यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना पर मोदी ने शाेक जताया

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यमुना एक्सप्रेसवे माइलस्टोन 127 पर आठ बसों और तीन कारों की टक्कर हो गई, जिसमें तेरह लोगों की मौत हो गई और आग लग गई। 25 लोग घायल हो गए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के मथुरा में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति गहरा शोक व्यक्त किया है। श्री मोदी ने दुर्घटना में घायल हुए लोगों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना भी की है।

प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (पीएमएनआरएफ) से प्रत्येक मृतक के परिजनों को 2 लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी जाएगी। घायलों को 50,000 रुपये दिए जाएंगे।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने एक्‍स पर पोस्ट किया;

उत्तर प्रदेश के मथुरा में यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई दुर्घटना में हुई जानमाल की हानि अत्यंत पीड़ादायक है। मेरी संवेदनाएं उन सभी के साथ हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खोया है। मैं घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने कहा, “मृतकों के परिजनों को पीएमएनआरएफ से 2 लाख रुपये की अनुग्रह राशि दी जाएगी। घायलों को 50,000 रुपये दिए जाएंगे।”

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनपद मथुरा में हुए सड़क हादसे का संज्ञान लेते हुए जनहानि पर गहरा शोक व्यक्त किया है। मुख्यमंत्री जी ने दिवंगतों के शोकाकुल परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की है तथा अधिकारियों को निर्देशित किया है कि घायलों का तत्काल, समुचित एवं निःशुल्क उपचार सुनिश्चित करते हुए उन्हें हरसंभव सहायता उपलब्ध कराई जाए।

मुख्यमंत्री जी ने हादसे में दिवंगतों के परिजनों को ₹दो -दो लाख तथा घायलों को ₹50-50 हजार की आर्थिक सहायता प्रदान किए जाने के निर्देश दिए हैं।

कम विजिबिलिटी के कारण मथुरा में यमुना एक्सप्रेसवे माइलस्टोन 127 पर आठ बसों और तीन कारों की टक्कर हो गई। इसमेंआग लग गई।इससे तेरह लोगों की मौत हो गई । 25 लोग घायल हो गए ।घायलों को अस्पताल ले जाया गया। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि उत्तर प्रदेश में दिल्ली-आगरा एक्सप्रेसवे पर घने कोहरे के कारण हुए एक भयानक चेन एक्सीडेंट में 13 लोगों की मौत हो गई और लगभग 75 अन्य घायल हो गए, जब मंगलवार तड़के आठ बसें और तीन कारें आपस में टकरा गईं और उनमें आग लग गई।  हादसा यमुना एक्सप्रेसवे के आगरा-नोएडा कैरिजवे पर हुआ, जहां घने कोहरे के कारण विजिबिलिटी बहुत कम हो गई थी। गाड़ियां एक के बाद एक टकराती गईं, जिससे एक बड़ी आग लग गई जिसने कुछ ही मिनटों में बसों और कारों को अपनी चपेट में ले लिया, जिससे यात्रियों को बचने का बहुत कम समय मिला!

टक्कर इतनी ज़ोरदार थी कि सभी गाड़ियों में लगभग तुरंत आग लग गई, जिससे यात्री अंदर फंस गए और घटनास्थल पर अफरा-तफरी मच गई। चश्मदीदों ने बताया कि जैसे ही आग एक गाड़ी से दूसरी गाड़ी में तेज़ी से फैली, अराजकता का माहौल था। रिपोर्ट के अनुसार, यात्रियों ने बचने की कोशिश की और मदद के लिए चीख-पुकार मच गई।

हादसे के तुरंत बाद फायर ब्रिगेड, पुलिस टीमें और एम्बुलेंस घटनास्थल पर पहुंचीं। दमकलकर्मियों ने आग बुझाई, जबकि बचाव टीमों ने बचे हुए लोगों को बाहर निकाला और घायलों को पास के अस्पतालों में पहुंचाया।

लगभग 25 लोगों को इलाज के लिए मथुरा और पड़ोसी जिलों के अस्पतालों में ले जाया गया। कई लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है।

एक्सप्रेसवे के प्रभावित हिस्से पर ट्रैफिक घंटों तक रुका रहा क्योंकि इमरजेंसी टीमों ने मलबा हटाया। घने कोहरे की स्थिति में दुर्घटना के कारणों का पता लगाने के लिए जांच शुरू कर दी गई है। उत्तर प्रदेश में घना कोहरा छाया हुआ है

यह हादसा तब हुआ जब सोमवार सुबह उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में घना कोहरा और धुंध छाई हुई थी, इससे शहरों में विजिबिलिटी काफी कम हो गई थी।आगरा घने कोहरे की चादर में लिपटा रहा, जिससे ताजमहल कई घंटों तक दिखाई नहीं दिया। वाराणसी, प्रयागराज, मैनपुरी और मुरादाबाद से भी ऐसी ही खबरें आईं, जहां खराब विजिबिलिटी के कारण यात्रियों को अपनी गाड़ियों की स्पीड कम करनी पड़ी।

राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति मुर्मु ने किया परमवीर दीर्घा का उद्घाटन

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज 16 दिसंबर विजय दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में परमवीर दीर्घा का उद्घाटन किया। इस गैलरी में परम वीर चक्र से सम्मानित सभी 21 विजेताओं के चित्र प्रदर्शित हैं। गैलरी का उद्देश्य आगंतुकों को हमारे उन राष्ट्रीय नायकों के बारे में जानकारी प्रदान करना है जिन्होंने हमारे राष्ट्र की रक्षा में अदम्य संकल्प और साहस का प्रदर्शन किया। यह उन वीर योद्धाओं की स्मृति को सम्मान देने की एक पहल है जिन्होंने मातृभूमि की सेवा में अपने प्राणों की आहुति दी।

जिन गलियारों में यह परम वीर दीर्घा बनाई गई है, वहां पहले ब्रिटिश सहायक अधिकारियों के चित्र लगे होते थे। भारतीय राष्ट्रीय नायकों के चित्र प्रदर्शित करने की यह पहल औपनिवेशिक मानसिकता को त्यागने और भारत की समृद्ध संस्कृति, विरासत और शाश्वत परंपराओं को गर्व से अपनाने की दिशा में एक सार्थक कदम है।

परम वीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य सम्मान है जो युद्ध के दौरान असाधारण वीरता, साहस और आत्मबलिदान के लिए प्रदान किया जाता है।

वीआईपी दर्शन पर सुप्रिम आदेश, निर्णय केंद्र करे

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अशोक मधुप

वरिष्ठ  पत्रकार

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मंदिरों में ‘वीआईपी दर्शन’ सुविधा को चुनौती देने वाली याचिका भले ही खारिज कर दी, किंतु इस याचिका पर कोर्ट द्वारा कही गई बातों की गूंज दूर तक जाएगी। यह  गूंज केंद्र सरकार को  विवश करेगी कि वह मंदिरों में हाने वाले वीवीआईपी  दर्शन पर  रोक लगाने वाला निर्णय लें ।  कार्ट की ये गूंज  आने वाले समय  में मंदिरों के वीवीआईपी दर्शन कर रोक लगाने का रास्ता प्रशस्त करेगी।

मुख्य न्यायाधीश  संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है। इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है। यह याचिका मंदिरों की तरफ से वसूले जाने वाले वीआईपी दर्शन शुल्क को समाप्त करने की मांग कर रही थी। मुख्य न्यायाधीश  ने कहा कि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। उन्होंने कहा, ‘हालांकि हमारी राय है कि मंदिरों में प्रवेश के संबंध में कोई विशेष व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन हमें नहीं लगता कि यह अनुच्छेद 32 के तहत अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने का उपयुक्त मामला है।’ यह आदेश में दर्ज किया गया लेकिन मामला सरकार के विचार के लिए छोड़ दिया गया।मुख्य न्यायधीश खन्ना ने कहा कि यह मामला कानून-व्यवस्था का प्रतीत होता है और याचिका इस पहलू पर होनी चाहिए थी। बेंच ने कहा, ‘हम स्पष्ट करते हैं कि याचिका खारिज होने से संबंधित अधिकारियों को जरूरत के हिसाब से कार्रवाई करने से नहीं रोका जाएगा।

याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, ‘आज 12 ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ इस प्रैक्टिस को फॉलो करते हैं। ये मनमाना और भेदभाव वाला है। यहां तक कि गृह मंत्रालय ने भी आंध्र प्रदेश से इसकी समीक्षा करने को कहा है। चूंकि, भारत में 60 प्रतिशत पर्यटन धार्मिक है, इसलिए ये भगदड़ की प्रमुख वजह भी है।’ सुप्रीम कोर्ट में ये याचिका विजय किशोर गोस्वामी ने डाली थी। उन्होंने मंदिरों में अतिरिक्त शुल्क लेकर ‘वीआईपी दर्शन’ के चलन को आर्टिकल 14 के तहत समानता के अधिकार और आर्टिकल 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन बताया। उन्होंने दलील दी कि जो लोग इस तरह का शुल्क अदा करने में असमर्थ हैं, ये उनके खिलाफ भेदभाव है। याचिका में जोर देकर कहा गया था कि कई मंदिर 400 से 500 रुपये में लोगों के लिए विशेष दर्शन की व्यवस्था करते हैं। इससे आम श्रद्धालु और खासकर महिलाएं, स्पेशली एबल्ड लोग और सीनियर सिटिजंस को दर्शन में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यह मामला देश भर के मंदिरों में आम लोगों और वीआईपी के बीच भेदभाव के मुद्दे को उठाता है। वीआईपी दर्शन की सुविधा से आम लोगों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है, जबकि वीआईपी आसानी से दर्शन कर लेते हैं।

ये एकजगह नही है,श्रृद्धालू को इस समस्या से सभी  जगह रूबरू होना पड़ता है।  जगह –जगह मंदिरों में इस समस्या का सामना करना पड़ा है। लगभग  40 साल पहले हम कोलकत्ता  गए। कालिका जी मंदिर में हम श्रृद्धालुओं की लाइन में लगे थे कि  हमारे एक साथी ने देखा  और हमें इशारा कर अपने पास बुला लिया। यहां पुजारी पांच रूपया प्रति व्यक्ति लेकर सीधे दर्शन करा  रहे थे। अभी  वेट द्वारिका जाना   हुआ। हम परिवार के छह सदस्य थे। एक पंडित जी ने हमसे पांच सौ रूपये लिए।अलग लाइन से हमें आराम से दर्शन कराए। भीड़− भाड़ भी बची।वैसे दर्शन में दो से तीन घंटे लगते  पांच सौ रूपये में आधा घंटा में दर्शन कर मंदिर से बाहर आ गए। करीब दस साल पहले हम गुजरात में अम्बा जी गए थे। दर्शन की लाइन में  लगे थे कि कर्मचारियों ने यह कह कर हमके रोक दिया कि दर्शन का समय समाप्त हो गया, जबकि कुछ अन्य को लगातार प्रदेश  दिया जा रहा। किसी तरह  हम अन्यों  वाली पंक्ति में शामिल हुए। तब दर्शन हुए। दर्शन भी  बड़े  आराम से हुए। काफी समय हम मंदिर में रूके , जबकि ऐसा  पहले संभव नही था। इस तरह का भेदभाव हमें कई जगह देखने को  मिला। उज्जैन में तो  आप  पंडित को पांच  सौ के आसपास रूपये दीजिए।वह मंदिर के गर्भ गृह में ले जाकर पूजन अर्चन कराते हैं। जो ये रकम नही देते वे गर्भगृह के बाहर ही दूर से दर्शन कर तृप्त  हो जाते हैं।ओंकारेश्वर में तो पंडित जी पूजा भी आराम से और श्रद्धालुओं की पंक्ति से अलग लेकर कराते हैं। मथुरा  जी के बांके बिहारी मंदिर में सुपरिम आदेश   से  यह व्यवस्था रूकी है, अन्यथा लगभग सभी मंदिरों की हालत ऐसी ही है।      

सुपरिम कोर्ट ने याचिका तो खारिज कर दी, किंतु इस  वीआईपी दर्शन पर रोक वाली गेंद केंद्र सरकार के पाले में यह कह कर डाल दी । बेंच ने कहाकि बेंच इस मुद्दे से सहमत है, लेकिन अनुच्छेद 32 के तहत निर्देश जारी नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश  संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है। इस पर केंद्र सरकार को विचार करना होगा। बेंच ने यह भी कहा कि वीआईपी के लिए ऐसा विशेष व्यवहार मनमाना है।

सुपरिम कोर्ट का  यह  निर्देश  अब केंद्र सरकार को विवश करेगा कि मंदिरों में आम आदमी के साथ हो रहे भेदभाव को रोके और बांके बिहारी मंदिर की तरह पैसा लेकर कराए जा रहे वीआईपी दर्शन  की व्यवस्था  खत्म  करे। व्यवस्था  अयोध्या  जी के श्रीराम मंदिर जैसी हो, जहां श्रद्धालू बिना भेदभाव आराम से 25−30 मिनट में दर्शन कर बाहर आ सके।

अशोक मधुप

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं)

बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है मगर सम्मान और सुविधाएं नहीं

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बाल मुकुन्द ओझा

 बुजुर्गों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति पर आये दिन मीडिया में खबरे सुर्खियां बटोरती है। बुजुर्ग किसी भी समाज का आधार होते हैं। उनके अनुभव, ज्ञान, और जीवन-मूल्य अगली पीढ़ी को दिशा देते हैं। लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश, शहरीकरण, और आधुनिक जीवनशैली के कारण बुजुर्गों की स्थिति में काफी बदलाव आया है। आज के समाज में वरिष्ठ नागरिकों के लिए आपस में मिलने-जुलने, बातचीत करने और अपने अनुभव साझा करने की जगहें कम होती जा रही हैं। इसका सीधा असर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। इसी अकेलेपन को दूर करने के लिए विभिन्न शहरों में कॉफी क्लब, चाय क्लब और पार्क क्लब जैसे आयोजन किए जा रहे हैं। कुछ गैर-सरकारी संगठन भी बुजुर्गों के लिए हर महीने खास मुलाकातें आयोजित करते हैं, जहाँ वे अपने शौक (जैसे स्नेह मिलन, गज़ल, संगीत या ताश) को पूरा कर पाते हैं। एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में आगामी 2030 तक प्रत्येक 6 में से एक व्यक्ति की आयु 60 वर्ष से ज्यादा होंगी। हमारे देश की बात करें तो भारत की बुजुर्ग आबादी अगले दशक में 41 प्रतिशत तक बढ़ जाने का अनुमान है, यानी 2031 तक इस देश में 194 मिलियन वरिष्ठ नागरिक हो जाएंगे। यह जानकारी एक सरकारी रिपोर्ट में दी गई है। दुनिया के कुछ देश बुजुर्गों को एक ही छत के नीचे स्वास्थ्य सहित सभी प्रकार की मूलभूत सुविधाएं सुलभ करा रहे है। मगर हमारे देश में बुजुर्गों को पेंशन स्वास्थ्य सुविधा आदि की आंशिक सुविधा जरूर दी जा रही है मगर अन्य आवश्यक सुविधाओं की दृष्टि से हम बहुत पीछे है।

संयुक्त राष्ट्र की इंडिया एजिंग रिपोर्ट के मुताबिक देश और दुनिया की आबादी बूढ़ी हो रही है। वैश्विक स्तर पर बात करें तो 2023 में 7.9 अरब की आबादी में से करीब 1.1 अरब लोगों की उम्र 60 साल से अधिक होगी। यह जनसंख्या का लगभग 13.9 प्रतिशत है। 2050 तक वैश्विक आबादी में बुजुर्गों की संख्या बढ़कर लगभग 2.2 बिलियन हो जाएगी। भारत की बात करें तो देश में बुजुर्गों की आबादी बढ़ने का सिलसिला 2010 से शुरू हुआ है। वर्तमान चलन के अनुसार, 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या लगभग 15 वर्षों में दोगुनी हो रही है। मगर आबादी की वृद्धि के बावजूद बुजुर्गों को जीविनोपयोगी पूरी सुविधाएं आज भी नहीं मिल रही है। सामाजिक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को तेजी से बढ़ते उम्र वाले लोगों की जिम्मेदारी संभालने के हिसाब से तैयार होना होगा। सीनियर सिटीजन के हेल्थ, सोशल सर्विस और ओल्ड एज केयर के मामले में सरकार को बड़ा निवेश करने और इसके लिए बड़ी तैयारी करने की जरूरत है।  इन चीजों की मौजूदा हालत खस्ता है और इस स्थिति में भारत में सीनियर सीटिजन के लिए मुश्किलें और बढ़ने वाली है।

 विश्व सामाजिक रिपोर्ट के मुताबिक लोग पहले की तुलना में कहीं अधिक वृद्धावस्था तक जी रहे हैं। लेकिन, साथ ही पेंशन, जीवन-व्यापन और स्वास्थ्य देखभाल की कीमतों में भी भारी उछाल आया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जन्म से ही समान अवसरों को बढ़ावा देकर, हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य के साथ वृद्ध होने पर भी बेहतर सुविधाएं दी जा सकती हैं, जिससे देश फिर से लाभान्वित हो सकते हैं। रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि देशों को लंबे समय से चली आ रही नीतियों और आजीविका और काम से जुड़े तरीको पर फिर से विचार करना चाहिए। अब समय आ गया है जब 65 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या सदी के मध्य तक दोगुनी से अधिक होने का अनुमान है। रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में, दुनिया भर में 76.1 करोड़ लोग 65 और उससे अधिक आयु के थे, जो 2050 तक बढ़कर 1.6 अरब हो जाएंगे। रिपोर्ट में कहा गया है कि 80 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या और भी तेजी से बढ़ रही है। स्वास्थ्य और चिकित्सा उपचारों में सुधार, शिक्षा तक अधिक पहुंच और प्रजनन क्षमता में कमी के कारण लोग लंबे समय तक जी रहे हैं।

भारत में कभी बुजुर्गों की पूजा की जाती थी। बुजुर्ग घर की आन बान और शान थे। बिना बुजुर्ग को पूछे कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता था। आज वही बुजुर्ग अपने असहाय होने की पीड़ा से गुजर रहा है। दुर्भाग्य से उसे यह मर्मान्तक पीड़ा देने वाले कोई और नहीं अपितु उनके परिजन ही है। बुजुर्गो का सम्मान करने और सेवा करने की हमारे समाज की समृद्ध परंपरा रही है। समाचार पत्रों में इन दिनों बुजुर्गों के सम्बन्ध में प्रकाशित होने वाले समाचार निश्चय ही दिल दहला देने वाले हैं। राम राज्य का सपना देखने वाला हमारा देश आज किस दिशा में जा रहा है, यह बेहत चिंतनीय है। भारत में बुजुर्गों का मान-सम्मान तेजी से घटा है। यह हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों का अवमूल्यन है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। बुजुर्गों की वास्तविक समस्याएं क्या है और उनका निराकरण कैसे किया जाये इस पर गहनता से मंथन की जरूरत है। आज घर  घर में बुजुर्ग है। ये इज्जत से जीना चाहते है।  मगर यह कैसे संभव है यह विचारने की जरूरत है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

जब जांच ही अधिकारों का उल्लंघन बन जाए

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नार्को टेस्ट और संविधान : अधिकार, नैतिकता और न्याय

– डॉ सत्यवान सौरभ

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनैच्छिक नार्को‑विश्लेषण परीक्षणों को पुनः असंवैधानिक करार देना भारतीय लोकतंत्र में संविधान की सर्वोच्चता की एक महत्वपूर्ण पुनःघोषणा है। यह निर्णय केवल आपराधिक जांच की किसी एक तकनीक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य की दंडात्मक शक्ति, व्यक्ति की गरिमा और न्याय व्यवस्था की नैतिक दिशा पर गहरा प्रश्न उठाता है। आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत यह है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर भी नागरिकों के मौलिक अधिकारों से समझौता नहीं किया जा सकता।

नार्को टेस्ट मूलतः एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें आरोपी या संदिग्ध व्यक्ति को विशेष रासायनिक दवाएँ देकर उसकी चेतन अवस्था को कमजोर किया जाता है, ताकि वह बिना प्रतिरोध के प्रश्नों के उत्तर दे सके। इसे अक्सर ‘सत्य निकालने’ की तकनीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। किंतु सत्य तक पहुँचने का कोई भी मार्ग यदि असंवैधानिक, अमानवीय और अवैज्ञानिक है, तो वह न्याय का मार्ग नहीं हो सकता। भारतीय संविधान ने राज्य और नागरिक के संबंधों को संतुलित करने के लिए स्पष्ट सीमाएँ तय की हैं, जिनका उल्लंघन किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

संविधान का अनुच्छेद 20(3) आत्म‑अभिशंसा से संरक्षण का अधिकार प्रदान करता है। इसका आशय यह है कि किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध साक्ष्य देने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। अनैच्छिक नार्को टेस्ट इस अधिकार का सीधा उल्लंघन है, क्योंकि इसमें व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उससे जानकारी उगलवाने का प्रयास किया जाता है। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) के ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि नार्को टेस्ट, ब्रेन मैपिंग और पॉलीग्राफ जैसी तकनीकें यदि बिना सहमति के कराई जाती हैं, तो वे असंवैधानिक हैं। यह निर्णय केवल विधिक व्याख्या नहीं, बल्कि संवैधानिक नैतिकता की रक्षा का घोषणापत्र है।

अनुच्छेद 21, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है, नार्को टेस्ट के संदर्भ में और भी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है। जीवन का अधिकार केवल शारीरिक अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमा, मानसिक स्वायत्तता और निजता भी सम्मिलित हैं। किसी व्यक्ति के शरीर में रासायनिक पदार्थ डालकर उसकी चेतना पर नियंत्रण करना उसकी शारीरिक और मानसिक स्वतंत्रता का गंभीर अतिक्रमण है। सर्वोच्च न्यायालय ने समय‑समय पर अनुच्छेद 21 की व्याख्या करते हुए कहा है कि राज्य की प्रत्येक कार्रवाई ‘न्यायसंगत, उचित और तर्कसंगत’ होनी चाहिए। नार्को टेस्ट इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता।

न्यायिक प्रक्रिया के दृष्टिकोण से भी नार्को टेस्ट अनेक प्रश्न खड़े करता है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत वही साक्ष्य स्वीकार्य होते हैं जो स्वेच्छा से और विश्वसनीय तरीके से प्राप्त किए गए हों। नार्को टेस्ट के दौरान दिए गए कथन न तो पूर्णतः स्वैच्छिक होते हैं और न ही वैज्ञानिक रूप से विश्वसनीय। दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति की स्मृति, कल्पना और बाहरी सुझाव आपस में घुल‑मिल जाते हैं। ऐसी स्थिति में प्राप्त जानकारी को सत्य मान लेना न्यायिक त्रुटि को आमंत्रित करना है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे परीक्षणों के परिणामों को साक्ष्य के रूप में स्वीकार करने से इंकार किया है।

एक और गंभीर संवैधानिक समस्या ‘सहमति’ की अवधारणा से जुड़ी है। समर्थक यह तर्क देते हैं कि यदि आरोपी सहमति दे, तो नार्को टेस्ट कराया जा सकता है। किंतु हिरासत की स्थिति में दी गई सहमति कितनी स्वतंत्र और स्वैच्छिक होती है, यह एक जटिल प्रश्न है। पुलिस हिरासत में शक्ति का असंतुलन स्वाभाविक होता है। भय, दबाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच दी गई सहमति को वास्तविक सहमति नहीं कहा जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने भी माना है कि हिरासत में प्राप्त सहमति की विश्वसनीयता संदिग्ध होती है।

संवैधानिक पहलुओं के साथ‑साथ नार्को टेस्ट गहरे नैतिक प्रश्न भी उठाता है। मानव गरिमा आधुनिक मानवाधिकार विमर्श का केंद्रीय तत्व है। किसी व्यक्ति को उसकी चेतन अवस्था से वंचित कर, रासायनिक रूप से नियंत्रित कर उससे जानकारी प्राप्त करना उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाता है। यह दृष्टिकोण व्यक्ति को एक ‘साधन’ में बदल देता है, जबकि संविधान व्यक्ति को ‘लक्ष्य’ मानता है। दार्शनिक दृष्टि से भी यह प्रक्रिया मानव को उसकी इच्छा और विवेक से अलग कर देती है, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।

वैज्ञानिक दृष्टि से नार्को टेस्ट की विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न हैं। यह धारणा कि दवाओं के प्रभाव में व्यक्ति केवल सत्य ही बोलेगा, एक मिथक है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ऐसी दवाएँ व्यक्ति की निर्णय क्षमता को कमजोर कर देती हैं, जिससे वह काल्पनिक घटनाओं को भी वास्तविक समझकर बयान कर सकता है। कई बार पूछताछ करने वाले के प्रश्नों का प्रभाव उत्तरों को दिशा देता है, जिससे ‘सत्य’ नहीं बल्कि जांचकर्ता की अपेक्षा सामने आती है। इस प्रकार नार्को टेस्ट सत्य की खोज के बजाय भ्रम की सृष्टि कर सकता है।

चिकित्सीय नैतिकता के संदर्भ में भी नार्को टेस्ट गंभीर चिंता का विषय है। चिकित्सा पेशा ‘हानि न पहुँचाने’ के सिद्धांत पर आधारित है। जब कोई चिकित्सक बिना किसी उपचारात्मक उद्देश्य के, केवल जांच के लिए, किसी व्यक्ति को दवाएँ देता है, तो वह इस सिद्धांत का उल्लंघन करता है। इसके अतिरिक्त, नार्को टेस्ट के दौरान स्वास्थ्य जोखिम भी मौजूद रहते हैं, विशेषकर यदि व्यक्ति पहले से किसी शारीरिक या मानसिक रोग से ग्रस्त हो। ऐसे में चिकित्सकों की भूमिका और जिम्मेदारी पर भी प्रश्न उठते हैं।

नार्को टेस्ट के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि गंभीर अपराधों, आतंकवाद या जटिल मामलों में यह जांच को दिशा देने में सहायक हो सकता है। किंतु यह तर्क संवैधानिक मूल्यों के सामने कमजोर पड़ जाता है। संविधान किसी भी परिस्थिति में मूल अधिकारों के निलंबन की अनुमति नहीं देता, सिवाय आपातकाल जैसी असाधारण स्थितियों के, वह भी सीमित दायरे में। अपराध की गंभीरता राज्य को मनमानी करने का अधिकार नहीं देती। यदि आज हम गंभीर अपराधों के नाम पर अधिकारों से समझौता करते हैं, तो कल यह दायरा सामान्य अपराधों तक भी फैल सकता है।

वास्तव में, नार्को टेस्ट जांच एजेंसियों की उस मानसिकता को दर्शाता है, जो त्वरित परिणामों की चाह में संवैधानिक रास्तों से भटक जाती है। यह जांच की अक्षमता को ढकने का एक आसान रास्ता बन जाता है। इसके विपरीत, आधुनिक आपराधिक न्याय व्यवस्था साक्ष्य‑आधारित, वैज्ञानिक और पेशेवर जांच पर बल देती है। डीएनए विश्लेषण, डिजिटल फॉरेंसिक, वित्तीय जांच और गवाह संरक्षण जैसी तकनीकें न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि अधिकारों के अनुरूप भी हैं।

पुलिस सुधार और प्रशिक्षण इस संदर्भ में अत्यंत आवश्यक हैं। जब तक जांच एजेंसियों को आधुनिक तकनीक, पर्याप्त संसाधन और संवैधानिक मूल्यों का प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक वे ऐसे शॉर्टकट अपनाने के लिए प्रेरित होती रहेंगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी हिरासत संबंधी दिशा‑निर्देश और पुलिस आधुनिकीकरण योजनाएँ इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं, किंतु इनके प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता है।

न्यायपालिका की भूमिका भी केवल प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी जांच प्रक्रिया में अधिकारों का उल्लंघन न हो। साथ ही, न्यायिक प्रशिक्षण में भी संवैधानिक नैतिकता और मानवाधिकारों पर विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि निचली अदालतों में भी इन मूल्यों की रक्षा हो सके।

अंततः, नार्को टेस्ट का प्रश्न केवल एक तकनीक का नहीं, बल्कि उस दृष्टिकोण का है जिससे राज्य अपने नागरिकों को देखता है। क्या नागरिक केवल जांच के साधन हैं, या वे अधिकारों से युक्त गरिमामय व्यक्ति हैं? भारतीय संविधान ने स्पष्ट रूप से दूसरे विकल्प को चुना है। लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह अपराध से निपटते समय भी अपने मूल्यों से विचलित न हो।

निष्कर्षतः, सर्वोच्च न्यायालय का रुख यह स्मरण कराता है कि न्याय का उद्देश्य केवल दोषसिद्धि नहीं, बल्कि निष्पक्ष, मानवीय और संवैधानिक प्रक्रिया के माध्यम से सत्य तक पहुँचना है। नार्को टेस्ट जैसी विधियाँ इस उद्देश्य के विपरीत हैं। एक सशक्त लोकतंत्र वही है जो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मानव गरिमा और मौलिक अधिकारों की रक्षा करे। यही संवैधानिक चेतना भारत की न्याय व्यवस्था की आत्मा है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारतीय रेल ने उर्वरक लोडिंग में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की

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भारतीय रेल ने उर्वरक लोडिंग में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है, जिससे देश भर के किसानों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।चालू वित्त वर्ष में अब तक भारतीय रेल ने 17,168 उर्वरक रैक लोड किए हैं, जिससे ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा को मजबूती मिली है।

भारतीय रेल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को सहयोग देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पूरे देश में उर्वरकों की सुचारू और समय पर आवाजाही सुनिश्चित करता है। इस वर्ष 30 नवंबर तक उर्वरक की लोडिंग 17,168 रेक तक पहुंच गई। यह पिछले वर्ष की इसी अवधि के 15,369 रेक की तुलना में 11.7 प्रतिशत की वृद्धि है। यह वृद्धि रेलवे नेटवर्क के कुशल संचालन को दर्शाती है।

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। किसानों को बुवाई के लिए समय पर उर्वरकों की आवश्यकता होती है। इसे ध्यान में रखते हुए, भारतीय रेल ने उर्वरक और खाद्यान्न ले जाने वाली ट्रेनों को प्राथमिकता दी है। इससे देश भर के राज्यों में निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हुई है।

आवश्यक माल ढुलाई सेवाओं को मजबूत करके रेलवे लाखों किसानों की मदद कर रहा है। यह ग्रामीण आजीविका, खाद्य सुरक्षा और समग्र आर्थिक स्थिरता को भी बढ़ावा दे रहा है। यह प्रदर्शन भारतीय रेल की राष्ट्र निर्माण के प्रति संकल्‍प और भारत की कृषि आपूर्ति श्रृंखला को समर्थन देने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करता है। उर्वरक रैकों की प्राथमिकता के आधार पर आवाजाही करके, रेलवे किसानों को निर्बाध आपूर्ति बनाए रखने में मदद करता है, जिससे वे बिना किसी देरी के कृषि कार्य कर सकें। समय पर आपूर्ति होने से फसलों की उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ खेती की आय में वृद्धि होती है और खाद्य सुरक्षा मजबूत होती है। रेल परिवहन कार्बन उत्सर्जन को कम करता है, राजमार्गों पर भीड़भाड़ कम करता है और एक पर्यावरण के अनुकूल तथा अधिक विश्वसनीय रसद समाधान प्रदान करता है।

मियाना रेलवे स्टेशन राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित

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राष्ट्रपति ने पुरस्कार प्रदान किया

भारतीय रेल ने ऊर्जा संरक्षण के क्षेत्र में एक नया मुकाम हासिल किया है। राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण दिवस के अवसर पर, राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी ने मध्य प्रदेश के गुना स्थित मियाना रेलवे स्टेशन को राष्ट्रीय ऊर्जा संरक्षण पुरस्कार, 2025 प्रदान किया। यह पुरस्कार महिला एवं रेलवे स्टेशन की महाप्रबंधक श्रीमती शोभना बंदोपाध्याय ने ग्रहण किया। स्टेशन को परिवहन श्रेणी (रेलवे स्टेशन) में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली इकाई के रूप में मान्यता दी गई है।

ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (बीईई) द्वारा दिया जाने वाला यह पुरस्कार ऊर्जा संरक्षण में उत्कृष्ट प्रयासों को मान्यता देता है। मियाना रेलवे स्टेशन को एलईडी लाइटिंग, बीएलडीसी पंखों और 30-70 प्रतिशत स्मार्ट लाइटिंग सर्किट संचालन प्रणालियों के प्रभावी इस्‍तेमाल के लिए चुना गया है। इन उपायों से स्टेशन को 9,687 यूनिट बिजली की बचत करने में मदद मिली है, जो ऊर्जा दक्षता और सतत विकास पर रेलवे के मजबूत फोकस को दर्शाता है।

भारतीय रेलवे ऊर्जा बचत, किफायती और पर्यावरण के अनुकूल संचालन के लिए प्रतिबद्ध है तथा मियाना रेलवे स्टेशन अपने प्रभावी कार्यान्वयन और सतत विकास के एक मॉडल के रूप में उभर रहा है।

सबसे बड़े डिजिटल पेंशन प्लेटफॉर्म ‘स्पर्श’ पर 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगी पंजीकृत

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देश के सबसे बड़े डिजिटल पेंशन प्लेटफॉर्म ‘स्पर्श’ पर 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगी पंजीकृत हुए।स्पर्श’ देश की सबसे बड़ी एकीकृत पेंशन प्रणाली है और रक्षा कर्मियों के लिए एकमात्र पूर्णतः एकीकृत डिजिटल पेंशन समाधान है। यह पूर्व सैनिकों और उनके परिवारों के लिए सम्मान, देखभाल और समय पर सहायता सुनिश्चित करने के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।पुराने विवादों के 94.3 प्रतिशत मामले सुलझा लिए गए; शिकायतों के निवारण का औसत समय 56 दिनों से घटकर 17 दिन हो गया।

प्रयागराज स्थित पीसीडीए (पेंशन) के माध्यम से रक्षा लेखा विभाग (डीएडी) द्वारा संचालित ‘स्पर्श’ ने नवंबर, 2025 तक भारत और नेपाल में 31.69 लाख रक्षा पेंशनभोगियों को अपने साथ जोड़ा है। यह 45 हजार से अधिक एजेंसियों द्वारा पहले प्रबंधित खंडित प्रणाली को एक एकीकृत, पारदर्शी और जवाबदेह डिजिटल ढांचे से प्रतिस्थापित करता है।पिछली प्रणाली से स्थानांतरित किए गए 6.43 लाख विसंगतिपूर्ण मामलों में से 6.07 लाख मामलों को पेंशनभोगियों के अधिकारों को प्रभावित किए बिना सामान्य कर दिया गया है। देश में 284 ‘स्पर्श’ पहुंच कार्यक्रम और 194 रक्षा पेंशन समाधान कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। चालू वित्त वर्ष में आयोजित इन कार्यक्रमों के दौरान 8 हजार से अधिक शिकायतों का मौके पर ही समाधान किया गया।

 पेंशनभोगी अब अपनी पेंशन की पूरी जानकारी ऑनलाइन देख सकते हैं और आसानी से सुधार संबंधी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं। शिकायतों के निवारण का औसत समय अप्रैल, 2025 में 56 दिन से घटकर नवंबर, 2025 में 17 दिन हो गया है। प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार रक्षा लेखा विभाग  ने 73  प्रतिशत  संतुष्टि अंक प्राप्त किया है जिससे यह मंत्रालयों/विभागों में 5 वें स्थान पर है।

  • क्षा एवं पेंशनभोगी विभाग (डीओपी एंड पीडब्ल्यू) के राष्ट्रव्यापी डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र (डीएलसी) 4.0 अभियान (1-30 नवंबर, 2025) के अंतर्गत रक्षा लेखा विभाग ने 202 कार्यालयों, 4.63 लाख सामान्य सेवा केंद्रों और 15 भागीदार बैंकों को सक्रिय किया है  जिन्हें 27 नोडल अधिकारियों का सहयोग प्राप्त है। 30 नवंबर, 2025 तक रक्षा पेंशनभोगियों के लिए 20.94 लाख डिजिटल जीवन प्रमाण-पत्र जारी किए जा चुके हैं, जो सभी विभागों में सबसे अधिक है।
  • वितरण : वित्त वर्ष 2024-25 में, रक्षा पेंशन बजट के अंतर्गत 1,57,681 करोड़ रुपये का वितरण ‘स्‍पर्श’ के माध्यम से वास्तविक समय के आधार पर किया गया। जुलाई, 2024 में लागू वन रैंक वन पेंशन-III के अंतर्गत मात्र 15 दिनों में 20.17 लाख लाभार्थियों को 1,224.76 करोड़ रुपये का त्वरित वितरण संभव हुआ।

संसद में एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025 पेश किया

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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज संसद में सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया बिल, 2025  पेश किया। यह बिल भारत के परमाणु ऊर्जा को नियंत्रित करने वाले कानूनी तंत्र को अपडेट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और परमाणु क्षति के लिए नागरिक जिम्मेदारी अधिनियम, 2010 को रद्द करना और उन्हें भारत की वर्तमान एवं भविष्य की ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुरूप एक एकल, व्यापक कानून में परिवर्तित करना है।

विधेयक के साथ संलग्न उद्देश्यों एवं कारणों के विवरण के अनुसार, निरंतर अनुसंधान एवं विकास के माध्यम से भारत को परमाणु ईंधन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिम्मेदारी के साथ संचालित करने में सक्षम बनाया है। इस अनुभव के आधार पर, सरकार स्वच्छ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने एवं डेटा केंद्रों और भविष्य के लिए तैयार अनुप्रयोगों जैसी उभरती आवश्यकताओं के लिए चौबीसों घंटे विश्वसनीय विद्युत आपूर्ति प्रदान करने के लिए परमाणु ऊर्जा की स्थापित क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करने की संभावना देखती है।

प्रस्तावित विधेयक भारत के दीर्घकालिक ऊर्जा एवं जलवायु लक्ष्यों से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है। यह 2070 तक कार्बन न्यूनीकरण के लिए देश की रूपरेखा और 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य को रेखांकित करता है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए, विधेयक स्वदेशी परमाणु संसाधनों का पूर्ण उपयोग करने और सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्रों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देता है, साथ ही भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा पारिस्थितिकी तंत्र में योगदानकर्ता के रूप में स्थापित करता है।

यह विधेयक परिचालन स्तर पर परमाणु ऊर्जा के उत्पादन या उपयोग में शामिल निर्दिष्ट व्यक्तियों के लिए लाइसेंस और सुरक्षा प्राधिकरण का प्रावधान करता है, साथ ही निलंबन या रद्द करने का स्पष्ट आधार भी बताता है। इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा, खाद्य एवं कृषि, उद्योग एवं अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में परमाणु और विकिरण प्रौद्योगिकियों के उपयोग को विनियमित करना है जबकि अनुसंधान, विकास एवं नवाचार गतिविधियों को लाइसेंसिंग आवश्यकताओं से छूट प्रदान की गई है।

इस बिल में परमाणु क्षति के लिए एक संशोधित एवं व्यावहारिक नागरिक दायित्व तंत्र का भी प्रस्ताव है, यह परमाणु ऊर्जा विनियामक बोर्ड को वैधानिक स्थिति प्रदान करता है, और सुरक्षा, सुरक्षा उपाय, गुणवत्ता आश्वासन एवं आपातकालीन तैयारी से संबंधित तंत्र को मजबूत करता है। यह नए संस्थागत व्यवस्थाओं के निर्माण का प्रावधान करता है, जिसमें एक परमाणु ऊर्जा शिकायत सलाहकार परिषद का गठन, दावा अधिकारियों की नियुक्ति और गंभीर परमाणु क्षति से संबंधित मामलों के लिए एक परमाणु क्षति दावा आयोग शामिल हैं, जिसमें विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण अपीलीय प्राधिकरण के रूप में काम करेगा।

इस विधेयक पेश करके, सरकार ने संकेत दिया है कि वह भारत के ऊर्जा परिवर्तन, तकनीकी प्रगति एवं अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप नाभिकीय शासन को आधुनिक बनाने का सोच रखती है। प्रस्तावित कानून नाभिकीय ऊर्जा के विस्तार को सुरक्षा, जवाबदेही एवं सार्वजनिक हित के साथ संतुलित करने का प्रयास है, और नाभिकीय ऊर्जा को ऊर्जा सुरक्षा और कम कार्बन उत्सर्जन वाले भविष्य की दिशा में राष्ट्रीय प्रयास को व्यापक बनाता है।

तीन देशों के राजदूतों ने राष्ट्रपति मुर्मु को अपने परिचय पत्र प्रस्तुत किए

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू ने आज (15 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक समारोह में ईरान, ब्रुनेई दारुस्सलाम और माइक्रोनेशिया के राजदूतों के परिचय पत्र स्वीकार किए।उधर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

1 इस्लामी गणराज्य ईरान के राजदूत, डॉ. मोहम्मद फथली

ब्रुनेई दारुस्सलाम की उच्चायुक्त, श्रीमती सिटी अरनीफरिज़ा हाजी मोहम्मद जैनी

माइक्रोनेशिया संघीय राज्यों के राजदूत जॉन फ्रिट्ज

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 16 से 22 दिसंबर, 2025 तक कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना का दौरा करेंगी।

16 दिसंबर को राष्ट्रपति कर्नाटक में मांड्या जिले के मालवल्ली में आदि जगद्गुरु श्री शिवरात्रिश्वर शिवयोगी महास्वामीजी के 1066वें जयंती समारोह का उद्घाटन करेंगी।

17 दिसंबर को राष्ट्रपति तमिलनाडु में वेल्लोर स्थित स्वर्ण मंदिर में दर्शन और आरती करेंगी। इसके बाद वे शीतकालीन प्रवास के लिए सिकंदराबाद के बोलारम स्थित राष्ट्रपति निलयम पहुंचेंगी।

19 दिसंबर को राष्ट्रपति हैदराबाद में तेलंगाना लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन करेंगी।

20 दिसंबर को राष्ट्रपति हैदराबाद में ‘भारत का शाश्वत ज्ञान: शांति और प्रगति के मार्ग’ विषय पर एक सम्मेलन को संबोधित करेंगे। इस सम्मेलन का आयोजन ब्रह्मा कुमारीज़ शांति सरोवर अपनी 21वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में कर रहा है।