हम शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए तैयार हैंःराष्ट्रपति मुर्मु

0

नई दिल्ली — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ऑपरेशन सिंदूर का उल्लेख करते हुए इसे भारत की सैन्य ताकत और आतंकवाद-रोधी रणनीति का एक निर्णायक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने न केवल भारत की सैन्य क्षमता और तत्परता को साबित किया है, बल्कि यह दिखाया है कि जब देश की संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा की बात हो, तो भारत दृढ़ता व जिम्मेदारी के साथ कार्रवाई करने में सक्षम है।राष्ट्रपति ने कहा, “हम शांति चाहते हैं, लेकिन अपनी सीमाओं और नागरिकों की रक्षा के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि हमारी कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सशस्त्र बल — मिलकर एक ऐसा भारत प्रस्तुत करते हैं जो मजबूत, सुरक्षित और न्यायपूर्ण है।

राजधानी के मानेकशॉ सेन्टर में आयोजित चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 के तीसरे संस्करण का बुधवार को राष्ट्राध्यक्ष द्रौपदी मुर्मू ने मुख्य अतिथि के रूप में भव्य उद्घाटन किया। इस मौके पर देश के शीर्ष सैन्य अधिकारी, रक्षा विशेषज्ञ, थिंक-टैंक, नीति आयोग, प्रशासनिक तथा स्थनीय प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय मेहमान तथा पत्रकार मौजूद थे — जिससे यह कार्यक्रम रक्षा एवं राष्ट्रीय सुरक्षा पर विचार-विमर्श का एक प्रमुख मंच बन गया।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग का यह संस्करण 27–28 नवंबर 2025 को “Reform to Transform – सशक्त, सुरक्षित एवं विकसित भारत” के थीम के साथ आयोजित किया गया है। इस मंत्र के अंतर्गत रक्षा व्यवस्थाओं में सुधार, आत्मनिर्भरता, भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए रणनीतिक बदलाव, आधुनिक युद्ध-तकनीक, इंडो-पैसिफिक सुरक्षा, साइबर व स्पेस रक्षा, थ्रेड कमांड संरचनाएं व संयुक्त ऑपरेशनल क्षमता आदि पर व्यापक चर्चा होगी।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डायलॉग के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि यह डायलॉग राष्ट्र की रक्षा संरचनाओं तथा सामरिक दृष्टिकोण के विस्तार में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि “भारत अब केवल संध्यात्मक चुनौती नहीं देखता, बल्कि नए युद्ध, आतंकवाद, उग्रवाद, मानवीय तथा हाइब्रिड खतरों का सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार है।


डायलॉग में शामिल अधिकांश वरिष्ठ सैन्य अधिकारी, रणनीतिक विश्लेषक, रक्षा विशेषज्ञ और नीति-निर्धारक इस अवसर पर उपस्थित थे। सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी सहित तीनों सेनाओं के उच्च अधिकारी एवं रक्षा सचिव, थिंक-टैंक प्रतिनिधि, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ एवं नीति आयोग के नेता डायलॉग के सत्रों में भाग ले रहे थे।

डायलॉग के दौरान यह स्पष्ट किया गया कि आज की बदलती भू-राजनीतिक स्थिति, तकनीकी चुनौतियाँ, साइबर व स्पेस असब्यूरिटीज, सीमा संघर्ष, आतंकवाद व हाइब्रिड युद्धों जैसी चुनौतियों के बीच भारत को अपनी रणनीति, हथियार-प्रणाली, जानकारी एवं कूटनीतिक दृष्टिकोण को और मजबूत करना होगा। “रिफॉर्म से ही ट्रांसफॉर्मेशन संभव है” — यह इस डायलॉग का मूल संदेश रहा।

राष्ट्रपति ने सम्मानित सशस्त्र बलों की मौजूदगी की भी सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने हर चुनौती में पेशेवराना दक्षता, अनुशासन और देशभक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण दिया है — चाहे वह पारंपरिक युद्ध हो, आतंकवाद-रोधी अभियान हो या मानवीय सहायता।

द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन में वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत का दृष्टिकोण “वसुधैव कुटुंबकम” — अर्थात् सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानने — पर आधारित है। इसके बावजूद, देश को अपनी सीमाओं, स्वाभिमान और नागरिकों की रक्षा के प्रति सजग रहना होगा। ऑपरेशन सिंदूर ने यही दिखाया है कि भारत न केवल सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत है, बल्कि शांति की उसकी प्रतिबद्धता भी स्पष्ट है।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत की कूटनीति, अर्थव्यवस्था और सशस्त्र-बल मिलकर इसे 21वीं सदी का जिम्मेदार, मजबूत और विश्वस्तरीय सुरक्षा-निगमित देश बनाने की दिशा में अग्रसर कर रहे हैं।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 में कई सत्र आयोजित होंगे जिनमें स्वदेशी रक्षा उत्पादन, हाइब्रिड व साइबर सुरक्षा, मल्टी-डोमेन थियेटर कमांड, इंडो-पीसिफिक रणनीति, सामरिक कूटनीति, संयुक्त रक्षा और बाह्य चुनौतियों पर भारत की तैयारियों पर चर्चा होगी। इसके अतिरिक्त, आतंकवाद-रोधी रणनीति, सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास व नागरिक सुरक्षा, मानवीय एवं राहत अभियानों में सशस्त्र बलों की भूमिका, और रक्षा संरचनाओं में लॉजिस्टिक-आधार, टेक्नोलॉजी एवं संयुक्तता जैसे विषय शामिल होंगे।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस डायलॉग के बाद भारत की रणनीतिक दिशा और स्पष्ट होगी — जो न केवल भारत के रक्षा तंत्र को मजबूत करेगी, बल्कि उसे एक प्रतिस्पर्धात्मक, आधुनिक और जवाबदेह वैश्विक शक्ति की भूमिका में और मजबूती से स्थापित करेगी।

चाणक्य डिफेंस डायलॉग 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का संबोधन — विशेषकर ऑपरेशन सिंदूर को लेकर — भारत के लिए एक आत्म-विश्वास और दृढ़ संकल्प का संदेश रहा। यह बयान इस बात का संकेत है कि भारत अपनी रक्षा, सुरक्षा और विदेश नीति में अस्थिरता या डर के बजाय, रणनीति, तैयारी और नैतिक समर्पण के साथ आगे बढ़ रहा है।

इस डायलॉग से यह उम्मीद की जा रही है कि भारत न केवल आधुनिक आतंकवाद, हाइब्रिड चुनौतियों और भू-राजनीतिक उतार-चढ़ावों से निपटने में सक्षम बनेगा, बल्कि वैश्विक रूप से शांति, स्थिरता और जवाबदेही के साथ अपनी भूमिका को और मजबूती से निभाएगा।

जैन संतों की शिक्षाएं आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शकःयोगी आदित्यनाथ

0

पार्श्वनाथ जैन मंदिर गाजियाबाद में मुख्समंत्री योगी आदित्यनाथ


गाजियाबाद। पार्श्वनाथ जैन मंदिर परिसर सोमवार को उस समय भक्तिमय और उत्साहपूर्ण वातावरण से गूंज उठा, जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ “जीत” कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त, स्वागत नारों और जैन समुदाय के गरिमामय आयोजन के बीच मुख्यमंत्री योगी का आगमन पूरे क्षेत्र के लिए आकर्षण का केंद्र रहा। कार्यक्रम में प्रदेश के मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों और बड़ी संख्या में जैन समाज के लोगों ने भाग लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ

सुबह लगभग 11 बजे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पार्श्वनाथ जैन मंदिर पहुंचे, जहां जैन मुनियों ने उन्हें शाल ओढ़ाकर और मंगल सूत्र प्रदान कर विशेष स्वागत किया। मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी सजावट, फूलों की बंदनवार और पवित्र प्रतीकों से सजाया गया था। “जीत” कार्यक्रम की शुरुआत नमस्कार महामंत्र और शांतिपाठ के साथ हुई, जिसमें सभी उपस्थितजनों ने सामूहिक रूप से सहभागिता की। इसके बाद जैन धर्माचार्यों ने कार्यक्रम की महत्ता और जैन दर्शन में ‘जीत’ यानी आत्मविजय की अवधारणा को विस्तृत रूप से समझाया।

मुख्यमंत्री योगी ने अपने संबोधन में जैन समुदाय द्वारा समाज के नैतिक उत्थान, अहिंसा, सत्य और संयम की परंपरा को विशेष रूप से सराहा। उन्होंने कहा कि जैन संतों की शिक्षाएं आज के समय में मानवता के लिए मार्गदर्शक हैं। योगी ने कहा कि “जैन समाज ने हमेशा राष्ट्र निर्माण, व्यापारिक ईमानदारी, शिक्षा और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आत्मविजय का मार्ग ही समाज को सही दिशा देता है, और यही संदेश ‘जीत’ कार्यक्रम पूरे देश को देता है।”

उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार सबके लिए समान अवसर के सिद्धांत पर काम कर रही है। “हमारा संकल्प है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था, विकास और अवसंरचना के क्षेत्र में ऐतिहासिक परिवर्तन लाया जाए। जिस प्रकार जैन समाज शुचिता और अनुशासन का पालन करता है, वही भावना यदि समाज के हर वर्ग में आए तो देश को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता,” मुख्यमंत्री ने कहा।

मुख्यमंत्री योगी ने पार्श्वनाथ भगवान की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन धर्म की अहिंसा और करुणा की शक्ति मानवता को जोड़ने का कार्य करती है। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन में ‘जीत’ का अर्थ बाहरी प्रतिस्पर्धा से प्राप्त विजय नहीं बल्कि अपने अंदर के लोभ, मोह, क्रोध और अहंकार पर विजय पाना है। मुख्यमंत्री ने युवा पीढ़ी से आह्वान किया कि वे इस आध्यात्मिक संदेश को अपने जीवन में अपनाएं और समाज को सकारात्मक दिशा देने में योगदान दें।

उन्होंने जैन संतों से आशीर्वाद लेते हुए कहा कि सरकार धार्मिक स्थलों के संरक्षण और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार कई धार्मिक केंद्रों को विकसित कर रही है ताकि भारत की संस्कृति और अध्यात्मिक धरोहर को विश्व स्तर पर पहचान मिले।

कार्यक्रम के दौरान जैन समाज ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को समाज के विभिन्न संगठनों की ओर से अभिनंदन पत्र और स्मृति चिह्न प्रदान किया। जैन समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि मुख्यमंत्री योगी के कार्यकाल में प्रदेश में धार्मिक सौहार्द और विकास की गति मजबूत हुई है। कई वक्ताओं ने जैन समुदाय के हित में लिए गए निर्णयों के लिए मुख्यमंत्री का धन्यवाद किया।

कार्यक्रम में जैन समाज के युवा और महिला मंचों ने भी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं, जिनमें जैन धर्म की शिक्षाओं और भगवान पार्श्वनाथ के जीवन पर आधारित लघु प्रस्तुतियां शामिल थीं। मंदिर परिसर में लगाए गए प्रदर्शनी स्टॉल में जैन इतिहास, जैन साहित्य और पर्यावरण संरक्षण पर आधारित सामग्री को लोगों ने विशेष रुचि से देखा।

मुख्यमंत्री योगी ने इस अवसर पर गाजियाबाद को लेकर कई विकास योजनाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, जल प्रबंधन और यातायात सुधार को लेकर बड़े स्तर पर कार्य चल रहे हैं। उन्होंने बताया कि सरकार का लक्ष्य है कि गाजियाबाद को NCR का एक मॉडल जिला बनाया जाए जहां नागरिक सुविधाएं और सुरक्षा दोनों उच्च स्तर पर हों।

मुख्यमंत्री ने कहा कि “हमारी सरकार का फोकस बिना भेदभाव के विकास पर है। प्रदेश की प्रगति ही राष्ट्र की प्रगति है। जैन समाज जैसे अनुशासित और शांतिप्रिय समाज की भागीदारी से प्रदेश में सकारात्मक परिवर्तन निश्चित रूप से और भी तेजी से होगा।”

कार्यक्रम के अंत में जैन धर्माचार्यों ने मुख्यमंत्री योगी को शुभाशीर्वाद दिया और समाज के कल्याण के लिए प्रार्थना की। मुख्यमंत्री ने मंदिर में दर्शन कर प्रदेश की शांति, समृद्धि और सौहार्द की कामना की। “जीत” कार्यक्रम आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत सफल रहा और जैन समाज तथा स्थानीय नागरिकों के लिए यह दिन लंबे समय तक स्मरणीय रहेगा।

मधुशाला लिखकर अमर हो गए हरिवंश राय बच्चन

0


हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य के उन अमर कवियों में गिने जाते हैं जिन्होंने कविता की संवेदनशीलता, सौंदर्य और जीवन-दर्शन को एक नई ऊँचाई दी। उनकी कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि हृदय की अनुभूति, जीवन का संगीत और आत्मा का उभार है। वे हिंदी की प्रगतिशील और प्रयोगवादी काव्यधारा के अग्रणी स्तंभों में रहे। बच्चन की कृतियों में जहां एक ओर व्यक्तिगत पीड़ा और भावनाओं का गहन चित्रण मिलता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक चेतना, जीवन की सच्चाइयाँ और मानव-मन की जद्दोजहद भी परिलक्षित होती है। उनकी साहित्यिक यात्रा एक ऐसे कवि की गाथा है जिसने हिंदी कविता को आम जन तक पहुँचाने के लिए सरल, मधुर और गीतात्मक भाषा का अनोखा प्रयोग किया।

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवंबर 1907 को उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ। उनका परिवार साधारण अवश्य था, लेकिन सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न था। उनके पिता प्रताप नारायण श्रीवास्तव एक जागरूक और संवेदनशील व्यक्ति थे, जिनके संस्कारों ने बच्चन के व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की। बच्चन ने प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालयों से प्राप्त की और आगे चलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। बचपन से ही वे साहित्य और कला के प्रति विशेष आकर्षित थे। वे अक्सर कविताएँ लिखते और मुशायरों तथा कवि-सम्मेलनों में भाग लेते थे।

हरिवंश राय बच्चन की प्रारंभिक कविताओं में व्यक्तिगत अनुभवों और प्रेम वेदना का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। प्रथम पत्नी श्यामा के असामयिक निधन ने उनके हृदय को गहराई से तोड़ा, जिसका असर उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही वजह है कि उनकी सुप्रसिद्ध रचना मधुशाला जन्म ले सकी। 1935 में प्रकाशित मधुशाला हिंदी साहित्य के इतिहास में एक क्रांतिकारी कृति साबित हुई। इसकी लोकप्रियता का आलम यह था कि लोगों ने इसे केवल कविता के रूप में नहीं बल्कि जीवन-दर्शन के रूप में अपनाया। रचना में प्रयुक्त प्रतीकों—हाला, प्याला, साकी—के माध्यम से उन्होंने जीवन के आनंद, संघर्ष, मोह, त्याग और मृत्यु की गहरी व्याख्या की। यह रचना आज भी युगों-युगों तक जीवित है और हर पीढ़ी को नई व्याख्याएँ देती है।

बच्चन की प्रमुख कृतियों में मधुकलश, मधुबाला, खादी के फूल, निशा निमंत्रण, सतरंगिनी, प्रणय-पंचमी, आरती और अंगारे प्रमुख हैं। उनकी कविताओं में दर्शन, अनुभूति और भावनाओं का ऐसा सामंजस्य मिलता है जो पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करता है। वे छायावाद से प्रभावित अवश्य थे, लेकिन उन्होंने अपनी कविता को छायावाद की कल्पनाशीलता से आगे बढ़ाकर यथार्थ और आधुनिकता की राह पर डाला। यही कारण है कि उन्हें हिंदी कविता में “नवगीत” आंदोलन का अग्रदूत भी माना जाता है।

उनकी भाषा सरल, लयात्मक और प्रवाहमयी होती थी। बच्चन ने कविता को जटिल बनाने के बजाय सरल और गेय बनाया ताकि सामान्य व्यक्ति भी उसे समझ सके और आत्मसात कर सके। यही गुण उनकी लोकप्रियता का मुख्य आधार बने। उनकी कविता में संगीतात्मकता इतनी सहज है कि कई रचनाएँ स्वयं ही गीत का रूप ले लेती हैं। बच्चन स्वयं भी एक उत्कृष्ट पाठक थे; उनके कविता-पाठ कार्यक्रमों का आकर्षण पूरे देश में था।

साहित्यिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के साथ-साथ हरिवंश राय बच्चन शिक्षक और अनुवादक के रूप में भी अत्यंत सफल रहे। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी साहित्य के लेक्चरर के रूप में वर्षों तक कार्य किया। साहित्य के छात्र उन्हें अत्यंत सम्मान और प्रेम से देखते थे। बाद में वे भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में राजनयिक पद पर भी कार्यरत रहे। इसके अलावा उन्होंने शेक्सपीयर की कई कृतियों का हिंदी अनुवाद किया, जिनमें हैमलेट, मैकबेथ और ओथेलो प्रमुख हैं। उनके अनुवाद न केवल साहित्यिक दृष्टि से श्रेष्ठ हैं, बल्कि मूल कृति की आत्मा को जीवंत रखते हुए हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का एक सफल प्रयास भी हैं।

हरिवंश राय बच्चन की निजी जिंदगी भी संघर्षों और अनुभवों से भरी रही। प्रथम पत्नी श्यामा के निधन के बाद 1941 में उन्होंने तेजस्विनी बच्चन से विवाह किया, जो अपने आप में एक शिक्षित, मजबूत और प्रेरणादायक व्यक्तित्व थीं। उनके दो पुत्र—अमिताभ बच्चन और अजिताभ बच्चन—भारत के जाने-माने व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं। प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन हरिवंश राय बच्चन को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानते थे और अक्सर कहते थे कि उनके पिता ने उन्हें जीवन से प्रेम करना और संघर्ष से कभी न घबराना सिखाया।

बच्चन को उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले। उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। इसके अलावा साहित्य अकादमी पुरस्कार, Soviet Land Nehru Award और कई अन्य सम्मान उन्हें प्राप्त हुए। 1969 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा क्या भूलूँ क्या याद करूँ ने उन्हें नई पहचान दी। यह आत्मकथा श्रृंखला चार भागों में है, और हिंदी साहित्य की श्रेष्ठ आत्मकथाओं में गिनी जाती है। इसमें केवल उनके जीवन का वर्णन नहीं, बल्कि उस समय के साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक माहौल का रोचक और सजीव चित्रण भी मिलता है।

बच्चन का जीवन 18 जनवरी 2003 को समाप्त हुआ, लेकिन उनका साहित्य सदैव जीवित रहेगा। उनकी कविताएँ समय की धारा को पार करती हुई आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी उनके लिखे जाने के समय थीं। मधुशाला जैसी कृति अनंत काल तक हिंदी साहित्य के गौरव का प्रतीक बनी रहेगी। बच्चन ने साहित्य को आम जन के करीब लाया और कविता को जन-जन की भाषा बनाया। उनकी रचनाएँ हमें जीवन को समझने, महसूस करने और अपनाने की प्रेरणा देती हैं।

हरिवंश राय बच्चन वास्तव में उन महान कवियों में से हैं जिन्होंने हिंदी साहित्य को एक नई पहचान, नई दिशा और नया स्वरूप दिया। उनकी कविता केवल लिखी नहीं जाती, वह गाई जाती है, जी जाती है और महसूस की जाती है। यही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, और यही कारण है कि वे हिंदी साहित्य के ‘अमर गायक कवि’ कहे जाते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद में स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया

0

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हैदराबाद, तेलंगाना में स्काईरूट के इन्फिनिटी कैंपस का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि आज देश अंतरिक्ष क्षेत्र में एक अभूतपूर्व अवसर का साक्षी बन रहा है और इस बात पर प्रकाश डाला कि निजी क्षेत्र की बढ़ती लोकप्रियता के साथ भारत का अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र एक बड़ी छलांग लगा रहा है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि स्काईरूट का इन्फिनिटी कैंपस भारत की नई सोच, नवाचार और युवा शक्ति को दर्शाता है, और इस बात पर ज़ोर दिया कि देश के युवाओं का नवाचार, जोखिम उठाने की क्षमता और उद्यमशीलता नई ऊँचाइयों को छू रही है। श्री मोदी ने कहा कि आज का कार्यक्रम इस बात का प्रतिबिंब है कि आने वाले समय में भारत वैश्विक उपग्रह प्रक्षेपण पारिस्थितिकी तंत्र में कैसे एक अग्रणी के रूप में उभरेगा। उन्होंने श्री पवन कुमार चंदना और श्री नागा भरत डाका को अपनी शुभकामनाएँ दीं और कहा कि ये दोनों युवा उद्यमी देश भर के अनगिनत युवा अंतरिक्ष उद्यमियों के लिए प्रेरणा हैं। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि दोनों ने खुद पर भरोसा रखा, जोखिम लेने से पीछे नहीं हटे और परिणामस्वरूप आज पूरा देश उनकी सफलता का गवाह बन रहा है, और देश उन पर गर्व महसूस कर रहा है।

श्री मोदी ने इस बात का ज़िक्र किया कि भारत की अंतरिक्ष यात्रा सीमित संसाधनों के साथ शुरू हुई थी, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि देश की महत्वाकांक्षाएँ कभी सीमित नहीं रहीं। उन्होंने कहा कि साइकिल पर रॉकेट के पुर्जे ढोने से लेकर दुनिया के सबसे विश्वसनीय प्रक्षेपण यान विकसित करने तक, भारत ने साबित कर दिया है कि सपनों की ऊँचाई संसाधनों से नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प से तय होती है। प्रधानमंत्री ने कहा, “इसरो ने दशकों से भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नए पंख दिए हैं और इस बात पर ज़ोर दिया है कि विश्वसनीयता, क्षमता और मूल्य ने इस क्षेत्र में भारत की विशिष्ट पहचान स्थापित की है।”

प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत के पास अंतरिक्ष क्षेत्र में ऐसी क्षमताएँ हैं जो दुनिया के कुछ ही देशों के पास हैं। इसमें विशेषज्ञ इंजीनियरों की मौजूदगी, उच्च-गुणवत्ता वाला विनिर्माण तंत्र, विश्व-स्तरीय प्रक्षेपण स्थल और नवाचार को प्रोत्साहित करने वाली मानसिकता शामिल है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि भारत की अंतरिक्ष क्षमता लागत-प्रभावी और विश्वसनीय दोनों है, यही वजह है कि दुनिया को देश से बहुत उम्मीदें हैं। उन्होंने कहा कि वैश्विक कंपनियाँ भारत में उपग्रहों का निर्माण करना चाहती हैं, भारत से प्रक्षेपण सेवाएँ प्राप्त करना चाहती हैं और भारत के साथ तकनीकी साझेदारी करना चाहती हैं, इसलिए इस अवसर का भरपूर लाभ उठाने पर ज़ोर दिया।

प्रधानमंत्री ने हर युवा, हर स्टार्टअप, वैज्ञानिक, इंजीनियर और उद्यमी को भरोसा दिलाया कि सरकार हर कदम पर उनके साथ मजबूती से खड़ी है। उन्होंने एक बार फिर पूरी स्काईरूट टीम को बधाई दी और भारत की अंतरिक्ष यात्रा को नई गति देने वाले सभी लोगों को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने अंत में सभी से 21वीं सदी को भारत की सदी बनाने का आह्वान किया, चाहे वह धरती पर हो या अंतरिक्ष में।

इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री श्री जी किशन रेड्डी सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

पृष्ठभूमि

भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट का इन्फिनिटी कैम्पस एक अत्याधुनिक सुविधा है। इसमें लगभग 200,000 वर्ग फुट का कार्यक्षेत्र है, जिसमें बहु-प्रक्षेपण वाहनों के डिजाइन, विकास, एकीकरण और परीक्षण के लिए हर महीने एक कक्षीय रॉकेट बनाने की क्षमता है। 

स्काईरूट भारत की अग्रणी निजी अंतरिक्ष कंपनी है, जिसकी स्थापना पवन चंदना और भरत ढाका ने की है, जो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के पूर्व छात्र और इसरो के पूर्व वैज्ञानिक हैं और अब उद्यमी बन गए हैं। नवंबर 2022 में, स्काईरूट ने अपना सब-ऑर्बिटल रॉकेट, विक्रम-एस, लॉन्च किया, जिससे वह अंतरिक्ष में रॉकेट लॉन्च करने वाली पहली भारतीय निजी कंपनी बन गई।

निजी अंतरिक्ष उद्यमों का तेजी से उदय पिछले कुछ वर्षों में सरकार द्वारा किए गए परिवर्तनकारी सुधारों की सफलता का प्रमाण है, जिससे एक आत्मविश्वासी और सक्षम वैश्विक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में भारत का नेतृत्व मजबूत हुआ है।

पाकिस्तान दोहरा रहा है अपना खूनी इतिहास

0

बाल मुकुन्द ओझा

पाकिस्तान से आने वाली ख़बरों पर यकीन करें तो पाकिस्तान एक बार फिर अपने खूनी इतिहास को दोहराने जा रहा है। जियाउलहक ने 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टों को फांसी दे दी थी और अब इमरान खान की जेल में मौत की ख़बरों से पूरी दुनियां हतप्रभ है। इसी बीच अदियाला जेल प्रशासन ने इमरान खान को लेकर चल रही अफवाहों को खारिज कर दिया है। अधिकारियों ने बताया कि वह जेल में ही हैं, पूरी तरह स्वस्थ हैं और उन्हें सभी जरूरी मेडिकल सुविधाएं मिल रही हैं। पाकिस्तान में लोकतंत्र के छलावे से हर कोई परिचित है। यह भी सर्वविदित है इस देश में सैनिक हुकुमरानों की इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। यहाँ एक और सैनिक तानाशाह आसिम मुनीर ने इमरान खान को जेल में डाल रखा है और उनके जीवित रहने या नहीं रहने की ख़बरें मीडिया की सुर्खिया बनी हुई है। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को लेकर इस समय पाकिस्तान की सियासत गरमाई हुई है। इमरान खान 2023 से रावलपिंडी की अदियाला जेल में बंद हैं, लेकिन इस वक्त पाकिस्तान में उनकी हत्या की अफवाह तेजी से फैल गई है। पाकिस्तान की सेना और सरकार पर जेल में उन्हें टॉर्चर करने का आरोप है। जबकि उनसे किसी को मिलने नहीं दिया जा रहा, जिससे अफवाह को बल मिल रहा है। इमरान खान की बहनें नोरीन खान, अलीमा खान और उजमा खान को जेल के बाहर से घसीटकर भगा दिया गया। उनके साथ मारपीट भी की गई।

पाक के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान सेना की मदद से पाक पर काबिज हुए थे। जितने दिन उन्हें सेना की छत्रछाया मिली वे निर्बाध रूप से राज करते रहे फिर जैसे ही उन्होंने अपनी स्वतंत्र आवाज बुलंद करनी चाही तो उनसे जल्द ही शासन से बेदखल होना पड़ा। बेदखल होने के बाद इमरान पर कई मुक़दमे कायम किये गए और अन्तोगत्वा अपने पूर्ववर्ती शासकों की तरह जेल के सींकचों में बंद होना पड़ा। भारत से अलग होने  के बाद पाकिस्तान ने भी लोकतंत्र का रास्ता चुना था। मगर शीघ्र ही लोकतंत्र की यह नकाब उतर गई। पाक में लोकतंत्र के पीछे सेना खड़ी हो गई और देखते देखते पाक पर छद्म रूप से सेना काबिज हो गई। कहा जाता है पाक पर वही पार्टी शासन करेगी जिसे सेना का समर्थन मिलेगा। अन्यथा सैना खुद शासन की कमान सँभालते देर नहीं करेगी। यह कोई कल्पित कहानी नहीं है अपितु पाक की असलियत है। कहते है पाक के शासक का पद काँटों के ताज से कम नहीं है। उसे कब सत्ताच्युत होकर जेल जाना पड़ेगा यह किसी को मालूम नहीं है। इससे पहले सुहरावर्दी से लेकर इमरान तक 5 निर्वाचित नेता गिरफ्तार हो चुके हैं। एक को फांसी दी गई थी। पाकिस्तान अपने पूर्व शासकों को जेल भेजने के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान तोशखाना केस में दोषी करार दिए गए। उन्हें तीन साल की सजा हुई। हुसैन सुहरावर्दी, जुल्फिकार अली भुट्टो, बेनजीर,  परवेज मुशर्रफ ,नवाज शरीफ, शाहिद खाकान अब्बासी आदि की कहानी ज्यादा पुरानी नहीं है जिन्होंने पहले निर्बाध रूप से पाक पर शासन किया और फिर जेल जाना पड़ा। 1956 से 1957 तक पाकिस्तान के पांचवें प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी को 1962 में गिरफ्तार किया गया था, जब उन्होंने 1958 में जनरल अयूब खान के तख्तापलट का समर्थन करने से मना कर दिया था। हुसैन को 1962 में पाकिस्तान सुरक्षा अधिनियम 1952 के तहत जेल में डाल दिया गया। इसके साथ ही उन्हें पाकिस्तान में राजनीति में भाग लेने से भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इसी तरह जुल्फिकार अली भुट्टो ने 1971 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति के रूप में जनरल याह्या खान की जगह ली थी। उन्होंने 1973-1977 तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया था। उनके शासनकाल में पाकिस्तान ने भारत के साथ शिमला समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, उस समय इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं। लेकिन जुलाई 1977 में एक सैन्य तख्तापलट के माध्यम से जनरल जिया-उल-हक ने सत्ता हड़प ली। भुट्टो को एक राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी की हत्या की साजिश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। सितंबर 1977 में रिहा तो किया गया लेकिन फिर से गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में उन्हें अप्रैल 1979 में सेंट्रल जेल रावलपिंडी में फांसी दे दी गई। शाहिद खाकान अब्बासी, जिन्होंने 2017 से 2018 तक प्रधानमंत्री के रूप में नवाज शरीफ की जगह ली थी, उनको भी कथित भ्रष्टाचार के लिए जनवरी 2019 में 12-सदस्यीय राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) की टीम ने गिरफ्तार किया था। 2001 से 2007 तक पाक के प्रधानमंत्री परवेज मुशर्रफ को भी सत्ताच्युत कर देश से निर्वासित  गया था। पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ का संयुक्त अरब अमीरात में निधन हो गया। मुर्शरफ के खिलाफ पाकिस्तान में कई मुकदमें चल रहे थे और इसी वजह से वह दुबई में निर्वासन में जी रहे थे। इससे पहले पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ भी कुछ ऐसा ही हश्र हुआ था। अप्रैल 2018 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को आजीवन सार्वजनिक पद धारण करने से अयोग्य घोषित कर दिया था।

1988 और 1990 के बीच 2 बार और फिर 1993 से 1996 तक पीएम बनने से पहले जुल्फिकार अली भुट्टो की बेटी बेनजीर भुट्टो को कई गिरफ्तारियों और जेल में कई शर्तों का सामना भी करना पड़ा था। 2007 में एक आत्मघाती हमलावर ने बेनजीर की हत्या कर दी थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह हत्या पाकिस्तानी तालिबान और अलकायदा के इशारे पर की गई थी।

पाक अपना इतिहास दोहरा रहा है। असल में पाक में लोकतंत्र का दिखावा मात्र है वहां असली शासन की बागडोर सेना के हाथ में है। जो व्यक्ति सेना की हुक्म उदूली करेगा उसे सत्ता से हटना ही होगा।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

मार्शल आर्ट के महा नायक ब्रूस ली

0

ब्रूस ली आधुनिक युग के उन महान व्यक्तित्वों में से एक हैं, जिन्होंने केवल मार्शल आर्ट की दुनिया को ही नहीं बदला, बल्कि शारीरिक क्षमता, आत्मविश्वास, दर्शन और जीवन दृष्टि को भी नई दिशा दी। वे केवल एक अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक शिक्षक, दार्शनिक और नवप्रवर्तनकर्ता थे जिनकी सोच ने दुनिया भर के युवाओं को प्रेरित किया। आज भी ब्रूस ली को मार्शल आर्ट का प्रतीक, शक्ति का अवतार और दृढ़ संकल्प का प्रतीक माना जाता है। उनकी बनाई शैली “जीत कुन डो” ने मार्शल आर्ट की सीमाओं को तोड़ते हुए इसे एक वैज्ञानिक, व्यावहारिक और लचीली कला में बदल दिया।

ब्रूस ली का जन्म 27 नवंबर 1940 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण हांगकांग में हुआ। उनके पिता ली होई चुएन एक प्रसिद्ध चीनी थिएटर कलाकार थे, इसलिए बचपन से ही ब्रूस को अभिनय और प्रदर्शन की दुनिया से परिचय मिला। वे शुरू से ही फुर्तीले, जिज्ञासु और ऊर्जा से भरपूर थे। किशोरावस्था में वे सड़क झगड़ों और गैंग से जुड़े माहौल में रहते हुए भी खुद को बचाने और शारीरिक रूप से मजबूत बनने की चाह में मार्शल आर्ट की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने विंग-चुन शैली के महान गुरु इप मैन से प्रशिक्षण लिया, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

मार्शल आर्ट में गहराई से उतरते हुए ब्रूस ली ने महसूस किया कि पारंपरिक शैलियों में कई सीमाएं हैं। वे मानते थे कि लड़ाई की कला को व्यावहारिक, वैज्ञानिक और तेज बनाया जाना चाहिए। इस विचार के साथ उन्होंने विभिन्न मार्शल आर्ट शैलियों—कुंग फू, बॉक्सिंग, जूडो और फेंसिंग—के सिद्धांतों को मिलाकर एक नई शैली विकसित की, जिसे उन्होंने नाम दिया “जीत कुन डो”। यह शैली कठोर नियमों से मुक्त थी और परिस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता पर आधारित थी। ब्रूस ली का प्रसिद्ध सिद्धांत था—”जो उपयोगी है उसे अपनाओ, जो अनुपयोगी है उसे छोड़ दो।” यह सिद्धांत न केवल लड़ाई की कला पर बल्कि जीवन पर भी लागू होता है।

ब्रूस ली ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन फिल्मों के माध्यम से भी किया। उनकी शुरुआती फिल्में हांगकांग में रहीं, लेकिन उन्हें विश्व प्रसिद्धि 1970 के दशक में हॉलीवुड फिल्मों से मिली। द बिग बॉस, फिस्ट ऑफ फ्यूरी, वे ऑफ द ड्रैगन, एंटर द ड्रैगन जैसी फिल्मों ने ब्रूस ली को अंतरराष्ट्रीय सुपरस्टार बना दिया। इन फिल्मों में उनकी गति, ताकत और वास्तविक मार्शल आर्ट तकनीक ने दर्शकों को अभिभूत कर दिया। एंटर द ड्रैगन तो आज भी दुनिया की सर्वोत्तम मार्शल आर्ट फिल्मों में गिनी जाती है। ब्रूस ली की फिल्मों ने न केवल पूर्वी लड़ाई प्रणालियों को पश्चिमी देशों में लोकप्रिय बनाया, बल्कि एशियाई कलाकारों के लिए हॉलीवुड के दरवाजे भी खोले।

ब्रूस ली केवल एक योद्धा नहीं थे; वे गहरे दार्शनिक भी थे। वे मानते थे कि शरीर और मन का संतुलन मनुष्य को पूर्ण बनाता है। उन्होंने अपनी डायरी में कई विचार लिखे जो आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं—”Be water, my friend” जैसे वाक्य दुनिया की सबसे प्रभावशाली पंक्तियों में गिने जाते हैं। उनका मानना था कि जीवन को पानी की तरह सरल, लचीला और प्रवाहमयी होना चाहिए। वे फिटनेस में भी बहुत आगे थे और अपने समय के सबसे अधिक प्रशिक्षित एथलीटों में थे। उनकी तेज़ी, सहनशक्ति और गति आज भी वैज्ञानिक अध्ययन का विषय हैं।

ब्रूस ली का जीवन जितना उज्ज्वल था उतना ही छोटा भी। 20 जुलाई 1973 को महज 32 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु को लेकर कई अटकलें लगाई गईं, लेकिन आधिकारिक रूप से यह कहा गया कि दवा की प्रतिक्रिया से उनका मस्तिष्क सूज गया था। अचानक चले जाने के बावजूद ब्रूस ली की विरासत आज भी उतनी ही मजबूत है। उनका नाम ताकत, समर्पण और आत्म-विकास का पर्याय बना हुआ है। दुनिया भर में लाखों मार्शल आर्ट स्कूलों में उनके सिद्धांत पढ़ाए जाते हैं और अनगिनत लोग उनके प्रेरणादायक विचारों का अनुसरण करते हैं।

ब्रूस ली ने साबित किया कि मनुष्य की असली शक्ति उसके भीतर होती है। यदि लक्ष्य स्पष्ट हो, संकल्प मजबूत हो और अभ्यास निरंतर हो, तो कोई भी सीमा मार्ग में बाधा नहीं बन सकती। उनका जीवन दिखाता है कि महानता केवल प्रतिभा से नहीं, बल्कि निरंतर मेहनत, आत्मविश्वास और नवीनता की सोच से प्राप्त होती है। वे सदैव याद किए जाएंगे—एक महान मार्शल आर्टिस्ट के रूप में, एक अद्भुत अभिनेता के रूप में, और एक ऐसे इंसान के रूप में जिसने दुनिया को सिखाया कि अपने भीतर की ऊर्जा को कैसे पहचानकर जीवन को असाधारण बनाया जा सकता है।

भारतीय संगीत में डिस्को शैली को स्थापित करने गायक − संगीतकार बप्पी लहरी

0


भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में बप्पी लहरी का नाम एक विशिष्ट पहचान रखता है। अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड में जिस तरह का संगीत लोकप्रिय हुआ, उसमें बप्पी लहरी ने एक नई दिशा और नई ऊर्जा का संचार किया। वे न सिर्फ एक संगीतकार थे, बल्कि एक गायक, नवप्रवर्तनकर्ता और लाखों युवाओं के फैशन आइकॉन भी थे। भारतीय संगीत में डिस्को शैली को स्थापित करने का श्रेय बड़ी हद तक बप्पी लहरी को दिया जाता है, जिन्होंने फिल्म संगीत को अंतरराष्ट्रीय पॉप और इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों से जोड़ा। अपने चकाचौंध भरे अंदाज़ और अनोखे संगीत प्रयोगों के कारण वे “डिस्को किंग” के नाम से पूरे देश में प्रसिद्ध हुए।

बप्पी लहरी का जन्म 27 नवंबर 1952 को कोलकाता के एक संगीत-समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम आलोकेश लाहिड़ी था। उनके माता-पिता अपरेश लाहिड़ी और बंसरी लाहिड़ी स्वयं प्रतिष्ठित शास्त्रीय संगीतकार तथा गायिका थे। इस सांगीतिक वातावरण ने बप्पी को बचपन से ही संगीत की ओर प्रेरित किया। तीन वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तबला बजाना और छह वर्ष की उम्र में पहला संगीत कार्यक्रम किया। किशोरावस्था तक वे वाद्ययंत्रों, ताल और सुर में पूरी तरह पारंगत हो चुके थे। किशोर कुमार के साथ उनका पारिवारिक संबंध भी उनके शुरुआती संगीत मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

संगीतकार के रूप में बप्पी लहरी का बॉलीवुड में पदार्पण 1973 की फिल्म नन्हा शीकारी से हुआ, लेकिन उन्हें व्यापक पहचान 1975 की फिल्म ज़ख्मी से मिलने लगी, जिसके गीतों ने उनकी प्रतिभा को सबके सामने ला दिया। 1980 का दशक उनके करियर का स्वर्णिम काल रहा। इस दौर में उन्होंने एक के बाद एक ऐसी फिल्में दीं जिनके गीतों ने भारतीय संगीत संस्कृति को पूरी तरह बदल दिया। वार्डन, डिस्को डांसर, डांस डांस, कसम पैदा करने वाले की, नमक हलाल, शराबी, हिम्मतवाला, सहस और तोहफा जैसी बड़ी फिल्मों में उनका संगीत सुपरहिट हुआ। हर गाने में उन्होंने आधुनिक बीट, सिंथेसाइज़र, इलेक्ट्रॉनिक संगीत और भारतीय सुरों का अनूठा मेल तैयार किया।

फिल्म डिस्को डांसर ने तो मानो संगीत के इतिहास में क्रांति ला दी। मिथुन चक्रवर्ती पर फिल्माए गए उनके गीत—आई एम ए डिस्को डांसर, जिमी जिमी जिमी आजा—दुनिया के विभिन्न देशों में लोकप्रिय हुए। यह उन दिनों की बात है जब भारतीय गीतों का वैश्विक प्रसार इतना आसान नहीं था, लेकिन बप्पी लहरी के संगीत ने सीमाएँ तोड़ दीं। रूस, चीन और मध्य-एशियाई देशों तक उनकी धुनों ने भारतीय फिल्मों की पहुंच बढ़ाई। उनकी इसी वैश्विक लोकप्रियता के कारण वे भारत में वेस्टर्न पॉप और नृत्य संगीत के लगभग पर्याय बन गए।

गायक के रूप में भी बप्पी लहरी बेहद सफल रहे। उनकी आवाज़ में एक अनूठी मिठास और आधुनिकता थी, जो युवा दर्शकों को जल्दी आकर्षित करती थी। कोई यहां नाचे नाचे, बंबई से आया मेरा दोस्त, यार बिना चेन कहां रे, ऊ लाला ऊ लाला, आज रपट जाएं, तम्मा तम्मा लोगे और दे दे प्यार दे जैसे गीत आज भी पार्टी और नृत्य का माहौल बना देते हैं। उनका अंदाज़, उनकी आवाज़ और उनकी मस्ती ने उन्हें गायकों की भीड़ में अलग खड़ा किया।

बप्पी लहरी की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में प्रयोगों को हमेशा अपनाया। उस समय जब अधिकतर संगीतकार पारंपरिक वाद्ययंत्रों और रागों पर निर्भर थे, बप्पी दा इलेक्ट्रॉनिक गिटार, सिंथेसाइज़र, ड्रम मशीन और विदेशी ताल-ध्वनियों का उपयोग कर रहे थे। यही नवाचार आगे चलकर बॉलीवुड के संगीत का मुख्य स्वरूप बन गया। उनकी वजह से ही अस्सी और नब्बे के दशक में बॉलीवुड का संगीत युवा पीढ़ी को पश्चिमी पॉप संगीत की ओर आकर्षित किए बिना उसके स्वाद को भारतीय शैली में परिवर्तित कर बताया गया।

उनके व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनका फैशन था। बप्पी लहरी और सोने की चेनें एक-दूसरे के पर्याय बन गए थे। उनके कई लेयर्ड गोल्ड चेन, गोल्ड ब्रेसलेट्स, चश्मे और चमकदार कपड़े उनकी पहचान का हिस्सा बन गए थे। वे कहते थे कि सोना उनके लिए शुभ है और उनकी ऊर्जा बढ़ाता है। भले ही कुछ लोग इसे दिखावा समझते थे, लेकिन उनकी यह शैली उन्हें पॉप कल्चर का हिस्सा बना चुकी थी।

नब्बे के दशक और उसके बाद भी बप्पी दा का योगदान जारी रहा। बदलते संगीत दौर में भी उन्होंने अपनी धुनों और स्टाइल को आधुनिक रूप में प्रस्तुत किया। 2000 के दशक में जब रिमिक्स और रीक्रिएटेड सॉन्ग्स की लहर चली, तब उनके कई गीतों के नए संस्करण सुपरहिट हुए। उन्होंने खुद भी फिल्मों और एल्बमों के लिए नए गाने बनाए। फिल्म डर्टी पिक्चर का उनका गीत ऊ लाला ऊ लाला उन की वापसी का शानदार उदाहरण बना। 2014 में उन्होंने हॉलीवुड फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के लिए भी अपनी आवाज़ दी।

बप्पी लहरी को उनके संगीत योगदान के लिए कई सम्मान मिले। फिल्मफेयर पुरस्कार, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार, दादा साहेब फाल्के अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार सहित अनेक मंचों पर उन्हें सम्मानित किया गया। वे लंबे समय तक इंडियन परफॉर्मिंग राइट्स सोसाइटी (IPRS) और अन्य संगीत अधिकार संस्थाओं से जुड़े रहे, जहाँ उन्होंने कलाकारों के अधिकारों की मजबूती के लिए आवाज उठाई।

18 फरवरी 2022 को बप्पी लहरी का निधन मुंबई में हुआ। उनकी उम्र 69 वर्ष थी। उनके अचानक चले जाने से भारतीय संगीत जगत में गहरा शोक फैल गया। करोड़ों प्रशंसकों ने उन्हें सोशल मीडिया पर याद किया, और उनके गीत कई दिनों तक ट्रेंड में बने रहे। उनकी अतुलनीय ऊर्जा, प्रयोगशीलता और संगीत प्रेम हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेंगे।

बप्पी लहरी केवल एक संगीतकार नहीं थे, वे एक सांस्कृतिक धरोहर थे। उन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में वह परिवर्तन लाया जिसने न सिर्फ बॉलीवुड को नया रूप दिया, बल्कि दुनियाभर के दर्शकों को भारतीय गीतों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी जब कोई युवा “डिस्को” शब्द सुनता है, तो सबसे पहले बप्पी दा की ही याद आती है। उनकी संगीत यात्रा और योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए भारतीय पॉप और फिल्म संगीत का आदर्श उदाहरण है।

बप्पी दा ने हिन्दी, बांग्ला और दक्षिण भारतीय भाषाओं में 5000 से ज्यादा गाने कंपोज किए. यह भी अपने आप में एक उपलब्धि है. इसके साथ ही उन्होंने कई सिंगिग रिएलिटी शोज में बतौर जज अपनी भूमिका निभाई. राजनीति में भी बप्पी दा ने कदम रखा. 2014 में वह भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन सक्रिय राजनीति नहीं की.

एक अवॉर्ड शो के दौरान बप्पी लाहिरी और राजकुमार की अचानक मुलाकात हो गई। राजकुमार ने बप्पी दा के गहनों को देखकर तारीफ की और कहा कि एक से बढ़कर एक जेवर पहने हो। पहले तो सब हंसी-खुशी थी, लेकिन फिर राजकुमार ने मजाक में तंज कसते हुए कहा, ‘बस अब तो एक मंगलसूत्र की कमी रह गई है।’ ये बात बप्पी लाहिरी को बुरी तरह चुभ गई और उन्हें बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।

 अमीर अलीः सात सौ  हत्याएं करने वाला ठग

0

क्या कोई  ठग अपने ठगी के लगभग बीस साल के समय में 700 हत्याएं कर सकता है। इस पर यकीन नही होता किंतु यह सत्य है। 700 हत्याएं करने वाला ठग अमीर अली  जेल में ठांठ से रहता है।  उसे इन हत्याओं पर कोई अफसोस  नही।

अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

फिलिप मिडोज टेलर की पुस्तक एक ठग की दास्तान का हिंदी में अनुवाद राज नारायण  पांडेय ने किया है। 700 से अधिक हत्याएँ करके अपराध के महासिन्धु में डूबा हुआ अमीर अली जेल में सामान्य बन्दियों से पृथक बड़े ठाट-बाट से रहता था। वह साफ कपड़े पहनता, अपनी दाढ़ी सँवारता और पाँचों वक्त की नमाज अदा करता था। उसकी दैनिक क्रियाएँ नियमपूर्वक चलती । अपराधबोध अथवा पश्चात्ताप का कोई चिह्न उसके मुख पर कभी नहीं देखा गया। उसे भवानी की अनुकम्पा और शकुनों पर अटूट विश्वास था। एक प्रश्न के उत्तर में उसने कहा था कि भवानी स्वयं उसका शिकार उसके हाथों में दे देती है, इसमें उसका क्या कसूर? और अल्लाह की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। उसका यह भी कहना था कि यदि वह जेल में न होता तो उसके द्वारा शिकार हुए यात्रियों की संख्या हजार से अधिक हो सकती थी।

पुस्तक ‘एक ठग की दास्तान’ 19वीं शताब्दी के आरम्भकाल में मध्य भारत, महाराष्ट्र तथा निजाम के समस्त इलाकों में सड़क मार्ग से यात्रा करनेवाले यात्रियों के लिए आतंक का पर्याय बने ठगों में सर्वाधिक प्रसिद्ध अमीर अली के विभिन्न रोमांचकारी अभियानों की तथ्यपरक आत्मकथा है। इसे लेखक ने स्वयं जेल में अमीर अली के मुख से सुनकर लिपिबद्ध किया है। “एक ठग की आत्मकथा” — एक अत्यंत चर्चित कृति है। यह उपन्यास 1839 में प्रकाशित हुआ था और इसे भारतीय समाज, अपराध, धार्मिक अंधविश्वास तथा ब्रिटिश औपनिवेशिक दृष्टिकोण को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है।टेलर स्वयं ब्रिटिश अधिकारी थे और उन्होंने लंबे समय तक भारत में कार्य किया। भारतीय संस्कृति, भाषा और समाज की गहरी समझ होने के कारण उन्होंने इस उपन्यास को न केवल अपराध की कथा के रूप में, बल्कि भारतीय जीवन के एक यथार्थ चित्र के रूप में प्रस्तुत किया। फिलिप मीडोज़ टेलर (1808–1876) ब्रिटिश अधिकारी, प्रशासक, और लेखक थे। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय भारत में बिताया, विशेषकर दक्षिण भारत के क्षेत्रों में। टेलर का झुकाव भारतीय जीवन, लोककथाओं और रहस्यमयी घटनाओं की ओर था। उन्होंने भारतीय समाज को केवल शासन की दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवता और संस्कृति की दृष्टि से भी गहराई से समझा।

 -“एक ठग की आत्मकथा” मूल रूप से एक अपराधी ठग, अमीर अली, की आत्मकथा है जिसे ब्रिटिश पुलिस पकड़ लेती है। कहानी का अधिकांश भाग अमीर अली के अपने अपराधी जीवन के वर्णन पर आधारित है, जिसे वह एक अंग्रेज अधिकारी को सुनाता है। अमीर अली मुस्लिम पृष्ठभूमि का व्यक्ति है, जो ठगों के एक संगठन से जुड़ जाता है। ये ठग धार्मिक और रहस्यमयी विश्वासों से प्रेरित होकर यात्रियों की हत्या करते थे और उनका धन लूट लेते थे। वे देवी काली की पूजा करते थे और मानते थे कि उनकी हत्या “धर्मिक बलिदान” का एक रूप है। अमीर अली अपने ठग जीवन के आरंभ, प्रशिक्षण, धार्मिक विश्वासों, यात्राओं, और अंततः गिरफ्तारी तक की कथा बड़े आत्मविश्वास और विस्तार से सुनाता है। कथा में भारत के विभिन्न भूभागों — मध्य भारत, बुंदेलखंड, मालवा, दक्क्षिण, आदि — के दृश्य आते हैं, जो 19वीं शताब्दी के भारत की सामाजिक और भौगोलिक झलक प्रस्तुत करते हैं।

अमीर अली का बाप भी ठग है। वह अपने बेटे काठगी की विधिवत ट्रेनिंग देता है। ये  ठग अपने शिकार की एक रूमाल से हत्या करते हैं। रूमाल के एक किनारे में एक सिक्का बंधा होता है। ये  अपने शिकार को बातों में लगाकर उसके गले में रूमाल डालकर उसे ऐंठ देते हैं।इससे शिकार का गला घुट जाता  है और कुछ ही पल में मौत हो जाती है।ये मरे शिकार का पेट फाड़कर उसे  जगह में दाब देतें हैं, जहां पता न लग सके।

पुस्तक के तीन पात्र हैं−1. अमीर अली – कहानी का नायक और कथावाचक। वह एक बुद्धिमान, साहसी, परंतु नैतिक दृष्टि से भ्रष्ट ठग है। उसके भीतर अपराध और आस्था का विचित्र मिश्रण है। 2.कैप्टन विलियम्स – ब्रिटिश अधिकारी जो अमीर अली से पूछताछ करता है और उसकी आत्मकथा को सुनता है। यह पात्र लेखक का प्रतिनिधि है । 3. ठगों का गिरोह – यह समूह संगठित अपराध का प्रतीक है, जो धार्मिक प्रतीकों और परंपराओं का सहारा लेकर हत्याओं को न्यायोचित ठहराता है।

 पुस्तक में लेखक टेलर ने दिखाया कि कैसे धर्म और अंधविश्वास को अपराध का औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। ठग देवी काली की सेवा के नाम पर यात्रियों की हत्या करते थे। कथा में विभिन्न भाषाएँ, रीति-रिवाज, परिधान, और लोकधारणाएँ शामिल हैं, जो भारत की बहुरंगी सामाजिक संरचना को दर्शाती हैं। अमीर अली का चरित्र गहराई से मनोवैज्ञानिक है। वह अपराधी है, परंतु पूरी तरह निर्दयी नहीं। वह अपने कर्मों को धार्मिक औचित्य से जोड़ता है, जिससे उसके भीतर द्वंद्व उत्पन्न होता है।

टेलर की भाषा सरल, प्रभावशाली और चित्रात्मक है। उन्होंने अंग्रेज़ी में लिखा, लेकिन भारतीय शब्दों — जैसे ठग, फकीर, देवी, नमाज़, काली — का प्रयोग प्रचुर मात्रा में किया, जिससे पाठक को भारतीय वातावरण का यथार्थ अनुभव होता है। संवाद-शैली ने उपन्यास को जीवंत बनाया है। अमीर अली के कथन आत्मस्वीकारोक्ति के रूप में हैं, जो उसे विश्वसनीय बनाते हैं।

“एक ठग की आत्मकथा अंग्रेजी साहित्य में पहला ऐसा उपन्यास था जिसने भारत के अपराध-जगत और औपनिवेशिक यथार्थ को इतने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया। यह उपन्यास थ्रिलर शैली का प्रारंभिक उदाहरण भी माना जाता है, क्योंकि इसमें रहस्य, हत्या और मनोवैज्ञानिक तनाव का उत्कृष्ट संयोजन है। साथ ही, इस उपन्यास ने पश्चिमी पाठकों के बीच भारत के रहस्यमयी और अंधविश्वासी रूप की एक स्थायी छवि बनाई, जो बाद में औपनिवेशिक साहित्य की विशेषता बन गई।

उपन्यास उस समय लिखा गया जब ब्रिटिश सरकार भारत में ठगों के उन्मूलन के अभियान में जुटी थी।वास्तव में, 1830 के दशक में कैप्टन विलियम स्लीमैन ने ठगों के गिरोहों के विरुद्ध बड़े पैमाने पर कार्रवाई की थी।टेलर ने इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आधार बनाकर अपने उपन्यास की रचना की। इस प्रकार यह रचना केवल साहित्यिक कल्पना नहीं, बल्कि एक सामाजिक-ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी है।

उपन्यास यह संदेश देता है कि जब अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता मानव बुद्धि पर हावी हो जाते हैं, तो अपराध को भी “धर्म का रूप मिल जाता है। अमीर अली जैसे पात्र यह दिखाते हैं कि नैतिकता केवल कानून से नहीं, बल्कि विवेक और सहानुभूति से आती है। यह रचना यह भी इंगित करती है कि समाज में शिक्षा और विवेक का प्रसार ही ऐसे अपराधों का अंत कर सकता है।

फिलिप मीडोज़ टेलर की “एक ठग की आत्मकथा” केवल अपराध की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय समाज के एक ऐसे अंधेरे पक्ष की गाथा है जहाँ धर्म, अंधविश्वास और लालच आपस में उलझे हैं। यह उपन्यास औपनिवेशिक युग के भारत को समझने का एक सशक्त माध्यम है।अमीर अली का चरित्र अपराधी होते हुए भी मानवीय जटिलताओं से भरा है, जो पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि अपराध केवल व्यक्ति का नहीं, समाज का भी दर्पण होता है ।

अशोक मधुप

( लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

फास्ट फूड का नकारात्मक प्रभाव!

0

पश्चिमी देशों की तरह हमारे मुल्क में भी जंक और फास्ट फूड का चलन तेजी से बढ़ रहा है। इसे हासिल करने में जितने लाभ और सुविधाएँ तलाश की जा रही हैं, उससे ज्यादा इसके नुकसान सामने आ रहे हैं। इंसान रोजाना जो कुछ खाता पीता है, उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। स्वस्थ रहने के लिए अच्छा पोषण और नियमित व्यायाम जरूरी है। इसके विपरीत फास्ट फूड और जंक फूड का ज्यादा सेवन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। खास ही नही, अब आम घरों में भी खाना बनाने का रिवाज कम होता जा रहा है। फास्ट फूड ऐसा भोजन है जो जल्दी तैयार हो जाता है और होटलों व रेस्टोरेंटों में कम समय में आसानी से सुलभ हो जाता है। मॉल, कंफेक्शनरी व किराना स्टोरों में मिलने वाले फास्ट फूड और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की बिक्री में दिन प्रतिदिन हो रही वृद्धि इस बात का प्रमाण है कि मौजूदा नस्ल की घरों में भोजन बनाने में दिलचस्पी नहीं है। हालाँकि घर पर तैयार भोजन की अपेक्षा इन खानों में पौष्टिकता कम होती है और ये महंगे भी होते हैं, फिर भी लोगों का रुझान इसी ओर बढ़ रहा है। युवा पीढ़ी तो फास्ट फूड की दीवानी है ही, बुजुर्गों व बच्चों में भी घर बैठे ऑनलाइन खाना मंगवाना आधुनिकता की शान और सामाजिक प्रगति की पहचान समझा जा रहा है। अधिकतर लोग फास्ट फूड के नुकसान और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले इसके नकारात्मक प्रभावों से अनजान हैं। दफ्तर से वापसी या देर से घर लौटने, थकान होने या खाना बनाने को मन नहीं करने का बहाना बनाकर फास्ट फूड मंगाने को आसान विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। जंक फूड का ज्यादा इस्तेमाल जहां स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, वहीं बीमारियों का सबब भी बन रहा है।
दरअसल, फास्ट फूड कम पोषक तत्व वाला वह भोजन है, जो जल्दी तैयार हो जाता है, जबकि जंक फूड खासतौर पर अत्यधिक प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ होते हैं। इनमें चीनी, वसा, सोडियम और कृत्रिम तत्व अधिक होते हैं। इस बिना पर हर जंक फूड फास्ट फूड हो सकता है, लेकिन हर फास्ट फूड जंक फूड नहीं होता। बर्गर जैसे फास्ट फूड की शुरुआत 18वीं शताब्दी में अमेरिका से हुई थी। आरंभ में लोग खराब स्वाद के कारण इसे पसंद नहीं करते थे, लेकिन समय बीतने के साथ लोगों का ध्यान बर्गर और इसके विभिन्न रूपों की ओर जाने लगा। आज दुनिया भर में मैक्डॉनल्ड्स, स्टारबक्स, मिक्स आइसक्रीम एंड टी, सबवे, केएफसी और डोमिनोज पिज्जा, बर्गर किंग, लकन कॉफी, पिज्जा हट, क्रिप्सी क्रीमे, जॉली बी और डंकिन डोनट्स डंकिन आदि ब्रांड के फास्ट फूड उपलब्ध हैं। फास्ट फूड में अमेरिका का वार्षिक राजस्व करीब 7,01,598 करोड़ रुपये, ब्रिटेन का 1,44,257 करोड़, फ्रांस का 1,78,888 करोड़, मेक्सिको का 1,76,647 करोड़, दक्षिण कोरिया का 1,10,373 करोड़, चीन का 1,47,440 करोड़ और इटली का 1,62,685 करोड़ रुपये है। स्वीडन, ऑस्ट्रिया, ग्रीस और नॉर्वे भी फास्ट फूड के बड़े बाजार हैं। भारत में यह कारोबार 7,14,584 करोड़ रुपये से अधिक का है। द लांसेट की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2006 में हमारे देश में ऐसे खाद्य पदार्थों की बिक्री 0.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर (80,66,17,35,000 रुपये) थी, जो 2019 में बढ़कर 38 बिलियन अमेरिकी डॉलर (34,05,71,77,00,000 रुपये) हो गई है। फास्ट फूड के सेवन से पुरुषों और महिलाओं में मोटापा दोगुना हो गया है। पुरुषों में मोटापे की दर जहां 12 से 23 प्रतिशत हो गई, वहीं महिलाओं में यह दर 15 से 24 प्रतिशत तक बढ़ गई। ऐसे खाद्य एवं पेय पदार्थों में विटामिन, खनिज और फाइबर जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है। फास्ट फूड को पुरुषों और महिलाओं में टाइप-2 डॉयबिटीज, रक्तचाप में वृद्धि, अवसाद, पाचन की खराबी, गुर्दों में तकलीफ, स्मृति हानि, हृदय रोग, यकृत की क्षति, कैंसर, चर्म रोग, प्रतिरोधक क्षमता में कमी और समय पूर्व मौत का कारण माना जा रहा है। वास्तविक पौष्टिकता से दूर इन खाद्य पदार्थों में चीनी, नमक, खराब तेल और बनावटी रंग आदि शामिल होते हैं। ऐसा करने से फास्ट फूड का स्वाद इतना बढ़ जाता है कि लोग इन्हें बार बार खाना पसंद करते हैं। हालांकि, ऐसा भोजन हमारी सेहत के लिए हानिकारक है, लेकिन बाजार में उपलब्ध बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राइज, चाउमीन, मोमोज, सैंडविच, फ्राइड चिकन, हॉट डॉग, टिकोज, स्प्रिंग रोल, डोनट, चिप्स, कुरकुरे, नूडल्स, नगेट्स, टॉफी, चॉकलेट, आइस्क्रीम, कुकीज, पेस्ट्रीज, नमकीन, स्नैक्स, पास्ता समोसा, कबाब, पकौड़ा, ढोकला, बड़ा पाव, मंचूरियन, मैगी, बिरयानी, नाचूस, मिठाई, कोल्डड्रिंक्स, ब्रेकफास्ट और खाद्य उत्पादों का सेवन पुरुषों और महिलाओं के साथ बच्चे भी कर रहे हैं। विशेषज्ञों ने पैकेटबंद फूड का सेवन कम करने के लिए सख्त कदम उठाने की आवश्यकता बताई है। हालांकि जंक फूड का कभी कभार सेवन नुकसान नहीं देता, लेकिन नियमित सेवन के कारण मोटापे और स्थाई बीमारियों से बचना मुश्किल है। सोडियम की उच्च मात्रा सिरदर्द और माइग्रेन का कारण बनती है। अधिक कार्बोहाइड्रेट से मुंहासे और चीनी से दांतों में कैविटीज बनती हैं। तले खाद्य पदार्थों से रक्त में कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ता है।
स्वस्थ आहार के तहत विटामिन, खनिज, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट के अलावा, फल, सब्जियाँ, साबुत अनाज, प्रोटीन और मेवे फायदेमंद हैं। टमाटर, आलू और ब्रोकली सहित विभिन्न प्रकार की लाल, हरी और पत्तेदार सब्जियाँ भी लाभदायक हैं। वसा रहित या एक प्रतिशत वसायुक्त दूध में कैल्शियम और अन्य पोषक तत्वों की मात्रा ज्यादा वसा वाले दूध से कम नहीं होती, इसलिए, बिना चिकनाई के दूध का उपयोग बेहतर है। प्रोटीन, खनिज, ओमेगा-3 और फैटी एसिड अधिक होने के कारण मछली को सप्ताह में लेना अच्छा है। पोषक तत्व प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होते हैं। चूंकि जंक और फास्ट फूड में प्राय आवश्यक पोषक तत्वों की कमी और कैलोरी अधिक होती हैं, इसलिए वजन और मोटापा बढ़ता है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा होती हैं। अतिरिक्त चीनी और ज्यादा कैलोरीज को नियंत्रित करने के लिए पेय पदार्थों के बजाय पानी पीना बेहतर है। पानी या बिना चीनी वाले पेय लेने से कैलोरीज काफी हद तक कम हो सकती है। स्वाद के लिए नींबू, तरबूज और मौसमी फलों का उपयोग बेहतर होता है। सेहतमंद आहार से ऊर्जा व पोषक तत्वों मिलते हैं, जो शारीरिक विकास में सहायक होने के अलावा हृदय रोग, मधुमेह और कैंसर जैसे रोगों के जोखिम को कम करने में सकारात्मक भूमिका निभाते हैं। इसलिए फास्ट फूड से परहेज सेहत के लिए अच्छा और दीर्घायु का आसान विकल्प है।

एमए कंवल जाफरी

नींद की कमी से जूझ रहा है युवा भारत

0

बाल मुकुन्द ओझा

नींद की कमी धीरे-धीरे एक साइलेंट हेल्थ क्राइसिस बन चुकी है। पहले नींद को आराम या आदत माना जाता था, लेकिन अब शोध यह दिखाते हैं कि कम नींद का सीधा असर दिमाग, दिल, इम्यून सिस्टम और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।  अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) ने इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य की उभरती हुई समस्या बताया है। उनकी रिपोर्ट के अनुसार लगभग हर तीन में से एक वयस्क रोजाना पर्याप्त नींद नहीं ले पा रहा। भारत में किए गए एक बड़े सर्वे में पाया गया कि युवा वर्ग में यह समस्या सबसे अधिक बढ़ी है, जहां रात देर तक फोन का इस्तेमाल, ओवरवर्क, तनाव और अनियमित दिनचर्या नींद का सबसे बड़ा दुश्मन बन चुके हैं। आजकल की खराब लाइफ स्टाइल, वर्क फ्रॉम होम, स्क्रीन से चिपटे रहने और काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों की दिनचर्या पूरी तरह बदल चुकी है। बदलते वर्किंग स्टाइल के कारण लोगों के पास पर्याप्त नींद लेने का समय भी नहीं बचता है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की रिसर्च बताती है कि जो लोग 5 घंटे से कम सोते हैं, उनमें हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा 30–40 फीसदी बढ़ जाता है। नींद की कमी शरीर में सूजन बढ़ा देती है, जिससे ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल गड़बड़ा सकते हैं। कई डॉक्टर बताते हैं कि नींद की कमी मोटापे को भी बढ़ाती है, क्योंकि देर से सोने पर भूख बढ़ाने वाला हार्मोन “घ्रेलिन” बढ़ जाता है और शरीर को गलती से कैलोरी की जरूरत महसूस होने लगती है। यही कारण है कि कम सोने वाले लोग रात में जंक फूड ज्यादा खाते हैं।

भारत में नींद की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। एक ऑनलाइन वैश्विक सर्वे की माने तो देश पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण स्वास्थ्य सम्बन्धी विकारों से जूझ रहा है। देश के लगभग 60 प्रतिशत लोग छह घंटे की नींद नहीं लेने के कारण विभिन्न बीमारियों की चपेट में आ रहे है। इनमें बड़ी संख्या में युवा भी शामिल है। सर्वे में भारत के 348 जिलों के 43 हज़ार लोगों को शामिल किया गया जिनमें 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं थी। नींद की कमी का सामना कर रहे लोगों में 72 प्रतिशत वाशरूम का बार बार उपयोग करने सहित ख़राब लाइफ स्टाइल, स्क्रीन देखने, शराब सेवन और रात्रि में देर तक काम करने आदि बड़े कारण बताये गए है। सर्वे में बताया गया है पर्याप्त नींद नहीं लेने के कारण आँखों और ह्रदय से जुडी बीमारियां आम बात है। डायबिटीज और मोटापा की चपेट में भी लोग आ रहे है। सड़क दुर्घटनाओं को भी नींद  का एक कारण बताया गया है। 

नींद का असर न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। जहाँ तक युवा भारत की बात है, आजकल युवाओं में तनाव की समस्या को लेकर देशवासी बेहद चिंतित है। तनाव की वजह से कम उम्र में ही युवा डिप्रेशन के शिकार होने लगे हैं। खासतौर से काम करने वाले युवा यानि को नौकरी कर रहे हैं उनके अंदर ठहराव, लगन और काम के लिए पैशन बहुत कम है। जरा-जरा सी बातों पर स्ट्रेस लेने लगते हैं। हाल की में हुई एक स्टडी में भी ऐसे ही आंकड़े सामने आए हैं। जिसमें 25 साल के युवा कर्मचारियों में से 90 प्रतिशत का मन और दिमाग बेचैन पाया गया है। जिसकी वजह से कई बार अपने आप को हानि पहुंचाने तक के ख्याल इनके मन में आने लगते हैं। तनाव और डिप्रेशन से बचना है तो सबसे पहले हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं। नींद की कमी के चलते कर्मचारियों की कार्य क्षमता भी प्रभावित हो रही है। रिसर्च से पता चला है कि नींद की कमी वाले कर्मचारी गलतियां करने की ज्यादा संभावना रखते हैं, उनकी एकाग्रता घट जाती है और उनकी समस्या सुलझाने की क्षमता भी कम हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से बचने के लिए अच्छी नींद लेना बहुत जरूरी है। रात में 6-8 घंटे की नींद से कई विकारों को दूर किया जा सकता है।

आज की भागदौड़ भरी लाइफ स्टाइल में काम का दबाव और समय का प्रबंधन हम पर इस कदर हावी हो चुके हैं कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ा रहा है। सोशल मीडिया के बारे में यह कहा जाता है विशेषज्ञों ने अच्छी नींद के लिए कैफीन का कम सेवन करने, सोने का निश्चित समय तय करने, सोने से पहले मोबाइल, लैपटॉप और टीवी जैसी स्क्रीन का इस्तेमाल न करने की सलाह दी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है एक्सपर्ट्स का कहना है कि अपनी दिनचर्या में  छोटे-छोटे बदलावों को अपनाकर लोग अपनी नींद की क्वालिटी सुधार सकते हैं और इससे उनकी तबीयत और उत्पादकता बेहतर हो सकती है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर