने वाले अवैध घुसपैठियों की पहचान सुनिश्चित कर नियमानुसार कार्रवाई शुरू करे। मुख्यमंत्री ने यह भी निर्देश दिया है कि घुसपैठियों को रखने के लिए प्रत्येक जनपद में अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाए जाएं।

इन केंद्रों में विदेशी नागरिकता के अवैध व्यक्तियों को रखा जाएगा । आवश्यक सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक वहीं आवास सुनिश्चित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि डिटेंशन सेंटर में रखे गए अवैध घुसपैठियों को तय प्रक्रिया के तहत उनके मूल देश भेजा जाएगा।

शहादत की अनुपम मिसाल थे गुरु तेग बहादुर जी

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बाल मुकुन्द ओझा

भारत की भूमि ने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता को समर्पित कर विश्व में भारत का नाम रोशन किया है। इन्हीं बलिदानी महापुरुषों में से एक हैं सिखों के नवें गुरु, श्री गुरु तेग़ बहादुर जी। उनका जीवन केवल सिख समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक आदर्श है। उन्होंने उस समय के धार्मिक अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन की नीतियों के सामने सत्य, धर्म और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गुरु तेगबहादुर जी का संपूर्ण जीवन न्याय, करुणा और सत्य की शक्ति का प्रतीक है।

 गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस देश और दुनियां में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन उनके महान त्याग, सिद्धांतों के प्रति उनकी अडिग निष्ठा और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए उनके साहसी रुख को याद करने का अवसर है। इस अवसर पर श्री आनंदपुर साहिब में 23 से 25 नवंबर तक तीन दिवसीय समागम पंजाब में श्रद्धा, इतिहास और संस्कृति का सबसे भव्य आयोजन बन रहा है। गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर होने वाले अखंड पाठ, नगर कीर्तन, हेरिटेज वॉक, विशेष विधानसभा सत्र, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और ड्रोन शो ने लोगों में भारी उत्साह पैदा किया है। 23 नवंबर को अखंड पाठ और सर्व धर्म सम्मेलन के साथ समागम शुरू होगा। 24 नवंबर को सुबह शीश भेंथ नगर कीर्तन निकलेगा।  यह वही ऐतिहासिक यात्रा है जिसके रास्ते भाई जैता जी गुरु तेग बहादुर जी का सिस लेकर आनंदपुर साहिब तक पहुंचे थे। आज भी यह घटना भारत के इतिहास की सबसे मार्मिक और पवित्र यादों में शामिल है। 24 को पहली बार विधानसभा का विशेष सत्र श्री आनंदपुर साहिब में होगा, जिसमें ऐतिहासिक फैसले लिए जाएंगे।

उन्हें भारत का कवच कहा जाता है क्योंकि उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अत्याचारों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया। गुरु तेग बहादुर जी, का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में हुआ था। वह छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी, और माता नानकी जी के सबसे छोटे पुत्र थे। उनका बचपन का नाम त्याग मल था।  गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस 24 नवंबर 1675 को है। उन्हें चांदनी चौक, दिल्ली में शहीद किया गया था। उनकी शहादत का उद्देश्य धर्मिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सच्चाई की रक्षा था। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान भारतीय इतिहास में एक अद्वितीय घटना है। यह बलिदान न केवल सिख धर्म के लिए था, बल्कि सनातन धर्म (कश्मीरी पंडितों) की रक्षा के लिए भी था। उनका शहीदी दिवस हमें न्याय, समानता और मानवाधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है। उन्हें ‘हिंद की चादर’ के रूप में भी जाना जाता है। उनका बलिदान भारतीय धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।  भारत के इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ किसी धर्मगुरु ने दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हों। गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस इसी महान आदर्श का स्मरण कराता है।

एक बालक के रूप में, तेग बहादुर जी ने अपने पिता, गुरु हरगोबिंद साहिब, से न केवल आध्यात्मिक शिक्षा, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। 1634 में करतारपुर के युद्ध में उन्होंने अपनी असाधारण तलवारबाजी और बहादुरी का प्रदर्शन किया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर ही उनके पिता ने उनका नाम ‘त्याग मल’ से बदलकर ‘तेग बहादुर’ रखा, जिसका अर्थ है ‘तलवार का धनी’ या ‘तलवार का बहादुर’।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

कर्नाटक कांग्रेस में जूतम पैजार

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कर्नाटक कांग्रेस में जूतों में दाल बंट रही है । बंटती क्यों नहीं मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से किया वादा जो तोड़ दिया है । ढाई साल पहले सरकार बनने पर सीएम के लिए दोनों के बीच जंग मची तो दिल्ली आलाकमान ने तय कराया था कि ढाई साल बाद सिद्धारमैया कुर्सी छोड़ देंगे और शिवकुमार सीएम बन जाएंगे ।

सिद्धारमैया चाहें तो डिप्टी सीएम बन सकते हैं । शिवकुमार समर्थक दो दर्जन कांग्रेस विधायक इस समय दिल्ली में हैं । आलाकमान उन्हें मिलने का समय तक नहीं दे रही । लेकिन सच है जनाब ! छुटती कहां है ज़ालिम मुँह से लगी हुई । सिद्धारमैया पद से हटने को तैयार नहीं ।

वैसे देखिए न महाराष्ट्र में तो यह फॉर्मूला कामयाब रहा । शिवसेना के एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और देवेंद्र फडणवीस उप मुख्यमंत्री । नया चुनाव हुआ हुआ तो सीटें बदल गई । अब देवेंद्र फडणवीस सीएम हैं और शिन्दे व अजित डिप्टी सीएम । मजे से सरकार चल रही है । आज बीजेपी की आलाकमान में खासा दम है सो महाराष्ट्र सरकार में नो प्रॉब्लम में चल रही है ।

लेकिन विगत शताब्दी के अंतिम दशक में ऐसा बिल्कुल नहीं था । याद कीजिए यूपी में जब बीजेपी और मायावती ने मिलकर सरकार बनाई तब भी ढाई ढाई साल का फॉर्मूला निकाला गया था । पहले ढाई साल के लिए मायावती सीएम बनीं । ढाई साल बाद जब बीजेपी की बारी आई तब मायावती ने कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया । जाहिर है सरकार गिर गई ।

आपको फिर से महाराष्ट्र की ओर ले चलें । बीजेपी और शिवसेना ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़े और जीते । यहां भी ढाई ढाई साल सीएम पद की बात तय हुई । लेकिन उद्धव अड गए कि पहले सीएम वे बनेंगे । सत्ता के लिए उद्धव ने बालासाहब के सिद्धांत छोड़कर कांग्रेस से हाथ मिला लिया । नतीजा यह निकला कि शिवसेना बीजेपी का दशकों पुराना तालमेल टूट गया । कालांतर में में शिवसेना टूटी और बीजेपी ने शिन्दे को सीएम बनाकर उद्धव शिवसेना को समाप्त कर दिया ।

तो बात कर्नाटक से शुरू हुई , वहीं खत्म होगी । हमें याद है ढाई साल पहले का वह दौर जब एस शिवकुमार मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार ही नहीं थे । दरअसल कर्नाटक की जीत के पीछे शिवकुमार की ही मेहनत थी । लेकिन सिद्धारमैया बीच में कूद पड़े और आलाकमान ने 50/50 यानि ढाई ढाई साल का समझौता करा दिया । अब सिद्धारमैया पलटी मार रहे हैं , आलाकमान चुप है । खबर है कि शिवकुमार के इशारे पर अनेक विधायक गायब हो गए हैं । मतलब कर्नाटक में खेला होगा और जरूर होगा ।

,,,,, कौशल सिखौला

वरिष्ठ पत्रकार

आतंक पर निर्णायक सख़्ती आवश्यक

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सुरक्षा, कानून और नागरिक चेतना—तीनों मोर्चों पर एक साथ बड़े बदलाव की आवश्यकता

भारत को आतंकवाद से निर्णायक रूप से निपटने के लिए तकनीक, क़ानून और नागरिक सहभागिता—तीनों स्तरों पर तेज़ बदलाव की आवश्यकता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित राष्ट्रीय निगरानी तंत्र और आधुनिक डिजिटल जाँच प्रयोगशालाएँ सुरक्षा की मजबूत आधारशिला बन सकती हैं। त्वरित न्यायालय और कठोर दंड व्यवस्था न्याय प्रक्रिया को गति देंगे। गुप्त इंटरनेट, आभासी मुद्राओं और संदिग्ध धन-प्रवाह पर विशेष निगरानी भविष्य के खतरों को रोकने के लिए आवश्यक है। साथ ही नागरिक सहायता-सेवा, शीघ्र प्रतिक्रिया दल और दलगत राजनीति से ऊपर उठी साझा राष्ट्रीय सुरक्षा नीति ही एक सुरक्षित और सक्षम भारत का मार्ग प्रशस्त करेगी।

– डॉ प्रियंका सौरभ

भारत एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ आतंकवाद का स्वरूप बदलकर और भी जटिल और खतरनाक हो चुका है। राजधानी दिल्ली से लेकर देश के विभिन्न शहरों में हाल की घटनाएँ केवल हिंसक वारदातें नहीं, बल्कि यह चेतावनी हैं कि हमारी सुरक्षा संरचनाओं में अभी भी जितनी मजबूती और तत्परता होनी चाहिए, वह नहीं है। हर विस्फोट केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि यह प्रश्न भी है कि एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में भारत क्या अपनी आंतरिक सुरक्षा को उसी गंभीरता से देख रहा है, जैसी दुनिया के विकसित राष्ट्र देखते हैं? अमेरिका ने 9/11 की भयावहता के बाद आतंकवाद को एक ऐसे खतरे के रूप में लिया, जिसने उसके पूरे सुरक्षा तंत्र, कानून व्यवस्था और राजनीतिक दृष्टिकोण को बदलकर रख दिया। भारत को भी अब उसी स्तर की संवेदनशीलता और निर्णायकता की आवश्यकता है।

यह स्वीकार करना होगा कि आतंकवाद अब पुरानी सीमाओं से निकलकर नई तकनीकी दुनिया में प्रवेश कर चुका है। पहले जहाँ उसका संबंध बंदूक, प्रशिक्षण शिविर और सीमा पार से आने वाले गुरिल्ला नेटवर्क से होता था, वहीं अब उसका संचालन सोशल मीडिया, डार्क वेब, एन्क्रिप्टेड चैट, क्रिप्टो करेंसी और फर्जी पहचान के माध्यम से हो रहा है। आज एक अकेला व्यक्ति, जिसे ‘लोन-वुल्फ’ कहा जाता है, दुनिया में बैठे किसी भी संगठन से निर्देश पा सकता है और मिनटों में घटना को अंजाम दे सकता है। क्राउड-रैडिकलाइज़ेशन की प्रक्रिया इतनी तेज़ और गहरी हो चुकी है कि एक वीडियो, एक पोस्ट, या एक उग्र भाषण ही कई युवाओं को गलत दिशा में धकेल सकता है। ऐसी स्थिति में यह सोचना कि आतंकवाद को केवल सीमापार से आने वाला खतरा माना जाए, वास्तविकता से आँख मूँद लेने जैसा है।

दिल्ली के नेहरू प्लेस जैसी घटनाओं ने फिर यह सामने ला दिया कि आतंक की तकनीक चाहे बदल जाए, पर हमारी कमियाँ वही पुरानी हैं। निगरानी कैमरों की संख्या सीमित है, उनकी गुणवत्ता अपर्याप्त है, और उनमे से भी कई खराब रहते हैं। कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में AI-आधारित निगरानी की व्यवस्था अब तक लागू नहीं है। यह भी एक कटु सत्य है कि जाँच एजेंसियों की क्षमता के मुकाबले घटनाओं की जटिलता कई गुना बढ़ गई है। आधुनिक दुनिया में जहाँ एक छोटे से डिवाइस में असंख्य डिजिटल प्रमाण छिपे हो सकते हैं, वहाँ हमारी फॉरेंसिक लैब्स की संख्या और आधुनिकता अभी भी सीमित है। सवाल यह भी है कि हम कब तक इन पुरानी कमजोरियों के साथ एक बदलती हुई दुनिया का सामना करेंगे?

एक आधुनिक राजधानी में 24×7 इंटेलिजेंट सर्विलांस सिस्टम होना चाहिए, जहाँ हर भीड़भाड़ वाला इलाका, हर बाजार, हर सार्वजनिक स्टेशन और हर संवेदनशील संस्थान AI से जुड़े कैमरों की निगरानी में हो। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल ने वर्षों पहले यह सुनिश्चित कर लिया कि आतंकियों के लिए कोई अंधेरा कोना न बचे। भारत को भी अब निगरानी को प्राथमिकता देनी चाहिए। कानून व्यवस्था की मजबूती केवल पुलिस की संख्या बढ़ाने से नहीं आएगी, बल्कि यह तकनीक, डेटा और तेजी से काम करने वाले नेटवर्क से आएगी।

यह भी एक गंभीर पहलू है कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में हमारी न्यायिक प्रक्रिया उतनी तेज़ नहीं है जितनी होनी चाहिए। वर्षों तक चलने वाली सुनवाई, गवाहों का मुकर जाना, कमजोर अभियोजन और डिजिटल साक्ष्यों की जटिलता—ये सब आतंकियों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचाते हैं। जबकि अमेरिका ने 9/11 के बाद स्पष्ट कर दिया कि आतंकवाद से जुड़े मामलों में न देरी स्वीकार्य है, न ढिलाई। भारत को भी यह संदेश देना चाहिए कि आतंकवाद के मामलों में न्याय शीघ्र और दृढ़ होना चाहिए। यह केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता है।

आतंकवाद को रोकने में नागरिक चेतना की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी एजेंसियों की। एक साधारण नागरिक की एक छोटी-सी सूचना कई बड़े हमलों को रोक सकती है। लेकिन अक्सर लोग पुलिस से संपर्क करने में संकोच करते हैं, उन्हें प्रक्रिया लंबी और जटिल लगती है, या वे यह सोचते हैं कि “यह मेरा काम नहीं।” यह मानसिकता बदलनी होगी। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जहाँ नागरिक आसानी से सूचना दे सकें, और तत्काल प्रतिक्रिया तंत्र मौजूद हो। मोहल्ला-स्तर तक चौकसी को मजबूत किया जाना चाहिए। नागरिक जब जागरूक होते हैं, तब आतंक के लिए जगह अपने आप कम होती जाती है।

दुर्भाग्य यह है कि भारत में सुरक्षा नीति अक्सर राजनीतिक बहसों में उलझ जाती है। किसी घटना को विपक्ष सत्ताधारी दल की विफलता बताता है, और सत्ता दल उसे सिर्फ ‘आतंकी षड्यंत्र’ कहकर जिम्मेदारियों से बचने की कोशिश करता है। लेकिन आतंकवाद का कोई राजनीतिक रंग नहीं होता। वह न किसी विचारधारा का मित्र है, न शत्रु; वह सिर्फ राष्ट्र और उसके नागरिकों को नुकसान पहुँचाता है। इसलिए यह अनिवार्य है कि राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीति से ऊपर रखा जाए। अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर दोनों दल एकजुट रहते हैं; भारत में भी यह संस्कृति विकसित होनी चाहिए।

तकनीक इस युग की नई सुरक्षा दीवार है। भारत को अगले कुछ वर्षों में एक व्यापक तकनीक-आधारित सुरक्षा मॉडल बनाना होगा। AI आधारित CCTV नेटवर्क, चेहरे की पहचान प्रणाली, रीयल-टाइम डेटा इंटरलिंकिंग, आधुनिक डिजिटल फॉरेंसिक लैब, साइबर विशेषज्ञों की नियुक्ति, संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की निगरानी और डार्क वेब पर नज़र रखने वाली विशेष टास्क फोर्स—ये सभी कदम अत्यंत आवश्यक हैं। यह समझना होगा कि आतंकवाद को केवल बंदूक और बम से ही नहीं, बल्कि डेटा और तकनीक से भी हराया जा सकता है।

आतंकवाद केवल मानव जनहानि का कारण नहीं बनता, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था को भी गहरे घाव देता है। हर विस्फोट निवेश को डराता है, पर्यटन को कमजोर करता है और व्यापार पर सीधा असर डालता है। एक असुरक्षित राजधानी विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका को नुकसान पहुँचा सकती है। इस कारण सुरक्षा केवल नागरिक जीवन का ही नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक भविष्य का भी प्रश्न है।

भारत अब एक निर्णयकारी मोड़ पर है। समय आ गया है कि हम आतंकवाद के खिलाफ एक स्पष्ट, कठोर और आधुनिक नीति बनाएं—जिसमें कानून की ताकत, तकनीक की सटीकता, नागरिकों की जागरूकता और सरकार की इच्छाशक्ति—सभी एक साथ कार्य करें। 9/11 के बाद अमेरिका ने जो उदाहरण रखा, वह बताता है कि निर्णायक कदम लेने पर परिणाम बदलते हैं। भारत को भी यही सख़्ती दिखानी होगी। क्योंकि राष्ट्र की सुरक्षा किसी भी प्रकार के समझौते की वस्तु नहीं हो सकती। यह एक ऐसी जिम्मेदारी है, जिसमें देरी की कोई गुंजाइश नहीं है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

रानी लक्ष्मीबाई की परम विश्वासपात्रः झलकारी बाई

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भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वीरता, त्याग और राष्ट्रभक्ति की अनगिनत गाथाओं से भरा हुआ है। इन गाथाओं में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम अद्वितीय है, परंतु उनके संघर्ष को विजय और गौरव की ऊँचाइयों तक ले जाने में जिन वीरों और वीरांगनाओं ने योगदान दिया, उनमें झलकारी बाई का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। झलकारी बाई केवल लक्ष्मीबाई की सहचरी नहीं थीं, बल्कि वे उनकी परछाईं, रण-सहयोगी और अनेक मौकों पर जान बचाने वाली रणनीतिक सहयोगी बनकर उभरीं। उनकी वीरता, बुद्धिमत्ता और बलिदान स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम चरण की अमर धरोहर है।

झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड क्षेत्र में झांसी के समीप स्थित एक साधारण कोली परिवार में लगभग 1830–1831 के आसपास हुआ माना जाता है। उनका बचपन गरीबी और संघर्ष भरे परिवेश में बीता, परंतु इसी परिवेश ने उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से दृढ़ बनाया। बचपन में ही उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाज़ी, धनुर्विद्या और युद्ध-कौशल सीख लिया था। उनके पिता सदैव उन्हें निडर, स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करते थे।झलकारी बाई का स्वभाव बचपन से ही साहसी था। स्थानीय कथाओं में वर्णित है कि उन्होंने एक बार अकेले ही एक जंगली तेंदुए का सामना कर उसे मार गिराया था। इस घटना ने उनके साहस को और अधिक उजागर किया। बुंदेलखंड की संस्कृतियाँ—कुश्ती, दंगल, तलवार-कला और घुड़सवारी—उनके व्यक्तित्व में रच-बस गईं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई न्यायप्रिय, प्रजावत्सल और सैन्य प्रतिभा से सम्पन्न शासिका थीं। 1857 के विद्रोह के बाद जब झांसी अंग्रेजों के निशाने पर आ गया, तब सभी क्षेत्रों से वीरों का रानी के साथ जुड़ना प्रारंभ हुआ। झलकारी बाई की प्रसिद्धि रानी तक पहुँची और उन्हें रानी से मिलने का अवसर मिला।जब लक्ष्मीबाई ने झलकारी बाई की युद्ध-विद्या और साहस देखा तो वे अत्यंत प्रभावित हुईं। इसके अलावा, झलकारी बाई का व्यक्तित्व रानी से आश्चर्यजनक रूप से मिलता-जुलता था—दिखावट, कद-काठी और चेहरे की समानता ने उन्हें रानी की रणनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उपयुक्त बना दिया।

रानी ने झलकारी बाई को अपने दुर्गा दल में शामिल किया। यह दल महिलाओं का विशेष सैन्य दल था, जिसमें प्रमुख कमांडर के रूप में झलकारी बाई ने ख्याति प्राप्त की। यह दल रानी की सुरक्षा, सैन्य संचालन और आपातकालीन रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।

रानी लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई के संबंध साधारण शासक–सेविका के नहीं थे। वे दोनों एक-दूसरे की शक्ति थीं। रानी उनकी सलाह पर भरोसा करती थीं, और झलकारी बाई रानी के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण से सेवा करती थीं।

झलकारी बाई के लिए रानी केवल शासक नहीं, एक आदर्श, प्रेरणा और मातृस्वरूप थीं। वहीं रानी लक्ष्मीबाई के लिए झलकारी बाई उनके संघर्ष की साथी, उनकी रक्षा कवच और विपरीत परिस्थितियों में भरोसे की दृढ़ चट्टान थीं।

1857 के विद्रोह में झांसी अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र था। जब अंग्रेजी सेना झांसी पर आक्रमण करने लगी, तब रानी ने सेना का नेतृत्व किया और झलकारी बाई दुर्गा दल की कमांडर के रूप में मोर्चे पर डटी रहीं। लड़ाई के दौरान झलकारी बाई ने कई महत्वपूर्ण अभियानों का नेतृत्व किया। उन्होंने महिलाओं और पुरुषों दोनों को युद्ध-प्रशिक्षण दिया। कई बार उन्होंने अग्रिम पंक्ति में रहकर अंग्रेजी सेना के विरुद्ध तलवार उठाई।अंग्रेजों को यह समझ आ गया था कि झांसी की मजबूती केवल रानी लक्ष्मीबाई की सैन्य समझ ही नहीं, बल्कि उनके सहयोगियों की वीरता से भी है। इन सहयोगियों में सबसे उल्लेखनीय नाम झलकारी बाई का था, जो युद्ध के मैदान में अपराजेय साहस का प्रदर्शन कर रही थीं।झांसी की लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण क्षण तब आया, जब अंग्रेजी सेना ने किला लगभग घेर लिया था। रानी को सुरक्षित निकालना अनिवार्य था, ताकि वे आगे ग्वालियर जाकर पुनः संगठित होकर संघर्ष जारी रख सकें।

रानी से अत्यधिक मिलते-जुलते चेहरे और समान शारीरिक बनावट के कारण यह निर्णय लिया गया कि झलकारी बाई स्वयं रानी के वेश में दुश्मन के सामने प्रकट होंगी, ताकि अंग्रेज भ्रमित होकर मुख्य सेना का ध्यान उस ओर लगा दे, और इसी बीच रानी झांसी से बाहर निकलकर आगे की योजना बना सकें। यह योजना अत्यंत जोखिमपूर्ण थी, क्योंकि इसका अर्थ था कि झलकारी बाई को लगभग निश्चित मृत्यु का सामना करना पड़ेगा। लेकिन झलकारी बाई किसी भी हिचकिचाहट के बिना इस निर्णय पर सहमत हो गईं। उनके लिए रानी की सुरक्षा और झांसी की प्रतिष्ठा सर्वोपरि थी। वेश बदलकर झलकारी बाई अंग्रेजों के सामने प्रकट हुईं। अंग्रेजी सेना उन्हें ही रानी समझकर अपनी पूरी ताकत उन पर केंद्रित कर दी। उन्होंने अत्यंत वीरता से युद्ध किया, कई अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया और रणभूमि में अनोखी रणनीति से उन्हें उलझाए रखा।इस बीच रानी सुरक्षित मार्ग से झांसी से बाहर निकलने में सफल हो गईं। झलकारी बाई की इस असाधारण कुर्बानी ने रानी को आगे के संघर्ष के लिए सुरक्षित रखा।

कुछ कथाओं के अनुसार झलकारी बाई अंत तक लड़ती रहीं और शहीद हो गईं, जबकि कुछ में उनका जीवित बच जाना और बाद में शांतिपूर्ण जीवन बिताना बताया गया है। चाहे जो भी ऐतिहासिक सत्य हो, उनकी देशभक्ति और बलिदान की चमक भारत के स्वतंत्रता इतिहास में हमेशा अमर है।

लंबे समय तक झलकारी बाई का योगदान मुख्यधारा इतिहास में उपेक्षित रहा। इसका एक बड़ा कारण यह था कि झलकारी बाई एक दलित समुदाय से आती थीं। परंतु आज इतिहास पुनर्पाठ हो रहा है और उन्हें योग्य सम्मान मिल रहा है।आज झलकारी बाई भारत की बहादुर महिलाओं के प्रतीक के रूप में मान्य हैं। उनके नाम पर संस्थान, संग्रहालय और मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। झांसी में उनके सम्मान में झलकारी बाई स्मारक बनाया गया है। कई शोध-ग्रंथ, नाटक और काव्य उनकी वीरता को समर्पित हैं।

झलकारी बाई का व्यक्तित्व भारत की स्त्री–शक्ति का अद्वितीय उदाहरण है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि वीरता किसी जाति, वर्ग या लिंग की मोहताज नहीं होती। साहस, समर्पण और राष्ट्रप्रेम किसी भी साधारण मानव को असाधारण बना सकते हैं।

भावनात्मक निर्भरता की मनोवैज्ञानिक पड़ताल है पुस्तक मीरा और महात्मा

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सुधीर कक्कड़ भारतीय समाज और मनोविज्ञान के विलक्षण अध्येता माने जाते हैं। उनकी पुस्तक “मीरा एंड द महात्मा” महात्मा गांधी और उनकी विदेशी अनुयायी मैडेलीन स्लेड—जो बाद में “मीरा बेन” के नाम से जानी गईं—के जटिल, आत्मिक और गहरे मानव संबंध पर प्रकाश डालती है। यह पुस्तक केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग का विवरण नहीं, बल्कि दो असाधारण व्यक्तित्वों के मध्य विकसित एक आध्यात्मिक मैत्री, विश्वास और भावनात्मक निर्भरता की मनोवैज्ञानिक पड़ताल भी है। कक्कड़ इस संबंध को अत्यंत संवेदनशीलता और विश्लेषणात्मक दृष्टि से समझने का प्रयास करते हैं।

लेखक के अनुसार मीरा का गांधी से प्रथम परिचय उनके लेखन के माध्यम से हुआ। रस्किन और टॉल्स्टॉय के विचारों से प्रेरित मीरा को गांधी के लेखों में वही आध्यात्मिक धारा मिली, जिसकी तलाश उन्हें लंबे समय से थी। गांधी के जीवन की सरलता, सत्य के प्रति अडिगता और आत्मसंयम की साधना मीरा को गहरे तक प्रभावित करती है। कक्कड़ लिखते हैं कि मीरा अपने भीतर एक ऐसे “गुरु” की खोज कर रही थीं, जिनके माध्यम से वह आत्मिक शांति पा सकें। गांधी का व्यक्तित्व उन्हें इस खोज का उत्तर प्रतीत हुआ। 1925 में जब वह गांधी से मिलीं तो पहली ही भेंट में उनका मन दृढ़ हो गया कि वह अपना जीवन गांधी और उनके मिशन को समर्पित करेंगी।

गांधी ने मीरा को अपने आश्रम में स्वीकार किया, पर यह स्वीकार्यता केवल एक अनुयायी की नहीं थी। कक्कड़ बताते हैं कि गांधी मीरा में एक अत्यंत गंभीर, अनुशासित और तपस्विनी आत्मा देखते थे। उनके भीतर की निष्ठा और समर्पण गांधी को प्रभावित करते थे। मीरा ने स्वयं को पूरी तरह से गांधी के मार्ग में लगा दिया—चरखा, स्वच्छता, सेवा, सत्य और ब्रह्मचर्य—उन्होंने आश्रम जीवन की सारी कठिनाइयाँ अत्यंत सहजता से अपनाई।

सुधीर कक्कड़ इस संबंध का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक सन्दर्भ में करते हुए बताते हैं कि मीरा के लिए गांधी “मास्टर” से अधिक एक आध्यात्मिक पिता-तुल्य थे। वह अपने जीवन के हर निर्णय, हर भाव, हर उलझन में गांधी से मार्गदर्शन चाहती थीं। उनके लिए गांधी का सान्निध्य किसी भक्ति की चरम अनुभूति जैसा था। गांधी ने भी मीरा के इस विश्वास को स्नेह और सहानुभूति के साथ ग्रहण किया। वह मीरा की आध्यात्मिक खोज को सम्मानित करते थे और उन्हें एक तपस्विनी साधक के रूप में देखते थे।

कक्कड़ यह भी बताते हैं कि मीरा का यह समर्पण अक्सर आश्रमवासियों के लिए उलझन का कारण बना। कई लोगों को ऐसा लगता था कि मीरा की गांधी से अत्यधिक निकटता अनुचित है। परंतु गांधी हमेशा इस संबंध को पूर्ण पारदर्शिता और आत्मिकता के स्तर पर ही देखते थे। उन्होंने मीरा के प्रति अपने स्नेह को कभी भी व्यक्तिगत मोह में बदलने नहीं दिया। गांधी का जीवन ब्रह्मचर्य-व्रत से बँधा हुआ था और वह हर संबंध को आत्मिक शुचिता के दायरे में ही रखते थे।

इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि कक्कड़ गांधी और मीरा के संबंध को किसी भी सनसनीखेज ढंग से प्रस्तुत नहीं करते। वह इसे एक गहरे मानवीय और आध्यात्मिक संबंध के रूप में देखते हैं, जहाँ दो व्यक्तित्व एक-दूसरे के भीतर के प्रकाश को पहचानते हैं। गांधी के लिए मीरा सत्य और तप की साधना में एक विश्वसनीय सहयोगी थीं। वहीं मीरा के लिए गांधी उनकी आध्यात्मिक यात्रा के अंतिम पूर्वज—एक ऐसे व्यक्ति—जिसके माध्यम से वह स्वयं को पहचान पा रही थीं।

कक्कड़ यह भी बताते हैं कि इस संबंध में एक प्रकार का भावनात्मक तनाव भी था। मीरा अक्सर गांधी से बेहद निकट रहने की इच्छा रखती थीं। वह चाहती थीं कि गांधी उनके समर्पण को उसी तीव्रता से समझें। गांधी कई बार उन्हें संयम और दूरी की सीख देते थे। यह दूरी गांधी की आत्मिक साधना का अंग थी। मीरा इस दूरी को कभी-कभी भावनात्मक वेदना के रूप में अनुभव करती थीं। पुस्तक में मीरा के पत्रों और गांधी की प्रतिक्रियाओं के माध्यम से इस भावनात्मक द्वंद्व को संवेदनशीलता से उकेरा गया है।

मीरा का गांधी के जीवन पर प्रभाव भी कम नहीं था। उनकी दृढ़ निष्ठा, शुचिता और कार्य के प्रति समर्पण ने आश्रम के कई कामों को दिशा दी। स्पिनिंग, संगीत, अहिंसा के प्रचार और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों में मीरा का योगदान उल्लेखनीय रहा। वह गांधी की यात्राओं में साथ रहीं और कई कठिन चरणों में उनका समर्थन करती रहीं।

कक्कड़ यह भी दर्शाते हैं कि गांधी के प्रति मीरा की निष्ठा केवल व्यक्ति-पूजा नहीं थी। यह एक विचार के प्रति समर्पण था—एक ऐसे भारत के प्रति, जिसे गांधी सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन के आधार पर गढ़ना चाहते थे। मीरा ने न केवल इस विचार को समझा, बल्कि उसे अपने जीवन का ध्येय बना लिया।

अंततः, गांधी और मीरा का संबंध गुरु-शिष्य, पिता-पुत्री, मित्र और साधक-साधिका—इन सभी रूपों का एक अनोखा संगम था। कक्कड़ की व्याख्या यह समझने में सहायता करती है कि यह संबंध मनुष्य के भीतर की गहन आध्यात्मिक आकांक्षाओं और भावनात्मक आवश्यकताओं से कैसे आकार लेता है। यह संबंध इतिहास का हिस्सा भर नहीं, दो आत्माओं का संवाद था—जहाँ मीरा ने गांधी के माध्यम से स्वयं को पहचाना, और गांधी ने मीरा में एक सच्चे साधक का चेहरा देखा।

इस प्रकार सुधीर कक्कड़ की “मीरा एंड द महात्मा” मीरा और गांधी के संबंधों को किसी सरल परिभाषा में सीमित न करके, उसे एक मानवीय, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक गहराई से परिचित कराती है—जो भारतीय इतिहास की सबसे अनूठी और प्रेरक कहानियों में से एक है।