हवा हवाई हुये हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा के ‘जुमले’                                                                  −तनवीर जाफ़री

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 भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के अकुशल संचालन के चलते पिछले दिनों देशभर में भारी उड़ान संकट पैदा हो गया। हालांकि यह संकट मुख्य रूप से 2 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ और 5 दिसंबर को अपने चरम पर जा पहुंचा था जब इंडिगो ने देश भर की अपनी लगभग एक हज़ार से अधिक उड़ानें रद्द कर दी थीं । जिससे देश भर में हज़ारों यात्री विभिन्न शहरों में अकारण ही फंस गए थे । इस घटना ने केवल यात्रियों को ही परेशान नहीं किया, बल्कि एविएशन सेक्टर की कार्यकुशलता पर भी कई सवाल खड़े कर दिए। अभी तक पूरे देश में उड़ानों की स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है। मुंबई,इंदौर,दिल्ली हैदराबाद व बेंगलुरु जैसे कुछ महत्वपूर्ण नगरों की इंडिगो उड़ान सेवाएं अभी भी प्रभावित होने के समाचार हैं। हवाई अड्डों पर जहां सामान्य दिनों में पहले ही भारी भीड़ इकट्ठा हो रही थी पिछले दिनों की अफ़रा तफ़री के दौरान इन्हीं उड़ान प्रभावित हवाई अड्डों पर तो भीड़ का कुछ ऐसा  दृश्य दिखाई दिया जैसा कि छठ-दिवाली व दशहरा जैसे त्योहारों के दौरान रेलवे स्टेशन पर नज़र आता है। 

                       हवाई संचालन में आये इस तरह के असामान्य व्यवधान के कई कारण बताये जा रहे हैं। इनमें नए पायलट और क्रू रेस्ट नियमों का प्रभाव,  तकनीकी ख़राबी और ऑपरेशनल लापरवाही,  मौसम, भीड़भाड़ और उड़ान शेड्यूल में बदलाव जैसी वजहें मुख्य रूप से शामिल हैं। इस अव्यवस्था के चलते देश भर में विमान यात्रियों को जिस शारीरिक व  मानसिक प्रताड़ना को सहन करना पड़ा वह तो अपनी जगह पर परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि इस कई एयरलाइंस कंपनियों ने इसी अव्यवस्था का फ़ायदा उठाकर देश के कई प्रमुख हवाई रूट्स पर किराए 2 से 10 गुना तक मंहगे कर दिए। उदाहरण स्वरूप दिल्ली-बेंगलुरु का सामान्य किराया  जो 10,000 से 15,000 के मध्य होता था वह बढ़कर 70,000 तक और कुछ मामलों में तो 1 लाख से ज़्यादा और एयर इंडिया पर नॉन स्टॉप फ़्लाइट का 1.02 लाख तक पहुँच गया था। इसी तरह दिल्ली-मुंबई का किराया 25,000से 60,000 तक और कुछ विमानों में 93,000 से भी अधिक हो गया था। जबकि एयरलाइंस कंपनियों द्वारा दिल्ली-चेन्नई के 40,000 से लेकर 80,000+ तक वसूल किये गये। दिल्ली-पुणे, गोवा, लखनऊ पर भी 20,000 से 50,000 से भी अधिक की टिकट बेची गयी। डिमांड-सप्लाई गैप के कारण ख़ासकर इंडिगो की 60%+ मार्केट शेयर वाली फ़्लाट्स कैंसिल होने के कारण यात्रियों को दूसरी एयरलाइंस में शिफ़्ट होना ही था। इसी का लाभ एयर इण्डिया ,एयर इण्डियाएक्सप्रैस,इस्पाईस जेट व अकासा एयर जैसी कई विमानन कंपनियों ने उठाया। हालांकि बाद में सरकार ने किराए की इस बेतहाशा बढ़ोतरी पर अस्थायी कैप लगाई ताकि अनुचित किराया बढ़ोतरी रोकी जा सके।

                          अब विमानन क्षेत्र में मची इसी अफ़रातफ़री के सन्दर्भ में ज़रा नरेंद्र मोदी का वह कथन याद कीजिये जब मार्च 2014 में सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुये उन्होंने कहा था कि “मैं चाहता हूँ कि हमारे गाँव के ग़रीब, जो हवाई चप्पल पहनते हैं, वो हवाई जहाज़ में बैठें। मैं ये सपना देखता हूँ कि जिस ग़रीब की झोली में कभी दो जून की रोटी भी मुश्किल से आती थी, वो हवाई जहाज़ में सफ़र करे। क्या ये सपना देखना गुनाह है?” मोदी ने यह ‘भावनात्मक जुमले ‘कई रैलियों में अलग-अलग शब्दों में दोहराये। यह भी सच है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत में हवाई अड्डों के विकास और संचालन में काफ़ी प्रगति हुई है। मुख्य रूप से क्षेत्रीय संपर्क योजना (उड़ान ) के तहत कई नए हवाई अड्डे शुरू किए गए हैं, साथ ही पुराने बंद पड़े या कम उपयोग वाले हवाई अड्डों को पुनर्जीवित भी किया गया है। नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रूप में जहाँ इसी वर्ष मुंबई का दूसरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा शुरू किया गया है वहीँ महर्षि बाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से अयोध्या इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दोनी पोलो एयरपोर्ट, ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश), मोपाह एयरपोर्ट, गोवा (गोवा का दूसरा एयरपोर्ट), देवघर एयरपोर्ट, झारखंड, कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, उत्तर प्रदेश, पाक्योंग एयरपोर्ट, सिक्किम (सिक्किम का पहला एयरपोर्ट),पसीघाट, जीरो, होलोंगी, तेजू (अरुणाचल प्रदेश); आगत्ती (लक्षद्वीप),रीवा (मध्य प्रदेश), अंबिकापुर (छत्तीसगढ़), सहारनपुर (उत्तर प्रदेश), सतना और दतिया (मध्य प्रदेश),अलीगढ़, आज़मगढ़, चित्रकूट, मुरादाबाद, श्रावस्ती (उत्तर प्रदेश) आदि अनेक नये एयर पोर्ट विकसित किये गए हैं तो दिल्ली, लखनऊ, पुणे, ग्वालियर, जबलपुर जैसे कई हवाई अड्डों पर नये टर्मिनल का भी निर्माण किया गया है।  

                         अब सवाल यह है कि विमानन क्षेत्र में होने वाले इस विकास से ग़रीबों को फ़ायदा हुआ या विमानन कंपनियों को ? क्या आज इस बात की कल्पना की जा सकती है कि पैरों में हवाई चप्पल धारण करने वाली यानी देश की ग़रीब जनता या दूसरे शब्दों में वे 80 करोड़ लोग जिन्हें सरकार ने 5 किलो मुफ़्त राशन पर आश्रित बना दिया है ऐसे लोग जो दस हज़ार रूपये की हवाई यात्रा की टिकट भी नहीं ख़रीद सकते वे लोग वही टिकट विमानन संचालन संकट के समय भला सत्तर हज़ार की कैसे ख़रीद सकते हैं ? यदि नहीं तो मोदी के उन ‘जुमलों ‘ की क्या हक़ीक़त जिसमें वे दो जून की रोटी भी मुश्किल से खाने वाले ग़रीब की हवाई यात्रा की ‘जुमलेबाज़ी ‘ करते हैं ? हाँ विमानन क्षेत्र में हो रहे विस्तार से स्पष्ट रूप से विमानन कंपनियों को फ़ायदे ज़रूर हुये हैं। इंडिगो जैसी कंपनियां ही 66% से अधिक बाज़ार पर क़ब्ज़ा कर चुकी हैं। इंडिगो ने तो अपनी स्थापना के तीन वर्षों में ही लाभ कमाना शुरू कर दिया, और लागत नियंत्रण (जैसे ईंधन दक्षता) से सालाना 850 करोड़ रुपये की बचत की। देश के अनेक छोटे बड़े हवाई अड्डों का संचालन व रखरखाव अडानी की कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। जिसका फ़ायदा अडानी को पहुँच रहा है। इस बीच में हवाई चप्पलों वाला या 2 वक़्त की रोटी भी न खाने पाने वाले किसी व्यक्ति की हवाई यात्रा की गुंजाईश ही कहाँ नज़र आती है ? इस तरह की ‘जुमलेबाज़ियाँ’ आकर्षक,लोक लुभावन व भावनाओं को छूने वाली तो ज़रूर हो सकती हैं परन्तु इनका वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं। सच्चाई तो यह है कि गत दिनों आये विमान संकट ने हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा जैसे ‘जुमले’ही हवा हवाई कर दिये। 

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                                               तनवीर जाफ़री

भजन लाल सरकार के दो साल

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आगाज़ तो अच्छा है अंजाम खुदा जाने

बाल मुकुन्द ओझा

राजस्थान में भजनलाल सरकार 15 दिसम्बर 2025 को अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने जा रही है। भजनलाल शर्मा ने 15 दिसंबर 2023 को अपने जन्मदिन के दिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में राजस्थान के 14वें मुख्यमंत्री के रूप मे शपथ ली थी। किसी भी सरकार की गति, प्रगति और अर्जित उपलब्धियों के लेखे जोखे के लिए हालांकि दो साल पर्याप्त माने जा सकते है। सत्ता पक्ष इसे उपलब्धियों से भरा हुआ बता रहा है, वहीं विपक्ष का कहना है कि पिछले दो साल में सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। भजनलाल सरकार का दावा है कि हम जनता के सेवक के रूप में कार्य कर रहे हैं और प्रदेश के विकास का पहिया बिना रुके, बिना थमे आगे बढ़ रहा है।  चुनाव के समय जनता से किए गए 392 संकल्पों में से 274 या तो पूरे किए जा चुके हैं या प्रगति पर हैं। वहीं विपक्ष ने दो साल के शासन को विफलताओं से भरा करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है इस अवधि में भ्रष्टाचार और और दुष्कर्म के अपराधों में प्रदेश सिरमौर है। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने में सरकार विफल रही है। चहुंओर अराजकता का माहौल है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि यह समय ड्रामा, नाकामियों और अधूरे वादों से भरा रहा।

राजस्थान सरकार अपने कार्यकाल के दो साल की उपलब्धियों का ढोल ढमाकों के साथ जश्न मनाने जा रही  है। यह कोई नई बात नहीं है, हर सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाती आई है तो भजन लाल सरकार क्यों पीछे रहेगी। मगर देखने समझने की बात तो यह है कि क्या जनता इन उपलब्धियों से संतुष्ट है। एक जनकल्याणकारी सरकार का दायित्व है, जनता को स्वच्छ प्रशासन मिले। सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था आदि की आधारभूत सुविधा बिना रोकटोक और आसानी से मिले। सरकारी दफ्तरों में उनके वाजिब काम हो। अब यह जनता को देखना है कि उसे इन कल्याणकारी कार्यों की सुविधाएं समयबद्धता से मिल रही है या नहीं।

मुख्यमंत्री प्रदेश के आर्थिक विकास और आधारभूत ढांचे को जन आंकाक्षाओं के अनुरूप मजबूत बनाने में जुटे हैं। अपने दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियों पर मुख्यमंत्री ने कहा है, हमने जनता-जनार्दन से जो काम पांच साल में पूरे करने का वादा किया था उनमें से 70 प्रतिशत कार्य केवल दो वर्ष में ही पूरे किए जा चुके हैं।  दो वर्षों की बजट घोषणाओं में से 73 प्रतिशत घोषणाएं या तो पूर्ण हो चुकी है या प्रगतिरत हैं। हमारी सरकार ने राज्य की प्राथमिकताओं को समझते हुए पानी- बिजली के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए हैं। हमने किसान को अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता बनाया है तथा ऊर्जा में किए गए नवाचारों से अब हम प्रदेश के 22 जिलों में दिन में बिजली उपलब्ध करा रहे हैं। किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को 9 हजार रुपये की राशि दी जा रही है जिसे आगामी समय में चरणबद्ध रूप से 12 हजार रुपये किया जाएगा। दो साल के कार्यकाल में अब तक एक भी पेपरलीक नहीं हुआ है। लगभग 92 हजार सरकारी नौकरियां दी जा चुकी हैं और 20 हजार युवाओं को इसी माह में नियुक्तियां दी जाएंगी। पांच साल में चार लाख सरकारी नौकरी दी जाएगी । राइजिंग राजस्थान के माध्यम से 35 लाख करोड़ के एमओयू किए गए जिनमें से 8 लाख करोड़ रुपये के एमओयू की ग्राउंड ब्रेकिंग की जा चुकी है। सरकार द्वारा निजी क्षेत्र में ढाई लाख रोजगार के अवसर प्रदान किए गए हैं। आगामी समय में युवाओं के लिए युवा पॉलिसी लाई जा रही है। सरकार चाहती हैं कि युवा रोजगार प्राप्त करने के साथ रोजगार प्रदाता भी बनें।

सरकार का दावा है कि इस अवधि में सरकार लगातार जनता के बीच गई और जन हितैषी कार्यों को अमलीजामा पहनाया। इस अवधि में भजनलाल सरकार के किसी भी मंत्री के दामन पर कोई दाग नहीं लगा, हालांकि अधिकारियों की कार्यशैली पर अवश्य सवालिया निशान लगे। सरकार के दावे के विपरीत विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने 2 साल में कुछ नहीं किया जिससे हर वर्ग दुखी और परेशान है। कानून व्यवथा छिन्न भिन्न है। रोजगार देने का वादा पूरा नहीं हुआ है। आमजन बेहाल है ऐसे में खुशहाली की बात करना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कना है। कांग्रेस ने भजनलाल सरकार को पर्ची सरकार घोषित किया मगर इसी पर्ची सरकार ने दो साल में राजस्थान को अग्रिम पंक्ति का राज्य बनाने के लिए न केवल नीतिगत सुधारों की पहल की अपितु आम नागरिक के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए समर्पित भाव से प्रयास किए हैं।

आम आदमी की सोच है प्रदेश के बहुमुखी विकास में तीन चीजें बाधक बनी हुई है। भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और कुशासन प्रगति और विकास के दुश्मन के रूप में उभरे है। जब तक इन पर काबू नहीं पाया जायेगा तब तक विकास और प्रगति एकांगी होगी। हर सरकार लोक कल्याण का वादा करती है मगर लोक कल्याण के मार्ग में अवरोध बने इन कारकों को समाप्त करने की दिशा में कोई ठौस कारवाही नहीं करती। चूँकि राजनेताओं के हित इनसे जुड़े है इसलिए इन बुराइयों को समाप्त नहीं किया जा सकता। जब तक समाज से यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होगी, हम भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगते रहेंगे।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

संजय गांधी, आज जिनका जन्म दिन है

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संजय गांधी का जन्म 14 दिसम्बर 1946 को नई दिल्ली हुआ था। वे धूमकेतु की तरह उदय हुए और उसी की तरह अचानक अस्त हो गए। वे भारत के एक राजनेता थे और भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र थे। मेनका गांधी उनकी पत्नी हैं और वरुण गांधी उनके पुत्र। भारत में आपातकाल के समय उनकी भूमिका बहुत विवादास्पद रही। अल्पायु में ही एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी।

इनके पिता फिरोज गांधी जी थे जो कि पारसी समुदाय से थे। जिन्होनें शादी के बाद अपना नाम परिवर्तित करके फिरोज गांधी कर लिया था। इनके पिता पेशे से पारसी राजनेता एवं पत्रकार थे, वे लोकसभा के सांसद भी रहे। संजय गांधी का मूल निवास स्थान मुम्बई था, क्योंकि यहीं पर उनके पिता फिरोज गांधी का जन्म हुआ था। संजय गांधी के बडे भाई का नाम राजीव गांधी था। इंदिरा गांधी जी ने,फिरोज गांधी से शादी अपने पिता एवं देश के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की मर्जी के खिलाफ की थी।

अपने बड़े भाई राजीव की तरह , गांधी ने दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल, देहरादून के वेलहम बॉयज स्कूल और फिर देहरादून के दून स्कूल में शिक्षा प्राप्त की । गांधी ने स्विट्जरलैंड के एक अंतरराष्ट्रीय बोर्डिंग स्कूल, इकोले डी’ह्यूमनिटी में भी शिक्षा प्राप्त की। गांधी ने विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं लिया, बल्कि ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाया और इंग्लैंड के क्रू में रोल्स-रॉयस के साथ तीन साल की अप्रेंटिसशिप की। उन्हें स्पोर्ट्स कारों में बहुत रुचि थी। 1976 में, उन्होंने पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया और एरोबेटिक्स में कई पुरस्कार जीते।

1971 में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल ने भारत के मध्यम वर्ग के लिए एक किफायती, स्थानीय स्तर पर निर्मित कार के उत्पादन का प्रस्ताव रखा। जून 1971 में, मारुति मोटर्स लिमिटेड (अब मारुति सुजुकी ) नामक कंपनी को कंपनी अधिनियम के तहत शामिल किया गया, और संजय गांधी को इसका प्रबंध निदेशक बनाया गया, जबकि उनके पास पहले कोई अनुभव, डिजाइन प्रस्ताव या किसी भी निगम से कोई संबंध नहीं था। इंदिरा गांधी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में पाकिस्तान पर विजय ने जनता का ध्यान इस ओर मोड़ दिया। कंपनी ने उनके जीवनकाल में कोई वाहन नहीं बनाया। प्रगति प्रदर्शित करने के लिए एक प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किए गए परीक्षण मॉडल की आलोचना हुई। जनता की धारणा गांधी के खिलाफ हो गई, और कई लोग बढ़ते भ्रष्टाचार के बारे में अटकलें लगाने लगे।

गांधी ने तब पश्चिम जर्मनी की वोक्सवैगन एजी से संभावित सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और “पीपुल्स कार” के भारतीय संस्करण के संयुक्त उत्पादन के लिए संपर्क किया, ताकि वोक्सवैगन की बीटल के साथ विश्वव्यापी सफलता को दोहराया जा सके । आपातकाल के दौरान, गांधी राजनीति में सक्रिय हो गए और मारुति परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। अंततः, 1977 में जनता सरकार सत्ता में आई और “मारुति लिमिटेड” का परिसमापन कर दिया गया।

नई सरकार ने न्यायमूर्ति अलक चंद्र गुप्ता की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया , जिसने मारुति मामले पर एक बेहद आलोचनात्मक रिपोर्ट दी। 1980 में उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद, इंदिरा गांधी के कहने पर, केंद्र सरकार ने मारुति लिमिटेड को पुनर्जीवित किया और एक नई कंपनी के लिए एक सक्रिय सहयोगी की तलाश शुरू की। नेहरू-गांधी परिवार के मित्र और उद्योग जगत के दिग्गज वी . कृष्णमूर्ति के प्रयासों से उसी वर्ष मारुति उद्योग लिमिटेड की स्थापना हुई।

जापानी कंपनी सुजुकी से भी भारत में निर्मित होने वाली अपनी कार के डिजाइन और व्यवहार्यता प्रस्तुत करने के लिए संपर्क किया गया। जब सुजुकी को पता चला कि भारत सरकार ने वोक्सवैगन से भी संपर्क किया है, तो उसने भारत की पहली जनमानस कार ( मारुति 800 ) के उत्पादन की दौड़ में जर्मन कंपनी को पछाड़ देने के लिए हर संभव प्रयास किया। इसने सरकार को उनके ‘मॉडल 796’ का एक व्यवहार्य डिज़ाइन प्रदान किया, जो जापान और पूर्वी एशियाई देशों में भी सफल रहा।

मार्च 1977 में आपातकाल हटने के बाद संजय ने भारतीय संसद के लिए अपना पहला चुनाव लड़ा। इस चुनाव में संजय को न केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में करारी हार का सामना करना पड़ा , बल्कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी का पूरे उत्तरी भारत में सफाया हो गया। हालांकि, जनवरी 1980 में हुए अगले आम चुनाव में संजय ने कांग्रेस (आई) के लिए अमेठी सीट जीत ली।

उनकी मृत्यु से ठीक एक महीने पहले, मई 1980 में उन्हें कांग्रेस पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया था।

23 जून 1980 को सुबह 8:10 बजे, गांधी जी एक कलाबाजी करतब दिखाते हुए अपने विमान पर नियंत्रण खो बैठे और नई दिल्ली के राजनयिक एन्क्लेव में दुर्घटनाग्रस्त हो गए । एकमात्र अन्य यात्री, कैप्टन सुभाष सक्सेना की भी मृत्यु हो गई। गांधी जी का शव बरामद कर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया।

रजनीकांत शुक्ला

जेल की दीवारों के भीतर दिव्यांगता : गरिमा, अधिकार और राज्य की जिम्मेदारी

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– डॉ सत्यवान सौरभ

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किसी भी लोकतांत्रिक समाज में कारागार व्यवस्था केवल अपराध और दंड का प्रतीक नहीं होती, बल्कि वह राज्य की संवेदनशीलता, मानवीय दृष्टि और संवैधानिक प्रतिबद्धता की भी कसौटी होती है। भारतीय संविधान व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकार करता है और यह गरिमा अपराधी या कैदी बनने के बाद समाप्त नहीं हो जाती। इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश, जिनमें जेलों में दिव्यांग कैदियों के लिए सहायता, सुविधाओं के ऑडिट और दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के प्रभावी अनुपालन पर बल दिया गया है, भारतीय कारागार व्यवस्था की एक गंभीर लेकिन लंबे समय से उपेक्षित सच्चाई को सामने लाते हैं। ये निर्देश इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि कारागारों में बंद दिव्यांग व्यक्ति न केवल स्वतंत्रता से वंचित होते हैं, बल्कि अक्सर अपने बुनियादी मानवीय अधिकारों से भी वंचित रह जाते हैं।

भारतीय जेलें ऐतिहासिक रूप से ऐसे ‘सामान्य’ शारीरिक और मानसिक मानकों पर आधारित रही हैं, जिनमें दिव्यांगता को एक अपवाद या प्रशासनिक असुविधा के रूप में देखा गया। परिणामस्वरूप, शारीरिक, संवेदी, बौद्धिक या मनोसामाजिक दिव्यांगता से ग्रस्त कैदियों की आवश्यकताओं को जेल प्रशासन के ढांचे में समुचित स्थान नहीं मिल पाया। प्रवेश के समय दिव्यांगता की पहचान और पंजीकरण का अभाव, आवश्यकताओं के आकलन की कमी और अलग से किसी नीति का न होना, इन कैदियों को अदृश्य बना देता है। यह अदृश्यता ही आगे चलकर उपेक्षा, असमान व्यवहार और कभी-कभी अमानवीय स्थितियों में बदल जाती है।

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश इस स्थिति को बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 कारागारों पर भी समान रूप से लागू होता है और ‘उचित समायोजन’ तथा ‘सुलभता’ कोई दया या विशेष सुविधा नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं। इसके साथ ही, जेल परिसरों में दिव्यांगता संबंधी सुविधाओं का नियमित ऑडिट, स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुँच और कानूनी सहायता के प्रावधान को अनिवार्य मानते हुए न्यायालय ने प्रशासनिक जवाबदेही की नींव रखी है। यह दृष्टिकोण कारागारों को केवल अनुशासनात्मक संस्थान नहीं, बल्कि अधिकार-आधारित सुधार गृह के रूप में देखने की मांग करता है।

वास्तविकता यह है कि भारतीय जेलों में दिव्यांग कैदियों को अनेक स्तरों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सबसे पहली और बुनियादी समस्या सुलभता की है। अधिकांश जेल परिसरों में रैंप, रेलिंग, सुलभ शौचालय, समतल फर्श, स्पर्शनीय पथ या स्पष्ट संकेतकों का अभाव है। व्हीलचेयर उपयोग करने वाले कैदियों के लिए सीढ़ियाँ रोजमर्रा की गतिविधियों को भी असंभव बना देती हैं, जबकि दृष्टिबाधित कैदियों के लिए असमान फर्श और दिशासूचक संकेतों की कमी दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ाती है। यह स्थिति ‘समान पहुँच’ के संवैधानिक सिद्धांत का सीधा उल्लंघन है।

इसके साथ ही, चिकित्सा उपेक्षा एक गंभीर समस्या के रूप में उभरती है। नियमित स्वास्थ्य जांच, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और सहायक उपकरणों की समयबद्ध व्यवस्था का अभाव दिव्यांगता को और अधिक कष्टदायक बना देता है। कई मामलों में श्रवण यंत्र, व्हीलचेयर, छड़ी या अन्य सहायक साधनों की अनुपलब्धता कैदियों को पूरी तरह दूसरों पर निर्भर बना देती है। उपचार में विलंब से न केवल दिव्यांगता की तीव्रता बढ़ती है, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

संचार संबंधी बाधाएँ इस समस्या को और गहरा कर देती हैं। श्रवणबाधित कैदियों के लिए सांकेतिक भाषा दुभाषियों का न होना, दृष्टिबाधितों के लिए ब्रेल या ऑडियो सामग्री का अभाव और बौद्धिक या मनोसामाजिक दिव्यांगता वाले कैदियों के लिए सरल भाषा में सूचना की कमी—इन सबका परिणाम यह होता है कि वे जेल नियमों, अनुशासनात्मक कार्यवाहियों, कानूनी प्रक्रियाओं और शिकायत निवारण तंत्र से लगभग कट जाते हैं। यह स्थिति न्याय तक समान पहुँच के अधिकार को कमजोर करती है।

दिव्यांग कैदियों की सामाजिक स्थिति उन्हें और अधिक असुरक्षित बनाती है। भीड़भाड़ वाली बैरकों में वे उपहास, उपेक्षा या हिंसा के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। मनोसामाजिक दिव्यांगता वाले कैदियों को अक्सर अनुचित रूप से एकांतवास या कठोर अनुशासनात्मक उपायों का सामना करना पड़ता है, जबकि उनकी स्थिति विशेष देखभाल और उपचार की मांग करती है। इस प्रकार, कारागार का वातावरण उनके लिए दंड से अधिक पीड़ा का स्रोत बन जाता है।

संवैधानिक दृष्टि से यह स्थिति गंभीर चिंता का विषय है। अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद 21 गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी देता है और अनुच्छेद 39A न्याय तक समान पहुँच को राज्य का दायित्व बनाता है। ये सभी अधिकार जेल की दीवारों के भीतर भी उतने ही प्रभावी हैं। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ‘उचित समायोजन’ और ‘सुलभता’ को कानूनी अधिकार के रूप में स्थापित करता है, जबकि संयुक्त राष्ट्र का दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय हिरासत में दिव्यांग व्यक्तियों के संरक्षण और समावेशन की स्पष्ट रूपरेखा प्रदान करता है। इन मानकों की अनदेखी भारत की संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं दोनों को कमजोर करती है।

इस पृष्ठभूमि में, भारतीय कारागारों को दिव्यांगता-समावेशी बनाने के लिए व्यापक और संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है। बुनियादी ढाँचे को सार्वभौमिक डिज़ाइन के सिद्धांतों के अनुरूप ढालना अनिवार्य है, जिसमें रैंप, सुलभ शौचालय, रेलिंग, स्पर्शनीय फर्श और स्पष्ट संकेतक शामिल हों। यह सुधार चरणबद्ध रूप से, मौजूदा जेलों में ‘रेट्रोफिटिंग’ के माध्यम से किया जा सकता है। इसके साथ ही, प्रवेश के समय दिव्यांगता की अनिवार्य स्क्रीनिंग, आवश्यकताओं का आकलन और डिजिटल पंजीकरण व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए, ताकि किसी भी कैदी की आवश्यकता अनदेखी न रह जाए।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। नियमित चिकित्सीय जांच, मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ, सहायक उपकरणों की उपलब्धता और विशेषज्ञों के नियमित दौरे सुनिश्चित किए जाने चाहिए। दूरस्थ जेलों में टेलीमेडिसिन एक प्रभावी समाधान हो सकता है। संचार और कानूनी पहुँच के लिए सांकेतिक भाषा दुभाषिए, ब्रेल और ऑडियो सामग्री, सरल भाषा में नियमावली और ई-मुलाकात व ई-कोर्ट जैसी डिजिटल सुविधाओं में दिव्यांग कैदियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

मानव संसाधन विकास भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जेल कर्मियों के लिए अनिवार्य दिव्यांगता-संवेदनशीलता प्रशिक्षण, व्यवहारिक दिशानिर्देश और जवाबदेही तंत्र विकसित किए जाने चाहिए। यह प्रशिक्षण केवल औपचारिक न होकर व्यवहार में संवेदनशीलता और सहानुभूति को बढ़ावा देने वाला होना चाहिए। इसके अतिरिक्त, जहाँ संभव हो, दिव्यांग कैदियों के लिए वैकल्पिक दंड, चिकित्सीय आधार पर रिहाई या सुधारात्मक उपायों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।

अंततः, दिव्यांगता-समावेशी कारागार केवल प्रशासनिक सुधार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह मानवीय गरिमा, संवैधानिक नैतिकता और न्यायपूर्ण शासन की कसौटी है। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्देश इस दिशा में एक अवसर प्रदान करते हैं—एक ऐसा अवसर, जिसमें भारतीय कारागार व्यवस्था को दंड-केंद्रित दृष्टिकोण से निकालकर अधिकार-आधारित और सुधारोन्मुख संस्था के रूप में पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। यदि इन निर्देशों को ईमानदारी से लागू किया जाए, तो कारागार न केवल कानून के पालन का स्थल होंगे, बल्कि वे उस संवैधानिक आदर्श के सच्चे प्रतिनिधि बन सकेंगे, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति—चाहे वह स्वतंत्र हो या हिरासत में—गरिमा और न्याय का अधिकारी है।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट

17 से उत्तराखंड में45 दिनों तक ‘‘जन जन की सरकार-जन जन के द्वार’’ अभियान

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मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर प्रदेश में 17 दिसम्बर 2025 से 45 दिनों तक ‘‘जन जन की सरकार-जन जन के द्वार’’ अभियान संचालित किया जाएगा। इस अभियान के दौरान विभिन्न न्याय पंचायतों एवं ग्राम पंचायतों में कैम्प लगाकर आम आदमी से जुड़ी योजनाओं का लाभ जन सामान्य तक उपलब्ध कराया जाना सुनिश्चित किया जाएगा। इस अभियान में राजस्व, ग्राम्य विकास, पंचायती राज, कृषि, समाज कल्याण सहित 23 विभाग शामिल रहेंगे। इस संबंध में सभी संबंधित विभागों को स्पष्ट दिशा-निर्देश भी जारी किए गए हैं।

मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देशों के अनुपालन में सचिव सामान्य प्रशासन श्री विनोद कुमार सुमन ने इस संबंध में प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों को पत्र प्रेषित किया है। पत्र में प्रदेश में केन्द्र तथा राज्य सरकार की योेजनाओं का व्यापक प्रचार प्रसार करने और जरूरतमंद लोगों को विभिन्न योजनाओं का लाभ पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं।

सचिव के अनुसार इस अभियान के तहत विभिन्न न्याय पंचायतों में कैम्प लगाने तथा न्याय पंचायत/ग्राम पंचायतों में विभिन्न योजनाओं का लाभ प्रदान किए जाने हेतु ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण करते हुए जन सामान्य से आवेदन पत्र प्राप्त किए जाएंगे और उस पर कार्यवाही की जाएगी।

सेना प्रमुख द्विवेदी ने देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी में 157वीं पासिंग आउट परेड का अवलोकन किया

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सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सैन्य अकादमी में 157वीं पासिंग आउट परेड का अवलोकन किया।देहरादून स्थित भारतीय सैन्य अकादमी आज अपने ऐतिहासिक ड्रिल स्क्वायर में आयोजित 157वीं पासिंग आउट परेड के अवसर पर गौरव, परंपरा और सैन्य वैभव से ओतप्रोत दिखाई दी। इस गरिमामय समारोह में अधिकारी कैडेटों को भारतीय सेना में विधिवत कमीशन प्रदान किया गया। यह अवसर अकादमी के चिरस्थायी आदर्श वाक्य “वीरता एवं बुद्धिमत्ता” की जीवंत अभिव्यक्ति था, जो कैडेटों के कठोर प्रशिक्षण, अनुशासन, समर्पण और अदम्य साहस का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करता है।

सेना प्रमुख (सीओएएस) जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने परेड का अवलोकन किया और नव नियुक्त अधिकारियों को उनके प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर हार्दिक बधाई दी। इस अवसर पर अधिकारी कैडेटों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सैन्य पेशा मात्र एक आजीविका नहीं, बल्कि एक पवित्र आह्वान है, जो अटूट समर्पण, निस्वार्थ सेवा और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्र के लिए सर्वोच्च बलिदान की अपेक्षा करता है। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भारतीय सैन्य अकादमी की गौरवशाली विरासत की प्रशंसा करते हुए कहा कि इस प्रतिष्ठित संस्थान ने सदैव दूरदर्शी नेतृत्व और साहसी अधिकारियों को गढ़ा है, जिन्होंने बार-बार शौर्य, कर्तव्य एवं सम्मान की सर्वोच्च परंपराओं को अक्षुण्ण रखा है।

सेना प्रमुख ने आधुनिक सुरक्षा परिवेश की गतिशील, जटिल व बहुआयामी प्रकृति का उल्लेख किया, जो तीव्र गति से सैन्य, तकनीकी तथा सामाजिक क्षेत्रों में विस्तार कर रहा है। ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि समकालीन संघर्षों में कूटनीति और निर्णायक सैन्य कार्रवाई के बीच निर्बाध एवं प्रभावी समन्वय अत्यंत आवश्यक है। सेना प्रमुख ने यह भी कहा कि भारतीय सेना आधुनिकीकरण व नवाचार के मार्ग पर निरंतर अग्रसर है और नवनियुक्त अधिकारी इस परिवर्तनशील यात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने अनिश्चित और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में नेतृत्व के महत्व पर बल देते हुए कहा कि भविष्य की चुनौतियां हमेशा स्पष्ट समाधान प्रस्तुत नहीं करेंगी, बल्कि वे अधिकारियों की अनुकूलन क्षमता, विवेकशील निर्णय-क्षमता तथा नैतिक ईमानदारी की सच्ची परीक्षा लेंगी।

सेना प्रमुख ने नवनियुक्त युवा अधिकारियों से उदाहरण प्रस्तुत करते हुए नेतृत्व करने, उच्चतम नैतिक आचरण बनाए रखने और अपने अधीनस्थ जवानों के लिए मार्गदर्शक एवं प्रेरणास्रोत बनने का आग्रह किया। उन्होंने अधिकारियों से नैतिक साहस, रचनात्मक सोच और संकट के समय में संयम व संतुलन का प्रदर्शन करने का आह्वान किया। सेना प्रमुख ने 14 मित्र देशों के 34 विदेशी अधिकारी कैडेटों द्वारा प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूर्ण करने पर उनकी सराहना की। उन्होंने कहा कि भारतीय सैन्य अकादमी से ये मित्रवत संबंध देशों के बीच रक्षा सहयोग और आपसी विश्वास को सुदृढ़ करने वाले स्थायी बंधनों का प्रतीक हैं। जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने प्रशिक्षकों एवं अकादमी कर्मियों की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने चरित्रवान, सक्षम और दृढ़ निश्चयी अधिकारियों के निर्माण में उत्कृष्टता के प्रति उनके सतत समर्पण की प्रशंसा की। इस अवसर पर सेना प्रमुख ने गर्वित माता-पिता के त्याग, विश्वास और समर्थन के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए एक कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से उन्हें धन्यवाद दिया कि उन्होंने अपने पुत्रों को देश की रक्षा के पवित्र दायित्व के लिए समर्पित किया।

जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने चाणक्य के शाश्वत ज्ञान का स्मरण कराते हुए उत्तीर्ण होने वाले अधिकारी कैडेटों को यह संदेश दिया कि भौतिक संपदा और स्वयं जीवन क्षणभंगुर हैं, किंतु धर्म—अर्थात् कर्तव्य, नैतिकता तथा सत्यनिष्ठा—शाश्वत हैं। उन्होंने प्रत्येक अधिकारी से राष्ट्रसेवा में सम्मान, निष्ठा और साहस की उच्चतम परंपराओं को अक्षुण्ण रखने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन के समापन में युवा अधिकारियों से सदैव सजग, तैयार व समय से आगे रहने का आग्रह किया। उन्होंने अधिकारियों को भारत की संप्रभुता और भविष्य की सुरक्षा के सच्चे संरक्षक के रूप में गर्व, आत्मविश्वास एवं अटूट संकल्प के साथ सेवा करने के लिए प्रेरित किया।

इस अवसर पर 157वें नियमित पाठ्यक्रम, 46वें तकनीकी प्रवेश योजना पाठ्यक्रम, 140वें तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम, 55वें विशेष कमीशंड अधिकारी पाठ्यक्रम और प्रादेशिक सेना ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा 2023 पाठ्यक्रम से कुल 525 अधिकारी कैडेटों के साथ-साथ 14 मित्र देशों के 34 अधिकारी कैडेटों को कमीशन दिया गया। उनकी सेवा में नियुक्ति भारत के रक्षा नेतृत्व को मजबूत करने और मित्र देशों के साथ स्थायी सैन्य साझेदारी की निरंतरता दोनों का प्रतीक है।

इस गरिमामय समारोह में गर्वित माता-पिता, परिवारजन, वरिष्ठ सैन्य अधिकारी तथा अनेक विशिष्ट अतिथि उपस्थित रहे। परेड का समापन पारंपरिक ‘अंतिम पग’ के भावपूर्ण क्षण के साथ हुआ, जब युवा अधिकारी राष्ट्र की संप्रभुता, सम्मान एवं आदर्शों की रक्षा का संकल्प लेकर आत्मविश्वास के साथ अपने दायित्व पथ पर अग्रसर हुए।

समीक्षा अधिकारी द्वारा प्रदान किए गए पुरस्कार: –

•     स्वॉर्ड ऑफ ऑनर – अकादमी कैडेट एडजुटेंट निशकल द्विवेदी

•     स्वर्ण पदक (योग्यता क्रम में प्रथम) – अकादमी कैडेट एडजुटेंट निशकल द्विवेदी

•     रजत पदक (योग्यता क्रम में द्वितीय स्थान) – बटालियन अंडर ऑफिसर बादल यादव

•     कांस्य पदक (योग्यता क्रम में तीसरा स्थान) – वरिष्ठ अवर अधिकारी कमलजीत सिंह

•  रजत पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – तकनीकी स्नातक पाठ्यक्रम) – अधिकारी कैडेट जाधव सुजीत संपत

•     रजत पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – तकनीकी प्रवेश योजना – 46) – विंग कैडेट कैप्टन अभिनव मेहरोत्रा

   रजत पदक (विशेष कमीशन अधिकारी) – अधिकारी कैडेट सुनील कुमार छेत्री

•     पदक (योग्यता क्रम में प्रथम – विदेशी कैडेट) – बांग्लादेश के जूनियर अंडर ऑफिसर मोहम्मद सफिन अशरफ को दिया गया।

•     चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ बैनर – इम्फाल कंपनी (शरदकालीन सत्र 2025 के लिए 12 कंपनियों में से समग्र रूप से प्रथम स्थान)

इस 157वें बैच द्वारा नेतृत्व और सेवा की अपनी यात्रा का शुभारंभ करने के साथ ही भारतीय सैन्य अकादमी एक अग्रणी संस्थान के रूप में अपनी गौरवशाली विरासत की पुनः पुष्टि करती है। यह ऐसे अधिकारियों को तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है, जो साहस, व्यावसायिकता और राष्ट्र के लिए अटूट समर्पण के साथ नेतृत्व करेंगे।

असम में चौथे सहकारिता मेला 2025 का उद्घाटन

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असम सरकार के सहकारिता विभाग द्वारा, भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के मार्गदर्शन में आयोजित तीन दिवसीय चौथे सहकारिता मेला 2025 का आज चांदमारी स्थित एईआई ग्राउंड में उद्घाटन किया गया। यह तीन दिवसीय मेला 13 से 15 दिसंबर 2025 तक आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य असम में सहकारिता आंदोलन की शक्ति, विविधता और संभावनाओं को प्रदर्शित करना है।

इस मेले का औपचारिक उद्घाटन भारत सरकार के केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री  कृष्ण पाल गुर्जर ने असम सरकार के सहकारिता मंत्री  जोगेन मोहन की गरिमामयी उपस्थिति में किया।

गुवाहाटी में आयोजित सहकारिता मेले को संबोधित करते हुए केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री ने कहा कि असम में सहकारिता आंदोलन राज्य की गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं का स्वाभाविक विस्तार है। उन्होंने क्षेत्र के महान संत विभूतियों महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव और महापुरुष माधवदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि एकता, समानता और समाज सेवा पर आधारित उनकी शिक्षाएं ही सहकारिता की भावना की मूल आधारशिला हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के निर्णायक नेतृत्व और केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में “सहकार से समृद्धि” की राष्ट्रीय परिकल्पना, सशक्त वास्तविकता में परिवर्तित हो रही है। उन्होंने वर्ष 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना को एक ऐतिहासिक कदम बताया, जिसने भारत में वर्ष 2047 तक एक सर्वांगीण, विश्वस्तरीय सहकारिता प्रणाली के निर्माण के लिए आवश्यक संस्थागत प्रोत्साहन और स्पष्ट रोडमैप प्रदान किया है।

श्री गुर्जर ने विशेष रूप से असम में सहकारिता क्षेत्र में हो रहे तेज़ सुधारों की सराहना करते हुए मुख्यमंत्री डॉहिमंत बिस्वा सरमा के गतिशील नेतृत्व और राज्य के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन के समर्पित प्रयासों को इसका श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि राज्य स्तर पर सक्रिय और प्रभावी क्रियान्वयन के चलते असम प्रमुख राष्ट्रीय पहलों में अग्रणी बनकर उभरा है।

उन्होंने बताया कि प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (पैक्स) के 100 प्रतिशत कंप्यूटरीकरण की दिशा में असम ने उल्लेखनीय प्रगति की है, जहां 800 से अधिक पैक्स ने नए मॉडल उपविधियों को अपनाया है। इस प्रगति से युवाओं और महिलाओं को सशक्त किया जा रहा है, विभिन्न क्षेत्रों में उद्यमिता को बढ़ावा मिल रहा है और 32 लाख से अधिक सदस्यों को वित्तीय समावेशन का लाभ मिल रहा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि असम अब राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के उस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के अनुरूप पूरी तरह अग्रसर है, जिसके अंतर्गत वर्ष 2026 तक प्रत्येक गांव में एक सहकारी संस्था की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने राज्य के लिए एक समृद्ध, आत्मनिर्भर और सहकारिता-आधारित भविष्य के निर्माण हेतु सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

चौथे सहकारिता मेले में अपने संबोधन में असम सरकार के सहकारिता मंत्री श्री जोगेन मोहन ने इस मेले को जमीनी स्तर पर सशक्तिकरण का एक जीवंत मंच बताया। उन्होंने प्रतिभागियों की विशेष रूप से सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपशिष्ट को उपयोगी संसाधनों में बदलते हुए आत्मनिर्भरता और अद्भुत नवाचार क्षमता का परिचय दिया है।

उन्होंने बताया कि ये सहकारी संस्थाएं आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन से लेकर महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और युवाओं की सफलता तक, विभिन्न क्षेत्रों में लोगों को व्यापक लाभ पहुंचा रही हैं।

इस सहकारिता मेले में 160 सहकारी संस्थाओं की भागीदारी है, जो हथकरघा, मत्स्य पालन, डेयरी, कृषि तथा युवा एवं महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों जैसे प्रमुख क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। यह मेला स्थानीय उत्पादों, नवाचारों और सहकारिता की सफलता की कहानियों को प्रदर्शित करने के लिए एक सशक्त मंच प्रदान कर रहा है।

मेला आगामी दो दिनों तक जारी रहेगा, जिसमें प्रदर्शनियां, संवाद और ज्ञान-साझा सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनका उद्देश्य राज्य में सहकारिता आधारित विकास को और अधिक प्रोत्साहित करना है।

सेल की बिक्री 27 प्रतिशत बढ़ी

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स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने नवंबर 2025 में बिक्री में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, जिसमें पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 27% वृद्धि हासिल की। नवंबर 2025 में रिटेल बिक्री में उल्लेखनीय 69% की वृद्धि दर्ज हुई और यह 0.14 मिलियन टन (एमटी) रही, जबकि पिछले वर्ष इसी माह में यह 0.084 एमटी थी। यह वृद्धि विभिन्न उत्पाद श्रेणियों और वितरण चैनलों में उल्लेखनीय प्रदर्शन से संभव हुई, जिनमें घरेलू सेलएबल स्टील, रोड डिस्पैच और वेयरहाउस से डोर डिलीवरी शामिल हैं। इस माह सेल देश में टीएमटी बार्स की सबसे बड़ी विक्रेता के रूप में भी उभरी।

इस मासिक गति पर आगे बढ़ते हुए, सेल ने अप्रैल–नवंबर 2025 की अवधि में मजबूत समग्र प्रदर्शन दर्ज किया, जिसमें कुल 12.7 एमटी बिक्री हुई, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि के 11.1 एमटी की तुलना में 14% की वृद्धि है।

यह सुदृढ़ प्रदर्शन एक मजबूत बिक्री रणनीति और बाज़ार में सेल टीम के निरंतर प्रयासों से संभव हुआ, जबकि कंपनी को वैश्विक मूल्य दबावों और वैश्विक व्यापार नीति की अनिश्चितताओं तथा भू-राजनीतिक तनावों से उत्पन्न मांग अस्थिरता जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

अप्रैल–नवंबर 2025 के दौरान रिटेल चैनल बिक्री भी काफी मजबूत रही, जो 0.97 एमटी रही और पिछले वर्ष की इसी अवधि के 0.86 एमटी की तुलना में 13% वृद्धि दर्ज की। कंपनी ने यह भी जोड़ा कि यह वृद्धि चल रहे राष्ट्रव्यापी ब्रांड प्रचार अभियानों से समर्थित है।

ये परिणाम चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों में सेल की ग्राहक-केंद्रित प्रयासों, बाजार नेतृत्व और परिचालन उत्कृष्टता को प्रदर्शित करते हैं, जो विभिन्न खंडों में निरंतर वृद्धि सुनिश्चित करते हैं। सेल भविष्य में और अधिक उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है।

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वंदे भारत ट्रेनों में स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे

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वंदे भारत ट्रेनों में स्थानीय व्यंजन परोसे जाएंगे इसे धीरे-धीरे सभी ट्रेनों में लागू किया जाएगा

केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णमंत्री ने अधिकारियों को वंदे भारत ट्रेनों में संबंधित क्षेत्र के स्थानीय व्यंजन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। स्थानीय व्यंजन शुरू करने से यात्रियों का अनुभव काफी बेहतर होगा क्योंकि इससे यात्रा के दौरान मिलने वाले भोजन में उस क्षेत्र की संस्कृति और स्वाद की झलक मिलेगी। यह सुविधा भविष्य में धीरे-धीरे सभी ट्रेनों में लागू की जाएगी।केंद्रीय रेल मंत्री, सूचना एवं प्रसारण मंत्री और इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने आज रेल भवन में अधिकारियों की समीक्षा बैठक ली। इस बैठक में रेल एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री श्री रवनीत सिंह बिट्टू भी उपस्थित थे।

केंद्रीय मंत्री ने यह भी बताया कि फर्जी पहचान के जरिए ट्रेन टिकट बुकिंग पर भारतीय रेलवे की कार्रवाई से सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। उपयोगकर्ता की पहचान स्थापित करने और फर्जी आईडी का पता लगाने के लिए एक सख्त प्रणाली लागू होने के बाद, आईआरसीटीसी  वेबसाइट पर प्रतिदिन लगभग 5,000 नई यूजर आईडी बनाई जा रही हैं। नवीनतम सुधारों से पहले, यह संख्या प्रतिदिन लगभग एक लाख नई यूजर आईडी तक पहुंच गई थी।

इन प्रयासों से भारतीय रेलवे को 3.03 करोड़ फर्जी खातों को निष्क्रिय करने में मदद मिली है। इसके अलावा, 2.7 करोड़ यूजर आईडी को या तो अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है या उनकी संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर बंद करने के लिए चिह्नित किया गया है।

केंद्रीय मंत्री और राज्य मंत्री ने अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि टिकट प्रणाली में इस स्तर तक सुधार किया जाए जहां सभी यात्री एक वास्तविक और प्रामाणिक यूजर आईडी के माध्यम से आसानी से टिकट बुक कर सकें।

बिहार के गोपालगंज जिले में नारायणी नदी पर दो घाटों का निर्माण पूरा

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नमामि गंगा कार्यक्रम के तहत जुलाई 2021 में 8.25 करोड़ रुपये की लागत से बिहार के गोपालगंज जिले में नारायणी नदी पर दो घाटों का निर्माण पूरा किया गया और उन्हें संबंधित शहरी स्थानीय निकायों को सौंप दिया गया।

अंतर्देशीय जलमार्ग परिवहन को सुगम बनाने के लिए मंगलपुर (नौतन) के पास एनडब्ल्यू-37 (गंडक नदी) और बेतिया में इसके सामने के तट पर 3 करोड़ रुपये की लागत से दो घाट पहले ही बनाए जा चुके हैं।

वित्त वर्ष 2017-18, 2018-19 और 2019-20 में एनडब्ल्यू-37 (गंडक नदी) पर हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण सहित जलमार्ग विकास कार्य क्रमशः 5.32 करोड़ रुपये, 7.59 करोड़ रुपये और 8.49 करोड़ रुपये की कुल लागत से संपन्न किए गए थे।

केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री श्री सर्बानंद सोनोवाल जी ने लोकसभा में लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।