“फाइलों से फायर तक: अफसरशाही के भीतर सड़ता भेदभाव”

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(जातिगत अपमान, साइड पोस्टिंग और मानसिक उत्पीड़न — एक अफसर की चुप्पी जो अब चीख बन गई।) 

हरियाणा के सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार की आत्महत्या ने प्रशासनिक जगत को झकझोर दिया है। उनके सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं, जिन पर जातिगत अपमान और मानसिक उत्पीड़न के आरोप हैं। चंडीगढ़ पुलिस ने डीजीपी शत्रुजीत कपूर और रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया समेत 14 अधिकारियों पर एफआईआर नंबर 156 दर्ज की है। यह हरियाणा के इतिहास में पहला मौका है जब इतने सीनियर अफसरों पर एक साथ एससी/एसटी एक्ट और भारत न्याय संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा चला है। यह मामला नौकरशाही के भीतर छिपे जातिगत भेदभाव पर गहरी चोट है।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

हरियाणा की प्रशासनिक मशीनरी में सात अक्टूबर की सुबह एक ऐसी गूंज उठी, जिसने नौकरशाही के चेहरे से शालीनता का मुखौटा उतार फेंका। सीनियर आईपीएस अफसर वाई पूरन कुमार ने चंडीगढ़ के सेक्टर-11 स्थित अपने सरकारी आवास पर खुद को गोली मार ली। पर यह आत्महत्या नहीं, व्यवस्था के भीतर पल रहे जातिगत भेदभाव, सत्ता संघर्ष और संस्थागत उत्पीड़न का परिणाम थी। अब चंडीगढ़ पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है, उसने इस सन्नाटे को कानून के दस्तक में बदल दिया है।

एफआईआर नंबर 156, जिसमें डीजीपी शत्रुजीत कपूर, रोहतक एसपी नरेंद्र बिजारणिया सहित 14 अफसर आरोपी बनाए गए हैं, भारतीय प्रशासनिक इतिहास की एक अभूतपूर्व घटना है। भारत न्याय संहिता की धारा 108, 3(5) और एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के तहत दर्ज यह मामला इस सच्चाई की गवाही देता है कि नौकरशाही की ऊँची दीवारों के भीतर भी जाति आज भी उतनी ही जीवित है जितनी गांवों की गलियों में।

पूरन कुमार के सुसाइड नोट में 15 आईएएस-आईपीएस अफसरों के नाम दर्ज हैं। हर नाम एक आरोप है, और हर आरोप यह सवाल है कि क्या एक सविधानिक पद पर बैठा अधिकारी भी इस देश में अपनी जाति की जंजीरों से मुक्त नहीं हो सकता? उन्होंने लिखा कि उन्हें लगातार “साइड पोस्टिंग” दी जाती रही, उनकी योग्यता को दबाया गया, और उन्हें जातिगत तंज और धमकियों से मानसिक रूप से तोड़ा गया।

पूरन कुमार का कैरियर रिकॉर्ड इस बात की पुष्टि करता है। मेहनत और ईमानदारी से उन्होंने पुलिस सेवा में पहचान बनाई, पर उन्हें बार-बार “कम प्रभावी” पदों पर भेजा गया — कभी आईजी होमगार्ड, कभी आईजी टेलीकम्युनिकेशन। जब अप्रैल 2025 में उन्हें रोहतक रेंज का आईजी बनाया गया, तब उन्होंने यह सोचा होगा कि अब मेहनत का फल मिला है। लेकिन मात्र पांच महीने बाद ही उन्हें सुनारिया पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज भेज दिया गया — और वहीं से उनकी मानसिक गिरावट की शुरुआत हुई।

यह कहानी सिर्फ एक अफसर की नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की वह बीमार रग है जो ‘योग्यता’ के सामने ‘पहचान’ को रखती है। हमारे समाज में आरक्षण भले अवसर देता हो, लेकिन व्यवस्था अक्सर उसे स्वीकार नहीं करती। वह दलित अफसर को ‘काबिल अधिकारी’ की जगह ‘आरक्षण वाला अफसर’ कहकर छोटा करती है। पूरन कुमार की मौत ने यह दिखा दिया कि जाति का भूत सिर्फ समाज में नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में भी घूमता है।

पूरन कुमार की पत्नी आईएएस अमनीत पी. कुमार ने दो अलग-अलग प्रतिवेदन दिए — एक में केवल डीजीपी और एसपी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की, और दूसरे में सभी 15 अफसरों की गिरफ्तारी की। यह एक अधिकारी की नहीं, बल्कि एक संवेदनशील पत्नी और सहकर्मी की लड़ाई है जो व्यवस्था से इंसाफ मांग रही है। उन्होंने कहा कि “यह सिर्फ एक सुसाइड नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक मर्डर है।”

एफआईआर दर्ज होने के बाद राज्य के एससी समुदाय से जुड़े कई आईएएस, आईपीएस और एचसीएस अफसर पूरन परिवार के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। यह अपने आप में ऐतिहासिक है, क्योंकि आमतौर पर नौकरशाही के भीतर एक ‘मौन संस्कृति’ चलती है — जहां अधिकारी अपने साथी पर टिप्पणी करने से भी कतराते हैं। लेकिन इस बार सन्नाटा टूटा है। अफसर कह रहे हैं कि पूरन कुमार का मामला एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की हत्या है जो समानता और सम्मान की उम्मीद करती थी।

मुख्यमंत्री नायब सैनी ने परिवार से मुलाकात की और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिया है। पर सवाल यह है कि क्या यह भरोसा न्याय में बदलेगा? क्या राज्य सरकार इतनी हिम्मत दिखा पाएगी कि डीजीपी जैसे शीर्ष अधिकारी को छुट्टी पर भेजे और एसपी को हटाए? या यह भी किसी और “आंतरिक जांच” की तरह फाइलों में गुम हो जाएगा?

हरियाणा की ब्यूरोक्रेसी में वर्षों से यह चर्चा होती रही है कि जातिगत गुटबाजी अफसरों की नियुक्तियों, ट्रांसफरों और प्रमोशनों को प्रभावित करती है। “कौन किसका है” — यह बात यहां पद से बड़ी हो जाती है। और जब इस गुटबाजी में जाति का तड़का लग जाता है, तो योग्यता, सत्यनिष्ठा और संवेदनशीलता सब हाशिये पर चली जाती हैं।

पूरन कुमार की मौत इस झूठी प्रतिष्ठा वाली मशीनरी पर एक नैतिक प्रश्नचिह्न है। यह घटना सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि एक सिस्टम की आत्मा की हत्या है — जो अपने अफसरों को मानसिक और जातिगत रूप से इतना तोड़ देती है कि वे जीवन से हार मान लेते हैं।

इस घटना के बाद यह उम्मीद की जा सकती है कि अब नौकरशाही के भीतर जातिगत भेदभाव पर खुली चर्चा शुरू होगी। लेकिन डर यह भी है कि यह मामला किसी प्रशासनिक औपचारिकता में तब्दील कर दिया जाएगा — जैसे हर बार होता है। जांच कमेटी बनेगी, बयान होंगे, और अंत में रिपोर्ट यह कहेगी कि “व्यक्तिगत कारणों से आत्महत्या थी।”

पूरन कुमार का लिखा हर शब्द आज भी सवाल बनकर हवा में तैर रहा है —

> “जब न्याय देने वाले ही अन्याय करने लगें, तो शिकायत किससे करें?”

एक संवेदनशील अफसर ने अपनी जान देकर यह दिखा दिया कि जाति का दर्द कुर्सी की ऊंचाई से नहीं मिटता। आज यह जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है कि वह यह स्वीकार करे — जातिवाद अब सिर्फ राजनीति नहीं, प्रशासन की आत्मा में भी जहर की तरह घुल चुका है।

पूरन कुमार चले गए, पर उनके सुसाइड नोट ने यह साफ कर दिया है कि अब नौकरशाही की चुप्पी भी एक अपराध है। उनकी मौत व्यवस्था से यह मांग करती है कि वह सिर्फ दोषियों को नहीं, बल्कि अपनी सोच को भी कटघरे में खड़ा करे। क्योंकि जब तक सिस्टम खुद को नहीं बदलेगा, तब तक हर पूरन कुमार के भीतर कोई न कोई गोली तनी रहेगी।

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 डॉ. सत्यवान सौरभ

(स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार)

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

जगजीत सिंह — जीवन, संगीत और योगदान

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जगजीत सिंह (जन्म: 8 फरवरी 1941, श्री गंगानगर, राजस्थान – निधन: 10 अक्टूबर 2011, मुंबई) हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल संगीत के प्रतीक और आधुनिक भारत के महान गायकों में से एक थे।

प्रारंभिक जीवन और संगीत शिक्षा

जगजीत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम अमर सिंह धिमन था, जो सरकारी विभाग में कार्य करते थे, और माता बच्चन कौर थीं।शिक्षा के दौरान ही संगीत में रुचि जागी। उन्होंने शुरुआती संगीत प्रशिक्षण पंडित चगनलाल शर्मा से प्राप्त किया और बाद में उस्ताद जमाल खान (Senia Gharana) के तहत खयाल, ठुमरी, द्रुपद आदि शास्त्रीय विधाओं का अध्ययन किया।श्री गंगानगर के स्कूलों और कॉलेजों में वे पहले ही संगीत प्रस्तुतियों में भाग लेने लगे और धीरे-धीरे उन्हें पहचान मिलने लगी।

मुंबई में संघर्ष और करियर की शुरुआत

1965 में जगजीत सिंह मुंबई चले आए, जहाँ उन्होंने संगीत की बेहतर संभावनाएँ देखीं। शुरुआत में उन्होंने विज्ञापन जिंगल्स, रेडियो और स्टेज पर गाना शुरू किया।धीरे-धीरे उन्हें बॉलीवुड फिल्मों में पार्श्व गायकी के अवसर मिले और उन्होंने ग़ज़ल शैली को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ग़ज़ल की लोकप्रियता और नए अंदाज़

जगजीत सिंह को “ग़ज़ल किंग” कहा जाने लगा क्योंकि उन्होंने पारंपरिक ग़ज़ल को सरल, सुगम और जनता के करीब पहुँचाया।उनकी एक बड़ी विशेषता थी कि उन्होंने शायरी और संगीत दोनों को इस तरह संयोजित किया कि संगीत प्रेमी केवल शेर-ओ-शायरी के शौकीन ही नहीं, बल्कि आम जनता भी ग़ज़लों से जुड़ सकें।इसके अलावा, उन्होंने पारंपरिक संगीत वाद्यों के साथ-साथ कीबोर्ड, गिटार, वायलिन आदि पश्चिमी उपकरणों को भी शामिल किया, जिससे ग़ज़ल संगीत आधुनिक ध्वनि के साथ नए युग में प्रवेश कर सकी।

फिल्मों में योगदान

जगजीत सिंह ने कई फिल्मों के लिए गाना और संगीत कम्पोज किया। फिल्मों जैसे “प्रेम गीत”, “साथ− साथ”, “अर्थ”, “ सरफरोश”, “जागरस पार्क”, “लीला”, “तुम बिन”, आदि में उनके गाने बहुत लोकप्रिय हुए। उनका गाना “होठों से छू लो तुम” (प्रम गीत), “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो” (अर्थ), “होश वालों को खबर क्या” ( सरफरोश) आदि आज भी बहुत याद किये जाते हैं।

अन्य संगीत रूप और सामाजिक सेवा

ग़ज़ल के अलावा, जगजीत सिंह भजन, कीर्तन, और धार्मिक गीतों में भी सक्रिय रहे। उन्होंने श्री कृष्ण भजन, गुरुबाणी शबद आदि को भी प्रस्तुत किया।

साथ ही, उन्होंने अनेक संगीत शिक्षण एवं सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लिया और नए कलाकारों को प्रेरित किया।

सम्मान और विरासत

सरकार ने उन्हें 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया, जो भारत का तीसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है।

उनकी ग़ज़लों और गायन की शैली ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी गहरा प्रभाव डाला। उनका संगीत आज भी सुनने वालों के दिलों को छूता है।

निष्कर्ष

जगजीत सिंह ने शास्त्रीय, आधुनिक और लोकप्रिय संगीत को जोड़कर ग़ज़ल और संगीत की दुनिया में नया मुकाम बनाया। उनकी मधुर आवाज, भावनात्मक परिव्यक्ति और शेर-ओ-शायरी का सहज संवाद आज भी संगीत प्रेमियों के लिए अमूल्य निधि है।जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की जोड़ी भारतीय संगीत इतिहास की सबसे लोकप्रिय और भावनात्मक जोड़ियों में से एक मानी जाती है।


🌹 जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की पहली मुलाकात

साल 1967 के आसपास की बात है। उस समय जगजीत सिंह मुंबई में एक संघर्षरत गायक थे — वे विज्ञापन जिंगल्स और रेडियो कार्यक्रमों में गाया करते थे।
उसी दौर में एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो में उनकी मुलाकात हुई चित्रा दत्ता से, जो उस समय एक प्रसिद्ध मॉडल और कभी-कभी गायिका भी थीं।

चित्रा का विवाह पहले एक एयर फोर्स अधिकारी देबसिंह दत्ता से हुआ था, और उनकी एक बेटी मोनिका थी। लेकिन व्यक्तिगत कारणों से वह विवाह टूट गया।

जगजीत और चित्रा की यह मुलाकात एक पेशेवर काम के दौरान हुई — दोनों को साथ में एक जिंगल रिकॉर्ड करना था।चित्रा उनकी आवाज़, विनम्रता और संगीत के गहरे ज्ञान से बहुत प्रभावित हुईं। वहीं, जगजीत सिंह भी चित्रा के सौम्य स्वभाव और गायकी से आकर्षित हुए। धीरे-धीरे दोनों के बीच दोस्ती हुई और फिर यह दोस्ती जीवनसाथी के रिश्ते में बदल गई।


💍 विवाह और साथ का संगीत सफर

साल 1969 में जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ने विवाह किया।यह विवाह न केवल दो व्यक्तियों का, बल्कि दो आवाज़ों और दो आत्माओं का संगम था। विवाह के बाद उन्होंने मिलकर ग़ज़लों की नई दिशा तय की। दोनों ने साथ मिलकर “The Unforgettables” (1976) नामक एल्बम जारी किया, जिसने भारत में ग़ज़ल गायन का चेहरा बदल दिया।
यह एल्बम एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुआ — क्योंकि यह भारत की पहली स्टूडियो रिकॉर्डेड स्टीरियो ग़ज़ल एल्बम थी।

इस एल्बम के बाद दोनों पति-पत्नी संगीत जगत के सबसे लोकप्रिय ग़ज़ल युगल बन गए।
उनकी जोड़ी को लोग प्यार से “The King and Queen of Ghazals” कहा करने लगे।


🎶 संगीत में योगदान (JAGJIT–CHITRA DUO)

दोनों ने मिलकर दर्जनों एल्बम दिए, जिनमें प्रमुख हैं –

The Unforgettables (1976)

Come Alive in a Concert (1979)

Echoes

A Sound Affair

Passions

Someone Somewhere

उनकी गाई कुछ लोकप्रिय ग़ज़लें आज भी अमर हैं, जैसे —

“वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी…”

“ये तेरा घर, ये मेरा घर…”

“तुमको देखा तो ये ख़याल आया…”

“होठों से छू लो तुम…”

“झुकी झुकी सी नज़र…”

चित्रा सिंह की आवाज़ में एक कोमलता और गहराई थी, जो जगजीत सिंह की मधुर, भावनात्मक गायकी के साथ अद्भुत संगम बनाती थी।
दोनों ने ग़ज़ल को आम जनता तक पहुँचाया — सरल भाषा, मधुर संगीत और दिल को छू लेने वाले बोलों के साथ।


💔 व्यक्तिगत त्रासदी और चित्रा सिंह का संगीत से संन्यास

उनके जीवन में सबसे बड़ा झटका 27 जुलाई 1990 को लगा, जब उनके इकलौते बेटे विवेक सिंह की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई।
विवेक मात्र 21 वर्ष के थे और पढ़ाई कर रहे थे।

यह घटना जगजीत और चित्रा, दोनों के जीवन को तोड़ देने वाली साबित हुई।जहाँ जगजीत ने अपने दुःख को संगीत में ढाल दिया, वहीं चित्रा सिंह ने पूरी तरह संगीत से संन्यास ले लिया।
उन्होंने 1990 के बाद कभी मंच पर नहीं गाया और न कोई एल्बम रिकॉर्ड किया।

बाद में, 2009 में उनकी बेटी मोनिका चौधरी (चित्रा की पहली शादी से) ने भी आत्महत्या कर ली — यह उनके लिए दूसरा बड़ा मानसिक आघात था।


🕊️ चित्रा सिंह – एक शांत किंतु दृढ़ व्यक्तित्व

चित्रा सिंह ने अपने जीवन में असाधारण संघर्ष झेला, लेकिन उन्होंने हमेशा गरिमा और संयम बनाए रखा।
आज भी वे मुंबई में रहती हैं और समय-समय पर जगजीत सिंह की स्मृति में आयोजित आयोजनों में भाग लेती हैं।

वर्ष 2022 में उन्होंने अपने पति की याद में “Jagjit Singh Foundation” की स्थापना की, जो युवा कलाकारों को संगीत शिक्षा और मंच प्रदान करने का कार्य करती है।


🌼 निष्कर्ष

जगजीत और चित्रा सिंह की प्रेम कहानी केवल एक वैवाहिक संबंध नहीं, बल्कि संगीत की आत्मीय यात्रा है।
दोनों ने मिलकर भारतीय ग़ज़ल को नया जीवन दिया, उसे घर-घर तक पहुँचाया और संवेदना के उस स्तर तक पहुँचाया जहाँ श्रोता खुद को गीतों में महसूस करते हैं।

उनकी जोड़ी संगीत इतिहास में हमेशा एक मिसाल रहेगी —
जहाँ प्रेम, पीड़ा और संगीत — तीनों एक हो जाते हैं।

सॉफ्ट स्किल्स, वित्तीय साक्षरता और स्टार्टअप

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देवेंद्र जोशी
आजकल भारत की किशोर आबादी के विचारों में आने वाला परिवर्तन इनके बीच जाकर संवाद करने से महसूस किया जा सकता है। आज का किशोर यानी भविष्य का युवा इस ग्लोबलाइजेशन के दौर में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना चाहता है, वह परंपरागत विषयों से हटकर ऐसे नवाचार करना चाहता है जिससे उसके ज्ञान और पहल की सार्थकता सिद्ध हो सके। हाल ही में इन पंक्तियों के लेखक को एक प्रतिष्ठित स्कूल के बच्चों को संबोधित करने का अवसर मिला। संबोधन के बाद एक दसवीं क्लास का छात्र मेरे पास आया वह अपनी क्लास का टॉपर है और स्टार्टअप में अपना भविष्य देख रहा है। उस किशोर का मानना है कि पर्यटन स्थलों पर जाने वाले लोगों के पास एक्स्ट्रा सामान मसलन हैंडबैग, पर्स और खाने पीने का अतिरिक्त सामान एक बोझ की तरह से होता है अगर हमारी कंपनी वह सामान उसके घर तक सुविधाजनक कीमत में पहुंचा दे तो उसके पर्यटन का मजा खराब नहीं होगा। एक किशोर के मस्तिष्क में उपजे इस प्रकार के नवाचार को देखकर बड़ा अच्छा लगा मैंने उससे पूछा कि वह इतने अच्छे अंक लाकर डॉक्टर या इंजीनियर क्यों नहीं बनना चाहता, उसका जवाब था कि मैं चाहता हूं कि मैं बहुत से लोगों को रोजगार प्रदान करूं ।
ज्ञान और स्किल पर आधारित भविष्य का समाज मुख्यतः चार कॉन्सेप्ट के इर्द-गिर्द ही बनता हुआ प्रतीत होता है , सबसे पहले हम सॉफ्ट स्किल से बने व्यक्तित्व की बात करें तो आत्मविश्वास , इमोशनल मैनेजमेंट, नेतृत्व क्षमता ,टीमवर्क और समस्या समाधान के साथ-साथ अपने तनाव का करने वाला युवा भविष्य में किसी प्रकार के मानवीय संसाधन को नेतृत्व देगा | आज भी जब हम किसी बड़ी कंपनी की चयन प्रक्रिया को देखते हैं तो इन गुणों को वरीयता नियोक्ता देते हैं |
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को भविष्य में एक बड़ी ताकत के रूप में देखा जाता है ऐसे में आज का विद्यार्थी अपने समय प्रबंधन , प्रोजेक्ट निर्माण, प्रश्न पत्र तैयार करने और अपने उत्तर को औरों से बेहतर बनाने के साथ-साथ कठिन विषयों को सरलतम तरीके से समझने में इस तकनीक का प्रयोग कर रहा है | कंटेंट बनाना आज विद्यार्थी के लिए बहुत बड़ी चुनौती नहीं रह गया है |
इस आर्थिक युग में वित्तीय साक्षरता को दरकिनार नहीं किया जा सकता ऐसे में छोटी उम्र से ही बचत करना, निवेश के नए-नए तरीके सीखना, अपना और परिवार का बजट बनाना, वित्तीय धोखाधड़ी से बचना और आय के नए-नए साधनों को अर्जित करना आज किशोर सीखने लगे हैं |
और अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात है कि भारत जैसे विकासशील देश में आज का युवा स्टार्टअप की तरफ अपने कदम बढ़ा रहा है| हमारे इस विविधता पूर्ण समाज में किसी भी प्रोडक्ट के हिट होने या किसी भी विचार को नवाचार बनाने की अनंत संभावना है ऐसे में सरकारी सहायता और बड़ी आसानी से मिलने वाला लोन इन युवाओं के सपनों को पंख दे रहा है | कुल मिलाकर हम अपने आसपास होने वाले इस सामाजिक परिवर्तन को महसूस कर पा रहे हैं और भविष्य की बड़ी ही खूबसूरत तस्वीर हमारे सामने हमारी युवा पीढ़ी बना रही है यह बहुत सुखद और आनंद दायक है।

देवेंद्र जोशी
शिक्षाविद् एंव लेखक

बेटियों को चाहिए शिक्षा, समानता और सुरक्षा

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                                        बाल मुकुन्द ओझा

अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस हर साल 11 अक्टूबर को मनाया जाता है ताकि बालिकाओं के सामने आने वाली चुनौतियों और उनके अधिकारों के संरक्षण के बारे में जागरूकता बढ़ाई जा सके। दुनियाभर में महिलाओं के प्रति बढ़ते अत्याचारों और असमानताओं जैसे भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, बाल विवाह एवं अशिक्षा को देखते हुए और उन्हें इन सभी समस्याओं से उबारने के लिए तथा उनके संरक्षण के उद्देश्य से ही हर साल अंतरराष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जाता है। आजकल बालिका के सशक्तीकरण की चर्चा हमारी जुबान पर हर वक्त रहती है। सरकारी चर्चा शिक्षा, टीकाकरण, समान अधिकार देने, स्वास्थ्य, पोषण और बालिकाओं की घटती संख्या से आगे नहीं बढ़ती है। जबकि माता पिता को बालिका की सुरक्षा हर समय चिंतित रखती है। देश में बालिकाओं के साथ हो रही अनहोनी वारदातें निरंतर बढ़ती जा रही है। बेटियों के सशक्तीकरण की अनेक योजनाओं के संचालन के बावजूद आज समाज में बेटियों को सुरक्षा और संरक्षा का समुचित वातावरण नहीं मिल रहा है। आए दिन बालिकाओं पर होने वाले अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। इसमें सबसे ज्यादा मामले छेड़छाड़ और दुष्कर्म के हैं। जमीनी सच्चाई बता रही है कि समाज और सरकार बालिकाओं की सुरक्षा और संरक्षण सुनिश्चित कर पाने में नकारा साबित हो रहा है। एक वर्ष की बच्ची से लेकर अधेड़ उम्र की महिला सुरक्षित नहीं है। माता पिता ढाई तीन साल की आयु में अपनी बेटी को स्कूल भेज देते है। जब तक बेटी सुरक्षित घर नहीं आजाती तब तक माँ की आँखे हर समय घर के दरवाजे को घूरती रहती है। राम राज्य की बातें करने वाले हमारे समाज को आखिर हो क्या गया है। हम किस रास्ते पर चल निकले है।

बेटी को जन्म से लेकर मृत्यु तक सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। हमारी संकुचित मानसिकता ही उनके विकास में अवरोधक बनी हुई है। आज बालिका हर क्षेत्र में आगे बढ़ने के बाद भी अनेक सामाजिक कुरीतियों की शिकार हैं। ये कुरीतियों उनके आगे बढ़ने में बाधाएँ उत्पन्न करती है। पढ़े-लिखे लोग और जागरूक समाज भी इन कुरीतियों के शिकार है। आज भी हजारों लड़कियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। समाज में कई घर ऐसे हैं, जहाँ बेटियों को बेटों की तरह अच्छा खाना और अच्छी शिक्षा नहीं दी जा रही है। यह दिवस बालिका शक्ति को लोगों के सामने लाने तथा उनके प्रति समाज में जागरूकता और चेतना पैदा करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस देश की एक सच्चाई यह है कि भारत में हर घंटे चार बच्चों को यौन शोषण का सामना करना पड़ता है। हमारे देश में कन्या भ्रूण हत्या में इजाफा हो रहा है। सेंटर फॉर रिसर्च के अनुसार पिछले 20 वर्षों में भारत में कन्या भ्रूण हत्या के कारण एक करोड़ बच्चियां जन्म से पहले काल की बलि चढा दी गईं। सभी को मिलकर इस कुरीति को मिटाना है। बाल विवाह, भ्रूण हत्या, शिशु मृत्यु दर रोके जाने, स्तनपान कराने, नियमित टीकाकरण, दहेज प्रथा एवं अन्य सामाजिक ज्वलंत विषयों में सुधार लाना चाहिए।

आजकल रोज प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मिडिया पर कही ना कहीं से लड़कियों पर हो रहे अत्याचार की खबर दिखाई जाती रहती है परंतु इसकी रोकथाम के उपाय पर चर्चा कहीं नहीं होती है। इस तरह के अत्याचार कब रुकेंगें। क्या हम सिर्फ मूक दर्शक बन खुद की बारी का इंतजार करेंगे। लड़कियों पर अत्याचार पहले भी हो रहे थे और आज भी हो रहे हैं अगर इसके रोकने के कोई ठोस उपाय नहीं किये गये । आज भी हमारे समाज में बलात्कारी सीना ताने खुले आम घूमता है और बेकसूर पीड़ित लड़की को बुरी और अपमानित नजरों से देखा जाता है । न तो समाज अपनी जिम्मेदारी का माकूल निर्वहन कर रहा है और न ही सरकार। ऐसे में बालिका कैसे अपने को सुरक्षित महसूस करेगी यह हम सब के लिए बेहद चिंता की बात है। संविधान और कानून बनाकर नारी के स्वाभिमान की रक्षा नहीं होगी। समाज पूरी तरह जागरूक और सचेत होगा तभी हम बालिका को सुरक्षा और संरक्षा की खुली हवां में साँस दिला पाएंगे। 

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32 मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

आज़म ख़ान : सत्ता, विवाद और राजनीतिक दोराहे का सफ़र

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में आज़म ख़ान का नाम कभी प्रभाव और विवाद — दोनों का पर्याय रहा है। समाजवादी आंदोलन से निकले इस नेता ने तीन दशकों तक प्रदेश की सियासत में अपनी अहम भूमिका निभाई। लेकिन आज उनका राजनीतिक सफ़र इस सवाल के साथ खड़ा है कि क्या उन्होंने अपनी ऊर्जा जनता की सेवा में लगाई या सत्ता और प्रतिष्ठा की रक्षा में खो दी?

शुरुआत में संघर्ष, बाद में सत्ता का अहंकार

आज़म ख़ान ने राजनीति की शुरुआत छात्र आंदोलनों से की थी। वे एक समय आम जनता के बीच बेबाक आवाज़ के रूप में जाने जाते थे। मगर धीरे-धीरे वही नेता सत्ता में पहुँचकर उन आदर्शों से दूर होते गए, जिनके लिए वे कभी संघर्ष किया करते थे।
रामपुर में उनका राजनीतिक वर्चस्व इतना बढ़ गया कि स्थानीय प्रशासन और जनता पर भी उसका असर महसूस किया जाने लगा। यही वजह रही कि उनके विरोधियों ने उन्हें “स्थानीय सामंतवाद” का प्रतीक कहा।

जौहर विश्वविद्यालय : सपना या साधन?

मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय की स्थापना को आज़म ख़ान ने अपने जीवन का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट बताया। परंतु समय के साथ यह सपना कई कानूनी विवादों में उलझ गया।
कथित रूप से सरकारी ज़मीनों के अधिग्रहण और स्थानीय किसानों की शिकायतों ने इस परियोजना की साख को कमजोर किया।
शिक्षा के नाम पर स्थापित यह संस्थान आज राजनीति, कोर्ट केस और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच जकड़ा हुआ है — जिससे यह सवाल उठता है कि क्या विश्वविद्यालय शिक्षा का केंद्र बन सका या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का प्रतीक मात्र रह गया?

राजनीति में टकराव और विवादों की परंपरा

आज़म ख़ान का राजनीतिक जीवन हमेशा टकराव से भरा रहा है — चाहे वह प्रशासन से हो, मीडिया से या विपक्ष से।
उनकी भाषा और बयानबाज़ी ने कई बार राजनीतिक गरिमा पर प्रश्न उठाए।
लोकतांत्रिक राजनीति में संवाद और सहयोग को ताकत माना जाता है, लेकिन आज़म ख़ान अक्सर इससे उलट मार्ग पर चले, जिससे उनका संघर्ष व्यक्तिगत बन गया।

जनता की उम्मीदों पर सवाल

जनता ने उन्हें कई बार चुना, विश्वास जताया, लेकिन क्या वे उस भरोसे पर खरे उतरे?
रामपुर जैसे क्षेत्र में आज भी शिक्षा, रोज़गार और बुनियादी सुविधाएँ चुनौती बनी हुई हैं।
नेता के रूप में उनसे उम्मीद थी कि वे इन समस्याओं को दूर करेंगे, परंतु उनका ध्यान अधिकतर सत्ता बचाने और अपनी छवि सुधारने में ही केंद्रित दिखाई दिया।

निष्कर्ष : राजनीति में जवाबदेही अनिवार्य है

आज़म ख़ान जैसे अनुभवी नेता से जनता को उम्मीद थी कि वे प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देंगे, लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव का उपयोग रचनात्मक सुधारों से ज़्यादा व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की रक्षा में किया।
लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति कानून और जवाबदेही से ऊपर नहीं होता।
नेता चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, जनता के प्रति उत्तरदायित्व और पारदर्शिता सबसे ऊपर रहनी चाहिए — और शायद यही वह कसौटी है, जिस पर आज़म ख़ान जैसे नेताओं को इतिहास परखा जाएगा।

गुडडू हिंदुस्तानी

भारतवर्ष प्राचीनतम सनातन हिन्दू राष्ट्र

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पश्चिम ने जब चलना भी नहीं सीखा था तब आर्यभट्ट , वराहमिहिर , गौतम और कणाद परमाणु के बीज मंत्र रच रहे थे , ब्रह्मांड के रहस्य खोल रहे थे , संसार को शून्य का ज्ञान देकर गणित सिखा रहे थे ? भारतवर्ष अनादि आर्यभूमि है , ज्ञान भूमि है , जगत की प्राचीनतम संस्कृति है । पश्चिम ने जब आँखें भी नहीं खोली थी , हमारे ऋषि तब से वेद , उपनिषद और पुराणों की रचना कर रहे हैं ।

भारतवर्ष भरत भूमि है , प्राचीनतम सनातन हिन्दू राष्ट्र है । आक्रांताओं ने एक हजार वर्षों तक हमें लूटा , काटा , जनेऊ तोड़े , तलवार की नोक पर धर्मांतरण कराया । अंग्रेजों और पुर्तगालियों ने भारत को लूट लूटकर खाली कर दिया लेकिन न सनातन सभ्यता नष्ट हुई और न सनातन संस्कृति । सनातन भारत कल भी था , आज भी है और कल भी रहेगा । कुछ तो बात है जो मिटती नहीं हस्ती हमारी ।

लेकिन आज जो लोग संविधान की लाल किताब जेब में उठाए घूमते हैं , उनसे कुछ पूछना चाहते हैं । यह कैसा संविधान है जो ईसाई धर्मावलंबियों को ईसाई धर्म के धार्मिक संस्थान चलाने की इजाजत देता है ? यह कैसा संविधान है जो इस्लाम धर्म मानने वालों को इस्लामिक शिक्षा देने के लिए मदरसे चलाने की इजाज़त देता है । लेकिन इस देश के मूल सनातन हिन्दू धर्म को धार्मिक ज्ञान पढ़ाने की इजाजत नहीं देता ?

सनातन सिद्धांतों के मूल पाठ पाठ्यक्रमों में शामिल न करने के पीछे अंग्रेजों की मंशा तो समझ आती है ।
आजादी मिलने के बाद अपार सनातन ज्ञान देश के नौनिहालों को क्यों नहीं पढ़ता गया ? कौन रोक रहा था देश के पहले और दूसरे प्रधानमंत्री , शिक्षा मंडी को ? जब मदरसा बोर्ड बना , क्रिश्चियन कॉन्वेंट बोर्ड बना तब सनातन शिक्षा बोर्ड क्यों नहीं बना ?

संस्कृत शिक्षण संस्थान थोड़ी बहुत कर्मकाण्ड की शिक्षा तो देते हैं । लेकिन वेद पुराण सहित विशुद्ध धार्मिक ज्ञान देने का प्रबन्ध आजादी के बाद प्राइमरी विद्यालयों में क्यों नहीं किया गया ? जब अल्पसंख्यकों को धार्मिक शिक्षा देने की इजाजत दी गई तो देश के मूल धर्मावलंबी समाज के लिए सनातन शिक्षा का प्रबन्ध 1947 के बाद क्यों नहीं हुआ ? दुनिया के अनेक विश्विद्यालयों में हमारे प्राचीन ग्रंथों पर शोध हो रहे हैं । और हम अभागे सेक्युलर चश्में चढ़ाकर अनूठा ज्ञान बांटते हुए भी डर रहे हैं ?

मतलब भारत सदा सदा से ज्ञानवान रहा , बुद्धि का भंडार रहा , बुद्धिवाद का जन्मदाता रहा । भारत को संस्कृत पठन पाठन की भारी जरूरत है । सनातन धर्मग्रंथ कितने महान हैं जरा नासा से पूछिए , जर्मनी से पूछिए । जो बच्चे मदरसों और चर्चों में पढ़ते हैं उन्हें भी सनातन ग्रंथों के ज्ञान से अवगत कराइए । कॉन्वेंट और पब्लिक स्कूलों के बच्चों को भी । यकीन मानिए , मस्तिष्क और मन मंदिर के कपाट खुल जाएंगे । सनातन ज्ञान की जरूरत केवल हिंदुओं को ही नहीं , भारत में रहने वाले सभी धर्मावलंबियों को है । आधुनिक ज्ञान के साथ प्राचीन ज्ञान विज्ञान का पाठन बच्चों को कराइए , निश्चय ही भारत विकसित राष्ट्र बन जाएगा ।

…….कौशल सिखौला

बाज़ार के जहरीले आईने – जब लोग उपभोक्ता बन जाते हैं, इंसान नहीं

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आज का समाज उपभोक्ता संस्कृति का गुलाम बन चुका है। लोग जरूरत के लिए नहीं, बल्कि दिखावे के लिए चीजें खरीद रहे हैं। मोबाइल फोन से लेकर कपड़ों तक, हर वस्तु अब पहचान और प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गई है। “लोग क्या कहेंगे” के डर में लोग कर्ज में डूबते जा रहे हैं। असली जरूरतें पीछे छूटती जा रही हैं और कृत्रिम इच्छाएं आगे बढ़ रही हैं। उपभोक्तावाद का यह जाल धीरे-धीरे इंसान की आत्मा को खाली कर रहा है।

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

हमारा समाज आज विकास की तेज़ रफ़्तार पर तो है, पर दिशा कहीं खो चुका है। पहले इंसान ज़रूरतों के लिए चीज़ें खरीदता था, अब चीज़ें इंसान को खरीद रही हैं। अब बाज़ार केवल सामान नहीं बेचता, वह हमारी पहचान बेचता है। यह हमें यह समझाने की कोशिश करता है कि हम कौन हैं, हमारी औक़ात क्या है, और हमारी असली कीमत कितनी है। आज हर तरफ़ एक अजीब सी होड़ है — दिखावे की, ब्रांड की, और झूठे रुतबे की। लोग अब ज़िंदगी नहीं जी रहे, वे उसे प्रदर्शित कर रहे हैं। हर तस्वीर, हर पोस्ट, हर कपड़े और हर मोबाइल के पीछे एक ही सवाल छिपा होता है – “लोग क्या कहेंगे?”

उपभोक्तावाद यानी कंज़्यूमरिज़्म ने हमारे समाज की नसों में ज़हर की तरह जगह बना ली है। पहले व्यक्ति वस्तु का उपयोग करता था, अब वस्तुएँ व्यक्ति का उपयोग कर रही हैं। ब्रांड अब हमारी ज़रूरतों के नहीं, बल्कि हमारी असुरक्षाओं के सौदागर बन गए हैं। वे हमें यह यक़ीन दिला चुके हैं कि जब तक हमारे पास महंगा मोबाइल, बड़ा घर और इंस्टाग्राम पर दिखाने लायक जीवन नहीं है, तब तक हम अधूरे हैं।

कभी कहा गया था कि “मनुष्य वस्तु का मालिक है”, पर अब वस्तुएँ मनुष्य के मन और मानसिकता की मालिक बन चुकी हैं। ऐप्पल का मोबाइल हो या महंगी कार, इनका उद्देश्य सुविधा नहीं, प्रतिष्ठा बन चुका है। लोग अब पर्दा इसलिए नहीं हटाते कि उन्हें हवा लगे, बल्कि इसलिए हटाते हैं कि तस्वीर अच्छी आए। इज़्ज़त अब चरित्र में नहीं, कैमरे की फ्रेम में दिखती है।

सोशल मीडिया इस उपभोक्ता संस्कृति का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है। पहले लोग बातें करते थे, अब पोस्ट करते हैं। पहले खुशी आती थी, अब उसे रील में एडिट किया जाता है। पहले त्यौहार मनाए जाते थे, अब दिखाए जाते हैं।

हर लाइक आत्मविश्वास का मापदंड बन गया है, और हर टिप्पणी आत्म-मूल्य का प्रमाण। हम खुद से कम और दूसरों की निगाह से ज़्यादा जीने लगे हैं। कपड़े ब्रांडेड हैं, पर सोच उधार की है; चेहरे चमकते हैं, पर दिल थके हुए हैं।

एक समय था जब गाँव की औरतें पर्दे में रहकर भी मर्यादा और सम्मान की मिसाल होती थीं। आज वही परंपरा इंस्टाग्राम की चमक में खो गई है। अब पर्दा शर्म या संकोच का नहीं, बल्कि फोटोशूट का हिस्सा बन गया है। लोग कहते हैं — “हम तो आधुनिक हैं।” पर यह आधुनिकता नहीं, मानसिक गुलामी है — जहाँ दिखावा आत्म-सम्मान पर भारी पड़ता है।

सोचिए, जब कोई व्यक्ति अपनी मासिक कमाई का बड़ा हिस्सा केवल इसीलिए ईएमआई में खर्च कर देता है ताकि लोग कह सकें कि उसके पास ‘आइफ़ोन’ है — तो वह उपभोक्ता नहीं, बल्कि उपभोग का शिकार बन चुका है।

फ़ोन वही काम करता है — बात करना, संदेश भेजना, संपर्क बनाए रखना — पर हमारे दिमाग़ ने उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक बना लिया है।

बाज़ार हमें यह नहीं बताता कि हमें क्या चाहिए, बल्कि यह तय करता है कि हमें क्या चाहना चाहिए। विज्ञापन इतने मनोवैज्ञानिक हो चुके हैं कि वे पहले हमारे भीतर कमी का एहसास जगाते हैं, फिर उसी कमी का समाधान बेचते हैं।

यह एक मानसिक व्यापार है — पहले असंतोष पैदा करो, फिर संतोष बेचो। मोबाइल कंपनियाँ कहती हैं — “हमारा फ़ोन आपकी पहचान है।” धीरे-धीरे यही सोच हमारी आत्मा तक उतर गई है। हमारी पहचान, आत्मविश्वास और आत्मसम्मान — सब अब ब्रांड वैल्यू में बदल चुके हैं।

जब मूल्य वस्तु में बदल जाते हैं, तो रिश्ते भी सौदे में बदल जाते हैं। आज लोग उपहार नहीं, ब्रांडेड चीज़ें देते हैं।

शादी अब संस्कार नहीं, सामाजिक प्रदर्शन बन गई है।

त्योहार अब भावना नहीं, फोटो सेशन बन चुके हैं।

यह सब मिलकर हमारी संवेदनाओं को खोखला और नकली बना रहे हैं।

पहले माता-पिता बच्चों को सिखाते थे — “कपड़े से नहीं, कर्म से पहचान होती है।” अब बच्चे कहते हैं — “माँ, वही ब्रांड चाहिए जो मेरे दोस्त के पास है।” यही वह पल होता है जहाँ संस्कार हार जाते हैं और बाज़ार जीत जाता है। कई लोग कहते हैं — “हम तो ईएमआई पर खरीद रहे हैं, क्या फर्क पड़ता है?” पर फर्क यह है कि अब आप उस चीज़ के मालिक नहीं, बल्कि वह चीज़ आपकी जेब और मानसिक शांति की मालिक बन गई है। ईएमआई केवल किस्त नहीं, एक अदृश्य जंजीर है जो आत्मसंतोष को बाँध लेती है।

महंगी वस्तुएँ कुछ पलों की खुशी देती हैं, पर धीरे-धीरे वही बोझ बन जाती हैं।

मध्यवर्गीय समाज आज सबसे ज़्यादा इस झूठी प्रतिष्ठा की होड़ में फँसा हुआ है। वह अपनी असल ज़रूरतें भूल चुका है, और दिखावे की दुनिया में जी रहा है। वह “कैसा दिखता हूँ” में उलझ गया है, “मैं क्या हूँ” यह भूल गया है। दिखावे की संस्कृति ने केवल जेब नहीं, नैतिकता भी खाली कर दी है।

अब लोग दूसरों की नज़रों में अच्छे दिखने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। कोई अपनी निजता बेच रहा है, कोई झूठे रिश्ते दिखा रहा है, तो कोई सस्ती लोकप्रियता के लिए मर्यादा छोड़ रहा है। जहाँ कभी पर्दा सम्मान का प्रतीक था, आज वही पर्दा फोटोशूट की सजावट बन गया है।

अब सच्चाई दिखाना पुराना चलन माना जाता है। जो दिखता है वही बिकता है — यही आज की दुनिया का नारा है। पर जो बिकता है, वह सदा टिकता नहीं। दिखावे की चमक थोड़े समय की होती है, पर सच्चाई की रोशनी स्थायी होती है। दुनिया का सबसे बड़ा ब्रांड है — आपका आत्मसम्मान। उसे कोई बाज़ार, कोई सेल, कोई ऑफर नहीं खरीद सकता। जरूरतें पूरी कीजिए, लेकिन इच्छाओं को समझदारी से सीमित कीजिए। फ़ोन काम के लिए हो, पहचान के लिए नहीं। सोशल मीडिया अभिव्यक्ति का माध्यम बने, आत्ममूल्य का मापदंड नहीं।

मर्यादा का अर्थ बंदिश नहीं, बल्कि अपनी असल पहचान है।

दिखावे के शोर में सादगी की आवाज़ ही सबसे प्रभावशाली होती है। अगर समाज को बदलना है तो सबसे पहले अपनी सोच और ख़रीददारी की मानसिकता बदलनी होगी।

यह समय हमसे सवाल करता है — क्या हम अपने मालिक हैं या बाज़ार के गुलाम? क्या हम दिखावे की दौड़ से निकलकर सच्चे आत्मसंतोष की राह पकड़ सकते हैं? सवाल आसान है, पर जवाब कठिन। क्योंकि यह लड़ाई पैसों की नहीं, मानसिकता की है। यह तय करेगा कि हम तकनीक और चमक के बीच रहकर भी इंसान बने रह सकते हैं या नहीं।

फ़ोन चाहे किसी का भी हो, बात इंसानियत की होनी चाहिए। जब तक हम अपनी ज़रूरतों से ज़्यादा अपनी असलियत को महत्व नहीं देंगे, तब तक हम बाज़ार के आईने में अपने ही नकली प्रतिबिंब को देखते रहेंगे। समाज तब आगे बढ़ता है जब वस्तुएँ साधन बनें, साध्य नहीं।

अब समय है कि हम खुद को ब्रांड के उपभोक्ता नहीं, मूल्यों के रक्षक बनाएं। क्योंकि बाज़ार की चमक एक दिन फीकी पड़ जाएगी, पर इंसानियत की रोशनी कभी नहीं।

-प्रियंका सौरभ 

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

2047 तक भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की राह

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जब खेत, प्रयोगशाला और सूरज मिलेंगे — तब साकार होगा ऊर्जा आत्मनिर्भर भारत का सपना।

भारत 2047 तक ऊर्जा स्वतंत्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने, प्रदूषण कम करने और सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए स्वच्छ प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी दो मजबूत आधारस्तंभ हैं। सौर, पवन, ग्रीन हाइड्रोजन, बायोफ्यूल और बायोगैस के माध्यम से भारत एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत कर रहा है जिसमें विज्ञान, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता एक साथ आगे बढ़ते हैं। यदि यह रणनीति निरंतरता और नीति-सुदृढ़ता से लागू हुई, तो 2047 तक भारत न केवल ऊर्जा स्वतंत्र बल्कि हरित महाशक्ति के रूप में उभरेगा।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत वर्ष 2047 में अपनी आज़ादी के सौ वर्ष पूरे करेगा। यह वह समय होगा जब राष्ट्र केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और ऊर्जा दृष्टि से भी आत्मनिर्भर बनने का स्वप्न देख रहा है। आज भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है। हमारी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग जीवाश्म ईंधनों — अर्थात कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस — से पूरा होता है। किंतु इन संसाधनों की सीमित उपलब्धता और इनके दुष्परिणाम अब स्पष्ट हैं। तेल आयात पर अत्यधिक निर्भरता भारत की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालती है। अतः ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में “स्वच्छ प्रौद्योगिकी” और “जैव प्रौद्योगिकी” ही भारत के भविष्य की आधारशिला सिद्ध हो सकती हैं।

ऊर्जा स्वतंत्रता का अर्थ केवल पेट्रोल या डीज़ल के आयात को रोक देना नहीं है, बल्कि यह ऐसी व्यवस्था स्थापित करने का संकल्प है जिसमें ऊर्जा उत्पादन, वितरण और उपभोग — सभी स्तरों पर पर्यावरण अनुकूल, टिकाऊ और स्वदेशी समाधान अपनाए जाएँ। स्वच्छ प्रौद्योगिकी का उद्देश्य प्रदूषण कम करना, कार्बन उत्सर्जन घटाना और संसाधनों का सर्वोत्तम उपयोग करना है। वहीं जैव प्रौद्योगिकी, जीवित सूक्ष्मजीवों और प्राकृतिक जैविक प्रक्रियाओं के माध्यम से नई ऊर्जा संभावनाएँ खोजने में सहायक बनती है।

भारत की बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण और शहरीकरण के कारण ऊर्जा की माँग लगातार बढ़ रही है। आज भारत अपनी कुल तेल आवश्यकताओं का लगभग अस्सी प्रतिशत विदेशों से आयात करता है। यह न केवल विदेशी मुद्रा पर भार डालता है बल्कि ऊर्जा सुरक्षा को भी संकट में डालता है। यदि भारत को 2047 तक ऊर्जा स्वतंत्र बनना है तो उसे परंपरागत ईंधनों के स्थान पर नवीकरणीय और स्वच्छ स्रोतों को प्राथमिकता देनी होगी।

सरकार ने इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय सौर मिशन, ग्रीन हाइड्रोजन मिशन, इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम, फेम योजना और राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति जैसी योजनाएँ ऊर्जा आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव रख रही हैं। इन पहलों का उद्देश्य है — जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, स्वदेशी तकनीकों को बढ़ावा देना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना।

भारत सौर ऊर्जा उत्पादन में विश्व का अग्रणी देश बन रहा है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में बड़े सौर पार्क स्थापित किए गए हैं। 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसी प्रकार पवन ऊर्जा और जलविद्युत परियोजनाएँ भी तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं। स्वच्छ प्रौद्योगिकी के प्रयोग से ऊर्जा उत्पादन अधिक कुशल और पर्यावरण अनुकूल बनता जा रहा है।

ऊर्जा स्वतंत्रता के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। ऊर्जा का संचयन और उसका स्मार्ट उपयोग भी उतना ही आवश्यक है। नवीकरणीय स्रोतों की अनियमितता — जैसे सूर्य का न उगना या हवा का न चलना — ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करती है। इसके समाधान के रूप में बैटरी भंडारण और स्मार्ट ग्रिड तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। इनसे ऊर्जा को संग्रहीत कर आवश्यकता पड़ने पर उपयोग किया जा सकता है।

भारत का “ग्रीन हाइड्रोजन मिशन” इस दिशा में ऐतिहासिक पहल है। हाइड्रोजन वह ईंधन है जो जल के विद्युत अपघटन से प्राप्त होता है और इसके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य रहता है। यह इस्पात, परिवहन और उर्वरक जैसे भारी उद्योगों के लिए स्वच्छ ऊर्जा विकल्प प्रस्तुत करता है। 2030 तक पाँच मिलियन मीट्रिक टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। यह भारत को तेल आयात से काफी हद तक मुक्त कर सकता है।

परिवहन क्षेत्र में “विद्युत वाहन” एक और बड़ा परिवर्तन ला रहे हैं। भारत में तेल की खपत का लगभग एक-तिहाई भाग यातायात से संबंधित है। फेम-2 योजना के अंतर्गत इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। इससे पेट्रोल-डीज़ल की खपत घटेगी, प्रदूषण कम होगा और नागरिकों को सस्ती व स्वच्छ यात्रा सुविधा मिलेगी।

अब बात करें जैव प्रौद्योगिकी की — यह भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए ऊर्जा स्वतंत्रता का स्वदेशी समाधान बन सकती है। जैव प्रौद्योगिकी से बायोफ्यूल, बायोगैस और बायोडीज़ल जैसे वैकल्पिक ईंधन तैयार किए जाते हैं। इनका स्रोत है — कृषि अपशिष्ट, पशु मल, औद्योगिक जैविक कचरा तथा शैवाल।

कृषि अवशेषों से ईंधन बनाने की तकनीकें अब “सेकंड जेनरेशन” और “थर्ड जेनरेशन” स्तर तक पहुँच चुकी हैं। हरियाणा के पानीपत में स्थापित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन का बायो-एथेनॉल संयंत्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ पराली से एथेनॉल तैयार किया जा रहा है, जो पेट्रोल में मिलाया जाता है। इससे किसानों को पराली जलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती और पर्यावरण प्रदूषण में कमी आती है।

भारत सरकार ने 2025 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य रखा है। इससे न केवल विदेशी मुद्रा की बचत होगी बल्कि किसानों की आय भी बढ़ेगी। जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से ऊर्जा फसलों में आनुवंशिक सुधार किया जा रहा है ताकि उनसे अधिक मात्रा में एथेनॉल और बायोडीज़ल प्राप्त हो सके।

शैवाल आधारित ईंधन उत्पादन की दिशा में भी अनुसंधान चल रहा है। समुद्री शैवाल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऊर्जा उत्पन्न करने में सक्षम हैं। इस प्रक्रिया से “बायो-हाइड्रोजन” भी निर्मित किया जा सकता है। यदि इसे बड़े पैमाने पर अपनाया गया तो यह पारंपरिक पेट्रोलियम का विकल्प बन सकता है।

“बायोरिफाइनरी मॉडल” भी भारत की जैव-आर्थिक प्रगति में नई दिशा दे रहा है। इस मॉडल में एक ही जैविक कच्चे माल से ऊर्जा, रसायन, प्लास्टिक विकल्प और अन्य मूल्यवान उत्पाद तैयार किए जाते हैं। यह मॉडल शून्य अपशिष्ट नीति के अनुरूप है और ग्रामीण उद्योगों को सशक्त बनाता है।

ग्रामीण भारत में बायोगैस संयंत्रों की स्थापना से ऊर्जा क्रांति लाई जा सकती है। गोबर और जैविक कचरे से उत्पन्न बायोगैस घरेलू उपयोग के साथ-साथ लघु उद्योगों को भी ऊर्जा प्रदान कर सकती है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार, स्वच्छता और आत्मनिर्भरता तीनों को बल मिलता है।

ऊर्जा स्वतंत्रता केवल तकनीकी विषय नहीं है, यह सामाजिक और आर्थिक बदलाव का प्रतीक भी है। हमें अपनी जीवनशैली में ऊर्जा दक्षता को अपनाना होगा। “ऊर्जा बचत ही ऊर्जा उत्पादन है” — इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारना होगा।

सरकार को अनुसंधान और नवाचार में निवेश बढ़ाना होगा। विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्योगों के बीच सहयोग से स्वदेशी प्रौद्योगिकियाँ विकसित की जा सकती हैं। साथ ही, जैविक कचरे से ऊर्जा उत्पादन हेतु वित्तीय प्रोत्साहन और सब्सिडी की नीति को सुदृढ़ बनाना होगा।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। भारत “अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन” का संस्थापक सदस्य है, जिसने 100 से अधिक देशों को सौर ऊर्जा विकास के लिए जोड़ा है। इसी प्रकार “जी-20” और “संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन” जैसे मंचों पर भारत स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक नेता के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है।

2047 तक ऊर्जा स्वतंत्रता प्राप्त करने से भारत को आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय — तीनों क्षेत्रों में लाभ होगा। विदेशी मुद्रा की बचत, प्रदूषण में कमी, ग्रामीण आय में वृद्धि और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी। जैव प्रौद्योगिकी आधारित उद्योग नए रोजगार और उद्यम के अवसर भी प्रदान करेंगे।

अंततः भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता केवल आर्थिक स्वायत्तता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मसम्मान का प्रतीक होगी। जिस दिन भारत अपने खेतों, प्रयोगशालाओं और सूरज की किरणों से अपनी पूरी ऊर्जा आवश्यकता पूरी करेगा, उस दिन वह सच्चे अर्थों में “आत्मनिर्भर भारत” कहलाएगा।

2047 तक की यह यात्रा कठिन अवश्य है, किंतु असंभव नहीं। स्वच्छ प्रौद्योगिकी और जैव प्रौद्योगिकी के संयुक्त प्रयासों से भारत न केवल ऊर्जा आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि विश्व को हरित विकास और सतत ऊर्जा की दिशा में मार्गदर्शन देने वाला देश भी बन सकता है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

असम के पूर्व केंद्रीय मंत्री और 17 सदस्यों ने भाजपा छोड़ी

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असम में भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा है। असम के पूर्व केंद्रीय मंत्री और चार बार के भाजपा सांसद राजेन गोहेन ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उनके साथ कुल 17 अन्य सदस्यों ने भी पार्टी से अपना त्यागपत्र सौंपा। राजेन गोहेन ने यह फैसला राज्य भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया को लिखे पत्र में बताया। पत्र में उन्होंने कहा कि वे पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और सभी जिम्मेदारियों से तुरंत प्रभाव से हट रहे हैं।


बताया जाता है कि इस्तीफा देने वाले अधिकांश सदस्य ऊपरी और मध्य असम से हैं। राजेन गोहेन ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि उन्होंने इस्तीफा इसलिए दिया क्योंकि पार्टी ने ‘असम के लोगों से किए गए वादों को पूरा नहीं किया । स्थानीय समुदायों को धोखा दिया, जबकि बाहरी लोगों को राज्य में बसने की अनुमति दी।’

राजेन गोहेन ने 1999 से 2019 तक नागांव संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और 2016 से 2019 तक रेल मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रहे। भाजपा में रहते हुए वो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वे पेशे से चाय बागान के मालिक भी है। इसके अलावा कई अन्य क्षेत्रों में उनका काफी प्रभाव है। उनके जाने से भाजपा को राज्य में नुकसान हो सकता है।

खांसी के सिरप का क़हर

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दवा हमारी रोजमर्रा की जरूरतों में शामिल है। सिरदर्द, जुकाम और बुखार की गोलियाँ और खांसी की दवा का घरों में रखना इस बात का संकेत है कि लोगों को डॉक्टरों, अस्पतालों और मेडिकल स्टोर से मिलने वाली दवाओं पर पूरा भरोसा है। दवा रोग से मुक्त होने के लिए ली जाती है, लेकिन जब दवा ज़हर बन जाए और बीमार को ठीक करने की बजाय उसकी मौत का कारण बन जाए, तो बहुत तकलीफ होती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कफ सिरप ज़हर बन गया और देखते ही देखते पांच वर्ष से कम उम्र के कई बच्चों की मौत हो गई। मध्य प्रदेश में 16 और राजस्थान में तीन बच्चे मौत का शिकार हुए। इसके बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में कफ सिरप बनाने वाली कंपनियों के सिरप और अन्य उत्पादों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इनमें कोल्ड्रिफ, डेक्सट्राॅमिथरफेन और नेक्सा डीएस कफ सिरप शामिल हैं। केंद्र के औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने कोल्ड्रिफ कफ सिरप बनाने वाली कंपनी श्रीसन फार्मास्युटिक्स के खिलाफ सख्त कार्रवाई शुरू कर दी।
राजस्थान में कायसन फार्मा के डेक्सट्राॅमिथरफेन कफ सिरप से बच्चों की मौत हुई, जबकि मध्य प्रदेश में तमिलनाडु में बने श्रीमन फार्मा के कफ सिरप कोल्ड्रिफ के इस्तेमाल से बच्चे मौत का ग्रास बने। कोल्ड्रिफ में खतरनाक रसायन डाइएथिलीन ग्लाइकॉल (डीईजी) की मात्रा तय सीमा से ज्यादा पाई गई। मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान और केरल की सरकारों ने दवा के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध लगाते हुए कंपनियों से स्पष्टीकरण मांगा है। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने जांच के आदेश देते हुए कहा कि दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। कफ सिरप बनाने वाली फैक्ट्री कांचीपुरम में है। प्रकरण की जांच के लिए तमिलनाडु सरकार को पत्र लिखा और वहां से रिपोर्ट मिलने के बाद इस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया गया। तमिलनाडु सरकार ने सिरप के नमूनों में मिलावट मिलने के बाद पूरे राज्य में सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया और संयंत्र में उत्पादन बंद करा दिया। राजस्थान सरकार ने जयपुर के कायसन फार्मा प्लांट में निर्मित सभी 19 दवाओं के वितरण पर पाबंदी लगा दी। राज्य के दवा नियंत्रक राजाराम शर्मा को निलंबित किया गया। मध्य प्रदेश में दो ओषधि निरीक्षक गौरव शर्मा व शरद कुमार जैन और खाद्य एवं ओषधि प्रशासन के उप निदेशक शोभित कोस्टा को निलंबित और राज्य के ओषधि नियंत्रक दिनेश मौर्य का तबादला कर दिया गया। केरल की स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्री वीना जाॅर्ज के मुताबिक अन्य राज्यों से रिपोर्ट आने के बाद राज्य में कोल्ड्रिफ सिरप की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि डीईजी एक विषैला और हानिकारक रसायन है। कोल्ड्रिफ सिरप में डीईजी रसायन की मात्रा 48.6 प्रतिशत डब्ल्यू/वी पाई गई, जो अनुमत सीमा 0.1 से बहुत ज्यादा है। डाइएथिलीन ग्लाइकॉल बेहद खतरनाक रसायन है। यह मीठा, रंगहीन, गंधहीन होता है और मुख्य रूप से पेंट और प्लास्टिक के निर्माण में औद्योगिक विलायक के रूप में उपयोग में आता है। दवाओं में इसका इस्तेमाल पूरी तरह से प्रतिबंधित है, लेकिन दवा कंपनियाँ अपने मुनाफे के लिए इसे प्रोपीलीन ग्लाइकाॅल के साथ मिलाती हैं। यह रसायन सुरक्षित है, लेकिन काफी मंहगा है। इसलिए इसे सस्ते, किंतु जहरीले डाइएथिलीन ग्लाइकाॅल में मिलाया जाता है। शरीर में जाने के बाद डीईजी और ईजी विषैले यौगिकों में टूट जाते हैं। ये गुर्द, यकृत और तंत्रिका तंत्र को हानि पहुंचाते हैं। बच्चों में उल्टी, पेट दर्द और पेशाब कम होना इसके आरंभिक लक्षण हैं। बाद में गुर्दे कार्य करना बंद कर देते हैं और रोगी की मौत हो जाती है। चूंकि बच्चे अपने शरीर के भार के हिसाब से काफी कमजोर और असुरक्षित होते हैं, इसलिए इस विषाक्त रसायन की थोड़ी मात्रा भी उनके लिए लेने वाली हो सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बार बार डीईजी और ईजी से दूषित खांसी के शरबत के विषय में चेतावनी जारी की। संगठन ने दो-स्तरीय नई परीक्षण विधियां भी विकसित कीं। सरकारों से निगरानी बढ़ाने, घटिया दवाओं को हटाने और दवा आपूर्ति श्रंखलाओं पर सख्त जांच सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया है।
देश में कफ सिरप से मौतों का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं। फार्मा कंपनियों पर विषाक्त कफ सिरप की बिना पर मासूमों की जान जाने के आरोप लगते रहे हैं। तीन वर्ष पूर्व गाम्बिया में हरियाणा की कंपनी मेडेन फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड में तैयार दवा पर डब्ल्यूएचओ ने डीईजी और ईजी होने की चेतावनी दी थी। गाम्बिया में कफ सिरप के कारण 70 मासूम बच्चों की मौत होने के बाद काफी हंगामा हुआ था, जबकि नोएडा के मेरीन बायोटेक में निर्मित कफ सिरप में मिलावट से उज्बेकिस्तान में कई मौतें हुई थीं। इन वाकियात के बाद दुनिया भर में काफी बदनामी हुई, लेकिन इन दर्दीले वाकियात से कोई सबक नहीं लिया गया। 1972 में चेनई में कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकाॅल की मिलावट के कारण 14 बच्चों की मौत हुई, तो 1986 में मुंबई के जेजे अस्पताल में मिलावटी ग्लिसरीन के इस्तेमाल से 14 लोगों का निधन हुआ। 2020 में जम्मू व कश्मीर के ऊधमपुर जिले में डिजिटल लेबोरेटरीज द्वारा बनाए गए डाइएथिलीन ग्लाइकाॅल की मिलावट वाले कफ सिरप से 12 बच्चों की मौत हुई थी।
भारत न सिर्फ अपने देश बल्कि अन्य निम्न और मध्यम आय वाले देशों को भी सस्ती दवाओं की आपूर्ति करता है। ऐसे में इस प्रकार की घटनाएं देश की छवि को खराब करने के अलावा आर्थिक और सामाजिक रूप से भी हानिकारक हो सकती हैं। इनसे जनता के विश्वास के अलावा दवाओं की वैश्विक प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुँच सकता है। ये घटनाएँ दवा कंपनियों द्वारा दवाओं के निर्माण, वितरण और परीक्षण की पूरी प्रक्रिया में खामियों को उजागर करती हैं। 24 अगस्त को मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के परासिया ब्लॉक में पहला मरीज मिला और सात नवंबर को उसकी मौत हो गई। जब छिंदवाड़ा में पाँच साल से कम उम्र के कई बच्चों की मौत हो गई, तब अधिकारियों को कुछ गड़बड़ का अंदेशा हुआ। प्रारंभिक जांच में कुछ पता नहीं चला। अभिभावकों के पोस्टमार्टम नहीं कराने से भी मामला उलझा रहा, लेकिन जब सभी बच्चों के गुर्दों के काम नहीं करने की जानकारी हुई, तब इसे कफ सिरप से जोड़कर देखा गया। सवाल यह है कि इस किस्म की घटनाओं के लिए कौन जिम्मेदार है? क्या भविष्य में मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ पर प्रतिबंध लग जाएगा? इन वाकियात में रसायनों के अनुपात को बिगाड़ते हुए ज्यादा मुनाफा कमाने में लिप्त दवा बनाने वाली कंपनियों का इलाज किस के पास है? क्या दवाइयों की जांच के नाम पर महज खानापूर्ति और दवा सही होने के झूठे प्रमाण पत्र देने वाले अधिरियों के विरुद्ध भी कार्रवाई होगी? अब फार्मास्युटिकल्स इंडस्ट्री और रेगुलेट्री संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने का समय आ गया है। चिकित्सकों और फार्मासिस्टों को भी बच्चों को सिरप या एंटीबायोटिक लिखने से पहले उचित एहतियात की आवश्यकता है। हाल की घटनाओं के बाद प्रभावित रियासतों की हुकूमतों ने विवादित सिरपों पर प्रतिबंध लगाते हुए जांच के आदेश दिए हैं। केद्र सरकार की ओर से भी एडवाइजरी जारी करने के अलावा तहकीकात के लिए एक कमेटी बनाई गई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह कार्रवाई ठोस परिणाम और बदलाव का संबल बनेगी।


       
एमए कंवल जाफरी
वरिष्ठ पत्रकार