बचपन को अख़बारों में जगह क्यों नहीं?

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रविवार की सुबह बेटे प्रज्ञान को गोद में लेकर अख़बार से कोई रोचक बाल-कहानी पढ़ाने की इच्छा अधूरी रह गई। किसी भी प्रमुख अख़बार में बच्चों के लिए एक भी रचना नहीं थी। समाज बच्चों को पढ़ने के लिए कहता है, पर उन्हें पढ़ने को क्या देता है? यह संपादकीय हमारे समाचार पत्रों की बच्चों के प्रति उपेक्षा पर गहरी चोट करता है और मांग करता है कि समाचार पत्रों में बच्चों के लिए नियमित स्थान आरक्षित हो — ताकि बचपन शब्दों से जुड़े, संवेदना से सींचा जाए और विचारों से पल्लवित हो।

✍️डॉ प्रियंका सौरभ

रविवार की सुबह थी। मन हुआ कि बेटा प्रज्ञान गोद में आए और हम दोनों मिलकर अख़बार में से कोई रोचक कहानी पढ़ें — ताकि आधुनिक स्क्रीन युग में भी शब्दों की मिठास उसे मिल सके। परंतु खेदजनक आश्चर्य हुआ कि  प्रतिष्ठित अख़बारों में बच्चों के लिए एक भी कहानी, चित्रकथा, या बाल संवाद उपलब्ध नहीं था। इस पीड़ा से उपजा यह सवाल एक सामूहिक चिंतन की मांग करता है —“जब हम अपने अख़बारों में बच्चों के लिए छापते ही कुछ नहीं, तो हम उनसे पढ़ने की उम्मीद किस अधिकार से करते हैं?”

बाल मन: एक रिक्त पन्ना

हमारी शिक्षा व्यवस्था, अभिभावक वर्ग और समाज तीनों ही अक्सर एक स्वर में कहते हैं कि आज के बच्चे किताबें नहीं पढ़ते। वे मोबाइल, इंस्टाग्राम और गेमिंग की दुनिया में खो चुके हैं। पर कोई ये क्यों नहीं पूछता कि उन्हें क्या पढ़ने के लिए दे रहे हैं हम? अख़बार, जो एक समय में हर घर की सुबह का हिस्सा हुआ करता था — अब बच्चों के लिए पूरी तरह से एक “वयस्कों का युद्धक्षेत्र” बन चुका है, राजनीति के झगड़े, नेताओं के आरोप-प्रत्यारोप, बलात्कार, हत्याएं, भ्रष्टाचार, क्रिकेट, फिल्में और योगा टिप्स। कहाँ हैं राजा की बात, हाथी की सवारी, विज्ञान की कल्पना, चाँद की कविता, और जीवन मूल्य सिखाती छोटी कहानियाँ?

जब बच्चे दिखते ही नहीं

आज के समाचार पत्रों में बच्चे सिर्फ दो तरह से “दिखते” हैं —

 जब कोई बच्चा यौन हिंसा या हत्या का शिकार होता है। या जब कोई बच्चा बोर्ड परीक्षा में 99.9% अंक लाकर मीडिया का ताज बन जाता है। क्या इतने सीमित संदर्भों में बच्चे होने का अनुभव समझा जा सकता है? अख़बारों ने बच्चों को समाज से अलग करके एक ऐसी चुप्पी में डाल दिया है, जहां उनका न तो रचनात्मक स्वर सुनाई देता है, न जिज्ञासु आंखें दिखाई देती हैं।

संपादकीय दूरदर्शिता की अनुपस्थिति

किसी भी अखबार का मुख्य उद्देश्य होता है –”समाज को जागरूक बनाना और उसकी सोच को दिशा देना।” तो फिर एक पूरे समाज की नींव यानी बच्चों के लिए कोई पन्ना क्यों नहीं? क्या आज का संपादक इतना व्यस्त हो गया है कि उसे यह भी याद नहीं कि उसकी जिम्मेदारी अगली पीढ़ी तक संस्कार और विचार की मशाल पहुँचाने की भी है? एक समय में “बाल-जगत”, “बाल प्रभा”, “बाल गोष्ठी”, “बाल मेल” जैसे खंडों से अख़बार बच्चों को भी संवाद में शामिल करते थे। आज वे या तो बंद हो गए या ऑनलाइन लिंक की बेगानी भीड़ में खो गए।

विज्ञापन और बाजारवाद का हमला

बच्चे आज अख़बार के लिए ‘ग्राहक’ नहीं हैं। वे शैंपू या रेफ्रिजरेटर नहीं खरीदते। इसी कारण “बाजार” की भाषा में उनकी कोई ‘विज्ञापन वैल्यू’ नहीं है। और जहाँ विज्ञापन की भाषा नीति तय करने लगे, वहाँ बचपन बेमानी हो जाता है।

प्रत्येक अख़बार का लगभग 40% भाग विज्ञापनों से भरा रहता है — रियल एस्टेट, कपड़े, कोचिंग सेंटर, हॉस्पिटल, ब्रांडेड घड़ियाँ… कहीं भी यह नहीं दिखता कि कोई अख़बार यह पूछ रहा हो। “बच्चों को हम क्या पढ़ा रहे हैं?”

जब बाल साहित्य का विलोपन होता है

बाल साहित्य केवल मनोरंजन नहीं है —यह बच्चों को सोचने, सवाल करने, कल्पना करने और समाज से जुड़ने की प्राथमिक पाठशाला है। एक कहानी जिसमें एक पेड़ अपने फल देता है, एक चिड़िया घोंसला बनाती है, एक बच्चा अपने दोस्त के साथ पक्षियों को पानी पिलाता है —ये सब बच्चों को मानवता का बीज देते हैं। जब ये कहानियाँ हट जाती हैं, तो वहां केवल ड्रामा, सनसनी, और डाटा बचता है। और यही संवेदनहीनता आने वाली पीढ़ी में पनपती है।

क्या पढ़ाई और ज्ञान सिर्फ स्कूल का काम है?

हमारे समाज ने बच्चों के ज्ञान का ठेका सिर्फ स्कूलों को दे रखा है। अख़बार, जो कभी ‘घर की पाठशाला’ हुआ करता था, अब स्वयं को ‘वयस्कों की गॉसिप’ तक सीमित कर चुका है। क्या बच्चे समाचारों के योग्य नहीं? क्या विज्ञान, पर्यावरण, नैतिकता, और समाज की बातें उन्हें नहीं बताई जानी चाहिए?

यदि हम चाहते हैं कि बच्चे “समझदार नागरिक” बनें तो

हमें उन्हें शुरुआत से ही संवाद और सवालों से जोड़ना होगा — और अख़बार इसकी सशक्त जगह हो सकती है।

क्या किया जा सकता है?

साप्ताहिक ‘बाल संस्करण’ पुनः शुरू किए जाएं – हर रविवार या महीने में दो बार बच्चों के लिए विशेष खंड हो। बाल संवाद और चित्रकथाएँ हों – जिनमें नैतिक मूल्य, विज्ञान की जिज्ञासा और समाज का परिचय हो। बच्चों की रचनाएँ छापी जाएं – कविताएँ, चित्र, सवाल, विचार। बाल पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जाए – विद्यालय स्तर पर बच्चों से लिखवाया जाए, जो छपे भी। प्रेरणादायक ‘बच्चों के नायक’ दिखाए जाएं – जो स्क्रीन के बाहर भी उपलब्ध हों।

बेटा प्रज्ञान उस दिन सुबह मुझसे बोला —

“माँ, क्या आपके अख़बार में बच्चों के लिए कुछ नहीं होता?”

मैं चुप रह गई। ये चुप्पी सिर्फ एक माँ की नहीं, एक पूरे समाज की चुप्पी है। और जब अख़बार समाज का दर्पण होते हैं, तो इस दर्पण में प्रज्ञान जैसे लाखों बच्चों की मासूम जिज्ञासा को जगह मिलनी ही चाहिए। यदि हम चाहते हैं कि कल के भारत में पाठक, लेखक और संवेदनशील नागरिक जन्म लें —

तो आज के समाचार पत्रों में प्रज्ञान के लिए भी एक पन्ना आरक्षित करना होगा।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

विवादित बयान से बचना ही ठीक है

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बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय

बाल मुकुन्द ओझा

देश में चुनाव आते ही कटु वचनों की बाढ़ सी आ जाती है। कटु वचन एक ऐसे जहर के सामान है जो भले ही पिया न जाये लेकिन वह असर जहर से भी तेजी से करता है। कटु वचन मित्र को भी शत्रु बनाते देर नहीं करता। देश में चुनावों के दौरान कटुता का जैसा सियासी वातावरण बन रहा है वह निश्चय ही हमारी एकता, अखंडता, भाईचारे और सहिष्णुता पर गहरी चोट पहुँचाने वाला है। इसके लिए कौन दोषी है और कौन निर्दोष है उस पर देशवासियों को गहनता से मंथन करने की जरुरत है। हम बात कर रहे है बिहार विधान सभा चुनावों की। नेताओं के बयानों, भाषणों और कटु वचनों से सियासी वातावरण जहरीला हो उठा है। जिस तरह से एक के बाद एक नेता विवादित बयान दे रहे हैं, उसकी वजह से चुनावी माहौल में सरगर्मी बढ़ गई है। विवादित बयान देने में आरजेडी, कांग्रेस नीत महागठबंधन और भाजपा जेडी यू नीत एनडीए सहित कोई भी नेता पीछे नहीं है। कहते है राजनीति के हमाम में सब नंगे है। यहाँ तक तो ठीक है मगर यह नंगापन हमाम से निकलकर बाजार में आ जाये तो फिर भगवान ही मालिक है। सियासत में विवादास्पद बयान को नेता भले अपने पॉपुलर होने का जरिया मानें, लेकिन ऐसे बयान राजनीति की स्वस्थ परंपरा के लिए ठीक नहीं होते। हमारे माननीय नेता आजकल अक्सर ऐसी भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। देश के नामी-गिरामी नेता और मंत्री भी मौके-बेमौके कुछ न कुछ ऐसा बोल ही देते हैं, जिसे सुनकर कान बंद करने का जी करता है। 

देश को अमूमन हर साल कोई न कोई चुनाव का सामना करना ही पड़ता है । जैसे ही चुनाव आते है नेताओं के बांछे खिल जाती है । गंदे और कटु बोलों से चुनावी बिसात बिछ जाती  है। पिछले दो दशक से गंदे और विवादित बोल बोले जा रहे है। नेताओं के बयानों से गाहे बगाहे राजनीति की मर्यादाएं भंग होती रहती है। अमर्यादित बयानों की जैसे झड़ी लग जाती है। राजनीति में बयानबाजी का स्तर इस तरह नीचे गिरता जा रहा है उसे देखकर लगता है हमारा लोकतंत्र तार तार हो रहा है। नेता लोग अक्सर चर्चा में रहने के लिए ऊल-जलूल और समाज में कटुता फैलाने वाले बयान देते रहते है। विशेषकर चुनावों के दौरान गंदे बोलों से चुनावी बिसात बिछ जाती है। कुछ सियासी नेताओं ने तो  लगता है विवादित बयानों का ठेका ले रखा है। कई नेताओं पर विवादित बयानों पर मुक़दमे भी दर्ज़ हुए। कुछ को न्यायालय से सजा भी मिली। मगर इसका उनपर कोई  फर्क  नहीं पड़ा। विवादित बयानबाजी के कारण सुर्खियों में रहना नेताओं को शायद आनंद देने लगा है। पिछले दो दशक से गंदे और विवादित बोल बोले जा रहे है। नेताओं के बयानों से गाहे बगाहे राजनीति की मर्यादाएं भंग होती रहती है। अमर्यादित बयानों की जैसे झड़ी लग जाती है। राजनीति में बयानबाजी का स्तर इस तरह नीचे गिरता जा रहा है उसे देखकर लगता है हमारा लोकतंत्र तार तार हो रहा है।

जो लोग कटु वचन बोलते हैं और अपने वचनों से अन्य लोगों का मन दुखाते हैं। ऐसे लोगों के लिए रहीम दास जी ने अपने  दोहे में बड़ी सीख दी है। रहीम दास जी ने कहा है,  ”बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय।” भारत सदा सर्वदा से प्यार और मोहब्बत से आगे बढ़ा है। हमारा इतिहास इस बात का गवाह है हमने कभी असहिष्णुता को नहीं अपनाया। हमने सदा सहिष्णुता के मार्ग का अनुसरण कर देश को मजबूत बनाया। सहिष्णुता का अर्थ है सहन करना और असहिष्णुता का अर्थ है सहन न करना। सब लोग जानते हैं कि सहिष्णुता आवश्यक है और चाहते हैं कि सहिष्णुता का विकास हो। सहिष्णुता केवल उपदेश या भाषण देने मात्र से नहीं बढ़ेगी। सहिष्णुता भारतीय जनजीवन का मूलमंत्र है। मगर देखा जा रहा है कि समाज में सहिष्णुता समाप्त होती जारही है और लोग एक दूसरे के खिलाफ विषाक्त  वातावरण बना रहे है जिससे हमारी गौरवशाली परम्पराओं के नष्ट होने का खतरा मंडराने लगा है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए सहनशील होना आवश्यक है। सहनशीलता व्यक्ति को मजबूत बनाती है, जिससे वह बड़ी से बड़ी परेशानी का डटकर मुकाबला कर सकता है। अक्सर देखा जाता है हम छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा कर देते हैं, जिससे बात आगे बढ़ जाती है और अनिष्ट भी हो जाता है। ऐसी ही छोटी-छोटी बातों को मुस्कुराते हुए सुनने वाला व्यक्ति ही सहनशील है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

कहां तक बहेगी ऐसे ‘ज्ञान’ की अविरल धारा

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                                                               निर्मल रानी

  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत 9 नवंबर 2025 को उत्तराखंड की राजधानी देहरादून स्थित फ़ॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट में 25वें राज्य स्थापना दिवस के मुख्य समारोह को सम्बोधित किया । ग़ौर तलब है कि उत्तराखंड का गठन 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर हुआ था। इस समारोह में पीएम मोदी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को राज्य की आध्यात्मिक धरोहर से जोड़कर युवाओं को प्रेरित करने का प्रयास किया। कार्यक्रम को सफल बनाने के मक़सद से इस आयोजन में भाग लेने हेतु प्रदेश के अनेक शिक्षण संस्थानों के छात्रों को लाने की व्यवस्था की गयी थी। प्रधानमंत्री ने यहाँ अपने संबोधन में युवाओं से आह्वान किया कि वे ‘प्राचीन ज्ञान’ को आधुनिक विज्ञान से जोड़ें। निश्चित रूप से योग व आयुर्वेद जैसी प्राचीन भारतीय ज्ञान सम्बन्धी कई बातें ऐसी हैं जिन पर देश को गर्व है। परन्तु वास्तविक प्राचीन भारतीय ज्ञान की आड़ में पौराणिक कथाओं से प्राप्त ज्ञान को आज के वैज्ञानिक युग में ‘ज्ञान ‘ बताते हुये छात्रों को ‘भ्रमित’ करना,यह कहाँ तक उचित है ? प्रधानमंत्री सहित देश के कई ज़िम्मेदार लोगों द्वारा समय समय पर देश के भविष्य के कर्णधार छात्रों व युवाओं को सम्बोधित करते हुये ऐसी अनेक बातें की जा चुकी हैं जिनका न केवल मज़ाक़ उड़ाया गया बल्कि एक बड़े वैज्ञानिक व शिक्षित वर्ग द्वारा इसका खंडन भी किया गया। 

                         याद कीजिये अक्टूबर 2014 में जब  ‘रन फ़ॉर यूनिटी’ कार्यक्रम के संदर्भ में मुंबई के एक अस्पताल में चिकित्सकों और पेशेवरों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ” भगवान गणेश के सिर पर हाथी का सिर लगाना प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण है। हमारे देश ने चिकित्सा विज्ञान में जो हासिल किया था, उस पर गर्व महसूस कर सकते हैं। हम गणेश जी को पूजते हैं, जिनके सिर पर हाथी का सिर लगाया गया था। यह प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत थी।” मोदी के इस बयान की न केवल विपक्षी दलों द्वारा बल्कि वैज्ञानिकों द्वारा भी तीखी आलोचना की गयी थी। इस आलोचना का कारण यह था कि मोदी का कथन पूर्णतः अवैज्ञानिक व तर्कहीन था क्योंकि गणेश हिंदू पौराणिक कथा के चरित्र हैं यह कोई ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं। जबकि प्लास्टिक सर्जरी का आधुनिक विकास 19वीं सदी में  जोसेफ़ कार्प्यू जैसे ब्रिटिश डॉक्टरों द्वारा किया गया था। परन्तु  हाथी के सिर का मानव शरीर पर प्रत्यारोपण जैसा कोई पुरातात्विक या चिकित्सकीय प्रमाण क़तई नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी का यह प्रयास मिथक को इतिहास बनाने का प्रयास है, जोकि सरासर विज्ञान-विरोधी है। 

                        इसी तरह मोदी ने ऐसी ही ‘ज्ञान गंगा’ बहाने वाली एक पुस्तक की प्रशंसा करते हुए पुस्तक प्रस्तावना में लिखा ‘कि प्राचीन भारत में टेस्ट-ट्यूब बेबी, स्टेम सेल तकनीक, हवाई जहाज़ और न्यूक्लियर तकनीक आदि मौजूद थी जोकि “प्राचीन ज्ञान” का प्रमाण थी। इन बातों को भी दुनिया के एक बड़े शिक्षित व वैज्ञानिक वर्ग ने ख़ारिज किया क्योंकि यह भी अवैज्ञानिक व तर्कहीन दावे थे और यह सभी दावे वेदों और महाभारत की कथाओं व उनकी व्याख्या पर आधारित हैं। इन दावों का भी कोई भौतिक साक्ष्य जैसे अवशेष या यंत्र आदि उपलब्ध नहीं है । सच्चाई यह है कि आधुनिक IVF 1978 में विकसित हुआ जबकि हवाई जहाज़ का आविष्कार 1903 में हुआ। प्रधानमंत्री इस तरह की अनेक बातें कर चुके हैं जोकि पूरी तरह से अवैज्ञानिक व तर्कहीन है तथा इतिहास में उनके कोई प्रमाण भी नहीं मिलते। 

                     इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 फ़रवरी 2019 को भारतीय वायु सेना द्वारा बालाकोट एयर स्ट्राइक के संदर्भ में दिए गये अपने एक साक्षात्कार में यह दावा करते हैं कि उन्होंने सलाह दी कि “ख़राब मौसम और बादलों का फ़ायदा उठाते हुए भारतीय विमानों को पाकिस्तानी रडार से बचाया जा सकता है, क्योंकि बादल हैं तो रडार से बच सकते हैं”। बालाकोट हमले की रणनीति पर चर्चा के दौरान आये मोदी के इस ‘ज्ञान ‘ का भी काफ़ी मज़ाक़ उड़ाया गया था और विशेषज्ञों ने इसे तकनीकी रूप से ग़लत बताया, क्योंकि सामान्यतः रडार बादलों से प्रभावित नहीं होते। इसी तरह वे बायोगैस के महत्व को समझाने के लिए किसी चाय वाले की कहानी गढ़कर बताने लगते हैं कि ‘एक छोटे शहर में नाले के पास चाय बेचने वाले व्यक्ति ने नाले से निकलने वाली मीथेन गैस का उपयोग चाय बनाने के लिए किस तरह किया। तो कभी किसी किसान की ‘कहानी’ सुना डालते हैं  जिसने रसोई के कचरे और गोबर से बायोगैस बनाकर पंप इंजन चलाया। 

                  दरअसल जब से भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई है तभी से प्रधानमंत्री सहित ऊँचे ओहदे पर बैठे अनेक लोग इस तरह की अवैज्ञानिक व तर्कहीन बातें कर हमारे देश के छात्रों का भविष्य चौपट करने पर तुले हुये हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह लोग हिंदूवादी विचार के अशिक्षित लोगों को ख़ुश करने के फेर में यह भूल जाते हैं कि यह उस अगली पीढ़ी का भविष्य अंधकारमय बना रहे हैं जो भविष्य में देश की बागडोर संभालने वाली है। कभी केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश के ऊना ज़िले के पीएम श्री नवोदय विद्यालय में राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के अवसर पर छात्रों के साथ संवाद के दौरान यह ‘ज्ञान’ साँझा करते सुनाई  देते हैं कि  ‘हनुमान जी पहले अंतरिक्ष यात्री थे’। जबकि ऐतिहासिक रूप से पहले अंतरिक्ष यात्री सोवियत संघ के यूरी गागरिन थे। ठाकुर के इस दावे को भी मिथक और अवैज्ञानिक व तर्कहीन बताते हुये ख़ूब आलोचना की गयी थी । इसी तरह  राजस्थान हाईकोर्ट के जज न्यायमूर्ति महेश चंद्र शर्मा ने अपने रिटायरमेंट के अंतिम दिन मई 2017 को मीडिया से बातचीत में अपनी ‘ज्ञानगंगा’ बहाई। उन्होंने कहा कि  “मोर आजीवन ब्रह्मचारी रहता है। इसके जो आंसू आते हैं, मोरनी उसे चुगकर गर्भवती होती है।” उसी समय पक्षी विशेषज्ञों ने इसे ग़लत व कोरा झूठ बताया था ।  क्योंकि मोर और मोरनी भी अन्य पक्षियों की ही तरह सामान्य संभोग से ही प्रजनन करते हैं।

               सवाल यह है कि आज सूचना व संचार के आधुनिक युग में ख़ासकर ए आई के दौर में ऐसी निरर्थक तर्कहीन व अवैज्ञानिक बातें कर यह ‘महाज्ञानी लोग’ देश के युवाओं के भविष्य को कब तक अंधकारमय बनाते रहेंगे ? और कहां तक बहेगी ऐसे ‘ज्ञान’ की ‘अविरल धारा ‘ ?

           -निर्मल रानी

क्या भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून आवश्यक है?

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भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून: धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता की संवैधानिक चुनौती

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानूनों को सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के नाम पर लागू किया गया है, परंतु इनका वास्तविक प्रभाव नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर नियंत्रण के रूप में उभर रहा है। ये कानून न केवल धर्म परिवर्तन को प्रशासनिक अनुमति से जोड़ते हैं बल्कि अंतर्धार्मिक विवाहों और अल्पसंख्यक समुदायों पर भी प्रतिकूल असर डालते हैं। संविधान के अनुच्छेद 25 द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता की भावना इन कानूनों से आहत होती है। लोकतांत्रिक भारत के लिए आवश्यक है कि राज्य नागरिक की आस्था का संरक्षक बने, नियंत्रक नहीं। आस्था पर पहरा नहीं, सम्मान होना चाहिए।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरा हुआ देश है, जिसकी पहचान उसकी धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक स्वतंत्रता में निहित है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 तक नागरिकों को अपने धर्म को मानने, प्रचार करने और उसका पालन करने का मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। परंतु हाल के वर्षों में देश के अनेक राज्यों में बनाए गए “धर्मांतरण विरोधी कानून” ने इस संवैधानिक गारंटी को गंभीर प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

इन कानूनों का उद्देश्य यह बताया जाता है कि वे बल, प्रलोभन या कपट से किए गए धर्मांतरणों को रोकने के लिए बनाए गए हैं, किंतु व्यवहार में इनका दायरा इतना व्यापक और अस्पष्ट है कि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अंतर्धार्मिक विवाहों और अल्पसंख्यक समुदायों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दमनकारी प्रभाव डालते हैं।

भारत में धर्मांतरण का प्रश्न स्वतंत्रता-पूर्व काल से ही विवादास्पद रहा है। अंग्रेज़ी शासनकाल में कई मिशनरियों द्वारा ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार को लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। स्वतंत्रता के बाद 1954 में संसद में “धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक” प्रस्तुत किया गया था, किंतु वह पारित नहीं हो सका।

हालाँकि, कुछ राज्यों ने अपने-अपने स्तर पर ऐसे कानून बनाए — ओडिशा (1967) पहला राज्य था जिसने ‘धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम’ पारित किया। इसके बाद मध्यप्रदेश (1968), अरुणाचल प्रदेश (1978), छत्तीसगढ़, गुजरात, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों ने भी समान प्रकार के कानून बनाए। इन सभी अधिनियमों का मूल उद्देश्य “जबरन या धोखे से धर्मांतरण रोकना” बताया गया है, परंतु उनके प्रावधानों की व्याख्या के तरीके ने संविधान की मूल भावना पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25(1) प्रत्येक व्यक्ति को “धर्म की स्वतंत्रता” का अधिकार देता है। इसमें तीन मूल तत्व हैं — किसी धर्म को मानने की स्वतंत्रता, उसका पालन करने की स्वतंत्रता, और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता। यह अधिकार राज्य के सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन है, परंतु इन सीमाओं का उद्देश्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता बनाए रखना है।

अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। धर्मांतरण विरोधी कानून इन दोनों अधिकारों के साथ भी टकराते हैं क्योंकि ये नागरिकों के व्यक्तिगत निर्णय, आस्था और वैवाहिक चयन में राज्य के अनावश्यक हस्तक्षेप का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

भारत की धर्मनिरपेक्षता पश्चिमी देशों की तरह “राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण” पर आधारित नहीं है, बल्कि यह एक सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता है — जिसमें राज्य सभी धर्मों को समान दृष्टि से देखता है और किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं जाता। परंतु धर्मांतरण विरोधी कानूनों के माध्यम से राज्य जब किसी धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन करने की स्वतंत्रता पर शर्तें, अनुमति और दंड लगाने लगता है, तो वह अपने धर्मनिरपेक्ष स्वरूप से भटक जाता है।

इन कानूनों में प्रायः यह प्रावधान होता है कि जो व्यक्ति अपना धर्म बदलना चाहता है, उसे पहले जिलाधिकारी को सूचना देना और अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होगा। यह प्रक्रिया स्वयं में संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता का उल्लंघन है, क्योंकि किसी व्यक्ति की आस्था का निर्णय उसकी अंतरात्मा का विषय है, न कि सरकारी अनुमति का।

धर्मांतरण विरोधी कानूनों का सबसे गहरा असर अंतर्धार्मिक विवाहों पर पड़ा है। कई राज्यों ने इन कानूनों को तथाकथित “लव जिहाद” की अवधारणा से जोड़ दिया है — जिसमें यह प्रचारित किया जाता है कि एक धर्म विशेष के लोग विवाह के माध्यम से दूसरे धर्म की महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराते हैं।

इस धारणा के आधार पर बनाए गए कानून, जैसे उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021; मध्यप्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 2021; और हरियाणा धर्म स्वतंत्रता विधेयक, 2022 — इनमें यह प्रावधान है कि यदि विवाह धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया है, तो वह अवैध और शून्य घोषित किया जा सकता है।

इससे दो प्रमुख समस्याएँ उत्पन्न होती हैं — पहली, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन: प्रेम या विवाह व्यक्ति की व्यक्तिगत पसंद है। राज्य को यह तय करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को किस धर्म में विवाह करना है। दूसरी, सामाजिक विभाजन: ऐसे कानून समाज में धार्मिक अविश्वास, भय और घृणा को बढ़ावा देते हैं, जिससे अंतरधार्मिक मेलजोल और सद्भाव प्रभावित होता है।

धर्मांतरण विरोधी कानूनों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव अल्पसंख्यक समुदायों, विशेषकर ईसाई और मुस्लिम समाज पर पड़ता है। ईसाई मिशनरियों पर अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि वे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से “प्रलोभन देकर धर्मांतरण” कराते हैं। इस कारण उनके सामाजिक कार्यों पर लगातार निगरानी और उत्पीड़न बढ़ा है। मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में यह प्रचारित किया जाता है कि वे “लव जिहाद” के माध्यम से धर्मांतरण कराते हैं, जिससे मुस्लिम युवकों को झूठे मामलों में फँसाने की घटनाएँ बढ़ी हैं। इसके परिणामस्वरूप इन समुदायों में भय और असुरक्षा का वातावरण बना है। अनेक बार धर्मांतरण की झूठी अफवाहें फैलाकर भीड़ हिंसा की घटनाएँ हुई हैं, जो लोकतांत्रिक भारत के लिए गहरी चिंता का विषय है।

भारतीय न्यायपालिका ने इस विषय पर कई बार टिप्पणी की है। रेवरेंड स्टैनिसलॉ बनाम मध्यप्रदेश राज्य (1977) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि “धर्म प्रचार का अधिकार धर्मांतरण का अधिकार नहीं है।” हालाँकि उस समय का संदर्भ जबरन धर्मांतरण से जुड़ा था। हादीया केस (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि “किसी बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म और जीवनसाथी चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता है।” लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) में कोर्ट ने कहा कि अंतर्धार्मिक विवाह संविधान द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत अधिकार है और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।

इन निर्णयों से यह स्पष्ट है कि अदालतें धर्मांतरण के जबरन या धोखे से किए जाने का विरोध करती हैं, किंतु स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन या अंतर्धार्मिक विवाह को पूर्णतः व्यक्ति की स्वतंत्रता मानती हैं।

धर्मांतरण विरोधी कानून केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक औजार भी बन गए हैं। कुछ राजनीतिक दल इनका प्रयोग अपने ध्रुवीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए करते हैं। धार्मिक पहचान को राजनीतिक मुद्दा बनाकर चुनावी लाभ लेना इन कानूनों का अप्रत्यक्ष उद्देश्य बन चुका है। इस कारण सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक और बहुधार्मिक देश में किसी भी व्यक्ति की अंतरात्मा की स्वतंत्रता सर्वोपरि होनी चाहिए। राज्य का कर्तव्य यह नहीं कि वह व्यक्ति की आस्था पर नियंत्रण करे, बल्कि यह सुनिश्चित करे कि किसी को भी उसके धर्म या विश्वास के कारण भेदभाव या उत्पीड़न का सामना न करना पड़े।

अंततः यह कहा जा सकता है कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों की वर्तमान संरचना भारतीय संविधान की आत्मा — स्वतंत्रता, समानता और धर्मनिरपेक्षता — के विरुद्ध जाती है। यदि इन कानूनों को केवल बलपूर्वक या छल से किए गए धर्मांतरण तक सीमित रखा जाए, तो वे न्यायसंगत माने जा सकते हैं; परंतु जब ये व्यक्ति की निजी आस्था, विवाह और जीवन की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करने लगते हैं, तब वे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के लिए खतरा बन जाते हैं।

इसलिए आवश्यक है कि भारत में धर्मांतरण संबंधी कानूनों की पुनः समीक्षा की जाए, उन्हें संविधान के अनुरूप ढाला जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी कानून धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता की भावना को कमजोर न करे। धार्मिक विविधता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, और इस विविधता की रक्षा ही हमारी सच्ची राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

बिहार में फिर एक बार नीतीशे सरकारःएग्जिट पोल ने लगाई मुहर

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बाल मुकुन्द ओझा

बिहार में एग्जिट पोल को लेकर सियासी क्षेत्रों में घमासान छिड़ गया है। एनडीए जहां इसे वास्तविकता के निकट बता कर स्वागत कर रहा है वहीं महागठबंधन इसे झूठ का पुलिंदा करार देकर नकार रहा है। हालाँकि दो दिन बाद 14 नवम्बर को पता लग जायेगा कि मतदाता किसे जीत का ताज पहनायेगा। बिहार विधानसभा चुनाव का मतदान मंगलवार शाम को संपन्न होते ही साढ़े छह बजे से खबरिया चैनलों में एग्जिट पोल की होड़ लग गई। एक को छोड़कर अन्य सभी डेढ़ दर्ज़न चुनावी सर्वे  में एक बार फिर एनडीए सरकार पर मुहर लगादी है। दूसरी तरफ सट्टा बाजार ने भी बिहार में एनडीए सरकार की भविष्यवाणी करदी है। सभी प्रमुख सर्वे एजेंसियों ने एनडीए को दो-तिहाई बहुमत के करीब या उससे भी अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। इस भांति एनडीए गठबंधन की प्रचंड लहर दिख रही है। बिहार विधानसभा चुनाव 66.91 प्रतिशत के ऐतिहासिक मतदान के साथ संपन्न हुआ है।

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी आजकल चुनाव में बड़ी भूमिका निभाने लगे है। चुनावी सर्वे करने वाली विभिन्न संस्थाओं से मिलकर किये जाने वाले सर्वेक्षणों में मतदाताओं का मूड जानने का प्रयास कर सटीक आकलन किया जाता है। कई बार ये सर्वे वास्तविकता के नजदीक होते है तो कई बार फैल भी हो जाते है। सर्वे का सीधा अर्थ है किसी भी वस्तु को खोजना या संभावनाओं का पत्ता लगाना। यह शब्द अधिकतर चुनावों के दौरान सुना जाता है और जबसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का प्रादुर्भाव हुआ है तब से लोकप्रिय हो रहा है। हमारे देश में दो चीजों का विकास करीब-करीब एक साथ ही हुआ है। पहला इन चुनावी सर्वेक्षणों  और दूसरा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या कहें समाचार चैनलों का। समाचार चैनलों  की भारी भीड़ ने चुनावी सर्वेक्षणों को पिछले दो दशक से हर चुनाव के समय का अपरिहार्य बना दिया है। आज बिना इन सर्वेक्षणों के भारत में चुनावों की कल्पना भी नहीं की जाती। बल्कि कुछ समाचार चैनल तो साल में कई बार ऐसे सर्वेक्षण करवाते हैं और इसके जरिये सरकारों की लोकप्रियता और समाज को प्रभावित करने वाले मुद्दों की पड़ताल करते रहते हैं। ऐसे में यह जानना दिलचस्प है कि आखिर भारत में इन सर्वेक्षणों का अर्थशास्त्र क्या  है? आखिर इन सर्वेक्षणों को करवाने से किसका भला होता है।

 टीवी चैनल टीआरपी के चक्कर में अपनी लोकप्रियता दांव पर लगा देते है। यदि सर्वे सही  जाता है तो बल्ले बल्ले अन्यथा साख पर विपरीत असर देखने को मिलता है। आज हम बिहार चुनाव की बात कर रहे है जहां महाएग्जिट पोल में एनडीए की बम्पर जीत का दावा किया गया है। बिहार में एक बार फिर भाजपा नीत एनडीए को स्पष्ट बहुमत का अपना आंकलन प्रस्तुत किया है। पोल ऑफ एग्जिट पोल्स में एनडीए को 155 सीटें मिलने का आकलन प्रस्तुत किया है। जबकि महागठबंधन को 82 से 98 सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है। इसके अलावा जनसुराज का खाता तो खुल सकता है, लेकिन उसे 2 से ज्यादा सीटें मिलने का अनुमान नहीं लगाया गया है। अन्य के खाते में 3 से 7 सीटें जा सकती  है।  IANS मैट्रिज, चाणक्य स्ट्रैटिजीज, पोल स्टार्ट, टाइम्स नाऊ-सीवोटर्स, दैनिक भास्कर,आज तक-सिसेरो, पोल डायरी, डीवी रिसर्च, न्यूज एक्स-सीएनएक्स, न्यूज नेशन, पीपुल्स इनसाइट, कामख्या ऐनालिटिक्स सहित लगभग डेढ़ दर्ज़न सर्वे एजेंसियों ने अपने एग्जिट पोल में एनडीए को 130 से 180 तक सीटें मिलने की भविष्यवाणी कर दी है। एग्जिट पोल एक तरह का चुनावी सर्वे होता है। मतदान वाले दिन जब मतदाता वोट देकर पोलिंग बूथ से बाहर निकलता है तो वहां अलग-अलग सर्वे एजेंसियों के प्रतिनिधि मौजूद होते हैं। वह मतदाता से मतदान को लेकर सवाल पूछते हैं। इसमें उनसे पूछा जाता है कि उन्होंने किसको वोट दिया है? इस तरह से हर विधानसभा या लोकसभा के अलग-अलग पोलिंग बूथ से मतदाताओं से सवाल पूछा जाता है। मतदान खत्म होने तक बड़ी संख्या में आंकड़े एकत्र हो जाते हैं। इन आंकड़ों को जुटाकर और उनके उत्तर के हिसाब से अंदाजा लगाया जाता है कि पब्लिक का मूड किस ओर है? गणितीय मॉडल के आधार पर ये निकाला जाता है कि कौन सी पार्टी को कितनी सीटें मिल सकती हैं? इसका प्रसारण मतदान खत्म होने के बाद ही किया जाता है। खबरिया चैनलों के एग्जिट पोल में कितना दम और सच्चाई है यह तो 14 नवम्बर को होने वाली मतगणना से ही पता चलेगा।

                                                                  

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर                                                                   

किसी बड़ी साजिश का संकेत है दिल्ली धमाका

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राजधानी की सुरक्षा पर गहरे सवाल, स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा आवश्यक

दिल्ली के रोहिणी सीआरपीएफ स्कूल में हुआ धमाका केवल एक हादसा नहीं बल्कि एक गहरी साजिश का संकेत है। यह घटना बताती है कि राजधानी जैसी सुरक्षित मानी जाने वाली जगह भी आतंकी या असामाजिक तत्वों के निशाने पर है। बच्चों के बीच इस तरह की घटना असहनीय और भयावह है। सरकार को चाहिए कि जांच एजेंसियाँ तेजी से कार्रवाई करें और दोषियों को कड़ी सजा दें। साथ ही स्कूलों और सार्वजनिक स्थलों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा हो ताकि भविष्य में ऐसी त्रासदियाँ दोहराई न जाएँ। नागरिक सुरक्षा ही राष्ट्र की वास्तविक ताकत है।

– डॉ प्रियंका सौरभ

रविवार सुबह राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में स्थित सीआरपीएफ स्कूल के बाहर हुआ धमाका पूरे देश को हिला गया। यह केवल एक हादसा नहीं था, बल्कि संभवतः किसी बड़ी साजिश की कड़ी का संकेत है। देश की राजधानी में सुरक्षाबलों के स्कूल के पास इस तरह का विस्फोट होना न सिर्फ सुरक्षा एजेंसियों की चौकसी पर सवाल उठाता है, बल्कि इस बात की भी चेतावनी देता है कि आतंकी और विध्वंसकारी ताकतें अब भी सक्रिय हैं और अपने नापाक इरादों को अंजाम देने के मौके तलाश रही हैं।

यह धमाका रोहिणी सेक्टर-14 के सीआरपीएफ पब्लिक स्कूल की दीवार के पास हुआ। स्थानीय लोगों ने सुबह करीब सात बजे के आसपास तेज धमाके की आवाज सुनी। धमाका इतना तेज था कि आसपास के मकानों और दुकानों के शीशे टूट गए, दीवार में छेद हो गया और क्षेत्र में कुछ देर के लिए अफरातफरी मच गई। सौभाग्य से स्कूल बंद था, जिससे किसी जानमाल का नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, यह बात राहत से ज्यादा चिंता का विषय है कि अगर यह घटना स्कूल खुलने के समय होती, तो बड़ी त्रासदी हो सकती थी।

दिल्ली पुलिस, एनआईए, एनएसजी और फॉरेंसिक टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर जांच शुरू की। जांच में सफेद पाउडर, तारों के टुकड़े और विस्फोटक पदार्थ के अंश मिले हैं, जिससे यह संभावना बलवती होती है कि धमाके में क्रूड बम या इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (IED) का इस्तेमाल किया गया। जांच एजेंसियों ने सीसीटीवी फुटेज खंगाले हैं, जिसमें एक संदिग्ध युवक सफेद टी-शर्ट में क्षेत्र के आसपास घूमता दिखा। वहीं, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म टेलीग्राम पर एक चैनल ने इस धमाके की जिम्मेदारी लेने का दावा किया, जिसे बाद में खालिस्तानी समर्थक तत्वों से जोड़ा गया। हालांकि इस दावे की पुष्टि जांच एजेंसियों ने नहीं की है, परंतु इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि घटना के पीछे किसी संगठित नेटवर्क की भूमिका हो सकती है।

दिल्ली देश की राजधानी है — यहाँ संसद, सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के मुख्यालय स्थित हैं। ऐसे में इस तरह का विस्फोट होना गंभीर सुरक्षा चूक को दर्शाता है। यह तथ्य और भी चिंताजनक है कि धमाका सीआरपीएफ स्कूल के बाहर हुआ — यानी एक ऐसे संस्थान के पास, जो स्वयं देश की सबसे सशक्त अर्धसैनिक बल से जुड़ा हुआ है। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब सुरक्षा बलों की चौकी के पास ऐसी घटना हो सकती है, तो आम नागरिक कितना सुरक्षित है? दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसियों को अब केवल प्रतिक्रियात्मक नहीं बल्कि प्रो-एक्टिव रणनीति अपनानी होगी — यानी घटना के बाद नहीं, बल्कि पहले से ऐसे संकेतों को पहचानना और निष्क्रिय करना होगा।

ऐसी घटनाएँ केवल भौतिक क्षति नहीं करतीं, बल्कि समाज में भय और असुरक्षा का माहौल भी पैदा करती हैं। राजधानी में इस तरह का विस्फोट आम नागरिकों के मन में यह धारणा मजबूत करता है कि आतंकवादी ताकतें किसी भी समय, कहीं भी वार कर सकती हैं। स्कूल के बाहर हुआ धमाका बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों के मनोबल को प्रभावित करता है। बच्चे जिन स्कूलों में शिक्षा लेने जाते हैं, अगर वे स्थान भी असुरक्षित महसूस होने लगें, तो यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

ऐसी घटनाओं के बाद राजनीतिक दलों की बयानबाज़ी शुरू हो जाती है — कोई इसे कानून-व्यवस्था की नाकामी बताता है तो कोई राजनीतिक साजिश कहता है। लेकिन सच्चाई यह है कि आतंकवाद और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियाँ किसी पार्टी या विचारधारा की नहीं होतीं, ये पूरी मानवता के खिलाफ होती हैं। इसलिए इस तरह के मामलों में राजनीतिक लाभ-हानि की सोच से ऊपर उठकर राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना समय की मांग है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो केवल कागज़ी जांचों तक सीमित न रहें, बल्कि जमीनी स्तर पर ठोस निवारक कदम सुनिश्चित करें।

आज आतंकवादी और असामाजिक तत्व पारंपरिक तरीकों से हटकर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया और डार्क वेब का उपयोग कर रहे हैं। टेलीग्राम चैनल के माध्यम से जिम्मेदारी लेने की कोशिश इसी प्रवृत्ति का हिस्सा है — जिससे आतंक फैलाना, भ्रम पैदा करना और जांच को भटकाना आसान हो जाता है। इसलिए अब सुरक्षा एजेंसियों को साइबर इंटेलिजेंस पर उतना ही ध्यान देना होगा जितना फिजिकल सुरक्षा पर दिया जाता है। फर्जी संदेशों, हैकिंग नेटवर्क और डिजिटल फंडिंग की निगरानी जरूरी है।

हर बार जब कोई ऐसी घटना होती है, तो हम यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि सुरक्षा एजेंसियाँ सब संभाल लेंगी। लेकिन सच्चाई यह है कि आम नागरिक भी सुरक्षा तंत्र की पहली कड़ी हैं। संदिग्ध वस्तु, अनजान व्यक्ति या असामान्य गतिविधि पर नजर रखना और तत्काल पुलिस को सूचित करना — यह नागरिक कर्तव्य बनना चाहिए। सुरक्षा सिर्फ बंदूक और बुलेटप्रूफ जैकेट से नहीं आती, बल्कि सजग नागरिक चेतना से भी आती है।

भारत लंबे समय से सीमापार आतंकवाद का शिकार रहा है। कई बार राजधानी दिल्ली और अन्य महानगर आतंकी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। रोहिणी विस्फोट जैसी घटनाएँ यह याद दिलाती हैं कि हमारे शत्रु तंत्र हर समय सक्रिय हैं और देश की स्थिरता को अस्थिर करने के प्रयास में हैं। ऐसे में भारत को अपनी आंतरिक सुरक्षा नीति को और सुदृढ़ करना होगा — विशेषकर शहरी क्षेत्रों की खुफिया निगरानी को तकनीकी रूप से उन्नत बनाना आवश्यक है।

हर ऐसी घटना में निष्कर्ष आने में महीनों लग जाते हैं। जनता को समय-समय पर अपडेट देना जरूरी है ताकि अफवाहें न फैलें। सभी केंद्रीय और अर्धसैनिक संस्थानों के आसपास की सुरक्षा समीक्षा तत्काल की जानी चाहिए। सोशल मीडिया पर उग्रवादी संदेशों और चैनलों पर सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। नागरिकों को सुरक्षा अभियान का भागीदार बनाना — स्कूलों और बाजारों में जागरूकता अभियान चलाना भी आवश्यक है। ऐसे मामलों पर सभी दलों को एक मंच से बयान देना चाहिए, ताकि दुश्मन यह न समझे कि देश अंदर से बँटा हुआ है।

दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में हुआ यह धमाका भले ही सौभाग्य से किसी बड़ी जनहानि का कारण नहीं बना, लेकिन यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आतंकवाद की चुनौती अब भी हमारे चारों ओर मौजूद है। यह केवल एक पुलिस केस नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक एकता और नागरिक जिम्मेदारी से जुड़ा मामला है। जरूरत इस बात की है कि हम घटना को महज़ “एक धमाका” न मानें, बल्कि इसे एक चेतावनी के रूप में लें — एक ऐसी चेतावनी जो बताती है कि लापरवाही की गुंजाइश अब नहीं बची।

राष्ट्र की सुरक्षा केवल सैनिकों के कंधों पर नहीं टिकी होती, बल्कि हर नागरिक की सजगता और एकता में निहित होती है। अगर हम सभी मिलकर सतर्क रहें, जागरूक रहें और एकजुट रहें — तो कोई भी साजिश हमें तोड़ नहीं सकती।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

रोजगार संकट :भारत के आईटी क्षेत्र में छंटनी की लहर

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव से भारत के सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग में गहरे संरचनात्मक परिवर्तन, पर क्या तैयार है देश का श्रमबल?

भारत के आईटी क्षेत्र में हाल की छँटनियाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित स्वचालन के दौर की अनिवार्य वास्तविकता हैं। यह केवल रोजगार संकट नहीं, बल्कि कौशल और तकनीक के पुनर्संतुलन की प्रक्रिया है। सरकार, उद्योग और शिक्षण संस्थानों को मिलकर एक राष्ट्रीय पुनःप्रशिक्षण अभियान चलाना चाहिए, ताकि लाखों पेशेवरों को नई तकनीकी दिशा मिल सके। भविष्य में वही राष्ट्र आगे बढ़ेगा जो अपने युवाओं को “डिजिटल श्रमिक” नहीं बल्कि “तकनीकी नवप्रवर्तक” बनाएगा। परिवर्तन अवश्यंभावी है, लेकिन विवेक और दूरदृष्टि के साथ यह परिवर्तन भारत के लिए शक्ति बन सकता है।

— डॉ प्रियंका सौरभ

भारत का सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र लंबे समय से देश की आर्थिक प्रगति का प्रमुख आधार रहा है। यह क्षेत्र न केवल सेवा निर्यात का सबसे बड़ा स्रोत है, बल्कि लाखों शिक्षित युवाओं को उच्च आय वाले रोजगार भी प्रदान करता रहा है। परंतु हाल के वर्षों में इसमें एक गहरी हलचल देखी जा रही है। वर्ष 2024–25 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (टीसीएस) द्वारा लगभग 20,000 नौकरियों में की गई कटौती ने पूरे उद्योग को हिला दिया। यह केवल एक कंपनी का प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय आईटी क्षेत्र में चल रहे एक व्यापक संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत है।

यह परिवर्तन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन अधिगम और स्वचालित प्रणालियों के तीव्र विस्तार के कारण हो रहा है। जिन कार्यों के लिए पहले सैकड़ों कर्मचारियों की आवश्यकता होती थी, अब वही कार्य कुछ ही मिनटों में स्वचालित तकनीक द्वारा संपन्न किए जा रहे हैं। सॉफ्टवेयर निर्माण, परीक्षण, और ग्राहक सेवा जैसे कार्य अब “एजेंटिक एआई” प्रणालियों द्वारा अधिक कुशलता से किए जा रहे हैं। इससे कंपनियों की उत्पादकता तो बढ़ी है, लेकिन मानव श्रम की आवश्यकता घटने लगी है — और यही इस मौन छँटनी (Silent Layoff) की सबसे बड़ी वजह है।

टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो और कॉग्निज़ेंट जैसी कंपनियाँ अब पुराने “आउटसोर्सिंग” मॉडल से हटकर “मूल्य आधारित डिजिटल सेवा” मॉडल की ओर बढ़ रही हैं। यह परिवर्तन सीधे तौर पर मध्यम स्तर के कर्मचारियों को प्रभावित कर रहा है, जिनके कौशल पारंपरिक तकनीकों तक सीमित हैं। वे नई एआई आधारित प्रणालियों के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं पा रहे हैं। यही कौशल असंगति (Skill Mismatch) इस संकट का मूल कारण है।

एआई आधारित उपकरणों ने सॉफ्टवेयर उद्योग में मध्य प्रबंधन और सहायक भूमिकाओं को लगभग अप्रासंगिक बना दिया है। पहले जहाँ “ईआरपी प्रबंधन” या “सिस्टम रखरखाव” के लिए बड़े दलों की आवश्यकता होती थी, अब वही कार्य कुछ प्रोग्राम और क्लाउड स्वचालन प्रणालियाँ पूरी कर देती हैं। कंपनियों के लिए यह लागत घटाने का साधन है, लेकिन लाखों कर्मचारियों के लिए यह असुरक्षा का कारण बन गया है।

यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका और यूरोप में भी तकनीकी उद्योगों में बजट कटौती और व्यापारिक संरक्षणवाद के कारण भारी परिवर्तन हो रहे हैं। विदेशी ग्राहक अब मानव श्रम आधारित सेवाओं की जगह तकनीक-आधारित समाधान चाहते हैं। साथ ही, अमेरिका में एच-1बी वीज़ा शुल्क वृद्धि और स्थानीय भर्ती नीतियों ने भारतीय कंपनियों के लिए विदेशों में कर्मचारियों की नियुक्ति को कठिन बना दिया है। इन सब कारणों से कंपनियाँ घरेलू स्तर पर भी कार्यबल कम करने पर मजबूर हो रही हैं।

वर्ष 2023 से 2025 के बीच भारत की शीर्ष पाँच आईटी कंपनियों में लगभग 50,000 नौकरियाँ समाप्त हुई हैं। कंपनियाँ इसे “कार्य दक्षता में सुधार” बताती हैं, परंतु वास्तविकता यह है कि मानव संसाधन की आवश्यकता कम होती जा रही है। यह न केवल आर्थिक चुनौती है, बल्कि सामाजिक रूप से भी चिंता का विषय है, क्योंकि आईटी क्षेत्र देश के सबसे शिक्षित और संगठित वर्ग को रोजगार देता है।

फिर भी, इस परिवर्तन को पूरी तरह नकारात्मक नहीं कहा जा सकता। हर तकनीकी क्रांति अपने साथ अवसर भी लाती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने नए क्षेत्र खोले हैं — जैसे डेटा विज्ञान, क्लाउड इंजीनियरिंग, साइबर सुरक्षा, और एआई मॉडल निर्माण। प्रश्न यह नहीं है कि नौकरियाँ समाप्त हो रही हैं, बल्कि यह कि पुराने कौशल अप्रासंगिक हो रहे हैं और नए कौशलों की मांग बढ़ रही है।

अब आवश्यकता है कि सरकार, उद्योग और शिक्षा क्षेत्र मिलकर समन्वित प्रयास करें।

सबसे पहले, राष्ट्रीय स्तर पर “डिजिटल पुनःप्रशिक्षण अभियान” चलाना होगा। टीसीएस ने स्वयं 5.5 लाख कर्मचारियों को मूल एआई प्रशिक्षण दिया और एक लाख को उन्नत प्रशिक्षण में सम्मिलित किया। यदि इस मॉडल को अन्य कंपनियों और सरकारी योजनाओं में शामिल किया जाए, तो बड़ी संख्या में पेशेवरों को पुनःकुशल बनाया जा सकता है।

दूसरे, तकनीकी शिक्षा संस्थानों को अपने पाठ्यक्रम में मूलभूत परिवर्तन लाने होंगे। अब केवल प्रोग्रामिंग या नेटवर्किंग नहीं, बल्कि एआई नैतिकता, उत्पाद सोच (Product Thinking), डेटा विश्लेषण, और सृजनात्मक समस्या समाधान जैसे विषयों को शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा। नई शिक्षा नीति (एनईपी) के तहत इन विषयों को शामिल कर युवाओं को भविष्य की तकनीकों के अनुरूप तैयार किया जा सकता है।

तीसरे, सामाजिक सुरक्षा ढाँचे को मज़बूत करना होगा। छँटनी झेल रहे कर्मचारियों को सेवरेंस पैकेज, पुनःप्रशिक्षण सब्सिडी, और मानसिक स्वास्थ्य सहायता दी जानी चाहिए। भारत में निजी क्षेत्र के अधिकांश कर्मचारी किसी औपचारिक सुरक्षा प्रणाली से बाहर हैं। ऐसे में सरकार को “डिजिटल रोजगार सुरक्षा कोष” या “टेक्नो-कर्मचारी बीमा योजना” जैसी पहल शुरू करनी चाहिए।

चौथे, सार्वजनिक–निजी भागीदारी (PPP) मॉडल के माध्यम से बड़े पैमाने पर कौशल प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएँ। एड-टेक कंपनियों, नासकॉम (NASSCOM) और राज्य सरकारों को मिलकर क्षेत्रीय प्रशिक्षण मिशन शुरू करने चाहिए, ताकि बेरोजगार तकनीकी पेशेवरों को नए कौशल सिखाए जा सकें।

पाँचवाँ, नवाचार और स्टार्ट-अप संस्कृति को और प्रोत्साहित करना होगा। एआई आधारित उत्पाद विकास और डीप-टेक उद्यमिता को बढ़ावा देकर नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। सरकार को “स्टार्ट-अप इंडिया” और “डिजिटल इंडिया” योजनाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहिए। अगर भारत अपने युवाओं को “रोजगार चाहने वाला” नहीं, बल्कि “रोजगार सृजक” बना सका, तो यह संकट अवसर में बदल सकता है।

साथ ही, कंपनियों को अपनी मानव संसाधन नीतियों में संवेदनशीलता लानी होगी। “मौन छँटनी” या “जबरन निष्कासन” जैसी प्रक्रियाएँ कर्मचारियों के आत्मबल को तोड़ देती हैं। तकनीकी विकास तभी सार्थक है जब वह मानवीय मूल्यों के साथ संतुलन बनाए रखे।

भारत के पास इस समय एक अनूठा अवसर है। हमारे पास विश्व का सबसे बड़ा युवा तकनीकी कार्यबल है। यदि यह कार्यबल सही दिशा और कौशल के साथ प्रशिक्षित हो सके, तो भारत न केवल आईटी सेवाओं का केंद्र रहेगा बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के वैश्विक युग में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। इसके लिए एक दीर्घकालिक “राष्ट्रीय डिजिटल कौशल मिशन 2030” की रूपरेखा तैयार की जानी चाहिए।

टीसीएस की छँटनी जैसी घटनाएँ हमें यह चेतावनी देती हैं कि तकनीकी युग में स्थिरता केवल निरंतर सीखने और अनुकूलन से ही संभव है। आने वाले दशक में वही कंपनियाँ सफल होंगी जो तकनीकी दक्षता के साथ-साथ मानवीय कौशल — जैसे विवेकपूर्ण निर्णय, रचनात्मकता और नैतिक सोच — को भी महत्त्व देंगी।

भारत के आईटी क्षेत्र ने विश्व में अपनी पहचान गुणवत्ता, नवाचार और भरोसे के बल पर बनाई है। यह भरोसा तभी कायम रह सकता है जब उद्योग अपने कर्मचारियों को केवल “संसाधन” नहीं, बल्कि “साझेदार” समझे। अब समय आ गया है कि सरकार एक “प्रौद्योगिकी रोजगार नीति” बनाए जो नवाचार और सुरक्षा दोनों का संतुलन स्थापित करे।

तकनीकी क्रांतियाँ हमेशा समाज को दो विकल्प देती हैं — या तो उनके साथ विकसित हुआ जाए, या उनके नीचे दबा जाए। भारत के लिए यही समय है कि वह इस परिवर्तन को अपने अनुकूल बना ले। यदि देश इस चुनौती को दूरदृष्टि और नीतिगत समन्वय के साथ संभाल सका, तो यह छँटनी का दौर भविष्य के लिए एक नया अवसर बन सकता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

पक्षियों को भी खुले आसमान में जीने का अधिकार है

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                                     बाल मुकुन्द ओझा

 राष्ट्रीय पक्षी दिवस प्रतिवर्ष 12 नवंबर को मनाया जाता है। देशभर में राष्ट्रीय पक्षी दिवस भारत के प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी और प्रकृतिवादी डॉ. सलीम अली की जयंती के अवसर पर मनाया जाता है। सलीम अली को पक्षी मानव के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने पक्षियों से सम्बंधित अनेक पुस्तकें लिखी थीं जिनमें  बर्ड्स ऑफ इंडिया सबसे लोकप्रिय पुस्तक है। पद्मविभूषण से नवाजे गये परिंदों के इस मसीहा को प्रकृति संरक्षण की दिशा में किए गए प्रयासों के लिए कभी भुलाया नहीं जा सकता है ।

जिस भूखंड की जलवायु जीवन के अनुकूल हो और वहाँ पर हरी-भरी वनस्पतियाँ पाई जाती हों, वहाँ पशु-पक्षी और जीव-जन्तुओं का पाया जाना एक नैसर्गिक सत्य है। किसी भी भूखंड में विचरण करने वाले पशु-पक्षी और जीव-जन्तुओं की उपस्थिति से वहाँ की जलवायु का अनुमान लगाया जा सकता है। पंख वाले या उड़ने वाले किसी भी जन्तु को पक्षी कहा जाता है। आसमान में उड़ते पक्षी किसी का भी मन मोह लेते है। रंग बिरंगे पक्षियों को देखकर तन और मन दोनों प्रफुलित हो जाता है। जीव विज्ञान में इस श्रेणी के जन्तुओं को पक्षी कहते हैं।

भारत में अलग अलग प्रजातियों के पक्षी मिल जाते है। इनमे से ज्यादातर पक्षी भारत के  होते है लेकिन कुछ पक्षी प्रवासी भी होते है जो दूसरे देशों से लम्बी यात्रा करके भारत में मौसम विशेष में आते है। पक्षियों को हिंदू धर्म में देवता और पितर माना गया है। पौराणिक आख्यान के मुताबिक जिस दिन आकाश से पक्षी लुप्त हो जाएंगे उस दिन धरती से मनुष्य भी लुप्त हो जाएगा। हिन्दू धर्म में पक्षियों को मारना बहुत बुरा माना जाता है। कहते है पक्षी को मौत के घाट उतारने का मतलब पितरों के मारने के सामान है। बताया जाता है दुनियाभर में लगभग 10 हजार तरह के पक्षी होते हैं। भारत में ही लगभग 1200 प्रजातियां पायी जाती है। इनमें से बहुत सी प्रजातियां लुप्त हो गई है और अनेक लुप्त होने के कगार पर है। इनमें राष्ट्रीय पक्षी मोर, गौरेया, कौवा, कबूतर, बाज, चील, मुर्गी, तोता, शामा, राजहंस, उल्लू, बाज, कमल, तितली,  पक्षी, नीलकंठ, नवरंग,सारस, आदि सर्वत्र देखने को मिल जाते है। मोर को भारत के सभी राज्यों में आमतौर पर देखा जा सकता है। मोर भारत का राष्ट्रीय पक्षी है। यह रंग बिरंगा पक्षी दिखने में बेहद खूबसूरत होता है परंतु यह अधिक दूर तक नहीं उड़ सकता। मोर प्राचीन काल से ही शिष्टता और सुंदरता का प्रतीक माना गया है और मोर पंख को मुकुट और सिंहासनों पर लगाया जाता रहा है। इसी भांति तीतर पक्षी अपना घोंसला जमीन पर ही बनाता हैं। बतख पक्षी अपना बिना सिर घुमाये पीछे की तरफ भी देख सकता हैं। कोयल आपना घोंसला कभी नहीं बनाती हैं। कबूतर को शांति का प्रतीक माना जाता है। दुनिया में सबसे ज्यादा पाया जाने वाला पक्षी मुर्गा हैं। शुतुरमुर्ग पक्षी की आंख उसके दिमाग से भी बड़ी होती है। शुतुरमुर्ग पक्षी घोड़े से भी ज्यादा तेज दौड़ सकता हैं। पेंगुइन एक ऐसा पक्षी है यो तैरते समय पंखों का इस्तेमाल करता है। उल्लू एकमात्र एक ऐसा पक्षी है जो नीला रंग पहचान सकता है। दुनिया में तोतों की 350 से भी अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।  शुतुरमुर्ग संसार का सबसे बड़ा पक्षी है जिसका वजन 150 किलोग्राम से भी अधिक होता है। इसका अंडा भी सबसे बड़ा होता है।  चील पक्षी आग और धुंआ को देखकर आकर्षित होता है। पक्षियों के दांत नहीं होते वह अपना भोजन चोंच से ही खाते हैं।

बताया जाता है पक्षी है तो संसार का अस्तित्व है। हमें हमेशा पक्षियों के प्रति प्रेम और सद्भाव से पेश आना चाहिए । वह भी हमारी तरह खुशी और दुःख के भाव महसूस करतें हैं । वे बोल नहीं सकतें पर उनकी अपना बोली है। कहीं लोग पक्षी पालतें हैं। पिंजरें में पक्षियों को रखकर पालना गलत है। पक्षी स्वभाव से आजाद है उनको आजाद छोड़ना ही सही होगा है। यदि हम किसी पीड़ित पक्षी को देखें तो उसकी मदद करनी चाहिए। पक्षियों के चिकित्सक के पास ले जाकर उसकी इलाज करवाना बड़े पुण्य का काम होगा। पक्षी भी पीड़ा महसूस करतें हैं। बहुत कम लोगों में पक्षी के प्रति प्रेम भावना जीवित हैं। अगर किसी में यह न भी हो तो कम से कम उन्हें तंग न करें। किसी छोटे बच्चे को किसी प्राणी पर अन्याय करते हुए देखें तो उन्हें रोकें और समझाएं।

 बाल मुकुन्द ओझा

 वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

   डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

वोट चोरी : देश चाहता राहुल के सवालों के बिंदुवार जवाब

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                                                                    तनवीर जाफ़री  

                         लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी इन दिनों सत्ता व चुनाव आयोग की मिलीभगत के कथित नेटवर्क को लेकर काफ़ी आक्रामक हैं। विगत 7 अगस्त से लेकर गत 5 नवंबर तक वे चार बार देश के मीडिया के समक्ष अनेक प्रमाणों सहित सार्वजनिक रूप से यह दावे कर चुके हैं कि चुनाव आयोग सत्ता की कठपुतली के रूप में काम करते हुये ‘वोट चोरी’ कर रहा है। जिस तरह 7 अगस्त को उन्होंने अपनी इस तरह की पहली प्रस्तुति में कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र को केंद्र में रखते हुये यहाँ 1,00,250 फ़र्ज़ी वोट जोड़े जाने का आरोप लगाया था जिसमें 11,956 डुप्लीकेट वोटर, 40,009 अमान्य पते, 10,452 बल्क रजिस्ट्रेशन अर्थात एक ही पते पर 80 लोग , 4,132 अमान्य फ़ोटो , और 33,692 फ़ॉर्म 6 का दुरुपयोग जैसे अनेक गंभीर आरोप लगते हुये कहा था कि चुनाव आयोग भाजपा के साथ मिलकर “वोट चोरी” करते हुये “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत का उल्लंघन कर रहा है। । ठीक उसी तर्ज़ पर उन्होंने पिछली 5 नवंबर को दिल्ली में मीडिया के समक्ष हरियाणा के अक्टूबर 24 के चुनावों में बड़े पैमाने पर हुई कथित धांधली का भी भंडाफोड़ किया। इस बार सुबूतों के साथ चुनाव आयोग पर लगाये गए उनके आरोप और भी अधिक गहरे व गंभीर थे।

                        उन्होंने यहाँ आरोप लगाया कि 2024 के राज्य विधानसभा चुनाव में 25 लाख वोट “चुराए” गए। ” उन्होंने अपनी इस प्रस्तुति को H Files” का नाम दिया तथा अपने इन गंभीर रहस्योद्घाटन को सत्ता व चुनाव आयोग के लिये हाइड्रोजन बताया। राहुल गांधी ने दावा किया कि हरियाणा में भी 5,21,619 डुप्लीकेट वोटर पाए गए जबकि 93,174 मतदाताओं के पते अमान्य मिले। इसी तरह 19,26,351 बल्क वोटर पाए गये और 1,24,177 मत ऐसे मिले जिनपर फ़र्ज़ी फ़ोटो लगाई गयी थी।  इन्हीं फ़र्ज़ी फ़ोटो में एक चित्र एकब्राज़ीलियन मॉडल का भी इस्तेमाल किया गया जिसके फ़ोटो पर 10 अलग अलग बूथों पर अपना नाम बदल बदल कर 22 बार मतदान किया गया था। जब उस ब्राज़ीलियन मॉडल लैरिसा नेरी को ब्राज़ील में यह पता लगा कि उस के चित्र का प्रयोग भारत के वोटर लिस्ट में बार बार सीमा, स्वीटी, सरस्वती जैसे 22 अलग अलग नामों के साथ किया गया है तो उसने कहा कि वह इससे पूरी तरह अनजान हैं। उसने एक वीडियो में हैरानी जताते हुए कहा:”दोस्तों, मैं आपको एक मज़ाक़ सुनाती हूं—यह बहुत भयानक है! वे भारत में चुनावों के लिए मेरी पुरानी तस्वीर का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें मुझे भारतीय दिखा रहे हैं। यह पागलपन क्या है? मैं कभी भारत नहीं गई हूं। यह अविश्वसनीय है।” गोया ब्राज़ील तक भारतीय चुनाव आयोग की धांधली के डंके बजते सुने जा सकते हैं। इसी तरह एक महिला का चित्र ऐसा भी था जिसे लगाकर  223 बार दो अलग बूथों पर मतदान कराया गया। 5 नवंबर को दिल्ली में “H Files” के प्रस्तुत करने के बाद राहुल गाँधी बिहार की अपनी सभी चुनावी जनसभाओं में केंद्रीय चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर कथित वोट चोरी का सार्वजनिक रूप से आरोप लगा रहे हैं। और जनता की ओर से ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ के नारे लगाये जा रहे हैं। वे हरियाणा की भाजपा सरकार को चोरी की सरकार बता रहे हैं। वे Gen Z का भी वोट चोरी के प्रति सचेत रहने का आह्वान कर रहे हैं। राहुल गाँधी के अनुसार ‘’ सच तो ये है कि नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह जी और चुनाव आयोग, ये तीनों मिलकर संविधान पर हमला कर रहे हैं।  संविधान कहता है ‘वन मैन, वन वोट’ । हरियाणा में यह सिद्धांत नहीं था।  वहां ‘वन मैन, मल्टिपल वोट्स’ हुआ”। उन्होंने कहा, ‘’वे लोग बिहार में भी यही करने जा रहे हैं। यह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा और गुजरात में भी हो चुका है। ’’ इस रहस्योद्घाटन के बाद दिल्ली से भी कुछ ऐसे ख़ास लोगों के नाम उजागर हो रहे हैं जिनके पास दिल्ली का भी मतदाता पहचान पात्र है और बिहार का भी।

                        अब लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गाँधी के इस तरह के अति गंभीर व गहरे आरोपों का जवाब यदि केंद्रीय चुनाव आयोग बिंदुवार तरीक़े से देने के बजाये केवल उन्हें झुठलाने की कोशिश करे या इन आरोपों को बेबुनियाद कहकर उल्टे राहुल गांधी से ही अपने आरोपों संबंधी हलफ़नामा दाख़िल करने को कहे तो इससे चुनाव आयोग की साख पर सवाल उठना तो लाज़िमी है ? या केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू का यह कहना कि हरियाणा में कांग्रेस आपसी फूट के कारण हारी और राहुल अपनी नाकामी को छुपाने के लिए झूठे दावे कर रहे हैं या हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी द्वारा राहुल के दावों दावों को ख़ारिज कर देना निश्चित रूप से राहुल के आरोपों का जवाब नहीं है। आज यदि देश में बिना घर के पते के आधार कार्ड नहीं बन सकता तो मकान नंबर के बिना मतदाता पहचान पत्र कैसे ? यह कौन बतायेगा या इसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा कि एक ही व्यक्ति की फ़ोटो का उपयोग अनेक जगहों पर कैसे किया गया ? एक ही मकान में 100 ,50  या 20-20 मतदाताओं के फ़र्ज़ी नाम कैसे शामिल किये गये जबकि इन फ़र्ज़ी नामों के लोग वहाँ रहते ही नहीं? राहुल का यह भी बेहद गंभीर आरोप है कि  चुनाव आयोग ने डुप्लीकेट नाम पता व फ़ोटो हटाने का सॉफ़्टवेयर होने के बावजूद इस सॉफ़्टवेयर को बंद कर दिया अन्यथा चुनाव पूर्व ही सारे डुप्लीकेट चेक हो जाते। क्या यह आरोप चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा नहीं करता ?

                      राहुल का दावा है कि उनके पास और भी कई सबूत हैं और वे इस प्रक्रिया (वोट चोरी का पर्दा फ़ाश) को जारी रखेंगे। सवाल यह है कि आज राहुल को चुनाव आयोग के विरुद्ध इतने संगीन आरोप क्यों लगाने पड़ रहे हैं जिससे पूरे विश्व में न केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गयी है बल्कि यह सवाल भी खड़ा हो गया है दिल्ली से लेकर विभिन्न राज्यों की सरकारें वास्तव में वही सरकारें हैं जिन्हें जनता द्वारा लंबी लंबी क़तारों में घंटों खड़े होकर चुना गया है या फिर उनकी निर्वाचित सरकार चोरी कर ली गयी है ? निश्चित रूप से देश का प्रत्येक व्यक्ति जिसे लोकतंत्र व इसकी चुनाव व्यवस्था पर विश्वास है कि वह राहुल के सभी आरोपों के जवाब बिंदुवार चाहता है न कि वह इधर इधर के बहानेबाज़ी वाले जवाब सुनना चाहता है। यदि राहुल के आरोप ग़लत और बेबुनियाद हैं तो चुनाव आयोग उनके विरुद्ध क़ानूनी कार्रवाई क्यों नहीं करता ? देश को राहुल के गंभीर सवालों के गंभीर जवाब चाहिये । 

  − तनवीर जाफ़री

वरिष्ठ पत्रकार

अहंकार मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन

गुरु नानक देव की जयंती पर

                      बाल मुकुन्द ओझा

हमारे साधु  संतों ने सदा सर्वदा समाज को सद्भाव, प्रेम और भलाई का मार्ग दिखाया था।  इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए गुरु नानक देव ने समाज को झूठ, प्रपंच और अहंकार को त्याग कर सामाजिक एकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया था। आज समाज को जिस प्रकार के आडम्बर का सामना करना पढ़ रहा है वह निश्चय ही दुखद और चिंतनीय है। साधु संतों का लिबास ओढ़ कर राक्षसी प्रवृति के लोग अंध विश्वास और आस्था का भ्रम फैलाकर भोले भाले लोगों  को अपने चंगुल में फंसा कर आर्थिक और शारीरिक शोषण और दोहन कर रहे है। ऐसे में हमें ढोंगी साधुओं से सावधान रहकर गुरु नानक देव की शिक्षा और उपदेशों को आत्मसात कर राष्ट्र और समाज की हमारी पुरातन सामाजिक संरचना को मजबूत बनाने की जरूरत है। संत महात्माओं में गुरु नानक देव का नाम इतिहास में  स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। सिख धर्म के संस्थापक  और महान समाज सुधारक गुरु नानक देव का जन्म रावी नदी के किनारे पाकिस्तान के गाँव राय भोई की तलवंडी में कार्तिक पूर्णिमा, संवत् 1527 को हुआ था। अहंकार मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन हर साल  कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्रकाश पर्व या गुरुपरब के रूप में मनाई जाती है। यह सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव जी का जन्मदिवस है। इस साल गुरु नानक देव की 556वीं जयंती  5 नवम्बर को मनाई जा रही है।

सिख समुदाय के लोग इसे बड़ी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाते हैं। आज के पावन पवित्र  दिन हमें नानक देव के विचारों का गहन मंथन कर आत्मसात करने की जरुरत है। उनके बताये मार्ग पर चलकर हम अपने समाज को शांति और भलाई का रास्ता दिखा सकते है। गुरु नानक जयंती सिखों का सबसे बड़ा त्योहार है। हिंदू धर्म में दीपावली की तरह ही सिख धर्म में गुरु नानक जयंती मनाई जाती है। गुरु नानक देव ने सिख धर्म की स्थापना की थी। सिख समुदाय के लिए लोग इस दिन सुबह प्रभात फेरी निकालते हैं। गुरुद्वारे जाकर मत्था टेकते हैं, वाहे गुरू का जाप करते हैं और भजन कीर्तन करते हैं। गुरु नानक देव के 556 वें प्रकाश पर्व के मौके पर चारों ओर दीप जला कर रोशनी की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुरु नानक ने समाज में बढ़ रही कुरीतियों और बुराइयों को दूर करने का काम किया था। बुराइयों और कुरीतियों को त्याग करके नई राह दिखाई थी।

महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानन्द सहित अनेक महापुरुषों ने कहा था आप अहंकार छोड़ दीजिये, सुखों की अनुभूति होना प्रारम्भ हो जाएगा। धर्मपुस्तक, देवालय और प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहीं, यदि हमने अहंकार त्याग दिया है। गुरु नानक देव की शिक्षा का सार भी यही था अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसलिए अहंकार कभी नहीं करना चाहिए बल्कि विनम्र होकर सेवाभाव से जीवन गुजारना चाहिए। मगर आज हम अपने महापुरुषों के बताये मार्ग पर न चलकर अपने मन और भाव में अहंकार पाले हुए है जो समाज और राष्ट्र को पतन के मार्ग की ओर धकेल रहा है। हमारे  साधु  संतों  ने  सदा  सर्वदा  समाज  को  भलाई  का मार्ग दिखाया था। इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए गुरु नानक देव ने समाज को झूठ, प्रपंच और अहंकार को त्याग कर सामाजिक एकता और भाईचारे का पाठ पढ़ाया था।  हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम समाज में प्रेम, भलाई और एक दूसरे के सुख दुःख में भागीदारी देकर गुरु नानक देव जैसे संतों को अपनी सच्ची श्रद्धांजलि देंगे। 

सुख और दुःख पर गुरु नानक देव के विचार बहुत स्पष्ट और अनुकरणीय है। नानक देव का कहना था इस सृष्टि में दुख ही दुख व्याप्त है। कुछ लोग अपने आप को सुखी समझते हैं, लेकिन देखा जाए तो वे भी किसी न किसी दुख से दुखी हैं। गुरु नानक का यह कथन न केवल शाश्वत सत्य अपितु अजर अमर है। आज भी हमारा समाज दुखों के महासागर में गोते खा रहा है। अमीर से गरीब तक समाज का हर तबका किसी न किसी कारण दुखी है।

गुरु नानक देव ने ही इक ओंकार का नारा दिया यानी ईश्वर एक है। ईश्वर सभी जगह मौजूद है। हम सबका पिता वही है इसलिए सबके साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहिए। उनका कहना था किसी भी तरह के लोभ को त्याग कर अपने हाथों से मेहनत कर और न्यायोचित तरीकों से धन का अर्जन करना चाहिए। कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए बल्कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से जरूरतमंदों की भी मदद करनी चाहिए। धन को जेब तक ही सीमित रखना चाहिए। उसे अपने हृदय में स्थान नहीं बनाने देना चाहिए अन्यथा नुकसान हमारा ही होता है। स्त्री-जाति का आदर करना चाहिए। गुरु नानक देव, स्त्री और पुरुष सभी को बराबर मानते थे। तनाव मुक्त रहकर अपने कर्म को निरंतर करते रहना चाहिए तथा सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। संसार को जीतने से पहले स्वयं अपने विकारों और बुराईयों पर विजय पाना अति आवश्यक है। अहंकार मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसलिए अहंकार कभी नहीं करना चाहिए बल्कि विनम्र होकर सेवाभाव से जीवन गुजारना चाहिए।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर