शहादत की अनुपम मिसाल थे गुरु तेग बहादुर जी

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बाल मुकुन्द ओझा

भारत की भूमि ने ऐसे महापुरुषों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन मानवता को समर्पित कर विश्व में भारत का नाम रोशन किया है। इन्हीं बलिदानी महापुरुषों में से एक हैं सिखों के नवें गुरु, श्री गुरु तेग़ बहादुर जी। उनका जीवन केवल सिख समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक आदर्श है। उन्होंने उस समय के धार्मिक अत्याचार और जबरन धर्म परिवर्तन की नीतियों के सामने सत्य, धर्म और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। गुरु तेगबहादुर जी का संपूर्ण जीवन न्याय, करुणा और सत्य की शक्ति का प्रतीक है।

 गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस देश और दुनियां में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाया जा रहा है। यह दिन उनके महान त्याग, सिद्धांतों के प्रति उनकी अडिग निष्ठा और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए उनके साहसी रुख को याद करने का अवसर है। इस अवसर पर श्री आनंदपुर साहिब में 23 से 25 नवंबर तक तीन दिवसीय समागम पंजाब में श्रद्धा, इतिहास और संस्कृति का सबसे भव्य आयोजन बन रहा है। गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस पर होने वाले अखंड पाठ, नगर कीर्तन, हेरिटेज वॉक, विशेष विधानसभा सत्र, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और ड्रोन शो ने लोगों में भारी उत्साह पैदा किया है। 23 नवंबर को अखंड पाठ और सर्व धर्म सम्मेलन के साथ समागम शुरू होगा। 24 नवंबर को सुबह शीश भेंथ नगर कीर्तन निकलेगा।  यह वही ऐतिहासिक यात्रा है जिसके रास्ते भाई जैता जी गुरु तेग बहादुर जी का सिस लेकर आनंदपुर साहिब तक पहुंचे थे। आज भी यह घटना भारत के इतिहास की सबसे मार्मिक और पवित्र यादों में शामिल है। 24 को पहली बार विधानसभा का विशेष सत्र श्री आनंदपुर साहिब में होगा, जिसमें ऐतिहासिक फैसले लिए जाएंगे।

उन्हें भारत का कवच कहा जाता है क्योंकि उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए अत्याचारों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया। गुरु तेग बहादुर जी, का जन्म 1 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में हुआ था। वह छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी, और माता नानकी जी के सबसे छोटे पुत्र थे। उनका बचपन का नाम त्याग मल था।  गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस 24 नवंबर 1675 को है। उन्हें चांदनी चौक, दिल्ली में शहीद किया गया था। उनकी शहादत का उद्देश्य धर्मिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता और सच्चाई की रक्षा था। उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान भारतीय इतिहास में एक अद्वितीय घटना है। यह बलिदान न केवल सिख धर्म के लिए था, बल्कि सनातन धर्म (कश्मीरी पंडितों) की रक्षा के लिए भी था। उनका शहीदी दिवस हमें न्याय, समानता और मानवाधिकारों के लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है। उन्हें ‘हिंद की चादर’ के रूप में भी जाना जाता है। उनका बलिदान भारतीय धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।  भारत के इतिहास में ऐसे बहुत कम उदाहरण मिलते हैं जहाँ किसी धर्मगुरु ने दूसरों के धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए हों। गुरु तेग बहादुर जी का शहीदी दिवस इसी महान आदर्श का स्मरण कराता है।

एक बालक के रूप में, तेग बहादुर जी ने अपने पिता, गुरु हरगोबिंद साहिब, से न केवल आध्यात्मिक शिक्षा, बल्कि सैन्य प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। 1634 में करतारपुर के युद्ध में उन्होंने अपनी असाधारण तलवारबाजी और बहादुरी का प्रदर्शन किया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर ही उनके पिता ने उनका नाम ‘त्याग मल’ से बदलकर ‘तेग बहादुर’ रखा, जिसका अर्थ है ‘तलवार का धनी’ या ‘तलवार का बहादुर’।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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