राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण हेतु पुरस्कार प्रदान किए

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में वर्ष 2025 के लिए राष्ट्रीय दिव्यांगजन सशक्तिकरण पुरस्कार प्रदान किए।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि दिव्यांगजन समानता के हकदार हैं। समाज और देश की विकास यात्रा में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करना सभी हितधारकों का कर्तव्य है, न कि कोई दान-पुण्य। दिव्यांगजनों की समान भागीदारी से ही किसी समाज को वास्तविक अर्थों में विकसित माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दिव्यांगजन दिवस -2025 का विषय, ‘सामाजिक प्रगति को आगे बढ़ाने के लिए दिव्यांगता-समावेशी समाजों को बढ़ावा’ भी इसी प्रगतिशील विचार पर आधारित है।

राष्ट्रपति को यह जानकर खुशी हुई कि हमारा देश कल्याणकारी मानसिकता से आगे बढ़ते हुए, दिव्यांगजनों के लिए अधिकार-आधारित, सम्मान-केंद्रित व्यवस्था अपना रहा है। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों का समावेश हमारी राष्ट्रीय विकास यात्रा का एक अभिन्न अंग है। 2015 से “दिव्यांगजन” शब्द के प्रयोग का निर्णय दिव्यांगजनों के प्रति विशेष सम्मान प्रदर्शित करने के लिए लिया गया था।

राष्ट्रपति ने कहा कि सरकार दिव्यांगजनों के समावेशन और सशक्तिकरण के लिए इको-सिस्‍टम को मजबूत कर रही है। उनके लिए सांकेतिक भाषा अनुसंधान एवं प्रशिक्षण, मानसिक स्वास्थ्य पुनर्वास और खेल प्रशिक्षण जैसे विभिन्न क्षेत्रों में कई राष्ट्रीय स्तर के संस्थान स्थापित किए गए हैं। लाखों दिव्यांगजनों को विशिष्ट विकलांगता पहचान पत्र जारी किए गए हैं, जिससे उन्हें विशेष सुविधाओं का लाभ मिल रहा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि दिव्यांगजनों के हितों के लिए सरकार के साथ-साथ समाज को भी जागरूक और सक्रिय रहना चाहिए। इससे सरकार के प्रगतिशील प्रयासों को बल मिलेगा। उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों की गरिमा, स्वावलंबन और आत्म-सम्मान सुनिश्चित करना सभी नागरिकों का दायित्व है। प्रत्येक नागरिक को सामाजिक और राष्ट्रीय प्रगति के अपने प्रयासों में दिव्यांगजनों को भागीदार बनाने का संकल्प लेना चाहिए।

संसद में केन्द्रीय संचार मंत्री का स्पष्ट संदेशः डिजिटल धोखाधड़ी से बचाने का माध्यम है संचार साथी

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केन्द्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज बुधवार को लोकसभा में चर्चा के दौरान संचार साथी ऐप की उपयोगिता, स्वैच्छिकता और नागरिक-सुरक्षा के महत्व पर विस्तार से जवाब दिया। सिंधिया ने स्पष्टता से कहा कि संचार साथी किसी भी प्रकार की snooping (निगरानी) का माध्यम नहीं है। यह निगरानी का नहीं, बल्कि नागरिक सशक्तिकरण का टूल है। बिना रजिस्ट्रेशन यह ऐप सक्रिय नहीं होता और हर नागरिक को इसका उपयोग न करने या कभी भी डिलीट करने का पूर्ण अधिकार है। विपक्ष द्वारा फैलाए जा रहे भ्रमों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि संचार साथी न केवल भारत की डिजिटल सुरक्षा का आधार है, बल्कि यह जनभागीदारी से संचालित एक ऐसा सुरक्षा प्लेटफ़ॉर्म है जो हर नागरिक को स्वयं अपनी मोबाइल पहचान सुरक्षित रखने का अधिकार देता है।

नागरिकों के सुझाव के अनुसार नियमों में बदलाव को तैयार हैं हमः सिंधिया

केन्द्रीय मंत्री ने संसद के पटल पर स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में अंतिम अधिकार नागरिक का है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनता के सुझावों और फीडबैक पर विभाग इसके नियमों में संशोधित करने के लिए तत्पर है क्योंकि इस पहल का लक्ष्य केवल भारत के प्रत्येक मोबाइल उपयोगकर्ता की सुरक्षा करना है। इसके लिए संचार साथी को जन-जन तक उपलब्ध किया जा रहा है और फीडबैक अनुसार ऐप और इसके नियमों में बदलाव किए जाने को विभाग तैयार है।

जनभागीदारी आधारित नागरिक-सुरक्षा का माध्यम से संचार साथी

सिंधिया ने बताया कि संचार साथी पोर्टल और ऐप को भारत सरकार ने तकनीक दी है, लेकिन इसकी सफलता का असली श्रेय जनता को है। उन्होंने कहा कि यह देश का पहला ऐसा मंच है जिसने नागरिकों को सीधे फर्जी मोबाइल कनेक्शन, चोरी हुए फोन, फ्रॉड आईएमईआई और साइबर धोखाधड़ी के विरुद्ध कार्रवाई में भागीदार बनाया है।उन्होंने सदन को बताया कि देशभर में संचार साथी पोर्टल को 20 करोड़ से अधिक विजिट्स मिले हैं। संचार साथी ऐप को 1.5 करोड़ से अधिक डाउनलोड किया गया है।

नागरिकों द्वारा की गई रिपोर्टिंग और जनभागीदारी से इस तकनीक ने अभूतपूर्व परिणाम दिए हैंः

– 1.50 करोड़ से अधिक फ्रॉड मोबाइल कनेक्शन जनता की रिपोर्टिंग के आधार पर डिस्कनेक्ट किए गए।

– 26 लाख चोरी/गुम मोबाइल फोन ट्रेस किए गए।

– 7 लाख से अधिक फोन नागरिकों को वापस लौटाए गए।

– 41 लाख मोबाइल कनेक्शन अतिरिक्त नागरिक-इनपुट के आधार पर बंद किए गए।

– 6 लाख से अधिक फ्रॉड-लिंक्ड IMEIs ब्लॉक कर दिए गए।

उन्होंने कहा यह प्लेटफ़ॉर्म जनता का है, जनता के लिए है और जनता की सुरक्षा का है। सरकार केवल तकनीक देती है, इसकी असली ताकत भारत के मोबाइल उपयोगकर्ता हैं।

संचार साथी: पूर्णतया स्वैच्छिक, पारदर्शी और उपभोक्ता-अधिकार आधारित

सिंधिया ने जोर देकर कहा कि संचार साथी ऐप स्वतः सक्रिय नहीं होता। ऐप तभी काम करता है जब तक यूजर स्वयं इसे खोलें, स्वैच्छिक रूप से रजिस्ट्रेशन करें और इसे उपयोग करना चाहें। उन्होंने कहा, “जैसे आपके फोन में सैकड़ों ऐप होते हैं, उसी प्रकार संचार साथी भी एक विकल्प है। नागरिक इसे उपयोग करना चाहें तो करें, न करना चाहें तो कभी भी अन-इंस्टॉल कर सकते हैं। लोकतंत्र में अंतिम अधिकार नागरिक का है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनता के सुझावों और फीडबैक पर विभाग इसके नियमों में संशोधित करने के लिए तत्पर है क्योंकि इस पहल का लक्ष्य केवल भारत के प्रत्येक मोबाइल उपयोगकर्ता की सुरक्षा करना है।

डिजिटल सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी, दुरुपयोग रोकना अनिवार्य

सिंधिया ने कहा कि भारत में एक बिलियन से अधिक मोबाइल उपभोक्ता हैं। जहाँ दूरसंचार सुविधाओं से देश जुड़ता है, वहीं कई तत्व इसका नकारात्मक उपयोग भी करते हैं फर्जी सिम, फर्जी आईएमईआई, धोखाधड़ी नेटवर्क, साइबर अपराध, चोरी हुए फोन का गैरकानूनी व्यापार बड़ी चुनौती हैं। सरकार का कर्तव्य है कि जनता को सुरक्षित रखे। संचार साथी इसी ज़िम्मेदारी की पूर्ति करता है। यह नागरिकों को फ्रॉड से बचाता है, चोरी हुए फोन खोजता है, और डिजिटल अपराध को रोकने का सशक्त माध्यम है।

बीजेपी ने दिल्ली नगर निगम (MCD) के 12 वार्ड में से सात जीते

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भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने आज दिल्ली नगर निगम (MCD) के 12 वार्ड में से सात जीते। आम आदमी पार्टी (AAP) ने तीन सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस और लेफ्ट पार्टी एक-एक सीट जीतने में कामयाब रहीं। जिन 12 वार्ड में 30 नवंबर को वोटिंग हुई थी, उनमें से नौ पहले BJP के पास थे और बाकी आम आदमी पार्टी (AAP) के पास। 2022 में 250 वार्ड के लिए हुए MCD चुनाव में 50.47 प्रतिशत के मुकाबले वोट प्रतिशत 38.51 प्रतिशत रहा। राज्य चुनाव आयोग ने एक बयान में कहा कि कंझावला, पीतमपुरा, भारत नगर, सिविल लाइंस, राउज एवेन्यू, द्वारका, नजफगढ़, गोल मार्केट, पुष्प विहार और मंडावली में दस काउंटिंग सेंटर बनाए गए थे।

JP ने 7 वार्डों में जीत हासिल की, जिनके नाम हैं — द्वारका B, विनोद नगर, अशोक विहार, ग्रेटर कैलाश, डिचाओं कलां, शालीमार बाग B और चांदनी चौक। हालांकि, भगवा पार्टी अपने संगम विहार A और नारायणा वार्ड हार गई – जो उसने 2022 के MCD चुनावों में जीते थे।

आम आदमी पार्टी ने तीन वार्ड जीते — नारायणा, मुंडका और दक्षिणपुरी। कांग्रेस ने संगम विहार A वार्ड जीता जबकि AIFB के मोहम्मद इमरान ने चांदनी महल वार्ड जीता।

दिल्ली नगर निगम (MCD) उपचुनाव के लिए 12 वार्डों में वोटों की गिनती सुबह 8 बजे शुरू हुई। इस उपचुनाव को सत्ताधारी BJP के साथ-साथ AAP और कांग्रेस के लिए एक अहम परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था। 26 महिलाओं समेत 51 उम्मीदवार मैदान में थे।

जिन वार्ड में उपचुनाव हुए उनमें ग्रेटर कैलाश, शालीमार बाग B, अशोक विहार, चांदनी चौक, चांदनी महल, डिचाओं कलां, नारायणा, संगम विहार A, दक्षिण पुरी, मुंडका, विनोद नगर और द्वारका B शामिल है।

2022 के दिल्ली नगर निगम चुनाव में, आम आदमी पार्टी (AAP) ने 42.05% वोटों के साथ 134 सीटें जीतीं। पार्टी को 30,84,957 वोट मिले। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 104 सीटें जीतीं, 39.09% वोट शेयर हासिल किया और राजधानी में कुल 28,67,472 वोट मिले।

काशी तमिल संगमम् 4.0 के दूसरे दिन हनुमान घाट पर प्रतिनिधिमंडल का पवित्र स्नान

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ को साकार करने की दिशा में आयोजित काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत आज का दिन आध्यात्मिकता, संस्कृति और शिक्षा—तीनों स्तरों पर अत्यंत सार्थक और प्रेरक रहा। तमिलनाडु से आए प्रतिनिधिमंडलों ने हनुमान घाट पर पवित्र स्नान कर भारत की प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति अपनी आस्था प्रकट की, वहीं संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नमो घाट स्थित “बाल मंडप” में आयोजित विशेष पाठशाला ने बच्चों को काशी और तमिलनाडु की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

आज प्रातः काशी तमिल संगमम् 4.0 के प्रतिभागियों ने हनुमान घाट पर विधिवत पवित्र स्नान किया। यह अनुष्ठान न केवल धर्म और परंपरा का अनुभव था, बल्कि तमिलनाडु और काशी के सदियों पुराने आध्यात्मिक संबंधों की पुनर्पुष्टि भी था। प्रतिभागियों ने गंगा की पावन धारा में स्नान कर भक्ति, साधना और संस्कृति की उस निरंतर धारा को आत्मसात किया, जिसने तमिल और काशी—दोनों को समान रूप से ऊर्जा प्रदान की है।

यह पवित्र स्नान भारतीय सभ्यता के उस मूल तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें विविधता के बीच एकता निहित है। प्रतिभागियों ने इसे एक ऐसे अनुभव के रूप में देखा, जिसने उन्हें न केवल काशी की आध्यात्मिक विरासत से जोड़ा, बल्कि संगमम् के मूल संदेश—एकत्व, सद्भाव और सांस्कृतिक आदान-प्रदान—को भी और गहराई से स्थापित किया।

काशी तमिल संगमम् 4.0 का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है—“बाल मंडप”। इसका उद्देश्य है बच्चों को काशी और तमिलनाडु की विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और कलात्मक परंपराओं से जोड़ना, ताकि वे भारत के सांस्कृतिक वैभव को बचपन से ही समझ सकें।


आज “बाल मंडप” में आयोजित विशेष पाठशाला में बच्चों ने सहभागिता आधारित गतिविधियों, कहानियों, संवाद और सांस्कृतिक प्रदर्शनियों के माध्यम से दोनों क्षेत्रों की विरासत के बारे में विस्तार से सीखा। इस अनूठी पहल ने बच्चों के मन में सांस्कृतिक विविधता, पारस्परिक सम्मान और साझा सीख की भावना को और मजबूत किया। कार्यक्रम में बच्चों ने न केवल तमिल और काशी की परंपराओं को जाना, बल्कि यह भी समझा कि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है।

बाल मंडप” का यह पाठ सत्र बच्चों को भविष्य में सांस्कृतिक दूत के रूप में विकसित करने की दिशा में एक सार्थक कदम माना जा रहा है। यह सीख, एकता और राष्ट्र निर्माण की भावना को नए युग की पीढ़ी में सुदृढ़ करता है।

हनुमान घाट पर स्नान से लेकर “बाल मंडप” की रचनात्मक पाठशाला तक—काशी तमिल संगमम् 4.0 का आज का आयोजन ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की भावना को जीवंत करता दिखाई दिया। यह कार्यक्रम काशी और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक एकता का सेतु बनकर उभर रहा है।

मौसम का गजब नज़ारा :ग्रीष्म ऋतु लंबी होती जा रही हैं और सर्दियां छोटी

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बाल मुकुन्द ओझा

देश में मौसम के अज़ब गजब नज़ारे देखने को मिल रहे है। दिसंबर का महीना शुरू हो गया है मगर ठण्ड और सर्दी ने अभी अपने पारम्परिक तेवर नहीं दिखाए है। मौसम विभाग के मुताबिक, अगले 10 दिन तक राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में शीतलहर का सिलसिला शुरू होगा, जिससे न्यूनतम तापमान में कमी आएगी सर्दी में इजाफा होगा। अब सुबह के वक्त कोहरा परेशान करेगा। उधर, दक्षिण भारत में समुद्री तूफान दित्वा के प्रभाव से तमिलनाडु में आफत की आंधी-बारिश होगी। इसका असर आंध्र प्रदेश, कर्नाटक में भी रहेगा। पूर्वोत्तर के राज्यों में भी बारिश को लेकर अलर्ट है। हालांकि दिन में धूप निकलने की वजह से ठंड का असर कम देखने को मिल रहा है। सर्दी का मौसम देश में आमतौर पर नवम्बर से लेकर जनवरी के अंत तक होता है। शीत ऋतु सभी ऋतुओं में सबसे ठंडी होती है। जनवरी के महीने में तो तापमान जमाव बिंदु के नीचे तक गिर जाता है। इस समय सर्दी अपनी चरम सीमा पर होती है। ठंडी से बचने के लिए लोग गर्म और ऊनी वस्त्र पहनते हैं व रात के रजाइयां व कम्बल ओढ़ते हैं। जलवायु परिवर्तन ने इस साल देशवासियों को चौंका दिया है। देश में मौसम के अज़ब गजब नज़ारे देखने को मिल रहे है। इस वर्ष मानसून में भारी बारिश के बाद यह अनुमान लगाया गया था कि लोगों को शीत लहर का सामना करना पड़ेगा  मौसम विभाग के अनुसार सर्दियों के मौसम के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। पूर्वानुमान के अनुसार, सर्दियों के मौसम में सामान्य तौर पर पांच से छह दिनों की तुलना में इस बार शीतलहर वाले दिन कम रहने की उम्मीद है। मौसम में इस परिवर्तन का संबंध कहीं न कहीं जलवायु परिवर्तन से भी लगाया जा रहा है। वैज्ञानिक मानते हैं कि मौसम में जैसी तब्दीली इस बार देखने को मिली है, ऐसा पूर्व में बहुत कम देखने को मिला है। लम्बे समय में मौसम में होने वाले परिवर्तन को जलवायु परिवर्तन कहते हैं। इस परिवर्तन के कारण मौसम में परिवर्तन आता है। जैसे अधिक गर्मी, ठण्ड, वर्षा या आवश्यकता से भी कम गर्मी, ठण्ड और वर्षा का होना। विशेषकर उत्तर भारत इस समय मौसम परिवर्तन की चपेट में है।भारत ऋतुओं का देश है। ऋतुओं के मामले में  हमारा देश बहुत समृद्ध और धनी है। दुनिया के कुछ हिस्सों में तो जहां हमेशा तापमान एक ही जैसा रहता है मौसम में कोई खास परिवर्तन नहीं होता । दुनिया के कई हिस्सों में सिर्फ सर्दी और नाम मात्र की गर्मी पड़ती है, तो कुछ को पूरे साल भर गर्मी में ही जलना पड़ता है । वहीं हम भारतवासियों को साल भर में कुल 6 ऋतुओं का आनंद मिलता है । भारत में छ: ऋतु बसंत ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, हेमंत ऋतु और शीत ऋतु हैं। भारत में शीत ऋतु बहुत अधिक ठंडी होती है। शीत ऋतु का समय नवम्बर मास से लेकर फरवरी मास तक होता है। भारत देश में नवम्बर में शुरू होने वाली ठंड दिसम्बर आते-आते भीषण ठंड में बदल जाती हैं। शीत ऋतु में दिन प्राय: छोटे और रातें लंबी होती हैं। सूर्य की गर्मी जो लोगों को ग्रीष्म ऋतु में अच्छी नहीं लगती वह गर्मी सभी लोगों को शीत ऋतु में अत्यंत प्रिय लगने लगती है। मगर इस बार जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप नवम्बर माह गर्म रहा और लोगों को ज्यादा सर्दी से छुटकारा मिला।

जलवायु विशेषज्ञों के अनुसार पिछली कुछ सदियों से हमारी जलवायु में धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है यानी, दुनिया के विभिन्न देशों में सैकड़ों सालों से जो औसत तापमान बना हुआ था, वह अब बदल रहा है। भारत भी इसी मौसम परिवर्तन का शिकार हुआ है। ग्रीष्म ऋतु लंबी होती जा रही हैं और सर्दियां छोटी। पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है। इसे ही हम जलवायु परिवर्तन कहते है। जलवायु परिवर्तन को सामान्य घटना के रूप में लेना कोई समझदारी नहीं है। जलवायु परिवर्तन वास्तव में पृथ्वी पर जलवायु की परिस्थितियों में बदलाव को कहा जाता है। भूमि, वातावरण, उसके ताप, जल प्रणाली के क्रियाकलापों में ऐसे परिवर्तन हों जो जलवायु के कारण मानव के जीवन, उसके रहन-सहन को प्रभावित करने लगें तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं। जलवायु परिवर्तन पिछले कुछ सालों से बहुत ही गंभीर समस्या के रूप में उत्पन्न होता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन के कई कारण होते हैं, जो बहुत से तरीकों से पृथ्वी में चल रहे जीवन को प्रभावित करते है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

दिल्ली में ‘भारत टैक्सी’ की पायलट प्रोजेक्ट सेवा शुरू

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राजधानी दिल्ली में मंगलवार से ‘भारत टैक्सी’ की पायलट प्रोजेक्ट सेवा शुरू कर दी गई है, जबकि गुजरात में ड्राइवरों के पंजीकरण का काम जारी है। इस सेवा में कार, ऑटो, बाइक शामिल हैं और अब तक इस एप पर 51 हजार से अधिक ड्राइवर पंजीकृत हो चुके हैं।

सहकारिता मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में ‘भारत टैक्सी’ की लांचिंग की जानकारी दी। कहा- इस एप का उद्देश्य देश के कैब व टैक्सी ड्राइवरों को निजी कंपनियों पर निर्भरता से मुक्त कराना है। साथ ही कमीशन पर भी रोक लगानी है। शाह ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि ‘भारत टैक्सी’ एप दिसंबर से ही पूरे देश में शुरू होने की उम्मीद है, जो सहकार टैक्सी कोआपरेटिव लिमिटेड की ओर से संचालित की जाएगी।

सरकार एक राइड-हेलिंग मोबिलिटी ऐप, भारत टैक्सी लॉन्च हुआ, जिसका मकसद कमर्शियल गाड़ी चलाने वालों को Uber, Ola और Rapido जैसे प्राइवेट प्लेटफॉर्म का विकल्प देना है। सहकारिता मंत्री अमित शाह ने मंगलवार, 2 दिसंबर को लोकसभा में एक लिखित जवाब में इस डेवलपमेंट की पुष्टि की, और बताया कि यह ऐप ड्राइवरों को प्राइवेट कंपनियों पर निर्भरता से मुक्त करने के लिए बनाया गया है। 

इस सर्विस को आठ बड़े कोऑपरेटिव ऑर्गनाइज़ेशन का सपोर्ट है और इसका मकसद भरोसेमंद ट्रांसपोर्टेशन ऑप्शन देकर ओला, उबर और रैपिडो जैसे पॉपुलर ऐप्स से मुकाबला करना है। इस पायलट फेज़ में, ‘भारत टैक्सी’ कई तरह की गाड़ियां देता है, जिसमें कार, ऑटो-रिक्शा और बाइक शामिल हैं। अब तक, 51,000 से ज़्यादा ड्राइवरों ने ऐप इस्तेमाल करने के लिए साइन अप किया है। इस ऐप को सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड मैनेज करता है, जो एक रजिस्टर्ड कोऑपरेटिव सोसाइटी है। इसने 6 जून, 2025 को अपनी यात्रा शुरू की, और इसका फोकस सभी के लिए ट्रांसपोर्टेशन को और आसान बनाना है। सहकार टैक्सी कोऑपरेटिव लिमिटेड के प्रमोटर्स में शामिल हैं:

यूरोपीय देश नीदरलैंड के सबसे खुशहाल बच्चे

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यूनिसेफ की वर्ष 2020 की एक रिपोर्ट के अनुसार यूरोपीय देश नीदरलैंड के बच्चों को सबसे खुशहाल के रूप में आंका गया है।

वहां के मां-बाप के वे कौन से तरीके हैं या स्कूली सिस्टम में ऐसा क्या फर्क है कि हमारी मार-पिटाई, डांट-फटकार वाले सिस्टम से अलग जिंदगी वहां के बच्चे जी रहे हैं और ज्यादा खुशहाल हैं।

बच्चों की ये रैंकिंग 41 अमीर देशों की स्टडी के आधार पर तैयार की गई। इसका पैमाना एकेडमिक और सोशल स्किल थी। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य शारीरिक स्वास्थ्य समेत वे सारे पैमाने भी थे जो स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के लिए जरूरी हैं। नीदरलैंड के बाद डेनमार्क और नार्वे इस लिस्ट में दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। 41 देशों की इस लिस्ट में सबसे नीचे मिले चिली, बुल्गारिया और अमेरिका है। नीदरलैंड आर्थिक रूप से मजबूत देश है, सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से भी वहां सरकारें काफी जिम्मेदारियां उठाती हैं, लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि सिर्फ पैसे से खुशहाली आती है। ऐसा होता तो अमेरिका इतना पीछे नहीं होता।

विशेषज्ञ इसका राज बताते हुए कहते है कि बच्चों के लिए सीमाएं तय करें, प्रेम और और संबंधों में वार्म्थ, कुछ अच्छा करने का मोटिवेशन, साथ ही उन्हें अपने भविष्य का रास्ता चुनने की आजादी दें। यही कुछ रहस्य हैं जो बच्चों की खुशहाली का रास्ता साफ करते हैं। बच्चों से खुलकर बात करें कि वे क्या करना चाहते हैं, क्या कमियां हैं, कैसे उन्हें दूर किया जा सकता है। डच लोग अपने बच्चों से उन मुद्दों पर भी खुलकर बात करते हैं जिन पर एशियाई समाजों में बच्चों और पैरेंट्स के बीच एक दीवार जैसी खड़ी कर दी गई है।

इसके अलावा भी कई ऐसे तथ्य हैं जो तय करते हैं कि बच्चों की जिंदगी खुशहाली भरी होगी या नहीं? जैसे बच्चों पर कितना एकेडमिक बोझ है, कहीं सोशल मीडिया के के प्रभाव में दूसरों के पोस्ट देखकर आप भ्रमित होकर बच्चों पर दबाव तो नहीं बना रहे हैं, क्योंकि जरूरी नहीं कि सोशल मीडिया पोस्ट में लोग जितने चमकते दिख रहे हों वो सच हो। सोशल मीडिया के दौर में मां-बाप के लिए जरूरी है कि वे वास्तविकता की धरातल को पहचानें। बेवजह बच्चों पर दबाव न बनाएं। बच्चों को वो जो बनना चाहते हैं उस दिशा में काम करने की आजादी मिले। वे सकारात्मक माहौल के लिए अपने सही दोस्त चुन सकें। उन्हें हर बात पर जज न किया जाए। खेलकूद की भी उन्हें आजादी मिले।

नीदरलैंड स्कूलों में स्किल लर्निंग के माहौल पर जोर देने वाला देश है। मां-बाप के लिए एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि स्कूल के स्कोर बच्चों को आंकने के लिए कोई आखिरी पैमाना नहीं हो सकता हैं। इसकी बजाय बच्चों में लर्निंग और जिज्ञासा के माहौल को बढ़ाने पर जोर दें। इस लिस्ट में तीसरे नंबर पर नार्वे है। नार्वे अपने स्कूलों में टूगैदरनेस को बढ़ावा देने देने के लिए जाना जाता है। मतलब अपने साथ-साथ दूसरों को भी प्रगति में मदद करने की आदत। इसके लिए परिवारों का सामुदायिक बेहतरी के कामों में योगदान देने को वहां के समाज में काफी सराहा जाता है।

जबकि एशियाई समाज इसीलिए टूटते चले गए कि हमने न तो परिवारों को संभालने पर ध्यान दिया और न ही समाज में अच्छी आदतों, अच्छे काम और अच्छी पहल को सराहने की पहल की। जो काम हम नहीं करते वो बच्चे कैसे सीखेंगे। हम जो गलतियां खुद करते हैं उन्हें बच्चों को नहीं करने को कहते हैं। आखिर ये कैसे संभव है कि हम गलतियों करें और और बच्चों को रोक पाएं। इसलिए सबसे जरूरी है खुद में बदलाव लाएं और फिर अच्छे बदलावों की सीख बच्चों को दें।

रजनीकांत शुक्ला

अमित शाह ने खुदीराम बोस की जयंती पर नमन किया

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केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने महान देशभक्त और अमर बलिदानी खुदीराम बोस जी की जयंती पर उन्हें नमन किया।

श्री अमित शाह ने X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में कहा कि “महान देशभक्त और अमर बलिदानी खुदीराम बोस जी की जयंती पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। शौर्य, साहस और मातृभूमि के लिए त्याग के प्रतीक खुदीराम बोस जी ने माँ भारती की स्वाधीनता के लिए युवाओं को संगठित कर सशस्त्र क्रांति के लिए प्रेरित किया और स्वदेशी के लिए भी देशवासियों को जागृत किया। अनगिनत क्रांतिकारियों की प्रेरणा बने खुदीराम जी को क्रान्ति के पथ से अंग्रेजी हुकुमत की यातनाएँ भी डिगा न सकीं और मातृभूमि के लिए उन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी वीरगाथा हर एक युवा के लिए राष्ट्र प्रथम का अमूल्य प्रेरणास्रोत है।”

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले के बहुवैनी नामक गाँव में कायस्थ परिवार में बाबू त्रैलोक्यनाथ बोस के यहाँ हुआ था। उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि नौवीं कक्षा के बाद ही पढ़ाई छोड़ दी और स्वदेशी आन्दोलन में कूद पड़े। छात्र जीवन से ही ऐसी लगन मन में लिये इस नौजवान ने हिन्दुस्तान पर अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को ध्वस्त करने के संकल्प में अलौकिक धैर्य का परिचय देते हुए पहला बम फेंका और मात्र 19 वें वर्ष में 11अगस्त 1908 हाथ में भगवद गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी के फन्दे पर चढ़कर इतिहास रच दिया।

स्कूल छोड़ने के बाद खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बने और वन्दे मातरम् पैफलेट वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में उन्होंने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।

किन्तु खुदीराम से पूर्व 17 जनवरी 1872 को 68 कूकाओं के सार्वजनिक नरसंहार के समय 13 वर्ष का एक बालक भी शहीद हुआ था। उपलब्ध तथ्यानुसार उस बालक को, जिसका नंबर 50वाँ था, जैसे ही तोप के सामने लाया गया, उसने लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर कावन की दाढ़ी कसकर पकड़ ली और तब तक नहीं छोड़ी जब तक उसके दोनों हाथ तलवार से काट नहीं दिये गए। बाद में उसे उसी तलवार से मौत के घाट उतार दिया गया था।

फरवरी 1906 में मिदनापुर में एक औद्योगिक तथा कृषि प्रदर्शनी लगी हुई थी। प्रदर्शनी देखने के लिये आसपास के प्रान्तों से सैंकडों लोग आने लगे। बंगाल के एक क्रान्तिकारी सत्येन्द्रनाथ द्वारा लिखे ‘सोनार बांगला’ नामक ज्वलंत पत्रक की प्रतियाँ खुदीरामने इस प्रदर्शनी में बाँटी। एक पुलिस वाला उन्हें पकडने के लिये भागा। खुदीराम ने इस सिपाही के मुँह पर घूँसा मारा और शेष पत्रक बगल में दबाकर भाग गये। इस प्रकरण में राजद्रोह के आरोप में सरकार ने उन पर अभियोग चलाया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष छूट गये।

इतिहासवेत्ता मालती मलिक के अनुसार 28 फरवरी 1906 को खुदीराम बोस गिरफ्तार कर लिये गये लेकिन वह कैद से भाग निकले। लगभग दो महीने बाद अप्रैल में वह फिर से पकड़े गये। 16 मई 1906 को उन्हें रिहा कर दिया गया।

6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर बच गया। सन 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले।

मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रान्तिकारियों की गुप्त संस्था के माध्यम से खुदीराम क्रान्तिकार्यों पहले ही में जुट चुके थे। 1905 में लॉर्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। अन्य मामलों में भी उसने क्रान्तिकारियों को बहुत कष्ट दिया था। इसके परिणामस्वरूप किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेजा। ‘युगान्तर’ समिति कि एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को ही मारने का निश्चय हुआ। इस कार्य हेतु खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी का चयन किया गया। खुदीराम को एक बम और पिस्तौल दी गयी। प्रफुल्लकुमार को भी एक पिस्तौल दी गयी। मुजफ्फरपुर में आने पर इन दोनों ने सबसे पहले किंग्जफोर्ड के बँगले की निगरानी की। उन्होंने उसकी बग्घी तथा उसके घोड़े का रंग देख लिया। खुदीराम तो किंग्जफोर्ड को उसके कार्यालय में जाकर ठीक से देख भी आए।

30 अप्रैल 1908 को ये दोनों नियोजित काम के लिये बाहर निकले और किंग्जफोर्ड के बँगले के बाहर घोड़ागाड़ी से उसके आने की राह देखने लगे। बँगले की निगरानी हेतु वहाँ मौजूद पुलिस के गुप्तचरों ने उन्हें हटाना भी चाहा परन्तु वे दोनो उन्हें योग्य उत्तर देकर वहीं रुके रहे। रात में साढ़े आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अँधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बँगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आने वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका। हिन्दुस्तान में इस पहले बम विस्फोट की आवाज उस रात तीन मील तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड तथा योरोप में भी सुनी गयी जब वहाँ इस घटना की खबर ने तहलका मचा दिया। यूँ तो खुदीराम ने किंग्जफोर्ड की गाड़ी समझकर बम फेंका था परन्तु उस दिन किंग्जफोर्ड थोड़ी देर से क्लब से बाहर आने के कारण बच गया। दैवयोग से गाडियाँ एक जैसी होने के कारण दो यूरोपीय स्त्रियों को अपने प्राण गँवाने पड़े। खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार दोनों ही रातों-रात नंगे पैर भागते हुए गये और 24 मील दूर स्थित वैनी रेलवे स्टेशन पर जाकर ही विश्राम किया।

अंग्रेज पुलिस उनके पीछे लग गयी जैसे ही वैनी रेलवे स्टेशन पर खुदीराम पहुंचे वहा मौजूद दो सिपाहिकर्मी जिनके नाम फतेह सिंग और शेव पार्षद थे उन्हें खुदीराम के चाल चलन पर तब शक हुआ जब वो किसी चाय की दुकान पर पानी मांग रहा था साथ ही उसके मैले कपड़े और थकान की वजह। इतना कुछ देखने पर वे उनके नजदीक गए उन्होंने खुदीराम से कुछ सवाल पूछे कई जवाब ठीक से ना मिलने से दोनो का शक गहराता गया,उन्होंने उसको झप लिया खुदीराम ने उनसे छुड़ाने का काफी प्रयास किया लेकिन वो विफल रहा और आखिरकार पकड लिया गया। इधर दूसरी ओर अपने सहकर्मी खुदीराम से बिछड़ ने के बाद प्रफुल्लकुमार काफी दूर तक भागने में कामयाब रहे तकरीबन दोपहर के वक्त एक व्यक्ति त्रिगुणचर्न घोष ने उन्हें अपनी और भागते हुए देखा उन्हें बमबारी के घटना के बारेमे जानकारी मिल चुकी थी और समझ चुके थे की यह शख्स उन क्रांतिकारियों में से है। उन्होंने उसे पनाह देने का फैसला किया उसी रात वो खुद प्रफुल्ल के साथ रेलवे स्टेशन कोलकाता छोड़ने निकले हावड़ा के नजदीक आने के बाद ब्रिटिश सब-इंस्पेक्टर बनर्जी भी उसी ट्रेन में सवार थे। कुछ देर बाद उन्हें प्रफुल्ल के असलियत के बारेमे पता चला प्रफुल्ल भी समझ चुके थे की वो घिर चुका है। पकड़ में आने से पहले ही वे वहा से भाग निकला लेकिन अपने आप को चारो ओर घिरा देख प्रफुल्लकुमार चाकी ने खुद को गोली मारकर अपनी शहादत दे दी। और यहा खुदीराम के गिरफ्तार होने के कुछ दिन बाद 11 अगस्त 1908 को उन्हें मुजफ्फरपुर जेल में फाँसी दे दी गयी। उस समय उनकी उम्र मात्र 18+ वर्ष थी।

दूसरे दिन सन्देह होने पर प्रफुल्लकुमार चाकी को पुलिस पकडने गयी, तब उन्होंने स्वयं पर गोली चलाकर अपने प्राणार्पण कर दिये। खुदीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी का अन्त निश्चित ही था। 11 अगस्त 1908 को भगवद्गीता हाथ में लेकर खुदीराम धैर्य के साथ खुशी-खुशी फाँसी चढ़ गये। किंग्जफोर्ड ने घबराकर नौकरी छोड दी और जिन क्रान्तिकारियों को उसने कष्ट दिया था उनके भय से उसकी शीघ्र ही मौत भी हो गयी।

फाँसी के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गये कि बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे। इतिहासवेत्ता शिरोल के अनुसार बंगाल के राष्ट्रवादियों के लिये वह वीर शहीद और अनुकरणीय हो गया। विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों ने शोक मनाया। कई दिन तक स्कूल कालेज सभी बन्द रहे और नौजवान ऐसी धोती पहनने लगे, जिनकी किनारी पर खुदीराम लिखा होता था।

क्रान्तिवीर खुदीराम बोस का स्मारक बनाने की योजना कानपुर के युवकों ने बनाई और उनके पीछे असंख्य युवक इस स्वतन्त्रता-यज्ञ में आत्मार्पण करने के लिये आगे आये। इस प्रकार के अनेक क्रान्तिकारियों के त्याग की कोई सीमा नहीं थी।

मुज़फ्फरपुर जेल में जिस मजिस्ट्रेट ने उन्हें फाँसी पर लटकाने का आदेश सुनाया था, उसने बाद में बताया कि खुदीराम बोस एक शेर के बच्चे की तरह निर्भीक होकर फाँसी के तख्ते की ओर बढ़े थे। जब खुदीराम शहीद हुए थे तब उनकी आयु 18 वर्ष थी। शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हो गए कि बंगाल के जुलाहे उनके नाम की एक खास किस्म की धोती बुनने लगे।

उनकी शहादत से समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ी थी। उनके साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं

गुरूवार से बाल विवाह मुक्त भारत अभियान

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कल 4 दिसंबर से नई दिल्ली के विज्ञान भवन में बाल विवाह मुक्त भारत के लिए 100-दिवसीय गहन जागरूकता अभियान का विधिवत शुभारंभ किया जाएगा। बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के एक वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में इसका आयोजन होगा। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने 27 नवंबर, 2024 को बाल विवाह मुक्त भारत अभियान शुरू किया था और 27 नवंबर, 2025 को इसका एक वर्ष पूरा हो जाएगा। कल होने वाले इस समारोह में केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री श्रीमती अन्नपूर्णा देवी और राज्य मंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर उपस्थित रहेंगी।

कार्यक्रम में बाल विवाह उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय संकल्प लिया जाएगा। इस अवसर पर  देश भर से प्रेरक परिवर्तन की कहानियों और अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं के अनुभव पर आधारित विशेष रूप से निर्मित फिल्म का प्रदर्शन भी होगा। इनके जरिए सामूहिक प्रगति का जश्न मनाया जाएगा और मिशन के अगले चरण के लिए नए संकल्प के साथ जुटने का संकल्प लिया जाएगा। इस कार्यक्रम का सीधा प्रसारण https://webcast.gov.in/mwcd पर उपलब्ध होगा।

100- दिवसीय अभियान (27 नवंबर 2025 – 8 मार्च 2026)

तीन-चरण की योजना के साथ यह अभियान चलाया जाएगा जिसका उद्देश्य समुदायों को सक्रिय करना और सतत कार्रवाई को प्रोत्साहित करना है:

  • अवधि 1 (27 नवंबर–31 दिसंबर 2025):

स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जागरूकता गतिविधियां  जिनके अंतर्गत वाद-विवाद, निबंध प्रतियोगिताएं, संवादात्मक सत्र और संकल्प समारोह शामिल हैं।

  • अवधि (1-31  जनवरी 2026):

बाल अधिकारों, सुरक्षा और सशक्तिकरण पर संदेशों को बढ़ाने के लिए धार्मिक नेताओं, कम्युनिटी इन्फ्लुएंसर और विवाह सेवा प्रदाताओं के साथ कार्य।

  • अवधि (फरवरी-8 मार्च 2026):

ग्राम पंचायतों और नगरपालिका वार्डों को अपने अधिकार क्षेत्र को बाल-विवाह-मुक्त घोषित करने वाले प्रस्ताव पारित करने के लिए संगठित करना।

यह राष्ट्रीय अभियान स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण , पंचायती राज , ग्रामीण विकास और शिक्षा मंत्रालयों के साथ निकट तालमेल बनाकर क्रियान्वित किया जाएगा जिससे निर्बाध सहयोग और व्यापक रूप से जमीनी स्तर तक इसकी पहुंच सुनिश्चित हो सके। इस 100-दिवसीय अभियान के माध्यम से, मंत्रालय देश भर के नागरिकों, संस्थाओं और सामुदायिक नेताओं से इस आंदोलन में शामिल होने और बाल विवाह मुक्त भारत के निर्माण के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त करने का आह्वान करता है।

मसूरी में 600 प्रशिक्षु आईएएस और एक सवाल

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“उंगलियों पर हल होने वाला सवाल और भविष्य के प्रशासकों की तैयारी का सच”

मसूरी से उठता सवाल: क्या हमारी प्रशासनिक शिक्षा केवल पुस्तकीय हो गई है? मसूरी में 600 प्रशिक्षु और एक सवाल जिसने सबको सोचने पर मजबूर किया। लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी का वास्तविक लक्ष्य: ‘थिंकिंग एडमिनिस्ट्रेटर’ तैयार करना। प्रशिक्षण का अर्थ केवल पाठ नहीं।

मसूरी की कक्षाओं में उठा एक छोटा-सा सवाल, बड़ी सीख। प्रशासनिक प्रशिक्षण का आईना: जब लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में एक साधारण सवाल ने बड़ा संदेश दिया। उत्तराखंड के मसूरी में 100वाँ फाउंडेशन कोर्स और नेतृत्व की बुनियादी समझ पर गहरा संकेत।

— डॉ प्रियंका सौरभ

उत्तराखंड के शांत, अनुशासित और सुसंस्कृत वातावरण में स्थित मसूरी का प्रसिद्ध प्रशासनिक अकादमी परिसर—लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी—देश के सर्वोच्च सिविल सेवकों के निर्माण का केंद्र बिंदु है। यहाँ आज भी 600 से अधिक प्रशिक्षु अधिकारी भविष्य के भारतीय प्रशासन की रूपरेखा तय करने की तैयारी में डटे हैं। हाल ही में 100वें फाउंडेशन कोर्स का समापन समारोह आयोजित किया गया, जो किसी भी संस्थान के लिए गौरव का क्षण होता है। इस अवसर पर देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा और भी बढ़ा दी।

समारोह के दौरान रक्षा मंत्री ने एक सरल-सा गणितीय प्रश्न पूछा— “एक आदमी के पास कुछ पैसे थे। उसने आधा ए को, एक-तिहाई बी को और शेष 100 रुपये सी को दिए। बताइए, कुल पैसा कितना था?”

दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाला यह सीधा-सा सवाल प्रशिक्षुओं के लिए अप्रत्याशित सिद्ध हुआ। कई प्रशिक्षु अधिकारी प्रश्न में उलझ गए, जबकि समाधान उंगलियों पर किया जा सकता था। बाद में स्वयं राजनाथ सिंह ने इसे सरल तरीके से हल कर समझाया। यह घटना भले ही साधारण प्रतीत हो, पर प्रशासनिक प्रशिक्षण और नेतृत्व क्षमता की वास्तविक दिशा पर यह बेहद महत्त्वपूर्ण संकेत देती है।

प्रशासनिक कार्यों का मूल तत्व केवल कानून और नियमों का ज्ञान नहीं, बल्कि तुरंत समझने, तर्क लागू करने और व्यवहारिक समाधान निकालने की क्षमता है। कभी-कभी सबसे कठिन परिस्थितियों में सर्वाधिक सरल समाधान ही सर्वश्रेष्ठ होता है—पर इसके लिए मन का खुलापन और व्यावहारिक सोच आवश्यक होती है। यही गुण एक सक्षम प्रशासक को भीड़ से अलग करता है।

यह घटना इस बात का स्मरण भी कराती है कि सिविल सेवा केवल अकादमिक बौद्धिकता का अभ्यास नहीं है; यह मानव स्वभाव, सामाजिक व्यवहार, त्वरित निर्णय-क्षमता और सामान्य समझ की माँग भी करती है। किसी भी शासन प्रणाली में सबसे प्रभावशाली अधिकारी वही होता है जो जटिल समस्याओं को सरलता से हल करने की क्षमता रखता हो।

प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि व्यवहारिक बुद्धि का विकास भी है। एक छोटा सा प्रश्न प्रशिक्षुओं को यह याद दिलाता है कि वास्तविक प्रशासन वही है जो खेत-खलिहान, बाज़ार, थाने, पंचायत भवन और कार्यालयों में घटित होता है—जहाँ जटिलताएँ कम और सादगी अधिक काम आती है।

राजनाथ सिंह द्वारा पूछा गया प्रश्न प्रशासनिक सोच के दो महत्त्वपूर्ण पहलुओं को उजागर करता है—

पहला, अधिकारी का ध्यान समस्या के मूल की ओर होना चाहिए, न कि उसकी सतही जटिलता की ओर।

दूसरा, किसी भी चुनौती में घबराना नहीं, बल्कि उसे विभाजित कर सरल रूप में हल करना चाहिए।

सिविल सेवाओं में ऐसे अनेक अवसर आते हैं जब अधिकारी को अचानक लिए गए निर्णयों के आधार पर जनता को राहत, दिशा और सुरक्षा प्रदान करनी होती है। यदि वह क्षणिक दबाव में भी सामान्य तर्क बनाए रखने में दक्ष है, तो वह बेहतर प्रशासक बन सकता है।

यह प्रसंग इस व्यापक प्रश्न को भी जन्म देता है कि आधुनिक प्रशिक्षण पद्धति कहीं अत्यधिक तकनीकी, सैद्धांतिक या औपचारिक तो नहीं हो गई है? क्या हम प्रशासन के मूल तत्व—सरलता, संवेदनशीलता और सामान्य विवेक—को नजरअंदाज तो नहीं कर रहे?

सिविल सेवा का इतिहास बताता है कि देश के श्रेष्ठ अधिकारी वही रहे, जिन्होंने अत्यधिक बुद्धि के साथ-साथ सरल सोच, जन-संपर्क की क्षमता और सहज निर्णय-प्रक्रिया अपनाई। आज जब देश नई चुनौतियों—प्रौद्योगिकी, जटिल प्रशासनिक व्यवस्था, विस्तृत जनसंख्या और त्वरित परिवर्तनों—से गुजर रहा है, तब एक प्रशासक की भूमिका और भी विस्तृत और बहुआयामी हो चुकी है।

ऐसे समय में यह आवश्यक है कि प्रशिक्षण केवल परीक्षाओं और पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित न हो। उसमें व्यवहारिक गणित, तर्कशक्ति, सामान्य समझ, मनोवैज्ञानिक संतुलन और परिस्थितिजन्य विश्लेषण को भी समुचित स्थान मिले।

राजनाथ सिंह द्वारा हल्का-सा पूछा गया यह प्रश्न प्रशासनिक तंत्र को यह संदेश देता है कि नेतृत्व की असल परीक्षा कभी-कभी छोटे-छोटे क्षणों में ही होती है। बड़े निर्णयों का आधार भी वही अधिकारी बनता है जो बेसिक समझ को खोने नहीं देता।

इस प्रसंग से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रशिक्षण के दौरान आने वाले ऐसे अप्रत्याशित प्रश्न अधिकारी के मन को गति देते हैं, उसे दबाव में सोचने की क्षमता प्रदान करते हैं और वास्तविक प्रशासनिक दुनिया के लिए मानसिक रूप से तैयार करते हैं।

समय के साथ यह आवश्यक हो गया है कि सिविल सेवा प्रशिक्षण अकादमियाँ इस प्रकार के संवाद, प्रश्न-आधारित परीक्षण और व्यवहारिक अभ्यास को और भी अधिक बढ़ाएँ। इससे अधिकारी न केवल जनसेवा के लिए अधिक तैयार होंगे बल्कि प्रशासनिक जटिलताओं को सहजता से हल करने की क्षमता भी विकसित करेंगे।

निष्कर्षतः, मसूरी में घटित यह छोटा-सा घटना क्रम इस बात का प्रतीक है कि नेतृत्व की ताकत केवल बड़े भाषणों या उच्च ज्ञान में नहीं, बल्कि सरल तर्क और मौलिक समझ में भी निहित होती है। सिविल सेवा के भविष्य को आकार देने वाले प्रशिक्षुओं के लिए यह एक स्मरणीय संदेश है—प्रशासन की महानता सरलता में है, न कि जटिलता में।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,