यूनान में किसान सड़कों पर,भारी आंदोलन

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मध्य यूरोप के देश यूनान (Greece) में इन दिनों किसानों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहा है। इस प्रदर्शन में हजारों किसान सड़क पर निकल आए हैं और उन्होंने कृषि नीतियों, सब्सिडी में कटौती, बढ़ती लागतों, तथा सरकार की उन नीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद की है जिन्हें वे अपने भले के खिलाफ मानते हैं। किसानों की मांग है कि सरकार उनकी आय, उत्पादन लागतों, उर्वरक और बीजों की कीमतों में स्थिरता लाए, बिजली और ईंधन की बढ़ती दरों को नियंत्रित करे और कृषि उपज के दामों को बढ़ाए ताकि उनकी आमदनी सुनिश्चित हो सके।

प्रदर्शन का मुख्य केंद्र देश की राजधानी एथेंस रहा, जहाँ किसान ट्रैक्टर और ट्रॉली लेकर सड़कों पर उतरे। प्रदर्शनकारियों ने नारेबाजी की, प्लैकार्ड उठाए और सरकार के खिलाफ “हमारी खेती हमारी ज़िन्दगी” जैसे स्लोगन लगाए। कई किसान अपने खेतों की तस्वीरों और उपज के नमूनों को साथ लाए थे, यह दिखाने के लिए कि वे कितनी मेहनत करते हैं और किस मुश्किल के बीच अपना गुज़ारा कर रहे हैं।

किसानों ने बताया कि पिछले कुछ सालों में उर्वरकों, बीजों, किराये, मजदूरी और ईंधन की कीमतों में तेजी से वृद्धि हुई है। इस बीच, कृषि उत्पादों के दाम स्थिर हैं या कभी कभी गिरते भी रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी पर जोरदार असर पड़ा है। इस असंतुलन ने उन्हें बेहद असुरक्षित और कर्ज में धकेल दिया है। किसान वर्ग का यह कहना है कि सरकार की मौजूदा नीतियाँ आम किसानों के जीवन और कृषि की स्थिरता के पक्ष में नहीं है।

प्रदर्शन शांतिपूर्ण शुरुआत हुआ, लेकिन जैसे-जैसे संख्या बढ़ी, राजधानी की मुख्य सड़कों पर ट्रैक्टर और अन्य बड़े वाहन खड़े होने लगे। इससे यातायात ठप हो गया और कई इलाकों में आम लोगों को दिक्कतें होने लगीं। कई व्यापारी और स्थानीय लोग भी किसानों के समर्थन में आ गए और प्रदर्शन को सामाजिक संकट की बजाय किसानों की न्यायपूर्ण मांग का पक्ष माना।

सरकार की ओर से अभी तक कोई ठोस जवाब नहीं आया है। हालांकि कुछ प्रतिनिधि नेताओं ने किसानों से बात करने की कोशिश की है, मगर किसानों का कहना है कि बातें नहीं — ठोस कार्रवाई चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर उनकी माँगें नहीं मानी गईं, तो प्रदर्शन और अधिक व्यापक स्तर पर बढ़ाये जाएंगे, और देश भर में कृषि कार्य ठप होने की संभावना है।

विश्लेषकों के अनुसार, यह आन्दोलन सिर्फ आर्थिक मांगों तक सीमित नहीं, बल्कि यह संदेश दे रहा है कि यूरोप में भी कृषि संकट है। ऊँची लागत, अस्थिर मौसम, ऊर्जा संकट, और वैश्विक बाज़ार की चुनौतियों ने छोटे और मध्यम किसानों को बेहद असुरक्षित बना दिया है। यदि सरकार समय रहते राहत नहीं प्रदान करती, तो कृषि क्षेत्र में गिरावट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ज़्यादा दबाव की संभावना है।

प्रदर्शन की शुरुआत के दूसरे दिन, किसान नेताओं ने एक घोषणा की — वे अगले हफ्ते पूरे देश भर में एक दिन का “कृषक बंद” (farmers’ strike) करेंगे, जिसमें वे अपनी फसलें मंडियों में नहीं बेचेंगे। उनका उद्देश्य सरकार को यह दिखाना है कि कृषि देश की रीढ़ है — बिना किसानों के देश आगे नहीं बढ़ सकता।

इस प्रकार, यूनान में किसानों का यह आंदोलन अब सिर्फ एक स्थानीय समस्या नहीं रह गया, बल्कि यह पूरे यूरोपीय कृषि समुदाय के लिए एक चेतावनी है। अगर उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आने वाले महीनों में यूरोप भर में कृषि महंगाई, खाद्य संकट और ग्रामीण अस्थिरता जैसी परिस्थितियाँ और गहरा सकती हैं।

बदलती विश्व-व्यवस्था और जी-20 की चुनौती

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भू-राजनीतिक तनावों, आर्थिक अस्थिरता और नेतृत्व संकट से जूझते जी-20 में भारत का वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में उदय

जी-20 वैश्विक आर्थिक समन्वय का सबसे प्रभावी मंच है, परन्तु आज यह गहरे भू-राजनीतिक विभाजनों, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा, आर्थिक असमानताओं और नेतृत्व संकट जैसी कई चुनौतियों से घिरा है। इससे समूह की प्रासंगिकता एवं क्षमता दोनों पर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। ऐसे जटिल समय में भारत ने स्वयं को वैश्विक दक्षिण की सशक्त आवाज़ के रूप में स्थापित किया है—अफ्रीकी संघ की सदस्यता सुनिश्चित करने से लेकर समावेशी विकास, शांति-आधारित कूटनीति और दक्षिण-दक्षिण सहयोग के नए मॉडल प्रस्तुत करने तक। फिर भी वैश्विक शक्ति-संघर्ष भारत की प्रभाव क्षमता को सीमित करते हैं और जी-20 की कार्यकुशलता को प्रभावित करते हैं।

– डॉ प्रियंका सौरभ

विश्व-राजनीति वर्तमान समय में गहरे परिवर्तनों से गुजर रही है। महाशक्तियों के बीच अविश्वास, क्षेत्रीय युद्ध, आर्थिक संकट, तकनीकी वर्चस्व की होड़, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे और वैश्विक संस्थाओं में घटती प्रभावशीलता ने विश्व-व्यवस्था को अस्थिर बना दिया है। ऐसे दौर में जी-20, जो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित करने का सबसे महत्त्वपूर्ण मंच है, स्वयं को अभूतपूर्व चुनौतियों के बीच पाता है। समूह की प्रभावशीलता पर बढ़ते संदेह मात्र इसके कार्य-तंत्र से उत्पन्न नहीं हुए, बल्कि यह बदलती विश्व-स्थिति और बहुध्रुवीयता के असंतुलन का प्रत्यक्ष परिणाम है।

जी-20 की सबसे गंभीर चुनौती गहराता हुआ भू-राजनीतिक विभाजन है। यूक्रेन क्षेत्र में चल रहा युद्ध, पश्चिम एशिया की अस्थिरता, प्रशांत क्षेत्र में टकराव, बड़े देशों के बीच तकनीकी एवं आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तथा बढ़ते प्रतिबंधों ने समूह की सहमति-निर्माण क्षमता को कमजोर बनाया है। कई बार ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं कि साझा घोषणा-पत्र निकालना भी कठिन हो जाता है। उदाहरणस्वरूप, जोहान्सबर्ग बैठक में केवल अत्यंत सामान्य रूप से ‘स्थायी एवं न्यायपूर्ण शांति’ की अपील की गई, क्योंकि सदस्य देशों के दृष्टिकोण आपस में टकराते रहे। यह स्थिति दिखाती है कि वैश्विक मुद्दों पर सामूहिक स्वर तैयार करना कितना कठिन हो चुका है।

महाशक्तियों के व्यक्तिगत हित कई बार समूह के सामूहिक हितों पर भारी पड़ जाते हैं। इससे “उबंटू”—अर्थात् “मैं हूँ क्योंकि हम हैं”—जैसी साझी जिम्मेदारी की मूल भावना क्षीण होती जा रही है। कुछ प्रमुख देशों द्वारा सम्मेलन से दूरी बनाना, या महत्वपूर्ण विमर्शों में भागीदारी में अनिच्छा दिखाना, समूह की विश्वसनीयता को कमजोर करता है। इससे जी-20 उस भूमिका को नहीं निभा पाता जिसके लिए यह बनाया गया था—यानी वैश्विक समस्याओं के समाधान हेतु सामूहिक एवं समन्वित प्रयास।

इसके साथ ही आर्थिक असमानता जी-20 के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती है। विकसित और विकासशील देशों के बीच आय, तकनीक, स्वास्थ्य-सुविधाएँ, कौशल, ऊर्जा स्त्रोतों और जलवायु वित्त में बढ़ती खाई ने समूह के भीतर संतुलन को प्रभावित किया है। वैश्विक ऋण संकट, विकासशील देशों पर बढ़ता आर्थिक दबाव, मंदी का खतरा, और असमान व्यापार-संरचना मिलकर ऐसे परिदृश्य का निर्माण करते हैं जिसमें साझा नीति बनाना कठिन हो जाता है। ऐसे समय में समूह को जिस सशक्त नेतृत्व और सहयोग की आवश्यकता है, वह कई बार अनुपस्थित दिखाई देता है।

इन जटिल परिस्थितियों के बीच भारत ने जी-20 में अत्यंत सकारात्मक, समावेशी और संतुलनकारी भूमिका निभाई है। भारत ने न केवल वैश्विक दक्षिण की चिंता और अपेक्षाओं को केंद्र में रखा, बल्कि ऐसे ठोस कदम भी उठाए जिनका दीर्घकालिक प्रभाव दिखाई देता है। भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि अफ्रीकी संघ को जी-20 की स्थायी सदस्यता दिलाना रही। यह निर्णय न केवल ऐतिहासिक था, बल्कि उन विकासशील देशों की पुरानी मांग को भी पूरा करता था जिन्हें वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया में बराबरी का स्थान नहीं मिलता रहा। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत वैश्विक व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और समावेशी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

भारत ने विकासशील देशों की वास्तविक आवश्यकताओं पर आधारित कई व्यावहारिक एवं मापनीय पहलों को आगे बढ़ाया। डिजिटल सार्वजनिक संरचना का मॉडल, स्वास्थ्य-सुरक्षा व्यवस्था, कौशल विकास, ग्रामीण एवं कृषि नवाचार, मत्स्य प्रबंधन, पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण, आपदा प्रबंधन में सहयोग, और उपग्रह आँकड़ों का साझा उपयोग—ये सभी पहलें विकासशील देशों की आवश्यकताओं से सीधे जुड़ी हैं। विशेषकर “अफ्रीका कौशल वृद्धि योजना” जैसी पहलें लाखों युवाओं के लिए अवसरों का मार्ग खोलती हैं।

भारत ने वैश्विक सुरक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया, विशेषकर आतंकवाद और नशीली दवाओं के गठजोड़ को। यह विषय लंबे समय से वैश्विक विमर्श में अपेक्षित महत्व नहीं पाता रहा था। भारत ने इसके विरुद्ध कठोर और समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता पर बल दिया। इसके साथ ही न्यायपूर्ण ऊर्जा परिवर्तन, जलवायु वित्त, सतत विकास, तकनीक की समान उपलब्धता और खाद्य-सुरक्षा जैसे विषयों पर भी भारत ने विकासशील देशों की सामूहिक आवाज़ को मजबूत किया।

हालाँकि भारत की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है, फिर भी इसकी कुछ सीमाएँ स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। महाशक्तियों के बीच चल रहे तीव्र संघर्षों के बीच भारत सभी पक्षों को एकजुट नहीं कर सका। प्रमुख देशों की अनुपस्थिति को भारत रोक नहीं पाया, न ही यह सुनिश्चित कर सका कि सभी देश साझा घोषणा-पत्र में कठोर रुख अपनाएँ। आतंकवाद पर अपेक्षित कठोर निंदा का शामिल न हो पाना भारत के लिए निराशाजनक था। इसी प्रकार भारत की कई विकास सम्बन्धी पहलें सभी देशों की समान रुचि और समर्थन प्राप्त नहीं कर पाईं, क्योंकि प्रत्येक देश की प्राथमिकताएँ भिन्न होती हैं।

वैश्विक दक्षिण के भीतर भी कई बार मतभेद देखने को मिलते हैं, जिससे समग्र एजेंडा कमजोर पड़ता है। भारत की कूटनीति संतुलनकारी अवश्य है, परन्तु महाशक्तियों के कठोर और प्रतिस्पर्धी रुख के बीच इसकी प्रभाव सीमा सीमित हो जाती है।

फिर भी यह निर्विवाद है कि आज वैश्विक दक्षिण का ऐसा कोई और देश नहीं है जो भारत जैसी व्यापक, संतुलित, विश्वासयोग्य और दूरदर्शी भूमिका निभा सके। भारत ने जी-20 के मंच को नई ऊर्जा दी है, वैश्विक दक्षिण के हितों को उचित सम्मान दिलाया है, और वैश्विक शासन में समावेशिता की नई परिभाषा प्रस्तुत की है।

अंततः, जी-20 की भविष्य की सफलता उसके सदस्यों की सामूहिकता की भावना, परस्पर विश्वास, और साझा उत्तरदायित्व को पुनर्जीवित करने पर निर्भर करेगी। यदि समूह “उबंटू”—यानी साझा मानवता और साझा दायित्व—के सिद्धांत को पुनः अपनाता है, तो यह वैश्विक चुनौतियों से प्रभावी रूप से निपट सकता है। भारत ने इस दिशा में मजबूत नींव रखी है, और आने वाले समय में उसकी भूमिका और अधिक निर्णायक रूप से उभर सकती है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

तूतीकोरिन बंदरगाह पर 10.41 करोड़ रुपये की प्रतिबंधित इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट बरामद

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राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने तूतीकोरिन बंदरगाह पर 10.41 करोड़ रुपये की प्रतिबंधित इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट से जुड़े एक बड़े तस्करी रैकेट का सफलतापूर्वक भंडाफोड़ किया है। इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

डीआरआई अधिकारियों को विशिष्ट खुफिया जानकारी मिली थी कि ई-सिगरेट की तस्करी में शामिल एक गिरोह ने छतरी के साथ तूतीकोरिन बंदरगाह के माध्यम से चीन से ई-सिगरेट वाले एक कंटेनर को भारत में आयात करने की योजना बनाई है। उक्त जानकारी के आधार पर डीआरआई के अधिकारियों ने 27 नवंबर, 2025 को तूतीकोरिन में उक्त कंटेनर को रोका और उसकी जांच की।

उक्त कंटेनर की जांच के दौरान, कुछ डिब्बों में छतरियों का घोषित कार्गो पाया गया, जबकि एक बड़े हिस्से में छुपा कर रखी गई ई-सिगरेट पाई गई। सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के तहत 27 नवंबर, 2025 को 4.30 लाख रुपये मूल्य के 4,300 छतरियों के साथ छुपाई गई मिश्रित स्वादों की कुल 45,984 ई-सिगरेट मिलीं, जिनकी कुल कीमत 10.41 करोड़ रुपये है।

जी से कार्रवाई करते हुए, अधिकारियों ने खेप को ले जाने में शामिल चेन्नई के तीन व्यक्तियों को पकड़ लिया और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के तहत गिरफ्तार कर लिया।

ई-सिगरेट का आयात इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट निषेध अधिनियम, 2019 (पीईसीए अधिनियम) के साथ पठित डीजीएफटी अधिसूचना सं. 20/2015-2020 दिनांक 26 सितंबर, 2019 के तहत और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 के प्रावधानों के तहत प्रतिबंधित है।

डीआरआई देश भर में निरंतर सतर्कता और प्रवर्तन की कार्रवाइयों के माध्यम से ई-सिगरेट जैसे प्रतिबंधित और हानिकारक सामानों की तस्करी पर अंकुश लगाकर देश के आर्थिक हितों और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

एक बार नही , सात बार उजड़ी और बसी दिल वालों की दिल्ली

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 दिल्ली  दिल वालों की बताई जाती है किंतु दिल्ली के बारे में यह भी  सत्य है कि ये “सात बार उजड़ी और सात बार बसी”। बुजुर्गों की यह बात केवल एक कहावत नहीं, बल्कि इतिहास में दर्ज एक गहरी सच्चाई है। अक्सर लोग यह तो बताते हैं कि दिल्ली कई बार उजड़ी, पर यह नहीं बताते कि क्यों उजड़ी—कौन-सी राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं, कौन-से विदेशी आक्रमण, कौन-सी सत्ता संघर्ष की घटनाएँ थीं जिन्होंने इस शहर को बार-बार बर्बादी की ओर धकेला।

सबसे पुरानी दिल्ली महाभारत काल की इंद्रप्रस्थ मानी जाती है। पांडवों द्वारा बसाए गए इस नगर का पतन युद्ध और उसके बाद शासन संरचना के टूटने की वजह से हुआ। महाभारत युद्ध के बाद राजनीतिक केंद्रीकरण खत्म हुआ। आर्थिक ढांचा टूट गया और धीरे-धीरे नगर उजड़ने लगा।यह उजाड़ पूरी तरह विदेशी आक्रमण का नहीं, बल्कि भीतरू राजनीतिक विनाश का परिणाम था।

दूसरी बार दिल्ली पृथ्वीराज चौहान  की हार के बाद उजड़ा।11वीं–12वीं शताब्दी में तोमर वंश और बाद में चौहानों ने दिल्ली को मुख्य सत्ता केंद्र बनाया। पृथ्वीराज चौहान की राजधानी किला राय पिथौरा समृद्ध और शक्तिशाली शहर था। 1192 में तराइन की लड़ाई में मोहम्मद गौरी द्वारा पृथ्वीराज की हार के बाद दिल्‍ली उसके गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक के हाथ चली गई।

राजनीतिक अस्थिरता, चौहान वंश की शक्ति के टूटने और नए सुल्तान के शासन ने पुरानी दिल्ली को उजड़ने पर मजबूर किया।यह उजाड़ विदेशी आक्रमण और सत्ता हस्तांतरण का परिणाम था।

तीसरी बार शहर का उजाड़

अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोलों के लगातार हमलों से बचने के लिए सिरी नगर बसाया। यह दिल्ली का दूसरा बड़ा शाही शहर था,लेकिन खिलजी वंश के पतन के बाद यह शहर धीरे-धीरे राजनीतिक महत्व खो बैठा।दतुगलक काल में राजधानी का केंद्र बदल गया, इसलिए सिरी प्रशासन, सेना और व्यापार से खाली होने लगी। यह उजाड़ राजनीतिक केंद्र बदलने और वंश परिवर्तन का परिणाम था।

 तुगलकाबाद का उजाड़

गियासुद्दीन तुगलक ने विशाल तुगलकाबाद शहर बसाया, लेकिन उनके पुत्र मोहम्मद बिन तुगलक के काल में राजधानी को कभी दौलताबाद (महाराष्ट्र) तो कभी दिल्ली में रखने के फैसले से शहर अस्थिर हो गया।कुतुब मीनार के पास सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन औलिया से संघर्ष भी प्रसिद्ध है—“दिल्लीन अभी दूर है” का श्राप इसी काल से जोड़ा जाता है।  लोगों को बलपूर्वक राजधानी बदलने के आदेशों ने शहर को खाली करवा दिया।यह उजाड़ शासन की गलत नीतियों और अव्यवस्थित शहरीकरण का परिणाम था।

फीरोजाबाद (फिरोज शाह तुगलक की दिल्ली) का पांचवा उजाड़ फिरोज शाह तुगलक ने दिल्ली के नए हिस्से फीरोजाबाद को जगमगती राजधानी बनाया, लेकिन तुगलक वंश कमजोर होने लगा ।बंगाल, गुजरात आदि राज्य स्वतंत्र होने लगे, दिल्ली आर्थिक रूप से कमजोर पड़ गई। 1340–1400 के बीच मंगोलों और उत्तर-पश्चिम से आने वाले हमलावरों के छापों ने शहर को नुकसान पहुँचाया।सबसे बड़ा झटका 1398 में तैमूर लंग के आक्रमण ने दिया।दिल्ली में भयंकर नरसंहार हुआ और शहर लगभग वीरान हो गया। यह उजाड़ विदेशी आक्रमण + कमजोर राजनैतिक ढांचे का परिणाम था।

 छटा शेरगढ़ / दिनपनाह का उजाड़ — मुगल-अफगान संघर्ष

15वीं–16वीं सदी में मुगल और अफगान सत्ता के बीच संघर्ष बढ़ा।हुमायूँ ने “दिनपनाह” शहर बसाया, लेकिन शेरशाह सूरी ने हमला कर उसे उखाड़ फेंका।शेरशाह ने शहर के बड़े हिस्से तोड़े और अपना नया शहर “शेरगढ़” बसाया।लेकिन शेरशाह की मृत्यु के बाद अफगान शासन कमजोर हुआ और मुगलों ने फिर सत्ता हासिल की। इन लगातार संघर्षों के कारण यह क्षेत्र स्थिर शहरी केंद्र नहीं बन पाया। यह उजाड़ लगातार युद्ध और सत्ता संघर्ष का परिणाम था।

 सातवां शाहजहानाबाद का उजाड़ — मराठों, नादिरशाह, तैमूरी हमलों और ब्रिटिश शक्ति का उभार

शाहजहां ने 1648 में शाहजहानाबाद (पुरानी दिल्ली) बसाई जिसने दिल्ली को फिर से वैभव दिया।परंतु 18वीं शताब्दी में यह शहर सबसे ज्यादा उजाड़ झेलता रहा । 1739 में नादिरशाह का आक्रमण: दिल्ली में भयंकर कत्लेआम और लूट हुई। 1750–1770 के बीच अफगान अहमद शाह अब्दाली के हमले हुए।1760 के आसपास मराठों और अफगानों की लड़ाई (पानीपत) हुई।

1803 में अंग्रेजों का दिल्ली पर कब्ज़ा

1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सेना ने दिल्ली में बड़े पैमाने पर विध्वंस किया। शाहजहानाबाद का बहुत-सा हिस्सा ध्वस्त कर दिया गया और हजारों नागरिकों को शहर से बाहर निकाल दिया गया। यह उजाड़ आक्रमणों, मुगल पतन और ब्रिटिश दमन का परिणाम था।

दिल्ली का “सात बार उजड़ना” केवल पुरानी कहावत नहीं है, बल्कि यह भारत के राजनीतिक इतिहास की वास्तविक कहानी है—जहाँ सत्ता की लालसा, अंतरराष्ट्रीय आक्रमण, साम्राज्यों का उत्थान-पतन और योजनाहीन शहरीकरण ने इस शहर को बार-बार चोट पहुंचाई।हर बार दिल्ली टूटी… लेकिन हर बार नई रूप में उठ खड़ी भी हुई।इसीलिए दिल्ली को न केवल एक शहर, बल्कि जीवित इतिहास कहा जाता है।

पीएमओ कार्यालय अब सेवा तीर्थ हुआ

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केंद्र सरकार ने मंगलवार को प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम बदलकर सेवातीर्थ कर दिया। इसी के साथ केंद्रीय सचिवालय और राजभवनों के नाम बदलने का भी निर्णय हुआ है। 

प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम बदल गया है। अब पीएमओ ‘सेवा तीर्थ’ के नाम से जाना जाएगा। इसके साथ ही केंद्रीय सचिवालय के नाम में भी बदले गये है। सचिवालय का नाम कर्तव्य भवन कर दिया गया है। इन के साथ-साथ केंद्र सरकार ने देश में राज भवनों का नाम बदल कर लोक भवन करने का भी एलान किया है। इसके पहले दिल्ली में राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया गया था। वहीं प्रधानमंत्री आवास अब लोक कल्याण मार्ग कहलाता है।

इन बदलावों के बीच उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु समेत देश के आठ राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश ने अपने राजभवनों के नाम में बदलाव हुआ है। यह बदलाव गृह मंत्रालय द्वारा जारी निर्देश के बाद किया गया हैं। मंत्रालय की ओर से जारी निर्देश में पिछले साल राज्यपालों के सम्मेलन में हुई एक चर्चा का हवाला देते हुए कहा है कि राजभवन नाम औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाता है। 


राज्यों के गवर्नर और  केंद्र शासित प्रदेशों के लेफ्टिनेंट गवर्नर के मुख्यसचिव या सचिव को लिखे एक पत्र में गृह मंत्रालय ने पिछले साल हुई राज्यपालों की कॉन्फ्रेंस में दिए गए सुझाव का जिक्र किया है। जिसमें राजभवन का नाम बदलकर लोकभवन कर दिया जाए क्योंकि राजभवन शब्द से कॉलोनियलिज़्म को दर्शाता है। गृह मंत्रालय के निर्देश में कहा गया है, इसलिए यह गुजारिश की जाती है कि सभी आधिकारिक कामों के लिए राज्यपाल और लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालयों का नाम ‘लोकभवन’ और ‘लोक निवास’ रखा जाए।


गृह मंत्रालय के निर्देशों के बाद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने कार्यालयों से ‘राज’ शब्द हटाना शुरू कर दिया है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम, उत्तराखंड, ओडिशा, गुजरात और त्रिपुरा ने ‘राजभवन’ का नाम बदलकर ‘लोकभवन’ कर दिया है। लद्दाख के राज निवास का नाम बदलकर ‘लोक निवास’ कर दिया गया है। इस सूची में एक और राज्य जुड़ गया है। राजस्थान ने भी राजभवन का नाम बदलने का एलान कर दिया है। 


केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार भारत में अंग्रेजों की निशानियों को मिटाने पर काम कर रही है। इससे पहले केद्र सरकार ने राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ कर दिया था।।
 

केरल में शुरू हुआ भारत-मालदीव संयुक्त सैन्य अभ्यास

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भारतीय सेना और मालदीव राष्ट्रीय रक्षा बल (एमएनडीएफ) के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास एकुवेरिन का 14वां संस्करण आज केरल के तिरुवनंतपुरम में शुरू हुआ। यह संयुक्त सैन्य अभ्यास 2 से 15 दिसंबर, 2025 तक चलेगा। गढ़वाल राइफल्स की एक बटालियन द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए 45 कर्मियों वाली भारतीय सेना की टुकड़ी, मालदीव राष्ट्रीय रक्षा बल द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए समान क्षमता वाले मालदीव के एक दल के साथ भाग ले रही है।

धिवेही में “एकुवेरिन” का अर्थ “मित्र” होता है, जो दोनों देशों के बीच मित्रता, आपसी विश्वास और सैन्य सहयोग के गहरे बंधनों को दर्शाता है। वर्ष 2009 से दोनों देशों में बारी-बारी से आयोजित, “एकुवेरिन” अभ्यास भारत की “पड़ोसी प्रथम” नीति और मित्र देशों के साथ स्थायी रक्षा साझेदारी बनाने की उसकी प्रतिबद्धता का एक ज्वलंत उदाहरण बना हुआ है।

दो सप्ताह तक चलने वाले इस अभ्यास का उद्देश्य जंगल, अर्ध-शहरी और तटीय इलाकों में उग्रवाद-रोधी और आतंकवाद-रोधी अभियानों में अंतर-संचालन और परिचालन तालमेल को बढ़ाना है। इसमें दोनों पक्षों के सैनिक भाग लेंगे और क्षेत्र में साझा सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने की अपनी क्षमता को मज़बूत करने के लिए बेहतर अभ्यास, सामरिक अभ्यास और संयुक्त परिचालन योजना साझा करेंगे।

यह अभ्यास हिंद महासागर क्षेत्र में क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के प्रति भारत और मालदीव के बढ़ते रक्षा सहयोग और आपसी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

स्वास्थ्य मंत्री ने शीतकालीन मौसम में इन्फ्लूएंजा फैलने से रोकने की तैयारियों की समीक्षा की

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सर्दियों में फैलने वाले इन्फ्लूएंजा को रोकने के लिए की गई तैयारियों का जायज़ा लिया गया। , केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण तथा रसायन एवं उर्वरक मंत्री श्री जेपी नड्डा की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की गई। कर्तव्य भवन 1 में बैठक के दौरानवर्ष 2014-15 के दौरान मौसमी इन्फ्लूएंजा के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि को याद करते हुए, श्री नड्डा ने वर्तमान स्थिति पर अद्यतन जानकारी मांगी तथा पूछा कि क्या वर्तमान में प्रचलित वायरस के प्रकारों में ऐतिहासिक रुझानों से कोई भिन्नता है।

राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) और एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) के अधिकारियों ने मंत्री को बताया कि विश्व स्तर पर और भारत में भी इन्फ्लूएंजा की गतिविधि कम बनी हुई है। निगरानी से संकेत मिलता है कि परिसंचारी स्ट्रेन सामान्य मौसमी रूप- H3N2 और इन्फ्लूएंजा बी (विक्टोरिया) ही बने हुए हैं, जिनमें H1N1 का एक छोटा सा अनुपात है। मंत्री को लगभग वास्तविक समय निगरानी तंत्रों से भी अवगत कराया गया, जिनमें शामिल हैं: आईडीएसपी का इन्फ्लूएंजा जैसी बीमारी (आईएलआई) और गंभीर तीव्र श्वसन रोग (एसएआरआई) निगरानी नेटवर्क, मीडिया स्कैनिंग के माध्यम से एआई-संचालित घटना-आधारित निगरानी और श्वसन रोगजनकों के लिए आईसीएमआर की प्रहरी निगरानी। सभी प्रणालियाँ वर्तमान में इन्फ्लूएंजा के मामलों में असामान्य वृद्धि के कोई संकेत नहीं दिखाती हैं।

एनसीडीसी के निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) रंजन दास ने यह भी बताया कि एनसीडीसी इस महीने के अंत में इन्फ्लूएंजा पर दो दिवसीय राष्ट्रीय चिंतन शिविर आयोजित करेगा, जिसमें प्रमुख मंत्रालय, विभाग और राज्य सरकारें शामिल होंगी, ताकि इन्फ्लूएंजा की तैयारियों की व्यापक समीक्षा की जा सके और आगे की योजना बनाई जा सके।

श्री नड्डा ने सभी राज्य नोडल अधिकारियों के साथ इन्फ्लूएंजा की तैयारियों की समीक्षा करने और सभी केंद्र सरकार के अस्पतालों की तैयारी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में तैयारियों की समीक्षा अगले एक पखवाड़े के भीतर पूरी कर ली जाए। मंत्री ने इस संबंध में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक परामर्श जारी करने की भी सलाह दी और स्वास्थ्य सुविधाओं पर नियमित रूप से मॉक-ड्रिल आयोजित करने को कहा।

बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सचिव श्रीमती पुण्य सलिला श्रीवास्तव, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक (डीजीएचएस) डॉ. सुनीता शर्मा, संयुक्त सचिव (लोक स्वास्थ्य) श्रीमती वंदना जैन, राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के निदेशक प्रो. (डॉ.) रंजन दास और आपदा प्रबंधन (डीएम) प्रकोष्ठ तथा एकीकृत रोग निगरानी कार्यक्रम (आईडीएसपी) के विशेषज्ञों ने भाग लिया।

वाराणसी में केंद्र सरकार के जन कल्याण के महत्वपूर्ण कार्यों पर आधारित प्रदर्शनी का आयोजन

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वाराणसी के नमो घाट पर आज से शुरू हुए ‘काशी तमिल संगमम् 4.0’ में  केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की इकाई केंद्रीय संचार ब्यूरो, लखनऊ द्वारा काशी एवं तमिलनाडु की महान विभूतियों के जीवन दर्शन तथा केंद्र सरकार द्वारा जन कल्याण के लिए किये जा रहे महत्वपूर्ण कार्यों पर आधारित प्रदर्शनी लगाई गई है।

केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण और संसदीय मामलों के राज्यमंत्री डॉ. एल. मुरुगन ने केंद्रीय संचार ब्यूरो द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी का आज उद्घाटन किया। इसके उपरांत प्रदर्शनी को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। यह प्रदर्शनी 15 दिसंबर तक निरंतर रहेगी। 

प्रदर्शनी के पहले दिन आज उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, तमिलनाडु के राज्यपाल आर. एन. रवि, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, पुडुचेरी के उपराज्यपाल के. कैलाशनाथन, उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बृजेश पाठक  समेत अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने प्रदर्शनी का  अवलोकन किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केंद्रीय संचार ब्यूरो द्वारा आयोजित प्रदर्शनी को सराहा। मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ ने कहा इससे आम लोग काशी एवं तमिल की संस्कृतियों के साथ – साथ सरकार द्वारा जन कल्याण हेतु किये जा रहे प्रयासों से अवगत होंगे।

तमिलनाडु से आये हुए पत्रकार दल तथा काशी तमिल संगमम् की कवरेज कर रहे पत्रकारों तथा बड़ी संख्या में आम लोगों द्वारा भी प्रदर्शनी का अवलोकन किया गया।

काशी और तमिलनाडु के बीच सदियों पुराने संबंधों को और प्रगाढ़ बनाने वाले ‘काशी तमिल संगमम्’ के इस चतुर्थ संस्करण में केंद्रीय संचार ब्यूरो द्वारा लगायी गयी चित्र प्रदर्शनी में तमिलनाडु एवं काशी की महान विभूतियों के राष्ट्र निर्माण में योगदान एवं उनकी उपलब्धियां को दर्शाया गया है। चित्र प्रदर्शनी में तमिलनाडु की महान विभूतियों जैसे ऋषि अगस्त्य, तमिल महिला कवि संत अव्वैयार, तमिल कवि संत तिरुवल्लुवर, कवयित्री और संत कारैकल अम्माइयार, भक्ति आंदोलन की कवि एवं संत अंडाल (कोधाई), थिरूनावुक्कारसर, तमिल कवि और समाज सुधारक श्री रामलिंग स्वामी (वल्लालर), तमिल विद्वान यू. वी. स्वामीनाथ अय्यर,  अग्रणी समाज सुधारक, चिकित्सक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, ब्रिटिश भारत में पहली महिला विधायक डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी, गणितज्ञ श्री निवास रामानुजन, अविष्कारक और उद्योगपति जी.डी. नायडू, खगोलशास्त्री सुब्रमण्यम चंद्रशेखर, भारत में हरित क्रांति के जनक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन, भारत के पूर्व राष्ट्रपति मिसाइल मैन डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम, नोबेल पुरस्कार विजेता वेंकटरामन रामकृष्णन, स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति एवं महान दार्शनिक डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन, नोबेल पुरस्कार विजेता एवं महान वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकट रमन, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सुप्रसिद्ध राजनेता एवं भारत रत्न के. कामराज, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं सुप्रसिद्ध राजनेता चिदंबरम सुब्रमण्यम, महान अभिनेता एवं राजनेता एम. जी. रामचंद्रन इत्यादि के जीवन दर्शन को चित्रों एवं शब्दों में दर्शाया गया है।

इसी प्रकार काशी की महान विभूतियां जैसे संत कबीरदास, संत रविदास, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं शिक्षाविद पंडित मदन मोहन मालवीय, सुप्रसिद्ध शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान, विश्व प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीतकार पंडित रविशंकर, महान साहित्यकार जयशंकर प्रसाद इत्यादि के जीवन दर्शन को चित्रों शब्दों के माध्यम से दर्शाया गया है। 

चित्र प्रदर्शनी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में किये जा रहे सरकार के जन कल्याणकारी नीतियों, प्रयासों एवं योजनाओं को भी दर्शाया गया है। इसमें केंद्र सरकार द्वारा हाल में श्रम सुधार के लिए बनाये गये कानूनों, विभिन्न वस्तुओं एवं सेवाओं पर जीएसटी के दरों को कम करने के लिये किए गये प्रयासों की जानकारी दर्शकों और जनसामान्य के लिए प्रदर्शित की गई है।

इमरान खान जिंदा, जेल में उनकी बहन उजमा ने मुलाकात की

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 पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान से मंगलवार को उनकी बहन उजमा ने अदियाला जेल में मुलाकात की है। मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए उजमा खान ने कहा कि, इमरान खान का स्वास्थ्य ठीक है, लेकिन उन्हें जेल में परेशान किया जा रहा है। उन्हें पूरे दिन जेल में बंद रखा जाता है। इमरान खान इस जेल में 2023 से कई मामले के आरोप में बंद है। हाल ही उनके मौत की अफवाहें सामने आई थीं। पाकिस्तान सरकार ने मंगलवार को इमरान खान की बहन को जेल में उनसे मिलने की इजाजत दे दी। । 

पिछले एक महीने से उनसे किसी को मिलने की इजाजत नहीं दी गई थी। लंबे समय से इमरान खान से उनके परिजनों को पाकिस्तान सरकार मिलने नहीं दे रही थी। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के प्रमुख से उनके परिवारवालों के लगातार मिलने से मना करने के कारण सोशल मीडिया पर यह अटकलें लगाई जा रही थीं कि वह जिंदा हैं या मर गए। हालांकि अदियाला जेल अधिकारियों ने दावा किया कि उनकी सेहत अच्छी है।


वहीं दूसरी ओर पीटीआई ने एक बयान में कहा कि इमरान खान की एक बहन डॉ. उजमा खान को उनसे मिलने की इजाजत दी गई, लेकिन देखते हैं कि सरकार अपना वादा पूरा करती है या नहीं। इस बीच, पंजाब सरकार ने पीटीआई के विरोध को रोकने के लिए अदियाला रोड पर पूरी रावलपिंडी पुलिस फोर्स तैनात कर दी। सरकार ने पहले ही रावलपिंडी और इस्लामाबाद में धारा 144 लगा दी है। रावलपिंडी के आठ पुलिस स्टेशनों के स्टेशन हाउस ऑफिसर और सीनियर अधिकारी अदियाला जेल के बाहर मौजूद हैं।

दूसरे दिन भी हंगामेदार रही संसद की कार्रवाई

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आज दूसरे दिन भी लोकसभा और राज्यसभा में हंगामेदार होता रहा। क्य विपक्ष ने चल रहे मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण(SIR) — पर तुरंत चर्चा कराने की मांग की। यह संसद के शीतकालीन सत्र के दूसरे दिन की शुरुआत थी, लेकिन SIR को लेकर विरोध-प्रदर्शन व नारेबाजी के कारण दोनों ही सदनों में व्यवधान आया।

लोकसभा में सुबह जैसे ही बैठक शुरू हुई, विपक्ष ने SIR के मुद्दे को प्राथमिकता देने की मांग रखते हुए वेल में आकर नारे लगाने शुरू कर दिए। इस बीच, कुछ सांसदों ने सदन के बीच में जाकर हंगामा किया, जिसके कारण कार्यवाही को दो बार स्थगित करना पड़ा — पहले 12 बजे तक, फिर दोपहर 2 बजे तक।

विपक्ष का कहना रहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया लोकतंत्र की नींव से जुड़ा अहम मसला है, जिसे पीछे नहीं छोड़ा जा सकता। उन्होंने कहा कि जब तक इस पर बात नहीं होगी, संसद का बाकी काम नहीं चलेगा। दूसरी ओर सरकार और उसके समर्थक दलों ने कहा कि संसद सिर्फ एक ही विषय पर नहीं टिक सकती — देश के विकास और अन्य अहम विधेयकों पर भी काम होना चाहिए।

इस विरोध-प्रदर्शन के बीच, प्रशासनिक पहल भी हुई — बैठक के बाद लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में सभी दलों के फ्लोर लीडर्स की मीटिंग बुलाई गई। ताकि सदन की कार्रवाई व लंबित एजेंडा को आगे कैसे बढ़ाया जाए, इस पर समझौता हो सके। इस चर्चा के अनुसार तय हुआ कि SIR व अन्य चुनाव सुधारों पर बहस पहले होनी चाहिए, लेकिन इसे तुरंत नहीं बल्कि 9–10 दिसंबर को आयोजित किया जाएगा। इसके पहले, 8 दिसंबर को 150 साल पूरे होने पर राष्ट्रीय गान और राष्ट्रगीत Vande Mataram पर चर्चा होगी।

वहीं, राज्‍यसभा में भी प्रदर्शन जारी रहा। सुबह बैठक शुरू होते ही विपक्ष ने SIR के खिलाफ जोरदार नारेबाज़ी की, और मांग की कि चुनाव सुधारों पर तुरंत चर्चा हो। कारण यही था कि SIR पर चर्चा न होने से लोकतंत्र की मूल प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। सभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी गई, और बाद में सभापति ने इसे अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दिया।

हालाँकि, सरकार की ओर से कहा गया कि चुनाव सुधारों पर चर्चा की तैयारी है, लेकिन इसे बिना समयसीमा तय किए नहीं किया जा सकता। मंत्रियों ने नारेबाज़ी की बजाय संसद की कार्यवाही सुचारु बनाने व अन्य कानून-विधेयकों पर काम करने की अपील की।

इस तरह, आज संसद का दूसरा दिन अधिकांश समय गतिरोध में गुज़रा। SIR और चुनाव सुधारों को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बरकरार रहा। हालांकि आगे के लिए बहस की रूपरेखा तय हो चुकी है — Vande Mataram पर पहले दिन बहस, उसके बाद 9–10 दिसंबर को चुनाव सुधारों पर विस्तृत चर्चा — पर फिलहाल सदन ने किसी अहम बिल को अंतिम रूप नहीं दिया। संसद की कार्यवाही अगले दिन फिर शुरू होगी।

संसद में ऐसा माहौल देख कर यह स्पष्ट है कि शीतकालीन सत्र — जो अन्य अहम विधेयकों पास कराने के लिए बुलाया गया है — सफल हो सकेगा या नहीं, यह काफी हद तक विपक्ष और सरकार के बीच आज हुए मत-भेद और आगे की रणनीति पर निर्भर करता है।