बिहार सरकार के मंत्री नितिन नबीन को भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। यह फैसला तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है।बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव अरुण सिंह ने एक आदेश में कहा गया है कि इस नियुक्ति को पार्टी के संसदीय बोर्ड ने मंजूरी दे दी है। वर्तमान में नितिन नबीन बिहार सरकार में सड़क निर्माण विभाग के मंत्री हैं।
यह संगठनात्मक फेरबदल ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी अपने शीर्ष नेतृत्व ढांचे में बदलाव कर रही है। मौजूदा बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जनवरी 2020 में नियुक्त हुए थे और उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों सहित कई महत्वपूर्ण मौकों पर पार्टी का नेतृत्व करने के लिए कार्यकाल में एक्सटेंशन दिया गया था
नितिन नबीन बिहार के एक अनुभवी बीजेपी नेता हैं। पटना में जन्मे नितिन नबीन दिवंगत नबीन किशोर प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं। दिवंगत नबीन किशोर प्रसाद सिन्हा स्वयं एक अनुभवी बीजेपी नेता और पूर्व विधायक थे। अपने पिता के निधन के बाद नितिन नबीन ने सक्रिय चुनावी राजनीति में कदम रखा।नितिन नबीन पटना में बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। नबीन 2006 में उपचुनाव जीतने के बाद से लगातार चार बार विधायक चुने गए हैं। वह राज्य में पार्टी के सबसे मजबूत प्रदर्शन करने वालों में से एक माने जाते हैं। हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनावों में, उन्होंने बांकीपुर से शानदार जीत हासिल की थी। चुनाव में उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 51,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराया था।
भारतीय रेलवे ने चालू वित्त वर्ष 2025-26 (नवंबर 2025 तक) के दौरान कुल 4,224 से अधिक एलएचबी कोचों का निर्माण किया गया है। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि में उत्पादित 3,590 कोचों की तुलना में 18% की वृद्धि दर्शाता है। उत्पादन में यह वृद्धि रेलवे इकाइयों में विनिर्माण क्षमता के निरंतर सुदृढ़ीकरण और बेहतर उत्पादन नियोजन को प्रदर्शित करती है।
इस अवधि के दौरान कारखानेवार प्रदर्शन की बात करें तो, इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (आईसीएफ), चेन्नई ने 1,659 एलएचबी कोचों का उत्पादन किया है, इसके बाद मॉडर्न कोच फैक्ट्री (एमसीएफ), रायबरेली ने 1,234 कोचों का और रेल कोच फैक्ट्री (आरसीएफ), कपूरथला ने 1,331 कोचों का उत्पादन किया है। इन सभी ने मिलकर एलएचबी कोच उत्पादन में समग्र वृद्धि में योगदान दिया है।
दीर्घकालिक तुलना की जाए तो हाल के वर्षों में हासिल की गई उल्लेखनीय प्रगति साफ दिखाई देती है। 2014 और 2025 के बीच, भारतीय रेलवे ने 42,600 से अधिक एलएचबी कोचों का उत्पादन किया, जो 2004 और 2014 के बीच निर्मित 2,300 कोचों की तुलना में 18 गुना अधिक है। यह विस्तार एलएचबी कोचों को व्यापक रूप से अपनाकर यात्री परिवहन को आधुनिक बनाने पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने को रेखांकित करता है, जो अपने बेहतर सुरक्षा मानकों और कम रखरखाव की ज़रुरतों के लिए जाने जाते हैं।
घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाकर और आयात पर निर्भरता कम करके भारतीय रेलवे, ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ पहल के लक्ष्यों में लगातार महत्वपूर्ण योगदान दे रही है। यह संगठन देश की बढ़ती परिवहन आवश्यकताओं को पूरा करने और यात्रियों को सुरक्षित, सुगम और अधिक आरामदायक यात्रा अनुभव प्रदान करने के लिए अपनी उत्पादन क्षमता को और बढ़ाने पर केंद्रित है।
तमिलनाडु से सातवां आध्यात्मिक दल विशेष ट्रेन से बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचा।
काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत केंद्रीय शास्त्रीय भाषा संस्थान (सीआईसीटी) का स्टॉल तमिल भाषा, साहित्य और संस्कृति को समझने का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है। इस स्टॉल का उद्देश्य “तमिल करकलाम” (तमिल सीखें) पहल के माध्यम से तमिल शास्त्रीय भाषा को सरल, सुलभ और बहुभाषी स्वरूप में प्रस्तुत करना है।उधर काशी तमिल संगमम 4.0 में शामिल होने के लिए तमिलनाडु से सातवां आध्यात्मिक दल विशेष ट्रेन से बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचा।
सीआईसीटी द्वारा तमिल शास्त्रीय ग्रंथों का हिन्दी अनुवाद कर समस्त पुस्तकें स्टॉल पर उपलब्ध कराई गई हैं। इसके साथ ही यहाँ हिन्दी, तमिल, अंग्रेज़ी, थाई सहित कई अन्य भाषाओं में भी पुस्तकें प्रदर्शित की गई हैं, जिससे काशी और तमिलनाडु से आए प्रतिनिधि तमिल साहित्य को सहजता से समझ सकें।
स्टॉल पर विशेष रूप से तिरुक्कुरल ग्रंथ उपलब्ध है, जो लगभग 300 वर्ष पुराना माना जाता है और तमिल साहित्य की अमूल्य धरोहर है। यह ग्रंथ तीन भागों में विभाजित है प्रथम भाग में धर्म, द्वितीय भाग में अर्थ और तृतीय भाग में प्रेम के दर्शन प्रस्तुत किए गए हैं। जैसे हिन्दी में अर्थशास्त्र का महत्व है, उसी प्रकार तिरुक्कुरल तमिल समाज का नैतिक और दार्शनिक आधार है।
काशी तमिल संगमम् के बाद सांस्कृतिक एकता को और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से सीआईसीटी ने “Kashi as etched on the Tamil Indian Book” नामक एक विशेष अंतर-सांस्कृतिक पुस्तक भी प्रकाशित की है, जो काशी और तमिल संस्कृति के ऐतिहासिक व भावनात्मक संबंधों को रेखांकित करती है।
स्टॉल पर इंटरैक्टिव लर्निंग सत्र भी आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ शिक्षक पाँच प्रमुख पुस्तकों के माध्यम से सरल व्याकरण, तमिल शब्दकोश, संवाद अभ्यास और तमिल अक्षर लेखन सिखा रहे हैं। चार्ट और दृश्य सामग्री के प्रयोग से बच्चों एवं नवशिक्षार्थियों के लिए सीखना और अधिक सहज हो गया है।
इसके अतिरिक्त पीएम ई-विद्या पहल के अंतर्गत ऑनलाइन कक्षाओं के माध्यम से भी तमिल भाषा का शिक्षण कराया जा रहा है। स्टॉल पर तमिल की प्रथम व्याकरणिक पुस्तक तोळ्काप्पियम (Tolkappiyam), संगम साहित्य, पोस्ट-संगम साहित्य, कला साहित्य (18 भागों में) तथा तमिल शोध से संबंधित अनेक पुस्तकें भी उपलब्ध हैं।
इस स्टॉल का संचालन सीआईसीटी के निदेशक डॉ. आर. चन्द्रशेखर, रजिस्ट्रार डॉ. आर. भुवनेश्वरी के मार्गदर्शन में किया जा रहा है। स्टॉल टीम में डॉ. देवी, डॉ. कार्तिक एवं डॉ. पियरस्वामी सक्रिय रूप से सहभागिता निभा रहे हैं।
सीआईसीटी का यह प्रयास तमिल भाषा को सीखने, समझने और भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने की दिशा में एक सशक्त कदम सिद्ध हो रहा है।
स्टॉल पर तमिल भाषा सीख रही वाराणसी के स्थानीय निवासी साजिया ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि सीआईसीटी का यह प्रयास अत्यंत उपयोगी और प्रेरणादायक है। उन्होंने बताया, पहले मुझे लगता था कि तमिल भाषा सीखना कठिन होगा, लेकिन यहाँ ‘तमिल करकलाम’ के माध्यम से बहुत ही सरल और रोचक तरीके से पढ़ाया जा रहा है। हिन्दी में अनुवादित पुस्तकों, चार्ट और संवाद अभ्यास से भाषा समझना आसान हो गया है।”
साजिया ने कहा कि इंटरैक्टिव क्लास और शिक्षकों का मार्गदर्शन उन्हें तमिल अक्षर, शब्द और सामान्य बातचीत सीखने में आत्मविश्वास दे रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि इस तरह के मंच स्थानीय युवाओं को नई भाषाएँ सीखने और अन्य संस्कृतियों को समझने का बेहतरीन अवसर प्रदान करते हैं।
उन्होंने सीआईसीटी और काशी तमिल संगमम् 4.0 की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना को वास्तविक रूप में साकार करते हैं और युवाओं को ज्ञान व संस्कृति से जोड़ते हैं।
काशी तमिल संगमम 4.0 में शामिल होने के लिए तमिलनाडु से सातवां आध्यात्मिक दल विशेष ट्रेन से बनारस रेलवे स्टेशन पहुंचा। स्टेशन पर उतरते ही इस दल का पारंपरिक तरीके से डमरू वादन,पुष्प वर्षा और ‘हर-हर महादेव’ तथा ‘वणक्कम काशी’ के उद्घोष से भव्य स्वागत किया गया। स्टेशन पर पारंपरिक स्वागत देखकर तमिल दल के सदस्यों में खासा उत्साह देखने को मिला।
कई लोगों ने कहा कि काशी में मिल रही आध्यात्मिक वातावरण उनके लिए अविस्मरणीय है। डमरू वादन की ध्वनि से पूरा परिसर शिवमय हो गया और काशी व तमिलनाडु की सांस्कृतिक एकता की झलक साफ दिखाई दी।
इस दल में शामिल रामानुज ने कहा कि यह पहल भारत की दो प्राचीन सभ्यताओं काशी और तमिलनाडु के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक संबंधों का उत्सव है। सदियों से तीर्थयात्रियों, विद्वानों और साधकों ने दोनों क्षेत्रों के बीच ज्ञान, भाषा और परंपराओं का आदान-प्रदान किया है। संगमम उसी ऐतिहासिक जुड़ाव को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करता है। हम काफी उत्साहित हैं काशी, प्रयागराज और अयोध्या भ्रमण करने के लिए।
भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने आज ) राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार 2025 और ऊर्जा संरक्षण पर राष्ट्रीय चित्रकला प्रतियोगिता के पुरस्कार प्रदान किए।
राष्ट्रपति ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ऊर्जा संरक्षण सबसे पर्यावरण अनुकूल और ऊर्जा का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। ऊर्जा संरक्षण केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आज की सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि ऊर्जा बचाना केवल कम उपयोग करना नहीं है, बल्कि ऊर्जा का बुद्धिमानी, जिम्मेदारी और कुशलता से उपयोग करना है। उन्होंने कहा कि जब हम बिजली के उपकरणों का अनावश्यक उपयोग करने से बचते हैं, ऊर्जा-कुशल उपकरणों को अपनाते हैं, अपने घरों और कार्यस्थलों में प्राकृतिक प्रकाश और वेंटिलेशन का उपयोग करते हैं, या सौर और नवीकरणीय ऊर्जा विकल्पों को अपनाते हैं, तो हम न केवल ऊर्जा बचाते हैं बल्कि कार्बन उत्सर्जन को भी कम करते हैं। स्वच्छ हवा और सुरक्षित जल स्रोतों को बनाए रखने और एक संतुलित इकोसिस्टम के लिए भी ऊर्जा संरक्षण महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि ऊर्जा की प्रत्येक इकाई जिसे हम बचाते हैं, प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी संवेदनशीलता का प्रतीक होगी।राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि यदि युवा और बच्चे ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूक हों और इस दिशा में प्रयास करें, तो इस क्षेत्र में लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है और देश के सतत विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।
राष्ट्रपति ने इस बात पर जोर दिया कि यदि युवा और बच्चे ऊर्जा संरक्षण के प्रति जागरूक हों और इस दिशा में प्रयास करें, तो इस क्षेत्र में लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सकता है और देश के सतत विकास को सुनिश्चित किया जा सकता है।
राष्ट्रपति ने कहा कि सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा तक पहुंच समुदायों को मजबूत बनाती है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देती है और विकास के नए अवसर पैदा करती है। इसलिए, हरित ऊर्जा केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है; यह सशक्तिकरण और समावेशी विकास का एक शक्तिशाली साधन है।
राष्ट्रपति ने इस बात पर प्रसन्नता व्यक्त की कि प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी पहलों से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो रही है। सरकार नवीकरणीय ऊर्जा उपभोग दायित्व और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने और ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने बताया कि 2023-24 में भारत के ऊर्जा दक्षता प्रयासों के परिणामस्वरूप 53.60 मिलियन टन तेल के समतुल्य ऊर्जा की बचत हुई है। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से प्रतिवर्ष महत्वपूर्ण आर्थिक बचत हो रही है और कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में भी उल्लेखनीय कमी आई है।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के ऊर्जा परिवर्तन की सफलता के लिए हर क्षेत्र और हर नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। सभी क्षेत्रों में ऊर्जा दक्षता लाने के लिए व्यवहार में बदलाव बेहद ज़रूरी है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाते हुए संतुलित जीवनशैली अपनाने की चेतना भारत की सांस्कृतिक परंपरा का अभिन्न अंग है – यही भावना हमारे विश्व के संदेश, ‘‘पर्यावरण के लिए जीवनशैली – एलआईएफई’’ का आधार है। उन्होंने ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में कार्यरत सभी हितधारकों की सराहना की और कहा कि उनका योगदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित करेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सामूहिक जिम्मेदारी, साझेदारी और जनभागीदारी की भावना से भारत ऊर्जा संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाता रहेगा और हरित भविष्य की दिशा में अपने लक्ष्यों को प्राप्त करेगा।
केंद्रीय संचार एवं पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आज रविवार को कर्नाटक के बेलगावी स्थित अथानी में मराठा शिरोमणि छत्रपति शिवाजी महाराज की 25 फुट ऊँची भव्य प्रतिमा का अनावरण किया। इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए सिंधिया ने कहा कि यह केवल एक प्रतिमा का अनावरण नहीं, बल्कि भारत के स्वाभिमान, साहस और हिंदवी स्वराज की चेतना को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का संकल्प है। उन्होंने कहा कि “जय भवानी, जय शिवाजी” का उद्घोष आज भी हर भारतीय के भीतर निर्भीकता, राष्ट्रधर्म और आत्मगौरव की ऊर्जा भर देता है। कार्यक्रम के दौरान मंजूनाथ भारती स्वामी जी, संभाजी भिड़े गुरु जी, कर्नाटक सरकार में मंत्री संतोष लाड़ एवं सतीश जारकिहोली, कर्नाटक के पूर्व उपमुख्यमंत्री लक्ष्मण सवादी, कोल्हापुर सांसद श्रीमंत शाहू छत्रपति महाराज, कर्नाटक सरकार में पूर्व मंत्री श्रीमंत बी पाटिल और पीजीआर सिंधे सहित अन्य नेतागण मंच पर उपस्थित रहे।
हिंदवी स्वराज के शिल्पकार और राष्ट्रधर्म के प्रतीक हैं शिवाजी महाराज
अपने संबोधन में केन्द्रीय मंत्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज के जीवन और संघर्ष को स्मरण करते हुए कहा कि मात्र 15 वर्ष की आयु में हिंदवी स्वराज का संकल्प लेने वाले शिवाजी महाराज ने साहस, रणनीति और दूरदृष्टि से आक्रांताओं को पराजित कर भारत के स्वाभिमान की रक्षा की। सिंधिया ने कहा कि बेलगावी और अथानी की भूमि शिवाजी महाराज के पराक्रम की साक्षी रही है। दक्षिण भारत में उनके अभियानों के दौरान इस क्षेत्र का सामरिक महत्व अत्यंत रहा, जहाँ से दक्कन, कोंकण और गोवा मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई। उन्होंने कहा कि आज इसी धरती पर शिवाजी महाराज की प्रतिमा का अनावरण होना इतिहास, परंपरा और वर्तमान को जोड़ने वाला गौरवपूर्ण क्षण है। सिंधिया ने कहा कि आज बेलगावी की धरती पर शौर्य, स्वाभिमान और असीम साहस की अमर गाथा सजीव हो उठी है।
शिवाजी महाराज की प्रेरणा पर अग्रसर है आधुनिक भारतः सिंधिया
केन्द्रीय मंत्री ने कहा कि आज जब भारत आत्मगौरव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मार्ग पर अग्रसर है, तब छत्रपति शिवाजी महाराज का चरित्र और अधिक प्रासंगिक हो गया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत, आत्मनिर्भरता और राष्ट्रधर्म की जो चेतना देश में आगे बढ़ रही है, उसकी जड़ें शिवाजी महाराज की उसी विचारधारा में हैं। यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देती रहेगी कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है, साहस कभी थमता नहीं और स्वराज की भावना कभी पुरानी नहीं होती।
गौरतलब है कि केन्द्रीय मंत्री अपने दो दिवसीय महाराष्ट्र-कर्नाटक के दौरे पर हैं। इससे पहले शनिवार को उन्होंने कोल्हापुर में बॉम्बे जिमखाना के 150 वर्ष पूर्ण होने पर डाक टिकट का विमोचन किया, तत्पश्चात वे ग्रामीण डाक सम्मेलन में शामिल हुए जहां उन्होंने ग्रामीण डाक सेवकों से संवाद किया। उसके बाद आज सिंधिया बेलगावी में छत्रपति शिवाजी महाराज की प्रतिमा अनावरण कार्यक्रम में उपस्थित रहे।
आज सुबह से ही दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) लगातार बढ़ रहा है और सुबह 10 बजे यह 401 तक पहुंच गया। मौजूदा GRAP के तीसरे चरण (गंभीर वायु गुणवत्ता-दिल्ली का AQI 401-450 के बीच) के तहत परिकल्पित सभी कार्रवाइयां पूरे दिल्ली-एनसीआर में तत्काल प्रभाव से लागू कर दी गई हैं। यह एनसीआर में पहले से लागू GRAP के पहले और दूसरे चरण के तहत की गई कार्रवाइयों के अतिरिक्त है। जीआरएपी के तहत उपायों को लागू करने के लिए जिम्मेदार विभिन्न एजेंसियों, जिनमें एनसीआर और डीपीसीसी के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) शामिल हैं, को भी इस अवधि के दौरान जीआरएपी के चरण I और II के तहत की गई कार्रवाइयों के अलावा, मौजूदा जीआरएपी के चरण III के तहत की गई कार्रवाइयों का कड़ाई से कार्यान्वयन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया है।
दिल्ली की बिगड़ती वायु गुणवत्ता को देखते हुए, एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की श्रेणीबद्ध प्रतिक्रिया कार्य योजना (GRAP) पर गठित उप-समिति की आज बैठक बताया गया कि प्रदूषण में इस अचानक वृद्धि का मुख्य कारण उत्सर्जन नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहा कमजोर पश्चिमी विक्षोभ है। इस मौसमीय स्थिति के कारण हवा की गति में उल्लेखनीय कमी आई है, कभी-कभी हवा शांत हो जाती है, हवा की दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर बदल गई है और निचले वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ गई है। सर्दियों के मौसम में ऐसी परिस्थितियाँ धुंध और कोहरे के निर्माण के लिए अनुकूल होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप प्रदूषकों का फैलाव कम होता है और वे सतह के पास ही फंस जाते हैं। इन प्रतिकूल मौसमीय स्थितियों के कारण वायु गुणवत्ता में अचानक गिरावट देखी गई है।
मौजूदा जीआरएपी के चरण-III के अनुसार 9 सूत्री कार्य योजना पूरे एनसीआर में तत्काल प्रभाव से लागू है। इसमें एनसीआर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और डीपीसीसी सहित विभिन्न एजेंसियों द्वारा कार्यान्वित/सुनिश्चित किए जाने वाले कदम शामिल हैं। ये कदम इस प्रकार हैं:
1- निर्माण एवं विध्वंस गतिविधियां:
(i) पूरे एनसीआर में धूल उत्पन्न करने/वायु प्रदूषण फैलाने वाली निम्नलिखित श्रेणियों की निर्माण एवं विध्वंस गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लागू करें:
खुदाई और भराई के लिए मिट्टी का काम, जिसमें बोरिंग और ड्रिलिंग कार्य शामिल हैं।
पाइलिंग कार्य।
सभी विध्वंस कार्य।
खुली खाई प्रणाली द्वारा सीवर लाइन, जल लाइन, जल निकासी और विद्युत केबलिंग आदि बिछाना।
ईंट/पत्थर का काम।
आरएमसी बैचिंग प्लांट का संचालन।
प्रमुख वेल्डिंग और गैस-कटिंग कार्य।
हालांकि, एमईपी कार्यों (यांत्रिक, विद्युत और प्लंबिंग) के लिए छोटी वेल्डिंग गतिविधियों की अनुमति होगी।
पेंटिंग, पॉलिशिंग और वार्निशिंग कार्य आदि।
सीमेंट, प्लास्टर/अन्य कोटिंग्स, मामूली आंतरिक मरम्मत/रखरखाव को छोड़कर।
टाइल, पत्थर और अन्य फर्श सामग्री की कटिंग/ग्राइंडिंग और फिक्सिंग, मामूली आंतरिक मरम्मत/रखरखाव को छोड़कर।
प्रोजेक्ट साइट के अंदर या बाहर कहीं भी सीमेंट, फ्लाई ऐश, ईंटें, रेत, मुर्रम, कंकड़, बजरी आदि जैसे धूल उत्पन्न करने वाले पदार्थों का स्थानांतरण, लोडिंग/अनलोडिंग।
कच्ची सड़कों पर निर्माण सामग्री ले जाने वाले वाहनों की आवाजाही।
विध्वंस अपशिष्ट का किसी भी प्रकार का परिवहन।
(ii) उपरोक्त 1(i) में सूचीबद्ध गतिविधियों के अलावा, निर्माण संबंधी सभी गतिविधियां जो अपेक्षाकृत कम प्रदूषणकारी/कम धूल उत्पन्न करती हैं, उन्हें एनसीआर में निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों, धूल नियंत्रण/निरोध मानदंडों और आयोग द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों के अनुपालन के अधीन जारी रखने की अनुमति दी जाएगी।
(iii) उपरोक्त 1(i) में सूचीबद्ध गतिविधियों सहित निर्माण एवं विध्वंस संबंधी सभी गतिविधियां केवल निम्नलिखित श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए ही जारी रखने की अनुमति दी जाएगी, हालांकि निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियमों, धूल नियंत्रण/निरोध मानदंडों और आयोग द्वारा समय-समय पर जारी निर्देशों के अनुपालन के अधीन:
रेलवे सेवाओं और स्टेशनों से संबंधित परियोजनाएं
मेट्रो रेल सेवाओं और स्टेशनों से संबंधित परियोजनाएं
हवाई अड्डे और अंतरराज्यीय बस टर्मिनल
राष्ट्रीय सुरक्षा/रक्षा संबंधी गतिविधियां/राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाएं
अस्पताल/स्वास्थ्य सुविधाएं
रेखीय सार्वजनिक परियोजनाएं जैसे राजमार्ग, सड़कें, फ्लाईओवर, ओवरब्रिज, विद्युत पारेषण/वितरण, पाइपलाइन, दूरसंचार सेवाएं आदि
स्वच्छता परियोजनाएं जैसे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और जल आपूर्ति परियोजनाएं आदि
उपरोक्त परियोजना श्रेणियों से संबंधित और उनका पूरक सहायक गतिविधियां।
2. पूरे एनसीआर में स्टोन क्रशर का संचालन बंद करें।
3. पूरे एनसीआर में सभी खनन और संबंधित गतिविधियाँ बंद करें।
4. एनसीआर राज्य सरकार/जीएनसीटीडी दिल्ली और गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर जिलों में बीएस-III पेट्रोल और बीएस-IV डीजल से चलने वाले चार पहिया वाहनों (एलएमवी) के संचालन पर सख्त प्रतिबंध लगाएं।
नोट: दिव्यांगजनों को बीएस-III पेट्रोल / बीएस-IV डीजल से चलने वाले कम भार वाले वाहनों को चलाने की अनुमति होगी, बशर्ते कि ये वाहन विशेष रूप से उनके लिए अनुकूलित हों और केवल उनके निजी उपयोग के लिए ही चलाए जाते हों।
5. दिल्ली में पंजीकृत डीजल से चलने वाले मध्यम मालवाहक वाहनों (एमजीवी) पर, जो बीएस-IV मानकों या उससे नीचे के हों, सख्त प्रतिबंध लगाएगा, सिवाय उन वाहनों के जो आवश्यक वस्तुओं का परिवहन कर रहे हों या आवश्यक सेवाएं प्रदान कर रहे हों।
6. दिल्ली में पंजीकृत बीएस-IV डीजल से चलने वाले मालवाहक वाहनों (एलसीवी) को, जो दिल्ली के बाहर पंजीकृत हों, दिल्ली में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जाएगी, सिवाय उन वाहनों के जो आवश्यक वस्तुओं का परिवहन कर रहे हों या आवश्यक सेवाएं प्रदान कर रहे हों।
7. (i) एनसीआर राज्य सरकारों और दिल्ली में पंजीकृत एनसीआर राज्य सरकारों को दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद और गौतम बुद्ध नगर जिलों में कक्षा 5 तक के बच्चों के लिए स्कूलों में कक्षाएं अनिवार्य रूप से “हाइब्रिड” मोड में संचालित करनी होंगी, यानी भौतिक और ऑनलाइन दोनों मोड में (जहां भी ऑनलाइन मोड संभव हो)।
(ii) एनसीआर राज्य सरकारें एनसीआर के अन्य क्षेत्रों में भी कक्षा 5 तक के छात्रों के लिए कक्षाएं उपरोक्त “हाइब्रिड” मोड में संचालित करने पर विचार कर सकती हैं।
नई दिल्ली: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) ने दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा से संबंधित अंतरसरकारी समिति के 20वें सत्र के दौरान ‘नाट्यशास्त्र – सिद्धांत और व्यवहार का संश्लेषण’ शीर्षक से एक अकादमिक कार्यक्रम का आयोजन किया। विद्वानों ने एक जीवंत ज्ञान प्रणाली के रूप में ‘नाट्यशास्त्र’ के बारे में चर्चा की, जो भारत की प्रदर्शन कला परंपराओं में सिद्धांत और व्यवहार को एकीकृत करना जारी रखे हुए है। कार्यक्रम स्थल पर आईजीएनसीए मीडिया सेंटर द्वारा तैयार की गई यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड रजिस्टर में नाट्यशास्त्र के शिलालेख पर एक लघु फिल्म दिखाई गई, जिसे खूब सराहा गया।
नाट्यशास्त्र की प्रासंगिकता पर अध्यक्षीय भाषण पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह ने दिया। उन्होंने विभिन्न काल एवं संस्कृतियों में इस ग्रंथ की निरंतर प्रासंगिकता और समकालीन कलात्मक अभ्यास, सौंदर्य चिंतन एवं सांस्कृतिक विमर्श को सूचित करने की इसकी निरंतर क्षमता पर प्रकाश डालते हुए इसकी स्थायी सार्वभौमिकता के बारे मे बताया।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने नाट्यशास्त्र पर एक बंद सिद्धांत के बजाय एक बौद्धिक निरंतरता के रूप में विचार किया और इसके संवाद वाले उस स्वरूप पर जोर दिया जो लगातार पुनर्व्याख्या व नवीनीकरण को आमंत्रित करता है। साथ ही, उन्होंने इसे एक ऐसे जीवंत ज्ञान प्रणाली के रूप में निरूपित किया जो सिद्धांत एवं व्यवहार को एकीकृत करती है और जिसकी वैचारिक कठोरता एवं प्रदर्शन तर्क बदलते ऐतिहासिक व सांस्कृतिक संदर्भों में कलात्मक रचना, प्रसारण एवं व्याख्या को समझने के लिए एक गतिशील ढांचा प्रदान करते हैं।
डॉ. संध्या पुरेचा ने नाट्यशास्त्र का एक व्यापक अवलोकन प्रस्तुत किया, जिसमें इसकी व्यवस्थित संरचना, दार्शनिक गहराई और व्यापक अखिल भारतीय प्रभाव पर ध्यान दिलाया गय। साथ ही, उन्होंने यह भी बताया कि कैसे इस ग्रंथ ने विभिन्न क्षेत्रों और पीढ़ियों में विविध कलात्मक परंपराओं और प्रदर्शन प्रथाओं को प्रभावित किया है। श्री चित्तरंजन त्रिपाठी ने ‘समकालीन रंगमंच और नाट्यशास्त्र’ के बारें में बात की। उन्होंने इस बात को समझाया कि कैसे इस ग्रंथ में निहित शास्त्रीय नाट्य के सिद्धांत आधुनिक रंगमंचीय अभिव्यक्तियों को आकार देना, प्रदर्शन के तरीकों को प्रभावित करना और समकालीन रंगमंच प्रशिक्षण एवं निर्माण में शैक्षणिक अभ्यासों को सूचित करना जारी रखे हुए हैं।
प्रोफेसर सुधीर लाल ने अपने भाषण में कहा कि नाट्यशास्त्र कलाओं का एक ऐसा व्यापक दृष्टिकोण पेश करता है, जो नाटक, नृत्य एवं संगीत के सिद्धांतों को संहिताबद्ध करता है और उन्हें एक ऐसे व्यापक आध्यात्मिक ढांचे में रखता है जो इंसानी अनुभव को दिखाता है और मोक्ष की ओर इशारा करता है।
डॉ. योगेश शर्मा ने ‘नाट्यांग: पाठ का वैचारिक ढांचा’ विषय पर एक ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने उन मूलभूत तत्वों को समझाया जो भारतीय कलाओं में प्रदर्शन सौंदर्यशास्त्र को आधार देते हैं और अर्थ निर्माण में मार्गदर्शन करते हैं। उन्होंने बताया कि कैसे इन घटकों का जटिल तालमेल नाटक, नृत्य और संगीत की सूक्ष्म अभिव्यक्ति, भावनात्मक गहराई एवं संरचनात्मक सामंजस्य को प्रभावित करता है, जिससे नाट्यशास्त्र की एक सैद्धांतिक मार्गदर्शक और कलात्मक रचना के लिए एक व्यावहारिक ढांचे के रूप में स्थायी प्रासंगिकता साबित होती है।
वक्ताओं ने बैठक में हुई चर्चाओं के संबंध में संक्षिप्त विचार रखे और शास्त्रीय ज्ञान प्रणालियों के साथ लगातार जुड़ाव के स्थायी महत्व पर जोर दिया। इस कार्यक्रम ने नाट्यशास्त्र को परंपरा और आधुनिकता को जोड़ने वाले एक मौलिक बौद्धिक एवं कलात्मक संसाधन के रूप में फिर से स्थापित किया और भारत की सांस्कृतिक विरासत पर सूचित एवं गहन चर्चा को बढ़ावा देने के प्रति आईजीएनसीए की अटूट प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। इस सत्र में संस्कृति प्रेमी, विद्वान और कलाकार शामिल हुए, जिससे एक ऐसा विविध समूह एक साथ आया जो भारत की शास्त्रीय प्रदर्शन कलाओं की निरंतर प्रासंगिकता का पता लगाने में गहराई से जुड़ा हुआ है।
इस कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्म विभूषण पुरस्कार विजेता, विद्वान, गुरु और राज्यसभा की पूर्व सदस्य डॉ. सोनल मानसिंह ने की। इस कार्यक्रम में जाने-माने विद्वान और संस्थानों के प्रमुख – आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी; संगीत नाटक अकादमी की अध्यक्षा डॉ. संध्या पुरेचा; राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक श्री चित्तरंजन त्रिपाठी; आईजीएनसीए के कलाकोश के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) सुधीर कुमार लाल और आईजीएनसीए के कलाकोश के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. योगेश शर्मा – शामिल हुए।
भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन इंडिगो के अकुशल संचालन के चलते पिछले दिनों देशभर में भारी उड़ान संकट पैदा हो गया। हालांकि यह संकट मुख्य रूप से 2 दिसंबर 2025 से शुरू हुआ और 5 दिसंबर को अपने चरम पर जा पहुंचा था जब इंडिगो ने देश भर की अपनी लगभग एक हज़ार से अधिक उड़ानें रद्द कर दी थीं । जिससे देश भर में हज़ारों यात्री विभिन्न शहरों में अकारण ही फंस गए थे । इस घटना ने केवल यात्रियों को ही परेशान नहीं किया, बल्कि एविएशन सेक्टर की कार्यकुशलता पर भी कई सवाल खड़े कर दिए। अभी तक पूरे देश में उड़ानों की स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है। मुंबई,इंदौर,दिल्ली हैदराबाद व बेंगलुरु जैसे कुछ महत्वपूर्ण नगरों की इंडिगो उड़ान सेवाएं अभी भी प्रभावित होने के समाचार हैं। हवाई अड्डों पर जहां सामान्य दिनों में पहले ही भारी भीड़ इकट्ठा हो रही थी पिछले दिनों की अफ़रा तफ़री के दौरान इन्हीं उड़ान प्रभावित हवाई अड्डों पर तो भीड़ का कुछ ऐसा दृश्य दिखाई दिया जैसा कि छठ-दिवाली व दशहरा जैसे त्योहारों के दौरान रेलवे स्टेशन पर नज़र आता है।
हवाई संचालन में आये इस तरह के असामान्य व्यवधान के कई कारण बताये जा रहे हैं। इनमें नए पायलट और क्रू रेस्ट नियमों का प्रभाव, तकनीकी ख़राबी और ऑपरेशनल लापरवाही, मौसम, भीड़भाड़ और उड़ान शेड्यूल में बदलाव जैसी वजहें मुख्य रूप से शामिल हैं। इस अव्यवस्था के चलते देश भर में विमान यात्रियों को जिस शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना को सहन करना पड़ा वह तो अपनी जगह पर परन्तु दुर्भाग्यपूर्ण बात यह कि इस कई एयरलाइंस कंपनियों ने इसी अव्यवस्था का फ़ायदा उठाकर देश के कई प्रमुख हवाई रूट्स पर किराए 2 से 10 गुना तक मंहगे कर दिए। उदाहरण स्वरूप दिल्ली-बेंगलुरु का सामान्य किराया जो 10,000 से 15,000 के मध्य होता था वह बढ़कर 70,000 तक और कुछ मामलों में तो 1 लाख से ज़्यादा और एयर इंडिया पर नॉन स्टॉप फ़्लाइट का 1.02 लाख तक पहुँच गया था। इसी तरह दिल्ली-मुंबई का किराया 25,000से 60,000 तक और कुछ विमानों में 93,000 से भी अधिक हो गया था। जबकि एयरलाइंस कंपनियों द्वारा दिल्ली-चेन्नई के 40,000 से लेकर 80,000+ तक वसूल किये गये। दिल्ली-पुणे, गोवा, लखनऊ पर भी 20,000 से 50,000 से भी अधिक की टिकट बेची गयी। डिमांड-सप्लाई गैप के कारण ख़ासकर इंडिगो की 60%+ मार्केट शेयर वाली फ़्लाट्स कैंसिल होने के कारण यात्रियों को दूसरी एयरलाइंस में शिफ़्ट होना ही था। इसी का लाभ एयर इण्डिया ,एयर इण्डियाएक्सप्रैस,इस्पाईस जेट व अकासा एयर जैसी कई विमानन कंपनियों ने उठाया। हालांकि बाद में सरकार ने किराए की इस बेतहाशा बढ़ोतरी पर अस्थायी कैप लगाई ताकि अनुचित किराया बढ़ोतरी रोकी जा सके।
अब विमानन क्षेत्र में मची इसी अफ़रातफ़री के सन्दर्भ में ज़रा नरेंद्र मोदी का वह कथन याद कीजिये जब मार्च 2014 में सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुये उन्होंने कहा था कि “मैं चाहता हूँ कि हमारे गाँव के ग़रीब, जो हवाई चप्पल पहनते हैं, वो हवाई जहाज़ में बैठें। मैं ये सपना देखता हूँ कि जिस ग़रीब की झोली में कभी दो जून की रोटी भी मुश्किल से आती थी, वो हवाई जहाज़ में सफ़र करे। क्या ये सपना देखना गुनाह है?” मोदी ने यह ‘भावनात्मक जुमले ‘कई रैलियों में अलग-अलग शब्दों में दोहराये। यह भी सच है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत में हवाई अड्डों के विकास और संचालन में काफ़ी प्रगति हुई है। मुख्य रूप से क्षेत्रीय संपर्क योजना (उड़ान ) के तहत कई नए हवाई अड्डे शुरू किए गए हैं, साथ ही पुराने बंद पड़े या कम उपयोग वाले हवाई अड्डों को पुनर्जीवित भी किया गया है। नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के रूप में जहाँ इसी वर्ष मुंबई का दूसरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा शुरू किया गया है वहीँ महर्षि बाल्मीकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट के नाम से अयोध्या इंटरनेशनल एयरपोर्ट, दोनी पोलो एयरपोर्ट, ईटानगर (अरुणाचल प्रदेश), मोपाह एयरपोर्ट, गोवा (गोवा का दूसरा एयरपोर्ट), देवघर एयरपोर्ट, झारखंड, कुशीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, उत्तर प्रदेश, पाक्योंग एयरपोर्ट, सिक्किम (सिक्किम का पहला एयरपोर्ट),पसीघाट, जीरो, होलोंगी, तेजू (अरुणाचल प्रदेश); आगत्ती (लक्षद्वीप),रीवा (मध्य प्रदेश), अंबिकापुर (छत्तीसगढ़), सहारनपुर (उत्तर प्रदेश), सतना और दतिया (मध्य प्रदेश),अलीगढ़, आज़मगढ़, चित्रकूट, मुरादाबाद, श्रावस्ती (उत्तर प्रदेश) आदि अनेक नये एयर पोर्ट विकसित किये गए हैं तो दिल्ली, लखनऊ, पुणे, ग्वालियर, जबलपुर जैसे कई हवाई अड्डों पर नये टर्मिनल का भी निर्माण किया गया है।
अब सवाल यह है कि विमानन क्षेत्र में होने वाले इस विकास से ग़रीबों को फ़ायदा हुआ या विमानन कंपनियों को ? क्या आज इस बात की कल्पना की जा सकती है कि पैरों में हवाई चप्पल धारण करने वाली यानी देश की ग़रीब जनता या दूसरे शब्दों में वे 80 करोड़ लोग जिन्हें सरकार ने 5 किलो मुफ़्त राशन पर आश्रित बना दिया है ऐसे लोग जो दस हज़ार रूपये की हवाई यात्रा की टिकट भी नहीं ख़रीद सकते वे लोग वही टिकट विमानन संचालन संकट के समय भला सत्तर हज़ार की कैसे ख़रीद सकते हैं ? यदि नहीं तो मोदी के उन ‘जुमलों ‘ की क्या हक़ीक़त जिसमें वे दो जून की रोटी भी मुश्किल से खाने वाले ग़रीब की हवाई यात्रा की ‘जुमलेबाज़ी ‘ करते हैं ? हाँ विमानन क्षेत्र में हो रहे विस्तार से स्पष्ट रूप से विमानन कंपनियों को फ़ायदे ज़रूर हुये हैं। इंडिगो जैसी कंपनियां ही 66% से अधिक बाज़ार पर क़ब्ज़ा कर चुकी हैं। इंडिगो ने तो अपनी स्थापना के तीन वर्षों में ही लाभ कमाना शुरू कर दिया, और लागत नियंत्रण (जैसे ईंधन दक्षता) से सालाना 850 करोड़ रुपये की बचत की। देश के अनेक छोटे बड़े हवाई अड्डों का संचालन व रखरखाव अडानी की कंपनियों द्वारा किया जा रहा है। जिसका फ़ायदा अडानी को पहुँच रहा है। इस बीच में हवाई चप्पलों वाला या 2 वक़्त की रोटी भी न खाने पाने वाले किसी व्यक्ति की हवाई यात्रा की गुंजाईश ही कहाँ नज़र आती है ? इस तरह की ‘जुमलेबाज़ियाँ’ आकर्षक,लोक लुभावन व भावनाओं को छूने वाली तो ज़रूर हो सकती हैं परन्तु इनका वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं। सच्चाई तो यह है कि गत दिनों आये विमान संकट ने हवाई चप्पल वालों की हवाई यात्रा जैसे ‘जुमले’ही हवा हवाई कर दिये।
राजस्थान में भजनलाल सरकार 15 दिसम्बर 2025 को अपने कार्यकाल के दो साल पूरे करने जा रही है। भजनलाल शर्मा ने 15 दिसंबर 2023 को अपने जन्मदिन के दिन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में राजस्थान के 14वें मुख्यमंत्री के रूप मे शपथ ली थी। किसी भी सरकार की गति, प्रगति और अर्जित उपलब्धियों के लेखे जोखे के लिए हालांकि दो साल पर्याप्त माने जा सकते है। सत्ता पक्ष इसे उपलब्धियों से भरा हुआ बता रहा है, वहीं विपक्ष का कहना है कि पिछले दो साल में सरकार हर मोर्चे पर विफल साबित हुई है। भजनलाल सरकार का दावा है कि हम जनता के सेवक के रूप में कार्य कर रहे हैं और प्रदेश के विकास का पहिया बिना रुके, बिना थमे आगे बढ़ रहा है। चुनाव के समय जनता से किए गए 392 संकल्पों में से 274 या तो पूरे किए जा चुके हैं या प्रगति पर हैं। वहीं विपक्ष ने दो साल के शासन को विफलताओं से भरा करार दिया है। विपक्षी नेताओं का कहना है इस अवधि में भ्रष्टाचार और और दुष्कर्म के अपराधों में प्रदेश सिरमौर है। युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने में सरकार विफल रही है। चहुंओर अराजकता का माहौल है। कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा ने आरोप लगाया कि यह समय ड्रामा, नाकामियों और अधूरे वादों से भरा रहा।
राजस्थान सरकार अपने कार्यकाल के दो साल की उपलब्धियों का ढोल ढमाकों के साथ जश्न मनाने जा रही है। यह कोई नई बात नहीं है, हर सरकार अपनी उपलब्धियों का जश्न मनाती आई है तो भजन लाल सरकार क्यों पीछे रहेगी। मगर देखने समझने की बात तो यह है कि क्या जनता इन उपलब्धियों से संतुष्ट है। एक जनकल्याणकारी सरकार का दायित्व है, जनता को स्वच्छ प्रशासन मिले। सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था आदि की आधारभूत सुविधा बिना रोकटोक और आसानी से मिले। सरकारी दफ्तरों में उनके वाजिब काम हो। अब यह जनता को देखना है कि उसे इन कल्याणकारी कार्यों की सुविधाएं समयबद्धता से मिल रही है या नहीं।
मुख्यमंत्री प्रदेश के आर्थिक विकास और आधारभूत ढांचे को जन आंकाक्षाओं के अनुरूप मजबूत बनाने में जुटे हैं। अपने दो साल के कार्यकाल की उपलब्धियों पर मुख्यमंत्री ने कहा है, हमने जनता-जनार्दन से जो काम पांच साल में पूरे करने का वादा किया था उनमें से 70 प्रतिशत कार्य केवल दो वर्ष में ही पूरे किए जा चुके हैं। दो वर्षों की बजट घोषणाओं में से 73 प्रतिशत घोषणाएं या तो पूर्ण हो चुकी है या प्रगतिरत हैं। हमारी सरकार ने राज्य की प्राथमिकताओं को समझते हुए पानी- बिजली के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किए हैं। हमने किसान को अन्नदाता के साथ ऊर्जादाता बनाया है तथा ऊर्जा में किए गए नवाचारों से अब हम प्रदेश के 22 जिलों में दिन में बिजली उपलब्ध करा रहे हैं। किसान सम्मान निधि के तहत किसानों को 9 हजार रुपये की राशि दी जा रही है जिसे आगामी समय में चरणबद्ध रूप से 12 हजार रुपये किया जाएगा। दो साल के कार्यकाल में अब तक एक भी पेपरलीक नहीं हुआ है। लगभग 92 हजार सरकारी नौकरियां दी जा चुकी हैं और 20 हजार युवाओं को इसी माह में नियुक्तियां दी जाएंगी। पांच साल में चार लाख सरकारी नौकरी दी जाएगी । राइजिंग राजस्थान के माध्यम से 35 लाख करोड़ के एमओयू किए गए जिनमें से 8 लाख करोड़ रुपये के एमओयू की ग्राउंड ब्रेकिंग की जा चुकी है। सरकार द्वारा निजी क्षेत्र में ढाई लाख रोजगार के अवसर प्रदान किए गए हैं। आगामी समय में युवाओं के लिए युवा पॉलिसी लाई जा रही है। सरकार चाहती हैं कि युवा रोजगार प्राप्त करने के साथ रोजगार प्रदाता भी बनें।
सरकार का दावा है कि इस अवधि में सरकार लगातार जनता के बीच गई और जन हितैषी कार्यों को अमलीजामा पहनाया। इस अवधि में भजनलाल सरकार के किसी भी मंत्री के दामन पर कोई दाग नहीं लगा, हालांकि अधिकारियों की कार्यशैली पर अवश्य सवालिया निशान लगे। सरकार के दावे के विपरीत विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने 2 साल में कुछ नहीं किया जिससे हर वर्ग दुखी और परेशान है। कानून व्यवथा छिन्न भिन्न है। रोजगार देने का वादा पूरा नहीं हुआ है। आमजन बेहाल है ऐसे में खुशहाली की बात करना जनता के जख्मों पर नमक छिड़कना है। कांग्रेस ने भजनलाल सरकार को पर्ची सरकार घोषित किया मगर इसी पर्ची सरकार ने दो साल में राजस्थान को अग्रिम पंक्ति का राज्य बनाने के लिए न केवल नीतिगत सुधारों की पहल की अपितु आम नागरिक के चेहरे पर मुस्कान लाने के लिए समर्पित भाव से प्रयास किए हैं।
आम आदमी की सोच है प्रदेश के बहुमुखी विकास में तीन चीजें बाधक बनी हुई है। भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और कुशासन प्रगति और विकास के दुश्मन के रूप में उभरे है। जब तक इन पर काबू नहीं पाया जायेगा तब तक विकास और प्रगति एकांगी होगी। हर सरकार लोक कल्याण का वादा करती है मगर लोक कल्याण के मार्ग में अवरोध बने इन कारकों को समाप्त करने की दिशा में कोई ठौस कारवाही नहीं करती। चूँकि राजनेताओं के हित इनसे जुड़े है इसलिए इन बुराइयों को समाप्त नहीं किया जा सकता। जब तक समाज से यह बीमारी पूरी तरह खत्म नहीं होगी, हम भ्रष्टाचार की गंगा में गोते लगते रहेंगे।
संजय गांधी का जन्म 14 दिसम्बर 1946 को नई दिल्ली हुआ था। वे धूमकेतु की तरह उदय हुए और उसी की तरह अचानक अस्त हो गए। वे भारत के एक राजनेता थे और भारत की प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के छोटे पुत्र थे। मेनका गांधी उनकी पत्नी हैं और वरुण गांधी उनके पुत्र। भारत में आपातकाल के समय उनकी भूमिका बहुत विवादास्पद रही। अल्पायु में ही एक विमान दुर्घटना में उनकी मौत हो गयी।
इनके पिता फिरोज गांधी जी थे जो कि पारसी समुदाय से थे। जिन्होनें शादी के बाद अपना नाम परिवर्तित करके फिरोज गांधी कर लिया था। इनके पिता पेशे से पारसी राजनेता एवं पत्रकार थे, वे लोकसभा के सांसद भी रहे। संजय गांधी का मूल निवास स्थान मुम्बई था, क्योंकि यहीं पर उनके पिता फिरोज गांधी का जन्म हुआ था। संजय गांधी के बडे भाई का नाम राजीव गांधी था। इंदिरा गांधी जी ने,फिरोज गांधी से शादी अपने पिता एवं देश के पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की मर्जी के खिलाफ की थी।
अपने बड़े भाई राजीव की तरह , गांधी ने दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल, देहरादून के वेलहम बॉयज स्कूल और फिर देहरादून के दून स्कूल में शिक्षा प्राप्त की । गांधी ने स्विट्जरलैंड के एक अंतरराष्ट्रीय बोर्डिंग स्कूल, इकोले डी’ह्यूमनिटी में भी शिक्षा प्राप्त की। गांधी ने विश्वविद्यालय में दाखिला नहीं लिया, बल्कि ऑटोमोटिव इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाया और इंग्लैंड के क्रू में रोल्स-रॉयस के साथ तीन साल की अप्रेंटिसशिप की। उन्हें स्पोर्ट्स कारों में बहुत रुचि थी। 1976 में, उन्होंने पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया और एरोबेटिक्स में कई पुरस्कार जीते।
1971 में, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल ने भारत के मध्यम वर्ग के लिए एक किफायती, स्थानीय स्तर पर निर्मित कार के उत्पादन का प्रस्ताव रखा। जून 1971 में, मारुति मोटर्स लिमिटेड (अब मारुति सुजुकी ) नामक कंपनी को कंपनी अधिनियम के तहत शामिल किया गया, और संजय गांधी को इसका प्रबंध निदेशक बनाया गया, जबकि उनके पास पहले कोई अनुभव, डिजाइन प्रस्ताव या किसी भी निगम से कोई संबंध नहीं था। इंदिरा गांधी को आलोचनाओं का सामना करना पड़ा, लेकिन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध में पाकिस्तान पर विजय ने जनता का ध्यान इस ओर मोड़ दिया। कंपनी ने उनके जीवनकाल में कोई वाहन नहीं बनाया। प्रगति प्रदर्शित करने के लिए एक प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुत किए गए परीक्षण मॉडल की आलोचना हुई। जनता की धारणा गांधी के खिलाफ हो गई, और कई लोग बढ़ते भ्रष्टाचार के बारे में अटकलें लगाने लगे।
गांधी ने तब पश्चिम जर्मनी की वोक्सवैगन एजी से संभावित सहयोग, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और “पीपुल्स कार” के भारतीय संस्करण के संयुक्त उत्पादन के लिए संपर्क किया, ताकि वोक्सवैगन की बीटल के साथ विश्वव्यापी सफलता को दोहराया जा सके । आपातकाल के दौरान, गांधी राजनीति में सक्रिय हो गए और मारुति परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई। भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। अंततः, 1977 में जनता सरकार सत्ता में आई और “मारुति लिमिटेड” का परिसमापन कर दिया गया।
नई सरकार ने न्यायमूर्ति अलक चंद्र गुप्ता की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया , जिसने मारुति मामले पर एक बेहद आलोचनात्मक रिपोर्ट दी। 1980 में उनकी मृत्यु के एक वर्ष बाद, इंदिरा गांधी के कहने पर, केंद्र सरकार ने मारुति लिमिटेड को पुनर्जीवित किया और एक नई कंपनी के लिए एक सक्रिय सहयोगी की तलाश शुरू की। नेहरू-गांधी परिवार के मित्र और उद्योग जगत के दिग्गज वी . कृष्णमूर्ति के प्रयासों से उसी वर्ष मारुति उद्योग लिमिटेड की स्थापना हुई।
जापानी कंपनी सुजुकी से भी भारत में निर्मित होने वाली अपनी कार के डिजाइन और व्यवहार्यता प्रस्तुत करने के लिए संपर्क किया गया। जब सुजुकी को पता चला कि भारत सरकार ने वोक्सवैगन से भी संपर्क किया है, तो उसने भारत की पहली जनमानस कार ( मारुति 800 ) के उत्पादन की दौड़ में जर्मन कंपनी को पछाड़ देने के लिए हर संभव प्रयास किया। इसने सरकार को उनके ‘मॉडल 796’ का एक व्यवहार्य डिज़ाइन प्रदान किया, जो जापान और पूर्वी एशियाई देशों में भी सफल रहा।
मार्च 1977 में आपातकाल हटने के बाद संजय ने भारतीय संसद के लिए अपना पहला चुनाव लड़ा। इस चुनाव में संजय को न केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र अमेठी में करारी हार का सामना करना पड़ा , बल्कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी का पूरे उत्तरी भारत में सफाया हो गया। हालांकि, जनवरी 1980 में हुए अगले आम चुनाव में संजय ने कांग्रेस (आई) के लिए अमेठी सीट जीत ली।
उनकी मृत्यु से ठीक एक महीने पहले, मई 1980 में उन्हें कांग्रेस पार्टी का महासचिव नियुक्त किया गया था।
23 जून 1980 को सुबह 8:10 बजे, गांधी जी एक कलाबाजी करतब दिखाते हुए अपने विमान पर नियंत्रण खो बैठे और नई दिल्ली के राजनयिक एन्क्लेव में दुर्घटनाग्रस्त हो गए । एकमात्र अन्य यात्री, कैप्टन सुभाष सक्सेना की भी मृत्यु हो गई। गांधी जी का शव बरामद कर हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया।