राग स्वदेशी : हक़ीक़त और फ़साना

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                                                          तनवीर जाफ़री 

  हमारे देश में स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल करने के लिये प्रायः आवाज़ बुलंद की जाती है। भारत में स्वदेशी सामानों के इस्तेमाल पर ज़ोर इसलिए दिया जाता है क्योंकि इससे देश की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कई महत्वपूर्ण लाभ होते हैं। देश में स्वदेशी सामान की खपत से स्वदेशी वस्तुओं का उत्पादन बढ़ता है, जिससे स्थानीय उद्योगों को बल मिलता है। इससे रोज़गार के नए अवसर पैदा होते हैं और बेरोज़गारी की समस्या कम होती है। इसके अतिरिक्त विदेशी उत्पाद पर निर्भरता भी कम होती है। इसीलिये कभी सरकार की तरफ़ से देश को आत्मनिर्भर बनाने के मक़सद से स्वदेशी अपनाने के बारे में देश को जागृत करने के प्रयास किये जाते हैं तो कभी स्वदेशी उत्पादों के नाम पर अपना व्यवसाय चलाने वाले भी ‘स्वदेशी अपनाओ ‘ की बातें करते नज़र आते हैं। परन्तु क्या वजह है कि हम तो स्वदेशी का राग ही अलापते रह जाते हैं उधर पड़ोसी देश चीन का बड़े भारतीय बाज़ार पर क़ब्ज़ा हो जाता है ? चीन निर्मित शायद ही कोई ऐसा जीवनोपयोगी उत्पाद हो जिसकी भरपूर खपत भारत में न होती हो। परन्तु हमारे देश में स्वदेशी अपनाओ का शोर तो ज़्यादा सुनाई देता है परन्तु उसकी गुणवत्ता सुधारने या उचित क़ीमत में आकर्षक,टिकाऊ व योग्य वस्तु का उत्पादन करने पर ज़ोर कम दिया जाता है। 

                 स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई प्रमुख अवसरों पर आत्मनिर्भर भारत बनाने हेतु स्वदेशी अपनाने के संबंध में जनता से अपील कर चुके हैं। वे दुकानों को स्वदेशी वस्तुओं से सजाने और भारतीय उत्पादों को गर्व से उपयोग करने के लिए नागरिकों को प्रेरित करते रहते हैं। प्रधानमंत्री का मानना है कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब भारतीय सामान वैश्विक बाज़ार में अपनी पहचान बनाएं और प्रत्येक नागरिक स्वदेशी उत्पादों के इस्तेमाल पर गर्व महसूस करे। इसीलिये प्रधानमंत्री अक्सर ‘वोकल फ़ॉर लोकल’ की बात करते सुने जाते हैं जिसमें स्थानीय बाज़ार और उत्पादों को बढ़ावा देने पर बल दिया जाता है। निःसंदेह भारत की आत्मनिर्भरता का मार्ग तभी मज़बूत होगा जब देशवासी अपने उत्पादन, तकनीक और नवाचार में स्वदेशी को प्राथमिकता दें। विदेशी वस्तुओं की जगह देसी उत्पाद को पहचान और सम्मान देना आज के दौर में राष्ट्रीय हित, सुरक्षा और आर्थिक मज़जबूती के लिए अत्यंत आवश्यक है।

             परन्तु सवाल यह है कि भारतवासियों के लिये स्वदेशी उत्पाद बनाने वाली कंपनियां या उद्योग अपने आप में कितने विश्वसनीय हैं ? क्या वजह है कि देश के लोगों को भारतीय उत्पाद  की तुलना में अनेक विदेशी उत्पाद ज़्यादा पसंद आते हैं। कई विपक्षी नेता तो यहां तक कहते हैं कि स्वदेशी अपनाने का पाठ पढ़ने वाले प्रधानमंत्री स्वयं विमान से लेकर मोबाईल फ़ोन,पेन,चश्मा व घड़ी आदि सब कुछ विदेशी प्रयोग करते हैं ? स्वदेशी उत्पाद बनाने व बेचने वाले रामदेव भी पूरे देश को स्वदेशी अपनाने की शिक्षा देते रहते हैं। परन्तु अनेक बार उनके उत्पाद मिलावटी या निर्धारित मानकों के प्रतिकूल पाए गये हैं। सेना सहित कई प्रमुख जगहों से पतंजली के उत्पाद हटाये जा चुके हैं। कई बार उनके उत्पाद गुणवत्ता के मानक पर खरे नहीं उतरे। ऐसे में स्वदेशी उत्पाद की विश्वसनीयता पर सवाल तो उठेगा ही ?

              इसी तरह पिछले दिनों तमिलनाडु में बने ‘कोल्ड्रिफ़’ नामक कोल्ड सीरप ने देशभर में हंगामा खड़ा कर दिया। इस सिरप के पीने से अब तक मध्य प्रदेश, राजस्थान, केरल, और अन्य राज्यों के 26 से अधिक बच्चों की मौत हो चुकी है। यह मामला भारत में स्वास्थ्य और दवा सुरक्षा व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। तमिलनाडु की श्रीसन फ़ार्मास्युटिकल कंपनी द्वारा निर्मित इस विषाक्त सीरप के सेवन से अनेक बच्चों की किडनी फ़ेल हो गयी और कई बच्चों की मौत हो गई। 14 वर्षों से निर्माणाधीन यही सीरप आख़िरकार रिक्तियों, नियमों के उल्लंघनों और मिलावट के कारण अपनी गुणवत्ता पर खरा नहीं उतरा और ज़हरीला साबित हुआ। क्या इस तरह की घटना भारत की दवा सुरक्षा प्रणाली की गंभीर चूक का संकेत नहीं है? निश्चित रूप से इस ज़हरीली दवा के निर्माण में मानकों का उल्लंघन हुआ, और इसे कई वर्षों तक बिना उचित निगरानी के बाज़ार में फैलने दिया गया। बेशक सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है और दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की दिशा में क़दम उठाने की बात भी की है परन्तु जिनके घरों के ‘चिराग़’ बुझ गये न तो उन्हें वापस लाया जा सकता है न ही उनपरिवारों को स्वदेशी उत्पाद पर भरोसा करने का पाठ पढ़ाया जा सकता है।  

                      आज पूरे देश में सरे आम ज़हरीली सब्ज़ियां,विषाक्त फल, मिलावटी व ज़हरीले दूध,पनीर घी मक्खन खोया कुट्टू का ज़हरीला आटा आदि तमाम चीज़ें बेचीं जा रही हैं। दूध की तो रोज़ के उत्पादन से कई गुना अधिक की खपत है, सरकार व प्रशासन को भी यह सब पता है परन्तु मिलावट ख़ोर मौत के सौदागर सरे आम ऐसी ज़हरीली सामग्री बाज़ार में खपा रहे हैं। तमाम नक़ली दवाइयां बाज़ार में बेचीं जा रही हैं। इसी तरह मिलावटी व ज़हरीली मिठाइयां व बेकरी के सामान बाज़ार में बेख़ौफ़ बिकते हैं। बाज़ार में इन सब चीज़ों की खपत का मुख्य कारण भ्रष्टाचार है। इन मौत के सौदागरों को भली भांति मालूम है कि उनके काले करतूतों का पर्दा फ़ाश होने के बावजूद उनका कुछ भी बिगड़ने वाला नहीं। केवल गुणवत्ता का ही प्रश्न नहीं बल्कि मिठाई वाला यदि आपको एक या दो हज़ार रूपये किलो मूल्य की मिठाई देता है तो वह गत्ते के डिब्बे को भी उसी रेट में तोल देता है। यानी आपको मंहगी क़ीमत अदा करने के बावजूद पूरा सामन नहीं मिल पाता। किसी सामग्री पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य को लेकर भी बड़ा गोलमाल देखा जा सकता है। कई बार तो प्रिंटेड रेट से आधे मूल्य पर भी दुकानदार सामन बेच देता है। जबकि आधे मूल्य पर बेचने पर भी दुकानदार मुनाफ़ा कमाता है।   

                  हमारे देश में अभी भी किसी वस्तु के प्रयोग की तिथि समाप्त होने यानी एक्सपायरी डेट निकल जाने के बावजूद सीधे सादे व अनपढ़ लोगों को ऐसा सामान बेच दिया जाता है। कई कम गुणवत्ता वाले सामानों पर किसी ब्रांडेड कम्पनी की मुहर लगा कर बाज़ार में बेच दिया जाता है। इस तरह की मानसिकता का केवल एक ही कारण है कि इस तरह के व्यापार करने वाला व्यक्ति कम समय में अधिक धन कमाना चाहता है। और अपने इस ‘ अनैतिक व नापाक मिशन’ में वह यह भी भूल जाता है कि ऐसा कर वह आम लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहा है क्योंकि उसे इस बात का पूरा यक़ीन रहता है कि किन्हीं विशेष परिस्थितियों में उसके पकड़े जाने के बावजूद उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं । लिहाज़ा देशवासियों को स्वदेशी उत्पाद अपनाने की सलाह देने वालों को चाहिये कि पहले उत्पादन कर्ताओं को यह सख़्त निर्देश व सन्देश दिया जाये कि गुणवत्ता से कोई समझौता न हो। मिलावट ख़ोरी,नक़ली व ज़हरीले खाद्य पदार्थ बाज़ार से पूरी तरह ग़ायब हों। देशवासियों को ज़हरीली सामग्री बेचने वालों को सामूहिक हत्या के अभिप्रायपूर्वक किये गये प्रयास का दोषी मानकर दण्डित किया जाये। भारतीय उत्पाद की क़ीमतें व नाप तौल ठीक हों। जब तक देशवासियों में स्वदेशी उत्पाद के प्रति पूरा विश्वास पैदा नहीं होता तब तक ‘राग स्वदेशी’ अलापना इसलिये मुनासिब नहीं क्योंकि इसकी हक़ीक़त कुछ और है जबकि असली फ़साना कुछ और।                                                                त

तनवीर जाफ़री

वरिष्ठ पत्रकार

मासिक धर्म अवकाश नीति को पूरे देश में लागू किया जाए

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“हर राज्य में लागू हो मासिक धर्म अवकाश — महिला सम्मान का नया अध्याय”

कर्नाटक सरकार द्वारा मासिक धर्म अवकाश नीति लागू करना एक सराहनीय और संवेदनशील पहल है। यह निर्णय महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और कार्यस्थल की समानता को नई दिशा देता है। मासिक धर्म के दौरान एक दिन का सवेतन अवकाश उन्हें शारीरिक राहत के साथ आत्मसम्मान की अनुभूति भी कराता है। अब आवश्यकता है कि यह नीति केवल कर्नाटक तक सीमित न रहे, बल्कि पूरे भारत में लागू की जाए ताकि हर कार्यरत महिला को समान अधिकार और सम्मान मिल सके। यह कदम महिला सशक्तिकरण और मानवीय संवेदनशीलता का सशक्त प्रतीक है।

– डॉ प्रियंका सौरभ

आज जब महिलाएँ हर क्षेत्र में बराबरी से काम कर रही हैं, तब यह जरूरी है कि नीतियाँ भी उनके अनुभवों और जरूरतों के अनुसार बनें। कर्नाटक सरकार ने मासिक धर्म अवकाश की जो पहल की है, वह न केवल महिला स्वास्थ्य की दृष्टि से ऐतिहासिक है, बल्कि यह सामाजिक सोच में बदलाव का प्रतीक भी है।

राज्य सरकार ने यह व्यवस्था लागू की है कि सभी सरकारी दफ्तरों, आईटी कंपनियों और फैक्ट्रियों में कामकाजी महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान हर माह एक दिन का सवेतन अवकाश (Paid Leave) मिलेगा। यह कदम उस संवेदनशीलता का परिचायक है जिसकी महिलाओं को लंबे समय से प्रतीक्षा थी।

महिलाएँ समाज और अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं। मासिक धर्म उनके शरीर की प्राकृतिक प्रक्रिया है, परंतु सदियों से इसे सामाजिक असहजता और मौन के घेरे में रखा गया। इस अवधि में शारीरिक दर्द, असुविधा और मानसिक थकान का अनुभव आम है, लेकिन कार्यस्थलों पर उनसे सामान्य दिनों जैसी कार्यक्षमता की अपेक्षा की जाती रही है। अब जब सरकारें इस जैविक प्रक्रिया को नीति निर्माण में शामिल कर रही हैं, तो यह समाज के परिपक्व होने की निशानी है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मत है कि मासिक धर्म के शुरुआती दिनों में विश्राम और मानसिक स्थिरता अत्यंत आवश्यक होती है। इस अवधि में अत्यधिक काम करने या तनाव लेने से महिलाओं में कई स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इसलिए यह नीति सिर्फ सुविधा नहीं बल्कि महिला स्वास्थ्य के संरक्षण का साधन भी है।

यह नीति नारी-सशक्तिकरण की परिभाषा को और गहराई देती है। सशक्तिकरण का अर्थ केवल अधिकारों की बात करना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुरूप सम्मान देना है। जब राज्य स्वयं यह स्वीकार करता है कि महिला शरीर की आवश्यकताएँ विशेष हैं, तो यह समानता की दिशा में उठाया गया वास्तविक कदम है।

कर्नाटक का यह निर्णय समाज में एक बड़ा संदेश देता है — कि महिलाओं की जैविक प्रक्रिया को अब छिपाने या शर्म की दृष्टि से देखने की बजाय सामान्य जीवन का हिस्सा समझा जाना चाहिए। यह नीति मासिक धर्म के विषय को सार्वजनिक विमर्श में लाकर इसे सामान्य और सम्मानजनक बनाती है।

इस निर्णय से यह उम्मीद भी बढ़ी है कि अन्य राज्य सरकारें और निजी कंपनियाँ भी इस दिशा में कदम उठाएँगी। कुछ वर्ष पहले केरल और ओडिशा जैसे राज्यों में इस विषय पर चर्चा तो हुई, पर नीति नहीं बनी। अब कर्नाटक ने जो उदाहरण पेश किया है, वह अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा बनेगा।

वास्तव में, यह समय की माँग है कि भारत सरकार भी राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी नीति बनाए, जिससे हर क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं — सरकारी कर्मचारी, शिक्षिका, नर्स, बैंक अधिकारी, फैक्ट्री वर्कर या निजी क्षेत्र की कर्मचारी — सभी को समान रूप से यह अधिकार प्राप्त हो।

यह नीति केवल छुट्टी देने का मामला नहीं है, बल्कि यह महिलाओं की गरिमा, स्वास्थ्य और आत्मसम्मान से जुड़ा प्रश्न है। इससे वे बिना अपराधबोध या झिझक के अपने शरीर की जरूरतों को प्राथमिकता दे सकेंगी।

कुछ आलोचक इस नीति को अतिरिक्त विशेषाधिकार बताकर इसे कमजोर करने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि समानता का अर्थ एक जैसी परिस्थितियाँ नहीं बल्कि न्यायपूर्ण व्यवहार है। पुरुषों को मासिक धर्म की शारीरिक पीड़ा नहीं झेलनी पड़ती, इसलिए महिलाओं को इस समय विश्राम का अधिकार देना किसी प्रकार का पक्षपात नहीं बल्कि संवेदनशील न्याय है।

भारत में महिला जनसंख्या लगभग आधी है। यदि यह नीति पूरे देश में लागू की जाती है, तो न केवल महिलाओं का स्वास्थ्य सुधरेगा बल्कि कार्यस्थलों की उत्पादकता, वातावरण और लैंगिक समानता भी मजबूत होगी।

यह भी आवश्यक है कि कार्यस्थलों पर इस नीति के अनुपालन के साथ-साथ संवेदनशील माहौल बनाया जाए ताकि महिलाएँ इस अवकाश का उपयोग बिना झिझक कर सकें। यह शिक्षा, कॉरपोरेट जगत और मीडिया सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि मासिक धर्म के विषय को अब सामान्य संवाद का हिस्सा बनाया जाए।

कर्नाटक की यह पहल दर्शाती है कि सरकारें जब संवेदनशील दृष्टि से सोचती हैं, तो नीतियाँ सिर्फ प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहतीं — वे समाज के चरित्र को बदलने का माध्यम बन जाती हैं।

इसलिए अब आवश्यकता है कि भारत के सभी राज्यों और केंद्र सरकार को इस नीति को अपनाकर पूरे देश में लागू करना चाहिए। इससे भारत दुनिया के उन देशों की श्रेणी में शामिल होगा, जिन्होंने महिलाओं के प्रति वास्तविक समानता का उदाहरण प्रस्तुत किया है।

यह नीति भारत को केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी आगे ले जाएगी। यही वह सोच है जो एक संवेदनशील, समानतापूर्ण और आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा दिखाती है।

कर्नाटक ने रास्ता दिखा दिया है — अब बारी पूरे भारत की है। कर्नाटक की मासिक धर्म अवकाश नीति न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि यह भारतीय समाज के विचार और संवेदनशीलता में गहरे बदलाव का प्रतीक है। यह कदम बताता है कि जब सरकारें नीतियाँ बनाते समय महिलाओं के अनुभवों, स्वास्थ्य और गरिमा को प्राथमिकता देती हैं, तो समाज अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण बनता है। यह नीति महिलाओं को अपने शरीर के प्रति अपराधबोध से मुक्त कर आत्म-सम्मान की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर देती है।

आज आवश्यकता है कि इस पहल को केवल कर्नाटक तक सीमित न रखा जाए। भारत के हर राज्य और केंद्र सरकार को इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू कर, सभी कार्यरत महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करने चाहिए। इससे कार्यस्थलों पर समानता, स्वास्थ्य और उत्पादकता तीनों का संतुलन स्थापित होगा।

महिला सशक्तिकरण की असली कसौटी वही है, जहाँ नीतियाँ संवेदना के साथ न्याय भी करें। कर्नाटक का यह कदम उसी दिशा में एक सुनहरी शुरुआत है। यदि यह नीति पूरे भारत में लागू होती है, तो यह न केवल महिलाओं के लिए राहत का प्रतीक होगी, बल्कि एक संवेदनशील, आधुनिक और सम्मानजनक भारत की नींव भी रखेगी।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

सभी क्षेत्र में तरक्की कर रही हैं बालिकाएं

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​हर साल 11 अक्टूबर को विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस (International Day of the Girl Child) मनाया जाता है। यह दिवस बालिकाओं के अधिकारों को पहचानने, उनके सामने आने वाली अनूठी चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। यह न केवल एक उत्सव का दिन है, बल्कि दुनिया भर की लड़कियों की आवाज को सशक्त करने और उन्हें आगे बढ़ने के लिए एक सुरक्षित, समान और समृद्ध वातावरण प्रदान करने के लिए सामूहिक कार्रवाई का आह्वान भी है। इस विशेष अवसर पर, भारत में बालिकाओं की वर्तमान स्थिति का गहन विश्लेषण करना प्रासंगिक है।

​अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस का महत्व और उद्देश्य

​अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 19 दिसंबर 2011 को एक प्रस्ताव पारित करने के बाद हुई, जिसके बाद पहला अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस 11 अक्टूबर 2012 को मनाया गया। इस दिन को मनाने का मुख्य उद्देश्य बालिकाओं के मानवाधिकारों की पूर्ति को बढ़ावा देना, लैंगिक समानता पर ज़ोर देना और यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक बालिका अपनी पूरी क्षमता का एहसास कर सके। यह दिवस लड़कियों के शिक्षा, पोषण, चिकित्सा अधिकार, कानूनी अधिकार, और बाल विवाह जैसी चुनौतियों के बारे में जागरूकता बढ़ाता है।
​भारत में बालिकाओं के कल्याण और अधिकारों को समर्पित राष्ट्रीय बालिका दिवस भी है, जो हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है। ये दोनों दिवस मिलकर देश और विश्व स्तर पर बालिकाओं के महत्व को रेखांकित करते हैं।

​भारत में बालिकाओं की स्थिति: एक जटिल तस्वीर

​भारत एक ऐसा देश है जिसका इतिहास प्राचीन काल में महिलाओं को उच्च दर्जा देने का रहा है, जहां गार्गी, मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि, मध्ययुगीन काल और विदेशी शासन के दौरान समाज में अनेक कुरीतियां और विकृतियां पैदा हुईं, जिससे महिलाओं और बालिकाओं की स्थिति में गिरावट आई। स्वतंत्रता के बाद, भारतीय संविधान ने लैंगिक समानता और सभी नागरिकों के लिए समान अवसरों की गारंटी दी, जिसके परिणामस्वरूप बालिकाओं की स्थिति में सुधार की एक धीमी, लेकिन निश्चित यात्रा शुरू हुई।
​वर्तमान में, भारत में बालिकाओं की स्थिति दो विपरीत सत्यों को दर्शाती है: एक तरफ, अभूतपूर्व प्रगति और दूसरी तरफ, गहरी जड़ें जमाए हुए सामाजिक और आर्थिक चुनौतियाँ।
​1. शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति और चुनौतियाँ
​शिक्षा किसी भी बालिका के सशक्तिकरण की पहली सीढ़ी है। पिछले कुछ दशकों में भारत ने बालिका शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।
​सकारात्मक पहलू:

​साक्षरता दर में वृद्धि: 1951 से 2011 तक स्त्री साक्षरता दर में लगभग 57.7% की वृद्धि हुई है। 2011 की जनगणना के अनुसार, महिला साक्षरता दर 65.46% थी, जो 2001 में 53.67% थी।

​नामांकन में सुधार: यू-डाइस रिपोर्ट (2019-20) के अनुसार, प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक स्तर तक बालिकाओं के नामांकन में वृद्धि हुई है, जो दर्शाता है कि सरकार के प्रयासों और सामाजिक जागरूकता के सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं।

​उच्च शिक्षा और पेशेवर क्षेत्रों में सफलता: अब बालिकाएं केवल पारंपरिक क्षेत्रों तक सीमित नहीं हैं। वे इंजीनियरिंग, पायलट, वैज्ञानिक, तकनीशियन, सेना, पत्रकारिता और सॉफ्टवेयर उद्योग जैसे पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में भी अपनी योग्यता प्रदर्शित कर रही हैं। कई बड़े शिक्षण संस्थानों में शीर्ष स्थानों पर बालिकाओं का चयन बालकों की तुलना में अधिक हो रहा है।

​चुनौतियाँ:

​लैंगिक साक्षरता अंतर: हालांकि साक्षरता दर बढ़ी है, फिर भी पुरुष और महिला साक्षरता दर में अंतर मौजूद है (2011 में लगभग 16.68%)।

​स्कूल छोड़ने की दर: प्राथमिक शिक्षा के बाद माध्यमिक विद्यालय दूर होने या अभिभावकों की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में कई बालिकाएं पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं।

​सामाजिक कुप्रथाएं: बाल विवाह, पर्दा प्रथा और दहेज जैसी सामाजिक कुप्रथाएं आज भी ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में बालिका शिक्षा में बड़ी बाधा हैं।

​2. स्वास्थ्य और पोषण
​स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बालिकाओं को गंभीर लैंगिक असमानता का सामना करना पड़ता है।
​चुनौतियाँ:

​असुरक्षित जन्म दर और कन्या भ्रूण हत्या: भारत दुनिया का इकलौता बड़ा देश है, जहां लड़कों से ज्यादा बच्चियों की मौत होती है। हालांकि, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियानों और कानूनी प्रतिबंधों के कारण जन्म के समय लिंगानुपात में सुधार के संकेत मिले हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में असमानता अभी भी बनी हुई है।

​शिशु मृत्यु दर: भारत में पाँच साल से कम उम्र की लड़कियों की मृत्यु दर लड़कों की तुलना में 8.3% अधिक है, जो लड़कियों के प्रति भेदभावपूर्ण पोषण और स्वास्थ्य देखभाल को दर्शाता है।

​एनीमिया (रक्ताल्पता): पोषण की कमी के कारण किशोरियों और महिलाओं में एनीमिया एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है।

​3. सामाजिक और कानूनी अधिकार
​सामाजिक ताने-बाने में बालिकाओं के प्रति गहरी जड़ें जमाए हुए रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रह हैं।
​चुनौतियाँ:

​भेदभाव और रूढ़िबद्धता: उन्हें अक्सर मृदुभाषी, शांत और चुप रहने की अपेक्षा की जाती है, जबकि लड़कों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। लैंगिक भूमिकाओं से जुड़ी रूढ़िबद्धता महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह और भेदभाव को जन्म देती है।

​सुरक्षा और हिंसा: कन्या भ्रूण हत्या से लेकर यौन शोषण, हिंसा और कम उम्र में शादी तक, लड़कियों को अपने लिंग के कारण कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

​बाल विवाह: 21वीं सदी में भी बाल विवाह समाज में एक बड़ी समस्या बनी हुई है, जो लड़कियों को शिक्षा और विकास के अवसरों से वंचित कर देती है।

​’मिसिंग विमेन’ की संख्या: 2020 में ‘मिसिंग विमेन’ (लिंग-चयनात्मक गर्भपात और स्वास्थ्य भेदभाव के कारण जन्म के समय या बाद में जीवित नहीं रहने वाली लड़कियों/महिलाओं) की अनुमानित संख्या 142.6 मिलियन थी, जो लैंगिक असमानता की भयावहता को दर्शाती है।

​4. सरकारी पहल और सशक्तिकरण के प्रयास
​भारत सरकार ने बालिकाओं की स्थिति सुधारने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं और नीतियां शुरू की हैं।

​बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ (BBBP): यह योजना कन्या भ्रूण हत्या को रोकने, बालिकाओं की सुरक्षा और शिक्षा सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

​सुकन्या समृद्धि योजना: यह योजना बालिकाओं की शिक्षा और विवाह के लिए वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है।

​राष्ट्रीय बालिका दिवस: महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा 2008 में इसकी शुरुआत की गई थी, जिसका उद्देश्य लड़कियों के सामने आने वाली कठिनाइयों को दूर करना है।

​स्वयं सहायता समूह (SHG): ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता के लिए स्वयं सहायता समूहों का अभियान तेजी से बढ़ रहा है।

​शिक्षा के लिए प्रोत्साहन: बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए छात्रवृत्ति, साइकिल वितरण और सुरक्षित परिवहन जैसी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं।

​भविष्य की राह: पूर्ण सशक्तिकरण की ओर

​अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें याद दिलाता है कि बालिकाओं के सशक्तिकरण के बिना देश और समाज का समग्र विकास असंभव है। लैंगिक समानता और महिलाओं का सशक्तिकरण समृद्धि और सतत विकास प्राप्त करने के लिए अनिवार्य है, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) में भी शामिल है।
​पूर्ण सशक्तिकरण के लिए आवश्यक कदम:

​कानून का कठोर कार्यान्वयन: कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह और यौन उत्पीड़न से संबंधित कानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना।

​शिक्षा तक पहुंच और गुणवत्ता: प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक बालिकाओं की पहुंच सुनिश्चित करना, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में, और उन्हें व्यावसायिक शिक्षा के अवसर प्रदान करना।

​स्वास्थ्य और पोषण में समानता: यह सुनिश्चित करना कि लड़कियों को लड़कों के समान पोषण और स्वास्थ्य देखभाल मिले, और किशोरियों के लिए विशेष स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करना।

​सामाजिक सोच में बदलाव: समाज में गहरे जड़ें जमाए हुए लैंगिक पूर्वाग्रहों और रूढ़िवादिता को चुनौती देने के लिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाना। इसमें पुरुषों और लड़कों को भी समानता के समर्थक के रूप में शामिल करना महत्वपूर्ण है।

​सुरक्षित वातावरण: स्कूलों, सार्वजनिक स्थानों और कार्यस्थलों पर लड़कियों और महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाना।

​निष्कर्ष

​भारत में बालिकाओं की स्थिति एक ऐसी कहानी है जिसमें चुनौतियों के बावजूद आशा और प्रगति की किरणें हैं। अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस हमें उस महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़े होने का अवसर देता है जहां हमें केवल प्रगति का जश्न नहीं मनाना है, बल्कि बची हुई असमानताओं को दूर करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराना है। जब एक बालिका सशक्त होती है, तो उसका परिवार, उसका समुदाय और अंततः उसका राष्ट्र सशक्त होता है। जैसा कि पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “आप किसी राष्ट्र की स्थिति को उसकी महिलाओं की स्थिति को देखकर बता सकते हैं।” भारत को एक विश्व शक्ति बनने के लिए, हर बालिका को उसकी क्षमता का एहसास करने का अवसर मिलना चाहिए। हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि हर लड़की को सिर्फ ‘बेटी’ के रूप में नहीं, बल्कि ‘देश के भविष्य’ के रूप में देखा और माना जाए।

छठी मैय्या की पूजा, लेकिन यमुना की सजा आखिर कब जागेगा समाज?

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छठ पर्व भारतीय संस्कृति का वह अनुपम उत्सव है जिसमें प्रकृति, आस्था और अनुशासन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। यह पर्व केवल सूर्य उपासना का प्रतीक नहीं, बल्कि जल और पर्यावरण के प्रति हमारी श्रद्धा का भी सबसे सुंदर उदाहरण है। जब-जब छठी मैय्या का गीत गूंजता है, तब-तब नदी के तटों पर आस्था की लहरें उमड़ पड़ती हैं। परंतु आज जब हम छठ मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब एक गहरी चिंता मन में उठती है। क्या हमारी नदियाँ, विशेषकर यमुना, इस आस्था को स्वीकार करने लायक बची हैं। हालांकि यमुना केवल एक नदी नहीं, भारत की संस्कृति की धारा है। जिस जल में कभी कृष्ण की बंसी गूंजी, जिसमें मथुरा-वृंदावन की मिट्टी ने भक्ति का रंग भरा, आज वही यमुना शहरों की गंदगी और कारखानों के जहरीले रसायनों से कराह रही है। दिल्ली से लेकर आगरा तक यमुना के जल का स्वरूप देखकर कोई भी संवेदनशील व्यक्ति विचलित हुए बिना नहीं रह सकता। छठी मैय्या के उपासक जिस पवित्रता से जल अर्पित करते हैं, वह पवित्रता अब स्वयं यमुना में दिखाई नहीं देती। छठ पर्व हमें सिखाता है कि प्रकृति की पूजा केवल फूल-मालाओं से नहीं, बल्कि उसके संरक्षण से होती है। यमुना की सफाई के लिए केवल सरकारी योजनाएँ काफी नहीं होंगी। यह कार्य तभी सफल होगा जब जनता, समाज और प्रशासन मिलकर इसे एक सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार करेंगे। आज आवश्यकता है साफ यमुना सबका अभियान की। इसमें पहला कदम होना चाहिए कि गंदगी के स्रोतों की पहचान हो। यमुना में सबसे अधिक प्रदूषण नालों, सीवर और फैक्ट्री के केमिकल डिस्चार्ज से आता है। दिल्ली, फरीदाबाद, मथुरा और आगरा के बीच सैकड़ों छोटे-बड़े नाले सीधे नदी में गिर रहे हैं। अगर इन्हें चिन्हित कर, उन पर रोक लगा दी जाए तो आधी समस्या वहीं समाप्त हो जाएगी। हर जिले में नागरिक समितियाँ बनाई जा सकती हैं जो ऐसे बिंदुओं की निगरानी करें और प्रशासन को रिपोर्ट दें। दूसरा कदम फैक्ट्रियों की जिम्मेदारी तय की जाए। जो उद्योग अपना अपशिष्ट बिना ट्रीटमेंट के यमुना में बहा रहे हैं, उन पर भारी जुर्माना और सीलिंग की कार्रवाई हो। पर्यावरण विभाग को जनता की निगरानी के साथ जोड़ना होगा ताकि कोई भी उल्लंघन छिप न सके। तीसरा कदम धार्मिक आयोजनों में स्वच्छता का अनुशासन हो‌। छठ पूजा के अवसर पर लाखों श्रद्धालु यमुना तट पर एकत्रित होते हैं। उनकी भावना पवित्र है, लेकिन यदि आयोजन के बाद पूजा सामग्री, मूर्तियाँ, कपड़े या प्लास्टिक नदी में डाले जाएँ तो वही आस्था प्रदूषण का कारण बन जाती है। इसके लिए नगर निकायों को घाटों पर विशेष सफाई दल और कूड़ा संग्रह केंद्र लगाने चाहिए। साथ ही, भक्तों से यह अपील भी जरूरी है कि मैय्या की पूजा धरती को गंदा कर के नहीं, साफ रख कर करें। चौथा कदम जनजागरण और शिक्षा का हो‌। स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संस्थाओं में यमुना संकल्प सप्ताह मनाया जाए। ताकि नई पीढ़ी समझ सके कि धर्म और पर्यावरण एक-दूसरे के पूरक हैं। मीडिया की भूमिका भी अहम है। वह हर सप्ताह यमुना की स्थिति और सुधार कार्यों की रिपोर्ट जनता के सामने रखे। पाँचवाँ कदम तकनीकी उपाय का हो। यमुना किनारे पानी की गुणवत्ता मापने वाले सेंसर और सीसीटीवी कैमरे लगाए जाए। ताकि कोई भी संस्था या व्यक्ति चोरी-छिपे गंदगी न गिरा सके। साथ ही, छोटे स्तर पर जैविक ट्रीटमेंट प्लांट और नाले रोकने वाले फिल्टर सिस्टम लगाए जाए। छठ पर्व की आत्मा यही कहती है कि सूर्य और जल ये दोनों जीवन के आधार हैं। जब हम डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो यह केवल पूजा नहीं बल्कि कृतज्ञता का भाव होता है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि अगर हम अपनी नदियों को मरने देंगे, तो यह पूजा केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। यमुना की सफाई का अभियान दरअसल आस्था और अस्तित्व दोनों की रक्षा का संकल्प है। छठी मैय्या का यह पावन पर्व हमें यह याद दिलाता है कि पवित्रता केवल मंत्रों में नहीं, बल्कि हमारे कर्मों में बसती है। जब समाज का हर व्यक्ति यह ठान ले कि वह गंदगी नहीं फैलाएगा, नाले को नदी नहीं बनाएगा, फैक्ट्री को जिम्मेदार बनाएगा, तभी यमुना फिर से जीवन से भर उठेगी। आइए, इस बार छठ की संध्या पर हम सब मिलकर एक संकल्प लें कि मैय्या के अर्घ्य के साथ यमुना की रक्षा भी हमारी पूजा का हिस्सा है। अगर यह भावना जन-जन में बस गई तो यकीन मानिए कि फिर से यमुना बहेगी निर्मल, फिर से गूंजेगा भक्ति का स्वर और फिर छठी मैय्या का आशीर्वाद पूरे समाज को स्वच्छता और समृद्धि का संदेश देगा।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
(स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक)

नीला हाथी जागा, मगर क्या चलेगा भी?

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कभी वो दिन थे जब बहन मायावती का नाम लेते ही बड़े-बड़े नेता थर्रा जाते थे। बसपा की गूंज दिल्ली से लेकर दक्षिण तक सुनाई देती थी। यूपी की राजनीति में तो हालत ये थी कि मायावती का नाम ही जीत की गारंटी माना जाता था, लेकिन वक्त बदलता है साहब… और वक्त ने बसपा का रथ रोक दिया। जो पार्टी कभी सत्ता में थी वो अब सियासत के किनारे लग गई है, लेकिन पिछले गुरुवार को लखनऊ में हुई बहनजी की रैली ने जैसे सियासी हवा ही बदल दी। जिस भीड़ का अंदाज़ा किसी को नहीं था वो उमड़ पड़ी। लोग जोश में मायावती ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे। देखने वालों ने भी कहा कि अभी बहनजी बाकी हैं। मायावती ने मंच से साफ कहा कि बसपा 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी। यह बात पुराने दिनों की याद दिला गई जब बहनजी गठबंधन की बजाय खुद के बूते मैदान में उतरती थीं। उनके तेवर देखकर लग रहा था कि वो अब चुप बैठने वालों में नहीं हैं। दलित वोट जो बसपा की रीढ़ रहे हैं। अब अलग-अलग दलों में बिखर गए हैं। कोई सपा में, कोई कांग्रेस में, तो कुछ भाजपा के पाले में चले गये, लेकिन लखनऊ की रैली ने ये ज़रूर जताया कि सब बसपा से पूरी तरह कटे नहीं हैं। हां अब चुनौती बड़ी है कि संगठन कमजोर है। पुराने नेता किनारे हो गए हैं और सोशल मीडिया पर बसपा पिछड़ती दिखती है। सच कहें तो आज की राजनीति में सिर्फ भीड़ नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति दोनों ज़रूरी हैं। भाजपा, सपा और कांग्रेस ये बात समझ चुके हैं पर बसपा को अब इसे फिर से समझना होगा‌। दूसरी तरफ़ मुस्लिम वोट भी अब किसी एक खेमे में नहीं हैं। सपा और कांग्रेस उन्हें साधने में लगी हैं। ऐसे में मायावती को उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि बसपा ही भाजपा को रोक सकती है। दलितों को भावनात्मक रूप से जोड़ना और मुसलमानों को विश्वास दिलाना कि यही दो काम अगर बहनजी कर पाई तो कहानी फिर पलट सकती है। पर अब एक नया खिलाड़ी मैदान में उतर चुका है और वो है एडवोकेट चन्द्रशेखर आजाद। नगीना से उन्होंने पहली बार में ही जीत दर्ज करके सबको चौका दिया था। कई दलों ने उन्हें हल्के में लिया, लेकिन नतीजा सबके सामने है। राजनीति भी कभी-कभी क्रिकेट जैसी होती है कि जिस तरह भारत कभी कमजोर क्रिकेट टीम बांग्लादेश से हार गया था वैसे ही जो लोग आजाद समाज पार्टी को कमज़ोर समझ रहे हैं वो आने वाले वक्त में पछता सकते हैं। फिलहाल लखनऊ की रैली ने बसपा में फिर से हलचल तो पैदा कर दी है पर ये बस शुरुआत है। अगर मायावती अब सोशल मीडिया पर एक्टिव हो। युवाओं को टिकट दें। स्थानीय मुद्दों पर बोलें और पार्टी संगठन को ज़मीनी स्तर पर मज़बूत करें तो हो सकता है नीला हाथी एक बार फिर मैदान में गरजे। वरना ये रैली बस एक पुरानी याद बनकर रह जाएगी‌। जब लोगों ने बहनजी को फिर से सुना, मगर वोट किसी और को दे दिया।

भूपेन्द्र शर्मा सोनू
(स्वतंत्र पत्रकार एवं लेखक)

सत्ता की छाया में नौकरशाही: हरियाणा का आईना और देश की हकीकत

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(नौकरशाही में एक्सटेंशन संस्कृति) 

“नौकरशाही और राजनीतिक हुकूमत: सच बोलने का डर”

देश की नौकरशाही में एक्सटेंशन संस्कृति गंभीर समस्या बन चुकी है। वरिष्ठ अधिकारी सत्ता और राजनीतिक हाजिरी के आधार पर पदों पर टिके रहते हैं। हरियाणा के डीजीपी शत्रुजीत कपूर का मामला और आईपीएस पूरन कुमार की आत्महत्या यह दर्शाती है कि सच बोलने और ईमानदारी बनाए रखने की कोशिशें दबाई जा रही हैं। अफसरों के बीच गुटबाज़ी, भय और निष्पक्षता की कमी प्रशासनिक तंत्र को कमजोर कर रही है। यदि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की गई, तो प्रशासन केवल राजनीतिक हुकूमत का दास बनेगा और जनता का भरोसा टूट जाएगा।

– डॉ. सत्यवान सौरभ

देश की नौकरशाही में एक्सटेंशन संस्कृति आज एक गंभीर समस्या बन चुकी है। वरिष्ठ अधिकारी अपनी सेवा अवधि के बाद भी सत्ता के निकटता और राजनीतिक हाजिरी के आधार पर पदों पर टिके रहते हैं। इससे न केवल प्रशासनिक निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं बल्कि यह संदेश भी जाता है कि योग्यता और दक्षता से अधिक महत्वपूर्ण राजनीतिक सुख-संबंध और सत्ता के साथ सामंजस्य है। हरियाणा के डीजीपी शत्रुजीत कपूर का मामला, आईपीएस पूरन कुमार की दुखद आत्महत्या, और अफसरशाही के भीतर बढ़ती गुटबाज़ी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि सच बोलने और ईमानदारी बनाए रखने की कोशिशें धीरे-धीरे दबाई जा रही हैं।

आज देश में कई वरिष्ठ अधिकारी अपने निर्धारित सेवा अवधि के बाद भी एक्सटेंशन पर बने हुए हैं। कुछ लोग इसे अनुभव का लाभ मानते हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक सुविधा का परिणाम। वास्तविकता यह है कि एक्सटेंशन अब सम्मान नहीं बल्कि सत्ता के निकट रहने का प्रमाण बन चुका है। यदि कोई अफसर शासन की इच्छाओं के अनुरूप काम करता है तो उसके लिए नियमों की दीवारें लचीली हो जाती हैं, और यदि वह अपनी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ काम करता है तो उसे किनारे कर दिया जाता है।

हरियाणा में डीजीपी शत्रुजीत कपूर का मामला इस प्रवृत्ति का जीवंत उदाहरण है। जुलाई में सरकार ने घोषणा की कि वे 31 अक्टूबर 2026 तक अपने पद पर बने रहेंगे, यानी रिटायरमेंट तक। इस फैसले ने केवल आईपीएस बिरादरी में असंतोष नहीं फैलाया बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या किसी राज्य में इतनी लंबी अवधि के लिए राजनीतिक सुविधा अनुसार पद तय होना न्यायसंगत है।

आईपीएस पूरन कुमार का मामला इस संवेदनहीनता का काला अध्याय है। वह अधिकारी जिसने वर्षों से अपने साथ हुए भेदभाव, उत्पीड़न और अपमान के खिलाफ आवाज उठाई, अंततः सिस्टम की कठोरता के कारण टूट गया। उनकी आत्महत्या केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह इस बात की गवाही है कि सच बोलने वाला अफसर आज सबसे असुरक्षित प्राणी बन चुका है। पोस्टमार्टम में देरी, अधिकारियों की चुप्पी और सत्ता का मौन इस सामूहिक अपराध को और स्पष्ट करता है। जब संस्थाएं व्यक्ति से बड़ी नहीं बल्कि व्यक्ति या सत्ता से बंधक बन जाएँ तो सच बोलने वाले की रक्षा करना असंभव हो जाता है।

हरियाणा पुलिस के भीतर आईपीएस अफसरों का एक गुट डीजीपी के खिलाफ मुखर है, जबकि दूसरा गुट सत्ता के साथ खड़ा है। यह विभाजन केवल पुलिस बल की कार्यक्षमता को कमजोर नहीं करता, बल्कि यह संदेश भी देता है कि सत्य और साहस अब गुटबाज़ी और व्यक्तिगत स्वार्थ के जाल में फँस चुके हैं। डीजीपी का कथित बयान कि “मैं छुट्टी पर जाऊँगा, तो मेरे लौटने तक किसी स्थायी डीजीपी की नियुक्ति न हो” प्रशासनिक अनुशासन के बजाय व्यक्तिगत सत्ता की अभिव्यक्ति है। सवाल यह नहीं कि वे कितने कुशल अधिकारी हैं, बल्कि यह है कि क्या किसी व्यक्ति को संस्थागत निर्णयों को इस तरह शर्तों में बाँधने की अनुमति होनी चाहिए।

हर लोकतंत्र की आत्मा उसकी स्वतंत्र नौकरशाही होती है। लेकिन जब नौकरशाही सत्ता की छाया में पलने लगे, तो वह लोकसेवा नहीं, राजसेवा बन जाती है। अफसरों के बीच यह धारणा मजबूत हो रही है कि सच बोलने से करियर खतरे में पड़ सकता है, जबकि हां में हां मिलाने से एक्सटेंशन और पोस्टिंग सुरक्षित रहती है। यह प्रवृत्ति केवल हरियाणा में नहीं, बल्कि लगभग हर राज्य में दिखने लगी है, जहां फाइलें अब नियमों से नहीं, बल्कि रिश्तों और राजनीतिक हाजिरी से चलती हैं।

पूरन कुमार जैसे मामलों में केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संस्थागत सुधार की आवश्यकता है। एक्सटेंशन की नीति पारदर्शी होनी चाहिए और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही विस्तार दिया जाना चाहिए। मानसिक उत्पीड़न और भेदभाव की शिकायतों पर स्वतंत्र जांच व्यवस्था होनी चाहिए। वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो, ताकि पद केवल शक्ति का प्रतीक न रहे, बल्कि उत्तरदायित्व का दायरा भी बने। राजनीतिक और प्रशासनिक संतुलन को पुनः परिभाषित किया जाए, ताकि अधिकारी भयमुक्त होकर अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें।

पूरन कुमार की दुखद मौत एक चेतावनी है कि यदि सच्चाई और ईमानदारी के लिए खड़ा होना जोखिम भरा हो जाए, तो प्रशासनिक प्रणाली का मूल उद्देश्य खतरे में पड़ जाता है। एक्सटेंशन पर टिके अधिकारी और चुपचाप देखती संस्थाएं इस बात का प्रतीक हैं कि सत्ता ने प्रशासनिक तंत्र को धीरे-धीरे अपने अधीन कर लिया है।

देश के नागरिकों को यह समझना चाहिए कि नौकरशाही की मजबूती व्यक्ति के साहस से नहीं, बल्कि संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही से आती है। जब कोई अधिकारी अपनी नौकरी, सम्मान और अंततः जीवन तक गंवा देता है, तो यह केवल उसकी हार नहीं, बल्कि शासन की नैतिक पराजय है। अब सवाल यह नहीं कि कौन डीजीपी रहेगा, बल्कि यह है कि क्या कोई ऐसा अधिकारी बचेगा जो सच के लिए खड़ा हो सके। यदि ऐसे लोग नहीं बचे, तो देश में केवल राजनीतिक हुकूमत बचेगी और प्रशासनिक व्यवस्था समाप्त हो जाएगी।

हरियाणा का यह मामला पूरे देश के लिए आईना है। यह हमें याद दिलाता है कि सत्ता के दबाव और राजनीतिक स्वार्थ के बीच सच बोलने वाले अफसरों का अस्तित्व किस हद तक संकट में है। अगर प्रशासनिक तंत्र को बचाना है, तो पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता ही उसके आधार होना चाहिए। वरना केवल पद और सत्ता का खेल बच जाएगा, और जनता का भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा। 

– डॉ. सत्यवान सौरभ

आज जिनका जन्म दिन है लोक नायक जेपी

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​लोकनायक जयप्रकाश नारायण: परिचय और भारतीय राजनीति में योगदान

​जयप्रकाश नारायण (11 अक्टूबर, 1902 – 8 अक्टूबर, 1979), जिन्हें संक्षेप में जे.पी. और प्यार से ‘लोकनायक’ कहा जाता है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख सेनानी, समाजवादी विचारक और स्वतंत्रता के बाद की भारतीय राजनीति के एक महान स्तंभ थे। उनका जीवन सत्यनिष्ठा, त्याग और जनसेवा का प्रतीक था। उनका राजनीतिक सफर मार्क्सवादी रुझान से लेकर लोकतांत्रिक समाजवाद, सर्वोदय आंदोलन और अंततः ‘संपूर्ण क्रांति’ के आह्वान तक विस्तृत रहा। 1999 में उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था।

​प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

​जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर, 1902 को बिहार के सिताबदियारा गाँव में हुआ था। उनके पिता हरसू दयाल एक सरकारी कर्मचारी थे और माता फूल रानी देवी थीं।इन्हें चार वर्ष तक दाँत नहीं आया, जिससे इनकी माताजी इन्हें ‘बऊल जी’ कहती थीं। इन्होंने जब बोलना आरम्भ किया तो वाणी में ओज झलकने लगा। 1920 में जयप्रकाश का विवाह ‘प्रभा’ नामक लड़की से हुआ। प्रभावती स्वभाव से अत्यन्त मृदुल थीं। गांधी जी का उनके प्रति अपार स्नेह था। प्रभा से शादी होने के समय और शादी के बाद में भी गांधी जी से उनके पिता का सम्बन्ध था, क्योंकि प्रभावती के पिता श्री ‘ब्रजकिशोर बापू’ चम्पारन में जहाँ गांधी जी ठहरे थे, प्रभा को साथ लेकर गये थे। प्रभा विभिन्न राष्ट्रीय उत्सवों और कार्यक्रमों में भाग लेती थीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई। उच्च शिक्षा के लिए, वे पटना कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने अध्ययन किया।
​गांधीवादी विचारों से प्रभावित होकर, उन्होंने असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। बाद में, उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा की, जहाँ उन्होंने बर्कले, आयोवा और विस्कॉन्सिन जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया। अमेरिका में रहने के दौरान ही वे मार्क्सवाद और समाजवाद के विचारों से गहराई से परिचित हुए। 1929 में भारत लौटने पर, वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए।

​स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका

​जयप्रकाश नारायण ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक सक्रिय और क्रांतिकारी भूमिका निभाई:

​सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930): उन्होंने इस आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और जेल गए।

​कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (1934): उन्होंने कांग्रेस के भीतर वामपंथी विचारधारा को संगठित करने के लिए आचार्य नरेंद्र देव और मीनू मसानी जैसे नेताओं के साथ मिलकर कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (CSP) की स्थापना की। वे इसके पहले महासचिव बने।

​भारत छोड़ो आंदोलन (1942): यह उनके जीवन का सबसे क्रांतिकारी दौर था। आंदोलन के शुरुआती चरण में ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन वे हजारीबाग केंद्रीय कारागार से भाग निकले और भूमिगत रहते हुए स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया। उनकी वीरतापूर्ण गतिविधियों ने उन्हें जनता के बीच एक “राष्ट्रीय संघर्षकर्ता” के रूप में ख्याति दिलाई।

​स्वतंत्रता के बाद का योगदान

​स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद, जयप्रकाश नारायण ने सत्ता की राजनीति से परे रहकर देश की सेवा करने का मार्ग चुना और भारतीय राजनीति को कई मायनों में प्रभावित किया।

​1. लोकतांत्रिक समाजवाद और दलगत राजनीति से दूरी

​समाजवाद के प्रवक्ता: वे भारतीय समाजवाद के प्रमुख विचारक और प्रवक्ता रहे। उनका मानना था कि समाजवाद को भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल ढालना चाहिए।

​राजनीति से संन्यास: 1950 के दशक की शुरुआत में, उन्होंने दलगत राजनीति से दूरी बना ली। उन्होंने सत्ता की राजनीति को छोड़कर जन सेवा और रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया। उनका मानना था कि लोगों की सच्ची शक्ति नीचे के स्तर पर होनी चाहिए, न कि केवल केंद्र में।

​2. सर्वोदय और भूदान आंदोलन

​सर्वोदय में भागीदारी: वे महात्मा गांधी और विनोबा भावे के सर्वोदय (सबका उदय/कल्याण) दर्शन से प्रभावित हुए।

​भूदान आंदोलन (1950 और 1960 के दशक): जे.पी. ने लगभग दस वर्षों तक विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। इस आंदोलन का उद्देश्य बड़े भूस्वामियों को हृदय परिवर्तन के माध्यम से अपनी भूमि गरीबों के लिए दान करने हेतु प्रेरित करना था। जे.पी. ने ग्रामदान की अवधारणा को आगे बढ़ाया, जिसमें गाँव के लोग गाँव की भूमि का सामूहिक स्वामित्व लेते थे।

​3. सम्पूर्ण क्रांति का आह्वान और आपातकाल

​बिहार आंदोलन (1974): 1970 के दशक की शुरुआत में, देश में आर्थिक संकट, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और राजनीतिक भ्रष्टाचार चरम पर था। 1974 में, छात्रों ने बिहार में सरकारी भ्रष्टाचार और कुशासन के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। गिरते स्वास्थ्य के बावजूद, जयप्रकाश नारायण ने इस युवा नेतृत्व वाले आंदोलन का नेतृत्व स्वीकार किया। उन्होंने तत्कालीन राज्य सरकार से इस्तीफे की मांग की।

​सम्पूर्ण क्रांति: 5 जून, 1974 को पटना के गांधी मैदान में एक विशाल सभा को संबोधित करते हुए, जे.पी. ने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का ऐतिहासिक नारा दिया। यह क्रांति किसी एक राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसका उद्देश्य था: सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, वैचारिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में पूर्ण परिवर्तन लाना। उनका उद्देश्य था- भ्रष्टाचार मुक्त, समतामूलक और लोकतांत्रिक समाज की स्थापना।

​विपक्ष का नेतृत्व: उन्होंने इंदिरा गांधी की प्रशासनिक नीतियों और कथित अधिनायकवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व किया और देश की जनता को एकजुट किया।

​आपातकाल (1975): जब 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लागू किया गया, तो इंदिरा गांधी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। जे.पी. आपातकाल के दौरान लोकतंत्र के दमन के खिलाफ लड़ने वाले प्रमुख व्यक्ति थे। जेल में ही उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया।

​जनता पार्टी का गठन: आपातकाल समाप्त होने के बाद, जे.पी. ने विपक्ष के विभिन्न धड़ों को एकजुट कर जनता पार्टी का गठन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने 1977 के आम चुनावों में कांग्रेस को हरा कर केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। यह भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ था।

​4. लोक समाजवाद और विकेन्द्रीकरण का दर्शन

​जयप्रकाश नारायण राजनीतिक शक्ति के पूर्ण विकेन्द्रीकरण में विश्वास करते थे। उन्होंने राज्य के समाजवाद के विकल्प के रूप में लोक समाजवाद को प्रस्तुत किया।

​सहभागी लोकतंत्र: उनका मानना था कि शक्ति और निर्णय लेने की प्रक्रिया का आधार सबसे निचला स्तर यानी गाँव होना चाहिए। उन्होंने “सहभागी लोकतंत्र” (Participatory Democracy) की कल्पना की, जहाँ नागरिक अधिक से अधिक सक्रिय हों और सरकार के कार्यों पर कड़ी निगरानी रखें।

​भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था: जे.पी. का विश्वास मूल्य की राजनीति में था। वे भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था और राजनीतिक शुद्धता के लिए आजीवन संघर्ष करते रहे।

​विरासत और प्रभाव

​जयप्रकाश नारायण ने भारतीय जनमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है।

​लोकतंत्र के रक्षक: उन्हें भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े रक्षकों में से एक माना जाता है, जिन्होंने संकट के समय में लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए संघर्ष किया।

​युवा पीढ़ी का प्रेरणास्रोत: उन्होंने युवा पीढ़ी को रचनात्मक ऊर्जा और संघर्ष की भावना से प्रेरित किया और उन्हें राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए समर्पित होने का आह्वान किया।

​सामाजिक न्याय के सूत्रधार: उनके विचारों और आंदोलनों ने भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय और राजनीतिक शुद्धता की माँगों को केंद्र में ला दिया।

​अहिंसक क्रांति: महात्मा गांधी के बाद, जे.पी. को दूसरे ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है, जिन्होंने अहिंसक आंदोलन के माध्यम से देश की सत्ता को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

​जयप्रकाश नारायण का निधन 8 अक्टूबर, 1979 को पटना में हुआ। उनका जीवन और कार्य हमें सिखाता है कि सच्ची राजनीति सत्ता का खेल नहीं, बल्कि जनसेवा, त्याग और नैतिक मूल्यों की स्थापना का माध्यम है। उनका ‘सम्पूर्ण क्रांति’ का आह्वान आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नैतिक मार्गदर्शन का काम करता है।

जयप्रकाश नारायण एक निष्ठावान राष्ट्रवादी थे और सिर्फ़ खादी पहनते थे। जयप्रकाश ने रॉलेट एक्ट जलियाँवाला बाग़ नरसंहार के विरोध में ब्रिटिश शैली के स्कूलों को छोड़कर बिहार विद्यापीठ से अपनी उच्चशिक्षा पूरी की, जिसे युवा प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और सुप्रसिद्ध गांधीवादी डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा, जो गांधी जी के एक निकट सहयोगी रहे द्वारा स्थापित किया गया था।। जयप्रकाश जी ने एम. ए. समाजशास्त्र से किया। जयप्रकाश ने अमेरिकी विश्वविद्यालय से आठ वर्ष तक अध्ययन किया और वहाँ वह मार्क्सवादी दर्शन से गहरे प्रभावित हुए।

जयप्रकाश जी के योगदानों के बारे में जितना कहा जाए वह कम है। ये अत्यन्त परिश्रमी व्यक्ति थे। इनकी विलक्षणता की तारीफ़ स्वयं गांधीजी और नेहरू जैसे लोग किया करते थे। भारत माता को आज़ाद कराने हेतु इन्होंने तरह-तरह की परेशानियों को झेला किन्तु इन्होंने अंग्रेज़ों के सामने घुटने नहीं टेके। क्योंकि ये दृढ़निश्चयी व्यक्ति थे। संघर्ष के इसी दौर में उनकी पत्नी भी गिरफ़्तार कर ली गईं और उन्हें दो वर्ष की सज़ा हुई। क्योंकि वह भी स्वतंत्रता आंदोलन में कूदी थीं और जनप्रिय नेता बन चुकी थीं। जयप्रकाश जी अपनी निष्ठा और चतुराई के लिए प्रसिद्ध थे। वे सच्चे देशभक्त एवं ईमानदार नेता थे। वे ब्रिटिश प्रशासन का समूल नष्ट करने पर तुले हुए थे।

उन्होंने विश्व स्तर पर अपनी आवाज़ बुलन्द करते हुए कहा है कि विश्व के संकट को मद्देनज़र रखते हुए भारत को आज़ादी प्राप्त होना अति आवश्यक है। जब तक हम आज़ाद न होंगे, हमारा स्वतंत्र अस्तित्व क़ायम न होगा और हम विकास के पथ पर अग्रसर न हो सकेंगे।

महात्मा गांधी ने अपने सारवान भाषण में कहा था– करो या मरो” “Do or die”

ये वाक्यांश जयप्रकाश बाबू के मन में सदैव गूँजता रहता था। फलत: उन्होंने देश को आज़ाद करने हेतु ‘करो या मरो’ का निर्णय लिया। गांधीजी के इस महामंत्र का उन्होंने जमकर प्रचार व प्रसार भी किया। गांधीजी से प्रेरणा लेकर जयप्रकाश आगे बढ़ते गये और स्वतंत्रता का बिगुल बज उठा। जब जयप्रकाश की गिरफ़्तारी हुई तो ठीक दूसरे दिन महात्मा गांधी की भी गिरफ़्तारी हुई। सैकड़ों हज़ारों की संख्या में लोग अपने नेताओं की रिहाई की माँग करने लगे। अंग्रेज़ स्तब्ध रह गये। देश के कोने-कोने के कार्यकर्ता बन्दी बनाये गये। क्रान्ति की स्थिति सम्पूर्ण देश के सम्मुख आयी हज़ारों की संख्या में लोगों ने गिरफ़्तारियाँ दीं।

जयप्रकाश 1929 में भारत लौटने पर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। भारत में ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लेने के कारण 1932 में उन्हें एक वर्ष की क़ैद हुई। रिहा होने पर जयप्रकाश ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के गठन में अग्रणी भूमिका निभाई, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नेतृव्य करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर एक वामपंथी समूह था। द्वितीय विश्व युद्ध में ग्रेट ब्रिटेन के पक्ष में भारत की भागीदारी का विरोध करने के कारण 1939 में जयप्रकाश को दुबारा गिरफ़्तार कर लिया गया, जयप्रकाश नारायण जी को हज़ारी बाग़ जेल में क़ैद किया गया था। बापू जयप्रकाश जी के जेल से भागने की योजना बनाने लगे। इसी बीच दीपावली का त्योहार आया और जेलर साहब ने जश्न मनाने हेतु नाच-गाने का भव्य प्रोग्राम तैयार किया था, लोग मस्ती में झूम रहे थे। इसी बीच जब नाच-गाने का कार्यक्रम हुआ तो 9 नवम्बर, 1942 ई. को जयप्रकाश अपने छ: सहयोगियों के साथ धोती बांधकर जेल परिसर को लांघ गये। इसकी सूचना लन्दन तक पहुँची।

जयप्रकाश नारयण ने आचार्य नरेंद्र देव के साथ मिलकर 1948 में ऑल इंडिया कांग्रेस सोशलिस्ट की स्थापना की। 1953 में कृषक मज़दूर प्रजा पार्टियों के विलय में उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। भारत के स्वतंत्र होने के बाद उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया और चुनावी राजनीति से अलग होकर भूमि सुधार के लिए विनोबा भावे के भूदान आंदोलन से जुड़ गए।

जयप्रकाश जी 1974 में भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक कटु आलोचक के रूप में प्रभावी ढंग से उभरे। जयप्रकाश जी की निगाह में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार भ्रष्ट व अलोकतांत्रिक होती जा रही थी। 1975 में निचली अदालत में गांधी पर चुनावों में भ्रष्टाचार का आरोप साबित हो गया और जयप्रकाश ने उनके इस्तीफ़े की माँग की। इसके बदले में इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी और नारायण तथा अन्य विपक्षी नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया। पाँच महीने बाद जयप्रकाश जी गिरफ़्तार किए गए। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जेपी आंदोलन व्यापक हो गया और इसमें जनसंघ, समाजवादी, कांग्रेस (ओ) तथा भारतीय लोकदल जैसी कई पार्टियाँ कांग्रेस सरकार को गिराने एवं नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली के लिए एकत्र हो गईं। इस प्रकार जयप्रकाश ने ग़ैर साम्यवादी विपक्षी पार्टियों को एकजुट करके जनता पार्टी का निर्माण किया। जिसने भारत के 1977 के आम चुनाव में भारी सफलता प्राप्त करके आज़ादी के बाद की पहली ग़ैर कांग्रेसी सरकार बनाई। जयप्रकाश ने स्वयं राजनीतिक पद से दूर रहकर मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री मनोनीत किया।

लोकनायक बाबू जयप्रकाश नारायण ने स्वार्थलोलुपता में कोई कार्य नहीं किया। वे देश के सच्चे सपूत थे और उन्होंने निष्ठा की भावना से देश की सेवा की है। देश को आज़ाद करने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। वे कर्मयोगी थे। वे अन्त: प्रेरणा के पुरुष थे। उन्होंने अनेक यूरोपीय यात्राएँ करके सर्वोदय के सिद्धान्त को सम्पूर्ण विश्व में प्रसारित किया। उन्होंने संस्कृत के निम्न श्लोक से सम्पूर्ण विश्व को प्रेरणा लेने को कहा है–

सर्वे भवन्तु सुखिन:

सर्वेसन्तु निरामया

सर्वे भद्राणी पश्यन्तु

मां कश्चिद दुखभागवेत्।।

बाबू जयप्रकाश नारायण सभी से उन्नति की बात करते थे। वे ऊँच-नीच की भेद भावना से परे थे। उनका विचार अच्छी बातों से युक्त था। वे सच्चे अर्थों में आदर्श पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में अदभुत ओज और तेज़ था। जयप्रकाश ने बिहार आंदोलन में भी भाग लिया है। जयप्रकाश की धर्म पत्नी श्रीमती प्रभा के 13 अगस्त सन् 1973 में मृत हो जाने के पश्चात् उनको गहरा झटका लगा। किन्तु इसके बावज़ूद भी वे देश की सेवा में लगे रहे और एक बहादुर सिपाही की तरह कार्य करते रहे। भारत का यह अमर सपूत 8 अक्टूबर सन् 1979 ई. को पटना, बिहार में चिर निन्द्रा में सो गया।

दिनकर ने लोकनायक के विषय में लिखा है–

है जयप्रकाश वह नाम

जिसे इतिहास आदर देता है।

बढ़कर जिसके पद चिह्नों की

उन पर अंकित कर देता है।

कहते हैं जो यह प्रकाश को,

नहीं मरण से जो डरता है।

ज्वाला को बुझते देख

कुंड में कूद स्वयं जो पड़ता है।।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिये 1998 में लोकनायक जयप्रकाश नारायण को मरणोपरान्त भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया।

बिहार में रेवड़ी सरकार का बोलबाला

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बाल मुकुन्द ओझा

                                                                                                                    बिहार में चहुंओर मुफ्त की बारिश हो रही है, जिसे देखकर लगता है चाहे किसी पार्टी की सरकार बने मगर बनेगी तो रेवड़ी सरकार ही। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने की लगातार घोषणाओं से चुनावी माहौल गरमाने लगा है। चुनाव का सियासी बिगुल बज चुका है। मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन में है। सभी पार्टियों के नेता लोक लुभावन वादों की बौछार कर रहे। आरजेडी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार तेजस्वी यादव ने प्रदेश के हर घर में सरकारी नौकरी का वादा कर फ्री बीज का छक्का जड़ दिया है। इसी के साथ आरोप प्रत्यारोप की सियासत शुरू हो गई है। सच तो यह है रेवड़ी संस्कृति के कारण हमारे देश की अनेक राज्य सरकारें लगभग दीवालिया होने की कगार पर हैं। उनका बजट घाटा बढ़ता जा रहा है, लेकिन वे मुफ्तखोरी की सियासत को छोड़ने को तैयार नहीं है। क्योंकि चुनाव जो जीतना है। कहा जाता हैं चुनाव जीतने के लिए सब कुछ जायज है। इस कार्य में कोई भी सियासी पार्टी पीछे नहीं रहती। बिहार में मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की होड़ शुरू हो गई है। बिहार पर पहले से ही 4 लाख करोड़ से ज्यादा का कर्ज है, ऊपर से चुनावी सीजन में मुफ्त योजनाओं के लिए बड़े-बड़े वादे किए जा रहे हैं।

बिहार में महिलाओं को साधने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत प्रधानमंत्री ने 75 लाख ग्रामीण महिलाओं को पहली किस्त के तौर पर 10,000- 10,000 रुपये की राशि ट्रांसफर की। योजना के तहत आगे चलकर प्रत्येक महिला को कुल 2 लाख तक की आर्थिक सहायता मिलेगी। इसे महिलाओं के लिए चुनावी सौगात भी कहा जा रहा है। यानि अभी तो फ्री बीज की यह शुरुआत है, पिक्चर अभी बाकी है। आरजेडी और इंडिया ब्लॉक का आरोप है कि मुख्यमंत्री ने दरअसल उन्हीं वादों की नकल की है, जिन्हें विपक्ष ने जनता से करने का दावा किया था।  

मुख्यमंत्री नीतिश कुमार फ्री बीज की योजनाओं के विरुद्ध रहे है है। उन्होंने दिल्ली चुनाव के दौरान अरविन्द केजरी वाल की मुफ्त बिजली की अवधारणा को ‘गलत काम’ करार देते हुए कहा था कि यह दीर्घकालिक विकास के लिए हानिकारक है और आज वे खुद ही फ्री बीज के रास्ते पर चल निकले है। नीतीश कुमार ने 2022 में केजरीवाल की मुफ्त बिजली योजना को अव्यवहारिक और गलत बताकर तंज कसा था, आज तीन साल बाद खुद ऐसी ही फ्री बिजली योजना लागू कर अपनी सियासी रणनीति बदल ली है। उनका यह कदम न केवल उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, बल्कि नीतिगत निर्णयों और सिद्धांतों की राजनीति से किनारा करने की स्थिति को भी बताता है। इसीलिए कहा जाता है हाथी के दांत दिखाने के कुछ और होते है। इससे पूर्व आरजेडी नेता तेजस्वी मुफ्तखोरी की अनेक घोषणाएं की घोषणा कर दी थी। चुनावों के दौरान सियासी पार्टियां वोटरों को लुभाने के लिए तरह तरह के वादे और प्रतिवादे करती है। सरकार बनने के बाद चुनावी वादे पूरा करने में पार्टियों के पसीने छुट जाते है। कई राज्यों की अर्थव्यवस्था तो चौपट तक हो जाती है जिसके कारण सम्बध सरकारों को अपने कर्मचारियों के वेतन आदि  चुकाने के लाले पड़ जाते है। राजनैतिक पार्टियों द्वारा मत हासिल करने के लिए राजकीय कोष से मुफ्त सुविधाएं देने का प्रकरण सियासी हलकों में गर्माने लगा है। देश की प्रबुद्ध जमात का मानना है इससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद हिलने लगी है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस प्रकार की योजनाओं की आलोचना की थी। राजनीतिक दलों द्वारा चुनावों के दौरान इस तरह के वादे करने का चलन लगातार बढ़ता ही जा रहा है। चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक पार्टियां आम लोगों से अधिक से अधिक वायदे करती हैं। इसमें से कुछ वादे मुफ्त में सुविधाएं या अन्य चीजें बांटने को लेकर होती हैं। यह देखा गया है कुछ सालों से देश की चुनावी राजनीति में मुफ्त बिजली—पानी, मुफ्त राशन, महिलाओं को नकद राशि, सस्ते गैस सिलेंडर आदि आदि अनेक तरह की घोषणाओं का चलन बढ़ गया है। विशेषकर चुनाव आते ही वोटर्स को लुभाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा और जम्मू कशमीर के चुनाव इसके ज्वलंत उदाहरण है। मुफ्त का मिल जाये तो उसका जी भर उपयोग करना। ये मुफ्त की नहीं है अपितु जनता के खून पसीनें की कमाई है जो राजनीतिक दलों और सरकारों द्वारा दी जा रही है ताकि चुनाव की बेतरणी आसानी से पार की जा सके। देश के प्रधानमंत्री रेवड़ी कल्चर का विरोध कर चुके है मगर चुनावों में उनकी पार्टी भाजपा सहित कांग्रेस और आप सहित सभी पार्टियां रेवड़ी कल्चर में डुबकियां लगा रही है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

तेजस्वी ने एक बहुत ऊंची फेंकी

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तेजस्वी ने एक बहुत ऊंची फेंकी । बोले वे सीएम बने तो बिहार में तीन करोड़ रोजगार देंगे ! वह भी सरकारी ? हर महीने 20 लाख नौकरियों का दावा किया है । अच्छी बात है , बेरोजगारों का कल्याण होना चाहिए । आपको मुख्यमंत्री जरूर बनना चाहिए । मोदी तो 2 करोड़ नहीं दे पाए , यह आरोप विपक्ष का ही है ।

आप जरूर दे देंगे क्योंकि देश ने आपके पिता को जमीन के बदले नौकरी देते हुए और पशुओं का चारा खाते हुए देखा है । और हां , आपके खटाखट खटाखट वाले साथी दो हफ्तों से विदेश में हैं । कोई नई बात नहीं , जब भी चुनाव आता है या सीट बंटवारे का दौर चलता है , वे देश में होते कहां हैं ? आएंगे , प्रचार अभियान के वीआईपी प्रचारक बनेंगे और विदेश यात्रा से जितनी टिप्स लाए हैं , उड़ेल देंगे , लम्बी लम्बी हॉक देंगे ? 3 करोड़ नौकरियां कैसे दें , यह भी उन्हीं से सीख लेना । अरे भाई खटाखट की तरह ? तेजस्वी बाबू ! बड़ा मजा आए जब मिल बैठेंगे दीवाने दो ?

हवाई किले बांधने के दिन हैं । नाश हो इन टीवी वालों का । एक सबसे बड़े और उससे छोटे न्यूज चैनल्स ने अभी से एनडीए की सरकार बनती दिखा दी ? बताइए ! अभी तो नामांकन करने के दिन हैं , उन्होंने सर्वे दिखा दिया ? हाय हाय ! यह क्या कर डाला नामर्दूदों ने ? खैर ! चुनाव है भैया यह सब तो चलेगा ही । टिकट बंटवारे में महागठबंधन के भी पसीने छूटते रहे और एनडीए भी हांफता रहा । बिहार में कभी कांग्रेस का एकछत्र राज था ।

जब से क्षेत्रीय दल आए तब से बिहार इस देश का सबसे अधिक खिचड़ी दलों वाला राज्य बन गया । छोटे छोटे दलों ने बड़े दलों की नींद उड़ा दी है । सच कहा किसी ने । बिहार में इतने दल हैं कि उनको दिलखुश करना मेढ़कों को तौलने के समान है । झटका लगते ही जालिम दूसरे पलड़े में जा बैठते हैं । क्या करें ? चुनाव बिहार में हो तो सबसे बड़ा काम जातियों को साधना होता है । ये छोटे छोटे दल यही काम तो करते हैं । तो खेलेंगे भी और खूब खिलाएंगे भी ?

नगाड़ा बज चुका है । बिहार कांग्रेस गा रही है — आजा रे परदेसी आजा , तुझको पुकारे देश तेरा । सामने बुजुर्ग नीतीश हैं , युवा सम्राट हैं । चिराग और मांझी ने बड़े खेल दिखाए । केन्द्र से भेजे गए प्रभारियों के जब पसीने छूटे तो आखिर में शाह मोदी को फोन उठाना पड़ा । अब मोदी तो राम नहीं लेकिन चिराग खुद को मोदी के हनुमान कहते हैं , सो मान गए , नतीजा आज आएगा । चिराग पिछली बार तो नहीं माने थे पर अब तो मान गए । तो मजा खूब आएगा । लिट्टी चोखा की बहार है । छठ पूजा भी आ रही है । तो जाइए , कुछ दिन तो बिताइए बिहार में ?
……कौशल सिखौला

त्योहार अब दिल से नहीं, डिस्प्ले से मनाए जाते हैं

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त्योहारों का सेल्फ़ी ड्रामा

( हम अब त्योहारों से ज़्यादा अपनी तस्वीरें मना रहे हैं।) 

अब त्योहार पूजा, मिलन और आत्मिक उल्लास का नहीं, बल्कि ‘कंटेंट’ का मौसम बन गए हैं। दीपक की लौ से ज़्यादा रोशनी अब मोबाइल की फ्लैश में दिखती है। भक्ति, व्रत और परंपराएँ अब फ़िल्टर और फ्रेम में सिमट गई हैं। लोग ‘सेल्फ़ी विद गणेश’, ‘करवा चौथ वाइब्स’ और ‘भाई दूज मोमेंट्स’ जैसे टैग से उत्सव मनाते हैं। सच्ची आस्था और दिखावे के बीच की यह डिजिटल खाई हमारी आत्मा को धीरे-धीरे खोखला कर रही है। यह सवाल अब ज़रूरी है — क्या हम त्योहार मना रहे हैं या दिखा रहे हैं?

✍️ डॉ. प्रियंका सौरभ

त्योहार हमारे समाज की आत्मा होते हैं — वह समय जब इंसान ईश्वर, प्रकृति और अपने संबंधों के प्रति आभार व्यक्त करता है। लेकिन अब हर त्योहार के साथ एक नया किरदार जुड़ गया है — मोबाइल कैमरा। जैसे ही दीपक जलता है, आरती की थाली घूमती है या राखी बंधती है, पहला सवाल यही होता है — “फोटो ली क्या?”। पहले पूजा पूरी होती थी, फिर प्रसाद बाँटा जाता था; अब पहले स्टोरी लगती है, फिर पूजा होती है। यह वही भारत है जहाँ कभी ‘मन का उत्सव’ मनाया जाता था, आज वही ‘मीडिया का उत्सव’ बन गया है।

दीपावली अब दीपों की नहीं, सजावट की पोस्टों की रात है। घरों की सफ़ाई से ज़्यादा लोग कैमरे का कोण सुधारने में व्यस्त रहते हैं। माता लक्ष्मी की प्रतिमा की पूजा से पहले “बूमरैंग” बनता है, और पटाखों से पहले “कैप्शन” तय होता है — #दीवाली_की_वाइब्स #परिवार_का_प्यार। ऐसा लगता है मानो हर व्यक्ति का त्योहार सोशल मीडिया पर दिखना चाहिए, वरना वह अधूरा है। यह डिजिटल प्रतिस्पर्धा अब भक्ति से ज़्यादा ‘लाइक’ का खेल बन चुकी है।

करवा चौथ जैसे व्रतों का जो भाव था — प्रेम, समर्पण और आशीर्वाद — वह अब फोटो खिंचवाने और छूट वाले ऑफ़र में बँट गया है। “सेल्फ़ी विद सासू माँ”, “उपवास वाला चेहरा” और “चाँद के साथ तस्वीर” जैसी प्रवृत्तियाँ अब त्योहार की नई पहचान हैं। पहले चाँद देखने का रोमांच था, अब ‘क्लिक करने’ का जुनून है। एक जमाना था जब महिलाएँ साड़ी पहनती थीं पूजा के भाव से; आज वही साड़ी ब्रांड को टैग करने का साधन बन गई है। त्योहार अब प्रेम का नहीं, प्रदर्शन का पर्व बन गया है।

होली भी अब रंगों का नहीं, रंगीन दिखावे का खेल है। पहले जो चेहरे रंगों में डूबे होते थे, अब वे फ़िल्टर में धुल चुके हैं। लोग अब एक-दूसरे को रंग लगाने से ज़्यादा डरते हैं कि “कपड़े खराब हो जाएँगे, फोटो में अच्छा नहीं लगूँगा।”

“सेल्फ़ी विद गुलाल” में रंग तो हैं, पर अपनापन नहीं। यह होली अब मन की नहीं, मेकअप की होली बन गई है।

ईद, क्रिसमस, नवरात्र — हर धर्म का उत्सव अब एक ही रंग में रंग गया है — डिजिटल दिखावे का रंग। मस्जिद या गिरजाघर के सामने मुस्कुराती तस्वीरें, थाली में सजे पकवानों के फोटो, और शीर्षक — “प्यार और शांति बाँट रहे हैं।” पर क्या सचमुच प्यार और शांति फैल रही है, या बस दिखावा? त्योहार अब इंसान को जोड़ने की बजाय, तुलना और प्रतिस्पर्धा का कारण बनते जा रहे हैं। “उसकी लाइटिंग ज़्यादा सुंदर”, “उसका मंडप बड़ा”, “उसके पास महँगी सजावट”— यह सब उस आत्मीयता को निगल गया है जो कभी परिवारों की पहचान थी।

यह सेल्फ़ी नाटक इतना गहरा हो चुका है कि अब भक्ति का भी अभिनय होता है। मंदिर में जाते ही लोग पहले फोन निकालते हैं, फिर हाथ जोड़ते हैं। आरती लाइव होती है, पर मन ऑफ़लाइन। दान सोशल मीडिया पर दिखाया जाता है, ताकि दूसरों को पता चले कि ‘हम भी नेक हैं’। भक्ति निजी नहीं रही, सार्वजनिक प्रदर्शन बन गई है। आस्था अब आत्मा से नहीं, प्रसारण से चलती है।

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह “डिजिटल आस्था” एक गहरी बेचैनी का परिणाम है। इंसान अब अपने हर अनुभव का प्रमाण सोशल मीडिया से चाहता है। उसे लगता है कि अगर कोई चीज़ कैमरे में नहीं आई तो वह हुई ही नहीं। यही कारण है कि अब त्योहारों में मुस्कान असली नहीं, अभ्यास की हुई होती है। बच्चे तक कैमरे के सामने “हैप्पी दिवाली” बोलना सीख चुके हैं। रिश्तों की गर्माहट अब कैमरे की ठंड में जम गई है।

त्योहारों का असली अर्थ था — रुकना, साँस लेना, जुड़ना।

अब अर्थ बदल गया है — सजना, पोस्ट करना, भूल जाना।

लोगों को यह भी याद नहीं रहता कि त्योहार का मूल कारण क्या था — बस इतना याद रहता है कि किस दिन क्या पोस्ट करना है। यह ‘सेल्फ़ी संस्कृति’ धीरे-धीरे उस आध्यात्मिक गहराई को खा रही है जो भारतीय समाज की पहचान थी।

अब त्यौहार आत्मा का नहीं, ‘छवि’ का दर्पण बन गए हैं।

बाज़ार ने भी इस प्रवृत्ति को भुनाने में देर नहीं लगाई।

हर त्यौहार से पहले ‘सेल्फ़ी पृष्ठभूमि’, ‘फोटो मंच’, ‘डिजिटल सजावट’ और ‘त्योहार संग्रह’ की बाढ़ आ जाती है।

पूजा की थाली से ज़्यादा महत्त्व अब पैकेजिंग का हो गया है। त्योहार अब आध्यात्मिक नहीं, ब्रांडेड अवसर बन चुके हैं। दीपावली अब “ऑनलाइन खरीदारी पर्व” है, नवरात्र “गरबा नाइट्स प्रायोजित कार्यक्रम” है, और होली “कलर ब्लास्ट आयोजन” बन चुकी है। जहाँ पहले त्योहार आत्मा को शुद्ध करते थे, अब वह जेब को खाली कर देते हैं।

सोशल मीडिया पर दिखावे की इस होड़ ने समाज में एक अजीब-सी भावनात्मक दूरी पैदा कर दी है। लोगों को लगता है कि उन्होंने दूसरों की फोटो देखकर उनसे जुड़ाव बना लिया — जबकि असल में वह जुड़ाव एक भ्रम है। त्योहार जो कभी सबको साथ लाते थे, अब लोगों को अकेला कर रहे हैं। हर कोई अपने फोन में बंद है, दूसरे की मौजूदगी सिर्फ स्क्रीन पर है। “परिवार की फोटो” तो पूरी है, लेकिन परिवार बिखरा हुआ है।

यह सब लिखते हुए एक प्रश्न चुभता है — क्या हम ईश्वर से जुड़ रहे हैं या नेटवर्क सिग्नल से? क्या हमें खुशी मिल रही है या बस ‘प्रतिक्रिया’? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे त्योहार अब आत्मा से नहीं, कैमरे की चमक से रोशन हो रहे हैं?

त्योहारों का असली अर्थ तब लौटेगा जब हम कैमरा नीचे रखकर, किसी के चेहरे पर सच्ची मुस्कान देखेंगे।

जब दीया सिर्फ़ फोटो के लिए नहीं, अंधेरे के लिए जलाया जाएगा। जब करवा चौथ पर फोटो नहीं, साथ बैठकर एक-दूसरे की आँखों में सुकून ढूँढा जाएगा। जब होली पर रंग लगाते वक्त डर नहीं, अपनापन होगा। त्योहार तब लौटेंगे, जब हम दिखाना बंद करेंगे — और महसूस करना शुरू करेंगे।

त्योहारों का यह सेल्फ़ी ड्रामा तभी खत्म होगा जब इंसान अपने अंदर झाँककर यह कह सके — “मुझे किसी की लाइक नहीं चाहिए, मुझे बस अपने अपनों की सच्ची मुस्कान चाहिए।”

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,