भारतीय नौसेना का तिरुवनंतपुरम के शंगुमुघम समुद्र तट पर नौसेना दिवस 2025 के अवसर पर समुद्री शक्ति का परिचालन प्रदर्शन

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भारतीय नौसेना ने 3 दिसंबर 2025 को तिरुवनंतपुरम के शंगुमुघम समुद्र तट पर एक शानदार ‘परिचालन प्रदर्शन’ के माध्यम से अपनी परिचालन क्षमता और समुद्री क्षमताओं का प्रदर्शन किया। इस विशाल आयोजन ने नौसेना की दुर्जेय युद्ध क्षमताओं, प्रौद्योगिकी उत्कृष्टता और परिचालन तत्परता को जीवंत किया, साथ ही देश की बढ़ती समुद्री शक्ति और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाया। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का स्वागत नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी ने किया। आगमन पर मुख्य अतिथि को 150 जवानों द्वारा औपचारिक गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया।

केरल के राज्यपाल श्री राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर तथा केरल के मुख्यमंत्री श्री पिनाराई विजयन सहित अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों, वरिष्ठ केंद्रीय एवं राज्य के सरकारीअधिकाररियों, सैन्य अधिकारियों और बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिकों ने इस कार्यक्रम को देखा।

इस ऑपरेशन डेमो में अग्रिम पंक्ति के प्लेटफार्मों द्वारा समन्वित युद्धाभ्यास का एक रोमांचक प्रदर्शन किया गया, जो नौसेना की समुद्री क्षेत्र में शक्ति और सटीकता प्रदान करने की क्षमता का प्रतीक था। स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत सहित बीस से अधिक नौसैनिक जहाजों और पनडुब्बियों ने एयर असेट्स और इलीट मरीन कमांडो (एमएआरसीओएस) के साथ नौसेना की ताकत और परिचालन उत्कृष्टता का शानदार प्रदर्शन किया।

इसके अतिरिक्त, सी कैडेट कोर द्वारा हॉर्नपाइप नृत्य, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नौसैनिक कर्मियों द्वारा तेजी से किए गए क्रमबद्ध ड्रिल ‘कंटीन्यूटी ड्रिल्स’ ने भी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस कार्यक्रम का समापन भारतीय नौसेना बैंड द्वारा बीटिंग रिट्रीट और नौसेना के जहाजों की रोशनी के साथ पारंपरिक सूर्यास्त समारोह के साथ हुआ।

नौसेना दिवस भारतीय इतिहास के पन्नों में एक महत्वपूर्ण दिन है, जो 1971 के युद्ध के दौरान ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ में भारतीय नौसेना की निर्णायक भूमिका का स्मरण कराता है । दशकों से भारतीय नौसेना लगातार मजबूत हुई है और देश के समुद्री हितों के लिए उभरती चुनौतियों का सामना करने के लिए निरंतर विकसित होते हुए दृढ़ और मजबूत बनी हुई है। इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए आत्मनिर्भर भारत के मार्गदर्शक विजन के तहत भारतीय नौसेना अपने तेज आधुनिकीकरण की दिशा में बढ़ रही है और एक ‘खरीददार नौसेना’ से एक ‘निर्माता नौसेना’ में पूरी तरह परिवर्तित हो गई है।

ऑप डेमो 2025 ने नौसेना की समुद्री उत्कृष्टता और एक विश्वसनीय बल के रूप में इसकी अटल भूमिका को रेखांकित किया, जो महासागरों में विश्वास प्रेरित करता है, साझेदारी बनाता है और सामूहिक सुरक्षा को बरकरार रखता है। यह एक ऐसी भूमिका है, जो एमएएचएसएजीएआर (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए आपसी और समग्र उन्नति) के विजन पर आधारित एक स्वतंत्र, खुली और नियम आधारित समुद्री व्यवस्था के प्रति भारत की प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ मेंटेनेंस कमांड ने बेस रिपेयर डिपो तुगलकाबाद का दौरा किया

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एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, मेंटेनेंस कमांड, एयर मार्शल यल्ला उमेश, ने आज 04 दिसंबर 2025 को बेस रिपेयर डिपो, तुगलकाबाद का दौरा किया। उनके साथ क्षेत्रीय वायु सेना परिवार कल्याण संघ की अध्यक्ष श्रीमती श्रीवल्ली भी थीं। वायु सेना स्टेशन तुगलकाबाद के एयर ऑफिसर कमांडिंग, एयर कमोडोर डीएन साहू और एएफएफडब्ल्यूए की स्थानीय अध्यक्ष श्रीमती प्रीति साहू ने उनका स्वागत किया।

एयर मार्शल को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया। इसके उपरांत उन्हें डिपो के कामकाज, नवोन्मेष, उपलब्धियों और जारी पहल से अवगत कराया गया। एयर मार्शल यल्ला उमेश ने विभिन्न अनुभागों में पहुंचकर परियोजनाओं की समीक्षा की और परिचालन आवश्यकता अनुरूप स्वदेशीकरण और नवीन समाधानों के डिपो के प्रयासों की सराहना की।

स्टेशन कर्मियों के साथ संवाद में एयर मार्शल ने आयात पर निर्भरता कम करने और स्वदेशी क्षमता सुदृढ़ कर आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ने के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने क्षेत्रीय इकाइयों को उन्नत तकनीकी और परिचालन सहायता सुनिश्चित करने में सभी कर्मियों की भागीदारी, समर्पण और पेशेवर रुख की सराहना की।

एयर मार्शल यल्ला उमेश ने तकनीकी कौशल और बेहतर बनाने, सभी भूमिकाओं में दक्षता और उत्कृष्टता के लिए प्रयास जारी रखने की आवश्यकता भी रेखांकित की। एयर मार्शल ने सभी वायु योद्धाओं से शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ और चुस्त रहने का आह्वान किया ताकि परिचालन तत्परता और उभरती सुरक्षा चुनौतियों के प्रति सजगता बनी रहे।

योजनाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध, पारदर्शी और किसान-केंद्रित हो- केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह

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केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने निर्देश दिया कि योजनाओं का क्रियान्वयन समयबद्ध, पारदर्शी और किसान-केंद्रित हो तथा किसानों को सब्सिडी भी समय पर दी जाएं, इस संबंध में कोई शिकायत नहीं आनी चाहिए। साथ ही, श्री शिवराज सिंह ने किसानों के हित में, जल्दी खराब होने वाले बागवानी उत्पादों के संबंध में विशेष रणनीति बनाने पर जोर दिया, ताकि इनकी सेल्फ लाइफ बढ़े, किसानों को नुकसान नहीं हो और नुकसान से बचने के लिए अवेयरनेस प्रोग्राम भी चलाए जाएं।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में आज कृषि भवन, नई दिल्ली में राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) के निदेशक मंडल की 33वीं बैठक आयोजित हुई। बैठक में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर भी उपस्थित थे।

एनएचबी की भूमिका सुदृढ़ करने के लिए मार्गदर्शन- बैठक के दौरान केंद्रीय मंत्री चौहान ने बागवानी क्षेत्र की उत्पादकता, गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने हेतु कई रणनीतिक सुझाव दिए। उन्होंने गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री, फसलोत्तर प्रबंधन, उत्पादकता वृद्धि पर विशेष ध्यान देने को कहा। श्री शिवराज सिंह ने कहा कि पूरे समन्वय के साथ किसानों को बाजार, कोल्ड-चेन नेटवर्क और मूल्य संवर्धन के अवसरों से जोड़ने वाली व्यवस्था को सुदृढ़ करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि किसानों के फायदे के लिए एनएचबी राज्यवार, क्षेत्रवार रोडमैप बनाकर पूरी ताकत से श्रेष्ठ कार्य करें।

तकनीकी प्रकाशनों का विमोचन- केंद्रीय मंत्री श शिवराज सिंह ने राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड द्वारा तैयार गुड एग्रीकल्चर प्रैक्टिस, जैविक खेती मॉडल और उन्नत बागवानी तकनीकों पर आधारित तकनीकी प्रकाशनों का विमोचन किया। ये संसाधन किसानों, उद्यमियों व कृषि विशेषज्ञों के लिए एक उपयोगी संदर्भ सामग्री सिद्ध होंगे। बैठक में केंद्रीय कृषि सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी, आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. मांगीलाल जाट सहित कृषि, विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, बागवानी उद्योग से जुड़े गैर-आधिकारिक सदस्य उपस्थित रहे। इस व्यापक प्रतिनिधित्व से बैठक में क्षेत्रीय दृष्टिकोण व सहभागी संवाद को बल मिला। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त संगठन है, जो देशभर में वाणिज्यिक बागवानी और कोल्ड-चेन अवसंरचना के सुदृढ़ विकास के लिए कार्यरत है।

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काशी तमिल संगमम् 4.0 के द्वितीय समूह ने काशी विश्वनाथ मंदिर में किया दर्शन पूजन 

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काशी तमिल संगमम् 4.0 के द्वितीय समूह के आगमन पर काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिकारियों ने परंपरागत गरिमा के साथ सभी अतिथियों का स्वागत किया। मंदिर प्रशासन द्वारा पुष्प वर्षा और डमरू वादन की ध्वनि के बीच सम्पूर्ण समूह का स्वागत किया गया जिससे  सभी सदस्यों ने काशी की समृद्ध आध्यात्मिक धारा का अनुभव किया। 

स्वागत के उपरांत  सदस्यों ने बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए और दर्शन के पश्चात मंदिर प्रशासन द्वारा समूह को काशी विश्वनाथ धाम के भव्य कॉरिडोर का विस्तृत भ्रमण करवाया गया। भ्रमण के दौरान सभी ने धाम के ऐतिहासिक स्वरूप, स्थापत्य कला, नवनिर्मित सुविधाओं और निरंतर बढ़ती श्रद्धा-धारा के बारे में जानकारी प्राप्त की।

भ्रमण पूर्ण होने पर सभी अतिथियों के लिए मंदिर द्वारा संचालित अन्नक्षेत्र में दोपहर के भोजन की व्यवस्था की गई। अन्नक्षेत्र में परोसे गए प्रसाद ने सभी को काशी की सेवा-परंपरा और अतिथि-भावना का गहरा अनुभव कराया।

काशी तमिल संगमम् 4.0 में दक्षिण भारत से आने वाले आगंतुकों का सिलसिला जारी है। बुधवार की देर रात दूसरा दल विशेष ट्रेन से बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचा जिसमें बड़ी संख्या में अध्यापक (टीचर्स डेलिगेशन) शामिल थे। स्टेशन पर उतरते ही मेहमानों का पारंपरिक तरीके से डमरू वादन,पुष्प वर्षा और ‘हर-हर महादेव’ तथा ‘वणक्कम काशी’ के उदघोष से भव्य स्वागत किया गया।

स्वागत समारोह में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ तथा वाराणसी के मेयर अशोक तिवारी स्वयं उपस्थित रहे। दोनों ने मेहमानों को काशी की सांस्कृतिक आत्मीयता और तमिल-काशी के ऐतिहासिक संबंधों की जानकारी देते हुए उनका अभिनंदन किया।

स्टेशन पर पारंपरिक स्वागत देखकर तमिल दल के सदस्यों में खासा उत्साह देखने को मिला। कई लोगों ने कहा कि काशी में मिल रही गर्मजोशी और आध्यात्मिक वातावरण उनके लिए अविस्मरणीय है। डमरू वादन की ध्वनि से पूरा परिसर शिवमय हो गया और काशी व तमिलनाडु की सांस्कृतिक एकता की झलक साफ दिखाई दी।

कार्यक्रम के तय शेड्यूल के अनुसार, तमिलनाडु से आए यह डेलिगेट्स आज श्री काशी विश्वनाथ धाम में दर्शन–पूजन करेंगे। इसके बाद वे गंगा तट, घाटों, तथा शहर के प्रमुख सांस्कृतिक और शैक्षिक स्थलों का भ्रमण भी करेंगे। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि अतिथियों को काशी की समृद्ध विरासत, कला, संस्कृति और अध्यात्म से परिचित कराने के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार किए गए हैं।

धर्म बदलकर SC/ST लाभ हड़पने वालों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का करारा प्रहार: अब संविधान से खिलवाड़ नहीं

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐसा फैसला सुनाया है। जिसने पूरे उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश में हलचल मचा दी है। कोर्ट ने साफ और दो-टूक शब्दों में कहा कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म को छोड़कर किसी अन्य धर्म में जाने वाले व्यक्ति को SC/ST का लाभ लेने का कोई अधिकार नहीं है। जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की एकल पीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि धर्म परिवर्तन के बावजूद अनुसूचित जाति का लाभ लेना केवल बेईमानी ही नहीं, बल्कि संविधान के साथ सीधा विश्वासघात है। यह टिप्पणी उन लाखों फर्जी लाभार्थियों पर करारा तमाचा है। जिन्होंने वर्षों से धर्म और पहचान की आड़ में सरकारी योजनाओं को लूटने का काम किया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को चार महीने की सख्त समय सीमा देकर निर्देश दिया है कि वे ऐसे सभी लोगों की पहचान करें, जो हिंदू धर्म छोड़ चुके हैं, लेकिन SC/ST के लाभ उठा रहे हैं। यह आदेश किसी सलाह या अपील की तरह नहीं, बल्कि अब बस बहुत हुआ जैसी सख्त चेतावनी है। जिला प्रशासन को पहली बार इस तरह का स्पष्ट निर्देश मिला है कि वे इस वर्ग की पूरी छानबीन कर कार्रवाई करें। यह कदम उन असली दलितों की जीत के रूप में देखा जा रहा है जो वर्षों से देखते थे कि उनकी सीटें, उनका हक, उनकी स्कॉलर्शिप और उनकी नौकरियां उन लोगों द्वारा हड़पी जा रही थीं। जिनका न तो सामाजिक उत्पीड़न से संबंध था और न ही जाति व्यवस्था से। इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ने वाला है जो धर्म परिवर्तन करने के बाद भी SC प्रमाण पत्रों का गलत इस्तेमाल करते रहे। कोर्ट का कहना है कि SC/ST व्यवस्था केवल हिंदू सामाजिक संरचना के कारण अस्तित्व में आई थी। जातियों का ढांचा, सामाजिक दमन, भेदभाव और ऐतिहासिक उत्पीड़न..इन सबकी नींव हिंदू समाज में थी न कि उन धर्मों में जहाँ जाति का कोई आधिकारिक ढांचा ही नहीं। ऐसे में धर्म बदल चुके लोगों का अनुसूचित जाति के लाभ लेना किसी भी दृष्टिकोण से न्यायसंगत नहीं है। इस फैसले ने यह भी साफ कर दिया कि वे लोग जो स्वयं को ‘दलित’ तो बताते थे मगर ‘हिंदू’ नहीं मानते थे। अब कानून की नजर में दो टूक साफ कर दिया गया है कि दलित पहचान हिंदू सामाजिक संरचना से ही जुड़ी है। जिसे उस संरचना से बाहर जाना है उसे उसके लाभ-सुविधाएं भी छोड़नी होंगी। यह कथन उन राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों के लिए बड़ा झटका है जो दलित पहचान को धार्मिक पहचान से अलग करने की कोशिश करते रहे हैं। हालांकि इस फैसले से एक बहस भी जन्म लेगी। कुछ लोग इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर दबाव बताएंगे और तर्क देंगे कि भेदभाव धर्म बदलने के बाद भी जारी रहता है। परन्तु सवाल यह है कि यदि कोई व्यक्ति उस समाज से निकल चुका है जिसने भेदभाव किया तो वह उसी समाज से मिलने वाले लाभ को किस तर्क से जारी रखेगा। यही कोर्ट का सवाल है और इसका जवाब ढूंढना आसान नहीं। राजनीतिक हलकों में भी यह फैसला बड़ा मुद्दा बनेगा। विपक्ष इसे धार्मिक ध्रुवीकरण का प्रयास बताएगा। जबकि समर्थक इसे सामाजिक न्याय का सबसे सख्त कदम कहेंगे। पर एक बात तय है कि यह फैसला लाभ की राजनीति करने वालों की सुविधाजनक जमीन हिला चुका है। आने वाले महीनों में बड़ी संख्या में ऐसे फर्जी लाभार्थी चिन्हित होंगे जिन्होंने धर्म बदलकर भी SC/ST के नाम पर सरकारी खजाना खाली कराया है। फैसले का वास्तविक लाभ असली दलित समाज को मिलेगा। जो सदियों के दर्द, बेबसी, गरीबी और भेदभाव के कारण समान अवसरों से वंचित रहे, अब उनके हक पर कोई और कब्जा नहीं करेगा। कोर्ट का यह कदम न सिर्फ नीति-निर्माण की दिशा बदलेगा, बल्कि उन लोगों के लिए भी चेतावनी है जो जाति-धर्म को अपनी सहूलियत के हिसाब से बदलकर सरकारी लाभ की खेती करते रहे हैं। कुल मिलाकर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला केवल एक आदेश नहीं, बल्कि एक सामाजिक घोषणा है कि SC/ST का लाभ उसी को मिलेगा जो वास्तव में इस पीड़ा और सामाजिक संरचना का हिस्सा था। धर्म बदलकर दो नावों में सवारी अब संभव नहीं।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक

गरीबों का अनाज बना ग्लोबल सुपरफूड

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बाल मुकुन्द ओझा

देश और दुनिया में मोटे अनाज की मांग बढ़ रही है। अब यह केवल गरीब की थाली तक सीमित नहीं रहा है अपितु फाइव स्टार होटलों में भी पहुँच गया है। आज देश-दुनिया के लोग मोटे अनाज की खूबियों का बेबाकी से बखान कर रहे हैं। हमारी सेहत और खानपान को लेकर दुनियाभर में चिंता व्याप्त हो रही है। एक मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक हम सभी की आधी से ज्यादा बीमारियों की वजह हमारा गलत खानपान है। इसी के साथ बिगड़ी सेहत को सुधारने के लिए मोटा अनाज या श्री अन्न एक बार फिर चर्चा में आ गया है। वैज्ञानिकों का मानना है मोटे अनाज के सेवन से शरीर में अनेक बीमारियां दूर हो जाती है मोटा अनाज डायबिटीज को रोकता है कोलेस्ट्रॉल और कैंसर की रोकथाम करता है। हार्ट अटैक से रक्षा करता है। मोटा अनाज पाचन तंत्र को मजबूत करता है और मोटापे को घटाता है। अनेक औषधीय फायदों के कारण इसे सेहत का खजाना कहा गया है।

प्रगति और विकास के साथ न केवल हमारी जीवनशैली बदली अपितु हमारा खान-पान भी पूरी तरह से बदल गया। चार पांच दशक पहले मोटा अनाज हमारे आहार का मुख्य घटक था । जिन अनाज को हमारी कई पीढ़ियां खाती आ रही थीं, उनसे हमने मुंह मोड़ लिया। वह भी एक समय था जब लोग हाथ चक्की में पीसे मोटे अनाज का सेवन कर स्वस्थ रहते थे। मोटे अनाज के एक नहीं अनेक फायदे है। पौष्टिक तत्वों की भरमार होने से अनेक बीमारियां दूर भागती  थी। अब एक बार फिर देश का ध्यान मोटे अनाज की ओर गया है। यह अनाज देश में बहुतायत से उत्पन्न होता है।

हमारे देश में आज भी घर घर में लोग गेहूं के साथ मक्के, बाजरा और चंने की रोटी पसंद करते हैं। सर्दी हो या गर्मी लोग इसे बड़े ही चाव के साथ न केवल खाते है अपितु मेहमानों की परोसगारी भी करते है। इसे मोटा अनाज कहा जाता है, जिसमें ज्वार, बाजरा, रागी, सावां, कंगनी, चीना, कोदो, कुटकी और कुट्टू शामिल है। सर्दी के दिनों में ठंड से शरीर को बचाने के लिए ज्वार और बाजरा खाने की सलाह भी दी जाती है। गेहूं और चावल की तुलना में मोटे अनाज में मिनरल, विटामिन, एंजाइम और इन सॉल्युबल फाइबर भी ज्यादा मात्रा में पाया जाता है। मोटे अनाज को खाने से शरीर में कई पोषक तत्वों की पूर्ति होती है साथ ही यह कुपोषण से भी बचाव करेगा। मोटे अनाजों में बीटा-कैरोटीन, नाइयासिन, विटामिन-बी6, फोलिक एसिड, पोटेशियम, मैग्नीशियम, जस्ता आदि खनिज लवण भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में पैदा होने वाले मोटे अनाज में 41 प्रतिशत तक भारत में पैदा होता है। देश में सर्वाधिक बाजरा उत्पादन करने वाले राज्य राजस्थान सहित अनेक प्रदेशों में मोटे अनाज की महत्ता, उपयोगिता और पोषण गुणवत्ता को लेकर कार्यशालाएं आयोजित की जा रही है जिनके माध्यम से किसानों और आम नागरिकों में जागरूकता पैदा की जा रही है। राजस्थान का बाजरे के उत्पादन और क्षेत्रफल दोनों दृष्टि से देश में प्रथम स्थान है। देश में बाजरा क्षेत्रफल में राजस्थान का हिस्सा 57.10 प्रतिशत है वहीं उत्पादन में 41.71 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। इसी तरह राष्ट्र में ज्वार के क्षेत्रफल और उत्पादन में राज्य का तीसरा स्थान है।  

कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक भविष्य मोटे अनाजों का है। मोटे अनाज के क्षेत्र में किसानों एवं कृषि उद्यमिता की अपार संभावनाएं हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए इनकी उपयोगिता जगजाहिर है। गेहूं, चावल के मुकाबले मोटा अनाज उगाना और खाना ज्यादा सुविधाजनक है। मोटे अनाज में पोषण भी अधिक होता है, जिससे शरीर मजबूत होता है और बीमारियों से लड़ने की शक्ति मिलती है। मोटे अनाजों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ प्रसंस्करण गतिविधियों के जरिए उद्यमिता को भी बढ़ावा दिया जाए। इससे रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। भारत सरकार ने बजट में ऐलान किया कि बाजरा, कोदो, सांवा जैसे मोटे अनाज को बढ़ावे देने के लिए श्रीअन्न योजना शुरू की जाएगी। भारत मिलेट्स को लोकप्रिय बनाने के काम में सबसे आगे है, जिसकी खपत से पोषण, खाद्य सुरक्षा और किसानों के कल्‍याण को बढ़ावा मिलता है। भारत विश्‍व में श्रीअन्न का सबसे बड़ा उत्‍पादक और दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। भारत में कई प्रकार के श्रीअन्‍न की खेती होती है जिसमें ज्‍वार, रागी, बाजरा, कुट्टु, रामदाना, कंगनी, कुटकी, कोदो, चीना और सामा शामिल हैं। मोटे अनाज को सुपर फूड भी कहा जाता है। मोटे अनाज में  बाजरे की रोटी, दलिया, बिस्कुट,  पकौडी , लड्डू  के साथ ही मकई की रोटी व घट्ठा, कोदो का भात, मिक्स अनाज का पापड़, ज्वार की खिचड़ी, चव्यनप्राश, बिस्कुट, बेकरी उत्पाद जैसे व्यंजन बनाये जा सकते है।

बाल मुकुन्द ओझा

डी 32, मॉडल टाउन, जगतपुरा रोड

जयपुर [ राजस्थान ]

मायावती छह की नोयडा रैली में भाग नही लेंगी

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बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आगामी छह दिसंबर को नोएडा में प्रस्तावित रैली को संबोधित नही करेंगी। संविधान के रचयिता डॉ. भीमराव आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर नोएडा में ये रैली प्रस्तावित थी। वह अपने आवास पर ही डॉ. आंबेडकर को श्रद्धासुमन अर्पित करेंगी।

 बसपा सुप्रीमो का कहना है कि अपनी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों को होने वाली असुविधा की वजह से यह फैसला लिया है। बसपा सुप्रीमो ने जारी अपने बयान में कहा कि महापुरुषों की जयंती व पुण्यतिथि के मौकों पर बहुजन समाज के संतों, गुरुओं व महापुरुषों स्मारक स्थलों पर भीड़ उमड़ती है। इस दौरान मेरा अनुभव रहा है कि मेरे जाने पर मेरी सुरक्षा प्रबंध के नाम पर जो सरकारी व्यवस्था की जाती है, जो जरूरी भी है, उससे लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। 

उन्होंने कहा कि डाॅ. आंबेडकर की पुण्यतिथि पर पार्टी के लोग व उनके अनुयायी लखनऊ के डाॅ. भीमराव आंबेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल पर तथा पश्चिमी यूपी, दिल्ली व उत्तराखंड के लोग नोएडा में स्थित राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल पर अपने परिवार सहित पहुंचकर श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।

भारतीय सिने इतिहास के अमर सितारे हैं देव आनंद

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फिल्म अभिनेता देव आनंद भारतीय सिनेमा की उस पीढ़ी के कलाकार थे जिन्होंने न केवल अभिनय की नई शैली गढ़ी, बल्कि पूरी फिल्मी दुनिया को एक नई ऊर्जा, नई दृष्टि और नए आत्मविश्वास से भर दिया। उनका जीवन संघर्ष, समर्पण और निरंतर रचनात्मक सक्रियता का अद्भुत उदाहरण था। देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर जिले में हुआ। उनका वास्तविक नाम धर्म देव पिशोरीमल आनंद था। एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म लेने वाले देव आनंद ने प्रारंभिक शिक्षा के बाद लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया। युवावस्था में ही उन्हें साहित्य, कला और नाटक का आकर्षण था, जिसने आगे चलकर उन्हें मुंबई की फिल्मी दुनिया में कदम रखने की प्रेरणा दी।

मुंबई आना उनके लिए आसान नहीं था। जेब में बहुत कम पैसे और दिल में सपनों का विशाल आसमान लिए देव आनंद ने 1940 के दशक में मायानगरी की ओर रुख किया। शुरुआती दिनों में उन्होंने क्लर्क की नौकरी भी की, लेकिन फिल्मों में काम करने का जुनून उन्हें लगातार आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा। उनका संघर्ष अंततः रंग लाया जब 1946 में उन्हें फिल्म हम एक हैं में पहली बार अभिनय करने का अवसर मिला। यही से एक कलाकार के रूप में देव आनंद की लंबी और सफल यात्रा शुरू हुई। उनकी साफ दृष्टि, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान और संवाद बोलने की अनूठी शैली ने जल्दी ही दर्शकों का दिल जीत लिया।

1950 और 1960 का दशक देव आनंद के करियर का स्वर्णिम काल माना जाता है। इस अवधि में उन्होंने बाजी, जाल, सीआईडी, काला पानी, हम दोनों, गाइड और ज्वेल थीफ जैसी यादगार फिल्मों में अभिनय किया। उनकी फिल्मों के चरित्र युवा जोश, रोमांस, नैतिक द्वंद्व और सामाजिक सरोकारों को बखूबी प्रस्तुत करते थे। रोमांटिक हीरो के रूप में उनकी छवि ने उन्हें युवाओं का प्रतीक बना दिया। उनकी तेज चाल, हाथों की लयात्मक हरकतें और संवादों का खास अंदाज़ एक ऐसी पहचान बन गई जिसे बॉलीवुड में ‘देव आनंद स्टाइल’ के नाम से जाना गया।

अभिनय के साथ-साथ देव आनंद निर्देशन और निर्माण के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। 1949 में उन्होंने अपने भाइयों चेतन आनंद और विजय आनंद के साथ मिलकर ‘नवकेतन फिल्म्स’ की स्थापना की। इस बैनर के तहत बनी फिल्में न केवल मनोरंजन का माध्यम थीं, बल्कि उनमें सामाजिक संवेदनाओं और आधुनिक सोच का स्पष्ट प्रभाव देखा गया। गाइड जैसी फिल्म ने भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस फिल्म में उनके अभिनय को आज भी सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनों में गिना जाता है। विजय आनंद के निर्देशन और आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित इस फिल्म की संवेदनशीलता ने देव आनंद को एक सशक्त और गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित किया।

देव आनंद का योगदान केवल सफल फिल्मों तक सीमित नहीं था। वे अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों से भी प्रभावित होते थे और उन्हें अपनी फिल्मों में जगह देने की कोशिश करते थे। 1970 के दशक में बनी फिल्म प्रेम पुजारी और हरे रामा हरे कृष्णा इसका उदाहरण हैं। विशेषकर हरे रामा हरे कृष्णा ने उस दौर में युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति और पश्चिमी जीवनशैली के प्रभाव को दर्शाते हुए समाज को चेतावनी दी। इस फिल्म ने भारतीय युवाओं की मनोस्थिति को बड़े परदे पर सजीव रूप में प्रस्तुत किया, और यह देव आनंद की दूरदर्शिता का प्रमाण था।

एक कलाकार के रूप में उनका उत्साह और जीवंतता अंतिम समय तक बनी रही। 80 और 90 के दशक में भी उन्होंने नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ काम किया और अनेक प्रयोग किए। उम्र बढ़ने के बाद भी उनका व्यक्तित्व युवा ऊर्जा से भरा हुआ रहता था। वे अक्सर कहते थे कि उम्र केवल एक संख्या है, और उनका जीवन इस कथन का साक्षात प्रतीक था। वे लगातार नई फिल्मों, नए कथानकों और नए कलाकारों के साथ काम करने के लिए तत्पर रहते थे।

देव आनंद का फिल्मी योगदान केवल अभिनय या निर्देशन तक ही नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की सोच बदलने में भी रहा। उन्होंने फिल्मों में आधुनिकता, आत्मविश्वास और स्वतंत्र विचारों को बढ़ावा दिया। उनकी फिल्मों ने दर्शकों में सकारात्मक सोच और जीवन के प्रति आशावाद जगाया। वे कलाकारों की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आज़ादी और नए विचारों के समर्थन में हमेशा खड़े रहे। उन्होंने फिल्म उद्योग में पेशेवरता, सम्मान और परस्पर सहयोग की संस्कृति को नई दिशा दी।

3 दिसंबर 2011 को लंदन में देव आनंद का निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो आज भी प्रेरणा देती है। उनका व्यक्तित्व, उनकी ऊर्जा, उनका आत्मविश्वास और नवाचार की उनकी सोच भारतीय सिनेमा की धरोहर है। एक ऐसे समय में जब फिल्में सीमित तकनीक और संसाधनों के बीच बनती थीं, देव आनंद ने अपने दृष्टिकोण और शैली से फिल्मों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनका जीवन वास्तव में यह संदेश देता है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प हो तो इंसान हर चुनौती को पार कर सकता है।

देव आनंद भारतीय फिल्म इतिहास के उन अमर सितारों में से हैं जिनका प्रकाश कभी धूमिल नहीं होता। उनकी शैली, उनकी फ़िल्में और उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। भारतीय सिनेमा में उनका स्थान सदैव ऊँचा रहा है और रहेगा, क्योंकि उन्होंने केवल अभिनय ही नहीं किया, बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग को एक नई दिशा और नई पहचान दी।

धुन पर गीत

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प्रसिद्ध संगीत निर्देशक जयदेव का शौक था उन्हें जब भी समय मिलता वे साहित्यकारों की लोकप्रिय रचनाओं की धुन बनाते थे। इसी क्रम में एक मशहूर शायर की ग़ज़ल की धुन उन्होंने बनाई।

ग़ज़ल का शेर कुछ यूँ था –

वो रफ्ता रफ्ता जाम पिलाते चले गए,

मैं रफ्ता रफ्ता होश में आता चला गया,

उन दिनों देवानंद ‘हम दोनों’ फिल्म बना रहे थे जिसका संगीत जयदेव साहब बना रहे थे। देवानंद के आने पर जब जयदेव ने उन्हें वह धुन सुनाई जो उन्हें बहुत अच्छी लगी।

‘हम दोनों’ फिल्म के लिए गीत साहिर लिख रहे थे। उन दोनों लोगों को पता था कि साहिर धुन पर गीत लिखने के सख्त खिलाफ थे। उनका मानना था कि पहले गीत है धुन उसके बाद में है।

मगर फिर भी उन्होंने साहिर को वह धुन सुनाई और दोस्ती का वास्ता देकर इसरार किया कि वे इस पर एक गीत लिखें।

दोस्ती की खातिर अपने उसूलों को तोड़कर साहिर ने जो गीत लिखा।

क्या गजब का गीत है वो…

आप भी देखिए…

मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया,

हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया,

बरबादियों का शोक मनाना फिज़ूल था,

बरबादियो का जश्न मनाता चला गया,

जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझ लिया,

जो खो गया मैं उसको भुलाता चला गया,

ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ,

मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया।

(आज देवानंद की पुण्यतिथि है।)

हिंदी सिनेमा में तकरीबन छह दशक तक दर्शकों पर अपने हुनर, अदाकारी और रूमानियत का जादू बिखेरने वाले सदाबहार अभिनेता देव आनंद ने भी तीन दिसंबर के दिन ही वर्ष 2011 में दुनिया को अलविदा कहा था।

−रजनीकांत शुक्ला

गुरु गोविंद सिंह जयंती पर उत्तर प्रदेश में अवकाश

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उत्तर प्रदेश शासन ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए घोषणा की है कि 27 दिसंबर 2025 (शनिवार) को गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती के अवसर पर प्रदेशभर में अवकाश रहेगा। शासनादेश की मुख्य बातें

  • यह अवकाश सार्वजनिक/ऐच्छिक श्रेणी में रखा गया है।
  • आदेश के अनुसार, इस दिन प्रदेश के सभी सरकारी कार्यालय, निगम, परिषद, शैक्षणिक संस्थान तथा अधीनस्थ कार्यालय बंद रहेंगे।
  • कर्मचारियों और अधिकारियों को इस दिन कार्य से मुक्त रखा जाएगा ताकि वे गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती पर धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सम्मिलित हो सकें।

सरकार ने फर्जी खबरों और एआई-जनित डीपफेक पर अंकुश लगाने के लिए कानूनी ढांचे को मजबूत करने की आवश्‍यकता पर बल दिया

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केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री श अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में बताया कि सोशल मीडिया और फर्जी खबरों से जुड़ा मुद्दा बेहद गंभीर है। उन्होंने कहा कि फर्जी खबरें लोकतंत्र के लिए खतरा हैं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, गलत सूचनाओं और एआई-जनित डीपफेक पर सख्त कार्रवाई की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि कुछ लोग या समूह जिस तरह से सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे लगता है कि ये भारत के संविधान या संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन नहीं करना चाहते। उन्होंने इस मामले सख्त कार्रवाई और कड़े नियम बनाने की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया।

श्री वैष्णव ने संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए बताया कि हाल ही में नए नियम लागू किए  गए हैं, जिनमें छत्तीस घंटों के भीतर वीडियो हटाने का प्रावधान भी शामिल है। एआई-जनित डीपफेक की पहचान करने और उन पर आवश्यक कार्रवाई करने के लिए एक मसौदा नियम भी प्रकाशित किया गया है और इस पर विचार-विमर्श चल रहा है। उन्‍होंने संसदीय समिति के कार्य की सराहना की और कानूनी ढांचे को मजबूत करने के लिए प्रमुख सिफारिशों वाली एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए श्री निशिकांत दुबे और सभी सदस्यों को धन्यवाद दिया।

सूचना और प्रसारण मंत्री ने कहा कि फर्जी खबरें तथा सोशल मीडिया से जुड़े मुद्दों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व हमारे लोकतंत्र की सुरक्षा के बीच एक नाज़ुक संतुलन की आवश्यकता है और सरकार इस संतुलन को बनाए रखने के लिए पूरी संवेदनशीलता के साथ काम कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, डिजिटल इंडिया पहल ने एक बड़ा बदलाव लाया है और तकनीक का लोकतांत्रिकरण किया है जिसके सकारात्मक प्रभावों को स्वीकार किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने भी प्रत्येक नागरिक को एक मंच प्रदान किया है। इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, सरकार संस्थाओं और समाज की नींव रखने वाले विश्वास को मज़बूत करने के लिए काम कर रही है।