भारत निर्वाचन आयोग ने 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूचियों के चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के लिए प्रासंगिक तिथियों को एक सप्ताह बढ़ाकर संशोधित कार्यक्रम की घोषणा की है, जिसमें 01.01.2026 को अर्हक तिथि माना गया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण का संशोधित कार्यक्रम इस प्रकार है:
क्रमांक
गतिविधियां
अनुसूची
1
गणना अवधि
11.12.2025(गुरुवार) तक
2
मतदान केंद्रों का युक्तिकरण/पुनर्व्यवस्थापन
11.12.2025 (गुरुवार) तक
3
नियंत्रण तालिका का अद्यतनीकरण और ड्राफ्ट रोल की तैयारी
12.12.2025 (शुक्रवार)15.12.2025 (सोमवार) तक
4
मसौदा मतदाता सूची का प्रकाशन
16.12.2025 (मंगलवार) को
5
दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अवधि
16.12.2025 (मंगलवार)15.01.2026 (गुरुवार) तक
6
नोटिस चरण (जारी करना, सुनवाई और सत्यापन); गणना प्रपत्रों पर निर्णय और दावों तथा आपत्तियों का निपटान ईआरओ द्वारा साथ साथ किया जाएगा
16.12.2025 (मंगलवार) से07.02.2026 (शनिवार)
7
मतदाता सूची के स्वास्थ्य मापदंडों की जांच करना तथा अंतिम प्रकाशन के लिए आयोग की अनुमति प्राप्त करना।
भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने आज राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), कुरुक्षेत्र, हरियाणा के 20वें दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भाग लिया।उन्होंने विद्यार्थियों से ज़िम्मेदारी से नवाचार करने का आग्रह किया और कहा कि “प्रौद्योगिकी का असली उद्देश्य केवल प्रगति नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण प्रगति है।”
उपराष्ट्रपति ने भारत के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में से एक के इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में शामिल होने को अपना सौभाग्य बताया। उन्होंने एनआईटी कुरुक्षेत्र की सराहना करते हुए कहा कि यह एक समृद्ध विरासत, जीवंत वर्तमान और भविष्य वाला संस्थान है जो देश में तकनीकी शिक्षा के मानकों को आकार दे रहा है।
उन्होंने कहा कि कुरुक्षेत्र एक पवित्र भूमि है जो हमें याद दिलाती है कि अधर्म पर धर्म की हमेशा विजय होती है, चाहे अधर्म कितना भी शक्तिशाली क्यों न होउपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह केवल एक समारोह नहीं, बल्कि एक ऐसा क्षण होता है जब वर्षों का समर्पण गर्व, आशा और अवसर से भरी एक नई शुरुआत में बदलता है।
वैश्विक परिवर्तन की गति पर बोलते हुए उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जैव प्रौद्योगिकी, साइबर सुरक्षा और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में विकास के बारे में बात की।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि प्रौद्योगिकी उद्योगों को नया रूप देने और समाज के कामकाज के तरीके को पुन:परिभाषित करने में एक शक्तिशाली माध्यम बन गई है। उन्होंने विद्यार्थियों से ज़िम्मेदारी से नवाचार करने का आग्रह किया और कहा कि “प्रौद्योगिकी का असली उद्देश्य केवल प्रगति नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण प्रगति है।”
विद्यार्थियों को अनुसंधान, नवाचार और भारत-विशिष्ट समस्या-समाधान में गहराई से उतरने के लिए प्रोत्साहित करते हुए, उन्होंने कहा कि ये दोनों इंजन भारत के तकनीकी नेतृत्व को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने युवा नवप्रवर्तकों को राष्ट्रीय महत्व के उभरते क्षेत्रों, जैसे टिकाऊ विनिर्माण, स्मार्ट मोबिलिटी, क्वांटम प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा प्रौद्योगिकी, कृषि नवाचार और हरित बुनियादी ढाँचागत क्षेत्र में अनुसंधान करने पर बल दिया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत प्रौद्योगिकी के उपयोगकर्ता से उन्नत समाधानों का वैश्विक निर्माता बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। उन्होंने एक जीवंत उद्यमशीलता तंत्र को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलों को श्रेय दिया और स्नातकों से अपने विचारों को ऐसे उद्यमों में बदलने का आग्रह किया जो रोजगार का सृजन करें और राष्ट्रीय विकास में योगदान दें।
समकालीन वैश्विक चुनौतियों – जलवायु परिवर्तन, साइबर सुरक्षा खतरे, प्रौद्योगिकी तक समान पहुँच और एआई का नैतिक उपयोग – को स्वीकार करते हुए, उन्होंने कहा कि ये नवाचार और नेतृत्व के लिए अपार अवसर भी प्रदान करते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 को लागू करने में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता की प्रशंसा की। यह नीति बहु-विषयक शिक्षा के अवसर प्रदान करती है और भारत की संस्कृति, विरासत और लोकाचार में गहराई से निहित है। उपराष्ट्रपति ने कहा कि एनईपी 2020 ने मैकाले शिक्षा प्रणाली की औपनिवेशिक छाप को तोड़कर भारत को परिवर्तनकारी पथ पर अग्रसर किया है। उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा प्रणाली भारत पर शासन करने के लिए शुरू की गई थी और केवल क्लर्क तैयार करती थी।
समग्र शिक्षा पर संस्थान के फोकस की सराहना करते हुए, उन्होंने समग्र व्यक्तित्व विकास केंद्र (सीएचपीडी) की स्थापना की सराहना की, जो भगवद गीता, सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों, संज्ञानात्मक विज्ञान और मानसिक स्वास्थ्य पर पाठ्यक्रमों के माध्यम से बौद्धिक, भावनात्मक और नैतिक विकास को बढ़ावा देता है।
विकसित भारत @ 2047 के राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए, उपराष्ट्रपति ने विश्वास व्यक्त किया कि एनआईटी कुरुक्षेत्र के स्नातक इस लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने सराहना करते हुए कहा कि संस्थान को अब तक 64 पेटेंट प्रदान किए गए हैं, जो अनुसंधान, नवाचार और बौद्धिक संपदा निर्माण की इसकी मजबूत संस्कृति को दर्शाता है।
उन्होंने डीआरडीओ और इसरो के सहयोग से एआई-आधारित युद्ध, रक्षा अनुसंधान और चंद्रयान और मार्स ऑर्बिटर मिशन जैसे अंतरिक्ष मिशनों में उन्नत तकनीकों में संस्थान के महत्वपूर्ण योगदान की सराहना की। उन्होंने गांवों और झुग्गियों में जीवन स्तर में सुधार के लक्ष्य से कम लागत आधारित अनुसंधान, स्वदेशी तकनीक के माध्यम से आत्मनिर्भर भारत के लिए संस्था के प्रयासों की प्रशंसा की।
विद्यार्थियों से भारत की विकास यात्रा से जुड़े रहने का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा कि अनुसंधान को शहरी-ग्रामीण खाई को पाटने, एमएसएमई को सशक्त बनाने, कृषि को आधुनिक बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सहायता करनी चाहिए ताकि प्रौद्योगिकी अंतिम व्यक्ति तक पहुंच सके। उन्होंने कहा, “हमें प्रतिभा पलायन से प्रतिभा से लाभ की ओर बढ़ना चाहिए।” उन्होंने स्नातकों को प्रोत्साहित किया कि वे जहां भी जाएं भारत को अपने दिल में रखें।
भारत के युवाओं से अपनी आकांक्षाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि अगला गूगल, अगला टेस्ला, अगला स्पेसएक्स भारत से हो – एनआईटी कुरुक्षेत्र जैसे संस्थानों से हो।”
उपराष्ट्रपति ने विद्यार्थियों से “नशे को ना” कहकर अनुशासित जीवन जीने की भी अपील की।
अपने संबोधन के समापन पर उन्होंने स्नातकों को याद दिलाया कि उनकी डिग्री एक समापन बिंदु नहीं है बल्कि एक नई जिम्मेदारी की शुरूआत है। उन्होंने विद्यार्थियों से सृजनात्मकता, मानवीयता और करूणा से समाज की सेवा करने का आग्रह किया।
इस अवसर पर हरियाणा के राज्यपाल प्रो. आशिम कुमार घोष, हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी, एनआईटी कुरुक्षेत्र के निदेशक प्रो. बी.वी. रमना रेड्डी, एनआईटी कुरुक्षेत्र के बोर्ड ऑफ गवर्नर्स की अध्यक्ष डॉ. तेजस्विनी अनंत कुमार और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।
संसद के आगामी शीतकालीन सत्र, 2025 से संबंधित मुद्दों पर चर्चा के लिए आज (30 नवंबर, 2025) रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ संसद भवन परिसर, नई दिल्ली में एक बैठक आयोजित की गई। यह बैठक संसदीय कार्य और अल्पसंख्यक कार्य मंत्री श्री किरेन रिजिजू ने बुलाई थी। इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा, विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल और संसदीय कार्य और सूचना एवं प्रसारण राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन भी शामिल हुए। कुल मिलाकर, बैठक में मंत्रियों सहित 36 राजनीतिक दलों के 50 नेताओं ने भाग लिया।
रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह की परिचयात्मक टिप्पणी से बैठक की शुरूआत हुई। उन्होंने बैठक में उपस्थित सभी नेताओं का स्वागत किया। तत्पश्चात, संसदीय कार्य मंत्री ने बैठक का संचालन किया। उन्होंने नेताओं को सूचित किया कि संसद का शीतकालीन सत्र, 2025 सोमवार, 1 दिसंबर, 2025 को आरंभ होगा और सरकारी कार्य की अनिवार्यताओं के अधीन, सत्र शुक्रवार, 19 दिसंबर, 2025 को समाप्त हो सकता है। इस सत्र में 19 दिनों की अवधि में कुल 15 बैठकें होंगी।
संसदीय कार्य मंत्री श्री रिजिजू ने आगे बताया कि इस सत्र के दौरान उठाए जाने वाले विधायी और अन्य कार्यों के लिए अस्थायी रूप से 14 विषयों की पहचान की गई है।
उन्होंने यह भी कहा कि सरकार दोनों सदनों के नियमों के अनुसार, सदनों में किसी भी अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने संसद के आगामी शीतकालीन सत्र के दौरान उनके की ओर से उठाए जाने वाले विभिन्न संभावित मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए और सरकार को पूर्ण सहयोग प्रदान करने का आश्वासन दिया।
अंत में, श्री राजनाथ सिंह और श्री किरेन रिजिजू ने बैठक में भाग लेने, अपने विचार व्यक्त करने तथा सक्रिय एवं प्रभावी भागीदारी के लिए सभी नेताओं को धन्यवाद दिया।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल भारतीय राजनीति के उन सधे, शांत, चिंतनशील और दूरदर्शी नेताओं में से एक थे जिन्होंने न सिर्फ भारत की विदेश नीति को नई दिशा दी, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की मर्यादा को भी सर्वोच्च स्थान दिया। उनका जीवन संघर्ष, आदर्शवाद, विद्वत्ता और कूटनीतिक कौशल का ऐसा संगम था जिसने उन्हें विश्व समुदाय में सम्मान दिलाया। गुजराल की सबसे महत्वपूर्ण पहचान उनकी ‘गुजराल सिद्धांत’ के रूप में है, जिसने दक्षिण एशिया में भारत की पड़ोसी नीति को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। 1919 में अविभाजित पंजाब के झेलम (अब पाकिस्तान) में जन्मे इंद्र कुमार गुजराल आज़ादी के आंदोलन से प्रभावित रहे और युवावस्था में ही राजनीतिक चेतना से ओत-प्रोत हो गए थे।
गुजराल का आरंभिक राजनीतिक जीवन कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़ाव और स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान जेल यात्राओं से होकर गुजरा। विभाजन के बाद वे परिवार सहित भारत आ गए और भारतीय राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने लगे। उनकी शिक्षा, विद्वत्ता, शालीन व्यवहार और गहरी वैचारिक समझ उन्हें अन्य नेताओं से अलग पहचान दिलाती थी। वे उन विरले नेताओं में शामिल थे जिन्हें पढ़ने-लिखने का गहरा शौक था और जिनकी राजनीति विचारों पर आधारित थी, न कि शोर-शराबे पर। यही कारण था कि वे राजनीति में एक ‘जेंटलमैन स्टेट्समैन’ के रूप में जाने जाते थे।
स्वतंत्र भारत में इंद्र कुमार गुजराल ने अनेक महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। वे सांसद, सूचना एवं प्रसारण मंत्री, विदेश मंत्री और अंततः 1997 में भारत के 12वें प्रधानमंत्री बने। सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में उन्होंने सेंसरशिप की जगह रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहन दिया और दूरदर्शन-आकाशवाणी के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए। परंतु उनकी सबसे बड़ी पहचान कूटनीति में उनके महत्वपूर्ण योगदान से बनी। वे स्वाभाविक रूप से एक विचारवान और सधे हुए राजनयिक थे।
1997 में गठबंधन सरकार के दौर में गुजराल को प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी मिली। यह वह समय था जब देश में गठबंधन राजनीति अपने शुरुआती दौर में थी और स्थिरता एक चुनौती थी। बावजूद इसके, गुजराल ने अपने कार्यकाल में किसी भी तरह की राजनीतिक तकरार से दूर, संयमित और सकारात्मक नेतृत्व दिया। उनका कार्यकाल बहुत लंबा नहीं रहा, परंतु प्रभाव अत्यंत गहरा रहा। एक ओर उन्होंने आंतरिक राजनीति में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की, वहीं दूसरी ओर विदेश नीति के मोर्चे पर भारत की प्रतिष्ठा को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया।
इंद्र कुमार गुजराल को सबसे अधिक याद किया जाता है ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ के लिए। यह सिद्धांत पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंधों को विश्वास, सद्भावना और बिना शर्त सहयोग पर आधारित करने की परिकल्पना था। इस सिद्धांत के अनुसार भारत को अपने छोटे पड़ोसी देशों—नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव—के साथ संबंधों में बड़े-भाई वाली भूमिका निभाने के बजाय एक सहयोगी की तरह आगे आना चाहिए। गुजराल का मानना था कि दक्षिण एशिया में स्थिरता और विकास तभी संभव है जब भारत अपने पड़ोसियों के साथ संवाद, विश्वास और सहयोग को बढ़ावा दे। उनके इस दृष्टिकोण ने क्षेत्रीय राजनीति में सकारात्मक संदेश भेजा और भारत की छवि को मजबूत बनाया।
गुजराल की विदेश नीति में पाकिस्तान के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण पहलू था। विभाजन की पीड़ा को व्यक्तिगत रूप से महसूस करने वाले गुजराल दोनों देशों के बीच बेहतर संबंधों के प्रबल समर्थक थे। वे मानते थे कि स्थायी शांति के लिए संवाद ही विकल्प है। उनके प्रयासों से कुछ समय के लिए विश्वास का माहौल बना, हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों ने इसे अधिक समय तक टिकने नहीं दिया। फिर भी, उनका दृष्टिकोण आज भी भारत-पाकिस्तान संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु माना जाता है।
इंद्र कुमार गुजराल न सिर्फ राजनेता थे, बल्कि साहित्य, कला और संस्कृति में भी उनकी गहरी रुचि थी। वे उर्दू साहित्य के प्रेमी थे और कई कवियों के साथ उनकी घनिष्ठता थी। उनकी वाणी में शालीनता, तर्क और विनम्रता का अद्भुत मेल था। वे उन नेताओं में शामिल थे जो राजनीति को जनसेवा और बौद्धिक दायित्व के रूप में देखते थे। सार्वजनिक जीवन में उनका व्यवहार सौम्य, विवादहीन और आदर्शवादी रहा।
प्रधानमंत्री पद छोड़ने के बाद भी गुजराल सक्रिय रहे और उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मैटर्स ऑफ डिस्क्रेशन’ लिखी, जिसमें उन्होंने राजनीति, कूटनीति और अपने अनुभवों का विस्तृत विश्लेषण किया। 30 नवंबर 2012 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनकी नीतियाँ और विचार आज भी प्रासंगिक हैं।
इंद्र कुमार गुजराल की विरासत उनके बड़े-बड़े राजनीतिक भाषणों में नहीं, बल्कि उनकी सरलता, विचारधारा और शांत कूटनीति में निहित है। वे ऐसे नेता थे जिन्होंने सत्ता को कभी लक्ष्य नहीं बनाया, बल्कि साधन के रूप में देखा। उनकी विदेश नीति का दृष्टिकोण भारत की कूटनीति में आज भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। गुजराल ने दिखाया कि कभी-कभी नरम शब्द, संयम और सद्भावना भी वही काम कर सकते हैं जो कठोर कूटनीति नहीं कर पाती। उनका जीवन आधुनिक भारतीय राजनीति में एक ऐसी मिसाल है जो आदर्शवाद, शालीनता और विवेकशील नेतृत्व का प्रतीक बनकर हमेशा याद किया जाएगा।
आज के “मन की बात” कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर स्पष्ट संदेश दिया कि भारत की प्रगति में केवल सरकार का योगदान नहीं, बल्कि हर नागरिक की भागीदारी, हर युवा की मेहनत, हर किसान की प्रतिबद्धता और हर समाज के समूह की सक्रियता आवश्यक है। उन्होंने खेती हो, खेल हो, संस्कृति हो या सामाजिक सुधार — हर क्षेत्र में सामूहिक प्रयास की अहमियत रेखांकित की।
उनका कहना था कि भारत अब नयी दिशा में अग्रसर है, और इस दिशा में हम सबको मिलकर काम करना है। उन्होंने देश को गर्व से आगे देखना और आगे बढ़ने का आह्वान किया।
आज का “मन की बात” सिर्फ एक भाषण नहीं — यह उम्मीद, उत्साह और सामूहिक जिम्मेदारी का संदेश है। भारत की तरक्की, सांस्कृतिक एकता और सामाजिक समरसता के लिए यह संवाद एक नए अध्याय की शुरुआत है।
आज — रविवार — प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “मन की बात” के 128वें एपिसोड में देशवासियों से संवाद किया। इस कार्यक्रम में उन्होंने देश के विकास, सामाजिक-सांस्कृतिक उन्नति, कृषि, खेल, धर्म व अर्थव्यवस्था सहित कई महत्वपूर्ण विषयों पर विचार साझा किए।
प्रधानमंत्री ने किसानों का उल्लेख करते हुए कहा कि आज देश के कृषि-विभाग में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि न केवल उत्पादन बढ़ा है, बल्कि नई तकनीकों और आधुनिक तरीकों का उपयोग कर खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक सशक्त हो रही है।कृषि क्षेत्र में भी देश ने बड़ी उपलब्धि हासिल की। भारत ने 357 मिलियन टन के खाद्यान्न उत्पादन के साथ एक ऐतिहासिक record बनाया है। Three hundred and fifty seven million ton! 10 साल पहले की तुलना में भारत का खाद्यान्न उत्पादन 100 मिलियन टन और बढ़ गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि आर्थिक गतिविधियाँ, जैसे रोजगार, उद्योग व स्थानीय व्यापार, तेजी से विकसित हो रहे हैं, जिससे गांवों व कस्बों में जीवन स्तर में सुधार हो रहा है। इस बात पर जोर दिया गया कि समृद्धि सिर्फ शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि ग्रामीण भारत भी इसका हिस्सा बने।
कुछ दिन पहले ही मैंने हैदराबाद में दुनिया की सबसे बड़ी लीप इंजन MRO facility का उद्घाटन किया है। Aircrafts की Maintenance, repair and overhaul के sector में भारत ने ये बहुत बड़ा कदम उठाया है। पिछले हफ्ते मुंबई में एक कार्यक्रम के दौरान INS ‘माहे’ को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया। पिछले ही हफ्ते भारत के space ecosystem को Skyroot के Infinity campus ने नई उड़ान दी है। ये भारत की नई सोच, innovation और Youth Power का प्रतिबिंब बना है।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने देश में हो रही खेल-सफलताओं और युवाओं की मेहनत व प्रतिभा की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत के युवा हर क्षेत्र — खेल, कला, विज्ञान, उद्यमिता — में आगे बढ़ रहे हैं और देश का नाम रोशन कर रहे हैं।
उन्होंने यह संदेश दिया कि युवाओं की ऊर्जा, आत्म-विश्वास और लगन ही भारत के उज्जवल भविष्य की नींव है। उनका आह्वान था कि देश का हर युवा अपने हुनर, प्रतिभा और लगन से देश व समाज के लिए सकारात्मक योगदान दे।
प्रधानमंत्री ने देश की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक समरसता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग धर्म, रीति-रिवाज, भाषा और परंपराएं हैं, लेकिन यही विविधता भारत की असली ताकत है।
उन्होंने हाल ही में हुए धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों, त्योहारों और सामाजिक समागमों का उल्लेख कर कहा कि इस तरह के उत्सव, कार्यक्रम और मिलन-जुलन भारत की सामाजिक एकता को और मजबूत करते हैं।
इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, सभ्यता और सभ्याचार — हमें याद रखने और बनाए रखने चाहिए, और आने वाली पीढ़ियों को भी इसे समझाने व आत्मसात कराने का काम हम सबका है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश ने हाल ही में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल की हैं — चाहे वह कृषि क्षेत्र में हो, खेल के क्षेत्र में हो या सामाजिक-आर्थिक प्रगति में। उन्होंने कहा कि देशभर में विकास की गति तेजी से बढ़ी है और यह विकास सिर्फ कुछ हिस्सों तक सीमित नहीं, बल्कि देश के हर हिस्से में दिखाई दे रहा है।
विशेष रूप से, उन्होंने उल्लेख किया कि नवाचार, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, रोजगार सृजन और युवा-शक्ति के योगदान से भारत एक नई दिशा में आगे बढ़ रहा है।
अपने संदेश में, प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से आग्रह किया कि वे हर क्षेत्र में सकारात्मक रूप से भाग लें — चाहे वह कृषि हो, खेल हो, संस्कृति हो या सामाजिक उत्थान। उन्होंने कहा कि देश की प्रगति में हर नागरिक की भागीदारी महत्त्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के पहाड़ी इलाकों में वन तुलसी यानि सुलाई, सुलाई के फूलों से यहाँ की मधुमक्खियाँ बेहद अनोखा शहद बनाती हैं। ये सफेद रंग का शहद होता है जिसे रामबन सुलाई honey कहा जाता है। कुछ वर्षों पहले ही रामबन सुलाई honey को GI Tag मिला है। इसके बाद इस शहद की पहचान पूरे देश में बन रही है।
दक्षिण कन्नड़ा जिले के पुत्तुर में वहाँ की वनस्पतियाँ शहद उत्पादन के लिए उत्कृष्ट मानी जाती हैं। यहाँ ‘ग्रामजन्य’ नाम की किसान संस्था इस प्राकृतिक उपहार को नई दिशा दे रही है। ‘ग्रामजन्य’ ने यहाँ एक आधुनिक processing unit बनाया, lab, bottling, storage और digital tracking जैसी सुविधाएँ जोड़ी गईं। अब यही शहद branded उत्पाद बनकर गाँवों से शहरों तक पहुँच रहा है। इस प्रयास का लाभ ढाई हजार से अधिक किसानों को मिला है।
आज भारत honey production में नए रिकार्ड बना रहा है। 11 साल पहले देश में honey का उत्पादन 76 हजार मीट्रिक टन था। अब ये बढ़कर डेढ़ लाख मीट्रिक टन से भी ज्यादा हो गया है। बीते कुछ वर्षों में शहद का export भी तीन गुना से ज्यादा बढ़ गया है। Honey Mission कार्यक्रम के तहत खादी ग्रामोद्योग ने भी सवा 2 लाख से ज्यादा bee-boxes लोगों में बांटे हैं। इससे हजारों लोगों को रोजगार के नए अवसर मिले हैं। यानि देश के अलग-अलग कोनों में शहद की मिठास भी बढ़ रही है। और ये मिठास किसानों की आय भी बढ़ा रही है।
उन्होंने युवाओं से विशेष अपील की कि वे अपने हुनर, ऊर्जा और नवाचार के द्वारा देश को आगे बढ़ाएँ; साथ ही समाज में एकता, सहयोग और सद्भाव बनाए रखें।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि छोटे-छोटे प्रयास, चाहे वो स्वदेशी खरीद हो, स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देना हो या सामाजिक सेवा — ये सभी देश की मजबूती और विकास की दिशा में अहम योगदान हैं।
गत दिनों अपने किसी निजी कार्यवश अचानक बिहार जाने का कार्यक्रम बन गया। प्रायः शहीद या सरयू यमुना एक्सप्रेस से पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मेरा दरभंगा आना जाना होता है परन्तु इस बार चूँकि मात्र एक सप्ताह पूर्व ही दरभंगा जाने की तिथि निर्धारित हुई इसलिये शहीद या सरयू यमुना एक्सप्रेस में आरक्षण न मिल पाने के चलते आने जाने हेतु अन्य विकल्प तलाश करने पड़े। ऐसे ही वैकल्पिक ट्रेन थी अमृतसर – जयनगर ‘स्पेशल ट्रेन’ यानी 04652 । इस ट्रेन के अमृतसर से अंबाला पहुंचने का निर्धारित समय दोपहर 2 बजकर 50 मिनट था और दरभंगा पहुंचने का निर्धारित समय अगले दिन शाम 5.30 बजे था। अर्थात पूरी यात्रा लगभग 26 घंटे 30 में तय होनी थी। परन्तु यह ट्रेन अगले दिन शाम 5.30 बजे दरभंगा पहुँचने के बजाये तीसरे दिन सुबह लगभग 8.30 बजे पहुंची। यानी यह ‘स्पेशल ट्रेन’ 04652 लगभग 15 घंटे की देरी से दरभंगा पहुंची। इतना ही नहीं जहाँ दूसरी मेल एक्सप्रेस ट्रेन्स का अंबाला-दरभंगा का ए सी थ्री का किराया लगभग 1500 रुपये है वहीं इस तथाकथित ‘स्पेशल ट्रेन’ के नाम पर यात्रियों से किराया भी क़रीब 2000 / रूपये वसूल किये गये।
इसी तरह वापसी के लिये भी जिस ट्रेन में ए सी थ्री श्रेणी में आरक्षण मिल सका वह भी दरभंगा-नई दिल्ली स्पेशल ट्रेन 02569 थी। इसका भी दरभंगा से छूटने का निर्धारित समय सुबह 6 बजकर 30 मिनट था परन्तु यह वहां से प्रातः 9 बजकर 40 मिनट पर यानी तीन घंटा दस मिंट के विलंब से रवाना हुई। और अपने निर्धारित समय यानी अगले दिन सुबह 4 बजे नई दिल्ली पहुँचने वाली यह स्पेशल ट्रेन लगभग 1. 30 बजे दोपहर अर्थात क़रीब दस घंटे की देरी से नई दिल्ली स्टेशन पहुँच सकी। इसका भी ए सी थ्री श्रेणी का किराया 1900 रूपये था जबकि अन्य सामान्य मेल एक्सप्रेस ट्रेन्स में 1500 के आस पास होता है। इस लेट लतीफ़ी के परिणाम स्वरूप कितने यात्रियों को किन किन परेशानियों का सामना करना पड़ा रेल विभाग को इससे कोई लेना देना नहीं। रास्ते में ट्रेन में खाने पीने व वाशरूम में जल आपूर्ति संबंधी कैसी कैसी परेशानियों का सामना यात्रियों ने किया रेल विभाग से इसका भी कोई वास्ता नहीं। रेल विभाग को तो यात्रियों की जेब से ‘स्पेशल ट्रेन’ के नाम पर ठगे गए फ़ालतू किराये भर से ही मतलब है।
इस समय आपको देश के कई भाग से इसी तरह की अनेक ट्रेन स्पेशल ट्रेन या क्लोन ट्रेन के नाम से चलती दिखाई दे जाएँगी। इनमें अधिकांश स्पेशल या क्लोन ट्रेन इसी तरह घंटों नहीं बल्कि दिन के हिसाब से लेट चल रही हैं। जानकारी जुटाने पर पता चला कि यह वही ट्रेन्स हैं जिन्हें पिछले दिनों त्योहारों के दौरान स्पेशल ट्रेन या क्लोन ट्रेन के नाम से चलाया गया था। परंतु चूंकि इसका किराया अन्य ट्रेन्स की तुलना में काफ़ी अधिक है और यात्रियों की संख्या अधिक होने के चलते यह ट्रेन्स त्यौहार ख़त्म होने के बावजूद अभी भी यात्रियों की भारी भीड़ ढो रही हैं इसलिये रेल विभाग भी इसे अपनी कमाऊ योजना समझकर त्यौहार ख़त्म होने के बावजूद अभी भी चला रहा है।अब चूँकि इस तरह की स्पेशल या क्लोन रुपी ट्रेन्स सप्ताह में 3 या चार दिन ही चलती हैं इसलिये इनके एक या दो दिन लेट हो जाने पर भी रेल विभाग को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हाँ यात्रियों को जो परेशानियां उठानी पड़ती है उसका रेल विभाग या सरकार से कोई वास्ता ही नहीं। किसी यात्री की अस्पताल में डॉक्टर से महीनों पहले ली गयी अपॉइंटमेंट निरस्त हो जाती है जिससे उसकी जान व सेहत प्रभावित होती है। किसी की परीक्षा छूट जाती है किसी को नौकरी ज्वाइन करनी होती है किसी को शादी ब्याह में शामिल होना होता है। गोया लोगों की तरह तरह की व्यस्तताओं पर रेल विभसग की लेट लतीफ़ी पानी फेर देती है। जब स्पेशल या क्लोन ट्रेन के नाम पर संचालित रेलगाड़ियों की यह स्थिति है तो सामान्य ट्रेन्स की हालत का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता है। ख़ासकर बिहार की ओर जाने वाली गाड़ियां तो लगभग हमेशा ही विलंब व अति विलंब से ही चलती हैं। सुबह की ट्रेन शाम व शाम को पहुँचने वाली ट्रेन का अगले दिन सुबह अपने गंतव्य तक पहुंचना तो गोया आम बात हो चुकी है।
सच तो यह है कि सरकार की प्राथमिकताओं में पहले से चल रही सामान्य /एक्सप्रेस व मेल ट्रेन्स को निर्धारित समय सारिणी के अनुसार संचालित करना नहीं बल्कि वंदे भारत ट्रेन्स की संख्या बढ़ाना है। वंदे भारत ट्रेन्स संचालित करने के पीछे भी यही कहानी है कि इसमें अन्य ट्रेन्स की तुलना में किराया काफ़ी अधिक है जिसे साधारण व्यक्ति ख़ासकर 5 किलो मुफ़्त राशन पर जीने को मजबूर व 10 हज़ार रूपये लेकर वोट डालने वाली महिलायें तो कम से कम सहन नहीं कर सकतीं। सरकार की दूसरी प्राथमिकता देश के चुनिंदा रेल स्टेशन को चमकाने व उनका रंग रोग़न करने की है। भले ही इन स्टेशन पर भिखारी कुत्ते गाय सांड आदि क्यों न डेरा जमाये हों। देश के अधिकांश रेलवे स्टेशन दशकों से नशेड़ियों व अपराधियों की शरण स्थली बने हुये हैं। आज भी देश के अनेक स्टेशन पर लूट चोरी ,जेब कतरी,ज़हर खुरानी,अवैध यात्री,रिश्वत ख़ोरी आदि अपराध धड़ल्ले से अंजाम दिए जाते हैं। शर्मनाक तो यह है कि देश के तमाम रेल स्टेशन पर बाक़ायदा रेल विभाग की ओर से लाउडस्पीकर से जेब कतरों से सावधान रहने,ज़हर खुरानी से बचने व अपने सामन की सुरक्षा करने जैसी घोषणायें बार बार की जाती हैं। परन्तु सरकार के पास यात्रियों को सुरक्षित व आरामदायक यात्रा मुहैया कराने की न तो कोई योजना है और शायद न ही यह उसकी भावी योजनाओं का हिस्सा प्रतीत होती है। बल्कि सरकार तो बुलेट ट्रेन चलाने की योजना पर काम कर रही है। शायद बिहार जैसे राज्यों से आने वाले ताज़ातरीन चुनाव परिणामों के बाद सरकार इस निष्कर्ष पर भी पहुँच चुकी है कि यू पी व बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्यों की जनता जब मुफ़्त राशन व नक़द पैसों के बदले वोट दे ही देती है तो उसे निर्धारित समय सारिणी के अनुसार ट्रेन संचालन जैसे विषय से क्या लेना देना ? और जिस जागरूक व शिक्षित वर्ग के रेल यात्री ट्रेन्स की लेटलतीफ़ी या ट्रेन संचालन की अन्य त्रुटियों से प्रभावित होते भी हैं या इसे महसूस करते हैं उनकी संख्या ‘लाभार्थी मतदाताओं ‘ से तो आख़िर कम ही है ? जो भी हो परन्तु कुल मिलाकर यही है देश में चल रही ‘स्पेशल रेल गाड़ियों ‘ के संचालन की सच्चाई
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के निर्वाचन का सस्पेंस लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव संपन्न हो गए है, इसी के साथ पार्टी के भीतर हलचल तेज हो गई है। यह भी कहा जा रहा है खरमास के समाप्त होते ही अध्यक्ष के निर्वाचन की विधिवत प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। सियासी क्षेत्रों में चर्चा है कि, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और संघ के मध्य सब कुछ सही नहीं चल रहा है, जिसके कारण दोनों के बीच आपसी तालमेल बिगड़ गया है। यही कारण है कि भाजपा अपना अध्यक्ष अब तक नहीं चुन पाई है। पिछले एक साल से हर सप्ताह – पखवाड़े शीघ्र चुनाव की खबरे मीडिया में उछलती है। इसके साथ ही पांच सात नामों की सूची पर चर्चा होने लगती है। कुछ दिनों बाद यह चर्चा ठंडी पड़ जाती है। इसके साथ कुछ दिनों के इंतज़ार के बाद फिर चुनाव की ख़बरों से सियासत गरमाने लगती है। इस प्रकार की ख़बरें पचासों बार छप चुकी है मगर आज तक भाजपा अपना अध्यक्ष नहीं खोज पाई है। अब यह मामला कहां जाकर अटका और लटका है यह मोदी और शाह ही भलीभांति बता सकते है। यह भी कहा जा रहा था कि बिहार चुनाव के बाद अध्यक्ष का फैसला हो जायेगा। अब बिहार चुनाव भी हो गया, मगर अब तक स्थिति साफ़ नहीं हुई है।
पार्टी विथ डिफरेंस का दावा करने वाली भाजपा इस समय एक अजीब से उधेड़बुन का शिकार हो रही है। भाजपा अध्यक्ष का निर्वाचन अब बीरबल की खिचड़ी बन गया है। कोई न कोई बहाना बताकर इसे लगातार आगे से आगे खिसकाया जा रहा है। दस करोड़ सदस्यों वाली पार्टी के पास वर्तमान में 16 राज्यों में खुद के बुते अथवा सहयोगियों के साथ सरकार हैं। इसके बावजूद एक अदद अध्यक्ष की तलाश पूरी नहीं हो रही है। राज्यों में भी तदर्थ अध्यक्ष पार्टी चला रहे है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा डांवाडोल की स्थिति में है। वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल जनवरी 2023 में खत्म हो चुका है। इसके बाद लगातार नये अध्यक्ष की खोज की जा रही है मगर यह खोज पौने तीन साल बाद भी ख़त्म नहीं हुई है। एक व्यक्ति, एक पद का सिद्धांत भाजपा में लागू होता है। मगर दो पदों पर काम कर रहे वर्तमान अध्यक्ष को इससे छूट दे रखी है। लोग तरह तरह की टीका टिप्पणियां कर रहे है। कुछ लोग इसे भाजपा संघ के मध्य मन मुटाव से भी जोड़कर देख रहे है। बताया जा रहा है संघ ने शीर्ष नेतृत्व को अपने रूख से अवगत करा दिया है, अब फैसला पार्टी को करना है कि वह संघ के बताये रास्ते पर चलेगी अथवा अपना स्वतंत्र मार्ग अख्तियार करेगी। संघ के विश्वसनीय सूत्र बता रहे है वह आगामी लोकसभा चुनावों की रणनीति पर काम कर रही है जिसमें अध्यक्ष के साथ प्रधान मंत्री पद का फैसला अहम् बन गया है। इसी बीच एक बार फिर भाजपा के सूत्र कह रहे है पार्टी के नए अध्यक्ष का चुनाव दिसंबर या जनवरी 26 में हो सकता है। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने इस चुनाव को लेकर तैयारियां भी शुरू कर दी हैं।
भाजपा और संघ के जानकारों का कहना है मोदी के मन की थाह लगाना मुश्किल है। भाजपा में कई फैसले ऐसे लिए गए हैं जो बेहद चौंकाने वाले थे। मनोहर लाल खट्टर से लेकर भजन लाल तक के नाम इसमें शुमार किये जा सकते है, जिनकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। मोदी को ऐसा अध्यक्ष चाहिए जो उनका विश्वस्त तो हो ही साथ में उसे अगला चुनाव जिताने की भरपूर क्षमता और सम्भावना हो। अगले लोकसभा चुनाव नये अध्यक्ष के कार्यकाल में संपन्न होंगे इसीलिए फूंक फूंक कर कदम उठाये जा रहे है।
इसी बीच पार्टी विथ डिफरेंस और दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा में नये अध्यक्ष को लेकर तरह तरह की चर्चाएं व्याप्त हो रही हैं। दक्षिण भारत और उत्तर भारत की संभावनाएं भी तलाशी जा रही हैं। अनेक बड़े और दमदार नेताओं के नाम सामने आ रहे हैं, जो पार्टी के इस महत्वपूर्ण पद के लिए दावेदार हैं। इसी बीच मीडिया में प्रमुखता से एक दर्ज़न नामों की चर्चा सुनी जा रही है। इनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, शिवराज सिंह चौहान, देवेंद्र फडणवीस, केशव प्रसाद मौर्य, मनोहर लाल खट्टर, समृति ईरानी और संजय जोशी के नाम प्रमुखता से लिए जा रहे है। रोज कुछ नाम इस सूची में कुछ नाम जुड़ रहे है। किसी महिला को राष्ट्रीय अध्यक्ष का दारोमदार सौंपने की चर्चाएं भी है। संघ के पसंद- नापसंद की चर्चाएं भी छाई हुई है।
भाजपा के लिए नया अध्यक्ष बेहद महत्वपूर्ण होगा। प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी ने जो रणनीतियां बनाई हैं, उनके साथ नए अध्यक्ष को तालमेल बैठाना होगा। उसे पार्टी के संगठन को नई दिशा देने के साथ-साथ युवाओं को जोड़ने और आगामी चुनावों की तैयारियों में सक्रिय भूमिका के साथ एनडीए के साथी संगठनों से बेहतर समन्वय स्थापित करना होगा । इसलिए पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से जुड़ा हो और संगठनात्मक दृष्टि से मजबूत हो। साथ ही मोदी और शाह के भरोसे का हो।
आलोक पुराणिक मौज लेनेवाले, व्यंग्य करने वाले हर दौर में हुए हैं। औरंगजेब इस मुल्क के ऐसे बादशाह हैं, जो मर तो गये हैं, पर मरे नहीं हैं। 1707 में औरंगजेब की मौत हुई, पर बराबर इस या उस वजह से औरंगजेब चर्चा में आते रहते हैं। औरंगजेब ने बाप को कैद रखा और भाईयों का कत्ल कराया। एक क्रूर हत्यारे के तौर पर बदनाम औरंगजेब को चाहनेवाले भी कम नहीं हैं। शायर इकबाल औरंगजेब के परम प्रशंसक थे। औरंगजेब से वैचारिक प्रेरणा लेनेवाले कई लोग अब भी मिल जायेंगे।
खैर, औरंगजेब के वक्त के सिक्कों पर दर्ज था- सिक्का जद देर जहां चू मीर मुनीर शाह औरंगजेब आलमगीर
इसका मतलब हुआ कि दुनिया में यह सिक्का ऐसे चमक रहा है, जैसे औरंगजेब आलमगीर चमक रहे हैं. इसकी जो पैरोडी बनायी गयी, उसे सुनकर आप को लग सकता है कि यह किसी दिल्लीवाले ने बनायी होगी, दिल्ली वाले पनीर के प्रेमी होते हैं, इस दो लाइन की पैरोडी में पनीर आता है- सिक्का जद बा कुर्स ए पनीर औरंगजेब बिरादर कुश, पिदार गीर यानी औरंगजेब का सिक्का पनीर पर चला, औरंगजेब अपने भाई का हत्यारा और पिता को कैदी बनानेवाला। औरंगजेब का यह मजाक उस वक्त के ईरान के शाह अब्बास ने 1663 में बनाया था। बादशाहों के सिक्कों पर लिखे की पैरोडी बनाने वाले कई थे, कई का जिक्र हुमायूं टोंब की हेरिटेज-लिटरेचर वाक में होगा। खैर, बाप पर एक शेर सुनिये-
हमें पढ़ाओ न रिश्तों की कोई और किताब पढ़ी है बाप के चेहरे की झुर्रियाँ हम ने मेराज फ़ैज़ाबादी
पहले बड़े मदनी और अब अरशद मदनी ; दोनों ही खुलकर आसिम मुनीर की भाषा बोल रहे हैं । उन्हें सुप्रीमकोर्ट सुप्रीम नहीं लगता । वन्देमातरम बोलने वाले लोग इन मदनियों को मरी हुई कौम लगते हैं । दोनों मौलाना धर्मगुरु जिहाद का ऐलान खुले आम कर रहे हैं । उन्हें देश से नफरत है मुनीर से प्यार है । डाक्टरों के आतंकी मॉड्यूल पर सवाल खड़े करते हुए उनके लिए को वे जिहाद बताते हैं ?
ज्ञानवापी और कृष्ण जन्मभूमि की कोर्ट में सुनवाई पर उन्हें एतराज है । कहते हैं कि सरेंडर मत करो चूंकि मुर्दा कौमें ही सरेंडर किया करती हैं। अल्फलाह यूनिवर्सिटी की वकालत करते हुए अरशद मदनी कहते हैं कि जब जब जुल्म होगा तब तब जिहाद होगा । महमूद मदनी साफ साफ बता रहे हैं कि जिहाद होगा , भारत के खिलाफ जिहाद होगा । अनपढ़ भी जिहाद करेंगे , उच्च शिक्षित भी और जीवन बचाने वाले डाक्टर भी जिहाद करेंगे ।
इन बयानों का क्या मतलब है ? भारत में कानून का राज है , संविधान का राज है , शरिया का राज नहीं है मदनी बंधुओं ? जैसा कि अंसार रजा ने कहा कि भारत का मुसलमान मदनी का समर्थन नहीं करता । भारत का मुसलमान सबसे सुरक्षित है देश के विकास में योगदान दे रहा है । दरअसल बिहार में वोटबैंक बनने के बावजूद जीत न पाने से मदनी हताश हैं । आमतौर पर अरशद मदनी इतना गर्म नहीं बोलते , महमूद मदनी को गरमाई के लिए छोड़ देते हैं । लेकिन इस बार वे भड़के हुए हैं ।
देश की मुस्लिम जनता ने राम मंदिर पर कोर्ट के वर्डिक्ट का सम्मान किया । देश में कहीं से भी दंगे की खबर नहीं आई , मंदिर बन भी गया । काशी मथुरा पर भी देर सवेर राम मंदिर जैसा ही फैसला आएगा , देश की पूरी जनता को मानना ही पड़ेगा । मदनी भाईजान , देश के परिपक्व लोकतंत्र पर भरोसा रखो , जिहाद जिहाद मत चिल्लाओ । आप दोनों किसी इस्लामिक मुल्क में नहीं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हो । ये भड़काऊ जिहादी धमकियां बंद करो ?
यदि मुल्ला आसिम मुनीर आपका आदर्श है , हाफिज सईद आपका मजहब है अथवा जाकिर नाइक आपका मसीहा है तो याद रखना ? इस देश की जनता आपके साथ नहीं है , मुस्लिम समाज भी आपके अलगाव के साथ नहीं है । इस देश में लोकतंत्र का निजाम है । ये हिंदुस्तान है मेरी जाँ आपके ख्वाबों का गलीचा नहीं ।
डिजिटल द्वार पर दस्तक देती संवेदनाएँ, टूटते संबंधों की कहानियाँ और बदलते सामाजिक मानस का मार्मिक चित्र
— डॉ प्रियंका सौरभ
मेसेंजर के आभासी प्रांगण में कुछ अनाम आत्माएँ प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल ऐसे उतर आती हैं, मानो मेरे मन-लोक के द्वार उनकी प्रतीक्षा में ही सदैव खुले रहते हों। उनके संदेशों का प्रवाह इतना निरंतर, इतना अविरल होता है कि लगता है जैसे किसी सुदूर स्रोत से आशा की कोई अदृश्य नदी बहती चली आ रही हो। यह भी विचित्र है कि इन संदेशों के उत्तर की उन्हें तनिक भी चिंता नहीं—उनके शब्दों में एक ऐसी निस्सीम आशा झलकती है मानो दुनिया का ध्वंस भी उनसे उनकी जिजीविषा न छीन पाएगा।
जब कभी मैं मेसेंजर खोलती हूँ, तो भीतर कृत्रिम पुष्पों की रंग-बिरंगी पाँतें, कोमल उपमाओं की मधुमयी धाराएँ और शब्दों की शक्कर से लिपटी मिठास मेरी आँखों के समक्ष फैल जाती है। वह क्षण किसी अनजाने उत्सव-सा लगता है—एक ऐसा उत्सव, जिसे किसी ने बिना निमंत्रण दिए मेरे जीवन में बिखेर दिया हो। कभी-कभी मन यूँ ही सोच में डूब जाता है—क्या सचमुच कोई अजनबी नारी किसी अनदेखे- अनजाने व्यक्ति के हृदय में इतना सारा मृदु स्नेह, इतनी कोमल भावनाएँ और इतना अनुशासित आदर जगा सकता है?
परंतु इसी कोने में एक गहरी विडंबना भी खड़ी है—अपने निजी जीवन में तो जीवनसाथी के मुख से एक मधुर शब्द भी सुनने को नहीं मिलता। वहाँ तो केवल शिकायतों की काँटेदार झाड़ियाँ और उलाहनों की सूखी टहनियाँ ही पनपती हैं। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे विवाह नामक संस्था ने दो अधूरे मनुष्यों को एक साथ बाँधकर उनसे पूर्णता की अपेक्षा कर ली हो, जबकि भीतर दोनों ही अपूर्णताओं और अनकहे दुःखों के बोझ तले दबे हों।
फिर भी, इन अनाम स्नेहदाताओं के प्रति मेरे भीतर एक विचित्र-सा आभार जन्म लेता है। शायद यह आभार किसी अपेक्षा का नहीं, बल्कि इस भाव का है कि दुनिया में अभी भी कुछ लोग ऐसे हैं जो बिना स्वार्थ, बिना पहचान, बिना अपेक्षा—स्नेह देना जानते हैं। इस सत्य की मधुर अनुभूति ही हृदय में एक अदृश्य कृतज्ञता अंकित कर देती है। किन्तु मेरे अस्तित्व के भीतर इन अजनबियों के लिए किसी भी भाव—प्रेम, आकर्षण या खिंचाव—की कोई जगह नहीं। मेरे भीतर जो स्थान सुरक्षित है, वह वीतराग के विस्तृत आकाश की तरह रिक्त और शांत है।
मेरे परिचय-वलय में एक ऐसा व्यक्ति भी है जो दुनिया को हँसी के उत्सव बाँटता फिरता है। वह अपनी चुटीली टिप्पणियों और सहज हास्य से लोगों के चेहरे पर मुस्कान उगा देता है, लेकिन जैसे ही वह घर के मुख्यद्वार पर पहुँचता है, उसके चेहरे से हर आभा ऐसे झर जाती है, जैसे वह “गोड्डा निवाणे” की किसी कठिन और थकाऊ यात्रा से लौटकर आया हो। उसे देखते हुए मन में यह शंका बार-बार जाग उठती है—कहीं ये संदेश भेजने वाले भी भीतर से वैसे ही रिक्त तो नहीं? कहीं यह मुस्कान केवल बाहरी छलावरण तो नहीं, जो भीतर के गहरे अकेलेपन को छिपाने के लिए ओढ़ रखी गई हो?
आज मेसेंजर में उमड़ती संदेशों की बाढ़ ने मेरे भीतर सामाजिक प्रवृत्तियों की तहों तक उतर जाने की एक तीव्र इच्छा जगा दी। कुछ परिचितों के जीवन-चित्र स्मृति में कौंध गए—प्रसन्न, संघर्षरत, टूटते और फिर से सँभलते हुए। हर चित्र अपने भीतर एक कहानी लिए हुए था, और हर कहानी समाज के बदलते स्वरूप का मूक प्रमाण थी।
इन सब पर विचार करते हुए सबसे पहले मैं उन परिवारों को हृदय से नमन करना चाहती हूँ जो प्रेम, धैर्य, संयम और परस्पर सम्मान की कोमल डोर से बँधे रहते हैं। ऐसे परिवार किसी नदी की गहराई जैसे होते हैं—ऊपर भले ही शांत दिखें, लेकिन भीतर वे समाज की स्थिरता और सामूहिक संतुलन के लिए अथाह जल संजोए रखते हैं। उनकी उपस्थिति समाज में शांति, सहनशीलता और स्नेही वातावरण का आधार बनती है।
किन्तु समाज का दूसरा पक्ष भी उतना ही व्यापक और तीखा है। कुछ पुरुष और स्त्रियाँ, चालीस-पैंतालीस की सीमा में पहुँचते ही अचानक “पीड़ित-भाव” की ध्वजा उठाकर खड़े हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि वे अपनी प्रतिभा के आकाश को छू सकते थे, यदि परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों ने उनके स्वर्णिम अवसर न निगल लिए होते। यह सोच धीरे-धीरे उनके विवाह की डोर को छिन्न-भिन्न करने लगती है। मन में उभरता यह कथित “अवसर-हरण” का भाव, दाम्पत्य जीवन में कटुता का बीज बो देता है।
इसी के समानांतर कुछ पुरुष बाहर की स्त्रियों से अपने बनावटी दर्द, झूठी विवशताओं और मनगढ़ंत दुःखों की कहानियाँ साझा करते हैं। संवेदनशील स्त्रियाँ उन कहानियों को सत्य समझकर भावनात्मक रूप से उलझ जाती हैं। पुरुषों का यह छलावा उन्हें अपने ही भावों की कैद में धकेल देता है—जहाँ वे समझ नहीं पातीं कि उनका अपनापन वास्तविकता से जुड़ा है या किसी के क्षणिक मनोरंजन का साधन मात्र।
आजकल सरायों और भोजनालयों के बाहर जो नाटकीय दृश्य घटित होते हैं—अंदर पत्नी किसी ‘मित्र’ के साथ बैठी और बाहर पति क्रोध से दहकता खड़ा—वे किसी एक परिवार की नहीं, पूरे समाज की विकृत मानसकथा हैं। इन दृश्यों को देखकर लगता है कि हम एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुके हैं जहाँ “विश्वास” सबसे सस्ता और “विकार” सबसे महंगा हो गया है।
कुछ लोग घर की उलझी परिस्थितियों से भागकर हमउम्र स्त्रियों या नवयुवतियों में क्षणिक सुख ढूँढने निकल पड़ते हैं। वे इन नए आकर्षणों में डूबकर यह मानने लगते हैं कि यही वास्तविक जीवन है, यही सच्चा प्रेम, यही पूर्णता। परंतु जब वह चमक भी फीकी पड़ जाती है, तो वे फिर किसी नए आकर्षण की तलाश में निकल जाते हैं—मानो जीवन कोई मण्डी हो और प्रेम उसका सबसे सस्ता सिक्का।
घर में वही व्यक्ति कलह, कड़वाहट और अव्यवस्था की आग लेकर लौटता है। मधुरता, जो वह बाहर उदारता से बाँटता है, घर की चौखट के भीतर आते ही सूख जाती है—उसकी जगह ले लेते हैं रूखे शब्द, अस्थिर मन और थकान का बोझ।
इन सब परिस्थितियों की प्रतिक्रिया स्त्रियों में भी प्रतिशोध, प्रतिस्पर्धा और प्रतिरोध के रूप में उभरती है। वे संघर्ष में उतर आती हैं, कभी स्वयं को सिद्ध करने, कभी अपना खोया आत्मसम्मान खोजने, तो कभी केवल अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए। इसका परिणाम होता है—परिवारों का टूटना, बच्चों में दिशाहीनता, नशे की ओर झुकाव, और कम आयु में विपरीत लिंगी आकर्षण का असामान्य उभार।
बढ़ते अपराध, एकतरफा प्रेम की त्रासदियाँ, अवसाद, आत्महत्या और हिंसा—ये सब इसी टूट चुकी पारिवारिक नींव की उपज हैं। सोशल मीडिया उन घावों पर मरहम बनने की बजाय कई बार उन्हें और गहरा कर देता है।
सुख की तलाश में लोग दूसरों की सुख-शांति भी छीन ले जाते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने घरों में संवाद, प्रेम, आदर, विश्वास और धैर्य की गरिमा को पुनः स्थापित करें। तभी हम स्वस्थ, संतुलित समाज का निर्माण कर पाएँगे—ऐसा समाज जहाँ अगली पीढ़ियाँ टूटे मनों की विरासत नहीं, बल्कि स्नेह और समझ की पूँजी लेकर आगे बढ़ सकें।
यदि मेरे शब्दों से किसी संवेदनशील हृदय को पीड़ा पहुँची हो, तो मैं सहृदय क्षमा याचना करती हूँ।